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किस्से अब्दुल रहीम खानजादा के …

आज 17 दिसंबर ब्रज के कवि, अकबर के नवरत्नों में से एक, बैरम खाँ के लाड़ले, हम मेवातियों के नंवासे और एक कुशल सेनापति, प्रशासक तथा अपनी दानशीलता के लिए प्रसिद्ध अब्दुर्रहीम ख़ानख़ानाँ का जन्मदिन है l उसी रहीम का जिसका जीवन शायद मुग़लकाल का सबसे जटिल, चुनौती भरा और उतार-चढ़ाव वाला रहा है l रहीम ने कई भाषाओं  जैसे फ़ारसी, अरबी, संस्कृत, ब्रज में निपुणता हासिल की हुई थी l जहाँगीर के शासनकाल में उन्हें आर्थिक संकटों और कैद का सामना करना पड़ा l 1627 में दिल्ली में उनका निधन हो गया और उन्हें पत्नी माहबानू के  मकबरे के पास दफनाया गया, जिसका निर्माण उन्होंने स्वयं करवाया था l
         रहीम के जन्मदिन के अवसर पर तुलसी और उनकी मित्रता को लेकर प्रस्तुत है उपन्यास ‘ख़ानज़ादा’ का एक अंश –
उम्र सिर्फ़ बीस बरस और ओहदा पहले गुजरात का सूबेदार और फिर मिर अर्ज़ l इतना ही नहीं बादशाह अकबर के नौ रत्नों में से एक रत्न का ख़िताब भी हासिल हो गया l अब्दुर्रहीम मिर्ज़ा खाँ का ज़्यादातर वक़्त अब दरबार की सियासत में बीतने लगा l घर आने के बाद शाम से लेकर इशा की नमाज़ तक का समय रहीम का माहबानू के आलिंगन में बीतता l बीच-बीच में वह हिंदी का ज्ञान अपनी माँ से, कुछ अपने शौक़ से और बाकी अरबी, फ़ारसी और तुर्की की तालीम अंदीजान के मौलवी मुल्ला मुहम्मद अमीन से हासिल करता रहता l इस सबके बीच जो समय मिलता उसमें वह नीतिपरक दोहे और चुटीले बरवै रच लेता l रहीम जब ये नीतिपरक दोहे और चुटीले बरवै दरबार में सुनाता, तब इन्हें सुन पूरा दरबार उसकी विदग्धता पर भौचक्क रह जाता l रहीम की यह प्रतिभा दरबार में टोडरमल, बीरबल और गंग जैसे कवियों के अलावा अनेक संस्कृत विद्वानों के साथ रह कर और निखरने लगी l इनकी संगत में रह कर हिंदू धर्म-शास्त्रों का ज़्यादा और गहन अध्ययन करने लगा l
  गुजरात में अब्दुर्रहीम जो अमन-चैन स्थापित कर आया था, अचानक एक दिन बादशाह अकबर के पास एक बेचैन करने वाली ख़बर आई l बादशाह ने गुजरात के सूबेदार और मीर अर्ज़ अर्थात अब्दुर्रहीम मिर्ज़ा खाँ को एक बार फिर बुलाया l
 “बादशाह सलामत, आपने याद फरमाया ?” रहीम ने कोर्निश करते हुए पूछा l
 “हाँ मिर्ज़ा खाँ, मुज़फ़्फ़र हुसैन मिर्ज़ा ने हमसे गुजरात फिर छीन लिया है l मैं चाहता हूँ कि आप फिर से गुजरात जाएँ और इस पाजी को सलीक़े से सबक़ सिखा कर आएँ l”
 “जैसा आपका हुक्म बादशाह सलामत l”
 “इस काम को जितना ज़ल्दी अंजाम दिया जाए, उतना बेहतर होगा l”
 अब्दुर्रहीम मिर्ज़ा खाँ तुरंत गुजरात के लिए रवाना हो गया और शीघ्र हि मुज़फ़्फ़र हुसैन मिर्ज़ा की कमर तोड़ कर लौट आया l इससे ख़ुश होकर अगले दिन बादशाह अकबर ने उसे न केवल ख़िलअत देकर सम्मानित किया, बल्कि रहीम के वालिद मरहूम बैरम खाँ की तरह उसे भी ख़ानेख़ानाँ जैसे सबसे बड़े शाही ख़िताब से नवाज़ा गया l
 रहीम एक बार फिर अपने दोहे, बरवै और सोरठा रचने में रम गया l
 एक बार शायर नज़ीरी निशापुरी ने अब्दुर्रहीम से कहा,”ख़ानेख़ानाँ साहब, मैंने ज़िंदगी में कभी एक लाख अशर्फ़ियाँ नहीं देखी हैं l”
 शायर नज़ीरी निशापुरी की बात सुन अब्दुर्रहीम ख़ानेख़ानाँ घर चला आया l घर आने के बाद भी उसे शायर नज़ीरी की यह बात परेशान करती रही l परेशान बेटे को देख शाम को माँ सलीमा बेगम उसके पास आई और सर पर हाथ फेरते हुए पूछा,”लगता है मेरा बेटा आज परेशान है ?”
 “अम्मी जान, ऐसा कुछ नहीं है l” रहीम ने माँ को टालना चाहा l
 “कुछ तो है l नहीं बताएगा तो किसी मुश्किल का ऐसे कैसे हल निकलेगा ?”
 रहीम ने सोचा कि माँ को बता देना चाहिए वरना उसके चक्कर में वह भी परेशान रहेगी l वैसे भी उसकी ज़्यादातर मुश्किलों का हल यही तो बताती है l
 “अम्मी जान, पता है आज शायर नज़ीरी निशापूरी साहब क्या बोले l”
 “क्या बोले ?” माँ ने बेटे के बालों में अपनी नाज़ुक अँगुलियाँ फेरते हुए पूछा l
 “बोले कि ख़ानेख़ानाँ साहब, मैंने ज़िंदगी में कभी एक लाख अशर्फ़ियाँ नहीं देखी हैं l अम्मी जान, जब से नज़ीरी साहब ने यह कहा है, मैं तब से यह सोच-सोच कर बेचैन हूँ कि यहाँ मेरे पास बेशुमार दौलत है, और एक शायर नज़ीरी निशापूरी साहब जैसे लोग हैं, जिन्होंने कभी एक लाख अशर्फ़ियाँ नहीं देखी हैं l”
 “बेटा, शायर-कवियों के पास कभी धन-दौलत जुड़ती देखी है ? इनका दौलत से क्या लेना-देना l ये तो फ़क़ीर होते हैं l इस दुनिया में नज़ीरी साहब जैसे न जाने कितने लोग हैं l ऐसे ही लोगों के बारे में हमारे मेवात में कहा गया है कि-
 बिरह बाण और बिरहड़ा, इन्ने मत सीखियो कोए l
 इनका सीखणहार को, झुर-झुर पिंजर होए ll”
“आप सही कहती हैं अम्मी जान, शायरी-कवित्त करने वाले पिंजर हो जाते हैं l”
“वैसे रहीम, आपके लिए यह कौन-सी बड़ी बात है l”
 माँ के इतना कहते ही रहीम की सारी बेचैनी और परेशानी जैसे चुटकी बजाते काफ़ूर हो गई l उसने माँ का हाथ यह कहते हुए चूम लिया,”अम्मी जान, आपने मेरी बहुत बड़ी मुश्किल दूर कर दी l”
 अगले रोज़ सुबह अब्दुर्रहीम ख़ानेख़ानाँ ने शायर नज़ीरी निशापूरी को बुलवाया, और उसके सामने अशर्फ़ियों का ढेर लगा दिया l
अपने सामने लगे अशर्फ़ियों के ढेर को देख शायर नज़ीरी निशापूरी बोला,”ख़ुदा का शुक्रिया ख़ानेख़ानाँ साहब, जो उसने इस नाचीज़ को एक लाख अशर्फ़ियों के दीदार करा दिए l”
“सिर्फ़ अशर्फ़ियों के दीदार के लिए ख़ुदा का क्या शुक्र अदा करना नज़ीरी साहब l”
“हम जैसों के लिए तो एक लाख अशर्फ़ियों को देखना ही किसी सपने का पूरा होने जैसी बात है l” अशर्फ़ियों को देखने के बाद शायर नज़ीरी निशापूरी अपनी जगह से उठा, और यह कह कर जाने लगा,” ख़ानेख़ानाँ साहब, आपका बहुत शुक्रिया l आपकी वजह से आज मेरा एक बहुत बड़ा सपना पूरा हो गया l ख़ुदा हाफ़िज़ l”
शायर नज़ीरी निशापूरी ने जिस नादीदेपन के साथ सपना पूरा होने की बात कही, अब्दुर्रहीम सोचने लगा कि जिस आदमी की ज़िंदगी का सपना सिर्फ़ एक लाख अशर्फ़ियों को देखने का रहा हो, अगर उसे ये मिल जाएँ तब इनसे उसके कितने सपने पूरे होंगे, उसके बारे में सोचा भी नहीं जा सकता l
“अगर ऐसा है नज़ीरी साहब तो एक बार इन्हें छू कर भी देख लो l कहीं ऐसा ना हो कि बाद में आप कहें कि मैंने ज़िंदगी में कभी सोने की अशर्फ़ियों को छू कर नहीं देखा l”
 शायर नज़ीरी निशापूरी को लगा कि अब्दुर्रहीम ख़ानेख़ानाँ बात तो ठीक कह रहा है l वह वापिस लौटा और अशर्फ़ियों के ढेर में उसने दोनों हाथों की अँगुलियों को ऐसे डाला, जैसे अनाज की ढेरी में किसान हाथ डाल कर उसके दानों को परखता है l जिस वक़्त शायर नज़ीरी निशापूरी की अँगुलियाँ सोने की अशर्फ़ियों की देह का स्पर्श कर रही थीं, अब्दुर्रहीम ने ध्यान दिया शायर नज़ीरी की अँगुलियों में एक ख़ास तरह की जुम्बिश हो रही थी l शायर नज़ीरी निशापूरी ने एक बार फिर अब्दुर्रहीम ख़ानेख़ानाँ का शुक्रिया अदा किया, और वापिस जाने के लिए मुड़ा ही था कि पीछे से अब्दुर्रहीम ने उसे टोका l
 “नज़ीरी साहब, कहाँ चल दिए ?
 शायर नज़ीरी निशापूरी जाते-जाते रुक गया और मुस्कराते हुए बोला,”मिर्ज़ा खाँ, अपनी एक अधूरी ग़ज़ल का शे’र याद आ गया l कई दिनों से उसे पूरी करने की सोच रहा था, मगर पूरी नहीं हो रही थी l आज आपके पास आया तो एक बहुत उम्दा शे’र बन पड़ा है l”
 “वो तो ठीक है मगर इन अशआर को भी तो उठाइए !” अब्दुर्रहीम ने अपने सामने पड़े अशर्फ़ियों के ढेर की तरफ़ इशारा करते हुए कहा l
नज़ीरी निशापूरी ने अब्दुर्रहीम को बोरे में भरा और यह सोच कर उठा लिया कि शायद अब्दुर्रहीम यह जतलाना चाहता है, कि वह सिर्फ़ इन्हें देख और छूए भर नहीं, उठा कर यह भी महसूस करे कि एक लाख अशर्फ़ियों में कितना वज़न होता है l
“नज़ीरी साहब, ख़ुदा का शुक्र अदा करना तब ठीक रहेगा, जब आप इन्हें साथ ले जाएँगे !”
 “ख़ानेख़ानाँ साहब, साथ ले जाएँगे ! क्या मतलब है आपका ?” शायर नज़ीरी निशापूरी के जैसे हाथ-पाँव ठंडे पड़ने लगे  l
 “आज से बल्कि इसी वक़्त से इन पर अब आपका हक़ है नज़ीरी साहब l अब इनके मालिक आप हैं l” अब्दुर्रहीम ख़ानेख़ानाँ ने मुस्कराते हुए कहा l
 अब्दुर्रहीम ख़ानेख़ानाँ की इस उदारता की चारों तरफ़ चर्चा होने लगी l कुछ रोज़ पहले उसने मुल्ला शिकेवी को उसके फ़ारसी के एक शे’र पर एक हज़ार अशर्फ़ियाँ भेंट कर दी, तो अरबी कवि रफ़ीउद्दीन हैदर को एक लाख रुपए दे दिए l आए दिन रहीम से अरबी, फ़ारसी शायर ही नहीं अन्य कवि भी ईनाम में भेंट ले जाने लगे l उस दिन इबादतख़ाने में लगने वाली मजलिस में अब्दुर्रहीम ख़ानेख़ानाँ ने कवि गंग को एक छंद, जो छप्पय था, उससे प्रसन्न होकर जब गंग को ईनाम के रूप में छत्तीस लाख रुपए दिए l
 अब्दुर्रहीम ख़ानेख़ानाँ की दानप्रियता के इन क़िस्सों ने जैसे किंवदंतियों का रूप ले लिया l घर-घर में रहीम के चर्चे होने लगे l माँ सलीमा जब-जब बेटे के इन क़िस्सों को सुनती, तब-तब उसका सीना गर्व से चौड़ा होता चला जाता l जबकि बीवी माहबानू वह तो मारे ख़ुशी के जैसे बौरा जाती l धन्य हो उठती ऐसे दानवीर पति को पाकर l अपनी सूबेदारी और जागीरों से मिले राजस्व को वह कवि और शायरों में दोनों हाथों से बाँटने लगा l
 और इस घटना ने तो मानो पूरे रहीम का ही नहीं बल्कि पूरे हिंदुस्तान का में मस्तक ऊँचा कर दिया l
 “ख़ानेख़ानाँ साहब, एक ग़रीब बेवा आपसे मिलने की ख़्वाहिश लेकर आई है l” एक सिपाही ने आकर रहीम को आकर बताया l
 “हमसे एक बेवा मिलने की ख़्वाहिश लेकर आई है ?” रहीम ने आश्चर्य से पूछा l
 “जी l कह रही है कि उसे गोस्वामीजी ने भेजा है l”
 “क्याsss ! गोस्वामी तुलसीदास जी ने भेजा है ? उन्हें इसी वक़्त बाइज़्ज़त लाया जाए !”
 अब्दुर्रहीम ख़ानेख़ानाँ के हुक्म के बाद वह निर्धन विधवा हाज़िर हो गई l उसके आने पर रहीम ने पहले उसे ऊपर से नीचे तक देखा l उसके कपड़ों को देख रहीम समझ गया कि विधवा होने के साथ-साथ सचमुच  यह  काफ़ी ग़रीब भी है l आते ही विधवा ने काग़ज़ का एक छोटा-सा पुर्ज़ा रहीम की तरफ़ यह कहते हुए बढ़ा दिया,”गोस्वामीजी ने कहा है कि मैं इसे आपको ले जाकर दे दूँ l”
 रहीम ने गोस्वामी तुलसीदास द्वारा भेजे गए काग़ज़ के इस छोटे-से टुकड़े को खोला और उसे पढ़ने लगा l पास में बैठे दूसरे कवियों और शायरों ने ध्यान दिया कि इस टुकड़े को पढ़ते हुए उसके आँखों के कोर भीग आए हैं l देर तक रहीम की नज़र काग़ज़ के इस छोटे-से टुकड़े पर टिकी रही l काफ़ी देर बाद रहीम ने धीरे-से नज़र उठाई l
“विवाह में कितना ख़र्चा आ जाएगा ?” रहीम ने निर्धन विधवा की तरफ़ देखते हुए पूछा l
“अन्नदाता, कैसे बताऊँ l कन्या का विवाह है l जितना आपको उचित लगे दे दीजिए l” विधवा ने हाथ जोड़ते हुए बड़ी विनम्रता से कहा l
रहीम ने प्रत्युत्तर में कुछ नहीं कहा l काग़ज़ के उसी टुकड़े पर उसने कुछ लिखा और यह कहते हुए उसे वापस निर्धन विधवा को दे दिया,”इसे गोस्वामीजी को जाकर दे देना !” फिर सामने बैठे ख़ज़ानची की तरफ़ उसने नज़र उठा कर देखा और उससे बोला,”इनसे जितनी अशर्फ़ियाँ ले जाई जाएँ, इनकी झोली में भर देना !”
निर्धन विधवा रहीम को दुआएँ देती हुई चली गई l
उसके जाने के बाद रहीम ने पहले अपने साथ बैठे तन्ना मिश्रा अर्थात मियाँ तानसेन, शेख़ फ़ैज़ी, शायर नज़ीरी निशापूरी, मुल्ला दो प्याजा, फ़क़ीर अज़ुद्दीन, गंग सहित बैठे दूसरे कवि-शायरों की तरफ़ देखा l फिर सबको सुनाते हुए कवि गंग से बोला,”गंग साहब, आप सब सोच रहे होंगे कि यह बेवा कौन थी…इसने गोस्वामीजी का जो काग़ज़ का छोटा-सा पुर्ज़ा दिया, उस पर क्या लिखा था?”
“आप सही कह रहे हैं ख़ानेख़ानाँ साहब कि तुलसीदासजी ने ऐसा क्या लिख दिया, जिसे पढ़ने के बाद आपने इस निर्धन बेवा की झोली अशर्फ़ियों से भर दी ?”
“गंग साहब, इस बेवा की पुत्री का विवाह है लेकिन इसके पास इतना धन नहीं है कि वह उसके हाथ पीले कर दे l मदद के लिए यह गोस्वामीजी के पास गई होगी और अपनी परेशानी के बारे में बताया होगा l उस गोस्वामीजी के पास जिसके पास सिवाय रामरतन के कुछ नहीं है l वे ठहरे निरे वैरागी l धन से उनका क्या वास्ता l समझ में नहीं आया कि यह क्या उम्मीद लेकर उनके पास गई l उन्होंने इस पंक्ति के साथ इसे मेरे पास भेज दिया कि – सुरतिय नरतिय नागतिय, अस चाहत सब होय l”
“ख़ानेख़ानाँ साहब, तुलसीदासजी ने कहा तो एकदम सही है कि धन-संपत्ति और आभूषण सभी नारियों को अच्छे लगते हैं l इनकी सभी को ज़रूरत होती है, फिर चाहे वे देवताओं की पत्नियाँ हों या असुरों की… नागवंश की हो और कोई l” कवि गंग मुस्कराते हुए बोला l
“आप सही कह रहे हैं गंग साहब l सब चाहते हैं कि उसकी पुत्री विवाह के बाद, भले ही उसका ससुराल कितना ही साधन-संपन्न हो, सुखी रहे l अब अपने मित्र गोस्वामीजी के मान और उनके कहे को मैं कैसे टाल सकता था l”
“मगर आपने काग़ज़ के उस पुर्ज़े पर क्या लिख कर वापस लौटा दिया ?” तन्ना मिश्रा अर्थात मियाँ तानसेन ने पूछा l
“मुझे लगा गोस्वामीजी ने आधी बात लिखी है l उसे मैंने यह लिख कर पूरा कर दिया कि- गोद लिए हुलसी फिरे, तुलसी सो सुत होए l”
“क्या बात कही है ख़ानेख़ानाँ साहब कि-
सुरतिय नरतिय नागतिय, सब चाहत अस होय l
गोद लिए हुलसी फिरे, तुलसी सो सुत होए l”
 “ख़ानेख़ानाँ साहब, इसे दोहे की शक्ल देकर आपने दोस्ती का असली हक़ सही मायने में आज अदा किया है l क्या बात कही है कि गोद लिए हुलसी फिरे, तुलसी सो सुत होए l” मुल्ला दो प्याजा ने हुमकते हुए कहा l
“मुल्ला साहब, आपने सही फ़रमाया l इससे पहले जो नहीं जानते थे कि गोस्वामी तुलसीदास की माँ का क्या नाम है, ख़ानेख़ानाँ साहब के इस दोहे से पता चल जाएगा कि उनकी माँ का नाम हुलसी है l” मियाँ तानसेन मुस्कराते हुए बोला l
रहीम मन-ही-मन मंद-मंद मुस्कराता रहा l
कवि गंग से इस बार रहा नहीं गया और मुस्कराते हुए बोला,”ख़ानेख़ानाँ साहब, बुरा न मानो तो एक बात पूछूँ ?”
“प्रिय गंग, आपको हमसे कब से इजाज़त लेने की ज़रूरत पड़ गई ?” प्रतिप्रश्न किया अब्दुर्रहीम ख़ानेख़ानाँ ने l
कवि गंग ने इसके बाद एक पल के लिए रहीम की आँखों में देखा और फिर बोला-
सीखी कहाँ नवाब जू, ऐसी दीने दैन l
ज्यों-ज्यों कर ऊँचौ करो, त्यों-त्यों नीचे नैन ll”
 कवि गंग का सवाल सुन अब्दुर्रहीम ख़ानेख़ानाँ पहले चुप रहा l फिर धीरे-से नज़र उठाई और कवि गंग की तरफ़ देख कर मुस्कराया,”गंग जी,
 देनदार कोऊ और है, भेजत सो दिन-रैन l
 लोग बहराम हम पै धरें, याते नीचे नैन ll”
 रहीम के इतना कहते ही सभा में जैसे ख़ामोशी छा गई l थोड़ी देर के लिए लगा जैसे पूस की बर्फ़-सी पिघलती रातों की तरह ठंडी-ठंडी फुहारें बरस रही हैं l बेजान दीवारें किसी राग की बंदिश से झंकृत हो उठी हैं l
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