सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार (28 जनवरी 2026) को वक्फ अधिनियम, 1995 के तहत सिविल कोर्ट और वक्फ ट्रिब्यूनल के अधिकार क्षेत्र को लेकर एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया। कोर्ट ने साफ किया कि धारा 85 के बावजूद सिविल कोर्ट का अधिकार पूरी तरह और हर परिस्थिति में समाप्त नहीं होता। कोर्ट ने कहा कि वक्फ ट्रिब्यूनल का अधिकार क्षेत्र केवल उन्हीं मामलों तक सीमित है, जो कानून में स्पष्ट रूप से उसे सौंपे गए हैं।
यह फैसला जस्टिस संजय कुमार और जस्टिस के विनोद चंद्रन की पीठ ने सुनाया। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि किसी संपत्ति के वक्फ होने या न होने का विवाद ट्रिब्यूनल केवल तभी तय कर सकता है, जब वह संपत्ति अधिनियम के तहत प्रकाशित ‘लिस्ट ऑफ औकाफ’ में शामिल हो।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि धारा 85 में सिविल कोर्ट के अधिकार क्षेत्र पर रोक की बात जरूर कही गई है लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि हर मामले में सिविल कोर्ट स्वतः ही अधिकारहीन हो जाती है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि वक्फ अधिनियम के तहत भी सिविल कोर्ट का अधिकार पूरी तरह समाप्त नहीं किया जा सकता।
पीठ ने सीपीसी 1908 की धारा 9 का हवाला देते हुए कहा कि यदि किसी ट्रिब्यूनल को अंतिम निर्णय देने का अधिकार दिया भी गया हो, तब भी कोर्ट को यह देखना होगा कि क्या ट्रिब्यूनल वैसी राहत दे सकता है, जैसी सामान्यतः सिविल कोर्ट देती है। यदि ट्रिब्यूनल के पास वह राहत देने की शक्ति नहीं है, तो सिविल कोर्ट के अधिकार क्षेत्र को बाहर मानने का कोई आधार नहीं बनता।
धारा 83 केवल ट्रिब्यूनल गठन की व्यवस्था, व्यापक अधिकार नहीं
कोर्ट ने वक्फ अधिनियम की धारा 83 की व्याख्या करते हुए कहा कि यह कोई सर्वव्यापी अधिकार देने वाली धारा नहीं है। धारा 83 ट्रिब्यूनल को सभी वक्फ विवादों पर सामान्य अधिकार नहीं देती। यह केवल ट्रिब्यूनल के गठन की एक सक्षम व्यवस्था है।
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि इसे इस तरह नहीं पढ़ा जा सकता कि ट्रिब्यूनल हर प्रकार के वक्फ संपत्ति विवाद, किराएदारी विवाद या कब्जा हटाने के मामलों पर स्वतः अधिकार रखता है। कोर्ट ने कहा कि किसी संपत्ति के वक्फ होने या न होने का विवाद ट्रिब्यूनल केवल उन्हीं संपत्तियों के संबंध में तय कर सकता है, जो ‘लिस्ट ऑफ औकाफ’ में दर्ज हों।
कोर्ट ने यह भी कहा कि वक्फ की परिभाषा और अधिनियम का सभी औकाफ पर लागू होना अपने आप ट्रिब्यूनल को अधिकार नहीं देता। यह विवाद एक भूमि मालिक (अपीलकर्ता) और मोहम्मद अहमद (प्रतिवादी) के बीच था। अपीलकर्ता ने बिल्डर के साथ विकास समझौते के तहत एक अपार्टमेंट कॉम्प्लेक्स बनाया था।
प्रतिवादी का दावा था कि ग्राउंड फ्लोर पर एक स्थान को मस्जिद के रूप में घेरा गया, जिसमें मालिक की भी भूमिका थी। उन्होंने कहा कि 2008 से वहाँ नमाज अदा की जा रही थी, लेकिन 2021 में प्रवेश रोका गया। प्रतिवादी ने वक्फ ट्रिब्यूनल में मुकदमा दायर कर माँग की कि मुस्लिमों को नमाज पढ़ने से न रोका जाए।
अपीलकर्ता ने तर्क दिया कि वहाँ कोई वैध मस्जिद नहीं है, स्वीकृत नक्शे में मस्जिद का कोई उल्लेख नहीं है और सबसे अहम बात यह कि संपत्ति न तो ‘लिस्ट ऑफ औकाफ’ में दर्ज है और न ही वक्फ बोर्ड में पंजीकृत, इसलिए ट्रिब्यूनल को इस मामले में अधिकार नहीं है।

