Homeजियो तो ऐसे जियोआधी रात को ट्रैन में डकैतों से भिड़ने वाला फौजी

आधी रात को ट्रैन में डकैतों से भिड़ने वाला फौजी

कल्पना कीजिए 2 सितंबर 2010 की एक अंधेरी रात। मौर्य एक्सप्रेस ट्रेन पश्चिम बंगाल के घने जंगलों से गुजर रही थी। ट्रेन रांची से गोरखपुर की ओर बढ़ रही थी। इसी ट्रेन में सवार थे 35 वर्षीय रिटायर्ड गोरखा सैनिक बिष्णु प्रसाद श्रेष्ठ, जो भारतीय सेना की 8वीं गोरखा राइफल्स की 7वीं बटालियन में सेवा दे चुके थे और अपनी ड्यूटी पूरी कर घर लौट रहे थे। डिब्बे में सामान्य यात्री थे, किसी को अंदाजा नहीं था कि कुछ ही पलों में यह यात्रा मौत और साहस के बीच की लड़ाई बन जाएगी।
अचानक ट्रेन रुकती है। अंधेरे का फायदा उठाकर 30-40 के बीच हथियारबंद डाकू ट्रेन पर चढ़ आते हैं। उनके हाथों में चाकू, तलवारें, कुल्हाड़ी और कुछ के पास पिस्तौलें थीं। पूरे डिब्बे में चीख पुकार मच जाती है। यात्री डर से सिमट जाते हैं। डाकू मोबाइल, पैसे, गहने और कीमती सामान लूटने लगते हैं। बिष्णु स्थिति को समझते हुए चुप रहते हैं और अपना वॉलेट दे देते हैं, क्योंकि वे जानते थे कि अकेले होकर सीधे टकराना उस समय सही नहीं होगा।
लेकिन तभी हालात बदल जाते हैं। डाकू एक 18 साल की लड़की को पकड़ लेते हैं, जो अपने माता पिता के साथ यात्रा कर रही थी। वे उसे घसीटने लगते हैं और उसके कपड़े फाड़ने की कोशिश करते हैं। लड़की डर और बेबसी में चीख उठती है और बिष्णु की ओर देखकर कहती है, आप सैनिक हैं, मेरी रक्षा कीजिए, मुझे अपनी बहन समझिए। यह सुनते ही एक गोरखा सैनिक का खून खौल उठता है।
अगले ही पल बिष्णु अपनी कमर से पारंपरिक खुकरी निकालते हैं और अकेले ही डाकुओं पर टूट पड़ते हैं। उन्होंने एक डाकू को पकड़कर मानव ढाल बनाया और बिजली की रफ्तार से वार शुरू कर दिए। खुकरी की चमक और अचानक हुए हमले से डाकू घबरा जाते हैं। कुछ ही मिनटों में हालात पलट जाते हैं। रिपोर्ट्स के अनुसार तीन डाकू मारे गए और करीब आठ गंभीर रूप से घायल हुए। बाकी डाकू यह कहते हुए भाग खड़े हुए कि एक आदमी हम सब पर भारी पड़ रहा है।
इस भीषण संघर्ष में बिष्णु के बाएं हाथ पर गहरी चोट आती है और उन्हें करीब दो महीने अस्पताल में रहना पड़ता है। लड़की के गले पर हल्की खरोंच जरूर आती है, लेकिन उसकी इज्जत बच जाती है। यात्रियों का बड़ा नुकसान भी टल जाता है। बाद में पुलिस ने कई डाकुओं को पकड़ लिया और लूटा हुआ सामान बरामद किया।
इस असाधारण वीरता के लिए बिष्णु प्रसाद श्रेष्ठ को सेना मेडल और उत्तम जीवन रक्षा पदक से सम्मानित किया गया। लड़की के परिवार ने उन्हें इनाम देना चाहा, लेकिन उन्होंने विनम्रता से मना कर दिया और कहा, युद्ध में दुश्मन से लड़ना सैनिक का कर्तव्य है, लेकिन ट्रेन में डाकुओं से लड़ना एक इंसान का कर्तव्य था।
यह गोरखा सैनिकों की बहादुरी, साहस और मानवता की एक जीवित मिसाल है।
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