Homeमुम्बई चौपालमुंबई की चौपाल में घुली उर्दू की मिठास

मुंबई की चौपाल में घुली उर्दू की मिठास

प्रतिरोधक क्षमता (इम्यूनिटी) सशक्त होती है तो बाहरी वायरस तन और मन को विकारग्रस्त कम करते हैं। तन के लिए तो पौष्टिक खा लिया जाता है किंतु मन और मस्तिष्क का क्या…? चौपाल ढ़ोल ढ़माके बजाए बिना मानसिक प्रतिरोधक क्षमता को पोषित करने के सरंजाम हर महीने जुटाती रहती है। जाति, धर्म, रंग और भाषा, में चार विवादों के मूल कारक है, उनके प्रति समाज में समरसता बनी रहे, तो विवाद होंगे ही नहीं।

इसके लिए चौपाल में विषय विशेष के विशेषज्ञों को बुलाकर हक़ीक़त सुनी जाती है ताकि भ्रम के जाले साफ़ होते रहें।

उर्दू विषय पर लगातार दो चौपालें करने का ऐतिहासिक फैसला लेने के पीछे भी मंशा यही थी कि एक विषय उठाया ही गया है तो उस पर पर्याप्त बात की जा सके। पिछली बार जावेद सिद्दीकी आए थे और इस बार ज़मील गुलरेज़ पहली बार पधारे ।

संचालन की बागडोर अतुल तिवारी के हाथ में थी जो स्वयं उर्दू के शैदायी ही नहीं जानकार भी हैं, विषय को खोलते हुए बोले कि –द्रविडियन ज़बानों को छोड़ कर अधिकांश भाषाएं बाहर से आईं हैं जबकि उर्दू के लिए यकीन के साथ कहा जा सकता हैं कि उसकी जन्मस्थली भारत है। अति प्राचीन खरोष्ठी लिपि को भी उर्दू की तरह ही दाएं से बाएं लिखा जाता था, जिसे आज तक डीकोड नहीं किया जा सका है।

जमील गुलरेज़ साहब का बहुआयामी व्यक्तित्व है। वे अनेक रचनात्मक क्षेत्रों से जुड़े हुए हैं, उनका मूल काम आंचलिक भाषाओं के साथ आम नागरिकों को जोड़ना है । हर महीने दूसरे मंगलवार को पृथ्वी थियेटर के बाहर नशिश्तेँ करतें हैं। बड़े-बड़े फनकारों से मिलवाते हैं। मंटो, ग़ालिब जैसे अनेक फनकारों की अनजान कहानियों और कलामों को दर्शकों तक ले जाने का मुश्किल काम किया है। विज्ञापन जगत से अदब तक का उनका सफर बड़ा काबिले तारीफ है। उन्होंने कहा कि- उर्दू जबान रूह को छूती है, बांसुरी की तरह नरम मुलायम सुरीली… उर्दू की शायरी में कायनात का राज है। जैसे अनेक सितारे मिलकर आसमान में कहकशां बनाते हैं इस तरह अरबी हिंदी फारसी एइत्यादि भाषाओं से मिलकर बनी उर्दू एक जादुई भाषा है जो अपनी रवायती शक्ल में जिंदा है। उर्दू सिर्फ ज़बान नहीं एक अहसास है।

उन्होंने बड़े ही रोचक अंदाज में कृशनचंदर की कहानी ‘चिड़ियों की आलिफ लैला’ सुनाई जिसमें चिड़िया अजगर को अपनी मौत को टालने के लिए एक कहानी सुनाती है। कहने का अंदाज ऐसा लुभावना कि अजगर चिड़िया को खाना भूल गया और भूल गए सभागार में बैठे सारे श्रोता भी कि ‘यह कहानी है हक़ीक़त नहीं’।

कहानी का जादू सभागार में तारी हो चुका था। जमील गुलरेज़ बोले उर्दू के लिए कि–

काबे में जाकर बजाएंगे नाख़ुश (शंख)
बनारस की गलियों में पहनेंगे कहराम। (हज़ के समय पहना जाने वाला वस्त्र)
दुल्हन की मेहंदी जैसी है उर्दू ज़बान
खुशबू बिखेरता है उर्दू का हर्फ़ हर्फ़

फिर अतुल तिवारी ने विविध रचनात्मक क्षेत्र में कार्यरत तीन लोकप्रिय शायराओं को मंच पर निमंत्रित किया।

लाल किला, गेटवे ऑफ़ इंडिया, गणतंत्र दिवस मुशायरा, संसद भवन, जश्न- ए- रेख़्ता और देश विदेश के अनेक नामी गिरामी कवि सम्मेलनों और मुशायरों के हजार से अधिक कार्यक्रमों में शिरकत कर चुकी प्रज्ञा शर्मा ने कई पुस्तकें लिखी हैं। उनका बोलने का अंदाज बेहद प्रभावी है। वे बोली कि –चौपाल को अदब की महफ़िल यूँ ही नहीं कहा जाता।

मैं खुद को बेसबब़ उलझा रही हूँ
तेरे बारे में सोचे जा रही हूँ
मेरे अंदर कोई सुनता नहीं है
मैं कितनी देर से चिल्ला रही हूँ

खुद को जानना मुमकिन नहीं बगैर इसके
इसलिए तो हमें खुद को जान लेना है

यह भी
यह जो पत्थर है
आदमी था कभी
इसको कहते हैं इंतजार मियाँ

अगली बारी अंतरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त शायरा दिप्ती मिश्र की थी। अनेक पुस्तकों की लेखिका दिप्ती ने धारावाहिकों और फिल्मों में अक्सर नजर आती रहती हैं। गुलाम अली, कविता कृष्णमूर्ति, श्रेया घोषाल, उदित नारायण, मधुश्री, हरिहरन कविता सेठ, सोमा घोष, विनोद राठौर आदि जाने माने गायक उनके लिखे को अपना स्वर दे चुके हैं। कुछ गज़लें उनकी बार-बार इसरार् करके सुनी जाती है। उस दिन भी पहले उन्हें वही सुनानी पड़ी।

दोस्त बन के दुश्मनों सा सताता है मुझे
फिर भी उस ज़ालिम पे मरना
अपनी फितरत है तो है

दूसरी ग़ज़ल के शेर थे–

जिस्म से रूह तक मुझ में गमकता क्या है
नूर किसका है मेरे रुख पर दमकत क्या है
बुलंदी पर जिसको भी देखा
सभी आसरा ढूंढते हैं
फकत् दूरियों में ही सारी कशिश है
कि नजदीकियों में भरम टूटते हैं

एक और कड़वा सच
कांच के ताबूत में सफेद चादर में लिपटी हुई सो रही थी अजीब सन्नाटा था
इस देह को जलाना ना दफन करना
उन सब प्रेमियों में बांट देना टुकड़े-टुकड़े करके
जिन्हें सिर्फ मेरी देह की चाहत थी

लता हया को अली सरदार जाफरी ने ‘मंच की शेरनी’ का खिताब दिया था। लेखिका कवियत्री अभिनेत्री रंगकर्मी तथा अभिनय अध्यापन में कार्यरत लता हया ने देश विदेश के अनेक मुशायरों में शिरकत की है। रंग कर्म में वर्षों से संलग्न है। मोहन राकेश का सुप्रसिद्ध नाटक ‘आधे- अधूरे’ का मंचन वे चौपाल में कर चुकी हैं। अपनी पुरजोर सधी आवाज में उर्दू प्रेम का इज़हार करते हुए कहा कि–

मैं हिंदी की कोख से जन्मी उर्दू की बेटी हूंँ
यह बात जानते हैं मेरे हमनवांँ सभी
मिज़ाने हक यह अपना सुख़न तौलती हूँ
अब क्या मिलेगी मुझको सज़ा आप सोचिए
मेरा कुसूर यह है कि मैं सच बोलती हूंँ

चाहे पिया का घर हो परदेस
पिहर तो इसका इसी देश में है

अतुल तिवारी बोले कि हिंदी और उर्दू के बीच सगी बहनों सा जो रिश्ता है वह दुनिया की किसी भी दो ज़बानों में नहीं मिलता। राजनीतिज्ञों का काम है इधर-उधर की बातें करना और हम कलाकारों का काम है उसे करेक्ट करते रहना।

पद्मश्री कुलदीप सिंह जी के सुपुत्र जसविंदर बाकमाल ग़ज़ल गायक है। हिंदी उर्दू के साथ पंजाबी पर भी उनकी पूरी कमान है। उनके ‘कैफी और मैं’ नाटक के शो निरंतर हो रहे हैं। देश-विदेश में हजार से ज्यादा कार्यक्रम कर चुके जसविंदर ने उस दिन मंच लूट लिया था। शुरुआत की हमज़द हैदराबादी की ग़ज़ल से–

यूँ तो क्या-क्या नजर नहीं आता
कोई तुमसा नजर नहीं आता
जो नजर आते हैं नहीं है अपने
जो है अपना नजर नहीं आता
झोलियाँ सबकी भरी जाती है
देने वाला ही नजर नहीं आता

फलों फूलों से लदा दरख़्त किस तरह- झुका हुआ होता है पद्मश्री कुलदीप सिंह जी को देख कर बखूबी समझा जा सकता है। जसविंदर सिंह ने अपनी गायकी का पूरा श्रेय ग़ज़लों के रचनाकारों को तो दिया ही, अपने पिता को भी दिया, जिनकी कंपोजिशन वे गा रहे थे और तब कुलदीप जी के आंखों से ढुल ढ़ुल आँसू टपक पड़े। ये खुशी के आँसू एक बाप के थे, जो श्रोताओं की भरपूर दाद मिलने पर बरसे। कदाचित उससे ज्यादा एक गुरु के थे कि जितना सिखाया शिष्य ने उससे ज्यादा कर दिखाया।

सभागार में जसविंदर सिंह की माताजी कंवलजीत कौर भी बैठी थी जो स्वयं बहुत अच्छी गायिका हैं। प्रेक्षकों की सराहना को उनको नज़र करते जसविंदर बोले–
मुश्किल राहों में आसान सफर लगता है
यह मेरी माँ की दुआओं का असर लगता है

माहौल जरा सा भीग गया अपनत्व व समर्पण की उष्मा से। फिर जसविंदर सिंह ने फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ की ग़ज़ल छेड़ी–
हमें क्या बुरा था मरना गर एक बार होता…

उसके बाद मुबारक सिद्धीकी की ग़ज़ल के साथ श्रोता भी गुनगुनाने से खुद को रोक नहीं सके।
खिजांँ के रूत में गुलाब लहजा
बना के रखना कमाल ये है
हवा की जद में दिया जलाना
और जला के रखना कमाल ये है
जरा सी रंजिश पर तोड़ देते हैं
सारे तवाल्लुख जमाने वाले
ऐसे वैसो से तवाल्लुख रखना
और बना के रखना कमाल ये है
किसी को देना यह मशविरा
कि वो बिछड़ने को भूल जाए
ऐसे लमहे पर अपने आंसू छुपाना
और छुपा के रखना कमाल ये है

अगली प्रस्तुति से पहले बोले कि बाहर पाॅपुलर गाना पड़ता है चौपाल में ओरिजनल गाते हैं और उन्होंने ग़ालिब को गज़ल छेड़ी–
हम तो आशिक हैं तुम्हारे नाम के
आँख जिस ज़ानिब तुम्हारी उठ गई
रह गए लाखों कलेजा थाम के

फिल्में, रंगकर्म तथा चित्रकारी में दख़ल रखने वाले हरियाणा से आए अजय रोहिला ने इश्मत चुगताई की कहानी ‘घरवाली’ पर लघु नाटक पेश किया। अजय की चाल- ढ़ाल, बोली- वाणी ने इश्मतआपा के हर्फ़ों को हरकत में ला दिया। कमाल कालजयी कथा का तो था ही, निर्देशक शुभंकर विश्वास के कसे हुए निर्देशन का भी था, फिर अजय रोहिला की संवाद अदायगी तो गज़ब थी। नाटक के निर्देशक शुभंकर विश्वास चौपाल में उपस्थित थे वे भी मंच पर आए।

इस तरह कथा, कहानी, नाटक और गजलों भरी उर्दू ज़बान की शींरीं चाशनी में पगी वो शाम यादगार बन गयी।

(लेखिका स्वांतः सुखाय लेखन करती हैं और चौपाल पर एर पुस्तक भी लिख चुकी हैं)                 
 
चौपाल का फेसबुक पेज https://www.facebook.com/share/p/169LnYEW2v/
spot_img
RELATED ARTICLES
- Advertisment -spot_img

लोकप्रिय

उपभोक्ता मंच

- Advertisment -

वार त्यौहार