संघ के शताब्दी वर्ष के उपलक्ष्य में मुंबई के नेहरू सेंटर, वर्ली में आयोजित ‘संघ यात्रा के १०० वर्ष : नए क्षितिज’ इस दो दिवसीय संवाद कार्यक्रम में प्रश्नोत्तर सत्र में डॉ. मोहन भागवत ने विभिन्न राष्ट्रीय, अंतरराष्ट्रीय, सामाजिक तथा सांस्कृतिक विषयों से जुड़े प्रश्नों के बेबाक उत्तर दिए। इस व्य़ाख्यानमाला में मुंबई के कॉर्पोरेट जगत से लेकर फिल्म, खेल, सामाजिक व सांस्कृतिक क्षेत्र के लगभग एक हजार लोग उपस्थित थे। संघ प्रमुख के साथ इस अवसर पर मंच पर संघ के पश्चिम क्षेत्र संघचालक डॉ. जयंतीभाई भाडेसिया, कोंकण प्रांत संघचालक श्री अर्जुन चांदेकर, मुंबई महानगर संघचालक श्री सुरेश भगेरिया भी उपस्थित थे।
पुणे के पेशवा के समय का उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि उनके महल के बाहर एक बच्चा गणेश जी की एक मुहर लेकर बैठता था, जो भी व्यक्ति पेशवा के दरबार में अपनी मांग लेकर जाता, वह उस कागज पर गणेशजी की मुहर लगा देता था। एक बार एक गाँव के लोग ये शिकायत लेकर आए कि उनके गाँव में पिछले कई सालों से तालाब नहीं बना।
जब पेशवा ने इस मामले की जाँच करवाई तो दरबारियों ने कहा कि इस पर गणेशजी की मुहर नहीं लगी थी, इसलिए इस पर काम नहीं हुआ। पेशवा ने कहा कि ये मुहर कौन लगाता है, तो पता चला कि महल के बाहर एक बच्चा सबसे पैसे लेकर ये मुहर लगाता है।
पेशवा ने उस बच्चे को गिरफ्तार करवाया तो उस बच्चे ने चुनौती दी कि आप मुझे गिरफ्तार कर सकते हो मगर भ्रष्टाचार खत्म नहीं कर सकते। इस पर पेशवा ने उसे गाँव के बाहर जंगल में नदी के किनारे एक झोपड़ी बनाकर दी और दोनों समय के खाने की व्यवस्था की और उसे चुनौती दी कि वह यहाँ जंगल में भ्रष्टाचार करके दिखाए।
उसने देखा कि नदी में नाविक नाव चलाते हैं। उसने सभी नाविकों को कहा कि मुझे राजा ने यहाँ रखा है। दोनों समय मुझे भोजन राजा की ओर से आता है। तुम लोग जो नाव चलाते हो इससे नदी में लहरें पैदा होती हैं, इन लहरों पर टैक्स देना पड़ेगा।
इस तरह उसने महीने भर में बोरा भरकर पैसे इकट्ठे किए और पेशवा के दरबार में जाकर रख दिए कि मैंने जंगल में बैठकर भी भ्रष्टाचार कर लिया।
चाणक्य ने कहा कि “मछली पानी में कब जल पीती है, पता नहीं चलता — वैसे ही सरकार में कर्मचारी कब भ्रष्टाचार कर लेते हैं, पता नहीं चलता।” “तोरा मन दर्पण कहलाए” — ये गाना यही बात कहता है।
संघ द्वारा संचालित एक छात्रावास का उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि गुरुदक्षिणा का पैसा छात्रावास में रखा था। उसी समय छात्रावास के बच्चों के लिए तीन दिन तक खाना नहीं था और खरीदने के पैसे भी नहीं थे।
जब अधिकारियों को पता चला कि बच्चों के लिए खाना नहीं है, तो उन्होंने कहा कि जब यहाँ गुरुदक्षिणा का पैसा रखा था तो इससे खाने की व्यवस्था क्यों नहीं की। तब उनको बताया गया कि ये गुरुदक्षिणा का पैसा है, इसको हम अपने काम में कैसे ले सकते हैं।
इसलिए भ्रष्टाचार कायदा, कानून और सजा से नष्ट नहीं होगा — वह होगा तो केवल संस्कारों से ही होगा।
संघ प्रमुख के उद्बोधन की यूट्यूब लिंक
इस कार्यक्रम में समाज के विभिन्न क्षेत्रों का प्रतिनिधित्व करने वाले प्रमुख लोग उपस्थित थे। संन्यास आश्रम के महामंडलेश्वर स्वामी विश्वेश्वरानंद जी, एस्सेल समूह व ज़ी नेटवर्क के संन्यास आश्रम के महामंडलेश्वर स्वामी विश्वेश्वरानंद जीडॉ. सुभाष चन्द्रा, उद्योगपति हर्ष गोयनका, सज्जन जिंदल, अजय पीरामल, कुमार मंगलम बिड़ला, अनन्या बिड़ला, एल एंड टी के एस. सुब्रह्मण्याम, एच डीएफसी बैंक के सीईओ शशिधर जगदीशन, मोर्गन स्टेनली के रिथम देसाई, फिल्म जगत की हस्तियों में अक्षय कुमार, विक्की कौशल, अनन्या पांडेय, हृदयनाथ मंगेशकर, करण जोहर, रवीना टंडन, शिल्पा शेट्टी, सुबोध भावे, महेश मांजरेकर, जैकी श्रॉफ, विनीत कुमार सिंह, रवि दुबे, रुपाली गांगुली, वाईआरएफ के सीईओ अक्षय विधानी आदि विशेष तौर पर उपस्थित थे। इसके अलावा डॉक्टर, वैज्ञानिक, शिक्षाविद, विधि विशेषज्ञ, खिलाड़ी, मीडिया प्रतिनिधि, सामाजिक संस्थाओं के सदस्य, धर्मगुरु, लेखक, सोशल मीडिया तथा विज्ञापन क्षेत्र के प्रमुख लोगों के साथ ही कई देशों को राजदूत भी उपस्थित थे।

उपस्थित लोगों द्वारा पूछे गए कुल १४३ प्रश्नों को १४ श्रेणियों में वर्गीकृत किया गया। इनमें संघनीति, हिंदुत्व, राष्ट्रीय परिदृश्य, शिक्षा, अर्थव्यवस्था, राजनीति, विदेश नीति, राष्ट्रीय सुरक्षा, संस्कृति, कला, खेल व भाषा, जीवनशैली, पर्यावरण आदि विभिन्न विषयों से जुड़े प्रश्नों पर डॉ. भागवत ने रोचक व तथ्यपूर्ण उत्तर देकर उपस्थित श्रोताओं की जबर्दस्त वाहवाही लूटी।
व्याख्यानमाला में संघ प्रमुख डॉ. मोहन भागवत का प्रश्न-उत्तर सत्र केवल संवाद भर नहीं था, बल्कि वह देश की राजनीति, समाज और सांस्कृतिक दिशा को लेकर संघ की दीर्घकालिक सोच का स्पष्ट प्रतिबिंब भी था। उनके उत्तरों में संतुलन, समावेशन और स्थिरता की स्पष्ट झलक दिखाई दी। दो दिनों में आयोजित चार सत्रों में उन्होंने संघ, राजनीति, समाज से लेकर राष्ट्रीय व अंतर्राष्ट्रीय राजनीति से जुड़े हर सवाल के बेबाक और तथ्यपूर्ण जवाब दिए।
उन्होंने कहा कि भारत पर ५०० वर्षों तक शासन करने के बाद भी आक्रमणकारी जो नहीं कर सके, वे अब क्या करेंगे? उन्होंने २०४७ में भारत विभाजित होगा जैसी बातों को तथ्यहीन बताते हुए कहा कि भारत को तोड़ने का सपना देखने वाले खुद टूट जाएंगे तथा उनके सपने कभी पूरे नहीं होंगे।
उन्होंने कहा कि ईसा मसीह द्वारा प्रतिपादित ईसाई धर्म और पैगंबर मोहम्मद द्वारा बताए गए इस्लाम का स्वरूप आज उसी रूप में दिखाई नहीं देता। इसका कारण यह है कि उनके बाद इन दोनों पंथों पर तत्कालीन राजनीति का प्रभाव बढ़ गया। परिणामस्वरूप इन पंथों की आध्यात्मिकता पीछे रह गई और राजनीतिक हित अधिक प्रभावी हो गए। इन पंथों के मूल आध्यात्मिक तत्वों को प्रोत्साहन दिया जाए तो विश्वभर के राजनीतिक संघर्ष कम हो सकते हैं।
वीर सावरकर को भारत रत्न नहीं दिए जाने पर तालियों की गड़गड़ाहट के बीच उन्होंने कहा कि स्वातंत्र्यवीर सावरकर करोड़ों भारतीयों के हृदय पर राज कर रहे हैं। किंतु यदि उन्हें भारत रत्न से सम्मानित किया जाता है, तो इससे इस सम्मान की ही प्रतिष्ठा बढ़ेगी।
–डॉ. हेडगेवार कहा करते थे कि भारत को अपनी मातृभूमि मानने वाला एक भी हिंदू इस भारत भूमि पर है तब तक यह हिन्दूराष्ट्र है भाजपा के सत्ता में आने से हमारे अच्छे दिन शुरू नहीं हुए, ऐसा उल्टा है. हम एक विचार और नीति लेकर चलते हैं. जैसे-जैसे हमारी शक्ति बढ़ती है, हम उसका प्रचार और प्रतिपादन करते हैं, लोग उसे मानने लगते हैं। जो चुनावी राजनीति में इस नीति का पुरस्कार करते हैं, उन्हें उसका लाभ मिलता है. हम राम मंदिर के पक्ष में थे, तो जो लोग उसके पक्ष में आए, उन्हें उसका लाभ मिला।
डॉ. भागवत ने कहा कि भाजपा के सत्ता में आने से संघ को कोई प्रत्यक्ष लाभ हुआ ऐसा नहीं है, बल्कि समाज में संघ की बढ़ती शक्ति और स्वीकार्यता का लाभ समान विचारधारा और भारतीय नीतियों का पालन करने वाले दलों को मिला है। संघ के स्वयंसेवकों के निरंतर परिश्रम तथा समाज द्वारा संघ को दिए गए स्नेह और विश्वास के कारण ही संघ का कार्य बढ़ा है।
आपातकाल, गुरूजी जन्मशती, राम मंदिर आंदोलन आदि के माध्यम से आप सभी के सहयोग और स्वयंसेवकों के पुरूषार्थ से ही हमारे अच्छे दिन आए हैं. उसका लाभ हमारा समर्थन करने वालों को मिला है।
उन्होंने स्पष्ट किया कि संघ से संबंधित संस्थाओं, संगठनों या दलों पर संघ दबाव नहीं डालता। यहां कार्य करने वाले स्वयंसेवकों को पर्याप्त स्वतंत्रता होती है, जिससे वे अपने क्षेत्र में आवश्यक निर्णय और प्रयोग जिम्मेदारी से कर सकते हैं। वे जो अच्छे कार्य करते हैं, उसका श्रेय उन्हीं को जाता है, लेकिन जहां कमियां रह जाती हैं, उसके प्रश्न अभिभावक के नाते हमारे पास आते हैं और उसकी नैतिक जिम्मेदारी हम लेते हैं। संघ का कार्य केवल व्यक्तिनिर्माण का कार्य है। किसी विशेष क्षेत्र में कार्य करना संघ का कार्य नहीं है।
समान नागरिक संहिता पर अपनी भूमिका स्पष्ट करते हुए उन्होंने कहा कि समाज की मानसिकता तैयार करके तथा सभी समाज घटकों को विश्वास में लेकर इस प्रकार का कानून लागू किया जाना चाहिए। उत्तराखंड तथा अन्य कुछ राज्यों में ऐसे प्रयोग हो रहे हैं, इसलिए हम उसका स्वागत करते हैं। भारत विविधता में एकता को बनाए रखने वाला देश है, यह सिद्धांत ऐसे कानून बनाते समय प्राथमिकता से ध्यान में रखना चाहिए।
क्या संघ प्रमुख कोई पिछड़ी जाति का व्यक्ति बन सकता है इसको लेकर पूछे गए सवाल के जवाब में डॉ. भागवत ने स्पष्ट कहा कि जाति न तो योग्यता है और न ही बाधा, ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य या शूद्र इनमें से कोई नहीं, बल्कि कोई हिंदू ही संघ का सरसंघचालक होगा। भविष्य में अनुसूचित जाति या जनजाति के कार्यकर्ता भी सरसंघचालक बन सकते हैं।
बांग्लादेश में हिंदुओं पर हो रहे अत्याचार पर डॉ. भागवत ने कहा कि बांग्लादेश के सवा करोड़ हिंदुओं से संगठित होने का आह्वान किया। ऐसा होने पर अत्याचार पर स्वतः ही रोक लग जाएगी।
सब सुखी हो। अन्यथा दुखी लोग सुखी लोगों का सुख नष्ट कर देते है, इसीलिए समाज का हर घटक सुखी हो, यह सभी को सुनिश्चित करना चाहिए।
आरक्षण को लेकर डॉ. भागवत ने कहा कि जिन पर पीढ़ी दर पीढ़ी अन्याय या अत्याचार हुआ है, उनके सर्वांगीण उत्थान होने तक तथा उनके मन में सुरक्षा की भावना उत्पन्न होने तक संविधानसम्मत आरक्षण जारी रहना चाहिए, यह संघ की स्पष्ट भूमिका है।
डॉ. भागवत ने कहा कि समान नागरिक संहिता का विचार अच्छा है. विविधता में भी हमारा कोई विरोध नहीं है. पर यदि समानता से देश की एकता मजबूत होती है तो हमारा उसे समर्थन है. उत्तराखंड ने समान नागरिक संहिता के संबंध में पहले प्रस्ताव किया, फिर लोगों के सुझाव मांगे, तीन लाख सुझाव आए. उसके बाद उन्होंने कानून बनाया. कानून बन जाना पर्याप्त नहीं है. कानून का पालन होना चाहिए।
डॉ. मोहन भागवत ने भारत अमेरिका ट्रेड डील पर कहा, “आज के दौर में कोई एकाकी नहीं रह सकता. अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर डील करनी ही पड़ती है. उसमें कुछ लेना पड़ता है तो कुछ छोड़ना भी पड़ता है. अपने हित में क्या है? इसका ध्यान रखना ही चाहिए. हमें विश्वास है कि वर्तमान समय में उसका ध्यान रखा ही गया होगा. पिछले 10 वर्षों का जो एडमिनिस्ट्रेशन है, वह अडने वाला और तन कर खड़ा रहने वाला है.”
उन्होंने कहा कि संघ के स्वयंसेवकों को भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलनों तथा सभी प्रकार के प्रयासों में सहभागी होना चाहिए, यह संघ की भूमिका है। किंतु केवल कानून बनाकर भ्रष्टाचार पर नियंत्रण करना कठिन है, इसके लिए संस्कारित समाज मन का निर्माण उतना ही महत्वपूर्ण है। साथ ही कोई भी व्यवस्था मूल रूप से भ्रष्ट नहीं होती, बल्कि उस व्यवस्था में कार्य करने वाले व्यक्तियों का मन भ्रष्ट होता है और उसी कारण व्यवस्था भ्रष्ट होती है।
जबरदस्ती या लालच देकर धर्मांतरण किया जाता है तो वह निंदनीय है और उसका प्रत्युत्तर घर वापसी होगा, यह स्पष्ट करते हुए उन्होंने कहा कि यदि कोई व्यक्ति स्वेच्छा या स्वप्रेरणा से धर्म परिवर्तन करता है तो उसका विरोध नहीं किया जाना चाहिए। जनसंख्या का अनुपात केवल जन्मदर में कमी से नहीं बदलता, बल्कि धर्मांतरण और अवैध घुसपैठ के कारण भी बदलता है, इस ओर ध्यान दिलाते हुए अवैध घुसपैठ के संदर्भ में ‘डिटेक्ट एंड डिपोर्ट’ नीति को कठोरता से लागू करने का आह्वान उन्होंने किया। विदेशी अवैध घुसपैठियों को रोजगार देने के बजाय वह अपने देश के हिंदू या मुस्लिम नागरिकों को क्यों न दिया जाए, ऐसा प्रश्न उन्होंने उठाया।
उन्होंने कहा कि हिंदू और सिख पहले से ही एक थे और आज भी उनके बीच रोटी-बेटी के संबंध हैं। उनका रक्त संबंध है। पूजा पद्धति अलग मानी जा सकती है, उनकी विशिष्टता को मान्यता दी जानी चाहिए, लेकिन वे अलग नहीं हैं। हम सभी धर्म एक ही परंपरा से आए हैं। गुरु ग्रंथ साहिब में केवल सिख गुरुओं की ही नहीं, बल्कि संपूर्ण भारत के संतों की वाणी संकलित की गई है।
‘हिंद की चादर’ के रूप में पहचानी जाने वाली यह प्राचीन एकता पुनः स्थापित करनी है। समाज के नाते हम सभी एक हैं, यह ध्यान में रखना चाहिए। हिंदू नाम से कोई अलग धर्म अस्तित्व में नहीं है। आज जिसे हिंदू धर्म कहा जाता है, वही प्राचीन सनातन धर्म है। तथागत बुद्ध ने अपने उपदेशों के माध्यम से इसी सनातन धर्म में समयानुकूल सुधार किए।
संस्कृत भाषा को लेकर पूछे गए सवाल पर उन्होंने कहा कि संस्कृत बोलनी चाहिए तब जीवित रहेगी- बोलेंगे तो भाषा जीवित रहेगी। संस्कृत भारती- १० दिन के संवाद शिविर चलते हैं- रामरक्षा, गीता पढने से संस्कृत का व्याकरण जाना जा सकता है- संस्कृत स्तात्र कंठस्थ करने की परंपरा थी- सरकार का भाषा विभाग भी ऐसा प्रयास कर रहा है- समाज गुरुकुल खोले और स्वयंसेवक उसमें सहायता करेंगे- हमारे स्वयंसेवक गुरुकुल चला रहे हैं, जिनमें संस्कृत शिक्षण होता है।
उन्होंने कहा कि – हमारी हिंदू राष्ट्र की कल्पना में हिंदूराष्ट्र-जनपदवती भूमि- भूमि,जन जंगल, जानवर, बायोडायवर्सिटी सबका अपना महत्व है। जनपदवती भूमि, जहाँ भूमि, जल, जंगल, और वन्यजीव ecosystem/biodiversity के साथ एकीकृत हैं, जब ‘जन’ (लोग) उस विशिष्ट भौगोलिक क्षेत्र से भावनात्मक, आर्थिक और सांस्कृतिक रूप से जुड़कर उसमें स्थायी निवास करने लगते हैं, तब वह ‘जनपद’ कहलाता है। जब यही ‘जन’ साझा संस्कृति, नियमों और परस्पर निर्भरता के साथ एक व्यवस्थित इकाई में रहने लगता है, तब वह ‘समाज’ कहलाता है, जो आपस में जुड़े और आत्मनिर्भर होते हैं।
अमीर गरीब सभी जीवन के लिए कहते हैं कि साईं इतना दीजिए-जा में कुटुंब समाय… सभी के लिए यही गुण अच्छा लगता है- इस भूमि के साथ पुत्रत्व का संबंध, भारत माता हमारी माँ है। ये संस्कृति सनातन काल से जो है जो दुनिया की प्रथम संस्कृति है वह हिंदू संस्कृति ही है- गुरुजी ने कहा था कि भारत में खुद को हिंदू कहने वाला एक भी हिंदू जब तक जीवित है तब तक भारत हिंदूराष्ट्र है- बाकी बातें आने जाने वाली है- यह आत्मा है- शरीर हम सब मिलकर बना रहे हैं- राज्य, अमात्य, बल, दुर्ग, कोष, अमात्य, श्रुत राष्ट्र के शरीर हैं।
सतयुग में राजा नहीं होता था, समाज नैतिकता से चलता था। फिर राजा की आवश्यकता महससू हुई। राज्य के लिए राजा है तो राज्य को शक्ति चाहिए।
देश का व्यवहार चलाने के लिए इकॉनामी, कोष, भूमि, विद्वान सभी की आवश्यकता है। हमें श्रुत यानी मित्र भी चाहिए। ये सब शरीर के बाहरी अंग हैं।
हमारी राष्ट्र को लेकर जो कल्पना है वह नेशन की कल्पना नहीं है। हमारी राष्ट्र की कल्पना में हम पर्यावरण, राष्ट्र व समाज के लिए जिएं। हम कहाँ हैं इसका ज्ञान हमें होना चाहिए।
हमारे अंदर शत्रु और मित्र बोध होना चाहिए। ये बात एक बार में समझ में नहीं आती है। बार बास सुनने पर ही समझ में आती है।
विनोबाजी कहते थे ऋग्वेद में समाज समिति और सहचित्त की बात कही गई है। हम सब असहमत होकर भी सहभावना से काम करें। यही हमारा राष्ट्रवाद है।
सृष्टि में मेंढक, सांप गरुड़ का भी स्थान है। सृष्टि में एक धूल का कण भी सहयोगी है। किसी भी विचार में हमारा मत विचार विमर्श तक रहता है। लेकिन एक बार विमर्श अंतिम हो जाए तो वो सबका मत हो जाता है, हमारा मत नहीं होता, सबके मत में हमारा मत होता है।
वैदिक मंत्र समानो मन्त्रः समितिः समानी समानं मनः सह चित्तमेषाम्।
समानं मन्त्रमभिमन्त्रये वः समानेन वो हविषा जुहोमि।।
की व्याख्या करते हुए उन्होंने कहा कि यह मंत्र समान रूप, समरसता और सहमति को दर्शाता है। सभी की एकरूपता और समरसता से पूजा की जानी चाहिए ताकि वह सफल और सामंजस्यपूर्ण हो। सद्भाव और एकता के माध्यम से इष्ट देवों को प्रसन्न किया जाता है।
हमारा समावेशी स्वभाव है- समानो मंत्र समिति समानि, चित्त एक होना असंभव है- जितने लोग उतने- इसीलिए कहा सहचित्त होना चाहिए- विचार अलग हों लेकिन हमें साथ में रहकर देश को बडा करना है- यह सह भावना हमारे विचारों में आती है- सृष्टि के हर जीव को स्थान है- सॉंप, गरुड, मेंढक को भी स्थान है- अपना मत चर्चा तक, निर्णय होने के बाद सबका मत अपना मत होना चाहिए
डॉ. भागवत ने बताया कि विद्याभारती के लगभग 27 हजार विद्यालय चल रहे हैं और इसमें संस्कृत के साथ ही भारतीता की शिक्षा दी जाती है। ये गार्जियन के ऊपर है कि वे बच्चों को अपनी भाषा में शिक्षा के लिए प्रोत्साहित करें। विद्याभारती द्वारा अंग्रेजी में पढ़ने वाले बच्चों के लिए सीबीएसई स्कूल भी चला रहा है और उसमें भी बच्चे टॉप पर आ रहे हैं।
सरकार ने इंडियन नॉलेज सिस्टम बनाया है इसका नाम भारतीय शिक्षण मंडल होना चाहिए, बारतीय शिक्षा के लिए विदेशी भाषा में नाम क्यों…
समाज को सामाजिक कार्यों के लिए आगे आने और दान देने का आव्हान करते हुए उन्होंने यह नीतिशतकम् के श्लोक “दानं भोगो नाशस्तिस्रो गतयो भवन्ति वित्तस्य। यो न ददाति न भुङ्क्ते तस्य तृतीया गतिर्भवति।।” की व्याख्या करते हुए कहा कि धन की तीन ही गतियां (परिणाम) होती हैं: दान (देना), भोग (उपयोग करना), और नाश (नष्ट हो जाना)। जो व्यक्ति न दान करता है और न ही उपभोग, उसका धन निश्चित रूप से नष्ट हो जाता है।
वैदिक श्लोक यावद् भ्रियेत जठरं तावत् स्वत्वं हि देहिनाम्। अधिकं योऽभिमन्येत स स्तेनो दण्डमर्हति॥ का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि अपने स्वयम के पोषण के लिए जितना धन आवश्यक है उतने पर ही अपना अधिकार है। यदि इससे अधिक पर हमने अपना अधिकार जमाया तो यह सामाजिक अपराध है तथा हम दण्ड के पात्र है।
उन्होंने कहा कि खेती में किसान अपना मालिक हो- जेनेटिकली मॉडिफाइड सीड अपना पौधा नहीं बनाता- उसे खरीदना होगा- किसान दूसरे पर निर्भर हो जाता है- पारंपरिक रूप से अपना बीज, अपना खाद होता था- ८ से ९ हजार चावल की किस्में थीं- ये किस्में किसानों ने पैदा कीं- सदियों से हमारी वरायटी चल रही है- अब जितना उपयोगी है वह हमारे हाथ में है- हम “आ नो भद्राः क्रतवो यन्तु विश्वतः” ऋग्वेद के इस मंत्र क अपना आदर्श मानते हैं जिसका अर्थ है- “हमारे पास चारों ओर से कल्याणकारी (शुभ) और ज्ञानवर्धक विचार आते रहें“।
संघ प्रमुख ने आगे कहा, ज्ञान तो सारी दुनिया से आना चाहिए, परंतु जो लेना है, परीक्षण करके लेना चाहिए. बिना अपने देश की आकांक्षा, परंपरा और किसानों के हित को जाने, नया है इसलिए बराबर स्वीकार कर लेना ठीक नहीं. इसलिए हमारा संवेदनशील होना ठीक है।
डॉ. मोहन भागवत ने आगे कहा कि कम्युनिस्ट पार्टी का 100 वर्षों में विस्तार नहीं हुआ, यह प्रश्न उनसे पूछना चाहिए. अगर वे हमसे आकर पूछते हैं, तो हम उनका मार्गदर्शन करने को तैयार हैं. सिद्धांतहीन राजनीति चल जाती है, इसलिए चलाते हैं. जब पता चलेगा कि नहीं चलेगी तो वे करना बंद कर देंगे. राजनीति पर संघ का नहीं, मतदाताओं का दबाव होता है।
डॉ. मोहन भागवत ने कहा, अपनी आय का 1/6 खुद के लिए रखना, 1/6 अपने परिवार के लिए, 1/6 भगवान के लिए रखना, 1/6 आड़े वक्त के लिए बचत करके रखना, 1/6 धर्म-समाज के लिए रखना और 1/6 राजा [सरकार] को देना. अपनी आय में ये छह हिस्से रहते हैं, हमारी परंपरा में हजारों साल ये हम यही करते आए हैं।
संघ प्रमुख ने कहा कि सारी उपासनाएं चित्त शुद्धि के लिए है- धर्म के नाते कोई अंतर नहीं-रिलीजन दोनों अलग है- आप मुसलिम इसाइयों को समझाने के झंझट में मत पडें- दोनों में जो शाश्वत है जो बाद में जुडा है वो अलग है- इसीलिए सुसंगत नहीं है- शांति का पंथ कहा जानेवाला इस्लाम कहा जाता है लेकिन शांति कहीं नहीं है- जब अध्यात्म पर अधिष्ठित है पंथ तो वह ईश्वर की तरफ ले जाता है- पहले आप समझो फिर बताओ की धर्म एक ही है वह मानवधर्म है और वह हिंदू धर्म है- उस पर आना है- आप सच्चे इसाइयत-इसलाम पर आओ- यह होने के बाद ही संघर्ष खत्म होगा- दोस्ती होने के बाद ही यह होगा- दुनिया उसी की सुनती है जिसके पास ताकत है- हिंदू को शांति बात कहनी है लेकिन दुनिया हाथ में डंडा है तिक नहीं यह देखती है- ताकतवर की बात दुनिया सुनेगी। इसाईयत और इस्लाम में शाश्वत और बाद में जोडा गया हैं वो सुसंगत नही हैं।
आज जो इस्लाम या क्रिश्चिनिटी हम देखते है, वो मोहम्मद पैगम्बर या ईसा मसीहा ने बताया हुआ नहीं है। उनके तुरंत बाद इन रिलीजन्स को तत्कालीन राजनीति से जोड़ा गया। जिसके कारण हम इस्लाम या क्रिश्चिनिटी का आज का अलग स्वरूप देखते है।
इसलिये सच्चे स्वरूप में इसाईयत और इस्लाम आने से बात सरल होगी, सफल होगी.
गौतम बुध्द को लेकर उन्होंने कहा कि जिस प्रकार हनुमान के मूर्ति पर लगाया हुआ सिंदूर जमने के बाद उसे निकलना पड़ता है, वैसे ही सनातन धर्म में आए कालबाह्य तत्व को हटाने का कार्य तथागत गौतम बुद्ध ने किया।
उन्होंने कहा कि संघ अपनी यात्रा के एक सौ वर्षों में लगातार युवा हो रहा है आज संघ के कार्यकर्ताओं की औसत आयु २८ वर्ष है और इसे २५ वर्ष से नीचे लाने का प्रयास चल रहा है। देश का युवा देशभक्त और नैतिक आचरण करने वाला है। यदि उन्हें उनकी भाषा में विषय समझाए जाएं, तो वे उन्हें स्वीकार करते हैं और उसका आचरण भी करते हैं। इसलिए तार्किक पद्धति से उन्हें अपने मूल विचारों तक पहुंचाया जाना चाहिए। उन्हें प्रयोग करने की स्वतंत्रता और अवसर देना चाहिए तथा यदि प्रयोग में कोई त्रुटि हो जाए तो उनके पीछे दृढ़ता से खड़ा रहना चाहिए। यदि वर्तमान पीढ़ी युवाओं की जिज्ञासा शांत करने की क्षमता विकसित करे, तो युवा पीढ़ी और वर्तमान पीढ़ी के समन्वय से भविष्य का सशक्त भारत निर्माण होगा। भारतीय दर्शन का प्रभाव अंतरात्मा तक पहुंचता है, जबकि पाश्चात्य प्रभाव बाहरी स्तर तक सीमित रहता है।
संघ प्रमुख ने कहा कि हम एक समाज हैं. अल्पसंख्यक और बहुसंख्यक मानकर विचार नहीं करना चाहिए. अलग-अलग होने पर हम सब अल्पसंख्यक ही हैं.फास्डफूड खाने के लिए कोई कानून नहीं लाया गया, तो उसे बैन करने के लिए कानून क्यों लाना चाहिए? फास्डफूड लालच के चलते आया. खुद पर संयम रखकर उससे दूर रहना ही उससे बचने का उपाय है.
हर काम संघ को ही करना चाहिए, ऐसा नहीं है. चरित्रवान समाज के निर्माण का हमारा काम हम पूरा समय देकर भी पूरा नहीं कर पा रहे हैं. पेरिस समझौते के वादों को सबसे पहले पूरा करने में भारत सर्वप्रथम है. पर्यावरण के बारे में केवल संघ को विचार नहीं करना है. सारे समाज को विचार करना चाहिए. हालांकि पर्यावरण संरक्षण हमारी गतिविधियों में से एक है.
संघ चिरतरुण संगठन है, उसमें सभी पीढ़ियाँ काम करती हैं, और नई पीढ़ी को जल्दी आगे लाने का काम होता है. इसलिए पुरानी पीढ़ी जगह बना देती है. यह काम पीढ़ी-दर-पीढ़ी चलता है. संघ की औसत आयु आज की तारीख में 28 साल है. हम चाहते हैं कि यह 25 साल के भीतर आ जाए. रेव पार्टी के स्थान पर सत्संग पार्टी का चलन शुरू हुआ, यह हमने नहीं किया, सहजता से यह परिवर्तन हुआ है।
संस्कृत बोलनी चाहिए. भाषा वही जीवित रहती है जो चलन में रहती है. संघ केवल शाखा चलाने का कार्य करता है. संघ कोई गुरूकुल नहीं चलाता, चलाएगा भी नहीं. संघ के स्वयंसेवक गुरुकुल चलाते हैं, समाज के लोग गुरूकुल चलाते हैं तो संघ उनकी सहायता करता है. भारतीय शिक्षण मंडल के माध्यम से देशभर में गुरूकुल आदि का संचालन किया जाता है. मातृभाषा में उत्तम शिक्षा देने का कार्य विद्या भारती के माध्यम से किया जा रहा है.
सरकार के माध्यम से भी शिक्षा क्षेत्र में परिवर्तन के प्रयास किए जा रहे हैं. वैचारिक और राजनीतिक विरोध के चलते राज्य स्तर पर उसमें अवरोध पैदा नहीं किये जाने चाहिए. कला के क्षेत्र में संस्कार भारती और खेल के क्षेत्र में क्रीड़ा भारती के माध्यम से बहुत सारे कार्यक्रम चल रहे हैं. ध्येय के लिए आत्मीयतापूर्ण वातावरण से स्व अनुशासन ही संघ के कार्य का आधार है।
संघ का कार्य पहुंचाने के लिए संघ के स्वयंसेवक को ही वहां पहुंचना होता है. संघ को समझना है तो परसेप्शन या प्रोपेगेंडा से नहीं, खुद के अनुभव के आधार पर समझिए. साम्यवादी लेखिका रजनी पामदत्त ने अपनी पुस्तक में ब्रिटिशों को सुनाया है कि भारत में आपकी वजह से नहीं, बल्कि भारत की परंपरा से राष्ट्र संकल्पना स्थापित हुई है. अपने बारे में, अपनी पहचान के बारे में, अपने देश के बारे में स्पष्ट कल्पना कर सक्रिय हो जाइए, यही मेरा आप सभी से आह्वान है।
संघ प्रमुख द्वारा दिए गए संबोधनों के बाद कार्यक्रम के दूसरे दिन प्रश्न उत्तर सत्र में कई रोचक और तीखे सवाल श्रोताओँ ने पूछे, जिनका जवाब संघ प्रमुख ने तथ्यों, तर्कों व मजेदार ढंग से दिया।
- नेतृत्व और आयु पर सवाल — संगठनात्मक स्थिरता का संकेत
प्रश्न: 75 वर्ष की आयु के बाद भी पद पर बने रहने पर सवाल।
उत्तर: “जब संघ कहेगा, मैं पद छोड़ दूँगा… सेवा से सेवानिवृत्ति नहीं होती।”
राजनीतिक व्याख्या:
- यह उत्तर संघ की निरंतरता और अनुशासन को दर्शाता है।
- इससे यह संदेश गया कि RSS किसी व्यक्ति पर नहीं, बल्कि संस्था और परंपरा पर आधारित है।
- यह उन राजनीतिक चर्चाओं का उत्तर भी था, जहाँ नेतृत्व परिवर्तन को सत्ता-राजनीति से जोड़कर देखा जा रहा था।
सामाजिक व्याख्या:
- समाज में वरिष्ठता और अनुभव को सम्मान देने की भारतीय परंपरा को पुष्ट करता है।
- युवाओं को यह संकेत भी कि नेतृत्व केवल उम्र से नहीं, बल्कि योग्यता और सेवा-भाव से तय होता है।
- जाति और संघ प्रमुख पद — सामाजिक समावेशन की रणनीति
प्रश्न: क्या RSS प्रमुख बनने में जाति बाधा है?
उत्तर: “जाति कोई बाधा नहीं… सबसे योग्य व्यक्ति चुना जाएगा।”
राजनीतिक व्याख्या:
- यह बयान जातिगत राजनीति से दूरी का संकेत है।
- इससे संघ यह दिखाना चाहता है कि वह सामाजिक न्याय और समावेशन के विरोध में नहीं है।
- यह विशेष रूप से उन आलोचनाओं का उत्तर था कि RSS केवल उच्च जातियों का संगठन है।
सामाजिक व्याख्या:
- यह समाज में जाति-आधारित विभाजन को कम करने का प्रयास है।
- SC/ST और अन्य वंचित वर्गों के लिए यह एक प्रतीकात्मक संदेश है कि संघ नेतृत्व के दरवाज़े सबके लिए खुले हैं।
- UCC (एक नागरिक संहिता) — सामाजिक संतुलन बनाम राजनीतिक निर्णय
प्रश्न: UCC पर आपका दृष्टिकोण?
उत्तर: “सबकी सहमति से UCC बननी चाहिए, ताकि मतभेद न हों।”
राजनीतिक व्याख्या:
- यह बयान सरकार के एजेंडे से पूरी तरह असहमति भी नहीं, और अंधसमर्थन भी नहीं है।
- संघ यह दिखाना चाहता है कि वह संवैधानिक सुधार का समर्थक है, लेकिन सामाजिक स्थिरता की कीमत पर नहीं।
सामाजिक व्याख्या:
- यह अल्पसंख्यकों के प्रति एक आश्वासन है कि उनकी भावनाओं और परंपराओं को नजरअंदाज नहीं किया जाएगा।
- साथ ही बहुसंख्यक समाज को यह संकेत कि सुधार संघर्ष से नहीं, सहमति से होना चाहिए।
- “घुसपैठियों” पर बयान — सुरक्षा बनाम सामाजिक सौहार्द
प्रश्न: अवैध घुसपैठियों पर आपका मत?
उत्तर: “उनकी पहचान कर पुलिस को सूचना दें, उनको रोजगार न दें उन पर लगातार निगरानी रखें।”
राजनीतिक व्याख्या:
- यह बयान राष्ट्रीय सुरक्षा और सीमावर्ती राजनीति से जुड़ा हुआ है।
- यह सरकार की सीमा-सुरक्षा नीतियों के प्रति वैचारिक समर्थन का संकेत देता है।
सामाजिक व्याख्या:
- यह स्थानीय समुदायों में डेमोग्राफिक परिवर्तन की चिंता को संबोधित करता है।
- साथ ही यह नागरिकों को कानून के भीतर रहकर कार्य करने का संदेश देता है — स्वयं हिंसा या टकराव की अनुमति नहीं देता।
- संस्कृति और पहचान — “हिंदू” शब्द का सामाजिक अर्थ
प्रश्न: भारत की सांस्कृतिक पहचान पर संघ का संदेश?
उत्तर: “हमें अपनी सांस्कृतिक पहचान गर्व से बतानी चाहिए।”
राजनीतिक व्याख्या:
- यह बयान राष्ट्रवादी विमर्श को सुदृढ़ करता है।
- यह उन बहसों का उत्तर भी है जहाँ “हिंदू” शब्द को संकीर्ण धार्मिक अर्थ में देखा जाता है।
सामाजिक व्याख्या:
- संघ “हिंदू” को केवल धार्मिक नहीं, बल्कि सभ्यतागत पहचान के रूप में प्रस्तुत करता है।
- यह समाज में आत्म-गौरव और सांस्कृतिक आत्मविश्वास बढ़ाने की रणनीति है।
- राजनीति औरRSS संबंध — दूरी बनाकर प्रभाव बनाए रखना
हालाँकि प्रश्न सीधे राजनीति पर नहीं था, लेकिन उन्होंने कहा:
“BJP के अच्छे दिन RSS की वजह से आए, और हमारे लिए इसका उल्टा हो गया।
राजनीतिक व्याख्या:
- यह RSS की वैचारिक श्रेष्ठता और दीर्घकालिक सामाजिक प्रभाव को रेखांकित करता है।
- साथ ही यह दावा करता है कि संघ सत्ता का उपकरण नहीं, बल्कि सत्ता को दिशा देने वाला नैतिक स्रोत है।
सामाजिक व्याख्या:
- यह स्वयंसेवकों को यह संदेश देता है कि उनका कार्य राजनीति से ऊपर है।
- इससे संगठन के भीतर सेवा-भाव और त्याग की भावना को मजबूत किया जाता है।
नेतृत्व और आयु: संगठन व्यक्ति से बड़ा
एक प्रश्न के उत्तर में, जब उनसे 75 वर्ष की आयु के बाद भी पद पर बने रहने को लेकर सवाल किया गया, तो उन्होंने कहा कि जब भी संघ कहेगा, वे पद छोड़ देंगे, लेकिन सेवा से सेवानिवृत्ति संभव नहीं है। यह उत्तर संघ की उस परंपरा को रेखांकित करता है जिसमें संगठन व्यक्ति से ऊपर होता है। राजनीतिक दृष्टि से यह नेतृत्व परिवर्तन को सत्ता-राजनीति से अलग रखने का संकेत है, जबकि सामाजिक स्तर पर यह वरिष्ठता और अनुभव के सम्मान की भारतीय परंपरा को पुष्ट करता है।
घुसपैठ और सुरक्षा: सतर्कता, न कि टकराव
अवैध घुसपैठियों पर उन्होंने नागरिकों से अपील की कि वे सतर्क रहें और ऐसी स्थिति में पुलिस को सूचना दें, लेकिन स्वयं कानून हाथ में न लें। यह बयान राष्ट्रीय सुरक्षा के मुद्दे पर संघ की चिंता को दर्शाता है, वहीं सामाजिक स्तर पर यह शांति और कानून-व्यवस्था बनाए रखने की अपील भी है।
मुंबई में हुआ यह प्रश्न-उत्तर सत्र केवल संवाद नहीं, बल्कि संघ की भविष्य-दृष्टि का सार्वजनिक प्रदर्शन था। इसमें तीन बातें स्पष्ट रूप से उभरकर सामने आईं—
पहला, संगठनात्मक स्थिरता और अनुशासन;
दूसरा, सामाजिक समावेशन और सहमति पर आधारित सुधार;
तीसरा, राजनीति से संतुलित दूरी रखते हुए वैचारिक प्रभाव बनाए रखना।
इस सत्र ने यह संकेत दिया कि RSS आने वाले वर्षों में टकराव की बजाय संवाद, विभाजन की बजाय एकता और तात्कालिक राजनीति की बजाय दीर्घकालिक सामाजिक परिवर्तन की दिशा में आगे बढ़ना चाहता है।
संघ प्रमुख के उद्बोधन के दो रोचक उदाहरणः
– समाज में भाषा के आधार पर भेद नहीं है- तरह तरह की बातें उभारने पर ऐसा होता है- यह लोकलाइज्ड बीमारी है उसे सार्वजनिक नहीं करना- हर आदमी के आचरण की गारंटी कोई नहीं दे सकता- राजनीतिक स्वार्थ के कारण ये बातें होती हैं- ऐसा घावों का उपचार होना चाहिए- ये जहां है वही तक सीमित रहे- आम न बने- हमें सबसे मिलते रहना चाहिए- उनके घर में जाना चाहिए- भारत की एकता के पक्ष में खडे रहना चाहिए- गुंडागर्दी समाज का दुर्गुण नहीं-एक की करनी का दोष सबके माथे पर नहीं मढना।
ऐसा है कि पूरे समाज को देखा जाए जगह जगह पर मुंबई सहित समाज में भाषा के आधार पर भेदभाव है ऐसा नहीं है। कुछ मराठी लोग तलवार लेकर आए ऐसा नहीं है। ये लोकलाईज बीमारी है। राजनीति में स्वार्थ के कारण होती है। बाकी समाज को ये ध्यान रखना है कि ऐसी बातें फैले नहीं हम सब लोगों को आपस में मिलनते रहना चाहिए। क दूसरे के घर जाना चाहिए ।
भ्रष्टाचार के विरोध में आंदोलन में संघ आगे रहता है। भ्रष्टाचारियों को एक्सपोज़ करना ये हमारा प्रस्ताव है।
युत्तुर में संघ की प्रतिनिधि सभा में ये प्रस्ताव पारित किया गया कि स्वयं सेवक शुध्चार में खड़े होंगे। लोगों की मदद करेंगे। भ्रष्टाचार व्यवस्था में नहीं है आदमी के आचरण में रहता है।

