वंदे मातरम् की एक और अद्वितीयता है। यह राष्ट्रीयता की पहचान सुमधुरभाषिणीं की शब्दावली में करता है। दुनिया का कोई भी अन्य राष्ट्रगीत या गान किसी भाषिक या वाचिक माधुर्य या भद्रता या सुकोमलता का उल्लेख अपने देश या देशवासियों के संदर्भ में नहीं करता।
सेनेगल का राष्ट्रीय गान स्पष्ट रूप से अपने देश/लोगों को गरजते हुए (roaring) बताता है। यह गान “Le Lion rouge” (लाल शेर) के नाम से प्रसिद्ध है, जिसमें यह पंक्ति है: Le lion rouge a rugi (लाल शेर ने गरज दिया है)।यहाँ “लाल शेर” सेनेगल का राष्ट्रीय प्रतीक है, जो देश की ताकत, जागृति और एकता का प्रतीक है। गान में आगे कहा गया है: “पूरी सेना एक साथ उठ खड़ी हुई है” – यानी शेर की गरज पर पूरे देश ने एक स्वर में जवाब दिया।यह दुनिया का एकमात्र राष्ट्रीय गान है जिसमें स्पष्ट रूप से “रोरिंग/गरजना” का उल्लेख है।दूसरे गानों में थोड़ा-बहुत मिलता-जुलता है, लेकिन सीधे नहीं। फ्रांस का ला मार्सेयेज: “मुगीर से फेरोस सोल्दा” में दुश्मन सैनिकों के गरजने की बात है,अपने लोगों की नहीं। Entendez-vous dans les campagnes, mugir ces féroces soldats?”(क्या तुम सुनते हो मैदानों में उन क्रूर सैनिकों के गरजने/बेलोइंग की आवाज़?)। Mugir” का मतलब जानवर की तरह गहरी गरज या bellow/roar है – दुश्मन सैनिकों की।
अमेरिका का राष्ट्रीय गान (The Star-Spangled Banner) “The rockets’ red glare, the bombs bursting in air”(रॉकेट की लाल चमक, हवाई में बम फटने की आवाज़) जैसी युद्ध की ध्वनियों (explosions, bursting bombs) को देश की आज़ादी की गवाही के रूप में चित्रित करता है। और तब से उसके राकेटों की लाल चमक और बम अन्य देशों की राष्ट्रीय संप्रभुताएँ देख ही रहीं हैं। पाकिस्तान जैसे कुछ देशों ने तो अपने ही देश के कुछ हिस्सों में अपने ही अस्सी हजार नागरिकों को ऐसी बमबारी से मरवाने की बेशर्मी की वृत्ति ही बना ली है।
भूटान वैसे तो सबसे शांतिप्रिय देश है किन्तु उसके राष्ट्रीय गान (Druk Tsendhen – The Thunder Dragon Kingdom) का नाम ही “थंडर ड्रैगन किंगडम” है, जिसमें गरजते ड्रैगन (thunderous dragon) का प्रतीक है जो देश की ताकत और खुशी लाता है। गान में “thunder” की ध्वनि सीधे जुड़ी है।
अल्जीरिया के राष्ट्रीय गान (Qasaman) में कहा गया है We have taken the drum of gunpowder as our rhythm / And the sound of machine guns as our melody” कि बारूद के ड्रम को हमने ताल बनाया, मशीनगनों की आवाज़ को संगीत। इसमें युद्ध की ध्वनियाँ (gunfire, drums of war) स्वतंत्रता की धुन बतायी गयी है।
अल्जीरिया के राष्ट्रीय गान (Qasaman) में कहा गया है We have taken the drum of gunpowder as our rhythm / And the sound of machine guns as our melody” कि बारूद के ड्रम को हमने ताल बनाया, मशीनगनों की आवाज़ को संगीत। इसमें युद्ध की ध्वनियाँ (gunfire, drums of war) स्वतंत्रता की धुन बतायी गयी है।
इटली के राष्ट्रीय गान (Il Canto degli Italiani) में “thunderous chorus” और युद्ध की ध्वनियाँ जैसे cannons thunder का उल्लेख है जिसमें एकता की गरज पैदा करना आशयित है।
लेकिन सुमधुरभाषिणीं जैसी बात कहीं नहीं है। सिर्फ मधुरभाषिणीं से बंकिम के कवि की तृप्ति नहीं हो रही थी तब उन्होंने ‘सु’ उपसर्ग लगाना और आवश्यक समझा।
लेकिन सुमधुरभाषिणीं जैसी बात कहीं नहीं है। सिर्फ मधुरभाषिणीं से बंकिम के कवि की तृप्ति नहीं हो रही थी तब उन्होंने ‘सु’ उपसर्ग लगाना और आवश्यक समझा।
अधिकतर राष्ट्रवाद कर्कश हो जाता है, पर भारत के वंदे मातरम् का प्रथमादर्श जेंटल और सॉफ्ट स्पोकन होने का है। राष्ट्रवाद का स्वर आक्रामक ही हो, यह आवश्यक नहीं। राष्ट्रवाद वह जिसमें अपने देश के प्रति प्रेम हो, न कि दूसरे देशों के प्रति घृणा हो। वह बात अलग है कि जब दूसरे देश जन्मे ही एक बद्धमूल घृणा के साथ हों और उनका प्रतिकार हमारा राष्ट्रप्रेम बन जाता हो।
मधुरता हमारा वैदिक आदर्श रहा है। हमारे देश की हवाओं और नदियों में वही मधुरता श्रेय और प्रेय रही है।
मधुरता हमारा वैदिक आदर्श रहा है। हमारे देश की हवाओं और नदियों में वही मधुरता श्रेय और प्रेय रही है।
ऋग्वेद, मंडल 1, सूक्त 90 से ली गयीं ऋचाएँ याद करें : मधु वाता ऋतायते मधुं क्षरन्ति सिन्धवः । माध्वीर्नः सन्त्वोषधीः॥मधु नक्तमुतोषसो मधुमत्पार्थिवं रजः । मधु द्यौरस्तु नः पिता॥ वायुदेव मधु प्रदान करते हैं; तरंगमय जलप्रवाह जिनमें होता है उन नदियों से मधु रिसता है; संसार में उपलब्ध विविध ओषधियां हमारे लिए मधुमय हों । रात्रि हमारे लिए मधुप्रदाता होवे; और उसी प्रकार उषाकाल भी मधुप्रद हो; पृथ्वी से धारण किया गया यह लोक मधुमय हो; जलवृष्टि द्वारा हमारा पालन करने वाला द्युलोक माधुर्य लिए होवे ।
और देखिये कि जिन नदियों से मधु रिसता था, उनमें औद्योगिक effluents मिलाकर हमने कितना विषैला बना दिया। और देखिये कि मधु प्रदान करने वाली वायु को दिल्ली पंजाब आदि स्थानों में हमने कितना जहरीला कर दिया है।
यही मधुरता हमारी वाणी में हो। ऐसी बानी बोलिये मन का आपा खोय। औरन को शीतल करे, आपुही शीतल होय।’ यह तथाकथित जनवादी कबीर कहते थे और ‘तुलसी मीठे वचन ते, सुख उपजत चहुं ओर। वशीकरण एक मंत्र है, तज दे वचन कठोर’ यह पंडित होने के कारण आधुनिक प्रताड़ना के शिकार तुलसी भी कहते थे। और तुलसी के मित्र कवि रहीम भी यही बताते थे : कागा काको धन हरे, कोयल काको देय। मीठे वचन सुनाय कर, जग वश में कर लेय।
पर जब हम आज देखते हैं कि हमारे सोशल मीडिया पर गालियों का मवाद बहता रहता है, जब हम देखते हैं कि माँ बहन की गालियाँ देना बॉलीवुड और ओटीटी से लाई जा रही अपसंस्कृति में एक नया ‘कूल’ बन गया है तब क्या हम ‘सुमधुरभाषिणीं’ के आदर्श वाले राष्ट्रगान के प्रति अपना दायित्व निभा रहे हैं?
जब हम देखते हैं कि एक समुदाय दूसरे समुदाय को भर भर के गालियाँ देता है तब क्या हमें लगता है कि हम अपनी सुमधुरभाषिणीं भारत माता से कितनी दूर चले आये हैं?
जब सार्वजनिक मंचों से किसी नेता की कर्कशता का डेसीबेल लीवल और से और ऊपर होता चला जाता है तब क्या उसे इस सुमधुरभाषिणीं का ध्यान आता है?
बंकिम ‘प्रियं ब्रूयाद्’ की संस्कृति से अपने देश की पहचान को जोड़ते थे। विज्ञापन और वायदों से भ्रष्ट हुई भाषा के दौर में ‘सुमधुरभाषिणीं’ का आदर्श एक यूटोपिया लगता है।
पर उसे व्यवहृत करना इतना असंभव भी नहीं है। कोशिश करने वालों की हार नहीं होती।
जब सार्वजनिक मंचों से किसी नेता की कर्कशता का डेसीबेल लीवल और से और ऊपर होता चला जाता है तब क्या उसे इस सुमधुरभाषिणीं का ध्यान आता है?
बंकिम ‘प्रियं ब्रूयाद्’ की संस्कृति से अपने देश की पहचान को जोड़ते थे। विज्ञापन और वायदों से भ्रष्ट हुई भाषा के दौर में ‘सुमधुरभाषिणीं’ का आदर्श एक यूटोपिया लगता है।
पर उसे व्यवहृत करना इतना असंभव भी नहीं है। कोशिश करने वालों की हार नहीं होती।
(लेखक मप्र के सेवानिवृत्त आईएएस अधिकारी हैं और वर्तमान में मप्र के मुख्य चुनाव आयुक्त हैं)

