आइए महसूस करिए ज़िंदगी के ताप को
मैं चमारों की गली तक ले चलूंगा आपको
अदम गोंडवी के इस शेर के हवाले से कथाकार मधु कांकरिया ने कहा कि लेखन के साथ ही लेखक की यात्रा शुरू हो जाती है। वह जो देखता है वही दिखाता है। इसलिए साहित्य को समाज का दर्पण कहा जाता है। मैंने भी जो देखा अपने लेखन में वही दर्ज किया। रविवार 13 अप्रैल 2025 को केशव गोरे स्मारक ट्रस्ट, गोरेगांव के मृणालताई हाल में आयोजित चित्रनगरी संवाद मंच मुंबई के सृजन संवाद में डॉ मधुबाला शुक्ल ने मधु कांकरिया से विस्तृत बातचीत की।
झारखंड के आदिवासियों पर बात करते हुए मधु जी ने कहा कि उनका जीवन बहुत कठोर है। भारत मंदिरों का देश है लेकिन वहां कोई मंदिर नहीं है। वृक्ष और पहाड़ ही उनके देवता हैं। किसी के मरने पर भी वे पेड़ नहीं काटते। सूखी लड़कियां इकट्ठा करके ही दाह कर्म करते हैं। मधु कांकरिया ने कश्मीर के आतंकवाद पर भी बात की और महाराष्ट्र के किसानों की आत्महत्या पर भी। उन्होंने जालना जिले के गांवों में कुछ किसानों की आत्महत्या की मार्मिक दास्तान सुना कर सबको विचलित कर दिया। कोलकाता के रेड लाइट एरिया की औरतों की अंधेरी ज़िंदगी पर भी मधु जी ने रोशनी डाली।
कार्यक्रम के संचालक देवमणि पांडेय ने मधु कांकरिया का परिचय दिया। ‘मेरी ढाका डायरी’ पर लिखी चार लेखकों की टिप्पणी के अंश भी उन्होंने पेश किए। इनमें शामिल थे- डॉ विजय कुमार, ओमा शर्मा, गंगा शरण सिंह और प्रज्ञा रोहिणी। जाने माने उदघोषक आनंद सिंह ने ‘मेरी ढाका डायरी’ के एक अंश का पाठ किया जिसमें प्रेम में टूटी हुई एक स्त्री फ़ौजिया की अद्भुत दास्तान थी।
अपनी किताब पर चर्चा करते हुए मधु कांकरिया ने बताया कि पहले ढाका में सूफ़ियाना इस्लाम था। अब मज़हबी रंग दिखाई देता है। बाहरी मुल्कों से पैसा आ रहा है। पिछले दस सालों में ढेर सारी मस्जिदें बनी हैं मगर स्कूल और थिएटर नहीं बने। कल्चर और रिलीज़न के बीच युवा कंफ्यूज़ हैं। मज़हब मजबूत हो रहा है और संस्कृति कमज़ोर हो रही है। पहले हिंदू लोग सड़कों पर बिंदास होली खेलते थे। अब घर के अंदर खेलते हैं। लोगों के मन में एक अनजाना डर बैठ गया है। उन्होंने बताया कि जिन लोगों ने तस्लीमा नसरीन की किताब ‘लज्जा’ नहीं पढ़ी है वे भी तसलीमा नसरीन का विरोध करते हैं।
हिंदी एवं उर्दू बोलने के कारण बिहारी और पंजाबी मुसलमानों को सन् 1971 में किस यातना से गुज़रना पड़ा था मधु कांकरिया ने उसका भी चित्र पेश किया और उनकी मौजूदा स्थिति पर भी प्रकाश डाला। अशोक राजवाड़े, आनंद सिंह, कृपा शंकर मिश्र, प्रदीप गुप्ता आदि कई लेखकों ने मधु कांकरिया से सवाल पूछे। उन्होंने सबका समुचित जवाब दिया। एक सवाल के जवाब में मधु जी ने कहा कि जैसे मुंबई में कई मुंबई हैं इसी तरह ढाका में कई ढाका हैं। अमीर बहुत ज़्यादा अमीर हैं और ग़रीब बहुत ज़्यादा ग़रीब। कुल मिलाकर सृजन सम्वाद में ढाका के समाज, साहित्य, भाषा, संस्कृति, मज़हब और इतिहास पर महत्वपूर्ण चर्चा हुई।
प्रतिष्ठित व्यंग्यकार श्रीकांत आप्टे ने ‘धरोहर’ के अंतर्गत कालजयी कवि भवानी प्रसाद मिश्र की चर्चित कविता ‘चार कौवे’ का पाठ किया। कवि कृपा शंकर मिश्र ने देश भक्ति की रचना सुनाई। न्यूयॉर्क से पधारी गायिका अरुणा गुप्ता के गायन से कार्यक्रम का समापन हुआ।

