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‘वारी’ पर वारी-वारी जाऊँ! जब जन-जन के ह्रदय से भक्ति की गंगा बह निकलती है….

महाराष्ट्र का आध्यात्मिक उत्सव मानी जाती आषाढी वारी देहू से तुकोबा महाराज की पालकी के साथ 18 जून को शुरू हो गई है। जबकि आलंदी से 340 पालकियों के साथ 19 जून को प्रस्थान होगा। पुणे के आलंदी से भवानी पेठ की यात्रा 20 जून को होगी। पुणे में 21 जून को पालकी विश्राम लेगी। अगले दिन यह सासवड के लिए चल पड़ेगी। एक दिन पहले से ही ‘जय हरि विट्ठल’ का नाद सुनाई देने लगा…जगह-जगह गोपीचंदन लगाए लोग दिखने लगे…, ‘उद्या वारी न (कल वारी न)’ के सहज संवाद होने लगे। घर के कामों में हाथ बँटाने वाली ने कह दिया कि उस दिन वह जल्दी आएगी क्योंकि उसे पालकी के दर्शन करने जाना है। दूसरे दिन सुबह चार बजे से ही ‘विट्ठला-गोविंदा’ का नाम स्मरण करते लोग रास्तों पर दिखने लगते हैं..पूरा वातावरण भक्तिमय हो जाता है। ‘आलंदी से विश्रांतवाडी चौराहा यूँ तो ज़्यादा दूर नहीं, पर पालकी को यहाँ आने में दोपहर के देड़-दो बज जाते हैं’, ‘बारिश भी होती ही है’…‘माना जाता है इसमें सबसे कठिन चढ़ाई दिवेघाट की होती है’, हर किसी के पास इसी तरह की बातें थी…जैसे कोई और विषय रह ही  नहीं गया था, या किसी और विषय के बारे में कुछ और चर्चा कम से कम इन दिनों तो कोई करना ही नहीं चाहता था।

आलंदी से निकली पालखी पुणे आ पहुँचती है…यह पालखी होती है ‘वारी’ की…‘वारी’ मतलब आना-जाना, अपने घर से पंढरपुर स्थित भगवान् विट्ठल के मंदिर तक पैदल जाना और लौटना…पहले कभी लोग बुआई के बाद अकेले-दुकेले जाते थे लेकिन फिर साथ जाने लगे….साथ जाने लगे तो कितने लोग साथ जाने लगे…तकरीबन दस लाख…एक बार चलना शुरू किया तो 15 किलोमीटर तक लंबी रेलचेल… बीच में विश्राम…चाय-नाश्ता, भोजन-पानी के लिए। ‘वारी’जिस-जिस मार्ग से गुज़रती है वहाँ का वातावरण तो उसे देखना ही चाहिए जिसे वाराणासी के घाट को देखने का मोह हो। वहाँ गंगा बहती है, यहाँ भक्ति। भक्ति की इस धारा में जो शामिल नहीं हो सकते वे सड़क के दोनों ओर खड़े होते हैं…कुछ समूहों में (मनपा-महानगरपालिका) से अनुमति लेकर स्टॉल लगाते हैं। जिन्हें अनुमति मिलती हैं उनमें से कोई यात्रियों को पानी की बोतलें देता है, कोई बिस्कुट-चिक्की, कोई केले-साबूदाना खिचड़ी तो कहीं समूह के भोजन की व्यवस्था होती है।

वारकरी (वारी में चलने वाला) जिस अनुशासन में होता है वह देखते ही बनता है। कहीं कोई धक्का-मुक्की, छीना-छपटी नहीं। अमीर क्या,ग़रीब क्या लहू का रंग एक है, के साक्षात् दर्शन यहाँ किए जा सकते हैं। स्त्री-पुरुष की असमानता या उम्र का बंधन भी नहीं होता। एकदम बूढ़ा भी लकड़ी टेकते चलता है और कोई स्त्री अपनी गोद में छोटी बेटी को उठाए चल रही होती है। भूख लगी तो सड़क पर ही बैठ गए, घर से लाए थोड़े पोहो में पानी मिलाया और बच्ची को खिला-पिला दिया।

कर्मठता और निष्काम भाव से सेवा का उदाहरण होती है ‘वारी’। जिसने एक बार ‘वारी’ कर ली वह हर परिस्थिति में जी जाता है। लंगर के बारे में सभी जानते हैं, कुछ उसी तरह की सामूहिकता ‘वारी’ में देख सकते हैं। ठेठ मार्केटिंग का बंदा भी होगा और ठेठ गंवई भी…दोनों साथ-साथ, दोनों के हाथों में झांझ-करताल, मृंदग की ताल पर दोनों एकसाथ ठेका धरते हैं। रास्ते बंद होते हैं, स्कूल को एक दिन का स्थानीय अवकाश लेकिन इस व्यवस्था को लेकर कहीं कोई नाराज़गी नहीं…सबके लिए ‘साँवला-विट्ठल’ हर बात से ऊँचा उठ जाता है।

फेसबुक, वाट्सएप्प के युग में प्रोफाइल पिक भी वारी से जुड़े हो जाते हैं। हो भी क्यों नहीं, महाराष्ट्र में आलंदी और देहू से संत ज्ञानेश्वर महाराज और संत तुकाराम महाराज की चरण पादुकाएँ लेकर यह पदयात्रा होती है 260 किमी लंबी और 800 घंटेकी, इसमें जाति का बंधन नहीं होता, उपजाति का बंधन नहीं होता, कोई नहीं पूछता कि साथ चलने वाले का धर्म क्या है…जो है वह उसका है, हरि का है।सबका एक ही लक्ष्य होताहै, नाचते-गाते हुए पंढरपुर तक जाना। कई भक्त साथ आकर भजन गाते हुए, कथा कहते हुए बढ़ते हैं और उनका समूह ‘दिंडी’ कहलाता है। जिसके सबके आगे केसरी ध्वज  होता है और ‘दिंडी’ के पीछे तुलसी वृंदावन सिर पर लेकर चलती एक से लेकर कई महिलाएँ।

कहते हैं संत ज्ञानेश्वर महाराज के पिताजी ‘दिंडी’ की वारी लेकर जाते थे। ग्वालियर के सिंधिया सरकार के सेनाधारी हैबतराव बाबा आरफलकर ने ‘दिंडी’ को सेना का अनुशासन दिया। वे ज्ञानेश्वर की पादुका पंढरपुर लेकर जाते थे। तुकाराम महाराज भी ‘वारी’ करते थे। उनके बेटे नारायण महाराज ने सन् 1685 में श्रीतुकाराम महाराज और ज्ञानेश्वरमहाराज की पादुकाओं को पंढरपुर लेकर जाने की परंपरा शुरू की।

संत ज्ञानेश्वर महाराज और संत तुकाराम महाराज की ‘दिंडी’ के साथ महाराष्ट्र के अन्य स्थानों से कई दिंडियाँ 15 से 20 दिनों तक पैदल यात्रा कर पंढरपुर पहुँचती है।जिनमें विशेषत: श्रीज्ञानेश्वर महाराज (आलंदी), निवृत्तिनाथ (त्र्यंबकेश्वर), सोपानदेव (सासवड), मुक्ताबाई (एदलाबाद), विसोबा खेचर (औंढ्यानागनाथ), गोरा कुंभार (तेर), चांगदेव (पुणतांबे), जगन्मित्रनागा (परलीवैजनाथ), केशवचैतन्य (ओतुर), तुकाराममहाराज (देहू), बोधलेबुवा (धामगाव), मुकुंदराज (आंबेजोगाई), जोगापरमानंद (बार्शी), कान्हो राज महाराज (केंदूर), संताजी जगनाडे (सुदुंबरे) की पालकियाँ होती हैं। वाखरी स्थित संतनगर में सभी संतों की पालकियाँ साथ आती है।

आषाढ़ शुक्ल दशमी को सारी पालकियाँ एक-दूसरे में मिल जाती है और आगे बढ़ते हुए आषाढ़ शुक्ल ग्यारस को विट्ठल के दर्शन करने पहुँचती है। सभी वारकरी चंद्रभागा नदी में स्नान करते हैं और संतों की पालकियों के साथ पंढरी की परिक्रमा करते हैं। “पुंडलिक वरदा हरीविठ्ठल” और “जय जय रामकृष्ण हरि” का गगनभेदी उद्घोष गूँज उठता है। ग्यारस को दोपहर एक बजे सरदार खाजगीवाले के वाड़े में स्थित श्रीविठ्ठल-रुक्मिणी और श्रीमती राधारानी की रथ में परिक्रमा मार्ग पर शोभायात्रा निकाली जाती है। आषाढ़ शुद्ध पूर्णिमा को गोपाल काला के साथ यात्रा समाप्त होती है। गोपालपुर में सभी दिंडियाँ और पालकियाँ साथ आती है और कीर्तन के बाद गोपालकाला वितरित होता है। सब अपने-अपने मार्गों से लौट पड़ते हैं।

(स्वरांगी साने वरिष्ठ  पत्रकार हैं, कई मीडिया संस्थानों में सेवाएँ दे चुकी है और इन दिनों स्वांतः सुखाय सामाजिक, संवेदनशील व अध्यात्मिक मुद्दों पर लेखन कर रही हैं)

 
संपर्क 09850804068 
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