मुंबई। मुंबई शहर में ऐसे तो हर दिन राष्ट्रीय व अतंरराष्ट्रीय स्तर के कई आयोजन होते हैं, लेकिन कुछ ही आयोजन ऐसे होते हैं जो इतिहास बना देते हैं। जाने माने कवि और रामकथा के मर्मज्ञ डॉ. कुमार विश्वास द्वारा मुंबई के प्रतिष्ठित गोरेगाँव स्पोर्ट्स क्लब में अपने अपने राम के माध्यम से जब रामकथा के विविध प्रसंगों का वर्णन किया गया तो उपस्थित हजारों श्रोताओं की भावदशा और रोमांच देखने लायक था। उनके एक एक वाक्य श्रोताओं ने करतल ध्वनि से अपना अहोभाव व्यक्त किया।
गोरेगाँव स्पोर्ट्स क्लब के विशाल परिसर में बने भव्य पांडाल में हजारों श्रोताओं में रामकथा की इस रसगंगा में डुबकी लगाई। इस आयोजन को सफल बनाने में क्लब के अध्यक्ष श्री विनय जैन व सचिव श्री संजय मालू के निर्देशन में श्री चन्द्रकांत अग्रवाल-बाबू भैया, श्री रमाकांत परसरामपुरिया, श्री सुनील काबरा, श्री प्रदीप जैन व श्री ललित जैन सहित क्लब की विभिन्न कमेटियों के सदस्यों ने अथक प्रयास किए।
डॉ. कुमार विश्वास के अपने अपने राम के आयोजन का यह पहला दिन था। कार्यक्रम प्रारंभ होने के एक घंटे पहले ही पूरा पंडाल रसिक श्रोताओं से भर चुका था। यह कार्यक्रम 10 व 11 जनवरी को भी होगा।
उन्होंने अपने व्याख्यान का प्रारंभ रामचरित मानस के बाल कांड के मंगलाचरण से किया।
वर्णानामर्थसंघानां रसानां छन्दसामपि।
मंगलानां च कर्त्तारौ वन्दे वाणीविनायकौ॥1॥
भवानीशंकरौ वन्दे श्रद्धाविश्वासरूपिणौ।
याभ्यां विना न पश्यन्ति सिद्धाः स्वान्तःस्थमीश्वरम्॥2॥
वन्दे बोधमयं नित्यं गुरुं शंकररूपिणम्।
यमाश्रितो हि वक्रोऽपि चन्द्रः सर्वत्र वन्द्यते॥3॥
सीतारामगुणग्रामपुण्यारण्यविहारिणौ।
वन्दे विशुद्धविज्ञानौ कवीश्वरकपीश्वरौ॥4॥
उद्भवस्थितिसंहारकारिणीं क्लेशहारिणीम्।
सर्वश्रेयस्करीं सीतां नतोऽहं रामवल्लभाम्॥5॥
यन्मायावशवर्ति विश्वमखिलं ब्रह्मादिदेवासुरा
यत्सत्त्वादमृषैव भाति सकलं रज्जौ यथाहेर्भ्रमः।
यत्पादप्लवमेकमेव हि भवाम्भोधेस्तितीर्षावतां
वन्देऽहं तमशेषकारणपरं रामाख्यमीशं हरिम्॥6॥
नानापुराणनिगमागमसम्मतं यद्
रामायणे निगदितं क्वचिदन्यतोऽपि।
स्वान्तःसुखाय तुलसी रघुनाथगाथा
भाषानिबन्धमतिमंजुलमातनोति॥7॥
अपने व्याख्यान का प्रारंभ करते हुए उन्होंने कहा कि राम मनुष्य के स्वाभिमान के प्रतीक हैं और इस प्रतीक को सार्थक किया महाराष्ट्र की धरती पर जन्मे वीर शिवाजी ने। उन्होंने शिवाजी के जीवन के कई प्रेरक प्रसंगों का उल्लेख किया और महाकवि भूषण द्वारा शिवाजी के चरित्र पर लिखी गई अमर कविता की व्याख्या कर उसका स्वसर पाठ किया। श्रोताओं के लिए इस कविता को लय में सुनना एक अद्भुत अनुभव था।
इन्द्र जिमि जंभ पर, बाडब सुअंभ पर,
रावन सदंभ पर, रघुकुल राज हैं।
पौन बारिबाह पर, संभु रतिनाह पर,
ज्यौं सहस्रबाह पर राम-द्विजराज हैं॥
दावा द्रुम दंड पर, चीता मृगझुंड पर,
‘भूषन वितुंड पर, जैसे मृगराज हैं।
तेज तम अंस पर, कान्ह जिमि कंस पर,
त्यौं मलिच्छ बंस पर, सेर शिवराज हैं॥
ऊंचे घोर मंदर के अंदर रहन वारी,
ऊंचे घोर मंदर के अंदर रहाती हैं।
कंद मूल भोग करैं, कंद मूल भोग करैं,
तीन बेर खातीं, ते वे तीन बेर खाती हैं॥
भूषन शिथिल अंग, भूषन शिथिल अंग,
बिजन डुलातीं ते वे बिजन डुलाती हैं।
‘भूषन भनत सिवराज बीर तेरे त्रास,
नगन जडातीं ते वे नगन जडाती हैं॥
छूटत कमान और तीर गोली बानन के,
मुसकिल होति मुरचान की ओट मैं।
ताही समय सिवराज हुकुम कै हल्ला कियो,
दावा बांधि परा हल्ला बीर भट जोट मैं॥
‘भूषन’ भनत तेरी हिम्मति कहां लौं कहौं
किम्मति इहां लगि है जाकी भट झोट मैं।
ताव दै दै मूंछन, कंगूरन पै पांव दै दै,
अरि मुख घाव दै-दै, कूदि परैं कोट मैं॥
बेद राखे बिदित, पुरान राखे सारयुत,
रामनाम राख्यो अति रसना सुघर मैं।
हिंदुन की चोटी, रोटी राखी हैं सिपाहिन की,
कांधे मैं जनेऊ राख्यो, माला राखी गर मैं॥
मीडि राखे मुगल, मरोडि राखे पातसाह,
बैरी पीसि राखे, बरदान राख्यो कर मैं।
राजन की हद्द राखी, तेग-बल सिवराज,
देव राखे देवल, स्वधर्म राख्यो घर मैं॥
उन्होंने कहा कि रामचरित मानस एक विश्व ग्रंथ है जो हमारी सांस्कृतिक, अध्यात्मिक व धार्मिक धरोहर है। आज दुनिया को ये तय करना होगा कि वो किस संस्कृति को अपनाना चाहती है। एक हमारी संस्कृति है जो लोगों को जोड़ने का काम करती है और पाश्चात्य संस्कृति है जो लोगों पर कब्जा करके लूटने का काम करती है।
उन्होंने विवेकानंद के जीवन के एक मार्मिक प्रसंग का उल्लेख करते हुए कहा कि जब विवेकानंद शिकागो की धर्म सभा से अपनान व्याख्यान देकर नीचे उतरे तो एक विदेशी महिला ने उनके सामने विवाह का प्रस्ताव रखते हुए कहा कि मेरा सौंदर्य और आपके अध्यात्मिक ज्ञान से हमें जो संतान मिलेगी वो विलक्षण होगी। इस पर विवेकानंद ने जो उत्तर दिया, वो हमारी संस्क़ति का प्रतिनिधित्व करता है, उन्होंने कहा कि मैं आज से ही अआपको अपनी माँ मान लेता हूँ और मुझे अपना बेटा समझें।
राम के चरित्र का उल्लेख करते हुए डॉ. कुमार विश्वास ने कहा कि शक्ति तभी सुरक्षित रहेगी जब तक सके साथ मर्यादा रहेगी। हमारा इतिहास गवाह है कि श्री राम से लेकर वीर शिवाजी तक जितने भी योद्धा हुए हैं उन्होंने शक्ति के साथ संस्कृति और मर्यादा का भी पालन किया।
उन्होंने कहा कि फिल्मी दुनिया ने हमारी संस्कृति को हर तरह से विकृत करने का कुत्सित प्रयास किया इसीका नतीजा है कि हमारी नई पीढ़ी अपनी संस्कृति से विमुख होती रही, लेकिन अब यह दौर बदल रहा है। हम देखते हैं कि 31 दिसंबर और 1 जनवरी जो कैलेंडर की एक तारीख मात्र है, इस मौके पर भी युवा पीढ़ी सहित लाखों लोग मंदिरों में दर्शन करने पहुँचते हैं। उन्होंने कहा कि हमारी संस्कृति की यही विशेषता है कि वह हर जगह अपनी राह बना लेती है।
वह एक दौर था जब हमें ऐसी फिल्में और गीत देखने सुनने को मिलते थे।
उन्होंने 1954 में बनी जागृति’ फिल्म का उल्लेख करते हुए कहा कि इसके निर्देशक और मुख्य कलाकार सत्येन बोस व अभि भट्टाचार्य बंगाल के थे मुख्य नायिका मुमताज़ बेग़म थी।
संगीतकार हेमंत कुमार थे. गीतकार थे कवि प्रदीप और इसके गीत के बोल थे।
ये है अपना राजपूताना नाज इसे तलवारों पे
इसने सारा जीवन काटा बरछी तीर कटारों पे
ये प्रताप का वतन पला है आज़ादी के नारों पे
देखो, मुल्क मराठों का ये यहाँ शिवाजी डोला था
मुगलों की ताक़त को जिसने तलवारों पे तोला था
हर पर्वत पे आग जली थी हर पत्थर एक शोला था
बोली हर-हर महादेव की बच्चा-बच्चा बोला था
शेर शिवाजी ने रखी थी लाज हमारी शान की
इस मिट्टी से तिलक करो ये धरती है बलिदान की
अब एक बार फिर वह दौर बदल रहा है, अब छावा और धुरंधर जैसी फिल्मों ने एक नया विमर्श पैदा किया है।
उन्होंने औरंगजेब का उल्लेख करते हुए कहा कि वो जिस संस्कृति का प्रतीक था उसमें उसने अपने पिता शाहजहाँ को कैद कर उसके खाने और पानी पीने तक पर पाबंदी लगा दी थी। इस पर शाहजहाँ ने औरंगजेब को लिखकर भेजा कि एक तरफ हिंदू हैं जो अपने पुरखों को भी श्राध्द पक्ष में पानी पिलाते हैं और दूसरी तरफ तू मेरा बेटा होकर भी मुझे खाना और पानी तक नहीं देता है।
ऐ पिसर तू अजब मुसलमानी,
ब पिदरे जिंदा आब तरसानी
आफरीन बाद हिंदवान सद बार,
मैं देहंद पिदरे मुर्दारावा दायम आब।
कुमार विश्वास ने कहा कि तुलसी दास जी ने लिखा है-
राम कथा सुंदर कर तारी।
संसय बिहग उडा़वनिहारी।।
राम की कथा हाथ की सुंदर ताली है, जो संदेहरूपी पक्षियों को उड़ा देती है।
कुमार विश्वास ने कहा कि राम मनुष्यों के ही नहीं देवताओं के भी पूज्य हैं। एक प्रसंग का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि देवताओं के राजा इन्द्र के पुत्र जयंत न् जब इन्द्र से पूछा कि सबसे पूज्यनीय कौन हैं तो इन्देर ने जवाब दिया कि राम सबसे पूज्यनीय हैं, तो जयंत ने पूछा कि राम कहाँ मिलेंगे तो इन्द्र ने जवाब दिया वे पृथ्वी पर मिलेंगे। इस पर जयंट कौए का रूप बनाकर वनवासी राम को देखने गया, राम उस समय सीता जी क पैरों में महराब लगा रहे थे. तो कौआ बने जयंत ने सीता माता के पैरों पर चोंच मारकर खून निकाल दिया, इस पर राम को क्रोध आया तो उन्होंने उसके पीछे लक्ष्यबेधी बाण चला दिया अब कौआ बना जयंत अपनी जान बचाने को अपने पिता इन्द्र, भगवान शंकर, ब्रह्मा जी से लेकर विष्णुजी के पास गया उसकी कोई सुनवाई नहीं हुई तो नारद जी ने उसे समझाया कि तुझे राम ही बचा सकते हैं।
जब रामजी नीची गर्दन किए थे तो जयंत ने उनसे चिंरजीव होने का आशीर्वाद ले लिया। फिर जयंत ने कहा कि आपने तो मुझ पर तीर छोड़ रखा है, इससे कैसे बचूँ। इस पर रामजी ने कहा कि तीर तो अपना काम करेगा ही। तुझे इससे बचना हो तो अपने शरीर का कोई एक अंग इसके आगे समर्पित करना होगा। तब कौए ने अपनी एक आँख को तीर से घायल कर लिया और तबसे कोए की एक ही आँख रह गई। आज विज्ञान भी ये मानता है कौए की एक ही आँख होती है और वह उसी आँख से गर्दन घुमाकर एक से दूसरी ओर देखता है।
रामकथा की व्याख्या करते हुए कुमार विश्वास ने कहा कि ये मात्र रामजी की जीवनी नहीं हमारे जीवन की संजीवनी है। जो इसे पिएगा वो जीवन के हर कष्ट का सामना कर लेगा।
उन्होंने कहा कि हमारे देश को वामपंथ पर ले जाने की साजिशें हो रही है, लेकिन अब देश रामपंथ पर चल पड़ा है।
हमारी संस्कृति शास्त्रार्थ और उत्तरों से निकली संस्कृति है।
गीता विषाद मुक्त करने का ग्रंथ है। कृष्ण ने अर्जुन का विषाद से मुक्त कर पूरी मनुष्यता को विषाद मुक्त होने की राह दिखाई है।
उन्होंने दुःख व्यक्त करते हुए कहा कि फिल्मी दुनिया के लोगों से कोई पूछता है कि कौनसी पुस्तक पढ़ी तो वो किसी विदेश पुस्तक का नाम बताकर गौरव महसूस करते हैं। लेकिन गीता रामाचरित मानस जैसे ग्रंथों का फिल्मों में मजाक उड़ाते हैं।
कुमार विश्वास ने कहा कि फिल्मी धुनों पर भगवान के भजन बजाना बंद कीजिये। जब आप किसी फिल्मी धुन पर भजन सुनते हैं तो आप भक्ति में नहीं डूबते बल्कि फिल्मी दृश्य से जुड़ जाते हैं।
उन्होंने कहा कि मैंने माँ वैष्णो देवी के दर्शन के लिए कई बार प्रयास किए मगर माँ का बुलावा ही नहीं आय। एक दिन ऐसा अवसर आया कि मुझे माँ के चरणों मैं बैठकर कविता सुनाने को कहा गया और मात्र 45 मिनट दिए गए, लेकिन मैने लगातार डेढ़ घंटे तक अपनी कविता माँ के चरणों में प्रस्तुत की।
मैं क्या गाऊं तेरा यश मैया यश,
यश रस शंकर गजानन ने शारदा ने गाया है।
सब सुख संपदा या विपदा हरण मात जानता हूं
सब तेरे इंगितों की छाया है।
आधी सदी इंतजार में बिताई मैंने मैया।
क्यों नहीं बुलाया तू ही जाने तेरी माया है
देर तक देर तक देर तक तेरे दर पे नवाऊंगा मैं सर
क्योंकि मैया तूने मुझे देर से बुलाया है
कुमार विश्वास ने अपने प्रवचन में कई प्रमुख अध्यात्मिक व धार्मिक उध्दरणों के साथ युवी पीढ़ी से आव्हान किया कि वो पैसा खूब कमाएँ मगर अपनी सांस्कृतिक जड़ों को कतई ना भूलें।
उन्होंने पंजाब के एक व्यापारी लाला का उदाहरण देते हुए कहा कि उन्होंने व्यापार कारोबार सब छोड़कर अपना पूरा जीवन धार्मिक कार्यों में लगा दिया और इसकी प्रेरणा उन्हें घर की सफाई करने वाली महिला से मिली।
उन्होंने कहा कि संसद से लेकर न्यायलय और सड़क पर जो लोग राम को काल्पनिक कहते थे वे आज खुद काल्पनिक होने के कगार पर हैं।
उन्होंने कहा कि बच्चों को हैरी पॉटर की नहीं अपने धर्म और अध्यात्म की कहानियाँ सुनाईये। हम उस पीढ़ी के प्रतिनिधि हैं जिनको बचपन में ध्रुव, प्रहलाद और छढि मुनियों की कहानियाँ सुनाई जाती थी।
कुमार विश्वास ने दुःख व्यक्त करते हुए कहा कि आज विवाह के आयोजन पर करोडों रुपये खर्च किए जाते हैं लेकिन जिस ब्राह्मण ने हजारों साल से वैदिक परंपरा को जीवित रखा उसे दक्षिणा के नाम पर नाममात्र की राशि दी जाती है और उसे कहा जाता है कि पंडितजी जल्दी कीजिए। इस जल्दी का नतीजा बहुत खतरनाक होता है। एक घटना का उल्लेख करते हुए उन्होंने बताया कि विवाह में करोडों रुपये खर्च करने के बाद भी एक पति -पत्नी का संबंध विच्छेद हो गया । मैं उनके विवाह में गया था। उनके पिता ने मुझसे पूछा कि ये कैसे हो गया तो मैने कहा कि आप विवाह की रस्म कराने वाले पंडितजी को जल्दी कीजिये ..जल्दी कीजिये कह रहे थे इसलिए ये भी जल्दी हो गया …
उन्होंने कहा कि मेरी बेटी के विवाह का मुहुर्त 5.16 बजे शाम का था मैने वर पक्ष से साफ कह दिया था कि अगर इस समय तक दुल्हा लग्न मंडप में नहीं पहुँचा तो मैं बलपूर्वक उसे मंगवा लूंगा।
उन्होंने कहा कि हमारी संस्कृति है पत्थर में भगवान को देख लेना और इसीलिए हम जब मूर्ति विराजित करते हैं तो उसमें प्राण प्रतिष्ठा करते हैं और वह मूर्ति विग्रह हो जाती है। दूसरी ओर ऐसी संस्कृति है जो इंसान को पत्थर समझती है।
अपने खास अंदाज में श्री राम की महिमा का बखान करते हुए कहा, “राम केवल एक राजा नहीं, बल्कि हर व्यक्ति की आस्था और विश्वास के केंद्र हैं।”
कुमार विश्वास ने कहा कि अगर कोई चीज इस समय प्रासंगिक है तो हमारे धर्म जगत की महत्वपूर्ण कहानियां हैं।
उन्होंने कहा, जीवन में अपने सभी कर्म ईमानदारी से पूरे करते हुए शरीर छूटता है तो समझिए मोक्ष मिल गया। शरीर छूटते समय कुछ चिंता रही व कुछ काम न करने का मलाल रहा तो नर्क मिलता है। इसलिए चाहे जैसी स्थित हो कर्म करते रहना चाहिए।
उन्होंने कहा कि आज परिवारों में संवाद खत्म हो रहे हैं। सात जन्मों तक साथ निभाने का वाद कर सात फेरे लेने वाली पत्नी कोर्ट में इसलिए तलाक मांगने लगती हैं कि पति खर्राटे भरता है। छोटे भाई पर मुकदमा कर कथा सुनना किस काम का, ऐसे लोग तर्क देते हैं कि वह लक्ष्मण की तरह नहीं है। कभी खुद के मन में झांका है कि तुम भी तो राम की तरह नहीं हो। राम धर्म हैं तो सीता शांति है। बिना शांति के धर्म नहीं बचेगा।
भगवान श्री राम को ‘धर्मराज’ कहा जाता है। वे आदर्श पुरुष हैं, जिन्होंने अपने जीवन में उच्चतम नैतिकता और सिद्धांतों का पालन किया। श्री राम का जीवन एक सामान्य मानव के रूप में दिखाया गया है। उनका जन्म इस भूमि पर एक उद्देश्य के साथ हुआ था—धर्म की स्थापना करना और अधर्म का नाश करना।
उनके चरित्र में ये गुण हमें यह सिखाते हैं कि एक सच्चा इंसान कैसे बनें और जीवन की चुनौतियों का सामना कैसे करें।
भगवान श्री कृष्ण न केवल एक महान योद्धा थे, बल्कि एक कुशल रणनीतिकार और प्रेम का अवतार भी थे।
कृष्ण का मार्गदर्शन हमें सिखाता है कि जीवन में हर परिस्थिति में हमें कैसे अपनी बुद्धि और चातुर्य का प्रयोग करना चाहिए।
उन्होंने कहा यौवनं धनसम्पत्ति प्रभुत्वमविवेकित।
एकैकमप्यनर्थाय किमु यत्र चतुष्टयम्॥
यौवन (जवानी), धन-संपत्ति और सत्ता/प्रभुत्व—यदि इनके साथ विवेक न हो—तो इनमें से एक-एक भी मनुष्य के लिए अनर्थ (विनाश) का कारण बन सकता है।
फिर जहाँ ये तीनों (या चारों गुण एक साथ) हों, वहाँ तो अनर्थ होना निश्चित ही है। इसलिए हमारी संस्कृति में शक्ति के साथ धर्म और विवेक को भी महत्तवपूर्ण माना गया है।
भूख लगने पर खाना प्रकृति है, जरूरत से ज्यादा खा लेना विकृति है और भूख लगने पर भी सामने आये हुए भूखे अतिथि को अपना खाना खिला देना संस्कृति है।
उन्होंने नई पीढ़ी द्वारा अपने माता-पिता और संस्कृति के प्रति उपेक्षा को इस शेर के साथ समझाया।
इस दौर-ए-तरक़्क़ी के अंदाज़ निराले हैं
ज़ेहनों में अँधेरे हैं सड़कों पे उजाले हैं।
आज के दौर के रिश्तों को परिभाषित करते हुए उन्होंने कहा-
“एक वक्त था सोचता था, मेहमान कोई आए तो खाना खाऊँ मैं।
लानत है इस दौर पर सोचता हूँ मैं, ये शख़्स चला जाए तो खाना खाऊँ मैं”
उन्होंने अपने प्रवचन का समापन कबीर के इस प्रसिध्द दोहों से किया-
घणा दिन सो लियो रे
घणा दिन सो लियो रे ,
अब जाग सके तो जाग।
पहलो सोयो मात गरभ में,
उल्टा पाव फ़सार। २
बोल वचन कर बहार आयो।
भूल गयो जगदीश।
जन्म थारो हो लियो रे।
अब जाग सके तो जाग।
घणा दिन सो लियो रे ,
अब जाग सके तो जाग।
दूजो सोयो माँत गोद में ,
हस हस दांत दिखाय। २
बहन भुआ सब लाड लड़ावे।
हो रयो मंगला चार।
लाड थारो होरयो रे।
अब जाग सके तो जाग।
घणा दिन सो लियो रे ,
अब जाग सके तो जाग।
तीजो सोयो स्त्रिया संग में ,
गले में बाहे डाल। २
किया भोग सब रोग से दुखिया।
तन हो गयो बेकार ,
विवाह थारो होरियो रे।
अब जाग सके तो जाग।
घणा दिन सो लियो रे ,
अब जाग सके तो जाग।
चोथो सोयो शमशाना में ,
लम्बे पाँव फसार।२
कहे कबीर सुणो रे भई संतों।
जीव अग्नि में जाय,
प्रण थारो हो रियो रे।
अब जाग सके तो जाग।
घणा दिन सो लियो रे ,
अब जाग सके तो जाग।
फिल्म जागृति का प्रसिध्द गीत जिसका उल्लेख कुमार विश्वास ने अपने व्याख्यान में किया
आओ बच्चो, तुम्हें दिखाएँ झाँकी हिंदुस्तान की
इस मिट्टी से तिलक करो ये धरती है बलिदान की
वंदे मातरम्! वंदे मातरम्!
उत्तर में रखवाली करता पर्वतराज विराट है
दक्षिण में चरणों को धोता सागर का सम्राट है
जमुना जी के तट को देखो गंगा का ये घाट है
बाट-बाट में हाट-हाट में यहाँ निराला ठाठ है देखो,
ये तस्वीरें अपने गौरव की अभिमान की
इस मिट्टी से तिलक करो ये धरती है बलिदान की
वंदे मातरम्! वंदे मातरम्!
ये है अपना राजपूताना नाज इसे तलवारों पे
इसने सारा जीवन काटा बरछी तीर कटारों पे
ये प्रताप का वतन पला है आज़ादी के नारों पे
कूद पड़ी थी यहाँ हज़ारों पद्मिनियाँ अँगारों पे
बोल रही है कण-कण से क़ुर्बानी राजस्थान की
इस मिट्टी से तिलक करो ये धरती है बलिदान की
वंदे मातरम्! वंदे मातरम्!
देखो, मुल्क मराठों का ये यहाँ शिवाजी डोला था
मुगलों की ताक़त को जिसने तलवारों पे तोला था
हर पर्वत पे आग जली थी हर पत्थर एक शोला था
बोली हर-हर महादेव की बच्चा-बच्चा बोला था
शेर शिवाजी ने रखी थी लाज हमारी शान की
इस मिट्टी से तिलक करो ये धरती है बलिदान की
वंदे मातरम्! वंदे मातरम्!
जलियाँवाला बाग़ ये देखो, यहीं चली थी गोलियाँ
ये मत पूछो किसने खेली यहाँ ख़ून की होलियाँ
एक तरफ़ बंदूक़ें दन-दन एक तरफ़ थी टोलियाँ
मरनेवाले बोल रहे थे इंक़लाब की बोलियाँ
यहाँ लगा दी बहनों ने भी बाज़ी अपनी जान की
इस मिट्टी से तिलक करो ये धरती है बलिदान की
वंदे मातरम्! वंदे मातरम्!
ये देखो बंगाल यहाँ का हर चप्पा हरियाला है
यहाँ का बच्चा-बच्चा अपने देश पे मरनेवाला है
ढाला है इसको बिजली ने भूचालों ने पाला है
मुट्ठी में तूफ़ान बँधा है और प्राण में ज्वाला है
जन्मभूमि है यही हमारे वीर सुभाष महान की
इस मिट्टी से तिलक करो ये धरती है बलिदान की

