प्रातःकालीन शीतल हवा में जब मैदानों पर कदमताल और प्रार्थना की गूँज सुनाई देती है, तो वह केवल ध्वनि नहीं होती, बल्कि राष्ट्र की आत्मा का स्वर होती है—यह है संघ की शाखा। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) की सबसे बड़ी पहचान उसकी शाखाएँ हैं। यह केवल खेल का मैदान या व्यायाम का स्थल नहीं, बल्कि अनुशासन और संस्कार का जीवंत विद्यालय है। संघ का विश्वास रहा है कि राष्ट्र का निर्माण घोषणाओं या नीतियों से नहीं, बल्कि व्यक्तियों के चरित्र निर्माण से होता है। शाखा उसी निर्माण का प्रथम और प्रमुख माध्यम है।
डॉ. हेडगेवार: शाखा की नींव
संघ की स्थापना 1925 में डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार जी ने की। उनका मानना था कि यदि राष्ट्र को सशक्त बनाना है तो सबसे पहले अनुशासित और संस्कारित व्यक्ति चाहिए। वे कहा करते थे—“संगठन तभी जीवित रहेगा जब उसकी रीढ़ शाखाएँ होंगी।” हेडगेवार स्वयं शाखाओं में उपस्थित रहते और स्वयंसेवकों को समयपालन और सेवा का अभ्यास कराते। उनके समय में शाखाओं का छोटा-सा बीज बोया गया, जिसने पूरे राष्ट्र में जड़ें जमाईं।
गुरुजी गोलवलकर: शाखा से संगठन विस्तार
दूसरे सरसंघचालक माधव सदाशिव गोलवलकर (गुरुजी) ने शाखाओं को साधना का केंद्र माना। उनके शब्द थे—“शाखा केवल खेल का मैदान नहीं, यह साधना है—जहाँ व्यक्ति अपने भीतर छिपे संस्कारों को जागृत करता है।” गुरुजी के नेतृत्व में शाखाओं का तेज़ी से विस्तार हुआ। स्वयंसेवक शिक्षा, सेवा और समाज-सुधार के विविध क्षेत्रों में सक्रिय हुए। गुरुजी ने यह भी कहा था कि “हम अकेले कुछ नहीं हैं; हम एक महान सांस्कृतिक परंपरा के वाहक हैं।”
मोहन भागवत: शाखा और आधुनिक चुनौतियाँ
वर्तमान सरसंघचालक मोहन भागवत जी शाखा को आधुनिक चुनौतियों का उत्तर मानते हैं। उन्होंने कहा—“हर स्वयंसेवक जो शाखा में आता है, खेलता है और तैयार होता है, वह अपने ढंग से राष्ट्र निर्माण में योगदान करता है। संघ एक ऐसी मशीन है जो स्वयं चलती है।” उनके विचारों में शाखा व्यक्तिगत विकास से ऊपर उठकर राष्ट्रीय विमर्श का उपकरण है। संस्कृत का प्रसार, सांस्कृतिक पुनरुत्थान और जनसंख्या संतुलन जैसे मुद्दे शाखा की शिक्षाओं से जुड़कर सामने आते हैं।
दत्तात्रेय होसबोले: शाखा जीवनदायिनी
वर्तमान सरकार्यवाह दत्तात्रेय होसबोले जी ने शाखा को संघ का हृदय कहा। उनका कथन है—“शाखा संगठन की जीवनदायिनी है। स्वयंसेवक केवल दर्शक नहीं, बल्कि सक्रिय सहभागी बनकर संघ के उद्देश्य को जीते हैं।” यह कथन स्पष्ट करता है कि शाखा संघ की आत्मा है, जो हर दिन स्वयंसेवक के जीवन में प्राण भरती है।
संघ की शाखाओं ने समाज-सुधार और सेवा कार्यों को भी दिशा दी। तीसरे सरसंघचालक बालासाहेब देवरस जी ने अस्पृश्यता पर कहा था—“यदि अस्पृश्यता गलत नहीं है, तो इस दुनिया में कुछ भी गलत नहीं है।” उनके नेतृत्व में शाखाएँ सामाजिक समरसता और सेवा का केंद्र बनीं। पूर्व सरकार्यवाह भैयाजी जोशी जी ने कहा था कि “शाखा से बाहर संघ की कल्पना अधूरी है। यहीं से स्वयंसेवक आत्मबल, अनुशासन और राष्ट्रसेवा की प्रेरणा पाते हैं।”
इन्हीं शाखाओं की छाया में पले नेताओं के अनुभव भी उल्लेखनीय हैं। भारत के पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी जी ने स्वीकार किया था कि “शाखा ने मुझे समय का मूल्य, अनुशासन और राष्ट्रभक्ति का संस्कार दिया। वही जीवनभर मेरी सबसे बड़ी पूँजी रही।” साध्वी ऋतम्भरा जी ने शाखा की प्रार्थना को राष्ट्र-समर्पण का संकल्प बताते हुए कहा—“शाखा में गूँजने वाली प्रार्थना केवल शब्द नहीं है, वह आत्मा को राष्ट्र के लिए समर्पित करने का संकल्प है।”
आज प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी स्वयं को शाखा का संस्कारित स्वयंसेवक बताते हैं। उनका कहना है—“संघ की शाखा में मैंने सीखा कि व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा से ऊपर राष्ट्र का हित होता है। शाखा ने मुझे यह विश्वास दिलाया कि सच्चा जीवन वही है जो समाज और राष्ट्र को समर्पित हो।”
संघ के मुखपत्र पांचजन्य में प्रकाशित हालिया आंकड़ों के अनुसार आज देशभर में प्रतिदिन लगभग 71,000 दैनिक शाखाएँ और लगभग 96,000 साप्ताहिक शाखाएँ लगती हैं। इसके अलावा विदेशों में भी प्रवासी भारतीय शाखाओं का संचालन कर रहे हैं। पांचजन्य में यह भी उल्लेख है कि कोविड काल में जब शाखाएँ मैदानों में नहीं लग पाईं, तब ऑनलाइन शाखाओं ने स्वयंसेवकों को जोड़े रखा और अनुशासन की यह परंपरा बाधित नहीं हुई। यह इस बात का प्रमाण है कि शाखा किसी परिस्थिति में नहीं रुकती, बल्कि नए स्वरूप में ढलकर चलती रहती है।
संघ की शाखाएँ केवल संगठनात्मक परंपरा नहीं हैं, वे अनुशासन और संस्कार की वह पाठशाला हैं जहाँ व्यक्ति से समाज और समाज से राष्ट्र की शक्ति प्रवाहित होती है। हेडगेवार जी ने इसकी नींव रखी, गुरुजी ने इसे विस्तार दिया, भागवत जी ने इसे आधुनिक विमर्श से जोड़ा और होसबोले जी ने इसे जीवनदायिनी कहा। देवरस जी ने इसे समाज सुधार का उपकरण बनाया, भैयाजी जोशी जी ने इसे आत्मबल का स्रोत कहा, वाजपेयी जी ने इसे अपनी जीवन-पूँजी माना, साध्वी ऋतम्भरा जी ने इसे राष्ट्र-समर्पण का संकल्प बताया और मोदी जी ने इसे अपने जीवन का संस्कार कहा।
आज जब हर सुबह हज़ारों मैदानों में शाखाओं की प्रार्थना गूँजती है, तो यह केवल स्वर नहीं, बल्कि उस भारत का प्रारंभिक शिल्प है जो अनुशासन, सेवा और संस्कार की नींव पर खड़ा होकर विश्व को अपनी पहचान देता है।
(लेखक उच्च न्यायालय, लखनऊ में राज्य विधि अधिकारी हैं। उनकी जीवन-यात्रा का प्रथम संस्कार शाखा में बाल स्वयंसेवक के रूप में आरंभ हुआ।)

