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संस्कृति के सँवरते रंग काव्य संग्रह का विमोचन

कोटा  / कवियित्री साधना शर्मा के प्रथम काव्य संग्रह ” संस्कृति के सँवरते रंग” का विमोचन शनिवार 25 अक्टूबर को एक होटल में समारोहपूर्वक हुआ। मुख्य वक्ता विख्यात कथाकार और समीक्षक  विजय जोशी ने कहा कि संस्कृति के सँवरते रंग” काव्य- संग्रह के रूप में देख कर सुखद अनुभूति करती हुई कि कवयित्री साधना शर्मा अपनी रचनाओं में गीतों की सरगम एवं कविता के मर्म को सरल और सहज भाषा में उजागर कर सृजनशील परिवेश को समृद्ध कर रही हैं । इस दिशाबोधक अभिव्यक्ति के साथ कि – तीज त्योहर सभी देखें हम/ और देखें आध्यामिक रंग/ देश भक्ति का भाव जगाएँ/ आओ देखें संस्कृति के रंग।
   श्री  जोशी ने कहा वे पाठक और लेखक के मध्य सेतु अख़बार पर भी अपनी अनुभूति को प्रकट करती है –  दुनिया की खोज खबर रखूँ, मैं आसमान छू जाऊँ/ मैं सुबह-सुबह हर आँगन में, अपनी दस्तक दे जाऊँ/ मैं प्रभात की ज्ञान किरण हूँ, जीवन का आनंदित क्षण हूँ/ मेरे बिन जीवन है अधूरा, समाज का सच्चा दर्पण हूँ/लोकतंत्र का प्रहरी बन, सबकी राह आसान बनाऊँ। यही नहीं मानव बेचारा में उन्होंने मनुष्य के तीन पक्ष रखे हैं एक सामान्य वर्ग जिसे स्टेटस ने मारा, एक भिखारी का जो रुखा – सूखा खाना चाहते हुए भी उसे गरीबी ने मारा तो खाने से हारे को डायबिटीज जैसी बीमारी ने मारा। कवयित्री ने सामाजिक सन्दर्भों की वास्तविकताओं, सामाजिक संस्कारों,  संस्कृति के विविध आयामों के साथ सामाजिक जीवन को अपनी रचनाओं के माध्यम से उजागर किया है।
उन्होंने कहा कि जीवन का प्रकृति के साथ समन्वय और प्रकृति की जीवन को संवारने की प्रकृति दोनों के समन्वित भाव और संवेदनाओं का पुँज इन रचनाओं का प्रतिपाद्य है जिसमें रचनाकार ने अपने संस्कार और संस्कृति को अनुभवों के साथ उकेरा है। इस संग्रह में संस्कृति के रंग महकते नजर आते हैं, कहीं आध्यात्मिक रंग है, तो कहीं देशभक्ति का रंग, कहीं त्योहारों की छटा है, तो कहीं नदियों का संगम, कहीं नारी की महिमा, कहीं मन भावन सावन, कहीं लीलाधर की लीला, तो कहीं साँझ की बेला, कहीं बसंत ऋतु, तो कहीं पावस ऋतु का नजारा, कहीं राजस्थान के दुर्ग, तो कहीं राजस्थान की हस्तशिल्प कला, कहीं रिश्ते महकते हैं, तो कहीं शगुन की बातें होती हैं, कहीं बुजुर्गों की दुआएँ हैं, तो कहीं माटी के अनेक रूप देखने को मिलते हैं।
मुख्य अतिथि वरिष्ठ साहित्यकार जितेंद्र निर्मोही ने कहा कि बिना स्त्री शक्ति के कहां संवरती है संस्कृति।  हाड़ौती अंचल की गीत परंपरा में सबसे बड़ी कवयित्री के रूप में शकुंतला रेणु हमारे सामने आती है। उसके बाद डॉ वीणा अग्रवाल अग्रवाल एक बड़ी कवयित्री के रूप में सामने आती हैं। छंद विधान की कवयित्रियों में सावित्री व्यास, प्रमीला आर्य, निर्मला आर्य आती हैं। लेकिन देशभक्ति और आध्यात्मिक स्वर को लेकर शकुंतला रेणु के बाद वैसे ही तेवर लेकर साधना शर्मा उपस्थित होती है यह प्रशंसनीय है।
समारोह अध्यक्ष स्नेहलता शर्मा, विशिष्ठ अतिथि डॉ. प्रभात कुमार सिंघल, रेखा पंचोली और रीता गुप्ता ने अपने विचार रखते हुए कृति को साहित्य में महिला चेतना की उड़ान बताया। लेखिका साधना शर्मा ने सभी का स्वागत कर विचार रखे। नमो नारायण शर्मा  ने भी विचार रखे। अतिथियों ने सरस्वती की तस्वीर के सम्मुख दीप प्रज्वलित कर कार्यक्रम का शुभारंभ किया। वंदना शर्मा ने सरस्वती वंदना के साथ गीत प्रस्तुत किया। कार्यक्रम का संचालन विदुषी साहित्यकार डॉ. वैदेही गौतम ने करते हुए अतिथियों का परिचय करवाया। डाॅ. प्रियदर्शी शर्मा ने आभार व्यक्त किया।
लेखिका के परिवारजन गिरिराज गौतम,  ब्रज भूषण गौतम, निशांत गौतम, नेहा शर्मा, डाॅ. निधि शर्मा सहित अनेक साहित्यकार उपस्थित रहें। कार्यक्रम की विशेषता रही कि पर कार्यक्रम कृति पर ही केंद्रित रहा और वक्ताओं ने इसी के संदर्भों को उजागर करते हुए लेखिका की भूरी-भूरी प्रशंसा की।
अनुनाद का विमोचन :
साधना शर्मा ने उन पर केंद्रित अक्टूबर माह के अनुनाद ई बुलेटिन का ई डिजिटल फॉर्म में मोबाइल पर बटन दबा कर विमोचन किया। संस्कृति,साहित्य,मीडिया फोरम द्वारा साहित्यिक और सांस्कृतिक गतिविधियों पर इस ई बुलेटिन का प्रकाशन डॉ. प्रभात सिंघल और विजय जोशी द्वारा किया जाता है।
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प्रेषक : डॉ. प्रभात कुमार सिंघल
लेखक एवं पत्रकार, कोटा
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