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“विकसित भारत का अमृतकाल”: राष्ट्र के संकल्प और आत्मविश्वास का दस्तावेज

समकालीन भारत के परिवर्तनशील दौर को समझने के लिए लिखी गई डॉ. शिवानी कटारा की पुस्तक “विकसित भारत का अमृतकाल” वर्तमान भारत की विकास-यात्रा का एक सारगर्भित और विचारोत्तेजक दस्तावेज प्रस्तुत करती है। यह कृति केवल सरकारी योजनाओं या उपलब्धियों का उल्लेख भर नहीं करती, बल्कि उन परिवर्तनों के पीछे निहित दृष्टि, राष्ट्रीय चेतना और सामूहिक संकल्प को भी समझने का प्रयास करती है।
यह पुस्तक कुल 134 पृष्ठों में विस्तृत है और इसमें 17 अध्याय सम्मिलित हैं। इन अध्यायों के माध्यम से लेखिका ने भारत के समकालीन विकास, नीतिगत पहलों और सामाजिक परिवर्तन की विभिन्न धाराओं को व्यवस्थित रूप में प्रस्तुत किया है। पुस्तक की संरचना विषयों को क्रमबद्ध ढंग से समझने में सहायक है, जिससे पाठक भारत की विकास यात्रा को व्यापक परिप्रेक्ष्य में देख पाते हैं।
कृति में प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में भारत में हुए विकासात्मक परिवर्तनों, नीतिगत पहलों तथा वैश्विक स्तर पर भारत की बढ़ती प्रतिष्ठा को तथ्यात्मक आधार के साथ प्रस्तुत किया गया है। लेखिका ने कृषि, शिक्षा, विज्ञान, उद्योग, ग्रामीण विकास, महिला सशक्तिकरण तथा सुशासन जैसे विविध क्षेत्रों में हो रहे परिवर्तनों को एक समग्र विकास प्रक्रिया के रूप में देखने की दृष्टि प्रदान की है।
पुस्तक में “अमृतकाल” की अवधारणा को केवल एक नीतिगत शब्द के रूप में नहीं, बल्कि राष्ट्र के आत्मविश्वास, आत्मनिर्भरता और सामूहिक सहभागिता से जुड़े व्यापक सामाजिक परिवर्तन के रूप में प्रस्तुत किया गया है। लेखिका का मत है कि विकसित भारत का निर्माण सरकार के साथ-साथ समाज की सक्रिय भागीदारी से ही संभव है।
भाषा की दृष्टि से यह कृति सरल, संतुलित और विश्लेषणात्मक है, जिससे यह पुस्तक सामान्य पाठकों, विद्यार्थियों और शोधार्थियों सभी के लिए समान रूप से उपयोगी सिद्ध होती है। समग्र रूप से “विकसित भारत का अमृतकाल” समकालीन भारत की विकास-दृष्टि को समझने में सहायक एक महत्वपूर्ण और प्रेरणादायी कृति के रूप में सामने आती है।
पुस्तक: विकसित भारत का अमृतकाल
लेखिका: डॉ. शिवानी कटारा
प्रकाशक: शिल्पायन पब्लिशर्स एंड डिस्ट्रीब्यूटर्स, दिल्ली – 110032
मूल्य: 300 रुपये
समीक्षक ः डॉ. अंकिता पाण्डे, लखनऊ

छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री श्री विष्णुदेव साय ने ममता बनर्जी को कहा, माफी मांगिये

छत्तीसगढ़ के  मुख्यमंत्री श्री विष्णुदेव साय ने पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को पत्र लिख कर उनके द्वारा जनजाति समाज से आने वाली राष्ट्रपति श्रीमती द्रौपदी मुर्मू का अपमान किए जाने पर कड़ा ऐतराज जताया है। उन्होंने सुश्री बनर्जी से माफ़ी मांगने के लिए कहा है।*
सुश्री ममताजी,
आशा है, आप सानंद होंगी।
आपको दूसरी बार बड़े ही दुखी मन से यह पत्र लिख रहा हूं, आशा है कि आप संज्ञान लेंगी। भारत की लोकतांत्रिक परम्पराएं और शिष्टाचार हमेशा से प्रशंसित रहे हैं। यहां मतभेद को कभी भी मनभेद नहीं बनाया गया। हमें इसे अक्षुण्ण रखना चाहिए। जनजाति समाज से आनेवाली भारत की महिला राष्ट्रपति माननीया द्रौपदी मुर्मूजी के साथ पिछले दिनों आपके द्वारा किया गया अपमान इन परंपराओं को तिलांजलि-सा देता महसूस हुआ है, मुझे इसका दु:ख है।
महिला दिवस से ठीक पहले आपके द्वारा किया गया यह व्यवहार अक्षम्य है। विशेषकर आप स्वयं महिला हैं और बावजूद इसके ऐसा किया जाना अत्यधिक पीड़ादायक है। हमें अब तक लगा था कि स्वतंत्र भारत के इतिहास में पहली बार हुई ऐसी दुखद घटना पर आप दु:ख जताएंगी, पर उस घटना के बाद आपकी प्रतिक्रिया ने देश को और अधिक आहत किया है। ऐसा पहली बार हुआ है जब किसी राज्य शासन के विरुद्ध राष्ट्रपतिजी को अपनी व्यथा सार्वजनिक करनी पड़ी है, यह अत्यधिक कष्टकर है। पश्चिम बंगाल, जिसके भद्र लोक की विश्व भर में चर्चा है, यह उस राज्य की छवि को भी काफी नुकसान पहुंचाने वाला है।
अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस से ऐन पहले एक जनजातीय समाज से आनेवाली महिला राष्ट्रपति के प्रवास के दौरान न्यूनतम शिष्टाचार का भी पालन नहीं किया जाना, जनजातीय समाज द्वारा आयोजित कार्यक्रम का स्थान मनमाने ढंग से बदल देना, राष्ट्रपतिजी को मूलभूत सुविधाओं तक से वंचित रखकर आपने संविधान के प्रति निष्ठा की शपथ का भी उल्लंघन किया है। यह अपमान वास्तव में निंदनीय है। यह विशेषकर देश भर के मेरे जैसे करोड़ों आदिवासियों, पिछड़ों और दलितों का अपमान है। मातृशक्ति का भी आपने अपमान किया है।
ममताजी,
इससे पहले भी हमने संदेशखाली कांड पर आपका ध्यान आकृष्ट कराया था, वहां जनजातीय समाज की स्त्रियों के विरुद्ध भी आपकी पार्टी के नेताओं द्वारा अपराध की पराकाष्ठा पार कर दी गयी थी, तब भी आपने मुद्दे पर बात नहीं कर अपनी आदिवासी-वंचित विरोधी मानसिकता का परिचय दिया था। आखिर जनजातीय समाज ने आपका क्या बिगाड़ा है? पश्चिम बंगाल के संथाल समाज समेत सभी निवासियों की प्रदेश के विकास में भागीदारी रही है। आपके द्वारा पश्चिम बंगाल के वंचित समाज से लगातार दुर्व्यवहार किया जा रहा है, यह सर्वथा ही अनुचित है। प्रदेश की जनता इसे कभी भी नहीं भूलेगी।
आपसे आग्रह है कि कृपया सच्चे मन से देश-समाज और राष्ट्रपतिजी से क्षमा मांग कर अपनी भूल स्वीकारें और आगे से हमेशा लोकतांत्रिक संस्थाओं के प्रति अच्छा भाव रखने के प्रति देश को आश्वस्त करें। ऐसा किया जाना आपकी निजी छवि को ठीक करने की दृष्टि से भी उपयोगी रहेगा। आशा है, आप ध्यान देंगी।

संघ की स्थापना का उद्देश्य स्वतंत्रता, समाज, परिवार, संस्कृति और राष्ट्र को दीर्घजीवी सोच के साथ बचाए रखना हैः श्री गुरुमूर्ति

मुंबई। देश के जाने माने अर्थशास्त्री व राष्ट्रवादी चिंतक श्री एस. गुरूमूर्ति को किसी भी विषय पर सुनना एक दुर्लभ, रोमांचक, अध्यात्मिक, प्रेरक व रोमांचकारी अनुभव होता है। वे अपनी बात जिन ऐतिहासिक तथ्यों वसामाजिक साराकारों के साथ रखते हैं तो ऐसा लगता है जैसे उनके व्याख्यान के साथ कोई फिल्म चल रही है।

मुंबई के नेशनल स्टॉक एक्स्चेंज में एएनएमआई (एसोसिएशन ऑफ नेशनल स्टॉक एक्स्चेंज मेंबर ऑफ इंडिया) में श्री एस गुरुमूर्ति ने ‘आरएसएस@100: लॉंग टर्म मिशन इन ए शॉर्ट टर्मिस्ट वर्ल्ड’ पर अपने धाराप्रवाह भाषण में उपस्थित श्रोताओं को जैसे झकझोर दिया। राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ की उपलब्धियों, चिंतन, समर्पण, दूरदृष्टि और सेवाकार्यों को उन्होंने ऐतिहासिक प्रमाणों, तथ्यों और उदाहरणों के साथ इतनी सहजता से प्रस्तुत किया कि कॉर्पोरेट जगत के श्रोता मंत्रमुग्ध होकर उन्हैं सवा घंटे तक लगातार सुनते रहे। उनका भाषण प्रारंभ होते ही एनएसई के पूरे हाल में निस्तब्धता छा गई, मानो कोई भी उनके कहे हुए एक भी शब्द से चूकना नहीं चाहता था।

श्री गुरुमूर्ति ने अपने भाषण का प्रारंभ करते हुए कहा  आप जानते हैं, हम आज एक अल्पकालिक (short-term) दुनिया में जी रहे हैं और हम सब अल्पकालिक मुद्दों में ही उलझे हुए हैं। मेरे पास लगभग 40-50 वर्षों का अनुभव है जिससे मैं देख सकता हूँ कि समाज किस प्रकार बदला है।

आज हम में से किसी के पास समय नहीं है। मुझे याद है जब मैंने अपने पेशे की शुरुआत एक चार्टर्ड अकाउंटेंट के रूप में की थी, तब मेरे कुछ मित्र मेरे कार्यालय में आकर कहते थे—“गुरु, मुझे बोरियत हो रही थी, इसलिए सोचा तुम्हारे साथ थोड़ा समय बिताऊँ।”

 

लेकिन पिछले 25 वर्षों में मैंने यह वाक्य नहीं सुना कि “मुझे बोरियत हो रही है, इसलिए मैं तुम्हारे साथ समय बिताने आया हूँ।”

आज किसी के पास समय नहीं है।
हमारे पास दोस्तों के लिए समय नहीं है।
परिवार के लिए समय नहीं है।
बच्चों के लिए समय नहीं है।
पड़ोसियों के लिए समय नहीं है।

क्योंकि अल्पकालिक लाभ की दौड़ इतनी शक्तिशाली हो गई है कि हमने जीवन की बुनियादी बातों को लगभग खो दिया है।

उन्होंने कहा कि मैं मैं उन ठोस पहलुओं पर ध्यान केंद्रित करूँगा जहाँ हम सभी अल्पकालिक सोच (short-termism) में फँसे हुए हैं।

उन्होंने कहा, आप जानते हैं, आधुनिक अर्थशास्त्र को आकार देने वाले महान अर्थशास्त्रियों में से एक थे लॉर्ड मेनार्ड कीन्स (Lord Maynard Keynes)। आपने उनका नाम अवश्य सुना होगा। वे अर्थशास्त्र के क्षेत्र के सबसे प्रतिभाशाली मस्तिष्कों में से एक थे और उन्होंने भारत की मुद्रा प्रणाली पर भी काम किया था।

लेकिन उनका सबसे बड़ा योगदान तब सामने आया जब वैश्विक अर्थव्यवस्था महामंदी (Great Depression) के दौर से गुजर रही थी। उन्होंने उस समय की प्रचलित आर्थिक सिद्धांत को संशोधित किया। पहले यह माना जाता था कि बाजार हमेशा कुशल होता है और स्वयं ही सब ठीक कर लेगा।

लेकिन कीन्स ने कहा कि बाजार भी थक सकता है

जैसे यदि आप अपने शरीर को रोज़ व्यायाम, अच्छा भोजन और पर्याप्त नींद से स्वस्थ रखते हैं तो वह कुशलता से काम करता है। लेकिन हम हमेशा ऐसा नहीं करते—कभी खराब खाना खाते हैं, कम सोते हैं, व्यायाम नहीं करते—तो शरीर थक जाता है।

ऐसे समय शरीर को एक उत्तेजना (stimulus) की आवश्यकता होती है।

इसी प्रकार कीन्स ने कहा कि जब बाजार थक जाए, तो सरकार को आर्थिक प्रोत्साहन (stimulus) देना चाहिए। उन्होंने कहा कि बाजार लंबी अवधि में स्वयं को सुधार लेगा। लेकिन उन्होंने प्रसिद्ध वाक्य कहा—
लंबी अवधि में तो हम सब मर चुके होंगे।”

यानी केवल दीर्घकालिक सोच पर भरोसा करना पर्याप्त नहीं है।

इसी तरह विकास अर्थशास्त्र में भी अल्पकालिक बनाम दीर्घकालिक सोच का प्रश्न महत्वपूर्ण बन गया।

मुझे एक पुस्तक की प्रस्तावना याद आती है जिसे पंडित जवाहरलाल नेहरू ने 1956 में प्रसिद्ध कवि रामधारी सिंह दिनकर की पुस्तक के लिए लिखा था। दिनकर को “राष्ट्रकवि” कहा जाता था।

नेहरू ने उसमें लिखा कि आर्थिक विकास का अर्थ है अपनी परंपराओं से बाहर निकलना, एक नया समाज, नई अर्थव्यवस्था, नई सोच और नए दृष्टिकोण बनाना।

उन्होंने कहा कि विकास का अर्थ परंपराओं का त्याग करना है।

संयुक्त राष्ट्र ने 1951 में कहा था कि यदि किसी देश को विकास करना है तो उसे अपनी पुरानी दार्शनिकताओं को त्यागना होगा। जाति, पंथ और पुराने सामाजिक संबंधों को तोड़ना होगा।

एक संबंध आधारित समाज (relation-based society) को अनुबंध आधारित समाज (contract-based society) में बदलना होगा।

तभी विकास संभव होगा।

लेकिन नेहरू ने कहा—यदि हम परंपराओं को छोड़ देते हैं, तो हम अपने मूल्यों को भी खो देंगे।

इसलिए हम एक दुविधा में फँसे हैं—
एक ओर विकास की आकांक्षा है,
और दूसरी ओर परंपराओं को बचाए रखने की कठिनाई।

उन्होंने कहा कि इसी कारण समाज में चरित्र का संकट (crisis of character) उत्पन्न हो सकता है।

यही वह महत्वपूर्ण प्रश्न था जो भारत के विकास की नींव रखने वाले एक महान नेता के मन में था।

मैं इसका उल्लेख इसलिए कर रहा हूँ क्योंकि विकास और हमारी जीवन-दृष्टि के बीच एक अंतर्निहित संघर्ष है

इसी पृष्ठभूमि के साथ अब मैं आपको एक नए दृष्टिकोण की ओर ले जाना चाहता हूँ—
अल्पकालिक सोच (Short-termism) और दीर्घकालिक सोच (Long-termism) के बीच के अंतर को समझने के लिए।

लेकिन उससे पहले हमें अपने मन को खाली करना होगा, क्योंकि यदि हमें ऐसी किसी चीज़ को समझना है जो वर्तमान में हो रही चीज़ों से बहुत अलग है, तो हमें अपने मन को खाली करना होगा।

महर्षि अरविंद के जीवन की एक घटना का उल्लेख करते हुए श्री गुरुमूर्ति ने कहा,  अरविंद कोलकाता से पांडिचेरी आए थे। उन्होंने अपने क्रांतिकारी मार्ग को छोड़ दिया था और भारत के लिए एक दीर्घकालिक (long-term) मॉडल बनाने का प्रयास कर रहे थे।

जब वे पांडिचेरी आए, तो वे एक महान बुद्धिजीवी माने जाते थे। इसलिए सभी लोग उनसे उम्मीद कर रहे थे कि वे आगे का मार्ग दिखाएँगे। उस समय 1909 तक भारत का पूरा क्रांतिकारी आंदोलन लगभग समाप्त हो चुका था। 1915 तक लगभग सभी आंदोलन खत्म हो गए थे, जब तक कि महात्मा गांधी ने आकर कांग्रेस को फिर से जीवित नहीं किया।

लगभग दस वर्षों तक देश में एक तरह की शांति और ठहराव था। इसलिए सबकी निगाहें महर्षि अरविंद पर थीं कि वे मार्ग दिखाएँगे।

लेकिन महर्षि अरविंद एक रहस्यमय और पागल से दिखने वाले साधु कुलाचामी को देख रहे थे, जिनके बारे में सुब्रमण्यम भारती ने कविताएँ लिखी थीं। वह व्यक्ति कभी हँसता था, कभी रोता था, कभी सड़क की मिट्टी खा लेता था। लोगों को आश्चर्य था कि ऐसा व्यक्ति अरविंद को क्या मार्गदर्शन देगा। अरविंद के मित्र भी इस पर मुस्कुरा रहे थे। लेकिन अरविंद कहते थे—“वह मुझे रास्ता दिखाएगा।”

एक दिन अरविंद अपने मित्रों के साथ चाय पी रहे थे। तभी कुलाचामी आए और उन्होंने अरविंद के सामने रखा चाय का कप उठाया और उन्हें दिखाया।

कप चाय से भरा हुआ था।
फिर उन्होंने कप को खाली कर दिया और दोबारा दिखाया।

अरविंद ने कहा कि उन्हें वह मार्गदर्शन मिल गया जिसकी उन्हें आवश्यकता थी।

उनके मित्रों ने कहा—“आपकी चाय तो चली गई, लेकिन हमें बताइए कि आपको क्या मार्गदर्शन मिला?”

अरविंद ने कहा—“उन्होंने मुझे कहा है कि अपने मन को खाली करो और फिर से नए सिरे से सोचना शुरू करो।”

आम तौर पर मैं यह बात अपने व्याख्यान के अंत में कहता हूँ, लेकिन इस विषय की प्रकृति ऐसी है कि मैं चाहता हूँ कि आप पहले ही अपने मन को खाली कर लें और नए सिरे से सोचें, ताकि आप समझ सकें कि मैं क्या कहना चाहता हूँ।

 

श्री गुरूमूर्ति ने कहा कि मैं सबसे पहले मैं अल्पकालिक सोच (short-termism) के ठोस पहलुओं को समझाऊँगा। दीर्घकालिक सोच (long-termism) थोड़ी अमूर्त अवधारणा है।

यदि आप यह समझना चाहते हैं कि अल्पकालिक दुनिया में दीर्घकालिक सोच क्या होती है, तो आपने शायद स्कूल में एक उदाहरण पढ़ा होगा—

एक बूढ़ा आदमी आम का पौधा लगा रहा है।
सब जानते हैं कि वह उस पेड़ का फल खुद नहीं खाएगा।
जब आम का पेड़ बड़ा होगा, शायद उसका पोता उसका फल खाएगा।

यही दीर्घकालिक दृष्टिकोण है।

आज हमें इसी दीर्घकालिक दृष्टिकोण और आज के अल्पकालिक दृष्टिकोण के बीच के अंतर को समझना होगा।

भारत एक ऐसा समाज है जिसकी हजारों वर्षों की निरंतरता है और जिसकी वह सांस्कृतिक “डीएनए” आज भी हमारे भीतर मौजूद है।

शायद यही एकमात्र समाज है जो आधुनिकता को अपनाते हुए भी अपनी पारंपरिक अच्छाइयों को खोए बिना आगे बढ़ सकता है।

इसीलिए यह विषय हमारे लिए महत्वपूर्ण है।

इसी कारण मैंने यह विषय चुना—कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) किस प्रकार एक दीर्घकालिक दृष्टि और मिशन का उदाहरण है, और कैसे उसने एक अल्पकालिक सोच वाले समाज में भी अपने दीर्घकालिक लक्ष्य के साथ काम किया और सफलता प्राप्त की।

इसके साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि  उससे पहले मुझे अल्पकालिक सोच के आकर्षण को समझाना होगा।

उदाहरण के लिए, हम अभी नेशनल स्टॉक एक्सचेंज में एकत्रित हुए हैं। मैं अपने जीवन का अधिकांश समय कॉरपोरेट सलाहकार के रूप में काम करता रहा हूँ और आज भी कुछ कंपनियों को सलाह देता हूँ।

मैं 1986-87 से शेयर बाजार का विश्लेषण कर रहा हूँ। उस समय शेयर बाजार में किस तरह हेरफेर होता था, यह भी मेरे अध्ययन का विषय रहा है।

लेकिन समय के साथ बहुत बड़ा बदलाव आया है।

1980 के दशक में जब हम कंपनियों को सलाह देते थे, तो हम 10 साल की दृष्टि से योजना बनाते थे—
10 साल बाद अर्थव्यवस्था कैसी होगी, उद्योग कैसा होगा, कंपनी की स्थिति क्या होगी।

फिर हमारे पास वार्षिक बैलेंस शीट होती थी।
लेकिन बाद में वार्षिक रिपोर्ट घटकर त्रैमासिक परिणाम (quarterly results) तक सीमित हो गई। इस तरह कॉरपोरेट प्रबंधन की सोच ही अल्पकालिक हो गई।

जब डोनाल्ड ट्रम्प 2016 में सत्ता में आए, तब इस विषय पर बहुत चर्चा हुई। इंद्रा नूयी ने उनसे मुलाकात की और यहाँ तक सुझाव दिया गया कि त्रैमासिक परिणामों को ही बंद कर देना चाहिए, क्योंकि इससे शेयर बाजार में भारी हेरफेर होने लगा है।

इस तरह हमारी दृष्टि लगातार छोटी होती जा रही है।

पहले हम शेयरों में निवेश करते थे, फिर इंडेक्स ट्रेडिंग आई और फिर डेरिवेटिव्स आए।

यह भी एक प्रकार की गिरावट है। क्योंकि शेयर वास्तव में कंपनी और शेयरधारक के बीच संबंध का प्रतीक होता है। लेकिन जब इंडेक्स ट्रेडिंग आई तो शेयरधारक और कंपनी के बीच दूरी बढ़ गई। और डेरिवेटिव्स के आने से यह दूरी और बढ़ गई।

अब स्थिति यह हो गई है कि मालिकाना (ownership) की अवधारणा ही लगभग समाप्त हो गई है। भारत में अभी भी कंपनियों में “प्रमोटर” की अवधारणा है। लेकिन हम अमेरिका के प्रमोटर-रहित कॉरपोरेट मॉडल के आधार पर भारतीय कंपनियों का मूल्यांकन करते हैं।

भारत में 97% कंपनियाँ परिवार के स्वामित्व और प्रबंधन में हैं। इसलिए उनमें अभी भी दीर्घकालिक दृष्टि मौजूद है, क्योंकि परिवार का दृष्टिकोण लंबा होता है।

लेकिन हम पश्चिम के अल्पकालिक मॉडल का अनुसरण कर रहे हैं।

उन्होंने कहा कि हमारे देश में पहले ब्याज दरें वार्षिक आधार पर तय होती थीं। फिर वे त्रैमासिक हो गईं। अब तो ओवरनाइट ब्याज दरें ही पूरे राष्ट्र का माहौल तय कर देती हैं। यह भी अल्पकालिक सोच का उदाहरण है।

यहाँ तक कि इंट्राडे ट्रेडिंग—यानी एक ही दिन के छह घंटों में होने वाले उतार-चढ़ाव—भी लोगों की चिंता का कारण बन जाते हैं। इस प्रकार अल्पकालिक सोच हमें नियंत्रित कर रही है।

श्री गुरूमूर्ति ने कहा कि बहुत कम लोगों ने यह चर्चा की है कि 2008 की वैश्विक आर्थिक मंदी क्यों आई। अमेरिका की फेडरल डिपॉजिट इंश्योरेंस कॉर्पोरेशन की अध्यक्ष शीला ब्लेयर ने इस संकट के कारणों पर एक भाषण दिया।

उन्होंने कहा कि इस संकट का सबसे बड़ा कारण अल्पकालिक सोच थी।

अल्पकालिक सोच व्यापार और सरकार—दोनों में एक गंभीर और बढ़ती हुई समस्या बन चुकी है।

आज लगभग सभी लोकतांत्रिक सरकारें अल्पकालिक सोच में फँसी हुई हैं।

लोकतंत्र में सबसे बड़ा लक्ष्य यह हो जाता है कि मतदाताओं को कैसे आकर्षित किया जाए।

यह केवल भारत की समस्या नहीं है।

उदाहरण के लिए, अमेरिका की सोशल सिक्योरिटी प्रणाली—जो आज उसकी अर्थव्यवस्था को कमजोर कर रही है—भी इसी अल्पकालिक राजनीति का परिणाम है।

राजनेताओं ने लोगों से कहा—“आप अपने परिवार की चिंता मत करें, हम आपकी देखभाल करेंगे।” और इसी तरह सार्वभौमिक सामाजिक सुरक्षा प्रणाली शुरू हुई, जो आज अमेरिकी अर्थव्यवस्था पर भारी बोझ बन चुकी है।

उन्होंने कहा कि  लोकतंत्र में लगभग हर जगह यही स्थिति है।

लेकिन चीन एक अलग उदाहरण है। देंग शियाओपिंग ने कहा था—“अपनी क्षमता छिपाओ और समय का इंतज़ार करो।” चीन ने 30 वर्षों तक दीर्घकालिक दृष्टि के साथ काम किया। इसका मतलब यह है कि अल्पकालिक दुनिया में भी कुछ लोग दीर्घकालिक दृष्टि अपनाते हैं।

लेकिन भारत में हमने शायद ही कभी यह स्पष्ट रूप से चर्चा की है कि दीर्घकालिक और अल्पकालिक सोच के बीच सीमा कहाँ है।

उन्होंने बताया कि BBC के मैनेजिंग एडिटर रिचर्ड फिशर ने “Perils of Short-termism” नाम से एक लेख लिखा है। उसमें वे एक समाजशास्त्री का उद्धरण देते हुए कहते हैः

यदि मनुष्य हमेशा वर्तमान से जूझते-जूझते मानसिक रूप से थक जाता है, तो उसके पास भविष्य की कल्पना करने की ऊर्जा ही नहीं बचती।

यही अल्पकालिक सोच का सबसे बड़ा खतरा है।

यह हमारी अर्थव्यवस्था, राजनीति और पूरे सामाजिक जीवन को प्रभावित कर रहा है।

 

उन्होंने कहा कि मैं आपको स्वतंत्रता से पहले के भारत की ओर ले चलता हूँ। हम पर 200-300 वर्षों तक विदेशी शासन रहा। उस समय स्वतंत्रता प्राप्त करने के लिए तीन प्रकार के प्रयास हुए।

पहला था क्रांतिकारियों का प्रयास।

वे तुरंत स्वतंत्रता चाहते थे।
उन्होंने हिंसा का रास्ता अपनाया।

वे सभी महान देशभक्त थे।
उन्होंने अपने बारे में कभी नहीं सोचा, केवल देश के बारे में सोचा।

लेकिन उनका दृष्टिकोण अल्पकालिक था।

इसलिए वह आंदोलन सफल नहीं हुआ, क्योंकि वह जनता के बीच गहराई से जुड़ा नहीं था।

क्रांतिकारी समाज से अलग रहकर काम करते थे।

दूसरा प्रयास था राजनीतिक आंदोलन, जिसे पहले बाल गंगाधर तिलक ने आगे बढ़ाया और बाद में महात्मा गांधी ने नेतृत्व किया।

यह एक मध्यम अवधि का दृष्टिकोण था—
स्वतंत्रता प्राप्त करना और उसके लिए संगठित तरीके से संघर्ष करना।

राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के संस्थापक डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार, इन दोनों आंदोलनों में शामिल रहे। उन्होंने पहले क्रांतिकारी आंदोलन में भाग लिया। उन्होंने नागपुर में पढ़ाई की और फिर क्रांतिकारी गतिविधियों में शामिल होने के लिए कोलकाता गए।

लेकिन उन्होंने देखा कि क्रांतिकारी आंदोलन की सबसे बड़ी कमजोरी यह है कि वह समाज से जुड़ा नहीं है। फिर उन्होंने कांग्रेस के राजनीतिक आंदोलन में भाग लिया।

1921 में वे सत्याग्रह के कारण एक वर्ष के लिए जेल गए। 1930 में वे फिर जेल गए।

जब वे जेल से बाहर आए तो उनका स्वागत हुआ और उस सभा की अध्यक्षता मोतीलाल नेहरू ने की।

लेकिन डॉ. हेडगेवार के मन में एक प्रश्न लगातार उठ रहा था—

स्वतंत्रता तो मिल जाएगी, लेकिन उसे बनाए कैसे रखेंगे?

समाज में वह ऊर्जा, वह राष्ट्रीय भावना, वह ईमानदारी और वह समर्पण कैसे पैदा होगा जो केवल नारों से नहीं आता?

उसके लिए लोगों को तैयार करना होगा।

इसलिए उन्हें लगा कि कांग्रेस आंदोलन में कुछ गंभीर कमी है। इसके पीछे उस समय का जो सामाजिक-राजनीतिक माहौल था, उसका कारण मैं आपको बताने जा रहा हूँ।

दरअसल 1919 में ऑटोमन साम्राज्य (Ottoman Empire) का पतन हो गया। यह लगभग 800 वर्षों तक चलने वाला एक इस्लामी साम्राज्य था, जिसने बीजान्टिन साम्राज्य के बाद सत्ता संभाली थी और विश्व के बड़े हिस्से पर शासन किया था। पहले विश्व युद्ध में हार के बाद यह साम्राज्य टूट गया।

इसके बाद भारत के मुसलमानों में बहुत असंतोष फैल गया, क्योंकि ऑटोमन साम्राज्य एक तुर्की इस्लामी साम्राज्य था। भारत के मुसलमान इसके पतन के विरोध में आंदोलन करने लगे। यदि वे केवल आंदोलन करते, तो ब्रिटिश सरकार उससे निपट लेती।

लेकिन एक ऐतिहासिक गलती तब हुई जब महात्मा गांधी ने यह निर्णय लिया कि मुसलमानों को स्वतंत्रता आंदोलन में शामिल करने के लिए कांग्रेस को खिलाफत आंदोलन का समर्थन करना चाहिए। इससे भारत के मुसलमानों का ध्यान भारत से बाहर की ओर जाने लगा। वे प्रेरणा भारत के भीतर से नहीं बल्कि वैश्विक इस्लाम से लेने लगे।

यही पहली बात थी जो डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार ने नोटिस की। उन्होंने देखा कि राजनीतिक आंदोलन अक्सर देश के दीर्घकालिक हितों के बजाय तत्काल राजनीतिक लाभ के आधार पर निर्णय लेते हैं।

उस समय बाल गंगाधर तिलक का जुलाई 1919 में निधन हो गया था।
1919 के अंत में नागपुर में कांग्रेस का अधिवेशन होने वाला था और माना जा रहा था कि महात्मा गांधी अब कांग्रेस के नेता बनेंगे।

डॉ. हेडगेवार को लगा कि मुसलमानों को आंदोलन में शामिल करने के लिए उनकी सोच को भारत से बाहर की ओर मोड़ना भारत के लिए खतरनाक होगा।

वे कांग्रेस के कार्यकर्ता थे। इसलिए वे डॉ. बी.एस. मुंजे के साथ पांडिचेरी गए और महर्षि अरविंद से अनुरोध किया कि वे फिर से राजनीति में लौट आएँ।

उन्होंने कहा कि तिलक की मृत्यु के बाद नेतृत्व में खालीपन आ गया है और नया नेतृत्व अल्पकालिक लाभ के लिए मुसलमानों को इस तरह शामिल कर रहा है, जिससे भविष्य में देश को नुकसान हो सकता है।

लेकिन अरविंद ने कहा: “मेरा मन अब राजनीति से हट चुका है। मैं भी एक दीर्घकालिक कार्य पर काम कर रहा हूँ, लेकिन मेरे लिए राजनीति में लौटना संभव नहीं है।”

इसके बाद डॉ. हेडगेवार वापस लौट आए। उन्होंने न तो राजनीति छोड़ी और न ही कांग्रेस आंदोलन। 1921 में वे स्वतंत्रता आंदोलन में भाग लेने के कारण जेल भी गए। क्योंकि उनका मानना था कि स्वतंत्रता प्राप्त करने के लिए राजनीतिक आंदोलन आवश्यक है।

लेकिन उनके मन में यह स्पष्ट था कि यह केवल अल्पकालिक लक्ष्य है। भारत को स्वतंत्रता मिलना तय है। ब्रिटिश लंबे समय तक स्वतंत्रता को रोक नहीं पाएँगे।

लेकिन सवाल यह था—स्वतंत्रता मिलने के बाद उसे बनाए कैसे रखा जाएगा?

उन्होंने इतिहास की ओर देखा। तीसरी शताब्दी ईसा पूर्व से लेकर लगभग नौवीं शताब्दी तक भारत एक शक्तिशाली साम्राज्य था। अफगानिस्तान से लेकर श्रीलंका और बर्मा तक भारत का प्रभाव था। मौर्यगुप्त और कुषाण जैसे साम्राज्य थे। फिर भी हम अपनी स्वतंत्रता खो बैठे।

क्यों? क्योंकि हमारे भीतर एकता की कमी थीसाहस की कमी थी, और पूरे देश को एक मानकर काम करने की भावना कमजोर थी। लोग छोटे-छोटे क्षेत्रों और हितों में बँट गए थे।

हालाँकि भारत की जीवनशैली, संस्कृति और दर्शन पूरे देश में समान थे। लोग देश के एक कोने से दूसरे कोने तक यात्रा करते थे।

महात्मा गांधी ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक हिंद स्वराज” में इस बात को समझाया है।

उन्होंने यह पुस्तक तब लिखी थी जब वे केप टाउन से लंदन जा रहे थे।
उन्होंने इसे गुजराती में लिखा और अत्यंत तेजी से लिखा—इतना कि जब उनका दाहिना हाथ थक गया तो उन्होंने बाएँ हाथ से लिखना शुरू कर दिया। इस पुस्तक में गांधीजी ने उस समय भारतीयों के मन में उठने वाले सवालों का उत्तर दिया।

लोग कहते थे:

  • केवल अंग्रेजों की वजह से हम विकसित हो सकते हैं
  • तकनीक उन्हीं के पास है
  • हम बिखरा हुआ समाज थे, उन्होंने हमें एक राष्ट्र बनाया
  • रेल और डाक व्यवस्था ने हमें जोड़ा

गांधीजी ने इन सभी सवालों का जवाब संवाद के रूप में दिया।
पुस्तक में “पाठक” सवाल पूछता है और “संपादक” जवाब देता है—और दोनों ही भूमिकाएँ गांधीजी निभाते हैं।

एक सवाल पूछा जाता है:
हम कैसे कह सकते हैं कि हम एक राष्ट्र हैं?

गांधीजी जवाब देते हैं: हमारे तीर्थस्थान, हमारी नदियाँ और पवित्र स्थल लोगों को देश के एक कोने से दूसरे कोने तक यात्रा करने के लिए प्रेरित करते थे।

इस तरह हमारी सांस्कृतिक परंपरा ने हमें एक राष्ट्र बनाया।

उन्होंने कहा: अंग्रेजों को राज्य (state) ने जोड़ा है, लेकिन भारत को संस्कृति ने जोड़ा है।भारत में विविधता भी है और गहरी एकता भी। दुनिया में शायद ही कोई देश ऐसा हो जहाँ इतनी विविधता और इतनी एकता दोनों साथ-साथ मौजूद हों।

लेकिन फिर भी यह देश कमजोर कैसे हो गया?

इस पर कार्य किया डॉ. हेडगेवार ने।

डॉ. हेडगेवार ने सोचा कि हमें

चरित्र निर्माण करना होगा
एकता पैदा करनी होगी
मजबूत और समर्पित व्यक्तियों का निर्माण करना होगा

यह केवल नारों या प्रचार से संभव नहीं है। यह केवल व्यक्ति-से-व्यक्ति संपर्क से ही हो सकता है। इसके लिए एक ऐसी पद्धति, एक मिशन और एक व्यवस्था चाहिए जो लगातार लोगों को जोड़ती रहे और शिक्षा का एक सतत प्रक्रिया चलाती रहे।

इसी विचार से उन्होंने “शाखा” की शुरुआत की।1925 में विजयादशमी के दिन उन्होंने केवल पाँच लोगों के साथ इसकी शुरुआत की।

उनके पास

पैसा नहीं था
प्रभाव नहीं था
कोई बड़ा संपर्क नहीं था

फिर भी उन्होंने कहा:
“यह हिंदू राष्ट्र है और हम पूरे देश को एक करेंगे।”

उस समय जब महात्मा गांधी के नेतृत्व में एक विशाल स्वतंत्रता आंदोलन चल रहा था, तब पाँच लोगों के साथ इतना बड़ा लक्ष्य सोचना किसी पागलपन जैसा लगता था।

लेकिन डॉ. हेडगेवार ने तय कर लिया था कि यही रास्ता है।

यह लंबा रास्ता है—
कोई शॉर्टकट नहीं है,
कोई तात्कालिक तरीका नहीं है।

वे स्कूलों में जाते थे और प्रतिभाशाली बच्चों को पहचानते थे—
जो अच्छा गाते थे, अच्छा खेलते थे, अच्छा बोलते थे।

फिर वे उनसे संपर्क करते थे और उनके परिवारों से कहते थे कि बच्चों को पढ़ाई के लिए अलग-अलग शहरों में भेजें—जैसे मुंबई, लखनऊ, कोलकाता, चेन्नई।

उनका उद्देश्य था कि वहाँ RSS की शाखाएँ शुरू हों।

इस तरह बिना पैसे के केवल शाखाओं के माध्यम से संगठन फैलने लगा।

इसका आधार था-भारत माता के प्रति समर्पण की भावना।

उन्होंने कहा: भारत सांस्कृतिक रूप से हिंदू है, हालाँकि धार्मिक और भाषाई रूप से इसमें विविधता है।जब डॉ. हेडगेवार ने 1925 में यह बात कही तो बहुत लोगों ने विश्वास नहीं किया।

लेकिन 1995-96 में सुप्रीम कोर्ट के “हिंदुत्व” संबंधी फैसले में कहा गया कि हिंदुत्व केवल धर्म नहीं है, बल्कि भारत की संस्कृति और जीवन-पद्धति है।

डॉ. हेडगेवार धीरे-धीरे युवाओं को जोड़ते रहे—16, 17, 18, 20 वर्ष के युवा।

1940 तक उन्होंने बिना पैसे के एक ऐसा संगठन बना दिया जो पूरे देश से जुड़ा हुआ था।

उन्होंने यह भी तय किया कि संगठन को कोई व्यक्ति पैसे से नियंत्रित न कर सके।

जब पंडित मदन मोहन मालवीय ने उनसे पूछा कि RSS बनाने के लिए कितना पैसा चाहिए, तो उन्होंने कहा: “मुझे पैसा नहीं चाहिए, मुझे लोग चाहिए।”

आज भी RSS की पूरी व्यवस्था गुरु दक्षिणा के छोटे-छोटे योगदान से चलती है।

कोई भी व्यक्ति चेक देकर RSS को खरीद नहीं सकता।
आप BJP या कांग्रेस को दान दे सकते हैं, लेकिन RSS को नहीं।

यह संगठन बाहरी प्रभावों से बचाने के लिए बनाया गया था।

श्री गुरूमूर्ति ने कहा कि डॉ. हेडगेवार हमेशा प्रतिभाशाली लोगों की तलाश में रहते थे।

उन्हें पता चला कि काशी हिंदू विश्वविद्यालय में एक अत्यंत प्रतिभाशाली व्यक्ति हैं—एम.एस. गोलवलकर। वे उन्हें RSS में लाना चाहते थे। जबकि गोलवलकर संन्यासी बनना चाहते थे और रामकृष्ण मिशन के स्वामी अखंडानंद के संपर्क में थे। लेकिन स्वामी अखंडानंद ने उनसे कहा कि उनका जीवन एक बड़े मिशन के लिए बना है। इसके बाद डॉ. हेडगेवार ने उन्हें RSS में शामिल किया।

डॉ. हेडगेवार स्वयं महान वक्ता नहीं थे, लेकिन उनमें एक चुंबकीय व्यक्तित्व था।

एक घटना का उल्लेख करते हुए श्री गुरुमूर्ति ने कहा, एक बार उन्हें नागपुर में सुबह 7 बजे एक कार्यक्रम में पहुँचना था। रात में बस खराब हो गई। उन्होंने पूरी रात 30 किलोमीटर पैदल चलकर सुबह 7 बजे कार्यक्रम में पहुँचकर भाग लिया।

इससे उनकी निष्ठा, समयपालन और विश्वसनीयता स्पष्ट होती है।

उन्होंने RSS में गुरु के रूप में किसी व्यक्ति को नहीं रखा। उन्होंने कहा कि व्यक्ति में कमियाँ हो सकती हैं। इसलिए उन्होंने भगवा ध्वज को RSS का गुरु बनाया—जो त्याग और आदर्श का प्रतीक है।

उनकी दृष्टि बहुत दूर की थी। वे जानते थे कि स्वतंत्रता आंदोलन अंत नहीं है।

स्वतंत्रता केवल एक साधन है। उसके बाद भी राष्ट्र को मजबूत बनाने का काम जारी रहना चाहिए।

डॉ. गोलवलकर ने सोचा कि इन सभी अल्पकालिक दृष्टिकोणों ने भारत के अंदर और बाहर दोनों जगह बड़ी चुनौतियाँ पैदा कर दीं। इसलिए RSS ने तय किया कि उसे इन सभी चुनौतियों का सामना करना होगा।

जो लोग 1920 और 1930 के दशक में RSS में काम कर रहे थे, क्या उन्होंने कभी सोचा था कि एक दिन यह देश इस स्थिति में पहुँचेगा? उन्होंने केवल काम किया।  डॉ. हेडगेवार को इस बात का विश्वास था कि यह देश महान बनेगा और यह संगठन उस लक्ष्य को प्राप्त करेगा। भले ही यह मेरे जीवनकाल में न हो, लेकिन एक दिन यह अवश्य होगा।

इसी विश्वास के साथ पीढ़ी दर पीढ़ी हजारों-हजार RSS कार्यकर्ता काम करते रहे।

 श्री गुरूमूर्ति ने अपना अनुभव बताते हुए कहा,  आपातकाल (Emergency) के समय हम सभी भूमिगत होकर काम कर रहे थे। मैं भी भूमिगत रहा। उस समय जिन कार्यकर्ताओं ने मेरे साथ काम किया, उनमें से कुछ के बारे में मैंने ऑर्गेनाइज़र में लिखा भी है।

आज भी उनमें से कई लोग साइकिल से ही चलते हैं।
कुछ लोग मोटरसाइकिल से जाते हैं।

उन्होंने कभी यह नहीं कहा कि हमने देश के लिए काम किया है और अब जब BJP सत्ता में आ गई है, तो हमें भी उसका कुछ लाभ मिलना चाहिए।

यह RSS की सोच नहीं है। यह दीर्घकालिक दृष्टि है—आपका काम है भारत का निर्माण करना, भारत को महान और शक्तिशाली बनाना।

उन्होंने कहा कि मुझे यहाँ भारतीय रिज़र्व बैंक के स्वतंत्र निदेशक के रूप में परिचित कराया गया। यह एक ऐसा पद था जिसे मैं वास्तव में स्वीकार नहीं करना चाहता था।

लेकिन 2017 की परिस्थितियों के कारण मुझ पर बहुत दबाव डाला गया और मुझे इसे स्वीकार करना पड़ा।

मेरे गुरु कांची के महा स्वामी ने मुझे कहा था कि मुझे कभी सरकारी पद नहीं लेना चाहिए।

हम सभी को इसी प्रकार प्रशिक्षित किया गया है—
आपका काम केवल सेवा करना है।
आपको केवल यह देखना है कि देश महान बने।

उस मिशन के फलों का आनंद लेने के लिए आप नहीं हैं।

यही  भगवद गीता के कर्मयोग का वास्तविक अर्थ है।

श्री गुरूमूर्ति ने कहा कि RSS ने अपने जीवन में बहुत बड़ी-बड़ी चुनौतियों का सामना किया।

देश का विभाजन (Partition) हुआ। लाखों-करोड़ों हिंदू मारे गए। उन लोगों को सुरक्षित स्थानों तक पहुँचाना, उनकी सेवा करना, उन्हें रहने की व्यवस्था देना—यह सब काम स्वयंसेवकों ने किया। उस समय सरकार कमजोर थी और उसके पास पर्याप्त संसाधन भी नहीं थे।

यदि आप उस समय के साहित्य को पढ़ें, तो रात में नींद नहीं आएगी।

इसके बावजूद RSS पर महात्मा गांधी की हत्या का आरोप लगाकर प्रतिबंध लगा दिया गया।

बाद में कपूर आयोग (Justice Kapoor Commission) ने स्पष्ट कहा कि RSS का गांधी हत्या से कोई संबंध नहीं है।

लेकिन आज भी राहुल गांधी जैसे नेता यह कहते हैं कि गांधी हत्या के लिए RSS जिम्मेदार है।

जबकि अदालत की चार्जशीट और पूरी जांच में साफ लिखा है कि RSS का इससे कोई संबंध नहीं था। फिर भी आज तक उस पर आरोप लगाए जाते हैं।

इतनी आलोचना, प्रतिबंध और आरोपों के बावजूद RSS चुपचाप अपना काम करता रहा।

यह मातृभूमि की सेवा का मिशन है।

दरअसल इसे सेवा भी नहीं कहा जाता।

1971 के युद्ध के बाद किसी व्यक्ति ने RSS स्वयंसेवकों की सेवा पर एक किताब लिखी और वह किताब गुरुजी गोलवलकर को दिखाई।

गुरुजी ने वह किताब फेंक दी और कहा: “तुमने अपनी माँ की सेवा की है और उस पर किताब लिखना चाहते हो?
क्या यह तुम्हारा कर्तव्य नहीं है?”

यही RSS का दृष्टिकोण है।

RSS को बहुत कठिन परिस्थितियों का सामना करना पड़ा—
प्रतिबंध, विरोध, आलोचना।

जवाहरलाल नेहरू ने एक बार कहा था कि “मैं इस देश में भगवा झंडे को एक इंच जमीन भी नहीं दूँगा।”

लेकिन आज भगवा ध्वज पूरे देश में लहराता है।

उस समय 90,000 स्वयंसेवक जेल गए। उनमें से 40,000 युवा थे जिन्होंने अपनी पढ़ाई और परीक्षाएँ तक छोड़ दीं। सरकार को उन्हें बाद में परीक्षा देने के लिए विशेष अनुमति देनी पड़ी।

उस समय RSS एक युवा संगठन था। गोलवलकर जी केवल 37 वर्ष के थे और वे देश के सबसे बड़े नेताओं का सामना कर रहे थे। फिर भी संगठन बढ़ता गया।

क्यों? क्योंकि उसमें

  • ईमानदारी
  • समर्पण
  • देशभक्ति
  • सादगी
  • मूल्य

ये सब मौजूद थे।

1990 के दशक तक चेन्नई में RSS कार्यालय में मैंने कभी कार नहीं देखी।

जब गुरुजी गोलवलकर 1973 में चेन्नई आए, तो उन्हें एयरपोर्ट से कार्यालय तक साधारण टैक्सी में लाया गया। सबसे बड़ा साधन मोटरसाइकिल था, और अधिकांश लोग साइकिल से यात्रा करते थे।

1991 के चुनाव का एक उदाहरण देते हुए श्री गुरूमूर्ति ने कहा कि एक उम्मीदवार ने अपने रिश्तेदार से पूछा कि चुनाव लड़ने में कितना पैसा लगेगा।

उसने कहा— कम से कम 30-40 लाख रुपये।

लेकिन जब वह BJP के कार्यकर्ताओं की बैठक में गया, तो उसने देखा कि वहाँ 800-900 साइकिलें खड़ी थीं। सब कार्यकर्ता अपने घर से खाना लेकर आए थे और उन्हें केवल एक कप चाय दी गई थी।

जब उसने पूछा कि चुनाव में कितना खर्च होगा, तो उत्तर मिला—
लगभग 8 लाख रुपये।

यही वह आधार है जिस पर राष्ट्र बनते हैं।

1975 में जब आपातकाल लगा, तब इंदिरा गांधी ने RSS और लोकतंत्र दोनों को दबाने की कोशिश की।

सभी नेताओं को जेल में डाल दिया गया।

लेकिन RSS ने भूमिगत रहकर पर्चों और संदेशों के माध्यम से सच्ची खबरें फैलाना शुरू किया

देश में एक ऐसा वातावरण बन गया कि अंततः 1977 में सत्ता बदल गई।

इसके बाद राम जन्मभूमि आंदोलन आया।

उसने यह विचार स्थापित किया कि भारत मूल रूप से एक दार्शनिक रूप से हिंदू देश है।

यह कोई विचारधारा (ideology) नहीं है।

क्योंकि विचारधारा कहती है—
“मैं सही हूँ और तुम गलत हो।”

लेकिन हिंदू दर्शन कहता है—
“मैं सही हो सकता हूँ, और शायद तुम भी सही हो।”

यह दृष्टिकोण दुनिया में कहीं और नहीं मिलता।

आज भी हम वैश्विक स्तर पर कई शक्तियों और विरोधों का सामना कर रहे हैं।

लेकिन हमारे पास एक चीज़ है—
समर्पण

  • भारत माता के प्रति समर्पण
  • अपने पूर्वजों के प्रति समर्पण
  • अपनी संस्कृति और परंपरा के प्रति समर्पण

इसी समर्पण के कारण हजारों-हजार कार्यकर्ताओं ने अपना जीवन समर्पित कर दिया।

कई परिवारों ने कठिनाइयाँ झेली, लेकिन उन्हें विश्वास था कि एक दिन यह देश महान बनेगा।

आज हम उस परिणाम को देख रहे हैं।

राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ का 100 वर्षों का यह कार्य दुनिया के समाजशास्त्रियों के लिए अध्ययन का विषय होना चाहिए।

दुनिया में शायद ही कहीं ऐसा उदाहरण मिलेगा।

आज पूरे भारत में एक लाख से अधिक एकल शिक्षक विद्यालय चल रहे हैं।

एक व्यक्ति ही शिक्षक, मार्गदर्शक और समाजसेवक की भूमिका निभाता है।

वह बच्चों को पढ़ाता है, स्वच्छता सिखाता है, चरित्र निर्माण करता है।

इसके अलावा संघ के माध्यम से  लगभग लाख सामाजिक और सेवा गतिविधियाँ चल रही हैं।

यह सब लोगों के चरित्र, मूल्य और समर्पण को विकसित करके किया गया है।

आज की दुनिया अल्पकालिक परिणाम चाहती है—
“कल ही परिणाम मिलना चाहिए।”लेकिन RSS कहता है— “परिणाम 100 साल बाद भी आएँ तो भी चलेगा, लेकिन परिणाम स्थायी होना चाहिए।”

राजनीतिक दल आते-जाते रहते हैं। सरकारें बनती और टूटती रहती हैं।

लेकिन राष्ट्र बना रहना चाहिए। यही RSS का मिशन है।

श्री गुरूमूर्ति ने इस प्रेरक और धारदार वक्तव्य के बाद श्रोताओं के सवालों के जवाब भी दिए।

पहला प्रश्न था:

“पिछले एक सदी में RSS जैसे संगठनों ने जमीनी स्तर पर काम किया है। किसी देश की आर्थिक वृद्धि और वित्तीय समावेशन को मजबूत करने में सामाजिक पूंजी (Social Capital) और समुदाय की भागीदारी कितनी महत्वपूर्ण है?”

इस पर श्री गुरूमूर्ति ने कहा कि सामाजिक पूंजी का विचार 1990 के दशक में प्रमुख रूप से सामने आया। प्रसिद्ध विचारक फ्रांसिस फुकुयामा ने “Trust” नामक पुस्तक में इस अवधारणा पर विस्तार से लिखा।

सामाजिक पूंजी (Social Capital) समाज की संपत्ति होती है।
वित्तीय पूंजी (Financial capital) आपकी व्यक्तिगत संपत्ति होती है।
बौद्धिक पूंजी (Intellectual capital) भी आपकी व्यक्तिगत होती है।
लेकिन सामाजिक पूंजी पूरे समाज की होती है

समाज कैसे काम करता है—यह पूरे भारतीय इतिहास, अर्थव्यवस्था और राजनीति में सामाजिक पूंजी के माध्यम से दिखाई देता है।

इसी कारण भारत लगभग 1700 वर्षों तक दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था रहा।

अधिकांश लोगों को यह भी नहीं पता कि Paul Bairoch और Angus Maddison के शोध के अनुसार ईसा की पहली शताब्दी से लेकर 17वीं शताब्दी तक भारत दुनिया की प्रमुख आर्थिक शक्ति था

1934 की Bank for International Settlements की रिपोर्ट के अनुसार 14वीं से 19वीं शताब्दी के बीच दुनिया में जितना सोना पैदा हुआ, उसका लगभग 15% भारत के निर्यात अधिशेष (export surplus) के रूप में आया था।

इतिहास बताता है कि पहली शताब्दी में ही भारत ने इतना सोना एकत्र कर लिया था।

ग्रीक-मिस्री इतिहास में लिखा है कि प्लिनी (Pliny) जो ग्रीक-रोमन साम्राज्य के वित्त मंत्री थे, उन्होंने कहा था:

“भारतीय हमारा सोना लूट रहे हैं। मुझे हर जगह केवल भारतीय जहाज ही दिखाई देते हैं।”

यह सब सामाजिक पूंजी की वजह से संभव हुआ था।

 

श्री गुरूमूर्ति ने कहा, मैंने इसे अपनी आँखों से भी देखा जब मैंने वैश्वीकरण (Globalization) के समय भारतीय समाज और अर्थव्यवस्था की ताकत का अध्ययन करने के लिए यात्रा शुरू की।

जब वैश्वीकरण आया, तो जिन व्यापारियों को मैं सलाह देता था, वे पूछते थे:
“यह एक नया जानवर है, इससे कैसे मुकाबला करें?”

उस समय केवल रतन टाटा ने सकारात्मक बात कही।
उन्होंने मुझसे कहा: “गुरु, हमें लगभग 30 साल इंतजार करना होगा, तब हम इसे पार कर पाएँगे। फिलहाल हमें धैर्य रखना होगा।”

उन्होंने कहा, मैं लुधियाना, बटाला, राजकोट जैसे शहरों में गया। मुझे मुंबई और कोलकाता में आत्मविश्वास की कमी दिखी, लेकिन इन औद्योगिक क्लस्टरों में जबरदस्त आत्मविश्वास दिखाई दिया।

जब मैं जालंधर गया, तो मैं एक RSS नेता के घर ठहरा।
उन्होंने कहा: “सर, क्या आप मेरे क्रिकेट बैट के कारखाने को देखना चाहेंगे?”

मैं वहाँ गया। उन्होंने कहा: “पूरा ऑस्ट्रेलियाई क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड अपना ऑर्डर मुझे देता है।”

1994 में उस ऑर्डर की सालाना कीमत लगभग करोड़ रुपये थी।

उन्होंने मुझे एक बढ़ई दिखाया और कहा: “देखिए, यह बढ़ई अपने मूड के अनुसार रोज़ 20, 30 या 40 बल्ले बना लेता है।”

और बाहर उसकी मारुति कार खड़ी थी।
उस समय मारुति कार होना बहुत बड़ी बात थी।

जालंधर में एक बढ़ई के पास मारुति कार देखकर मैं आश्चर्यचकित हो गया।

मैंने इन औद्योगिक क्षेत्रों में कड़ी मेहनत और समृद्धि देखी।

यह सब इसलिए संभव था क्योंकि यह समुदाय-आधारित (community-driven) व्यवस्था थी।

 

उन्होंने  कहा कि मैंने इस पूरी बात को एक सिद्धांत के रूप में प्रस्तुत किया और अटल बिहारी वाजपेयी को बताया।

उसके बाद उनकी सरकार ने Industrial Cluster Policy बनाई।

श्री गुरूमूर्ति ने कहा कि RSS वास्तव में सामाजिक पूंजी की रक्षा करने की कोशिश कर रहा है

अमेरिका और पश्चिमी देशों ने अपनी सामाजिक पूंजी को नष्ट कर दिया है।

सामाजिक पूंजी की नींव होती है:

  • परिवार
  • समुदाय
  • संबंध आधारित समाज

इसलिए भारत की सामाजिक पूंजी मजबूत है और RSS उसे और मजबूत करने का प्रयास कर रहा है।

 

जब उनसे पूछा गया कि आज के युवाओं को RSS से क्या सीखना चाहिए?

उन्होंने कहा, हमारा जीवन केवल साधारण जीवन जीने के लिए नहीं है। सिर्फ पैसा कमाना और जीवन का आनंद लेना ही जीवन का उद्देश्य नहीं होना चाहिए। यह सब होना चाहिए, लेकिन जीवन केवल इसी तक सीमित नहीं होना चाहिए।

RSS आपको एक ऊँचा दृष्टिकोण (higher vision) देता है—
कि केवल यह देश ही नहीं, बल्कि पूरी दुनिया को हमारे जीवन-दर्शन की आवश्यकता है।

हमारे समाज में सिखाया जाता है:

  • माता-पिता का सम्मान
  • शिक्षकों का सम्मान
  • बड़ों का सम्मान
  • महिलाओं का सम्मान

उन्होंने कहा कि पश्चिमी देश महिलाओं को अधिकार (rights) देते हैं, जबकि भारतीय संस्कृति उन्हें सम्मान (respect) देती है।

कानून अधिकार दे सकता है, लेकिन सम्मान नहीं दे सकता।

सम्मान एक सभ्यता का गुण (civilizational virtue) है।

आप कानून बनाकर यह नहीं कह सकते कि हर कोई अपने माता-पिता का सम्मान करे या हर कोई अपने शिक्षकों का सम्मान करे।

ये गुण समाज में स्वाभाविक रूप से विकसित होते हैं।

 

उन्होंने कहा कि भारत में लगभग 6,68,000 गाँव और कस्बे हैं।

लेकिन पूरे देश में केवल लगभग 14,800 पुलिस स्टेशन हैं।

संयुक्त राष्ट्र के आंकड़ों के अनुसार हत्या, डकैती, चोरी और बलात्कार जैसे अपराधों के मामले में भारत दुनिया के सबसे कम अपराध वाले देशों में शामिल है।

तो समाज को नियंत्रित कौन करता है?

समाज स्वयं।

यही सामाजिक पूंजी है।

यह एक सभ्यतागत गुण है जो हजारों वर्षों की निरंतरता से बना है।

इसलिए हमें अपने युवाओं को यह समझाना होगा कि ऐसे समाज की नकल अचानक नहीं की जा सकती।

हमें युवाओं, महिलाओं, राजनेताओं और प्रशासनिक अधिकारियों को यह समझाना होगा।

RSS का काम है लोगों की चेतना को ऊँचा उठाना और यह कार्य आगे भी चलता रहेगा।

 

कार्यक्रम में आए कई लोगों ने कहा कि यह उनके जीवन का एक ऐसा भाषण था जिससे उन्हें अपने राष्ट्र के बारे में, स्वतंत्रता आंदोलन के बारे में, संघ के कार्यों के बारे में जो जानने व समझने को मिला वो कई पुस्तकों में भी नहीं मिल सकता था।

 

कार्यक्रम के आयोजन के लिए श्री गुरूमूर्ति ने श्री कमलेश श्रॉफ, श्री सुरेश, और श्री आशीष चौहान—को धन्यवाद देते हुए कहा कि उन्होंने एक अलग और शायद अधिक महत्वपूर्ण विषय पर मुझे बोलने का मौका दिया। उन्होंने कहा कि इतने बड़े और विचारशील श्रोताओं को एकत्र करना आसान नहीं होता। वक्ता को बुलाना तो आसान है, लेकिन ऐसा श्रोता समूह इकट्ठा करना जो वक्ता को सच में प्रसन्न करे—यह आसान काम नहीं है। मैं अत्यंत प्रसन्न हूँ कि आयोजकों ने ऐसा उत्कृष्ट श्रोता वर्ग यहाँ एकत्र किया है और मुझे इस मंच पर बोलने का अवसर मिला है।

 

कार्यक्रम के प्रारंभ में एएऩएमआई के राष्ट्रीय अध्यक्ष श्री के सुरेश ने स्वागत भाषण दिया और अंत में धन्यवाद ज्ञापन संस्था के अल्टरनेटिव अध्यक्ष श्री कमलेश श्रॉफ ने किया।

 

श्री गुरूमूर्ति के भाषण का वीडियो लिंक- https://youtu.be/5DnY-AVHTZE

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नेपाल में ऐतिहासिक सत्ता परिवर्तन और भारत

भारत के अहम पड़ोसी राष्ट्र नेपाल में युवाओं के व्यापक आंदोलन के बाद संपन्न हुए चुनावों के परिणाम आ चुके हैं। काठमांडू के पूर्व मेयर रैपर बालेन शाह का नेपाल के सबसे युवा प्रधानमंत्री बनना निश्चित हो चुका है। नेपाल के इतिहास में पहली बार किसी राजनैतिक दल को पूर्ण बहुमत प्राप्त हुआ है अतः अब देश में विकास की धारा बहने की आशा भी बलवती है।

नेपाल विगत दो दशकों से राजनैतिक अस्थिरता के दौर से गुजर रहा था जिसके  कारण वहां भ्रष्टाचार चरम पर पहुँच गया था और जनता त्रस्त थी। नेपाल के चुनाव परिणाम बताते हैं कि देश कोई भी हो जनता राजनैतिक अस्थिरता, परिवारवाद व नेताओं व दलों के मध्य बारंबार होने वाले अनैतिक गठबंधनों को पसंद नहीं करती है, उसको जैसे ही अवसर मिलता है वह परंपरागत दलों को हटाकर नया विकल्प चुन लेती है फिर चाहे यह विकल्प अनुभवहीन ही क्यों न हो। नेपाल को पहली बार ओली और प्रचंड की नूरा कुश्ती से स्वतंत्रता मिली है। नेपाल के वामपंथी दलों ने गठबंधन बनाकर स्वयं को जीवित रखने का प्रयास किया था किंतु नेपाल की जनता ने  उन्हें पूरी तरह बाहर का रास्ता दिखाकर बता दिया कि अब वामपंथ की दुनिया उजड़ रही है।

नेपाल की प्रातिनिधि सभा में 275 सदस्य होते हैं जिसमें 164 सदस्य सीधे मतदान के माध्यम से चुने जाते है। इन  चुनावों में बालेन शाह के नेतृत्व वाली राष्टीय स्वतंत्र पार्टी 120 सीटों पर विजय प्राप्त कर सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी है जबकि दशकों तक राज करने वाली नेपाली कांग्रेस को मतदाताओे के आक्रोश का सामना करना पड़ा और वह मात्र 17 सीटो पर ही सिमट कर रह गई । कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ नेपाल और नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी केवल सात -सात सीटों पर ही सिमट कर रह गईं। नेपाल में चुनाव मतपत्र के माध्यम से कराए जाते हैं और वहां  इस बार 60 प्रतिशत मतदाताओं ने अपने मत का प्रयोग कर ऐतिहासिक सत्ता परिवर्तन किया है।

कौन  हैं बालेन शाह – रैपर से काठमांडू के मेयर बने  बालेन शाह मधेशी समाज के नेता हैं जो पहली बार देश के प्रधानमंत्री बनने जा रहे हैं। दस वर्ष पूर्व तक किसी मधेशी नेता का  प्रधानमंत्री बनना अकल्पनीय था। मधेशी लोगों की भाषा ,संस्कृति और रहन -सहन भारत के सीमावर्ती क्षेत्रों से बहुत मिलता है। ये लोग मुख्य रूप से मधेश या तराई क्षेत्र में रहते हैं जो नेपाल और भारत का सीमावर्ती क्षेत्र है। मधेशी समुदाय में मैथिली, भोजपुरी, अवधी और हिंदी जैसी भाषाएं बोलने वाले लोग हैं। लंबे समय तक नेपाल की राजनीति में इन्हें प्रतिनिधित्व और अधिकारों को लेकर संघर्ष करना पड़ा  जिसके कारण कई  बार अलग मधेश राज्य बनाने की मांग को लेकर तीव्र आंदोलन हुए। अब पहली बार एक मधेशी नेता को वहां का प्रधानमंत्री बनने का अवसर प्राप्त होने जा रहा है। चुनाव प्रचार के दौरान  बालेन ने स्वयं को  मधेश का बेटा बताया था और उनकी पार्टी ने, “अबकी बार  बालेन सरकार”  नारे के साथ अभियान प्रारंभ किया था। मधेश प्रांत के आठ जिलों की कुल 32सीटों में अधिकतर पर स्वतंत्र पार्टी को भारी सफलता प्राप्त हुई है।

जेन- जी के व्यापक समर्थन से नेपाल के नए प्रधानमंत्री बनने जा रहे बालेन शाह के समक्ष अनेक चुनौतियां भी हैं। नेपाल में भड़के जन आंदोलन के दौरान सबसे बड़ा मुद्दा युवाओं के लिए रोजगार की भारी कमी, पलायन का और भ्रष्टाचार का था। स्वाभाविक तौर पर जनता इन समस्याओं का समाधान मांगेगी। नेपाल के नए प्रधानमंत्री को विदेश नीति के अतंर्गत भारत और चीन के मध्य सामंजस्य व संतुलन स्थापित करके चलना होगा। भारत को लेकर बालेन कई बार विवादों में रहे हैं। एक बार बालेन शाह ने अपने कार्यालय में ग्रेटर नेपाल का नक्शा लगा लिया था जिसमें भारत के अनेक क्षेत्रों को नेपाल का हिस्सा दिखाया गया था बाद में  विवाद व आलोचना के कारण बालेन को वह नक्शा हटाना पड़ा  था । पूर्व प्रधानमंत्री ओली भी इस प्रकार की नादानियां करते रहे हैं और उन्हें भारत से पंगा लेने का पुरस्कार भी वहां की जनता ने दे दिया है। वह आदिपुरूष फिल्म और माता सीता को नेपाल की बेटी बताकर भी भारत के साथ भिड़ गए थे। बालेन को भारत और नेपाल के रोटी-बेटी सम्बन्ध को समझना होगा।

राजनैतिक विश्लेषकों का अनुमान है कि बालेन शाह भारत का खुलकर विरोध करने की स्थिति में कतई नहीं हैं क्योंकि नेपाल में जिन- जिन लोगों ने भारत के साथ सामरिक चतुराई दिखाने का प्रयास किया है वो नेपथ्य में चले गए हैं। बालेन शाह ने राष्ट्रवाद के नाम पर कई बार भारत से पंगा लिया है और भारत के खिलाफ नैरेटिव खड़ा करने का प्रयास किया है। यद्यपि बालेन शाह ने भारत में ही अपनी पढ़ाई पूरी की किंतु उनका भारत विरोधी दृष्टिकोण कई बार सामने आ चुका है। नए संसद भवन में बने अखंड भारत के मानचित्र पर उन्होंने घोर आपत्ति जताई थी जबकि बालेन ने नेपाल के नक्शे में  यूपी, बिहार से लेकर बंगाल तक के अनेक हिस्सों को नेपाल का बता दिया था। बालेन ने भारत ,अमेरिका और चीन के खिलाफ एक पोस्ट लिखा था जिसमें सबसे बड़ा भाग भारत के खिलाफ था, इस पोस्ट पर राजनैतिक विवाद होने पर उन्होंने यह पोस्ट वापस ले ली थी। आदिपुरूष फिल्म के दौरान हुए विवाद के समय उन्होंने अपनी आपत्ति प्रकट की थी और यहां तक धमकी दे डाली थी कि जब तक उनकी आपत्ति का निराकरण नहीं जाता तब तक वह नेपाल की राजधानी काठमांडू व अन्य शहरों  मे भारतीय फिल्मों को नहीं चलने देगे। यही कारण है कि भारत नेपाल के घटनाक्रमों पर बराबर नजर बनाए रखे हुए है और वहां की स्थिति पर काफी संतुलित बयान दे रहा है क्योंकि बालेन शाह के साथ भारत का कोई बहुत अच्छा अनुभव नहीं रहा है।   पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी आईएसआई भी  नेपाल की राजनीति को प्रभावित करने के लिए अपनी गतिविधियां लगातार संचालित कर रही है। चुनावों के दौरान भी भारत के सटे सीमावर्ती क्षेत्रों में आईएसआई ने दंगे फैलाने की साजिशें रची थीं।

इन सबके बाद भी दशकों बाद नेपाल में पूर्ण बहुमत की सरकार आने से एक नई आशा बंधी है कि अब वहां स्थिर विकास हो सकेगा और युवाओं  की  अपेक्षाएं पूरी हो सकेंगी। बालेन शाह राष्ट्रवादी और मधेशी ब्राह्मण नेता हैं, भारत अपना रुख उनके प्रति सकारात्मक रखेगा क्योंकि बालेन शाह चाहते है कि यदि उन्हें बराबरी का सम्मान दिया गया तो वह प्रथम दृष्टया भारत के साथ ही जाना पसंद करेंगे। नेपाल की नई सरकार को नेपाल का पुनर्निर्माण करना है और उसमें भी युवाओं की आकांक्षा  व सपनो को पूरा करना है इसलिए नये शासक को सभी के साथ मिलकर चलना ही होगा।

प्रेषक – मृत्युंजय दीक्षित

फोन नं. – 9198571540

संसद टीवी द्वारा भाषाई भेदभाव और लोक शिकायतों पर कार्यवाही न करने के विरुद्ध लोक शिकायत।

सेवा में,

संयुक्त सचिव,

राजभाषा विभाग, गृह मंत्रालय,

भारत सरकार, नई दिल्ली।

संदर्भ- मेरी शिकायत 15 सितंबर 2025 एवं राजभाषा विभाग का 26 सितंबर 2025 का संसदीय कार्य मंत्रालय को लिखा गया पत्र (संलग्न)

विषय: संसद टीवी द्वारा भाषाई भेदभाव और लोक शिकायतों पर कार्यवाही न करने के विरुद्ध लोक शिकायत।

महोदय,

सादर निवेदन है कि भारत के लोकतंत्र के प्रहरी और जन-संवाद के मुख्य माध्यम ‘संसद टीवी’ की आधिकारिक वेबसाइट (https://sansadtv.nic.in) वर्तमान में पूर्णतः राजभाषा विरोधी स्वरूप में संचालित हो रही है और संसदीय कार्य मंत्रालय और संसद टीवी का प्रबंधन लोक शिकायतों व राजभाषा विभाग के पत्रों को कूड़ेदान में फेंक रहे हैं और कार्यवाही तो दूर उत्तर भी नहीं दे रहे हैं जो अत्यंत निंदनीय है। इस विषय में मुख्य बिंदु निम्नलिखित हैं:

1. संवैधानिक एवं विधिक प्रावधानों का उल्लंघन

संसद टीवी की वेबसाइट पर संपूर्ण सामग्री केवल अंग्रेज़ी भाषा में उपलब्ध होना राजभाषा अधिनियम, 1963 की धारा 3(3) का प्रत्यक्ष उल्लंघन है। यह अधिनियम स्पष्ट करता है कि केंद्र सरकार के स्वामित्व या नियंत्रण वाले निगमों, निकायों और कार्यालयों द्वारा जारी किए जाने वाले प्रेस नोट, विज्ञप्तियाँ, आधिकारिक कागजात और संविदाएँ अनिवार्य रूप से द्विभाषी (हिन्दी और अंग्रेज़ी) होनी चाहिए।

2. राजभाषा नियम, 1976 की अवहेलना

राजभाषा नियम, 1976 के नियम 11 के अनुसार, सभी सरकारी मैनुअल, संहिताएँ और अन्य प्रक्रिया संबंधी सामग्री हिन्दी और अंग्रेज़ी दोनों भाषाओं में होनी चाहिए। वेबसाइट पर उपलब्ध सूचनाएँ, कार्यक्रम विवरण और आधिकारिक सूचनाएँ इस नियम की परिधि में आती हैं, जिनका वर्तमान स्वरूप केवल एकभाषी (अंग्रेज़ी) है।

3. डिजिटल इंडिया एवं सूचना के अधिकार का हनन

संसद टीवी, जो लोकसभा और राज्यसभा टीवी के विलय के पश्चात भारत की लोकतांत्रिक व्यवस्था का प्रतिबिंब है, उसका मुख्य उद्देश्य जनता को संसदीय कार्यवाहियों से जोड़ना है। भारत की एक विशाल जनसंख्या हिन्दी भाषी है, जो तकनीकी और भाषाई बाधाओं के कारण संसद टीवी की वेबसाइट पर उपलब्ध सूचनाओं से वंचित रह जाती है। यह डिजिटल इंडिया के समावेशी दृष्टिकोण और भाषाई समानता के सिद्धांतों के विपरीत है।

4. तकनीकी विसंगति

अत्यधिक खेद का विषय है कि जहाँ निजी समाचार माध्यम अपनी वेबसाइटों को बहुभाषी बना रहे हैं, वहीं भारत सरकार का आधिकारिक संसदीय चैनल होने के बावजूद यह और इसका प्रबंधन राजभाषा का विकल्प देने को तैयार नहीं है। यह राष्ट्रपति के आदेशों व राजभाषा विभाग द्वारा समय-समय पर जारी किए गए कार्यालय ज्ञापनों व वार्षिक कार्यक्रमों और निर्देशों की घोर उपेक्षा को दर्शाता है।

अतः आपसे विनम्र आग्रह है कि:

  • द्विभाषी स्वरूप: संसद टीवी की वेबसाइट को तत्काल प्रभाव से पूर्णतः द्विभाषी (हिन्दी और अंग्रेज़ी) बनाया जाए।
  • सामग्री: वेबसाइट पर उपलब्ध सभी पूर्ववर्ती और वर्तमान वीडियो विवरण, लेख और आधिकारिक दस्तावेजों को हिन्दी में उपलब्ध कराया जाए।
  • उत्तरदायित्व का निर्धारण: राजभाषा नियमों की इस प्रकार की जा रही अनदेखी हेतु संबंधित अधिकारियों का उत्तरदायित्व निर्धारित किया जाए।
  • अनुपालन रिपोर्ट: इस सुधार हेतु की गई कार्यवाही से अवगत कराने की कृपा करें ताकि नागरिकों का राजभाषा के प्रति विश्वास सुदृढ़ हो सके।

राष्ट्र की लोकतांत्रिक संस्थाओं में राजभाषा ‘हिन्दी’ का गौरव बनाए रखना हमारा संवैधानिक उत्तरदायित्व है। आशा है कि आप इस संवेदनशील विषय पर त्वरित संज्ञान लेंगे।

सधन्यवाद।

भवदीय,

अभिषेक कुमार

ग्राम सुल्तानगंज, तहसील बेगमगंज,

जिला-रायसेन, मध्यप्रदेश-464570

 

ई-मेल: digitalhindi1008@gmail.com

प्रतिलिपि :

 

  • माननीय केंद्रीय गृह मंत्री, भारत सरकार
  • सचिव, संसदीय राजभाषा समिति

दक्षिण भारत के चाणक्य माधवाचार्य विद्यारण्य

भारतीय इतिहास के अनेक ऐसे पहलुओं को जान-बूझ कर अनदेखा किया गया है, जो कि हमारे साम्राज्यों की निर्मितियों और स्थायित्व के सबसे बड़े कारण रहे हैं। यह विमर्श विजयनगरम् साम्राज्य के संस्थापक हरिहर और बुक्का जैसे महान, मेधावी और महत्वाकांक्षी शासकों पर नहीं अपितु उन्हें कुंदन बनाने वाले उनके सहयोगी, गुरु और कालांतर में महामंत्री माधवाचार्य विद्यारण्य पर केंद्रित है। विद्यायरण्य को दक्षिण भारत का चाणक्य कहा जाता है; अपने अपने समय के दो महति विद्वानों की ऐसी तुलना सार्थक प्रतीत होती है।

हम चर्चा करेंगे कि क्यों माधवाचार्य विद्यारण्य को दक्षिण का चाणक्य कहा जाता है, इससे पहले एक प्रश्न आपके सम्मुख अवश्य रखना चाहता हूँ; सोचिए कि ऐसा क्यों है कि हम अतीत के नायकों-खलनायकों को स-विस्तार जानते हैं जबकि युगप्रवर्तकों को नहीं। जब भी बड़े सामाजिक बदलाव हुए हैं, राजनीति को महानायक प्राप्त हुआ है, लेकिन उनके पीछे किसी न किसी बड़े शिक्षक, विचारक, नीतिनिर्माता अथवा योजनाकार का हाथ अवश्य रहा है। महान मौर्य साम्राज्य की संस्थापना के साथ चाणक्य-चंद्रगुप्त की युति ने जो समाज को दिया वह अनमोल और वर्तमान के समक्ष भी प्रेरणा है, उदाहरण है। चाणक्य के शिष्य की साम्राज्यवादिता वस्तुत: स्थायित्व के लिये थी, उद्देश्यपूर्ण थी अर्थात भारतवर्ष की बिखरी-बटी हुई सीमाओं को एक ध्वज के अंतर्गत ला कर शासन प्रदान करना। मौर्य साम्राज्य के ही एक अन्य वैभवशाली सम्राट अशोक के लिए उनके महा-अमात्य रहे राधागुप्त की भूमिका भी महत्वपूर्ण रही है। विद्वानों को अपने साथ रखना-विचारविमर्श में उन्हें महत्व देना नन्द साम्राज्य के संस्थापक महापद्मनन्द की भी प्राथमिकता थी, वे अष्टाध्यायी जैसे महान ग्रंथ की रचना करने वाले विद्वान पाणिनी को अपना घनिष्ठ मित्र और सलाहकार मानते थे। इसी कड़ी में हमें शुंग साम्राज्य की ओर भी एक दृष्टि करनी चाहिये; इस दौर में महर्षि पतंजलि, सम्राट पुष्यमित्र शुंग के गुरु, मार्गदर्शक और पुरोहित रहे हैं।

ये केवल कुछ प्रचलित उदाहरण हैं। आज जब हम पूर्व-मध्यकालीन भारत के गौरवशाली विजयनगर साम्राज्य की बात करने जा रहे हैं और चर्चा माधवाचार्य विद्यारण्य पर की जा रही है तब यह कहना अतिश्योक्ति नहीं कि जो स्थान चंद्रगुप्त के उत्थान में चाणक्य का, अशोक के उत्थान में राधागुप्त का, पुष्यमित्र शुंग के उत्थान में पतंजलि का रहा है वही स्थान विजयनगर साम्राज्य के संस्थापकों हरिहर और बुक्का के जीवन में माधवाचार्य विद्यारण्य का रहा है। संक्षेप में यही कि भारतीय भूभाग पर मुसलमान आक्रान्ताओं की कुदृष्टि हमेशा से रही है लेकिन समय समय पर ऐसे महानायक हुए हैं जिन्होनें उनका सामना किया, उनकी जड़ों में मट्ठा डालने का कार्य किया है।

मुहम्मद बिन कासिम से आरंभ कर मुगलों तक को खदेडऩे में राजा दाहिर की पुत्रियों के बलिदान से ले कर छत्रपति महाराज शिवाजी तक के योगदानों को भले ही एनसीईआरटी की पुस्तकें समुचित स्थान न दें लेकिन यह निस्संदेह है कि हमारे इतिहास का वास्तविक गौरव यहीं निहित है। गजनियों, गोरियों, गुलामों, तुगलकों, सैयदों, लोदियों ने दक्षिण भारत की समृद्धि को लूटने की जो परिपाटी बनाई इसने न केवल प्रशासनिक हलकों को झखझोर दिया बल्कि यहाँ का सामाजिक-धार्मिक तानाबाना भी नष्ट होने लगा था। ऐसे में आवश्यकता थी कि इस राष्ट्र की समृद्धि को लूटने के साथ साथ इस्लाम का तलवार के बल पर प्रचार करने निकले दिल्ली सलतनत के खूंखार लुटेरों को प्रतिरोध दिया जाये। एक विद्वान ही समाज को गहराई से समझता है, समस्या का वास्तविक अन्वेषण कर पाता है और समाधान की दिशा प्रशस्त करता है। एक एक कर मुसलमान आक्रान्ताओं द्वारा नष्ट किये जा रहे दक्षिण के राज्यों को समेटना आवश्यक था, एक केन्द्रीय शक्ति चाहिए थी जो दीवार बन सके। वह प्रेरणा कि ”तन से, मन से, धन से; तन मन धन जीवन से;हम करें राष्ट्र आराधन” तब हरिहर और बुक्का नाम के दो भाईयों को प्रदान करने का कार्य किया, विद्वान माधवाचार्य विद्यारण्य ने।

कौन थे विद्यारण्य? स्थापित इतिहास की पुस्तकें इस तरह मौन हैं कि अनेक द्वितीयक तथा साहित्यिक साधनों से उनके विषय में जानकारी समगरीकृत हो पाती है। उल्लेख मिलता है कि विद्यारण्य के पिता नाम नाम था मायण। मायण के तीन पुत्र थे माधव, सायण और भोगनाथ। माधव अर्थात विद्यारण्य का जन्म वर्ष 1296 को तुंगभद्रा नदी के तटवर्ती पम्पाक्षेत्र अर्थात वर्तमान हम्पी के निकट के किसी गांव में हुआ था। उनका वास्तविक नाम तो माधव ही था, विद्यारण्य नामकरण उन्हें वर्ष 1331 ई. में संन्यास ग्रहण करने के पश्चात प्राप्त हुआ।

माधव ने आरम्भिक शिक्षा अपने पिता से प्राप्त की। उनकी माता श्रीमती देवी भी विदुषी थी। तत्पश्चात उनके तीन गुरु कहे जाते हैं जिनमें प्रमुख है श्रृंगेरी मठ के तत्कालीन प्रमुख विद्यातीर्थ, वेदान्त के परम विद्वान भारती तीर्थ और साहित्य तथा संस्कृति के ज्ञाता श्रीकंठ। आप, विद्वानों की विविधता और विषय की विविधता को देखें और अनुभव करें कि तत्कालीन शिक्षा पद्यति बड़े बड़े अन्वेषकों, विचारकों और विद्वानों की जननी क्यों थी। शिक्षा में उनकी मेधा ने ही उन्हें कालांतर में माधवाचार्य के रूप में पहचान प्रदान की। शिक्षा पूरी हुई तो आचार्यों से उन्होंने पूछा कि वे गुरुदक्षिणा में क्या प्रदान करें, उत्तर मिला अपना जीवन। गुरु भी योग्यता पहचानते थे, उन्हें ज्ञात था कि अप्प दीपों भव वाली मन:स्थिति उनके इसी विद्यार्थी में अंतर्निहित है, यही है जो दिल्ली के सुलतानों के फैलाये अंधकार से लड़ सकता है, उजियारा फैला सकता है।

आचार्य विद्यारण्य ने जब वास्तविकता के धरातल पर पैर रखा तो वह उन्हे जलता हुआ प्रतीत हुआ। उनके समकालीन का एक संदर्भ कहता है कि ”उस समय लोग चिदम्बरम् के पवित्र तीर्थ को छोड़कर भाग गए थे। मंदिरों के गर्भगृह और मंडलों में घास उग आयी थी। अग्रहारों से यज्ञ धूप की सुगंध के स्थान पर पकते मांस की गंध आने लगी थी। ताम्रपर्णी नदी का जल चंदन से मिश्रित होने के स्थान पर गोरक्त से मिश्रित होने लगा था। देवालयों और मंदिरों पर कर लग गए थे। अनेक मंदिर देखभाल न होने के कारण या तो स्वयं गिर गए थे अथवा गिरा दिए गए थे। हिन्दू राज्य छल-बल से समाप्त होते जा रहे थे।” व्यथित आचार्य इस अवस्था को बदल देना चाहते थे, इसके लिए उन्हें दो सहयोगी भाई भी मिल गए हरिहर और बुक्का जो स्वयं तत्कालीन राजनीति की चपेट में अपनी राजनैतिक पहचान बनाने के लिए संघर्ष कर रहे थे। माधवाचार्य विद्यारण्य जानते थे कि प्रजा में अपने धर्म के छिन जाने का असंतोष है, राजाओं-सामंतों में अपनी गरिमा के नष्ट होने की ग्लानि है। यही सही समय है जबकि गरम लोहे पर हथौड़ा मार दिया जाना चाहिए।


माधवाचार्य के पिता विजयनगर साम्राज्य के संस्थापक भाईयों हरिहर और बुक्का के कुलगुरु कहे जाते हैं, अत: यह स्वाभाविक था कि वे स्वयं भी उनके संपर्क में आ गए। यह संपर्क जिन परिस्थितियों में हुआ वह भी रोचक वृतांत है। अपनी पुस्तक ”पूर्व मध्यकालीन भारत” में श्रीनेत्र पाण्डेय लिखते हैं ”हरिहर और बुक्का भाईयों को रायचूर प्रदेश में आणेगुण्डी के राजा के यहाँ नौकरी करनी पड़ी। यहाँ भी वे मुसलमान आक्रान्ताओं की क्रूरता से बच नहीं सके, दिल्ली लाये गये। यद्यपि रायचूर पर मुसलमानों ने अपना अधिकार स्थापित कर लिया था परन्तु वे वहाँ शान्ति तथा सुव्यवस्था न स्थापित कर सके। अतएव सुल्तान तुगलक ने हरिहर तथा बुक्का को मुक्त कर दिया और उन्हें रायचूर दोआब का सामंत बना कर दक्षिण भेज दिया”।
 इस क्रम में अपनी पुस्तक ”विजय नगर का इतिहास” में श्री वासुदेव उपाध्याय लिखते हैं कि ”बड़े भाई हरिहर ने होयसल नरेश वीर बल्लाल के शासन समय में ‘महामण्डलेश्वर’ का पद ग्रहण किया था”। मुहम्मद बिन तुगलक के शासनकाल के अन्तिम भाग में जब तुगलक साम्राज्य छिन्न-भिन्न हो रहा था उसी समय होयसल साम्राज्य भी शक्तिहीन हो चला था। इस सभी के दृष्टिगत और अपने गुरु माधवाचार्य विद्यारण्य की प्रेरणा से हरिहर ने भी स्वयं को स्वतन्त्र शासक घोषित कर दिया। हरिहर और बुक्का के एक प्रशासनिक अधिकारी, सामंत, महामण्डलेश्वर और अंतत: एक साम्राज्य के अधिष्ठाता होने के विषय में श्रीनेत्र पाण्डेय लिखते हैं ”इन दोनों भाइयों का परम सहायक तथा नेता उस समय का प्रकांड पण्डित विद्यारण्य था जिसने इस वंश की उसी प्रकार सहायता की जिस प्रकार चाणक्य ने चन्द्रगुप्त मौर्य की की थी।
अपने गुरु तथा सहायक के प्रति अपनी कृतज्ञता प्रकट करने के लिए इन दोनों भाइयों ने तुंगभद्रा नदी के किनारे पर विद्यानगर अथवा विजयनगर नामक नगर की नींव डाली। इस नगर के स्थान का सुझाव भी विद्यारण्य का ही दिया हुआ था। उल्लेख मिलता है कि ”जहाँ पर विजयनगर (आज की हंपी) की स्थापना हुई उस भूमि पर भ्रमण करते हुए विद्यारण्य ने देखा कि कुछ खरगोश कुत्तों को खदेड़ रहे हैं। कुत्ते भाग रहे हैं और खरगोश पीछा कर रहे हैं। यह असंभव दिखने वाला दृश्य था। विद्यारण्य को लगा कि तुंगभद्रा की तटवर्ती इस भूमि में कुछ विशेष ही तेज है, जो ताकतवर शत्रुओं को भी मार भगाने की क्षमता रखती है।” यह नगर वर्ष 1336 ई0 में पूर्ण कर दिया गया था। यह नगर मुसलमानों के आक्रमण से सुरक्षा पाने के लिये बड़ा उपयुक्त था।”

अनेक संदर्भ इस बात की पुष्टि करते हैं कि विद्यारण्य ने विजयनगर के प्रथम शासक हरिहर के समय से उनकी आगे की तीन पीढिय़ों तक को अपना मार्गदर्शन प्रदान किया था। हरिहर प्रथम ने उन्हें अपने से भी ऊंचा आसन और सम्मान दिया था तथा वैदिक मार्ग प्रतिष्ठाता के सम्मानित सम्बोधन से सम्बोधित किया। जब वे छिहत्तर वर्ष की आयु के थे, उन्होंने राजनैतिक जीवन से भी संन्यास ले लिया। इसके पश्चात वे परम तत्व की साधना में लगा गए, वे शाृंगेरी चले आए और कुछ समय के पश्चात यहाँ के पीठाधीश्वर का पद उन्होंने सुशोभित किया।

कुछ विद्वान शृंगेरी के पीठाधीश्वर और विजयनगर के संस्थापक विद्यारण्य को दो अलग व्यक्ति मानते हैं लेकिन अधिकतम साक्ष्य और संदर्भ उनके एक ही होने का इशारा हैं। माधवाचार्य विद्यायरण्य ने ‘पराशरमाधवीय’ ‘जीवन मुक्ति विवेकपंचदशी’ ‘प्रायश्चित सुधानिधि’ और ‘जैमिनीय न्यायमाला’ जैसे महत्वपूर्ण ग्रंथों की रचना भी की है। वर्ष 1386 में उन्होंने यह लोक त्याग दिया था। ऐसे महान मनीषी इस भारत भूमि को प्राप्त हुए हैं यही कारण है कि हमने सैंकड़ों आक्रमण झेले, असंख्य आतताईयों का सामना किया लेकिन अब भी हमारा अपनी सांस्कृतिक पहचान के साथ अस्तित्व बना हुआ है। विजयनगर साम्राज्य का लंबे समय तक बना रहना और मुसलमान आक्रान्ताओं को चुनौती देना निश्चय ही गौरवशाली शासकों के साहस का प्रतिफल था तथापि माधवाचार्य विद्यारण्य जैसे दूरदृष्टा विद्वानों के योगदान को कमतर नहीं आका जा सकता।

(लेखक एनएचपीसी में इंजीनियर तथा प्रसिद्ध लेखक हैं)

वैश्विक युद्धोन्माद के बीच विश्व शांति की पुकार

द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद विश्व ने एक ऐसी व्यवस्था बनाने की कोशिश की थी जिसमें शक्ति को नियमों और संस्थाओं के माध्यम से नियंत्रित किया जा सके। लगभग आठ दशकों तक यह वैश्विक व्यवस्था अनेक उतार-चढ़ावों के बावजूद किसी-न-किसी रूप में कायम रही। अंतरराष्ट्रीय संस्थाएं, बहुपक्षीय समझौते, कूटनीतिक संवाद और साझा नियम-इन सबका उद्देश्य यही था कि दुनिया ‘मत्स्य-न्याय’ यानी शक्तिशाली द्वारा कमजोर को निगल जाने की प्रवृत्ति से बची रहे। इसी सोच के तहत युनाइटेट नेशनस्, वर्ल्ड ट्रेड ऑरगेनाइजेशन, वर्ल्ड हेल्थ ऑरगेनाइजेशन, यूनेस्को और अनेक अंतरराष्ट्रीय मंचों की स्थापना हुई। इन संस्थाओं ने विश्व राजनीति को पूरी तरह आदर्श नहीं बनाया, लेकिन उन्होंने कम-से-कम इतना अवश्य सुनिश्चित किया कि शक्ति के साथ नियम और नैतिकता का एक आवरण बना रहे। परंतु आज यह व्यवस्था अभूतपूर्व संकट के दौर से गुजर रही है।

विश्व राजनीति में एक नया रुझान तेजी से उभर रहा है जिसमें सहयोग, संवाद और बहुपक्षीयता की जगह एकपक्षीय कार्रवाई, सैन्य शक्ति और त्वरित लाभ की मानसिकता को प्राथमिकता दी जा रही है। विशेष रूप से डोनाल्ड ट्रम्प के नेतृत्व में अमेरिका की नीतियों ने इस प्रवृत्ति को और तेज कर दिया है। जो देश कभी वैश्विक नियम-आधारित व्यवस्था का प्रमुख निर्माता और संरक्षक था, वही अब अनेक अंतरराष्ट्रीय समझौतों और संस्थाओं से दूरी बनाता दिखाई देता है। ट्रंप के पहले कार्यकाल में ही यह संकेत मिल गया था जब अमेरिका ने पेरिस क्लाइमेंट अग्रीमेंटस्, इरान न्यूक्लियर डील्स्, विश्व स्वास्थ्य संगठन और यूनेस्को जैसी संस्थाओं से खुद को अलग करने की प्रक्रिया शुरू की। इन कदमों का संदेश यह था कि यदि किसी समझौते से तात्कालिक राष्ट्रीय हित प्रभावित होते हैं तो उसे छोड़ देना ही बेहतर है। इससे वैश्विक सहयोग की उस भावना को गहरा आघात पहुंचा, जो दशकों से अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था की आधारशिला रही है।

आज स्थिति और भी जटिल हो गई है। दुनिया के कई हिस्सों में युद्ध और संघर्ष सामान्य घटनाओं की तरह स्वीकार किए जाने लगे हैं। चार वर्षों से जारी रुस-यूक्रेन युद्ध और दो वर्षों से चल रहा गाजा युद्ध इसका सबसे दुखद एवं विडम्बनापूर्ण उदाहरण हैं। इन संघर्षों ने लाखों लोगों के जीवन को संकट में डाल दिया है, शहरों को खंडहर में बदल दिया है और वैश्विक अर्थव्यवस्था को अस्थिर बना दिया है। युद्ध की सबसे बड़ी विडंबना यही है कि वह किसी स्थायी समाधान की ओर नहीं ले जाता। युद्ध में विजय का दावा करने वाले भी अंततः विनाश और पीड़ा के साथ ही जीते हैं। इतिहास गवाह है कि युद्ध ने कभी भी मानवता को गौरव नहीं दिया; उसने केवल तबाही, भय और अस्थिरता को जन्म दिया है। युद्ध के परिणामस्वरूप पर्यावरण का भारी नुकसान होता है, आर्थिक संसाधन नष्ट हो जाते हैं, महंगाई बढ़ती है, रोजगार के अवसर घटते हैं और समाज में असुरक्षा तथा अविश्वास की भावना गहरी हो जाती है।

आज विश्व के सामने सबसे बड़ी चिंता यह है कि युद्ध और हिंसा धीरे-धीरे सामान्यीकृत होते जा रहे हैं। अनेक बार युद्ध का उद्देश्य वास्तविक समाधान नहीं बल्कि घरेलू राजनीति में छवि निर्माण, शक्ति प्रदर्शन या आंतरिक संकटों से ध्यान हटाना बन जाता है। ऐसी परिस्थितियों में वैश्विक नैतिकता और अंतरराष्ट्रीय कानून दोनों कमजोर पड़ते हैं। यदि शक्तिशाली देश ही नियमों को तोड़ने लगें तो पूरी व्यवस्था की विश्वसनीयता खतरे में पड़ जाती है। मानवाधिकारों के प्रश्न पर भी दोहरे मानदंड दिखाई देते हैं। किसी एक देश की आलोचना की जाती है, लेकिन उसी तरह के कृत्यों पर दूसरे देशों के संदर्भ में चुप्पी साध ली जाती है। इससे मानवाधिकार एक सार्वभौमिक मूल्य के बजाय भू-राजनीतिक बहस का उपकरण बन जाते हैं। यदि विश्व समुदाय वास्तव में मानवता की रक्षा करना चाहता है तो उसे हर देश के लिए समान मानदंड अपनाने होंगे। इन परिस्थितियों में यह प्रश्न अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाता है कि क्या दुनिया फिर से उस दौर की ओर बढ़ रही है जहां “जिसकी लाठी उसकी भैंस” ही अंतरराष्ट्रीय राजनीति का नियम बन जाएगा। यदि ऐसा हुआ तो यह केवल छोटे देशों के लिए ही नहीं बल्कि पूरी मानव सभ्यता के लिए गंभीर खतरा होगा।

भारत का ऐतिहासिक दृष्टिकोण इस संदर्भ में अत्यंत महत्वपूर्ण है। स्वतंत्रता के बाद से भारत ने संप्रभुता, गैर-हस्तक्षेप और बहुपक्षीय सहयोग की नीति का समर्थन किया है। भारत का यह विश्वास रहा है कि वैश्विक समस्याओं का समाधान केवल सामूहिक प्रयासों से ही संभव है। यही कारण है कि भारत ने हमेशा शांति, संवाद और कूटनीति को प्राथमिकता दी है। आज जब विश्व व्यवस्था डगमगा रही है, तब भारत की भूमिका और भी महत्वपूर्ण हो जाती है। भारत न केवल एक उभरती आर्थिक शक्ति है बल्कि एक ऐसी सभ्यता का प्रतिनिधि भी है जिसने सदियों से अहिंसा, सह-अस्तित्व और मानवता के मूल्यों को महत्व दिया है। महात्मा गांधी की अहिंसा की परंपरा और भारत की आध्यात्मिक विरासत आज भी विश्व को दिशा दे सकती है।

इसी संदर्भ में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी से अपेक्षा की जाती है कि वे अपने बढ़ते वैश्विक प्रभाव का उपयोग विश्व शांति की दिशा में और अधिक सक्रिय रूप से करें। पिछले वर्षों में भारत ने कई अंतरराष्ट्रीय मंचों पर शांति, सहयोग और विकास की बात को प्रमुखता से उठाया है। अब समय आ गया है कि इस पहल को और व्यापक बनाया जाए। भारत को चाहिए कि वह वैश्विक स्तर पर युद्धविराम, संवाद और कूटनीतिक समाधान के लिए पहल करे। रूस और यूक्रेन के बीच संघर्ष हो या पश्चिम एशिया की त्रासदी-इन सबके समाधान के लिए संवाद की नई पहल आवश्यक है। भारत यदि मध्यस्थता और शांति प्रयासों में सक्रिय भूमिका निभाए तो वह विश्व राजनीति में एक संतुलनकारी शक्ति बन सकता है। इसके साथ ही परमाणु हथियारों और शस्त्रों की होड़ पर भी गंभीर चिंतन आवश्यक है। आज दुनिया में जिस गति से आधुनिक हथियारों का भंडार बढ़ रहा है, वह मानवता के लिए गंभीर खतरा है। किसी भी क्षण किसी राष्ट्र की नासमझी या राजनीतिक महत्वाकांक्षा पूरी दुनिया को विनाश के कगार पर ला सकती है। इसलिए निशस्त्रीकरण और हथियार नियंत्रण की दिशा में नए अंतरराष्ट्रीय प्रयासों की आवश्यकता है।

यदि विश्व समुदाय मिलकर युद्ध के स्थान पर संवाद और सहयोग को अपनाए तो न केवल वैश्विक स्थिरता कायम होगी बल्कि मानवता विकास और समृद्धि के नए मानक भी स्थापित कर सकेगी। यही आज की सबसे बड़ी आवश्यकता है और यही भविष्य की सबसे बड़ी आशा भी। आज जब विश्व युद्ध, हिंसा और शक्ति-प्रतिस्पर्धा के तनाव से जूझ रहा है, तब दुनिया की निगाहें स्वाभाविक रूप से भारत की ओर उठती हैं। भारत वह धरती है जहाँ शांति, सह-अस्तित्व और अहिंसा केवल राजनीतिक नीतियाँ नहीं बल्कि जीवन-दर्शन के रूप में विकसित हुए हैं। इसी भूमि से “वसुधैव कुटुम्बकम् का वह महान मंत्र निकला जिसने संपूर्ण मानवता को एक परिवार के रूप में देखने की दृष्टि दी। महात्मा गांधी ने इसी भारतीय परंपरा को आधुनिक युग में अहिंसा की शक्तिशाली राजनीतिक और नैतिक शक्ति के रूप में स्थापित किया और दुनिया को बताया कि संघर्षों का समाधान हिंसा से नहीं बल्कि सत्य, करुणा और संवाद से संभव है। भारत की आध्यात्मिक विरासत-जिसमें महावीर और गौतम बुद्ध जैसे महापुरुषों की शिक्षाएँ समाहित हैं, मानवता को यह संदेश देती है कि शांति ही स्थायी विकास और वैश्विक संतुलन का आधार है। आज की अस्थिर वैश्विक परिस्थितियों में भारत की यही अहिंसात्मक दृष्टि, उसकी आध्यात्मिक शक्ति और सर्वहित की भावना विश्व को एक नई दिशा दे सकती है तथा मानवता को संघर्ष की अंधी दौड़ से निकालकर सहयोग, सद्भाव और स्थायी शांति के मार्ग पर अग्रसर कर सकती है।

(ललित गर्ग)
लेखक, पत्रकार, स्तंभकार
ई-253, सरस्वती कंुज अपार्टमेंट
25 आई॰ पी॰ एक्सटेंशन, पटपड़गंज, दिल्ली-110092
मो. 9811051133

ट्रिनिटी एयर ट्रैवल एंड टूर्स ने वैश्विक शिक्षा क्षेत्र में अपने विस्तार को मजबूत किया

प्रभाग भारतीय छात्रों को एक सहज, एंड-टू-एंड वैश्विक शिक्षा अनुभव प्रदान करने के लिए यात्रा और वीजा विशेषज्ञता के चार दशकों का लाभ उठाएगा

मुंबई। 1982 से भारतीय ट्रेवल इंडस्ट्री में एक दिग्गज कंपनी, ट्रिनिटी एयर ट्रैवल एंड टूर्स प्राइवेट लिमिटेड ने आज ‘ट्रिनिटी स्टडी अब्रॉड’ के औपचारिक लॉन्च के साथ शिक्षा क्षेत्र में अपने रणनीतिक विस्तार की घोषणा की। ऑनलाइन एग्रीगेटर्स के ट्रांजैक्शन-भारी मॉडल से आगे बढ़ते हुए, इस नए प्रभाग का उद्देश्य व्यक्तिगत अकादमिक परामर्श (personalized academic counseling) को अपनी मूल कंपनी की वीजा प्रोसेसिंग और वैश्विक लॉजिस्टिक्स में विशेषज्ञता के साथ जोड़कर जटिल अंतरराष्ट्रीय शिक्षा यात्रा को सरल बनाना है।

जहां एक ओर भारत में विदेशी शिक्षा की मांग लगातार बढ़ रही है, वहीं छात्रों और माता-पिता को अक्सर एक लंबी प्रक्रिया का सामना करना पड़ता है। वे प्रवेश, लोन, वीज़ा और यात्रा के लिए अलग-अलग वेंडर्स के बीच उलझे रहते हैं। ट्रिनिटी स्टडी अब्रॉड एक सिंगल-विंडो इकोसिस्टम की पेशकश करके इस अंतर को दूर करता है। यह फर्म यात्रा, विदेशी मुद्रा और आवास सहायता में ट्रिनिटी की इन-हाउस क्षमताओं के साथ करियर काउंसलिंग, यूनिवर्सिटी शॉर्टलिस्टिंग और एसओपी (SOP) मार्गदर्शन जैसी मुख्य शैक्षिक सेवाओं को एकीकृत करती है।

ट्रिनिटी एयर ट्रैवल एंड टूर्स प्राइवेट लिमिटेड के प्रबंध निदेशक श्री बेबी जॉन ने कहा, “ट्रिनिटी स्टडी अब्रॉड का उद्देश्य उन छात्रों को सर्वोत्तम मार्गदर्शन और मदद प्रदान करना है जो विदेश में अध्ययन करना चाहते हैं। विश्वास, ईमानदारी, सत्यनिष्ठा और ग्राहक सेवा वे चार स्तंभ हैं जिन पर मैंने अपनी सभी कंपनियों का निर्माण किया है। इस नए प्रभाग के साथ, हम उन मूल्यों को शिक्षा में ला रहे हैं, यह सुनिश्चित करते हुए कि परिवारों को केवल एप्लिकेशन प्रोसेसिंग के बजाय पारदर्शी, एंड-टू-एंड मेंटरशिप प्राप्त हो।”

ट्रिनिटी स्टडी अब्रॉड के सर्विस पोर्टफोलियो की मुख्य विशेषताएं इस प्रकार हैं:

व्यक्तिगत मेंटरशिप (Personalized Mentorship): वॉल्यूम-आधारित प्रोसेसिंग से हटकर समर्पित, वन-ऑन-वन (one-on-one) छात्र परामर्श पर ध्यान केंद्रित करना।

व्यापक लॉजिस्टिक्स (Comprehensive Logistics): सरल वीजा फाइलिंग, एयर टिकटिंग और विदेशी मुद्रा (foreign exchange) के लिए मूल कंपनी की IATA-मान्यता प्राप्त विरासत का लाभ उठाना।

वित्तीय और आगमन के बाद सहायता (Financial & Post-Arrival Support): शिक्षा ऋण (education loans), प्रस्थान-पूर्व ब्रीफिंग (pre-departure briefings) और गंतव्य देशों (destination countries) में बसने में सहायता।

सही पाठ्यक्रम चुनने से लेकर एक नए देश में आवास सुरक्षित करने तक, अंतर्राष्ट्रीय शिक्षा की जटिलताओं को नेविगेट करना परिवारों के लिए भारी पड़ सकता है। ट्रिनिटी स्टडी अब्रॉड एक संरचित मार्ग की पेशकश करके इस चिंता को कम करता है जो हर महत्वपूर्ण कदम को कवर करता है। चाहे वह उभरते हुए हब में उच्च-आरओआई (high-ROI) पाठ्यक्रमों की पहचान करना हो या पारंपरिक पसंदीदा देशों के लिए जटिल वीजा दस्तावेज़ीकरण का प्रबंधन करना हो, टीम यह सुनिश्चित करती है कि छात्रों को केवल ‘आवेदक’ के रूप में नहीं माना जाए, बल्कि अच्छी तरह से तैयार भविष्य के निवासियों के रूप में देखा जाए। यह समग्र मॉडल शिक्षा ऋण सहायता और विदेशी मुद्रा समर्थन सहित प्रवेश के बाद की आवश्यक जरूरतों तक फैला हुआ है, जो यह सुनिश्चित करता है कि माता-पिता के पास कई एजेंसियों के साथ समन्वय करने के बजाय पूरी यात्रा के लिए संपर्क का एक ही, विश्वसनीय बिंदु हो।

यह प्रभाग वर्तमान में यूके (UK), कनाडा (Canada), ऑस्ट्रेलिया (Australia), यूएसए (USA) और यूरोप (Europe) सहित प्रमुख वैश्विक शिक्षा केंद्रों में आवेदन करने वाले छात्रों की सहायता कर रहा है। मजबूत लॉजिस्टिक समर्थन के साथ अकादमिक आकांक्षाओं को जोड़कर, ट्रिनिटी पहली बार घर छोड़ने वाले छात्रों के लिए एक सुरक्षित वातावरण सुनिश्चित करता है।

अधिक जानकारी के लिए, कृपया देखें: www.trinitystudyabroad.com/services.

ट्रिनिटी एयर ट्रैवल एंड टूर्स प्राइवेट लिमिटेड के बारे में

1982 में मुंबई में स्थापित, ट्रिनिटी एयर ट्रैवल एंड टूर्स प्राइवेट लिमिटेड (Trinity Air Travel & Tours Pvt. Ltd.) यात्रा और पर्यटन उद्योग (travel and tourism industry) में एक मान्यता प्राप्त लीडर है। श्री बेबी जॉन के दूरदर्शी नेतृत्व में, कंपनी ने पासपोर्ट सहायता, वीजा प्रोसेसिंग, अंतरराष्ट्रीय एयर टिकटिंग और ट्रिनिटी वर्ल्ड हॉलीडेज (Trinity World Holidays) के माध्यम से क्यूरेटेड हॉलिडे अनुभवों में उत्कृष्टता के लिए एक मजबूत प्रतिष्ठा बनाई है। ट्रिनिटी स्टडी अब्रॉड समूह के नवीनतम उद्यम का प्रतिनिधित्व करता है, जो वैश्विक नागरिकों की अगली पीढ़ी को सशक्त बनाने के लिए समर्पित है।

Best Regards,

Swati Behal

Specialist – Media Relations

swati.behal@newsvoir.com

श्रीमद्भगवद् गीता पवित्र ग्रंथ है: डॉ. बालमुकुंद पाण्डेय

नई दिल्ली। भारतीय दार्शनिक अनुसंधान परिषद ( आईसीपीआर) के सहयोग से दिल्ली विश्वविद्यालय के ‘ दौलत राम कॉलेज’ में आयोजित एक दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी “श्रीमद् भगवद गीता एवं भारतीय नैतिकता” के विषय पर हुआ। इस संगोष्ठी के मुख्य अतिथि डॉ.बालमुकुंद पाण्डेय जी, राष्ट्रीय संगठन सचिव, अखिल भारतीय इतिहास संकलन योजना, केशव कुंज झंडेवालान रहे ,जबकि संगोष्ठी के मुख्य वक्ता आचार्य ( डॉ.) रजनीश कुमार शुक्ल, पूर्व कुलपति अंतरराष्ट्रीय वर्धा विश्वविद्यालय रहे एवं विशिष्ट अतिथि डॉ. सच्चिदानंद जोशी अध्यक्ष, राष्ट्रीय कला केंद्र दिल्ली रहे।

कार्यक्रम के मुख्य अतिथि डॉ. बालमुकुंद पांडे जी ने सभी अतिथियों को हृदय तल से आभार एवं धन्यवाद प्रेषित किए ।उनका कहना है कि श्रीमद् भगवद गीता एक ऐसा ग्रंथ है जो हर देश काल में प्रासंगिक है। श्रीमद् भगवद गीता एक सभ्यागत संस्कार एवं जीवन का नियमपूर्वक संचालित करने का मौलिक ग्रंथ है। यह ” सनातन विचार को लोकमानस तक पहुंचाने का ग्रंथ है”। इसके आदर्शों एवं मूल्यों को जीवन में आमुख करने से “हर चुनौती” पर नियंत्रण पाया जा सकता है। “यह एक ग्रंथ ही नहीं बल्कि व्यक्तिओं को अपने कर्तव्यों के प्रति जागरूक, आभार एवं अनुशासित करने का मौलिक आमुख है।”

कार्यक्रम के मुख्य वक्ता आचार्य (डॉ.) रजनीश कुमार शुक्ला जी ने श्रीमद् भगवद गीता को कर्मयोग की प्रणेता बताएं। उन्होंने कहा कि श्रीमद् भगवद गीता भारत के नहीं अपितु समस्त सनातन संस्कृति का परम पूजनीय मौलिक ग्रंथ है जो प्रत्येक व्यक्ति के जीवन में सकारात्मक ऊर्जा एवं असीमित उत्साह का संचार करता है।

कार्यक्रम के विशिष्ट अतिथि एवं महाविद्यालय की प्राचार्या प्रोफेसर ( डॉ.) सविता राय जी ने सभी अतिथियों का आभार व्यक्त की एवं श्रीमद् भगवद गीता की उपादेयता को रेखांकित किया। कार्यक्रम की संयोजिका प्रोफेसर (डॉ.) सोनिया जी ने सभी का आभार एवं धन्यवाद ज्ञापित किया।

कार्यक्रम में स्वामी श्रद्धानंद कॉलेज के आचार्य डॉ. ए.के दुबे जी, डॉ. एस .के. मिश्रा, डॉ. शत्रुंजीत सिंह, श्री सचिन रतन झा, विश्वविद्यालय एवं महाविद्यालय के प्राध्यापक एवं कॉलेज के छात्र एवं छात्राओं की ऊर्जावान उपस्थित रही ।

श्री गुरूमूर्ति ने कहा, भारत का वित्तीय तंत्र पारदर्शिता, जवाबदेही और निवेशक सुरक्षा को बढ़ावा देकर आगे बढ़ रहा है

मुंबई, 9 मार्च ।    नेशनल स्टॉक एक्स्चेंज  National Stock Exchange of India (NSE) ने आज निफ्टी 50 इंडेक्स  Nifty 50 Index के 30 वर्ष पूरे होने पर भव्य कार्यक्रम का आयोजन किया।    नेशनल स्टॉक एक्स्चेंज  भारत का प्रमुख इक्विटी बेंचमार्क है और दुनिया के सबसे अधिक ट्रैक किए जाने वाले सूचकांकों में से एक है। यह समारोह मुंबई स्थित NSE के एक्सचेंज प्लाज़ा में आयोजित किया गया, जिसमें  कॉर्पोरेट जगत  के अग्रणी व्यक्तियों, निफ्टी-50 कंपनियों के प्रतिनिधियों, नियामकों और भारत के पूंजी बाज़ार से जुड़े विभिन्न प्रतिभागियों ने भाग लिया।
 अपने संबोधन में जाने माने अर्थशास्त्री श्री एस गुरुमूर्ति S. Gurumurthy ने कहा कि पिछले कुछ दशकों में भारत की वित्तीय प्रणाली ने एक अनोखे तरीके से विकास किया है। कई देशों के विपरीत, जहाँ बाज़ार केवल वित्तीय नवाचार से विकसित हुए, भारत में बाज़ार मजबूत संस्थाओं, नियामकीय निगरानी और सावधानी की संस्कृति के संयोजन से आगे बढ़े हैं। इसी कारण भारत का वित्तीय तंत्र पारदर्शिता, जवाबदेही और निवेशक सुरक्षा को बढ़ावा देते हुए घरेलू और वैश्विक निवेशकों को आकर्षित कर रहा है।

इस कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रूप में सेबी   Securities and Exchange Board of India (SEBI)  के अध्यक्ष  तुहिन कांत पाण्डे Tuhin Kanta Pandey,  विशिष्ट अतिथि के रूप में लेखक, रणनीतिक विचारक और Reserve Bank of India के स्वतंत्र निदेशक  व देश के जाने माने अर्थशास्त्री श्री एस गुरुमूर्ति S. Gurumurthy शामिल हुए। उनके साथ  एनएसई के अध्यक्ष  श्रीनिवास इऩजेती (Shri Srinivas Injeti, Chairman, NSE) , NSE के  एमडी एवं सीईओ  श्री आशीष चौहान  Ashishkumar Chauhan ) भी उपस्थित थे।


SEBI के अध्यक्ष Tuhin Kanta Pandey ने कहा कि निफ्टी-50 के तीन दशक पूरे होने का अर्थ केवल एक सूचकांक का इतिहास नहीं है, बल्कि यह भारत के पूंजी बाज़ारों और उन्हें समर्थन देने वाली संस्थाओं की व्यापक यात्रा को दर्शाता है। पिछले 30 वर्षों में निफ्टी कॉरपोरेट भारत का दर्पण, निवेशकों की भावना का मापक और बाज़ार की दिशा का मार्गदर्शक बन गया है। यह उपलब्धि एक्सचेंजों, नियामकों, मध्यस्थों, बाज़ार संस्थाओं और लाखों निवेशकों के सामूहिक प्रयासों से संभव हुई है।


NSE के अध्यक्ष श्री Srinivas Injeti ने कहा कि पिछले तीन दशकों में Nifty 50 एक साधारण बाज़ार सूचकांक से आगे बढ़कर भारत की आर्थिक गति का प्रतीक बन गया है। 1990 के दशक के मध्य में उदारीकरण के दौर में शुरू हुआ यह सूचकांक आज उद्यम, स्थिरता और निवेशकों के विश्वास का भरोसेमंद मापक बन चुका है। भारत के विकसित राष्ट्र बनने की दिशा में NSE जैसी संस्थाएँ और Nifty 50 जैसे पारदर्शी बेंचमार्क देश की प्रगति में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते रहेंगे।

NSE के एमडी एवं सीईओ  श्री आशीष कुमार चौहान Ashishkumar Chauhan ने कहा कि पिछले 30 वर्षों में Nifty 50 केवल एक बाज़ार सूचकांक नहीं रहा, बल्कि यह भारत के कॉरपोरेट क्षेत्र और पूंजी बाज़ार की वृद्धि का प्रतीक बन गया है। इसने भारत के डेरिवेटिव बाज़ार के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है और इंडेक्स फंड तथा ETF जैसे निष्क्रिय निवेश साधनों के लिए आधार प्रदान किया है।


इस अवसर पर Urvish Kantharia द्वारा लिखित पुस्तक “Nifty Panorama” का विमोचन किया, जिसमें निफ्टी पारिस्थितिकी तंत्र की यात्रा और विकास का विस्तृत वर्णन है। साथ ही “Nifty 50: Thirty Years of India’s Market Evolution” नामक श्वेत पत्र भी जारी किया गया। कार्यक्रम में दो विशेष वीडियो प्रस्तुतियाँ भी दिखाई गईं, जिनमें भारत के वित्तीय बाज़ार के विकास में निफ्टी की भूमिका और निवेशकों पर उसके प्रभाव को दर्शाया गया।

कार्यक्रम के अंत में गणमान्य अतिथियों ने NSE की घंटी बजाकर भारत के पूंजी बाज़ारों की निरंतर वृद्धि और मजबूती का प्रतीकात्मक संदेश दिया।

निफ्टी-50 के बारे में
Nifty 50 को 22 अप्रैल 1996 को लॉन्च किया गया था, जिसकी आधार तिथि 3 नवंबर 1995 है। यह भारतीय अर्थव्यवस्था के प्रमुख क्षेत्रों की 50 बड़ी और तरल कंपनियों के प्रदर्शन को दर्शाने के लिए बनाया गया था। पिछले तीन दशकों में यह भारत के इक्विटी बाज़ार का प्रमुख आधार बन गया है।

3 नवंबर 1995 से 27 फरवरी 2026 तक निफ्टी-50 का दीर्घकालिक प्रदर्शन:
Nifty 50 Total Return Index (TRI): 12.74% वार्षिक चक्रवृद्धि वृद्धि दर
Nifty 50 Price Return Index (PRI): 11.23% वार्षिक चक्रवृद्धि वृद्धि दर
समय के साथ निफ्टी-50 भारत के निष्क्रिय निवेश तंत्र की आधारशिला बन गया है, जिससे इंडेक्स फंड, ETF और अन्य निवेश उत्पाद शुरू किए गए।

शुरुआत से शामिल प्रमुख कंपनियाँ
निफ्टी-50 की स्थापना से अब तक इसमें शामिल प्रमुख कंपनियों में शामिल हैं:
HDFC Bank
ICICI Bank
Reliance Industries
State Bank of India

नेशनल स्टॉक एक्सचेंज ऑफ इंडिया लिमिटेड (NSE) के बारे में

National Stock Exchange of India (NSE) भारत का पहला एक्सचेंज था जिसने इलेक्ट्रॉनिक या स्क्रीन-आधारित ट्रेडिंग प्रणाली लागू की। इसने 1994 में अपना संचालन शुरू किया। SEBI के आँकड़ों के अनुसार 1995 से हर वर्ष इक्विटी शेयरों के कुल और औसत दैनिक कारोबार के आधार पर यह भारत का सबसे बड़ा स्टॉक एक्सचेंज रहा है।

NSE का व्यवसाय मॉडल पूरी तरह एकीकृत है, जिसमें एक्सचेंज लिस्टिंग, ट्रेडिंग सेवाएँ, क्लियरिंग और सेटलमेंट सेवाएँ, इंडेक्स, मार्केट डेटा, तकनीकी समाधान और वित्तीय शिक्षा शामिल हैं। NSE ट्रेडिंग और क्लियरिंग सदस्यों तथा सूचीबद्ध कंपनियों द्वारा SEBI और एक्सचेंज के नियमों के पालन की निगरानी भी करता है।

तकनीक के क्षेत्र में अग्रणी NSE अपने सिस्टम की विश्वसनीयता और प्रदर्शन सुनिश्चित करने के लिए निरंतर नवाचार और तकनीकी निवेश करता है। Futures Industry Association (FIA) के अनुसार वर्ष 2025 में ट्रेडिंग वॉल्यूम के आधार पर NSE दुनिया का सबसे बड़ा डेरिवेटिव्स एक्सचेंज रहा है। वहीं World Federation of Exchanges (WFE) के आँकड़ों के अनुसार 2025 में ट्रेडों की संख्या के आधार पर यह इक्विटी सेगमेंट में विश्व में तीसरे स्थान पर है।

अधिक जानकारी के लिए देखें: www.nseindia.com