भारत ने हाल ही में जम्मू-कश्मीर के पहलगाम में हुए आतंकी हमले के जवाब में पाकिस्तान के साथ 1960 में हुई सिंधु जल संधि (Indus Waters Treaty) को स्थगित कर दिया है ।हां, हाल के समाचारों के अनुसार, भारत ने 23 अप्रैल 2025 को पाकिस्तान के साथ 1960 में हुई सिंधु जल संधि (Indus Waters Treaty) को तत्काल प्रभाव से स्थगित (सस्पेंड) कर दिया है। यह निर्णय जम्मू-कश्मीर के पहलगाम में हुए आतंकी हमले (26 लोगों की मौत) के बाद लिया गया, जिसके लिए भारत ने पाकिस्तान को जिम्मेदार ठहराया। भारत के विदेश सचिव विक्रम मिसरी ने घोषणा की कि यह स्थगन तब तक रहेगा जब तक पाकिस्तान सीमा पार आतंकवाद को पूरी तरह बंद नहीं करता।
सिंधु जल संधि का स्थगन पाकिस्तान के लिए एक बड़ा झटका है, जो उसकी कृषि, ऊर्जा, और अर्थव्यवस्था को गंभीर रूप से प्रभावित कर सकता है। तत्काल प्रभाव शायद सीमित हों, लेकिन अगर भारत पानी को रोकने के लिए बांध बनाता है, तो पाकिस्तान में जल संकट, खाद्य असुरक्षा, और आर्थिक अस्थिरता बढ़ सकती है।
हालांकि, संधि को पूरी तरह खत्म (टर्मिनेट) नहीं किया गया है, बल्कि इसे स्थगित किया गया है, जिसका मतलब है कि भारत अब संधि की बाध्यताओं से मुक्त है और भविष्य में सिंधु नदी के पानी को रोकने या उसका उपयोग बढ़ाने के लिए स्वतंत्र है।
1947 में ब्रिटिश भारत को भारत और पाकिस्तान में विभाजित किया गया, तो सिंधु नदी प्रणाली, जो दोनों देशों से होकर बहती है (तिब्बत से निकलती है और अफ़गानिस्तान और चीन को भी छूती है), तुरंत संभावित संघर्ष का मुद्दा बन गई। पानी पर किसका नियंत्रण है? किसे कितना मिलता है?
1960 में भारत-पाकिस्तान के बीच 6 नदियों के पानी के बंटवारे को लेकर हुआ था समझौता
1960 में भारत और पाकिस्तान के बीच नदियों का पानी बांटने को लेकर एक समझौता हुआ था, जिसे सिंधु जल संधि कहते हैं। वर्ल्ड बैंक की पहल के बाद करीब नौ साल चली बातचीत के बाद ये समझौता हुआ था। 19 सितंबर 1960 को कराची में उस सिंधु नदी घाटी समझौते पर हस्ताक्षर हुए, जिसमें छह नदियों के पानी के उपयोग का बंटवारा हुआ।
समझौते में सिंधु नदी घाटी की नदियों को पूर्वी और पश्चिमी नदियों में बांटा गया। इनमें ब्यास, रावी और सतलुज को पूर्वी नदियां मानते हुए इनका पानी भारत के लिए तय किया गया। वहीं, सिंधु, चेनाब और झेलम को पश्चिमी नदियां माना गया और इनका पानी पाकिस्तान के लिए तय किया गया।
समझौते के मुताबिक भारत पूर्वी नदियों का पानी बिना किसी रोक-टोक के पूरी तरह इस्तेमाल कर सकता है। वहीं, पश्चिमी नदियों के इस्तेमाल का भी भारत को सीमित अधिकार दिया गया। भारत इन नदियों के पानी का कुल 20% हिस्सा रोक सकता है। भारत चाहे तो इन नदियों पर हाइड्रो पावर प्रोजेक्ट बना सकता है, लेकिन उसे रन ऑफ द रिवर प्रोजेक्ट ही बनाने होंगे। यानी, इसके लिए पानी को रोका नहीं जा सकता। इसके साथ ही इस पानी का इस्तेमाल खेती के लिए भी कर सकता है।
सिंधु जल संधि भारत और पाकिस्तान के बीच 1960 में विश्व बैंक की मध्यस्थता से हुई थी। इसके तहत भारत को पूर्वी नदियों — सतलुज, ब्यास और रावी — का पूर्ण उपयोग करने का अधिकार है, जबकि पाकिस्तान को पश्चिमी नदियों — सिंधु, झेलम और चिनाब — का अधिकांश जल मिलता है ।
संधि स्थगन का पाकिस्तान पर प्रभाव
संधि के स्थगन से पाकिस्तान को गंभीर जल संकट का सामना करना पड़ सकता है:
कृषि पर असर: पाकिस्तान की लगभग 80% कृषि भूमि सिंधु नदी प्रणाली पर निर्भर है। जल आपूर्ति में कमी से खाद्य उत्पादन में गिरावट और खाद्य सुरक्षा पर खतरा उत्पन्न हो सकता है
शहरी जल आपूर्ति: कराची, लाहौर और मुल्तान जैसे प्रमुख शहर सिंधु और उसकी सहायक नदियों पर निर्भर हैं। जल प्रवाह में कमी से इन शहरों में जल संकट गहरा सकता है ।
बिजली उत्पादन: तरबेला और मंगला जैसे जलविद्युत परियोजनाएं सिंधु नदी पर आधारित हैं। जल आपूर्ति में कमी से बिजली उत्पादन प्रभावित हो सकता है, जिससे ब्लैकआउट की स्थिति उत्पन्न हो सकती है
जलसंधि स्थगित होने से पाकिस्तान की क्या हालत होगी?
सिंधु जल संधि के स्थगन से पाकिस्तान पर गंभीर और बहुआयामी प्रभाव पड़ सकते हैं, क्योंकि उसकी अर्थव्यवस्था, कृषि, और ऊर्जा उत्पादन सिंधु नदी प्रणाली पर बहुत हद तक निर्भर हैं। नीचे इसके प्रमुख प्रभाव दिए गए हैं:
पाकिस्तान की लगभग 80% कृषि सिंधु नदी और इसकी पश्चिमी सहायक नदियों (सिंधु, झेलम, चिनाब) पर निर्भर है।
यदि भारत इन नदियों के पानी को रोकता है या डायवर्ट करता है, तो पाकिस्तान में गेहूं, चावल, गन्ना, और कपास जैसी प्रमुख फसलों की पैदावार पर गंभीर असर पड़ेगा।
इससे खाद्य सुरक्षा खतरे में पड़ सकती है, और खाद्य पदार्थों की कीमतें बढ़ सकती हैं, जिससे आर्थिक अस्थिरता और बढ़ेगी।
पाकिस्तान के पंजाब और सिंध प्रांतों में लाखों लोग पीने के पानी के लिए सिंधु नदी प्रणाली पर निर्भर हैं।
पानी की कमी से इन क्षेत्रों में जल संकट गहरा सकता है, जिससे सामाजिक अशांति बढ़ने की आशंका है।
पाकिस्तान में कई हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट्स (जैसे मंगला बांध) सिंधु और उसकी सहायक नदियों पर निर्भर हैं।
पानी के प्रवाह में कमी से बिजली उत्पादन प्रभावित होगा, जिससे पहले से ही ऊर्जा संकट से जूझ रहे पाकिस्तान में बिजली की कमी और गंभीर हो सकती है।
पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था का बड़ा हिस्सा कृषि और उससे जुड़े निर्यात पर आधारित है। फसल उत्पादन में कमी से जीडीपी पर नकारात्मक असर पड़ेगा।
ऊर्जा और पानी की कमी से औद्योगिक उत्पादन भी प्रभावित हो सकता है, जिससे बेरोजगारी और आर्थिक संकट बढ़ेगा।
भारत अब बांधों और जल परियोजनाओं (जैसे रतले, शाहपुरक) के निर्माण में तेजी ला सकता है, जो पाकिस्तान को मिलने वाले पानी को और कम करेगा।
इससे पाकिस्तान को सूखा, अकाल, और बड़े पैमाने पर जनसंख्या विस्थापन का सामना करना पड़ सकता है।

