‘द केरल स्टोरी-2: गोस बियॉन्ड’ अब कोई साधारण फिल्म नहीं रह गई है। इस पर उठे सवालों ने ही इसे और अधिक देखने योग्य बना दिया है। फिल्म के निर्देशक कामाख्या नारायण सिंह हैं और निर्माता विपुल अमृतलाल शाह ने देश में फैल रही लव जिहाद की समस्या को सामाजिक और वैचारिक रूप से जिस तरह पर्दे पर उतारने का प्रयास किया है, वह वास्तव में उल्लेखनीय है।
फिल्म में देश के अलग-अलग कोनों से तीन लड़कियों की कहानियाँ दिखाई गई हैं। ये कहानियाँ बताती हैं कि किस प्रकार हिंदू पहचान के कारण उनके साथ भावनात्मक और सामाजिक स्तर पर छल किया जाता है, उन्हें उनकी पहचान के आधार पर चिह्नित कर अंधेरे गर्त में धकेल दिया जाता है।
फिल्म के रिलीज से पहले सामने आए प्रोमो वीडियोज में राजस्थान की दिव्या पालीवाल, केरल की सुरेखा नायर और मध्य प्रदेश की नेहा संत को पीड़िताओं के रूप में दिखाया गया था। इन तीनों किरदारों को उल्का गुप्ता, ऐश्वर्या ओझा और अदिति भाटिया ने निभाया है। इनमें से अदिति भाटिया का यह बड़े पर्दे पर पहला डेब्यू है।
सुरेखा की कहानी यह दर्शाती है कि ऐसे विधर्मियों से बचने के लिए केवल शिक्षा पर्याप्त नहीं होती। वहीं नेहा संत की कहानी बताती है कि यदि आपको अपने धर्म से प्रेम है, तब भी आपको झूठ बोलकर फँसाया जा सकता है। इसी प्रकार दिव्या पालीवाल की कहानी यह सिखाती है कि कम उम्र की बच्चियों का किस तरह ब्रेनवॉश कर उन्हें अपने जाल में फँसाया जाता है।
तीनों अभिनेत्रियों ने दिव्या, सुरेखा और नेहा के किरदार को प्रभावशाली ढंग से निभाया है। एक दर्शक के रूप में आप देख पाते हैं कि किस तरह एक लव जिहाद पीड़िता को जाल में फँसाया जाता है और किन-किन चरणों में उसका ब्रेनवॉश किया जाता है।
फिल्म की खासियत और समाचार में आती खबरें
‘द केरल स्टोरी’ के बाद पर्दे पर आ रही ‘द केरल स्टोरी-2: गोस बियॉन्ड’ की खास बात ये है कि इसकी कहानी किसी एक राज्य तक सीमित नहीं है, बल्कि देश के अलग-अलग हिस्सों से आती लव जिहाद की खबरों से जुड़ती है। उन पीड़िताओं की व्यथा भी इसमें दिखाई देती है, जो अब सामने आकर बताने लगी हैं कि कैसे उनकी जिंदगी बर्बाद की गई, उन्हें धर्म परिवर्तन के लिए प्रताड़ित किया गया या जबरन बीफ खिलाया गया।
बतौर अभिभावक कुछ दृश्य आपको विचलित कर सकते हैं, लेकिन यह बेचैनी उस पीड़ा से कम ही होगी, जो अपनी बेटियों को खो देने या उनके साथ हुई अमानवीय घटनाओं को देखकर किसी माता-पिता को होती है।
फिल्म के कई हृदयविदारक दृश्यों के बाद अंतिम दृश्य दर्शकों को संतोष का अनुभव करा सकते हैं। बैकग्राउंड में ‘हर-हर शंभू’ गीत सुनाई देता है, मनोज मुंतशिर की आवाज में चेतावनी के बोल गूँजते हैं, बुलडोजर का दृश्य दिखता है और पुलिस की कार्रवाई नजर आती है।
फिल्म का संगीत और बैकग्राउंड म्यूजिक पीड़िताओं के दर्द और फिल्म के हर सीन के प्रभाव और इमोशन को सशक्त बनाता हैं। संपादन की बात करें तो कुछ स्थानों पर एक दृश्य से दूसरे दृश्य में अचानक परिवर्तन दिखाई देता है, लेकिन यही बदलाव दर्शकों को फिल्म से जोड़े रखते हैं।
तीन अलग-अलग कहानियों को जोड़ने के लिए क्रॉस-कटिंग तकनीक का उपयोग किया गया है, जिससे पूरी फिल्म एक सहज प्रवाह में आगे बढ़ती है।
इसी प्रकार फिल्म में डॉयलॉग भी विशेष हैं, जो कई मुद्दों पर गहराई से सोचने पर मजबूर करते हैं। उन डॉयलॉग्स को आप अतिनाटकीय नहीं कह सकते, क्योंकि यही संवाद आजकल हो रही घटनाओं को परिभाषित करते हैं। जैसे-
‘ये काफिर हिंदू सेकुलर कहलाने को मरे जात हैं’
‘देश में हमारे लोग हर जगह मोहब्बत फैला रहे हैं’
हमारे में नास्तिक नहीं होते, तुम काफिर नास्तिक होते हो’
’16 साल के लाड-प्यार पे 6 महीने का प्यार’
‘कयामत के दिन शुक्रिया कहोगी’
‘भरोसा नहीं है के म्हारे पे बेबी।’
इस फिल्म का विरोध वह लोग कर रहे हैं जिन्हें लगता है कि समाज में लव जिहाद जैसा कुछ नहीं है। लेकिन, अगर आप उन खबरों में पीड़िताओं के दर्द को पढ़-सुनकर कभी कोई विचार मन में लाते हैं तो फिल्म जरूर देखी जानी चाहिए।
इसे देखिए ताकि आपकी वो समझ विकसित हो कि आप सोच सके कि आपको अपनी बच्चियों की परवरिश किस दिशा में करनी है। आप जान सकें कि विधर्मी तत्वों से लड़कियों को कैसे बचाना है। आप फैसला कर पाएँ कि आपको सेकुलर होने के भ्रम में जीना है या ये स्वीकारना कि आप हिंदू हैं।
गौरतलब है कि इस फिल्म के विरोध में केरल हाई कोर्ट में याचिका दायर की गई थी, जिसके बाद फिल्म की रिलीजिंग पर रोक लग गई थी। हालाँकि शुक्रवार (27 फरवरी 2026) को केरल हाई कोर्ट ने ये रोक हटा ली और अब ये फिल्म अपने तय समय पर पूरे देश में रिलीज हो रही है।
साभार- https://hindi.opindia.com/ से

