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अतृप्त तृष्णाएँ ( काव्य संग्रह ): समय के स्पंदन को ध्वनित करती रचनाएं…

कुछ नए प्रयोगों के साथ परिवेश और संदर्भ जुड़ा  छंद मुक्त 72 कविताओं के सतरंगी गुलदस्ते की रचनाएं समय के स्पंदन को ध्वनित करती हैं। कविताओं में कृति के शीर्षक के अनुरूप अतृप्त तृष्णाएँ तो स्पष्ट हैं ही साथ ही प्रेम, पीड़ा, प्रकृति,आध्यात्म,समाज के साथ – साथ विज्ञान के प्रयोग भी समय के साथ – साथ चलती रचनाएं हैं। प्रतीत होता है जैसे समय को मुट्ठी में बांध लेना चाहती हैं। प्रत्येक कविता कुछ बोलती, कहती और संदेश देती लगती है। कविता का प्रस्तुतीकरण इतना प्रभावी है कि लगता है लेखिका की आत्मा समय के साथ संवाद कर रही है। भाषा अत्यंत सहज सरल और सुग्राहीय है।
 ” अतृप्त तृष्णाएँ ” शीर्षक रचना को जिस खूबसूरती से अध्यात्म से जोड़ा है वह इनके सृजन की गहराई को सामने लाता है ( पृष्ठ १९)…………….
“विजन-वन-वल्लरी” पर, / सोती है अतृप्त तृष्णाएँ । / सूखी रेत पर पानी सी, /बहती है अतृप्त तृष्णाएँ । / क्वार के बादलों सी,/ गरजती है अतृप्त तृष्णाएँ ।/  अमा में चंद्र किरणों सी, /फलती है अतृप्त तृष्णाएँ।/ दर्शन दे जो गिरधारी, / तो पूर्ण हो, अतृप्त तृष्णाएँ ।
  ” मैं भी हाथ नहीं आया” रचना में समय को बंधने के प्रयास को जिस प्रकार वार्तालाप का रूप दिया है अद्भुत है ( पृष्ठ५४)……….
मैं भी हाथ नहीं आया/ वक्त से मैं बातें कर रही थी। /कुछ कह रही थी, कुछ सुन रही थी।/
मैंने पूछा उससे तू ठहरता क्यूँ नहीं,/ तू किसी का होकर रहता क्यूँ नहीं।/ मुस्करा कर हौले से वक्त बोला,/  मैं कल भी तेरा था। / मैं आज भी तेरा हूँ।/ बस तुझे मुझे जीना नहीं आया।/
वक्त जो मिला ईर्ष्या बैर में गँवाया।/  मैं ठहरा था तेरे लिए, कि कुछ पल तू जी ले। / कुछ हँसी के किस्से,/ वक्त में कैद कर ले।/ बेफिक्र होकर जीना तुझे आया नहीं।/बीत जाना मेरी फितरत थी,/ मैं भी हाथ आया नहीं।
विज्ञान के प्रयोग का चलन इन दिनों कविताओं में देखने को मिल रहा है। ” उत्तर का इंतजार करती रही ” कविता एक ऐसी ही बानगी है जिसमें बात को कविता में कहने के लिए विज्ञान का प्रयोग खूबसूरती से किया है( पृष्ठ ५६)…..
तुमने प्रेम में पूर्ण विराम लगाना चाहा, मैं योजक चिह्न सी उसे जोड़ती रही।/ प्रश्न सूचक चिह्न बनते रहे तुम, मैं विस्मय सूचक चिह्न सी निहारती रही।/ अल्प विराम की तरह तुम, अलग करने में लगे रहे, मैं तुम्हारे निर्देशों को अर्द्ध विराम समझती रही।/ तुम लाघव चिह्न सा मुझे संक्षिप्त करते रहे, मैं उद्धरण चिह्न की तरह तुम्हें विशेष करती रही। / उपविराम की तरह तुम अलग दिखाते रहे, मैं जीवन के कोष्ठक में तुम्हें बंद करती रही। / हँसपद की तरह तुम मुझे त्रुटि बोधक जताते रहे, मैं विवरण चिह्न सी अगली पंक्ति में, उत्तर का इंतजार करती रही…… ।
        ” एक घूँट जिंदगी ” कविता में नारी की भावनाओं को कितनी मार्मिक रूप में अभिव्यक्त किया है ( पृष्ठ ९६)……..
आदि से अनंत काल में एक घूँट सी है, जिंदगी।/  इस एक घूँट में ही, सम्पूर्ण तृप्ति लानी है। / संसार को निभाते हुए। / मोक्ष की राह सजानी है।/  इस एक घूँट में तृप्ति, प्रेम व भक्ति से मिल जाएगी।/  फँसे अगर, मोह, माया, ईर्ष्या और बैर के दलदल में. ..I/  तो न जाने कितनी बार ये एक घूँट सी जिंदगियाँ आएगी।
 ” लिखना है मुझे ” कविता ( पृष्ठ ९९) में प्रश्न खुद से हैं, ”  लिखना है मुझे,/ पर /वाह-वाह के लिए नहीं। /चर्चाओं के लिए नहीं।/ अखबारों के लिए नहीं।/समीक्षकों के लिए नहीं।/सम्मान के लिए नहीं। /तालियों के लिए नहीं। इस का उत्तर भी कविता में खुद ही देते हुए लिखती हैं, ” लिखना है मुझे क्योंकि/
मैं लिखना चाहती हूँ। /दिल के जज्बात को, हास को परिहास को । जो कह नही सकते, उस मन के हाल को।/ स्वयं को खोजने को।/
स्वयं को पाने को । /कान्हा से मेरी प्रीत को।/ कान्हा से मेरे गीत को ।/ सजाना है मुझे बस, दिल के जज्बात को ।/ बहती रहती हैं जो दिन-रात सोच की उस सरिता को। /बहकर जो मिल जाये,भाव शब्द के सागर को ।/ आत्मा जैसे विलीन हो परमात्मा को।/ मैं भी विलीन हो जाऊ, शब्दों के भगवान को।
    प्रेम का अतिरेक झलकता है ” मीरा न बन जाऊं ” कविता में। जैसे मेरा कृष्ण के प्रेम से उसकी भक्ति के सागर में गोते लगाती थी, वैसी ही  प्रेम की दीवानी एक महिला के मीरा बनने की सोच को इन्होंने अपनी इस कविता में भावनाओं के साथ वर्णित किया है ( पृष्ठ ९३)………….
ये मेरे इश्क की दीवानगी है या पागलपन/ कि तू दिखता नहीं है मुझे /फिर भी मुझे हर शय और जरें में तेरा ही अक्स नजर आता है।/
तुझसे इतर ये मेरा तन और मन /अब कहाँ कुछ देख व सोच पाता है।/ ये मेरी दीवानगी धीरे-धीरे भक्ति में बदल रही है।/ तुझमें अब वो ईश्वर की छवि देख रही है।/ सँभालो मुझे कही दीवानगी में पागल ना हो जाऊँ / मै भी दीवानगी में मीरा न बन जाऊँ ।/ मीरा न बन जाऊँ।
एक बार फिर से ” ये जिंदगी एक कला है” कविता में समय को ले कर जिंदगी का फलसफा यूं बयां किया है ( पृष्ठ २९)…..
  बस चले जा रहे है ।/ चलते है न जाने किस ओर, दाता ले जाता उस ओर ।/  हवा में फैली गंध सा, एक छोर से दूसरी ओर….।/ महावीर, बुद्ध तो है नहीं, कि कह दे… चल रहे है हम सत्य की खोज में।/ हम तो भटक रहे है, ईर्ष्याओं के जाल में। मन की हजारों बातों को दबाएँ ।/  गमों को आँसुओं में बहाये ।/बस जिये जा रहे है ना जाने क्या-क्या छुपाएँ।/
जिये जा रहे है बस, ये सोचते हुए कि अंत में सवालों के जवाब मिल जायेंगे।/ और जीने की कला आ जाएगी सम्मान व अस्तित्व के साथ ।
 संग्रह की अन्य कविताएं  मां, में शून्य हूं, मन पीड़ा, प्रेम क्या है, बस बात खत्म, सुनो प्रिय, मेरा मन कह रहा है, तुम कृष्ण हो, सूर्य का तेज, भाषा, सुकून , खुशी, अपनी मंजिल की ओर,कुछ तुम कहो, बिखरे पल, आधी अभी बाकी है, कभी – कभी, कुछ चिंताएं, काश कि मैं, वैसे ही मैं तेरे लिए आदि अन्य रचनाएं भी हमारे परिवेश और संदर्भ को ही दर्शाती हैं, चाहे वे पौराणिक हों या वर्तमान।
पुस्तक की भूमिका में नरेंद्र दीपक लिखते हैं ,” आज के साहित्यिक माहौल को एक दर्पण दिखाता है यह संग्रह”।  संदेश में नोडल अधिकारी पब्लिक लाइब्रेरी , कोटा संभाग डॉ. दीपक कुमार श्रीवास्तव लिखते हैं,” श्रीमती “गर्विता” ने अपनी कविताओं के माध्यम से यह दिखाया है कि जीवन के हर अनुभव – चाहे वह सुर हो या दुःख-को शब्दों में ढाल कर उसे अमर किया जा सकता है। यह काव्य संग्रह न केवल साहित जगत में एक मील का पत्थर साबित होगा, बल्कि आने वाली पीढ़ियों को भी प्रेरित करेगा”। डॉ. राकेश, आशी भटनागर,प्राथना भारती, हेमराज सिंह हेम एवं प्रवीण कुमार शुक्ला के संदेश भी दिए गए हैं।
पुस्तक : अतृप्त तृष्णाएँ
लेखिका : गरिमा राकेश गौतम ‘ गर्विता ‘
प्रकाशन : ब्राइट एमपी. पब्लिशर, गुड़गांव
प्रकाशन : अगस्त 2024
प्रकार : पेपरबैक
मूल्य : 250 रुपए
साहित्यिक परिचय :
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कोटा जिले में जन्मी गरिमा ने राजनीति विजयन में एमए कर बीएड किया है और हिंदी में एमए कर रही हैं।  पतझड़ से बसंत की ओर , कोरोना के कर्मवीर , जिंदगी के दिन ,
 तुम प्रीत हो मेरी , सुलझी अनसुलझी जीवन की उलझानें , शुभाशंसा , एक उम्र चुरा के लाऊं ,प्रकृति भी बोलती है तथा प्रेमार्चनाएँ इन की प्रकाशित कृतियां हैं। देश-विदेश की पत्र-पत्रिकाओं के साथ-साथ एलो दर्जन से अधिक साझा संकलनों में साहित्य की विविध विधाओं में 900 से ज्यादा रचनाओं का प्रकाशन। कई संस्थाओं से आप सम्मानित हो चुकी हैं।
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समीक्षक
डॉ. प्रभात कुमार सिंघल, कोटा
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