भारतीय समाज का कोई छोटा सा भाग हो, कोई ग्राम हो, नगर हो या महानगर हो; सभी स्थानों पर इन दिनों कहीं न कहीं, किसी न किसी रूप में संघ शिक्षा वर्ग की चर्चा निकलती ही है।
ग्रीष्म की छूट्टियों में जब कि सामान्यतः लोग किसी पहाड़, पठार, जैसे शीतल, सुरम्य स्थान पर या घर में वातानुकूलित कमरों में आराम करते हैं, तब भारत में एक दृश्य दूसरा भी होता है। देश का एक बड़ा वर्ग स्वरुचि से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के अभ्यास वर्गों में जाकर बीस-तीस दिनों तक कड़ा श्रम करते हुए पसीना बहाता है। इन वर्गों में शिक्षार्थी चाहे जिस भी पृष्ठभूमि से आया हो, वह बिना कूलर एसी के ही नीचे भूमि पर दरी बिछाकर सोने व स्वयं ही अपना बिस्तर समेटने, अपने बर्तन, कपड़े स्वयं धोने व अपने आसपास को स्वच्छ रखने हेतु बाध्य रहता है। इन शिविरों में यह प्रशिक्षार्थी बिना मोबाइल, बिना इंटरनेट, घर-गृहस्थी से संवाद किए बिना ही रहता है। इस अवधि में उसे शिविर प्रांगण से कहीं बाहर जाने की अनुमति नहीं होती है। किसी गुरुकूल के विद्यार्थी की भांति, यहां स्वयंसेवक, व्यक्तित्व परिष्करण व राष्ट्र चिंतन हेतु कष्टप्रद परिस्थितियों में रहता है। इन वर्गों में सामाजिक कार्यों में श्रमदान, अपने परिवेश की स्वच्छता, समाज के विभिन्न वर्गों के घर-परिवार में अचानक अतिथि रूप में जाकर भोजन प्राप्त करना व उनसे चर्चा करना जैसी गतिविधियां भी सम्मिलित रहती हैं।
आचार्य चाणक्य ने कहा था कि, “किसी भी देश में शांति काल में जितना पसीना बहेगा, उस देश में, युद्ध काल में उससे दूना रक्त बहनें से बचेगा”। आरएसएस के, इन संघ शिक्षा वर्गों में आये शिक्षार्थी, आचार्य चाणक्य की कल्पना पर ही देश के शांति काल में कल्पना, योजना, निर्माण, रचना पर अथक परिश्रम करते हुए सतत सैन्य व संस्कृति साधना का प्रशिक्षण लेतें हैं। आश्चर्य है कि प्रतिवर्ष चरम गर्मी के मई माह में, देश के साठ-सत्तर स्थानों पर आयोजित, इन शिक्षा वर्गों में संघ के लगभग पंद्रह हज़ार स्वयंसेवक प्रशिक्षण लेतें हैं। संघ शिक्षा वर्ग, बिना किसी भौतिक या व्यक्तिगत लाभ की दृष्टि से कष्टसाध्य वातावरण में किसी सामान्य से विद्यालय के कक्षों व प्रांगणों में आयोजित होतें हैं!
सात दिनों से पच्चीस दिनों तक के इन वर्गों के पाठ्यक्रम में प्रतिदिन लगभग चार घंटे के बौद्धिक विकास कार्यक्रम तथा चार घंटे के शारीरिक विकास के सत्र, कोई दो घंटे प्रकृति चिंतन के होते हैं। शेष समय में भी स्वयंसेवक को राष्ट्र आराधना की घुट्टी नाना प्रकार से पिलाई जाती है। स्मरण रहे कि, भले ही संघ शिक्षा वर्ग रोजगार, व्यावसायिक या कार्यालयीन कार्यकुशलता में वृद्धि की दृष्टि से आयोजित नहीं होते हैं, किन्तु इन वर्गों से, बालक तथा किशोर वय की आयु से लेकर वृद्धों तक को प्रत्येक क्षेत्र में अधिक निपुण, प्रवीण तथा पारंगत बना देता हैं। वर्ग पाठ्यक्रम का लक्ष्य, समाज, संस्कृति व राष्ट्रीयता के परिप्रेक्ष्य में, व्यक्ति की शारीरिक व बौद्धिक क्षमता के तीव्र विकास का होता है। कार्यकर्ता विकास वर्ग में स्वयंसेवक केवल संगठन हेतु नहीं अपितु स्वयं के व्यावसायिक, पेशेगत व नौकरी आदि के क्षेत्र में भी अधिक कार्यकुशल व संवेदनशील हो जाता है।
इन वर्गों में विभिन्न आयुवर्गों के अलग अलग गठ या समूह बना देते हैं। वस्तुतः “समाज में समरस रहते हुए अपने अपने कार्य को आनंदपूर्वक, श्रद्धापूर्वक करना व राष्ट्रनिर्माण की दृष्टि से परिणाम मूलक हो जाना”, यही इन वर्गों का लक्ष्य व सत्व होता है। वस्तुतः इन वर्गों में सम्मिलित व्यक्ति को खेल-खेल में ही समाज में विलीन हो जाने का अद्भुत प्रशिक्षण मिल जाता है। यही कारण है कि देश के ही नहीं अपितु विश्व के सर्वाधिक अनूठे, विशाल, अनुशासित, लक्ष्य समर्पित, तथा राष्ट्रप्रेमी संगठन के रूप में आरएसएस की पहचान होती है। संघ के विषय में यह तथ्य भी बड़ा ही सटीक, सत्य तथा सुस्थापित है कि संघ का कार्य संसाधनों से अधिक भावना तथा विचार आधारित होता है। यदि आपका संघ के स्वयंसेवकों से मिलना जुलना होता है तो एक शब्द आपको बहुधा ही सुननें को मिल जाएगा, वह शब्द है “संघदृष्टि”। यह संघदृष्टि शब्द, बड़ा ही व्यापक, विस्तृत शब्द है। संघदृष्टि विकास ही संघ वर्ग का लक्ष्य है। छोटे-छोटे घरेलू, सामाजिक, राष्ट्रीय विषयों में व्यक्ति, समग्र चिंतन के साथ बढ़े, इसका प्रशिक्षण वर्गों में होता है। वसुधैव कुटुम्बकम, सर्वे भवन्तु सुखिनः, धर्मो रक्षति रक्षितः, इदं न मम इदं राष्ट्रं जैसे अति व्यापक अर्थों वाले पाठ व्यक्ति के मानस में सहज स्थापित हो जायें यही लक्ष्य होता है। ये वर्ग व्यक्ति में भाव परिवर्तन या भाव विकास में सहयोगी होतें हैं; और यही व्यक्तित्व परिष्कार का सर्वाधिक सफल मार्ग भी है! राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, आज जिस आकार, ऊँचाई व गहराई को नाप रहा है वह इन वर्गों से प्रशिक्षित स्वयंसेवकों के आधार पर ही तो संभव हुआ है!
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना 27 सितंबर 1925 की विजय दशमी को, नागपुर के मोहिते के बाड़े में डॉ. केशवराव बलिराम हेडगेवार जी ने की थी। संघ के पांच स्वयंसेवको के साथ प्रारंभित, संघ की प्रथम शाखा आज एक लाख शाखाओं को छूने की ओर उद्धृत हो रही है। सौ वर्षीय इस संगठन में स्वयंसेवकों की करोड़ों की संख्या ने संघ को विश्व का सर्वाधिक विशाल स्वयंसेवी संगठन बना दिया है। संघ लक्ष्य में राष्ट्रवाद, हिंदुत्व, हिंदू राष्ट्र, अखंड भारत, भारत माता का परम वैभव, पाक अधिकृत कश्मीर, समान नागरिक संहिता जैसे विषय समाहित हैं। ‘अयोध्या जन्मभूमि’ व ‘कश्मीर से अनुच्छेद 370 उन्मूलन’ जैसे विषय संघ शक्ति से ही संपन्न हुए हैं। संघ के संवैचारिक संगठन, आयाम, प्रकल्प, गतिविधि की की संख्या एक लाख से ऊपर है। ये संगठन देश के विभिन्न, सुदूर, पहुंचविहीन गाँवों तक में अपनी उपलब्धियों से जन-जन को आलोकित कर रहें हैं। इन संगठनों को प्रशिक्षित कार्यकर्ता व नेतृत्व संघ के इन ‘कार्यकर्ता विकास वर्गों’ से ही मिलता है।
सम्पूर्ण राष्ट्र में संघ के विभिन्न संवैचारिक संगठन जैसे अखिल भारतीय साहित्य परिषद्, राष्ट्रीय सेविका समिति, विश्व हिंदू परिषद, भाजपा, बजरंग दल, अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद, राष्ट्रीय सिख संगत, भारतीय मजदूर संघ, हिंदू स्वयंसेवक संघ, हिन्दू विद्यार्थी परिषद, स्वदेशी जागरण मंच, दुर्गा वाहिनी, सेवा भारती, भारतीय किसान संघ, बालगोकुलम, विद्या भारती, भारतीय वनवासी कल्याण आश्रम आदि संगठन कार्यरत है जो एक लाख से अधिक प्रकल्पो को चला रहे है। संघ कार्यकर्ता विकास वर्गों में आने वाले स्वयंसेवक इन्हीं संगठनों के होते हैं।
संघ अपने स्वयंसेवकों के व्यक्तित्व परिष्करण हेतु कुछ दिनों के दीपावली वर्ग, शीत शिविर, शारीरिक वर्गों जैसे कार्यकर्ता विकास वर्ग का आयोजन भी करता है। प्राथमिक वर्ग सात
दिवसीय, इसके पश्चात पंद्रह दिवसीय कार्यकर्ता विकास वर्ग एक, दो, तीन होते हैं। वर्ग एक एवं दो देश में विभिन्न स्थानों पर व वर्ग तीन केवल नागपुर में पच्चीस दिवसीय होता है।
डॉ. प्रवीण दाताराम, 9425002270 guni.pra@gmail.com

