मांडव की वो खुशनुमा रात, बाल्यावस्था और तब ‘शब-ए-मालवा’ जैसा शब्द पता नहीं था, लेकिन बाद के बरसों में न केवल उस शब्द को जाना बल्कि उस शब्द ने जो सुकून भर दिया था, वह भी समझा, शब से पहले आने वाली शाम और शाम से जुड़ा ‘शाम-ए-अवध’, आने वाले कितने ही दिनों के सूरज को उदीयमान बना गया। अवध या कहें लखनऊ या कहें लखनऊ घराना या कहें कथक, उस एक रात की कड़ी से जीवन से जुड़ गया।
बहरहाल तब तो केवल इतना पता था कि मांडु उत्सव हो रहा है और माँ अलकनंदा साने, गुरू माँ जिन्हें हम ताई कहते वे, सविता गोडबोले और हम दो हम उम्र की लड़कियाँ, मैं और आस्था गोडबोले गेस्ट हाउस के कमरे में थे, कला समीक्षक रही माँ के साथ हम मांडू उत्सव में थे। गेस्ट हाउस के उस कमरे के बाहर के बरामदे में ताई अकेली बैठी थी और मैं बचपन की सहज उत्सुकतावश उनके पास चली गई। उनसे माँ की तरह ही स्नेह मिलता रहा है तो कोई औपचारिकता नहीं थी। उन्होंने बैठने का इशारा किया और आमद का पाठांतर कराने लगी… ‘ताs, थेsई तत’…उस समय यह इस तरह कंठस्थ हुआ कि आज भी उस रात की याद के साथ, यह आमद याद है। आमद की अपनी जगहों के साथ, जिस जगह उसे सीखा, वो जगह याद है।

गुरू लच्छू महाराज जी को नहीं देखा, लेकिन सविता गोडबोले जी (गोडबोले ताई) को देखा है, आस्था को देखा है, सोनाली चक्रवर्ती जी (ताई) को देखा है, इनकी त्रिवेणी से जो रसधार बही है, उससे लखनऊ घराने की परंपरा को बहुत क़रीब से देखने-जानने का अवसर मिला। लच्छू महाराज जी का जन्मदिन 1 सितंबर को होता है और उस दिन उन्हें कुछ अधिक याद करना भी जैसे परंपरा में आ गया। देखा जाए तो लच्छू महाराज जी को कोई याद करे, न करे, इससे उन्हें कोई फ़र्क नहीं पड़ता है। कथक गुरु प्रताप पवार कहते हैं, लच्छू महाराज फकीर किस्म के आदमी थे। उनकी बात पर इसलिए भी विश्वास हो जाता है क्योंकि बहुत करीब से उक्त तीनों को देखने का अवसर मिला और एक तरह की फकीरी, औलियापन दोनों ताइयों (मराठी भाषा में दीदी के लिए संबोधन) में देखने को मिला। केवल नज़र से भाव पैदा कर देना किसे कहते हैं, यह वहीं जान सकता है, जिसने उन्हें देखा हो और वह भी आमने-सामने, बिल्कुल आँखों के सामने। गुरू-शिष्य परंपरा में सीखना किसे होता है, यह बात आज की पीढ़ी के लिए कुछ-कुछ अबूझी होगी लेकिन हम उस थोड़ी भाग्यशाली पीढ़ी से है, जिसने इसे कुछ-कुछ जाना है। सविता ताई के यहाँ कथक के रियाज़ के अलावा जीने का रियाज़ भी हो जाता था। जीभर कर रियाज़ के बाद भूख लगी तो निःसंकोच कह दिया, बना लिया, जीभर कर खा भी लिया, न केवल खाना खाया बल्कि डाँट भी जीभर कर खाई और दुलार भी उतना ही पाया।
लच्छू महाराज जी के हर शिष्य में अलग तरीके का कथक आप देख सकते हैं, लखनऊ घराने का अंदाज़ लेकिन हर किसी का उसे बरतने का अपना तरीका। वह भी पूरे सौंदर्यबोध के साथ और बहुत ही प्रतीकात्मक तरीके से। सोनाली चक्रवर्ती का मानना हैं कि महाराज जी प्रयोगवादी थे। वंदना के बाद आमद करते हैं तो उन्होंने उसमें सूर्य, तारे, चंद्रमा, आकाश, पृथ्वी, सभी दिशाओं को प्रणाम करना, या देवी देवताओं को दिखाना, कृष्ण की छोटी- छोटी लीलाओं को दिखाना शुरू किया, उन्होंने बताया ठाट में जैसे कलाइयाँ चलाती हैं, गर्दन और भवें चलती हैं, वैसे कलाकार यदि थोड़ा भाव पैदा करे, तो कलाई के साथ भाव भी कर सकता है। ‘कसक मसक’ जैसी सारी चीज़ों में भावनाएँ पैदा कर सकता है। एक पद या कविता में हर शब्द में पलट-पलटकर नायिका भेद पेश कर सकता है। उन्होंने परनों की शक्लें बदली जैसे ‘किडतक थुन थुन नातिटता’ को एक अलग अंदाज़ में त्रिताल में दिखाया तो पंचम सवारी में भी इसी परन को किया। कई कवित्त परन और दक्ष यज्ञ की रचना की।
कथक क्षेत्र में इन दिनों नया विवाद खड़ा हो गया है कि ‘नाचत गोपाल लाल’ कवित्त किसका है, जबकि ऐसे कई साक्ष्य मिल जाएँगे कि यह लच्छू महाराज जी का लिखा कवित्त है। वे आशु कवि थे। नई दिल्ली की एक सभा में किसी ने उनसे कहा कि लखनऊ घराने में कवित्त ही नहीं है तो महाराज जी ने उसी वक्त तुरंत इस कवित्त की रचना कर दी थी। ऐसा ही एक कवित्त है ‘उमड़ घुमड़कर बादल छाए’ इसमें हस्त मुद्राओं से कथक में उसका प्रचालन किया। आस्था गोडबोले कार्लेकर कहती हैं कि भावों के साथ सौंदर्य दिखाना महाराज जी नृत्य में हैं। यदि गली दिखाना है तो कई वरिष्ठ नृत्यांगनाएँ कान के छेद को भी गली बना देती हैं, महाराज जी ऐसा नहीं करते। वे घटाओं को बालों से जोड़ेंगे, आँखों से जोड़ेंगे लेकिन भवों से नहीं दिखाएँगे।
सौंदर्य बोध को लेकर रघुवीर सहाय की पंक्ति याद आ जाती है कि ‘दूरी, सौंदर्य को बढ़ाती है’। इस पर आस्था सहमति जताते हुए कहती हैं, जब ‘आई’ (माँ) से दूर जाना हुआ, तब महाराज जी अधिक समझ में आए। ‘आई’ के साथ रहते हुए महाराज जी वैसे दिख रहे थे जैसे ‘आई’ ने उन्हें समझा होगा लेकिन गोवा के ड्रामा स्कूल में जाने के बाद महाराज जी का नया ऐंगल पता चला। महाराज जी पारसी थियेटर से जुड़े थे। पारसी थियेटर में मंच पर बड़े-बड़े परदे होते हैं, जिन पर दृश्य बना होता है, लंबे-लंबे संवाद होते हैं, तब ऐसे में कथक के जो मूवमेंट आएँगे वे भी खुले और बृहत् होंगे। महाराज जी का नृत्य कहीं से भी अंगों को चुराकर बरतने जैसा नहीं है। अंगों को पूरा खोलकर नाचा जाना चाहिए। यही वह तासीर है जो कथक की प्राचीन परंपरा में है। नवाबों के यहाँ जाने पर कथक में जो परिवर्तन आए उससे पहले का कथक कैसा था, यह महाराज जी सबके सामने रखना चाहते थे। एक ओर वे प्रयोगधर्मी थे, दूसरी ओर परंपरावादी भी। प्रयोग करते हुए शुद्धता पर आँच नहीं आनी चाहिए। वे हर नर्तक को अपने हिसाब से नृत्य करने की छूट देते थे ताकि नृत्य में ताज़गी रहे इसलिए सविता ताई का कथक अलग दिखता है, कुमकुम धर जी का अलग और कपिला शर्मा जी का अलग।
उप्र संगीत नाटक अकादमी की स्थापना 13 नवंबर 1963 को हुई थी। कथकाचार्य पं. लच्छू महाराज के प्रयासों से उप्र शासन द्वारा 1972 में अकादमी के अंतर्गत कथक केंद्र को स्थापित किया गया। कथक केंद्र में अपने कार्यकाल 1972-1978 के दौरान उन्होंने अनेक उत्कृष्ट कलाकार तैयार किए। इनमें मुख्यतः रमा देवी, सितारा देवी, रोहिणी भाटे, दमयंती जोशी, कुमकुम आदर्श, गोपीकृष्ण, पद्मा शर्मा, शन्नू महाराज, केदार खत्री, राजा केतकर, पी.डी. आशीर्वादम, ओमप्रकाश महाराज, कपिला राज, मालविका सरकार, कुमकुम धर, मीना नंदी, सविता गोडबोले आदि ने कथक जगत् में विशेष प्रतिष्ठा अर्जित की। लखनऊ कथक केंद्र में ही सबने सीखा, सबने समय की पाबंदी को भी महाराज जी से सीखा और पैर से तबला और पखवाज के एक एक शब्द की निकासी भी एक जैसी सीखी, लेकिन उनकी हर शिष्या को देखकर लगता है, उसमें कुछ अलग बात है। यह अलग बात आप ‘मोहे पनघट पर’ करते हुए मधुबाला को देखिए या ‘पाकिज़ा’ की मीनाकुमारी को देखिए, वही कथक है, वही घराना, वही महाराज जी का नृत्य लेकिन तब भी अलग अंदाज़ और खूबसूरती आपको अपनी ओर खींच लेगी। ‘मोहे पनघट’ की कोरियोग्राफी के लिए नौशाद जी ने के.आसिफ़ साहब को लच्छू महाराज का नाम सुझाया था। ठुमरी सुनकर लच्छू महाराज जी रोने लगे थे। तब आसिफ जी ने नौशाद से पूछा, ‘अमाँ ये क्या ड्रामा है, ये क्यों रो रहे हैं’। तब नौशाद जी ने बताया कि वाजिद अली शाह के दरबार में इनके पिता थे, ये आस्ताई (ठुमरी की शुरुआत) उनकी ही थी, आस्ताई उनकी ली है मैंने।
कथक के लखनऊ घराने को जिस नाम ने पहचान दिलाई ऐसे कालिका महाराज के तीन पुत्रों में से बीच के बैजनाथ प्रसाद मिश्र याने लच्छू महाराज जी। कहते हैं, इनके ताऊ बिंदादीन महाराज ने अपने तीनों भतीजों अच्छन महाराज, लच्छू महाराज और शंभू महाराज को गंडा बांधकर नृत्य की शिक्षा दी थी। बीसवीं सदी के दूसरे दशक में बिंदादीन महाराज का निधन हो जाने के कारण परिवार का पूरा दायित्व अच्छन महाराज पर आ गया। यही समय था जब अच्छन महाराज को रामपुर नवाब का आमंत्रण मिला। वो अपने दोनों छोटे भाइयों को लेकर रामपुर चले गए और यहाँ नवाब हामिद अली साहब के दरबारी नर्तक के रूप में प्रतिष्ठित हुए। लच्छू महाराज की युवावस्था का एक लंबा समय नवाबी माहौल में गुज़रा। यही कारण रहा कि महाराज जी अपने जीवन के अंतिम काल तक नवाबी ठाठ-बाट में ही जिये। उन्होंने कला के तत्व का संपूर्ण स्वरूप अपने शिष्यों में उसी तरह खुले हाथों से, पूरी ईमानदारी और अपनेपन से बाँटा।
महाराज जी भाव के पंडित थे। उनके अनुसार अभिनय करते समय आनंद, लज्जा, विरह, व्याकुलता, श्रृंगार की अनेक बारीक छटाएँ अपने चेहरे द्वारा प्रस्तुत करना ही नृत्य को सार्थकता प्रदान करता है। उनके द्वारा रचित तांडव लास्य प्रधान ‘अर्धनारीश्वर’ लखनऊ घराने का हर नर्तक-नर्तकी आत्मसात् करना चाहती है। ‘बाजी मुरजाई सुर तान गिरधर की’ कवित्त में ‘बाजी’ शब्द को उन्होंने अपने भाव, अंग, प्रत्यंग से कई तरीके से प्रदर्शित किया, जो देखते ही बनता था। ‘मैं वो नग़मा हूँ, जो खामोश है इक मुद्दत से, हस्ती-ए-साज़ को छेड़ा तो बिखर जाऊँगा’, ये शेर लच्छू महाराज का लिखा है। ‘शाम हुई घनश्याम न आए’… ये कविता भी उनकी ही रची है। उन्हें कथक में लास्य भाव का सम्राट कहा जाता है। लेकिन जैसे कि सोनाली ताई कहती हैं कि नारी भाव, पुरुष भाव के बिना अधूरा है। लास्य भाव के साथ तांडव का विस्तार भी लच्छू महाराज जी ने किया और परिपूर्ण होने की सुविधा दी। पर आज इस नृत्य को स्लो कहा जाता है, जबकि यह रूह का नृत्य है। ठहराव को लोग स्लो मान लेते हैं क्योंकि लोगों को एथलेटिक डांस देखने की आदत होती जा रही है।
हमने सविता ताई को जो देखा वह प्रतीकात्मक और लक्षणात्मक नृत्य को देखने जैसा है और उनसे ही लच्छू महाराज जी को देखा है। महाराज जी का नृत्य किसी को तूलिका पकड़ाने जैसा है, कि रंग आपको भरना है…तब कैनवास पर हर बार जो रंग दिखेगा वह नया दिखेगा…वह उस कलाकार का अक्स दिखाई देता है, जो उसे रंग दे रहा होगा…निश्चय ही घराने की चौखट में रहकर और पृष्ठभूमि में गुरु रुपी कैनवास को रखकर ही…
(लेखिका वरिष्ठ पत्रकार व स्तंभकार हैं और सामाजिक व सांस्कृतिक विषयों पर लेखन करती हैं)

