Homeअध्यात्म गंगापरकाया प्रवेश का विज्ञान और भारत में परकाया प्रवेश की परंपरा

परकाया प्रवेश का विज्ञान और भारत में परकाया प्रवेश की परंपरा

अध्यात्म में परकाया प्रवेश का अर्थ है एक आत्मा का एक शरीर को छोड़कर दूसरे शरीर में प्रवेश कर जाना। यह सुनने में अविश्वनीय लगता है लेकिन कई उदाहरणों से कहीं न कहीं यह प्रमाणित हुआ है कि ऐसा होना सम्भव है। तो, चलिए समझते हैं कि परकाया प्रवेश क्या है और यह कैसे होता है !
परकाया का अर्थ है कि एक व्यक्ति अपने शरीर के बाहर दूसरे शरीर में प्रवेश कर सकता है !
उदाहरण –
एक शादीशुदा महिला के मृत्यु के तुरन्त बाद किसी दूसरे की आत्मा उसके शरीर में प्रवेश कर गयी थी !
परकाया प्रवेश ध्यान योग, ज्ञान योग और योग निंद्रा द्वारा सम्भव हो सकता है !
शास्त्रों में काया प्रवेश की प्रक्रिया का वर्णन :
मृत्यु के समय जीवात्मा इस स्थूल शरीर से अलग होकर सूक्ष्म शरीर में ही जाता है !
बेहद रहस्यमयी है परकाया प्रवेश की प्रक्रिया, जानिये इसमें किस प्रकार आत्मा एक शरीर से दूसरे शरीर में प्रवेश करती है !
अध्यात्म में पुनर्जन्म के जैसे ही परकाया प्रवेश एक अद्भुत और रहस्यमय विषय है। परकाया का अर्थ है कि एक व्यक्ति अपने शरीर के बाहर दूसरे शरीर में प्रवेश कर सकता है। अर्थात जब एक सिद्ध योगी अपनी योग-साधना के बल से जीते-जी किसी दूसरे के मृत या जीवित शरीर में सूक्ष्म रूप से प्रवेश कर जाता है, तो उसे परकाया-प्रवेश कहते हैं। इसके बारे में वेदांत और तंत्र शास्त्र में विस्तार से बताया गया है।
1. प्राचीन समय में परकाया प्रवेश के कई उदाहरण मिलते हैं और आज के युग में कुछ ऐसे केस सामने आये हैं, जो परकाया प्रवेश के सिद्धांत को कहीं न कहीं प्रमाणित करते हैं। ऐसी ही एक घटना उत्तर प्रदेश में हुई थी, जहाँ एक शादीशुदा महिला के मृत्यु के तुरन्त बाद किसी दूसरे की आत्मा उसके शरीर में प्रवेश कर गयी थी !
2. परकाया प्रवेश का एक बड़ा उदाहरण शंकराचार्य का भी है, जब उनका एक विदूषी महिला भारती से शास्त्रार्थ हुआ। उन्हें कामशास्त्र के विषय को लेकर शास्त्रार्थ बीच में ही रोकना पड़ा था, क्योंकि उस विषय पर शंकराचार्य जी जानकारी और अनुभव शून्य थे ! इसलिए, उन्होंने इस विषय पर ज्ञान और अनुभव प्राप्त करने के लिए समय मांगा। इस समयावधि में उन्होंने अपने सूक्ष्म शरीर को एक राजा के शरीर में प्रवेश करवाया और राज का जीवन जीकर कामशास्त्र का ज्ञान प्राप्त किया। इस दौरान उनके स्थूल शरीर की सुरक्षा उनका शिष्य करता रहा था । शंकराचार्य ने जैसे ही ज्ञान प्राप्त किया, वह अपने असली शरीर में लौट आये और फिर भारती से चर्चा करके उनको शास्त्रार्थ में पराजित किया !
क्या परकाया प्रवेश सम्भव है ?
परकाया प्रवेश करना सरल नहीं है ! परकाया प्रवेश ध्यान योग, ज्ञान योग और योग निंद्रा द्वारा सम्भव हो सकता है। कोई सिद्धहस्त योगी, संत, महात्मा अथवा सिद्ध पुरूष ही योग क्रियाओं के द्वारा परकाया प्रवेश कर सकता है। परकाया प्रवेश का सिद्धांत इस बात पर आधारित है कि मानव शरीर दो प्रकार का शरीर है। एक स्थूल शरीर जो दिखाई देता है और दूसरा सूक्ष्म शरीर, जो दिखाई नहीं देता है। शास्त्रों के अनुसार, सूक्ष्म शरीर की लम्बाई अंगूठे के बराबर है और यह इतना अधिक पारदर्शी है कि प्रकाश भी उसके आर-पार जा सकता है। कुछ जानकारों ने आकाश, तेज और वायु इन तीन तत्त्वों को सूक्ष्म शरीर माना है और प्रेत का शरीर भी इन्हीं तीन तत्वों से बना होता है। मृत्यु के समय जीवात्मा इस स्थूल शरीर से अलग होकर सूक्ष्म शरीर में चला जाता है। सूक्ष्म शरीर की गति मन के वेग के समान तीव्र होती है। परकाया प्रवेश की प्रक्रिया में यह सूक्ष्म शरीर ही एक स्थूल शरीर को छोड़कर दूसरे स्थूल शरीर को धारण करता है !
शास्त्रों में काया प्रवेश की प्रक्रिया का वर्णन :
शास्त्रों और वेदों में परकाया प्रवेश के अलग-अलग तरीके बताये गए हैं। अष्टांग योग के अनुसार, इन्द्रियों को नियंत्रित करके साधक के सूक्ष्म शरीर को अन्य किसी जीवित अथवा मृत शरीर में प्रवेश करवाया जा सकता है। वहीं योग वशिष्ठ के अनुसार रेचक प्राणायाम के लगातार अभ्यास के बाद अन्य शरीर में आत्मा का प्रवेश किया जा सकता है। शंकराचार्य ने इस बारे में यह बताया है कि यदि सौन्दर्य लहरी के 87वें क्रमांक का श्लोक नित्य एक सहस्त्र बार जप कर लिया जाए, तो परकाया प्रवेश की सिद्धि प्राप्त की जा सकती है। तंत्र शास्त्र में यह बताया गया है कि आकाश तत्त्व की सिद्धि के बाद परकाया प्रवेश सम्भव होने लगता है। खेचरी मुद्रा का सतत् अभ्यास और इसमें पारंगत होना परकाया सिद्धि प्रक्रिया में अत्यन्त प्रभावशाली सिद्ध होता है। इन सबके अतिरिक्त भी कई और तरीके भी अलग-अलग शास्त्रों में बताए गए हैं !
अखण्ड ज्योति में श्रीराम शर्मा आचार्य ने उल्लेख किया है कि ‘नाथ सम्प्रदाय’ के आदि गुरु मुनिराज ‘मछन्दरनाथ’ को परकाया प्रवेश की सिद्धि प्राप्त थी। सूक्ष्म शरीर से वह अपनी इच्छानुसार विभिन्न शरीरों में गमनागमन करते थे। एकबार अपने शिष्य गोरखनाथ को स्थूल शरीर की सुरक्षा का भार सौंपकर एक मृत राजा के शरीर में उन्होंने सूक्ष्म शरीर से प्रवेश किया था !
‘महाभारत के शान्ति पर्व’ में वर्णन है कि सुलभा नामक विदुषी अपने योगबल की शक्ति से राजा जनक के शरीर में प्रविष्ट कर विद्वानों से शास्त्रार्थ करने लगी थी। उन दिनों राजा जनक का व्यवहार भी बदला बदला लगता था जो स्वाभाविक नहीं लगता था !
‘अनुशासन पर्व’ में ही कथा आती है कि एक बार इन्द्र किसी कारण वश ऋषि देवशर्मा पर कुपित हो गये। उन्होंने क्रोधवश ऋषि की पत्नी से बदला लेने का निश्चय किया। देवशर्मा का शिष्य ‘विपुल’ योग साधनाओं में निष्णात और सिद्ध था। उसे योग दृष्टि से यह मालूम हो गया कि मायावी इन्द्र, गुरु पत्नी से बदला लेने वाले हैं। ‘विपुल’ ने सूक्ष्म शरीर से गुरु पत्नी के शरीर में उपस्थित होकर इन्द्र के हाथों से उन्हें बचा लिया था !
‘पातंजलि योग दर्शन’ में सूक्ष्म शरीर से आकाश गमन, एक ही समय में अनेकों शरीर धारण, परकाया प्रवेश जैसी अनेकों योग विभूतियों का वर्णन है !
मरने के बाद सूक्ष्म शरीर जब स्थूल शरीर को छोड़कर गमन करता है तो उसके साथ अन्य सूक्ष्म परमाणु कहिए या कर्म भी गमन करते हैं जो उनके परिमाप के अनुसार अगले जन्म में रिफ्लेक्ट होते हैं, जैसे तिल, मस्सा, गोली का निशान, चाकू का निशान, आचार-विचार, संस्कार आदि। इस सूक्ष्म शरीर को मरने से पहले ही जागृत कर उसमें स्थिति हो जाने वाला व्यक्ति ही परकाय प्रवेश सिद्धि योग में पारंगत हो सकता है !
सबसे बड़ा सवाल यह है कि खुद के शरीर पर आपका कितना नियंत्रण है ? योग के अनुसार जब तक आप खुद के शरीर को वश में करना नहीं जानते तब तक दूसरे के शरीर में प्रवेश करना बहत ही मुश्किल होता है !
दूसरों के शरीर में प्रवेश करने की विद्या को परकाय प्रवेश योग विद्या कहते हैं। आदि शंकराचार्य इस विद्या में अच्छी तरह से पारंगत थे। नाथ संप्रदाय के और भी बहुत से साधक इस तकनीक से अवगत थे, लेकिन आम जनता के लिए तो यह बहुत ही कठिन जान पड़ता है क्योंकि यह एक दुर्लभ साधना से सीखी जाती है !
योग में कहा गया है कि मनुष्य की सबसे बड़ी समस्या है – ‘चित्त की वृत्तियां’ ! इसीलिए योग सूत्र का पहला सूत्र है-
योगस्य चित्तवृत्ति निरोध: !
इस चित्त में हजारों जन्मों की आसक्ति, अहंकार काम, क्रोध, लोभ, मोह आदि से उपजे कर्म संग्रहित रहते हैं, जिसे संचित कर्म कहते हैं।
यह संचित कर्म ही हमारा प्रारब्ध भी होते हैं और इसी से आगे की दिशा भी तय होती है। इस चित्त की पांच अवस्थाएं होती है जिसे समझ कर ही हम सूक्ष्म शरीर को सक्रिय कर सकते हैं। सूक्ष्म शरीर से बाहर निकल कर ही हम दूसरे के शरीर में प्रवेश कर सकते हैं !
चित्त की पांच अवस्थाओं को जानना आवश्यक है !
इस चित्त या मानसिक अवस्था के पांच रूप हैं:- (1)क्षिप्त (2) मूढ़ (3)विक्षिप्त (4)एकाग्र और (5)निरुद्व। प्रत्येक अवस्था में कुछ न कुछ मानसिक वृत्तियों का निरोध होता है।
(1) क्षिप्त : क्षिप्त अवस्था में चित्त एक विषय से दूसरे विषय पर लगातार दौड़ता रहता है। ऐसे व्यक्ति में विचारों, कल्पनाओं की भरमार रहती है !
(2) मूढ़ :
मूढ़ अवस्था में निद्रा, आलस्य, उदासी, निरुत्साह आदि प्रवृत्तियों या आदतों का बोलबाला रहता है !
(3) विक्षिप्त :
विक्षिप्तावस्था में मन थोड़ी देर के लिए एक विषय में लगता है पर क्षण में ही दूसरे विषय की ओर चला जाता है। पल प्रति‍पल मानसिक अवस्था बदलती रहती है !
(4) एकाग्र :
एकाग्र अवस्था में चित्त देर तक एक विषय पर लगा रहता है। यह अवस्था स्थितप्रज्ञ होने की दिशा में उठाया गया पहला कदम है !
(5) निरुद्व :
निरुद्व अवस्था में चित्त की सभी वृत्तियों का लोप हो जाता है और चित्त अपनी स्वाभाविक स्थिर, शान्त अवस्था में आ जाता है। अर्थात व्यक्ति को स्वयं के होने का पूर्ण अहसास होता है। उसके उपर से मन, मस्तिष्क में घुमड़ रहे बादल छट जाते हैं और वह पूर्ण जाग्रत रहकर दृष्टा बन जाता है। यह योग की पहली समाधि अवस्था भी कही गई है !
ध्यान योग का सहारा :
निरुद्व अवस्था को समझें यह व्यक्ति को आत्मबल प्रदान करती है। यही व्यक्ति का असली स्वरूप है। इस अवस्था को प्राप्त करने के लिए सांसार की व्यर्थ की बातों, क्रियाकलापों आदि से ध्यान हटाकर संयमित भोजन का सेवन करते हुए प्रतिदिन ध्यान करना आवश्यक है। इस दौरान कम से कम बोलना और लोगों से कम ही व्यवहार रखना भी जरूरी है !
*ज्ञान योग का सहारा :
चित्त की वृत्तियों और संचित कर्म के नाश के लिए योग में का वर्णन मिलता है। ज्ञानयोग का पहला सूत्र है कि स्वयं को शरीर मानना छोड़कर आत्मा मानों। आत्मा का ज्ञान होना सूक्ष्म शरीर के होने का आभास दिलाएगा।
कैसे होगा यह संभव :
चित्त जब वृत्ति शून्य (निरुद्व अवस्था) होता है तब बंधन के शिथिल हो जाने पर और संयम द्वारा चित्त की प्रवेश निर्गम मार्ग नाड़ी के ज्ञान से चित्त दूसरे के शरीर में प्रवेश करने की सिद्धि प्राप्त कर लेता है। यह बहुत आसान है, चित्त की स्थिरता से सूक्ष्म शरीर में होने का अहसास बढ़ता है। सूक्ष्म शरीर के निरंतर अहसास से स्थूल शरीर से बाहर निकलने की इच्‍छा बलवान होती है।
*योग निंद्रा विधि : जब ध्यान की अवस्था गहराने लगे तब निंद्रा काल में जाग्रत होकर शरीर से बाहर निकला जा सकता है। इस दौरान यह अहसास होता रहेगा की स्थूल शरीर सो रहा है। शरीर को अपने सुरक्षित स्थान पर सोने दें और आप हवा में उड़ने का मजा लें। ध्यान रखें किसी दूसरे के शरीर में उसकी इजाजत के बगैर प्रवेश करना अपराध है !
साभार https://www.facebook.com/dnpandeyd से

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