Homeजियो तो ऐसे जियोश्रीमती श्यामा शर्मा : बच्चों के मन में झांकने वाली गीतकार

श्रीमती श्यामा शर्मा : बच्चों के मन में झांकने वाली गीतकार

बाल साहित्यकार श्रीमती श्यामा शर्मा कोटा का जन्म 10 जनवरी 1958  को कोटा जिले की पीपल्दा तहसील में कारवाड़ में स्व. राम प्रताप के परिवार में हुआ। इन्होंने हिंदी साहित्य में स्नातक तक शिक्षा प्राप्त की। किसी पारिवारिक वजह से स्नातकोत्तर की पढ़ाई बीच में ही छोड़नी पड़ी। अपने पति जितेंद्र ‘ निर्मोही ‘ की प्रेरणा से करीब 11 वर्ष पहले इन्होंने साहित्य के क्षेत्र में कदम रखा। पति की निरंतर प्रेरणा, रचनाएं साहित्यिक पत्र – पत्रिकाओं में प्रकाशित होने,आकाशवाणी केंद्र और टीवी चैनल्स पर प्रसारित होने, कृतियां प्रकाशित होने और समय-समय पर विभिन्न संस्थाओं द्वारा मिले राष्ट्रीय और आंचलिक पुरस्कारों और कृतियों की समीक्षा से निरंतर मिले प्रोत्साहन का ही प्रतिफल है कि आज बाल साहित्य के क्षेत्र में  इन्होंने महत्वपूर्ण स्थान बना लिया है। ये कई साहित्यिक संस्थाओं से जुड़ी हैं और काव्य गोष्ठियों में सक्रिय हैं।
वर्तमान में निरंतर लेखन में सक्रिय हैं। इन्होंने विस्मृत लोक साहित्य के साथ-साथ अभिजात्य साहित्य को सामने लाने के प्रयासों के साथ – साथ बच्चों के लिए बाल साहित्य का सृजन किया है। बाल सृजन मनोरंजन के साथ-साथ संदेश परक, उनके नैतिक और मानसिक विकास में भी सहायक हो यहीं इनके लेखन का मर्म है। बाल कविताओं में इन्होंने अनेक पहलुओं को छुआ हैं। कविताओं में बच्चों को सहज आकर्षित कर प्रकृति और पर्यावरण से जोड़ा है। बच्चों में संस्कार और मानवीय गुण विकसित करना बाल साहित्य लिखना उद्देश्य रहा है। विज्ञान का क्षेत्र भी इनकी कविताओं से अछूता नहीं है। आपने जैव विविधता,  कम्प्यूटर, ओजोन परत, जल संरक्षण, पृथ्वी दिवस, वन्य जीव सप्ताह, योगासन जैसी जानकारी देने वाली कविताओं का सृजन भी किया है।
  आप हिंदी और राजस्थानी भाषा में सृजन का सामान अधिकार रखती हैं। बच्चों को शिक्षाप्रद संदेश देती और चेतना जाग्रत करती अनेक कविताओं की रचनाकार हिंदी और राजस्थानी भाषाओं में समान रूप से गद्य-पद्य विधाओं में वर्णात्मक, विवरणात्मक, विवेचनात्मक, बालकाव्य में मनोवृतिपरक ,रसयोजना-गीतों में भावानुकूल, समकालीन काव्य विषय में समसामयिक के साथ  रचनाओं को आगे बढ़ाती हैं ।समकालीन कविता और गीत लिखने के साथ-साथ बालकाव्य, बाल कहानी, संस्मरण, कहानी लेखन विधाओं में सृजन करती हैं। बच्चों की कोमल मनोभावनाओं, उनके मनोविज्ञान, ग्रहण क्षमता , परिवेश सभी को ध्यान में रख कर सरल शब्दों का चयन और उनकी जुगलबंदी इनके लेखन की विशेषता है।
इनके गीत काव्य में लोक, लोक संवेदना और आंचलिकता है तो समकालीन काव्य में समसामयिकता देखी जा सकती है। साहित्य के मूल में मनुष्य और मनुष्यता है, संस्मरणों में हाड़ौती अंचल की सांस्कृतिक विरासत  खासकर ग्राम्य संस्कृति है। इनके आने वाले राजस्थानी उपन्यास “किट्टी पारटी” वर्तमान समय और भौतिकवादी दृष्टिकोण का दिखावा विषय पर है।  इन्होंने हाड़ोती अंचल की लोककथाओं का लेखन कर उनसे बच्चों का मनोरंजन और लोक कथाओं के संरक्षण का महत्वपूर्ण कार्य भी इन्होंने किया है।
बाल काव्य संग्रह ’’कोई गीत सुनाओ ना’’  ’चिड़िया रानी आओ ना’ , “पक्षियों को पहचाने” बाल साहित्य कृति का गद्य और पद्य विधा में सृजन,  बाल काव्य कृति “उड़ी रै खशबू च्यारू मेर” और राजस्थानी संस्मरण कृति “वै दन वै बातां” और ” हाड़ोती अंचल की रोचक लोक कथाएं ’  इनकी अन्य प्रमुख कृतियां हैं। लेखन के लिए उन्हें कई संस्थाओं द्वारा सम्मानित किया गया हैं ये कई संस्थाओं से संबद्ध हैं। अपने कई साहित्यिक प्रतियोगिताओं में भाग ले कर पुरस्कार भी प्राप्त किए हैं।
संपर्क : ठ 422,आर के पुरम,
कोटा ( राज.) मो. -9413734544
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डॉ.प्रभात कुमार सिंघल
लेखक एवं पत्रकार, कोटा
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