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राष्ट्र के लिए जातीय गोलबंदियों से ऊपर उठने का समय !

अद्यतन उत्तर प्रदेश की राजनीति में जाति विशेष के विधायकों के द्वारा ‘ सहभोज’ करना पार्टी के शीर्ष राष्ट्रीय नेतृत्व एवं प्रदेश के शीर्ष नेतृत्व  द्वारा ‘ गंभीरता’ से लेकर विधायकों को’ पार्टी के मौलिक सिद्धांतों’ को आत्मसात  करके चलने को कहना’ भारतीय राजनीति में जातिवाद ‘ पर अंकुश का संकेत है। पार्टी के शीर्ष नेतृत्व का यह कहना कि……. सिद्धांतों एवं  राष्ट्रवाद पर आधारित राजनीतिक दल हैं। राजनीति का आधार सेवा, कर्तव्य एवं लोक कल्याण होता हैं उस राष्ट्र का  चतुर्दिक/ सर्वांगीण विकास होता है। भारतीय राजनीति में ऐसे राजनीतिक नेतृत्व की आवश्यकता है जो परिवार, वर्ग एवं जाति  के बजाय  राष्ट्र, एवं  जातिविहीन तत्वों को स्तुति करके’ राष्ट्र के  सर्वोपरि विकास’ एवं ‘ राष्ट्र- प्रथम’ के मौलिक अवधारणा का उन्नयन करें। भारत के राष्ट्रीय आंदोलन के दौरान जिन राजनीतिक दलों, सुधारवादी आंदोलन एवं सुधारवादी  व्यक्तियों का योगदान था उनके कार्यक्रमों, विचारधाराओं एवं प्रसार कार्यक्रमों का मूलाधार ‘ राष्ट्रवाद’ एवं ‘ राष्ट्र प्रथम’ की नीति थी। इसका सकारात्मक परिणाम यह हुआ कि जिस  ग्रेट- ब्रिटेन (अब इंग्लैंड) को अजेय ‘ ‘ सूर्यास्त ना होना’ एवं ‘ शक्तिशाली सैन्य संरचना’ के द्वारा जाना जाता था, उस बनियों के देश को’ सत्याग्रह’ ‘ इंकलाब ‘ एवं ‘ वंदे मातरम् ‘ जैसे पवित्र एवं आध्यात्मिक अस्त्रों  के सामने घुटने देखना पड़ा।’ साध्य’ की पवित्रता एवं नैतिकता’ साधन’ की पवित्रता पर  उत्तरदाई होती है।
सामयिक राजनीतिक परिदृश्य में  ‘ जातिवाद ‘ भारतीय राजनीतिक दलों के लिए एक ऐसी “टोपी” हैं ,जिसको हर राजनीतिक दल पहनकर राजनीतिक समीकरण को अपने विचार  एवं राजनीतिक दलों में  बढ़ाना चाहता है। प्रारंभिक वर्षों में राजनीति सेवा का साधन था, लेकिन प्रतिस्पर्धा, सत्ता की मलाईदार पद एवं नौकरशाही को अपने आगे पीछे घूमने के लिए ‘ बहुमत ‘ के साध्य  को प्राप्त करने के लिए राजनीतिक दलों के लिए जाति कामधेनु होने लगीं जिसका राजनीतिक जिन्न अपने जाति बिरादरी के पास संकेंद्रित होने लगी थीं। सन् 1990 से सन् 1997 तक एवं सन् 2004 से सन् 2014 तक की राजनीति में जाति महत्वपूर्ण कारक बना, जिससे राजनीति राजनीतिक दलों की जन्मजात कमाई का केंद्र हो गई थी।’ विवेक’ की आम अवधारणा है कि इसको जिस क्षेत्र में संकेंद्रित करेंगे, वह उसे उस क्षेत्र का विशेषज्ञ बना देती है । जाति व्यवस्था नागरिक समाज एवं नागरिक सरकार की अटूट अंग रही है एवं इसने जीवन के सभी पक्षों को प्रभावित किया है। स्वतंत्रता के पश्चात सत्ता प्रतिष्ठानों में जाति व्यवस्था का प्रतिशत बढ़ता गया एवं राजनीतिक जीवन एवं सार्वजनिक जीवन से सत्यता, नैतिकता, चरित्र,  आदर्श व्यवहार एवं ईमानदारी व्यक्ति के विभिन्न चेहरों (मुखौटा) का अभ्युदय, राजनीतिक चरित्र ,मूल्य एवं आदर्श का पतन ,विश्वास का गलघोंटू राजनीति एवं राजनीतिक मूल्यों का बंजर भूमि के चरवाहा की तरह प्रयोग किया जाता रहा है।
विगत 78 वर्षों में राजनीतिक संस्थाओं की कार्यप्रणाली और सामान्य राजनीतिक जीवन के अनुभव से यह संकेत मिलता है कि भारत की सामाजिक और राजनीतिक व्यवस्था पर जातिवाद का “अति संवेदनशील” प्रभाव हैं।भारतीय समाज से जाति का उन्मूलन नहीं हो सकता, जाति का स्वरूप अवश्य परिवर्तित होता रहेगा। राजनीतिक संस्कृति, राजनीतिक समाजीकरण एवं आधुनिकरण के मूल्यों के अनुरूप होने के कारण जाति के बदलते स्वरूप को’ परंपराओं की आधुनिकता ‘ कहा जाने लगा है। भारत की राजनीति का दुर्भाग्य है कि “संसद”( देश की सर्वोच्च पंचायत, राष्ट्र की आत्मा, जनप्रतिनिधियों का सदन एवं  लोकतंत्र के मंदिर) में जाति के लिए ‘ वाक्युद्ध ‘ का अखाड़ा बनता जा रहा है न कि विकास के विमर्श के लिए।
विचारकों एवं चिंतकों का आंकड़ों के अध्ययन से मानना था कि लोकतांत्रिक संस्थाओं के मजबूती के पश्चात’ जाति व्यवस्था के जाल ‘ का उन्मूलन हो जाएगा, एक अवैज्ञानिक, भ्रामक एवं त्रुटिपूर्ण अध्ययन था। भारतीय राजनीतिक व्यवस्था के मजबूती के पश्चात ‘ जाति की राजनीति’ का राजनीतिक तापमान बढ़ता ही जा रहा  हैं ।राजनीति में ‘ राजनीतिक सेंसेक्स’ का बढ़ना जातिवादी राजनीति का नकारात्मक प्रभाव है। भारत में जाति राजनीतिक संस्कृति का केंद्र होता जा रहा हैं ,खास तौर पर उन नेताओं की जिनकी राजनीतिक पृष्ठभूमि  ‘ जातिवाद’ के कारण उदित हुआ था। उत्तर प्रदेश में’ सपा’ (समाजवादी पार्टी), ‘ बीएसपी’ (बहुजन समाजवादी पार्टी) बिहार में ‘ राजद ‘ (राष्ट्रीय जनता दल)’ डीएमके’ एवं ‘ एडीएमके’ का राजनीति में  उभार  का एकमात्र कारण ‘ जाति कार्ड ‘ एवं’ जातियों के  हितैषी ‘ की छवि। एक अध्ययन से प्राप्त आंकड़ों से उत्तर प्रदेश के ‘ बाराबंकी’ जनपद के जिन क्षेत्रों में’ वर्मा’ (कोइरी ,कुशवाहा एवं मौर्य ) की संख्या अधिक हैं,  वहां स्व. बेनी प्रसाद वर्मा के परिवार के हिमायती ज्यादें हैं। यही कारण है कि स्व. मुलायम सिंह यादव के कार्यकाल में बेनी प्रसाद वर्मा  राज्यकर्ता ( स्टेट एक्टर) की हैसियत से काम करते थे। वर्तमान में भी हर दल टिकटों के बंटवारे में ‘ जाति अभियांत्रिकी’ (Cast engineering) को प्रमुखता देते हैं। भारतीय राजनीति में ‘ जाति कार्ड’ सत्ता प्राप्ति में महत्वपूर्ण नहीं, लेकिन ‘ आवश्यक’ तत्व है।
भारत में 1990 के दौर  में उदारीकरण, निजीकरण एवं भूमंडलीकरण( LPG ) के दौर में राज्य के नियंत्रण को कम करना (आ हस्तक्षेप की नीति ‘ Laizzez fair ‘  आर्थिक क्षेत्र में व्यक्ति को “अकेले” छोड़ दो) सशक्त बनाने पर केंद्रित एवं जाति  केंद्रित राजनीतिक दलों के अभ्युदय को संबल मिला। नवोदित क्षेत्रीय दलों को जनमत, उत्तरदायित्व एवं जवाब देही का “कोई नियंत्रक केंद्र ” नहीं होने के कारण उनके भ्रष्टाचार, भाई भतीजावाद एवं  लूट खसोट के कार्यों में सक्रियता होती गई……। लखनऊ विश्वविद्यालय में राजनीति विज्ञान के पूर्व अध्यक्ष प्रोफेसर बी.के तिवारी जी ने इस पर  ‘ क्षेत्र अध्ययन’ (केस स्टडी) किए  तो पाएं कि क्षेत्रीय राजनीतिक दलों के सत्ता में उभार से राजनीति का अपराधीकरण ,जाति विशेष के लोगों में अराजकता का दृष्टिकोण एवं इस वर्ग को मलाईदार पदों पर पुरस्कृत करना हैं ,जिस जाति के कारण उनका राजनीतिक कैरियर सफल हुआ है।
‘जाति माफिया’ के रूप में जाने वाले राजनीतिक नेताओं ने ऊंची जातियों के व्यक्तियों को संस्थाओं के प्रति निचली जातियों के असंतोष का भरपूर फायदा उठाएं एवं खुलेआम राज्य के संस्थानों को लूटा ।एक अध्ययन के प्रतिवेदन से स्पष्ट हुआ है कि क्षेत्रीय राजनीतिक दलों का राजनीति में ‘ सौदेबाजी’ एवं’ भ्रष्टाचार’ को बढ़ाने में उत्प्रेरक की भूमिका रही है। आयोगों के अध्यक्ष एवं विश्वविद्यालयों के कुलपतियों ने  ‘ नियुक्तियों ‘  में पारदर्शिता के बजाय’ जी हजूरी’ की भूमिका में काम कर रहे होते हैं। एक क्षेत्रीय दल के कार्यकाल में प्रतिष्ठित उत्तर प्रदेश लोक सेवा आयोग के अध्यक्ष गले में सोने के चेन एवं नीचे के जेब में रिवाल्वर लगाकर बैठते थे। अध्यक्ष पद के पहले उनके ऊपर   ‘ 57FIR ‘ था। माननीय उच्च न्यायालय के न्यायिक निर्णय से तत्कालीन अध्यक्ष जी त्यागपत्र दिए। तत्कालीन राज्य के मुख्यमंत्री जी प्रेस कॉन्फ्रेंस में उनको ‘ योग्य अध्यक्ष’ कह रहे थे। इससे पहले भी क्षेत्रीय राजनीतिक दलों का सत्ता में वापसी ‘ सौदेबाजी’ ‘ अपने बिरादरी के लोगों को ऊंचे पदों पर पुरस्कृत करना’ एवं’ अपने परिवार की राजनीतिक हैसियत को  उच्चीकरण करना’ रहा है। राजनीतिक असमतल को सुशासन, विकास, समावेशी शासन एवं सत्ता में सभी के भागीदारी से दूर किया जा सकता है। जातिवादी व्यवस्था को ‘ सबका साथ, सबका विकास एवं सबके विश्वास’ के अमृत मंत्र से दूर किया जा सकता है। राज्य का विकास सबका समाजीकरण, राजनीतिक  संस्कृति का उच्चीकरण ,समावेशी शासकीय नीतियों के क्रियान्वयन, अपराध अराजकता एवं माफिया संस्कृति के प्रति’ शून्य सहिष्णुता’ की नीति का क्रियान्वयन करना होगा।
राजनीति एक प्रतियोगी विमर्श है। इसका लक्ष्य” निश्चित उद्देश्यों के पूर्ति के लिए राजनीतिक सत्ता की प्राप्ति है।” नागरिक समाज जिसमें सामाजिक ,आर्थिक एवं राजनीतिक समानता को संवैधानिक आवरण प्राप्त है एवं इस समाज में सरकार का निर्माण व परिवर्तन ‘ बहुमत की इच्छा’ के द्वारा होता है। संवैधानिक सरकार के निर्माण के लिए अन्य समूहों की सहायता अति आवश्यक है। सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार के द्वारा राज्य के प्रत्येक नागरिक को व्यवस्था में सहभागिता धर्म, मूल, वंश एवं जाति के भेदभाव को वर्जित किया है। राजनीतिक व्यवस्था में जाति की राजनीति इस तरह हावी है कि  सुशासन, विकास, उत्तम विधि और व्यवस्था  का नागरिक समाज में औचित्य शून्य होती जा रही हैं। बदलते राजनीतिक परिदृश्य में बिहार विधानसभा चुनाव 2025 में बिहार की जनता जाति के बजाय सुशासन,  पारदर्शी शासन एवं विकास को प्राथमिकता दी है। राज्यों के उपचुनावों के  आंकड़ों से स्पष्ट है कि जनता सुशासन एवं विकास को प्राथमिकता दे रही हैं।
संसद (भारत की सर्वोच्च पंचायत, लोकतंत्र की आत्मा एवं विचार – विमर्श का केंद्र) को “सामूहिक विचार- विमर्श” एवं  “विकासोन्मुखी सदन” के रूप में प्रासंगिकता को उन्नयन किया  जाएं। हर राजनीतिक दल को राष्ट्रीय विषयों, मुद्दों एवं समावेशी विकास पर ध्यान देना चाहिए जिससे भारत ‘ सर्वोच्च महाशक्ति’ ‘ विश्व गुरु’ एवं’ विकसित भारत @2047′ के लक्ष्य को प्राप्त कर सके।
मेरा  मानना है कि …
1. जाति की राजनीति विकास, सुशासन, विधि एवं व्यवस्था को क्षीण कर रही है;
2. जाति की राजनीति समावेशी राजनीति एवं विकास की राजनीति के लिए मंदक है;
3. जाति की राजनीति प्रतिभा, कार्य उत्पादकता एवं ऊर्जावान विधायकों एवं सांसदों को हतोत्साहित  कर रही है;एवं
4. जाति की राजनीति दलगत राजनीति को बढ़ावा दे रही है।
(अखिल भारतीय इतिहास संकलन योजना, केशवकुंज, नई दिल्ली के राष्ट्रीय संगठन सचिव हैं) 
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