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21 जून, कर्क रेखा और उस दिन छाया न दिखने या कम होने का वैज्ञानिक और खगोलीय पहलू

मध्य प्रदेश   के उज्जैन जिले का एक  एक गांव अब खगोलीय चमत्कार का प्रतीक बन गया है। इस गाँव का नाम है  डोंगला. उज्जैन से करीब 35 किलोमीटर दूर स्थित डोंगला गांव में भारत की छठवीं और अद्भुत वेधशाला बन रही है. ये वो जगह है, जहां खगोलशास्त्र, ज्योतिष, विज्ञान और आध्यात्म सब एक हो जाते हैं. 21 जून को डोंगला की वराहमिहिर वेधशाला में मख्यमंत्री डॉ मोहन यादव एक प्लेनेटोरियम का लोकार्पण करेंगे. इस दौरान यहां खगोल विज्ञान एवं भारतीय ज्ञान परंपरा” विषय पर राष्ट्रीय कार्यशाला आयोजित की जाएगी. जिसमे देश के कई खगोलशास्त्री शामिल होंगे.
डोंगला अब सिर्फ एक गांव नहीं, समय की नई परिभाषा है. जहाँ सूर्य छाया नहीं देता, पर ज्ञान की रोशनी जरूर छोड़ जाता है. 1972 में जब पद्मश्री डॉ विष्णु श्रीधर वाकणकर ने उपग्रह चित्र मंगवाए और पाया कि कर्क रेखा और शून्य देशांतर अब डोंगला की ओर खिसक चुके हैं, तब शायद उन्होंने सोच लिया था कि एक दिन यह गांव पूरे देश के समय का मानक बनेगा.

  राजा विक्रमादित्य की नगरी उज्जैन में समय की गणना का केंद्र अब खिसककर एक छोटे से गांव डोंगला की गोद में आ गया है. यह वही डोंगला है, जहाँ हर साल 21 जून को ठीक दोपहर 12 बजकर 28 मिनट पर छाया तक छिप जाती है. विज्ञान इसे शून्य छाया बिंदु कहता है. डोंगला गांव से कर्क रेखा गुजरती है, इसलिए ये गांव खगोल विज्ञान और ज्योतिष विज्ञान की दृष्टि से महत्तवपूर्ण रहा है. और अब इस रहस्य को विज्ञान की आंख से देखने के लिए खड़ी हो चुकी है वराहमिहिर वेधशाला.

इस दिन सूर्य की किरणें लंबवत होंगी, यही वजह है कि व्यक्ति का साया कुछ पल के लिए नजर नहीं आता है.

यहाँ पर दोपहर में 12: 28 मिनट पर छाया को गायब होते देखा जा सकेगा. इस दौरान यहाँ पर होने वाली कार्यशाला में जाने माने विद्वान उपस्थित होंगे. राष्टीय कार्यशाला होगी देश के कोने-कोने से वैज्ञानिक और खगोल विज्ञान से जुड़े विद्वान आएंगे. ये वेधशाला केवल देखने का केंद्र नहीं. भविष्य की शिक्षा का मंदिर है. यहाँ बच्चों की तारों से दोस्ती कराई जाती है. एक 200 सीट वाला अत्याधुनिक ऑडिटोरियम, 20 इंच व्यास की प्लेनवेव दूरबीन, जो प्रदेश की सबसे लंबी टेलीस्कोप है और एक डिजिटल प्लेनेटोरियम. सब मिलकर एक सपना दिखाते हैं, जिसमें आकाश को छूने की चाह है.

21 जून वह दिन है जब सूर्य कर्क रेखा के सीध में आता है, जिससे उस रेखा या उसके आसपास छाया लगभग या पूरी तरह गायब हो जाती है। यह पृथ्वी के झुकाव और कक्षा का एक बेहद सुंदर और सटीक प्रमाण है, जो हमें बदलते मौसम और ऋतुओं का संकेत देता है।  21 जून को उत्तरी गोलार्ध में ग्रीष्म अयनांत (Summer Solstice) होता है।यह साल का सबसे लंबा दिन होता है और सूर्य कर्क रेखा (23.5°N) के ठीक ऊपर चमकता है।

इसी दिन सूर्य अपनी सर्वोच्च स्थिति (Zenith) में पहुँच जाता है, यानी कर्क रेखा पर सीधा सिर के ऊपर होता है।

कर्क रेखा क्या है?

यह पृथ्वी का वह अक्षांश है जो लगभग 23.5°N पर है।

यह वह रेखा है जिस तक सूर्य साल में एक बार सीधा चमकता है (21 जून को)।

कर्क रेखा भारत में इन राज्यों से होकर गुजरती है: गुजरात, राजस्थान, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, झारखंड, पश्चिम बंगाल, त्रिपुरा और मिज़ोरम।

छाया कम या बिल्कुल न होने का कारण

21 जून को दोपहर में कर्क रेखा के स्थानों (जैसे रांची, भोपाल, उज्जैन) में जब सूर्य सीधा सिर के ऊपर होता है तो छाया या तो बिल्कुल नहीं दिखाई देती या बहुत कम दिखाई देती है।

इसे ही “Zero Shadow Day” या छायाशून्य क्षण कहा जाता है।

ऐसा तब होता है जब सूर्य का आपतन कोण (Angle of Incidence) सीधा यानी 90° होता है और छाया सीधी व्यक्ति या वस्तु के नीचे रहती है।

कर्क रेखा के अलावा क्या होता है?

जो स्थान कर्क रेखा से थोड़े ऊपर या नीचे है, वहां छाया थोड़ी सी दिखाई देती है, पूरी गायब नहीं होती।

कर्क रेखा से आगे यानी उत्तर या दक्षिण में यह घटना कभी नहीं घट सकती।

पृथ्वी और सूर्य का संबंध

पृथ्वी अपनी धुरी (Axis) लगभग 23.5° झुकाव के साथ घूमती है।

इसी झुकाव और कक्षा में गति के कारण:  21 जून: सूर्य कर्क रेखा तक सीधा पहुँचता है।

22 दिसंबर: सूर्य मकर रेखा तक सीधा पहुँचता है।

21 मार्च और 23 सितंबर: सूर्य भूमध्य रेखा (Equator) के ऊपर सीधा होता है।

यह जानना क्यों महत्त्वपूर्ण है?

यह घटना हमें बताती है कि पृथ्वी और सूर्य का आपसी संबंध मौसम और ऋतुओं को नियंत्रित करता है।

यह वैज्ञानिक अध्ययन (खगोल विज्ञान) और सांस्कृतिक पहलुओं (जैसे विश्व योग दिवस) दोनों में विशेष स्थान रखती है।

यहां जो तारामंडल बना है उसमें 55 दर्शक एक साथ ब्रह्मांडीय घटनाएं देख सकते हैं. 8 मीटर व्यास वाले एफआरपी डोम में E-Vision 4K प्रोजेक्टर और डिजिटल साउंड के साथ.

1972 में जब पद्मश्री डॉ विष्णु श्रीधर वाकणकर ने उपग्रह चित्र मंगवाए और पाया कि कर्क रेखा और शून्य देशांतर अब डोंगला की ओर खिसक चुके हैं, तब शायद उन्होंने सोच लिया था कि एक दिन यह गांव पूरे देश के समय का मानक बनेगा.

डोंगला अब सिर्फ एक गांव नहीं, समय की नई परिभाषा है. जहाँ सूर्य छाया नहीं देता, पर ज्ञान की रोशनी जरूर छोड़ जाता है. जहाँ यंत्र धातु से नहीं, परंपरा से बने हैं. जहाँ भविष्य सिर्फ सपना नहीं, शोध है. जहाँ आज की तारीख़ — बीते कल के आधार पर — आने वाले कल को दिशा दे रही है. तो अगली बार जब आप घड़ी देखें या पंचांग पलटें — याद रखिएगा, कहीं दूर उज्जैन के पास डोंगला गांव में एक वेधशाला है. जो समय की सांसों को माप रही है. और हां, अगर कभी 21 जून को दोपहर 12:28 बजे बाहर हों — तो अपनी छाया ढूंढ़िएगा. शायद वो आपको डोंगला जाने को कह रही हो.

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