Friday, April 4, 2025
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रतन टाटा की वसीयतः रसोइयों को ₹80 लाख, ₹12 लाख पालतू जानवरों को, ₹350 करोड़ सामाजिक कार्यों के लिए

सौतेली बहन शिरीन और डिनना जेजीभॉय को एक अन्य वित्तीय संपत्ति का लगभग एक तिहाई हिस्सा मिला है।

दिवंगत उद्योगपति रतन टाटा की लगभग 3,800 करोड़ रुपए की वसीयत का एक बड़ा हिस्सा रतन टाटा एंडोमेंट फाउंडेशन (RTEF) और रतन टाटा एंडोमेंट ट्रस्ट (RTET) को दिया जाएगा. संपत्ति का शेष हिस्सा उनके परिवार, दोस्तों और करीबी सहयोगियों को मिलेगा. मीडियी की एक रिपोर्ट में यह जानकारी दी गई है. RTEF और RTET यह दोनों फाउंडेशन मानव सेवा और चैरिटी करती हैं. रिपोर्ट में कहा गया है कि टाटा की संपत्ति में टाटा संस के ऑर्डिनरी और प्रेफरेंस शेयर के अलावा अन्य फाइनेंशियल एसेट्स भी शामिल हैं. रतन टाटा की वसीयत में हर किसी के लिए कुछ न कुछ सौगात शामिल है। यहाँ तक कि वसीयत में रसोइया राजन शॉ और सुब्बैया और उनके पालतू कुत्ते टीटो का भी हिस्सा तय किया गया है। उनकी वसीयत 23 फरवरी, 2022 को ही तैयार कर ली गई थी। वसीयत में परिवार, दोस्त, चैरिटिबल फाउंडेशन समेत सभी का हिस्सा तय है।रतन टाटा की वसीयत के अनुसार, मुंबई के जुहू में स्थित 13 हजार वर्गफुट का दो मंजिला घर, अलीबाग में समुद्र किनारे का बँगला और 350 करोड़ रुपए से अधिक के फिक्स्ड डिपॉजिट को परोपकारी कार्यों में लगाया जाएगा।

‘इकोनॉमिक टाइम्स‘ की रिपोर्ट के अनुसार, रतन टाटा ने अपनी संपत्ति का लगभग एक तिहाई हिस्सा, यानी लगभग 3800 करोड़ रुपए दान कर दिए हैं। इसके अलावा ‘रतन टाटा एडोमेंट फाउंडेशन’ (RTEF) जैसी चैरिटी संगठनों के लिए भी अपनी व्यक्तिगत संपत्ति का एक बड़ा हिस्सा रतन टाटा ने दिया है। इसमें ‘टाटा संस’ की 0.82% हिस्सेदारी शामिल है।

रतन टाटा की 10,000 करोड़ रुपए की अनुमानित संपत्ति के बँटवारे के लिए प्रोबेट की प्रक्रिया शुरू कर दी गई है। प्रोबेट का अर्थ है कि मृत व्यक्ति की वसीयत की वैधता को न्यायालय में प्रमाणित करना और उसके बाद वसीयत के अनुसार संपत्ति के लिए नामित व्यक्ति को उसका अधिकार देना। उनकी मृत्यु 9 अक्टूबर, 2024 को हुई थी।

रतन के भाई जिम अविवाहित हैं। उन्हें जुहू बँगले का एक हिस्सा दिया गया है। उनकी हिस्सेदारी काफी महत्वपूर्ण है। इसके अलावा सौतेली बहन शिरीन और डिनना जेजीभॉय को एक अन्य वित्तीय संपत्ति का लगभग एक तिहाई हिस्सा मिला है। इसके तहत लगभग 800 करोड़ रुपए की वैल्यू के बैंक की FD व पेंटिंग्स समेत अन्य चीजें शामिल हैं।

रिपोर्ट्स के अनुसार, वसीयत में टाटा समूह की पूर्व कर्मचारी मोहिनी दत्ता को भी एक तिहाई हिस्सा मिला है। सौतेले भाई नोएल टाटा को ‘टाटा ट्रस्ट’ का चेयरमैन बनाया गया है। इसके अलावा रतन टाटा के सबसे करीबी सहयोगी और दोस्त शांतनु नायडू को स्टार्टअप ‘गुडफेलोज’ में टाटा की हिस्सेदारी मिली है। शांतनु, रतन टाटा के निजी सहायक रहे और ‘टाटा ट्रस्ट्स’ में डिप्टी जनरल मैनेजर हैं। रतन टाटा की सेक्रेटरी दिलनाज गिल्डर को ₹10 लाख रुपए मिलेंगे।

रतन टाटा की संपत्ति में से उनके रसोइए सुब्बैया को ₹30 लाख मिलेंगे, वहीं रसोई के ही राजन शॉ और उनके परिवार के लिए ₹50 लाख की राशि नामित की गई है। राजन को ही पालतू कुत्ते टीटो की देखभाल का जिम्मा भी दिया है। इसके अलावा ₹12 लाख रुपए की राशि उनके सभी पालतू जानवरों की देखभाल के लिए दिए हैं। इसमें से हर तीन महीने ₹30 हजार रुपए का खर्च निर्धारित किया गया है।

पश्चिम बंगाल में आतंक अत्याचार और हिंसा के साये में जी रहे हैं हिंदू परिवार

कहीं जलाई तो कहीं खंडित की प्रतिमाएँ, कहीं बच्चों समेत छिपा हिन्दू परिवार तो कहीं फूँक दिए खेत: बंगाल में मार्च में हिन्दुओं पर हमले के 8 बड़े मामले

हाल के दिनों में पश्चिम बंगाल में कानून-व्यवस्था की स्थिति गंभीर रूप से बिगड़ गई है, और हिंदू समुदाय पर हमले बढ़ते जा रहे हैं। सत्तारूढ़ ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली तृणमूल कॉन्ग्रेस सरकार हिंदू पूजा स्थलों, दुकानों, व्यापारिक प्रतिष्ठानों और घरों को निशाना बनाकर की जाने वाली हिंसा, आगजनी और तोड़फोड़ को रोकने में विफल रही है। ममता बनर्जी की तुष्टिकरण की राजनीति और अपराधियों के खिलाफ पुलिस की ढिलाई व निष्क्रियता ने स्थिति को और खराब कर दिया है। अकेले मार्च 2025 में पश्चिम बंगाल में हिंदू समुदाय पर 8 हमले हुए।

नाओदा में हिंदुओं की दुकानों और संपत्तियों पर हमला (9 मार्च)

भाजपा विधायक सुवेंदु अधिकारी ने X (पूर्व में ट्विटर) पर जानकारी दी थी कि पश्चिम बंगाल के मुर्शिदाबाद जिले के नाओदा ब्लॉक के पटिकाबारी बाजार में हिंदू समुदाय की दुकानों और संपत्तियों पर हमला किया गया। अधिकारी ने ट्वीट किया, “कुछ घंटे पहले, बदमाशों ने मुर्शिदाबाद जिले के नाओदा ब्लॉक के पटिकाबारी बाजार में हिंदुओं की दुकानों और संपत्तियों में तोड़फोड़ की और आग लगा दी।” उन्होंने पश्चिम बंगाल पुलिस और राज्य के मुख्य सचिव से तत्काल हस्तक्षेप करने का अनुरोध किया था। भाजपा नेता ने कानून और व्यवस्था की स्थिति को नियंत्रण में लाने के लिए सशस्त्र बलों की तैनाती की माँग की।

सुवेंदु अधिकारी ने स्थिति को शांत करने के लिए सीमा सुरक्षा बल (BSF) की तैनाती की भी माँग की। उन्होंने कहा, “यदि आप स्थिति को नियंत्रित करने में सक्षम नहीं हैं, तो कृपया माननीय बंगाल के राज्यपाल से BSF कर्मियों की तैनाती के लिए अनुरोध करें ताकि कानून और व्यवस्था की स्थिति बहाल हो सके।” भाजपा प्रवक्ता अमित मालवीय ने भी हिंदुओं की दुकानों और संपत्तियों पर हमले का वीडियो साझा किया। उन्होंने ममता बनर्जी के समर्थकों पर तोड़फोड़ और आगजनी की साजिश रचने का आरोप लगाया।

बरुईपुर में देवी शीतला की मूर्ति में आग लगाई गई (7 मार्च )

पश्चिम बंगाल के दक्षिण 24 परगना जिले के बरुईपुर शहर में शेख इंदु नाम के एक मुस्लिम व्यक्ति ने देवी शीतला की मूर्ति को तोड़ दिया और उसमें आग लगा दी। सोशल मीडिया पर कई पोस्ट में जली हुई मूर्तियों और क्षतिग्रस्त हिंदू मंदिर के दृश्य देखे जा सकते हैं।

स्थानीय लोगों ने आरोपित को पकड़ लिया, जो तोड़फोड़ और आगजनी में शामिल था। बरुईपुर पुलिस ने 7 मार्च को ट्वीट कर दावा किया कि आरोपित ‘मानसिक स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं’ से ग्रस्त है और उसे हिरासत में ले लिया गया है। पुलिस ने बताया कि मामले की जाँच जारी है और आरोपी बाहरी व्यक्ति है।

बशीरहाट में काली मंदिर पर हमला (9 मार्च)

भाजपा नेता दिलीप घोष ने एक्स पर जानकारी दी कि पश्चिम बंगाल के उत्तर 24 परगना जिले के बशीरहाट शहर के शंखचूरा बाजार में काली मंदिर पर हमला हुआ और हिंदू देवता की मूर्ति को तोड़ दिया गया। भाजपा नेता ने कहा कि मंदिर पर हमला स्थानीय टीएमसी नेता शाहनूर मंडल के नेतृत्व में हुआ।

नंदीग्राम में हिंदू देवी-देवताओं की मूर्तियाँ तोड़ी गईं (14 मार्च)

भाजपा के राष्ट्रीय प्रवक्ता अमित मालवीय ने एक्स पर एक वीडियो साझा किया, जिसमें पश्चिम बंगाल के पूर्व मेदिनीपुर जिले के नंदीग्राम ब्लॉक 2 के कमालपुर गाँव में हिंदू देवी-देवताओं की मूर्तियों को अपवित्र अवस्था में देखा जा सकता है। उन्होंने आरोप लगाया कि पूजा और राम नारायण कीर्तन को कुछ लोगों ने बर्दाश्त नहीं किया और स्थल पर तोड़फोड़ की गई।

एक वीडियो में एक व्यक्ति को यह कहते हुए सुना गया कि “पुलिस की प्रतिक्रिया मौन है, आप देख सकते हैं कि पुलिस कुछ नहीं कर रही है।” वीडियो में एक पुलिसकर्मी को घटना को रिकॉर्ड कर रहे व्यक्ति को धमकाते हुए भी देखा गया।

मालदा के मोथाबारी में हिंसा गुरुवार (27 मार्च 2025)

मालदा जिले के मोथाबारी गाँव में हिंसक भीड़ ने हिंदुओं के स्वामित्व वाले व्यापारिक प्रतिष्ठानों और घरों को निशाना बनाया। एक हिंदू महिला ने बताया कि कैसे हिंदुओं के घरों को नष्ट कर दिया गया और लोग अपने बच्चों के साथ बिस्तरों के नीचे छिपने को मजबूर हुए।

एक पीड़िता ने कहा, “मुस्लिमों ने हिंदुओं के घर और दुकानें बर्बाद कर दीं और हमारा सामान लूट लिया। अब हम कैसे जिएँगे?” महिलाओं को अपनी धार्मिक पहचान छिपाने के लिए मजबूर किया जा रहा है, और उन पर हिजाब जैसा सिर ढकने का दबाव डाला जा रहा है।

झाउबोना में हिंदुओं के स्वामित्व वाले पान के खेतों में आग लगाई गई शनिवार (29 मार्च 2025)

भाजपा नेता सुकांत मजूमदार ने पश्चिम बंगाल के मुर्शिदाबाद जिले के झाउबोना में हिंदू समुदाय पर लक्षित हमलों के वीडियो साझा किए। उन्होंने कहा कि ‘जिहादी भीड़‘ ने हिंदुओं के स्वामित्व वाले पान के खेतों में आग लगा दी, दुकानों को लूट लिया और निर्दोष हिंदुओं पर हमले किए। उन्होंने ममता बनर्जी की तुष्टिकरण नीति को इसके लिए जिम्मेदार ठहराया।

पूर्व मेदिनीपुर में पूजा पंडाल पर हमला शनिवार (29 मार्च 2025)

भाजपा नेता सुवेंदु अधिकारी ने आरोप लगाया कि पूर्व मेदिनीपुर जिले के दक्षिण बरबरिया गाँव में ‘हिंसक मुस्लिम भीड़‘ ने माँ चंडी के पूजा पंडाल पर हमला किया और धारदार हथियारों से 10 हिंदू भक्तों को घायल कर दिया। घायलों को इलाज के लिए मुगबेरिया अस्पताल ले जाया गया।

दक्षिण दिनाजपुर में शीतला माता की मूर्ति तोड़ी गई रविवार (30 मार्च 2025)

भाजपा नेता सुकांत मजूमदार ने सोशल मीडिया पर जानकारी दी कि दक्षिण दिनाजपुर जिले के केशबपुर गाँव में श्री शीतला माता मंदिर में तोड़फोड़ की गई और देवी की मूर्ति को क्षतिग्रस्त किया गया। उन्होंने इस घटना की तत्काल जाँच और दोषियों के खिलाफ कार्रवाई की माँग की।

पश्चिम बंगाल में हालिया घटनाएँ कानून-व्यवस्था की चिंताजनक स्थिति को उजागर करती हैं। भाजपा नेताओं ने हिंसा और हमलों के लिए राज्य सरकार की नीति को जिम्मेदार ठहराया है और BSF की तैनाती की माँग की है। इन घटनाओं ने हिंदू समुदाय के बीच असुरक्षा की भावना को और गहरा कर दिया है।

साभार- https://hindi.opindia.com/ से

न्यायाधीशों के पास कितनी है संपत्ति, सार्वजनिक होगी जानकारी

सुप्रीम कोर्ट के सभी न्यायाधीशों ने मंगलवार (1 अप्रैल 2025) को फुल-कोर्ट मीटिंग में अपनी संपत्ति की घोषणा करने पर सहमति जताई। बैठक में न्यायाधीशों ने निर्णय लिया कि वे अपनी-अपनी संपत्तियों को का ब्यौरा भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) के समक्ष करेंगे। इसके बाद इसे सुप्रीम कोर्ट की आधिकारिक वेबसाइट पर अपलोड किया जाएगा, जिसे कोई भी देख सकेगा।

लाइव लॉ की रिपोर्ट के मुताबिक, सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीशों की परिसंपत्तियों की घोषणाओं को सार्वजनिक रूप से प्रकाशित करने के खास तौर-तरीकों को जल्दी ही अंतिम रूप दिया जाएगा। वर्तमान में सुप्रीम कोर्ट के सभी जजों ने अपनी संपत्ति की डिटेल दे दी है। हालाँकि, इन घोषणाओं को सार्वजनिक नहीं किया गया है।

सुप्रीम कोर्ट के जजों का यह निर्णय न्यायपालिका की पारदर्शिता में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। बता दें कि कुछ दिन पहले ही दिल्ली हाई कोर्ट के जस्टिस यशवंत वर्मा के घर आग लगी थी। वहाँ एक कमरे में करोड़ों रुपए नकदी जल कर खाक हो गए थे। इसके बाद कई तरह के सवाल उठ रहे थे। उन सवालों के बीच यह निर्णय लिया गया है।

हरिद्वार के सभी कसाईखानों को हटाया जाएगा, मांस की दुकानें शराब की बिक्री पर भी प्रतिबंध

हरिद्वार नगर निगम द्वारा 2024 में पारित आदेश को लागू करने के लिए नगर निगम क्षेत्र में संचालित सभी कसाईखानों को जल्द ही या तो स्थानांतरित किया जाएगा या बंद कर दिया जाएगा। वर्तमान में नगर निगम की सीमा के भीतर लगभग 100 कसाई की दुकानें चल रही हैं, लेकिन रिपोर्ट के अनुसार, इनमें से केवल कुछ ही दुकानों के पास वैध लाइसेंस हैं।

नगर निगम प्रशासन ने फैसला लिया है कि वैध परमिट वाली दुकानों को सराय गाँव में बनाए गए नए क्षेत्र में स्थानांतरित किया जाएगा, जबकि अवैध रूप से संचालित दुकानों को पूरी तरह से बंद कर दिया जाएगा। हरिद्वार नगर आयुक्त नंदन कुमार के अनुसार, अब तक सराय गाँव में 60 दुकानें बनाई जा चुकी हैं, जहाँ वैध दुकानों को स्थानांतरित किया जाएगा।

ज्वालापुर और जगजीतपुर को छोड़कर, हरिद्वार को एक शुष्क ऐसा घोषित किया गया है, जहाँ मांस और शराब की बिक्री पर रोक है। यह कदम स्वच्छता सुनिश्चित करने और आवारा कुत्तों की समस्या को नियंत्रित करने के लिए उठाया गया है।

नगर निगम की इस कार्रवाई से हरिद्वार की धार्मिक एवं सांस्कृतिक पहचान को बनाए रखने में भी मदद मिलेगी।

दिल्ली का भविष्य: नई सरकार के सामने चुनौतियाँ और संभावनाएँ

दिल्ली की नई चुनी हुई सरकार के सामने अपने चुनावी वादे पूरे करने के साथ साथ राष्ट्रीय राजधानी के प्रशासन की मुश्किल चुनौती है

फ़रवरी 2025 में हुए दिल्ली विधानसभा के चुनावों के ज़रिए राजधानी में भारतीय जनता पार्टी की सरकार बनी है. दिल्ली के मतदाताओं ने मौजूदा सरकार को जो जनादेश दिया है, वो बिल्कुल स्पष्ट और भारी भरकम है. दिल्ली की सरकार के लिए अच्छी बात ये है कि केंद्र में उसकी दोस्ताना हुकूमत है और इस तरह जैसा कि कहा जाता है, दिल्ली में ‘डबल इंजन’ की सरकार है. यही नहीं, दिल्ली में चुनाव के कुछ दिनों बाद, दिल्ली नगर निगम के तीन पार्षद भारतीय जनता पार्टी में शामिल हो गए, जिससे एमसीडी में भी बीजेपी को बहुमत हासिल हो गया है. इसका मोटे तौर पर मतलब यही है कि राजनीतिक रूप से दिल्ली में अब ‘ट्रिपल इंजन की सरकार’ है, क्योंकि केंद्र, राज्य और नगर निकाय के स्तर पर एक ही पार्टी सत्ता में है और अब दिल्ली की जनता से किए गए वादे पूरे करने के लिए भारतीय जनता पार्टी की राह में कोई बाधा नहीं है.

दिल्ली राज्य तीन तरफ़ से हरियाणा और पूरब में उत्तर प्रदेश से घिरा है. इसका भौगोलिक क्षेत्र 1483 वर्ग किलोमीटर है. इसमें से 369.35 वर्ग किलोमीटर इलाक़े को ग्रामीण (24.90 फ़ीसद) क्षेत्र घोषित किया गया है. वहीं, 1113.65 वर्ग किलोमीटर (75.1 प्रतिशत) क्षेत्र शहरी कहा जाता है. 1961 में दिल्ली में जहां 300 गांव थे, वहीं 2001 में इनकी तादाद घटकर 165 और 2011 में और भी कम होकर सिर्फ़ 112 रह गई. ये बात भी महत्वपूर्ण है कि दिल्ली की आबादी बड़ी तेज़ी से बढ़ रही है. 1951 में दिल्ली की आबादी 17.4 लाख थी, जो 2011 में बढ़कर 1.678 करोड़ पहुंच चुकी थी. वर्ल्ड पॉपुलेशन रिव्यू के मुताबिक़ 2024 में दिल्ली की आबादी 3.380 करोड़ पहुंच चुकी थी, जो सबसे ज़्यादा आबादी वाले दुनिया के शहरों में केवल टोक्यो से कम थी. 2030 तक दिल्ली की जनसंख्या 3.893 करोड़ पहुंचने का अनुमान लगाया गया है, जिससे वो दुनिया का सबसे ज़्यादा आबादी वाला शहर बन जाएगी. ऐसे में दिल्ली सरकार के सामने राष्ट्रीय राजधानी के प्रबंधन की भारी चुनौती है. क्योंकि जब मौजूदा सरकार का कार्यकाल ख़त्म होगा, तब तक दिल्ली दुनिया का सबसे बड़ा शहर बन चुकी होगी.

दिल्ली विधानसभा चुनाव के लिए बीजेपी ने अपने घोषणापत्र का नाम ‘विकसित दिल्ली संकल्प पत्र 2025’ रखा था, जिसमें दिल्ली की आबादी के अलग अलग तबक़ों के लिए मुफ़्त की योजनाओं का ऐलान किया गया था.

विचित्र बात ये है कि दिल्ली विधानसभा चुनाव के लिए बीजेपी ने अपने घोषणापत्र का नाम ‘विकसित दिल्ली संकल्प पत्र 2025’ रखा था, जिसमें दिल्ली की आबादी के अलग अलग तबक़ों के लिए मुफ़्त की योजनाओं का ऐलान किया गया था. हालांकि, बीजेपी के संकल्प पत्र में उन प्रशासनिक लक्ष्यों का अभाव दिखा था, जो शहर की समस्याओं का समाधान करने वाले हों. बीजेपी के घोषणापत्र में जिन 16 वादों का ज़िक्र किया गया है, उनमें पूर्ववर्ती सरकार द्वारा चलाई जा रही 16 योजनाओं को जारी रखने, ग़रीब परिवारों की महिलाओं को 2500 रुपए प्रति महीने देने, हर गर्भवती महिला को 21 हज़ार रुपए की सहायता और छह पोषण किट देने, ग़रीब परिवारों की महिलाओं को 500 रुपए में रसोई गैस का सिलेंडर देने के साथ साथ होली और दिवाली पर मुफ़्त में गैस सिलेंडर देने के वादे किए गए हैं. यही नहीं, आयुष्मान भारत योजना के तहत ग़रीब परिवारों को पांच लाख रुपए की मेडिकल सहायता दी जानी है.

 इसके अलावा, राज्य सरकार ने अपनी तरफ़ से भी पांच लाख रुपए के मेडिकल कवर की गारंटी देने की घोषणा की है. 70 साल से ऊपर के वरिष्ठ नागरिकों को मुफ़्त में ओपीडी और जांच की सेवाएं दी जाएंगी. इसके अलावा 60 से 70 साल आयु वर्ग के लोगों को ढाई हज़ा रुपए पेंशन, 70 साल से ज़्यादा उम्र वालों, विधवाओं, बेसहारा लोगों और दिव्यांगों को तीन हज़ार रुपए महीने पेंशन दी जानी है.

‘अटल कैंटीन’ में पांच रुपए में खाना मुहैया कराया जाएगा, दिल्ली सरकार के संस्थानों में ग़रीबों के बच्चों को केजी से लेकर पोस्ट ग्रेजुएशन तक की पढ़ाई की सुविधा मुफ़्त में दी जाएगी. वहीं, प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करने वालों को एक बार में 15 हज़ार रुपए की सहायता देने के वादे भी बीजेपी ने किए हैं. इसी तरह, तकनीकी संस्थानों में तकनीकी और पेशेवर पढ़ाई कर रहे दलित वर्ग के छात्रों को एक हज़ार रुपए महीने स्टाइपेंड दिया जाना है. वहीं, ऑटो रिक्शा चलाने वालों, टैक्सी ड्राइवरों और घरेलू काम-काज करने वालों के लिए कल्याणकारी बोर्ड का गठन करने का वादा भी किया गाय है.

इन सबको सरकार की तरफ़ से दस लाख रुपए तक का जीवन बीमा, पांच लाख रुपए तक का दुर्घटना बीमा, उनके बच्चों को उच्च शिक्षा की पढ़ाई के लिए छात्रवृत्ति और सभी घरेलू काम-काजी महिलाओं को छह महीने की मैटरनिटी लीव, तनख़्वाह के साथ दी जानी है. सरकार, सड़क पर रेहड़ी पटरी लगाने वाले लाभार्थियों की संख्या दो गुनी करेगी और ये सुनिश्चित करेगी कि सभी पात्र किसानों का नौ हज़ार रुपए सालाना मिलने वाली किसान सम्मान निधि के लिए रजिस्ट्रेशन हो सके. इन 16 वादों में से सिर्फ़ एक जगह नाम मात्र के लिए नागरिक सेवाओं का ज़िक्र किया गया है. सरकार, पड़ोसी राज्यों, दिल्ली नगर निगम, नई दिल्ली म्युनिसिपल कमेटी और केंद्र सरकार के साथ सहयोग के ज़रिए, दिल्ली की स्वास्थ्य, यातायात, बिजली, पानी और परिवहन की समस्याओं का प्रभावी समाधान निकालेगी.

जहां तक बीजेपी के संकल्प पत्र की बात है, तो ये मुफ़्त की राजनीति वाली संस्कृति का ही एक व्यापक विस्तार था. हालांकि, ये भी सही है कि घोषणापत्र में नागरिक सेवाओं, सामाजिक और भौतिक ढांचे का भी ज़िक्र किया गया है. घोषणापत्र में सस्ते इलाज और सबको साफ़ पानी देने का ज़िक्र है. दिल्ली को प्रदूषण मुक्त बनाने का वादा है. सुरक्षा और हिफ़ाज़त के साथ साथ नगर निगम की बुनियादी सुविधाओं का भी प्रावधान किया गया है. घोषणापत्र में दिल्ली के भयंकर प्रदूषण की समस्या को स्वीकार किया गया है और ये भी माना गया है कि दिल्ली में यमुना नदी एक बड़े नाले में तब्दील हो चुकी है.

बीजेपी के संकल्प पत्र में सत्ता से बेदख़ल की गई सरकार के प्रशासनिक कुप्रबंधन, विश्व स्तरीय मूलभूत ढांचे के वादे, स्वच्छ पर्यावरण और शानदार शहरी सेवाओं की बातें भी लिखी हैं. संकल्प पत्र में बीजेपी ने जनता को विश्वास दिया है कि वो अच्छा प्रशासन देगी. इसके साथ साथ बीजेपी ने दिल्ली की 1700 अवैध कॉलोनियों को नियमित करने और वहां रहने वालों को पूरा मालिकाना हक़ देने का वादा भी किया गया है. घोषणापत्र में महिलाओं के सशक्तिकरण का विशेष रूप से ज़िक्र किया गया है. इसके साथ साथ वरिष्ठ नागरिकों के कल्याण, स्वास्थ्य, शिक्षा और युवा सशक्तिकरण का भी घोषणा पत्र में ज़िक्र किया गया है. बीजेपी ने ट्रांसजेंडर्स, दिव्यांगों, पूर्व सैनिकों और सिख समुदाय की विशेष ज़रूरतों की भी अनदेखी नहीं की है.

दिल्ली की नई सरकार के सामने जो सबसे बड़ी चुनौती होगी वो दिल्ली में वायु प्रदूषण और यमुना नदी को बहाल करने की शक्ल में होगी. दिल्ली ने लगातार दुनिया के सबसे प्रदूषित शहर होने का दर्जा हासिल करने की अभूतपूर्व उपलब्धि दर्ज कराई है

हालांकि, दिल्ली की नई सरकार के सामने जो सबसे बड़ी चुनौती होगी वो दिल्ली में वायु प्रदूषण और यमुना नदी को बहाल करने की शक्ल में होगी. दिल्ली ने लगातार दुनिया के सबसे प्रदूषित शहर होने का दर्जा हासिल करने की अभूतपूर्व उपलब्धि दर्ज कराई है और सांस और दिल की बीमारियों की वजह से दिल्ली की हवा मौत का एक बड़ा कारण बन चुकी है. हालांकि, पिछले कुछ वर्षों के दौरान कुछ उपलब्धियां तो हासिल की गई हैं. लेकिन, 2024 में किए गए एक अध्ययन में एक बार फिर से दिल्ली में वायु प्रदूषण के बढ़ते स्तर के ख़तरनाक होने का हवाला देते हुए चेतावनी दी गई थी कि शहर में बढ़ते वायु प्रदूषण की वजह से जान का जोखिम बढ़ता जा रहा है. इस स्टडी में इस बात की वकालत की गई थी कि दिल्ली प्रशासन, सर्दियों में जब हवा का प्रदूषण सबसे ख़राब स्तर पर होता है, तब प्रतिक्रिया स्वरूप आपातकालीन उपाय करने के बजाय उसके आगे की सोचे.

अध्ययन में सुझाव दिया गया था कि उत्सर्जन को कम करने और अनुपालन के मज़बूत ढांचे के लिए पूरे साल संस्थागत बदलाव के क़दम उठाए जाएं. दिल्ली के भयंकर रूप से ख़तरनाक हो चुके वायु प्रदूषण से निपटने की फ़ौरी ज़रूरत उस वक़्त और उजागर हो गई थी, जब सुप्रीम कोर्ट ने पिछले साल नवंबर में पूरे राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र (NCR) के स्कूल बंद करने और ग्रेडेड रिस्पांस एक्शन प्लान (GRAP) स्टेज IV के तहत प्रदूषण से निपटने के सख़्त क़दम उठाने के निर्देश दिए थे. अगर दिल्ली की नई सरकार अभी से प्रदूषण कम करने के ठोस उपाय नहीं करती, तो फिर 2025 की सर्दियां आते ही उसकी भयंकर आलोचना होगी. इस समस्या का पूरी गहराई से अध्ययन किया जा चुका है और निदान के उपाय क्या किए जाने हैं, वो भी सबको पता हैं. ज़रूरत राजनीतिक और प्रशासनिक तौर पर मज़बूत इच्छाशक्ति की है, जिसके ज़रिए ठोस और कड़े फ़ैसले लागू किए जाने हैं. क्योंकि, इनमें से कुछ उपाय प्रदूषण पैदा करने वालों पर चोट करेंगे.

यमुना नदी की सफ़ाई का काम तो और भी चुनौती भरा होने वाला है. पिछले कई दशकों से यमुना में सीवेज जाने से यमुना एक नाले में तब्दील हो चुकी है और लगभग मृतप्राय हो गई है. हालांकि, चुनाव के दौरान यमुना की सफ़ाई का वादा, दिल्ली के नागरिकों से किए गए बीजेपी के प्रमुख वादों में से एक था. ख़बरों के मुताबिक़ भारत सरकार ने ‘यमुना मास्टर प्लान’ के तहत यमुना की सफ़ाई के तीन साल के कार्यक्रम की शुरुआत कर दी है. इस योजना के तहत चार चरणों की रणनीति लागू की जानी है. जिसके पहले चरण में नदी से कचरा और तलछट साफ़ करना, प्रमुख नालों की सफ़ाई, सीवेज ट्रीटमेंट के मौजूदा प्लांटों (STPs) का पूरी क्षमता से उपयोग और जो सीवज अभी शोधित नहीं होता, उसके ट्रीटमेंट के लिए नए सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट (STPs) का निर्माण करना है.

इन वादों को पूरा करने के लिए लगातार वृहद प्रयास करने होंगे और सही समय पर पर्याप्त मात्रा में फंड उपलब्ध कराने होंगे. निगरानी के लिए प्रशासन की अलग अलग शाखाओं को आपस में नज़दीकी तालमेल से काम करना होगा और शीर्ष स्तर पर हर परियोजना की नियमित रूप से समीक्षा की ज़रूरत होगी. ट्रिपल इंजन की सरकार के सत्ता में होने की वजह से बहानेबाज़ी और छुपने की कोई गुंजाइश नहीं होगी.

 
(लेखक आईएएस अधिकारी हैं  महाराष्ट्र सरकार में कई महत्वपूर्ण पदों पर रहे हैं व ऑब्ज़र्वर रिसर्च फाउंडेशन मुंबई में शोधार्थी हैं  और शहरी विकास मामलों के विशेषज्ञ हैं) 
 
साभार https://www.orfonline.org/ से

रक्षा मंत्री ने माउंट एवरेस्ट और कंचनजंघा अभियान को हरी झंडी दिखाई

रक्षा मंत्री श्री राजनाथ सिंह ने 03 अप्रैल, 2025 को साउथ ब्लॉक, नई दिल्ली से माउंट एवरेस्ट (8,848 मीटर) और माउंट कंचनजंगा (8,586 मीटर) के लिए अभियानों को हरी झंडी दिखाई। भारतीय सेना के माउंट एवरेस्ट अभियान में 34 पर्वतारोही शामिल हैं और यह दल पारंपरिक साउथ कोल रूट का अनुसरण करेगा जिसका नेतृत्व लेफ्टिनेंट कर्नल मनोज जोशी करेंगे। संयुक्त भारत-नेपाल अभियान का उद्देश्य माउंट कंचनजंगा पर चढ़ना है। इसमें भारतीय सेना के 12 पर्वतारोही और नेपाली सेना के छह पर्वतारोही शामिल होंगे। इसका नेतृत्व भारतीय सेना के कर्नल सरफराज सिंह करेंगे।

इसके अलावा, माउंट एवरेस्ट पर एक संयुक्त एनसीसी अभियान का नेतृत्व कर्नल अमित बिष्ट करेंगे। इस दल में पांच छात्रा कैडेट, पांच छात्र कैडेट, चार अधिकारी और 11 स्थायी प्रशिक्षक कर्मचारी शामिल हैं। इस महीने शुरू होने वाले इन अभियानों का लक्ष्य मई 2025 तक अपने-अपने शिखरों पर पहुंचना है।

रक्षा मंत्री ने पर्वतारोहियों से बातचीत कर उनके साहस, समर्पण और दृढ़ संकल्प की सराहना की। उन्होंने विश्वास जताया कि ये अभियान युवाओं को प्रेरित करेंगे और अधिक ऊंचाई वाले क्षेत्रों में पर्वतारोहण में भारत के नेतृत्व को प्रदर्शित करेंगे।

इन अभियानों को सशस्त्र बलों के असाधारण कौशल, लचीलेपन और अदम्य भावना को प्रदर्शित करने के लिए डिज़ाइन किया गया है। इनसे भावी पीढ़ियों को साहस, दृढ़ संकल्प और उत्कृष्टता की भावना के साथ अपने सपनों को आगे बढ़ाने के लिए प्रेरणा मिलने की उम्मीद है।

भारतीय सेना द्वारा आयोजित इस कार्यक्रम में चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ जनरल अनिल चौहान, आर्मी चीफ जनरल उपेंद्र द्विवेदी, भारत में नेपाल के राजदूत डॉ. शंकर पी. शर्मा, नेपाल का एक प्रतिनिधिमंडल और अन्य वरिष्ठ नागरिक एवं सैन्य अधिकारी शामिल हुए।

1100 अंतरराष्ट्रीय प्रतिभागियों के साथ वेव्स ‘क्रिएट इन इंडिया चैलेंज’का पंजीकरण 85,000 के पार

मुंबई में 1 से 4 मई, 2025 तक वेव्स ‘क्रिएटोस्फेयर’ में 32 चैलेंज से 750 फाइनलिस्ट भाग लेंगे

1 से 4 मई, 2025 तक मुंबई के जियो वर्ल्ड सेंटर में होने वाले वर्ल्ड ऑडियो विजुअल एंड एंटरटेनमेंट समिट (वेव्स) के हिस्से के रूप में लॉन्च किए गए क्रिएट इन इंडिया चैलेंज (सीआईसी) सीजन-1 ने 1,100 अंतरराष्ट्रीय प्रतिभागियों सहित 85,000 पंजीकरणों को पार करने की एक नई उपलब्धि हासिल की है। 32 विविध चैलेंजों में से एक सावधानीपूर्वक चयन प्रक्रिया के बाद चुने गए 750 से अधिक फाइनलिस्टों को अपनी व्यक्तिगत चुनौती, अपनी प्रतिभा और कौशल के परिणाम और आउटपुट को दिखाने के अलावा पिचिंग सत्रों सहित अपने संबंधित क्षेत्र के व्यापारिक नेताओं के साथ नेटवर्किंग के अवसर और मास्टरक्लास, पैनल चर्चा, सम्मेलनों आदि के माध्यम से वैश्विक दिग्गजों से सीखने का एक अनूठा अवसर मिलेगा। क्रिएट इन इंडिया चैलेंजों के विजेताओं को मुंबई में एक भव्य समारोह में ‘वेव्स  क्रिएटर अवार्ड्स’ से सम्मानित किया जाएगा।

इन चैलेंजों ने रचनात्मक परिदृश्य में एक शक्तिशाली प्रवेश किया है। इससे भारत और उसके बाहर नवाचार और जुड़ाव की एक लहर पैदा हुई है, जो वैश्विक स्तर पर रचनात्मक प्रतिभा के लिए एक प्रमुख मंच के रूप में उभर रहा है। हाई-एनर्जी रील मेकिंग कॉम्पिटिशन, सॉल्यूशन-ओरिएंटेड ट्रुथ टेल हैकथॉन, दूरदर्शी यंग फिल्ममेकर चैलेंज और कल्पनाशील कॉमिक्स क्रिएटर चैंपियनशिप सहित 32 विविध और सशक्त चैलेंजों की विशेषता के साथ, सीआईसी क्रिएटर्स को अपने कौशल का प्रदर्शन करने का एक अनूठा अवसर प्रदान करता है। अन्य प्रमुख कार्यक्रम जैसे कि ए.आई अवतार क्रिएटर चैलेंज, डब्ल्यूएएम! एनीमे चैलेंज, ईस्पोर्ट्स टूर्नामेंट, ट्रेलर मेकिंग कॉम्पिटिशन, थीम म्यूजिक कॉम्पिटिशन और अत्याधुनिक एक्सआर क्रिएटर हैकथॉन सीआईसी को कहानीकारों, डिजाइनरों और डिजिटल इनोवेटर की अगली पीढ़ी के लिए एक निश्चित लॉन्चपैड के रूप में स्थापित करते हैं।

विभिन्न विषयों, सीमाओं और पीढ़ियों के रचनाकारों को एकजुट करके, सीआईसी न केवल भारत की रचनात्मक ऊर्जा का जश्न मनाता है – इसने कहानी कहने और डिजिटल अभिव्यक्ति के भविष्य के बारे में वैश्विक संवाद को बढ़ावा दिया है। इस उल्लेखनीय आधार के साथ रचनाकारों को सशक्त बनाने और कल के सांस्कृतिक परिदृश्य को आकार देने के अपने मिशन को जारी रखते हुए, सीआईसी आने वाले सीजन में नई ऊंचाइयों को छूने के लिए तैयार है।

वेव्स के बारे में

भारत सरकार द्वारा 1 से 4 मई, 2025 तक मुंबई, महाराष्ट्र में मीडिया और मनोरंजन (एम एंड ई) क्षेत्र के लिए एक महत्वपूर्ण कार्यक्रम,  प्रथम विश्व ऑडियो विजुअल और मनोरंजन शिखर सम्मेलन (वेव्स) आयोजित किया जाएगा।

चाहे आप इस इंडस्ट्री के पेशेवर हों, निवेशक हों, निर्माता हों या नवोन्मेषक हों, शिखर सम्मेलन एम एंड ई परिदृश्य से जुड़ने, सहयोग करने, नवोन्मेष करने और योगदान करने के लिए अंतिम रूप से एक वैश्विक मंच प्रदान करता है।

वेव्स भारत की रचनात्मक शक्ति को बढ़ाने के लिए तैयार है, जो सामग्री निर्माण, बौद्धिक संपदा और तकनीकी नवाचार के केंद्र के रूप में अपनी स्थिति को बढ़ाएगा। इसके केन्द्र में प्रसारण, प्रिंट मीडिया, टेलीविजन, रेडियो, फिल्म, एनिमेशन, विजुअल इफेक्ट, गेमिंग, कॉमिक्स, ध्वनि और संगीत, विज्ञापन, डिजिटल मीडिया, सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म, जनरेटिव एआई, एक्सटेंडेड रियलिटी (एआर), वर्चुअल रियलिटी (वीआर), और एक्सटेंडेड रियलिटी (एक्सआर) जैसे उद्योग और अन्य क्षेत्र शामिल हैं ।

क्या आपके कोई प्रश्न हैं? उत्तर के लिए यहां देखे

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मन दर्पण के प्रतिबिंब:जीवन के अनछुए पहलुओं का प्रतिबिम्ब

 ‘मन दर्पण के प्रतिबिम्ब‘ श्रीमती शिखा अग्रवाल की कविताओं की प्रथम पुस्तक है लेकिन पढ़ने पर पता चलता है कि शिखा  की कविता की समझ बहुत गहरी है और वे जो कहना चाहती हैं उसे शब्दों में ढालने का हुनर भी लाजवाब है। यह एक सार्वभौमिक सत्य है कि पुरूष की तुलना में नारी मन कुछ अधिक ही भावुक और संवेदनशील होता है। नारी मन हमेशा अमृत खोजता है वहीं पुरूष मन कठोर और कड़वे संवेगों का वाहक अधिक होता है । यह बात इस पुस्तक को पढ़ने से स्पष्ट जाहिर हो जाती है। मन को दर्पण का रूप सदा से ही माना जाता रहा है। इस पुस्तक के शीर्षक से ही स्पष्ट हो जाता है कि जिन अनुभूतियों की छाया शिखा की मन दर्पण पर पड़ी उसी का प्रतिबिम्ब उनके हृदय से कविताओं के रूप में प्रतिबिम्बित हुआ है।
 कवयित्री ने अपनी भूमिका ‘कवयित्री की कलम से‘ में प्रथम पंक्ति मे ही यह स्पष्ट कर दिया है कि ‘‘ सत्यं शिवम् सुन्दरं की भावना ही कविता का मूल है।‘‘ यही सोच उनकी हर कविता में प्रकट होती है। सच है, साहित्य ही वह अमृत है जो संसार को सत्यं शिवम सुन्दरं बनाता है। कवयित्री कविता लेखन का उनका उद्धेश्य स्पष्ट करती हुई लिखती है — ‘कविता की सफलता उसकी गहराई है जो दिल से सीधे उतरकर श्रोता अथवा पाठक का मनोरंजन करे, चिंतन की दिशा प्रदान करे, समस्या के प्रति उद्वेलित करे , देश प्रेम का जज्बा जगााए और प्रेम के समन्दर में गोते लगाने को मजबूर करे।‘‘
इस काव्य संग्रह के 112 पृष्ठों में कुल 45 कविताओं का पुष्पगुच्छ है जो भांति- भांति के कथ्य की सुगंध को पाठक तक पहुंचाकर पाठकों के मन को हर्षित कर देते हैं। संग्रह की प्रथम कविता के अंश —
कुछ करने की आग थी मन में।
कुछ कहने की आग थी मन में।।
कवयित्री की अभिव्यक्ति प्रक्रिया को प्रकट करती है। कवयित्री अतीत की सुखद अनुभूति करती हुई बेमौसम बरसात कविता में लिखती हैं –
साल दर साल बीत चुके थे।
कईं लम्हे किताबों में गुलाब बन चुके थे।
“तलाश” शीर्षक कविता में वे पाठक के चिंतन को दिशा देती हुई लिखती है – तलाशना है तो/ पाप के बोध में दबी अपनी / अंतरात्मा /को /तलाश। कविता की ये पंक्तियां पाठक की आंखें खोलने के लिए पर्याप्त है।
 “जन्म दिन” कविता में – एक फूल को हमने सुगंध से परखा है, भाग्यशाली है वह नारी, आंगन जिसके जली ये लौ। जन्मदात्री को भी बधाई की पात्र मानती है।
      “गुरूर की आत्म कथा” में कवयित्री की कलम से निकली धारा के प्रवाह जैसी अनुभूति तो देखने योग्य है जो समाज के विभिन्न वर्गों में व्याप्त वास्तविकता का परिचय करवाती है
‘‘मैं गुरूर हूं/ मेरी आत्म कथा शुरू होती है/मानव मन से / ….. मुझे अलग- अलग नामों से पुकारा गया/रईसों की मैं अकड़ हूं/सुन्दरियों का मैं घमंड हूं/सफलता का मैं अहंकार हूं/ लेखक की कलम का मैं गौरव हूं / पद पर आसीन मैं हँसता हुआ दंभ हूं/ मैं गुरूर हूं।‘‘ …‘‘दोस्तों! मेरा सबसे बड़ा दुश्मन वक्त है/ वही मुझे बनाता है/वही मुझे मिटाता है।‘‘
यह कविता पाठक के हृदय को सीधा स्पर्श कर गुरूर नहीं रखने की प्रेरणा देती है।
कविता “छुट्टियां” सीधी सपाट रचना हैं जिसका पाठक से सीधा जुड़ाव बन जाता है। कवयित्री की दृष्टि समाज व्यक्ति और परिवेश विशेष स्थान रखते हैं और यही भाव ‘‘ख्याल’’ नामक कविता से उभर कर आते हैं।
 “आंसू” कविता पाठक को भाव विभोर कर देने वाली कविता है — हृदय की गहाईयों से पनपे/नयनों के दामन में पसरे/क्यों सहमे हैं?/ठहरे हैं/थमे हैं/ये आंसू।
जिस कविता ने मुझे अत्यधिक प्रभावित किया है वह आज के समय की साहित्य जगत की सबसे बड़ी समस्या को सामने लाती है। सतत देखने में आ रहा है कि हर वर्ष हजारों की संख्या में लेखकों की किताबें छप रही है किंतु पाठक नहीं मिल रहे है। हकीकत तो यह भी है कि स्वयं लेखक होकर भी अन्य साथी लेखकों और कवियों की पुस्तकों को नहीं पढ़ते बल्कि केवल एक आशा रखते हैं कि उनकी पुस्तकों को अन्य अवश्य पढ़ें किन्तु वे किसी की भी साथी की लिखी पुस्तक को नहीं पढ़ते। ऐसे कवियों और लेखकों को दी गई पुस्तकें केवल आलमारी की शोभा ही बढ़ाती है।
 इसी पीड़ा को उजागर कविता ‘‘कारण‘‘ एक सार्थक कविता है। कितना अच्छा हो कि लेखिका की इस कविता को पढ़कर लेखक और कवि अन्य की रचनाओं और कृतियों को पढ़ने का प्रण लें। इस कविता ये पंक्तियां विचारणीय हैं —
क्या कारण है?/कि हम सभी/ एक दूसरे की रचनाओं को/ नहीं पढ़ते हैं।
क्या कारण है ?/कि हम सभी ज्ञान का सागर नहीं बढ़ाते हैं।
 यह कविता इस सत्य को भी उजागर करती है कि बिना अध्ययन के किया गया लेखन प्रभावी व सत्यपरक नहीं होता है। बधाई शिखा जी जो आपने लेखकों को सोचने एवं पढ़ने के लिए उत्प्रेरित किया।
आज धार्मिक मूर्तियां ड्राईंग रूम को सजाने के लिए इस्तेमाल होने लगी हैं। आज जीवन मूल्यों का किस प्रकार ह्रास हो रहा है और हम किस तरफ बढ़ रहे हैं इस पीड़ा को कवयित्री ने हृदय से महसूस किया है। तभी तो वे लिखती हैं –
 द्रवित मन से यह सोच होता है/शांति का दूत जब बैठक की सजावट बनता है/
पोटली वाला बुद्धा ज्यादा सुन्दर है/या स्माईली बुद्धा ज्यादा जचेगा/ यह देख इंसा पर रोष बहुत आता है । …….
इच्छा- वासना खुलकर मचा रही धमाल मांस मदिरा शराब से लोग हो रहे लाल/संगीत के साज पर अब गूंजती है आवाज यह/मद्यम शरणं गच्छामि/मांसम शरणं गच्छामि/ डांसम शरणं  गच्छामि।
आज की भोगवादी संस्कृति पर चोट करती हुई कवयित्री लिखती है – बंगला खरीदा, गाड़ी खरीदी / पर नहीं खरीद सके संस्कार। (पृष्ठ संख्या 68) । निरर्थक अहं से पूर्ण लोगों के लिए तो कवयित्री की ये पंक्यिां ही काफी हैं-
समंदर का घमंड टूट जाता गर/उसे पता हो,/
प्यास बुझाने के लिए बहुत नहीं/थेड़ा पानी ही बहुत है। (पृष्ठ संख्या 69)
कुछ कविताओं से अंश उद्धृत कर रहा हूं जो कि सहज ही  मन को भा जाते हैं। और सूत्र वाक्य से लगते हैं। यथा –
चाहे जितना लिखू/रहोगे तुम फिर भी/अपरिभाषित। (अपरिभाषित पृष्ठ संख्या 31)
घरोंदा नहीं मेरा कोई/खुले आसमां का हूं वारिस /उड़ते बादल मेरा बिछौना/यही मेरा रैन-बसेरा (चांद की दास्तां पृष्ठ संख्या 42)
आओ सुनें कहानी मजदूरों की/पिरोएं कुछ शब्दों में इनकी मजबूरी।(मजदूर नहीं मजबूर पृष्ठ संख्या 49)
जिन्दगी तुझ से कहां जी भरता है/ज्यों-ज्यों तेरी सांसे सरकती है/त्यो- त्यों साँसे लेने का मन करता है। ( जिन्दगी तुझ से कहां जी भरता है पृष्ठ संख्या 56)
अन्दर से पंखुड़ी सा कोमल/ऊपर से कठोर / रामसेतु सा पुल हैरुये एक पिता है। (पिता पृष्ठ संख्या 60)
इतना खुद को तराशा होता /तो स्वयं/गुलाब /बन जाते। (पृष्ठ संख्या 80)
बिल्कुल सही कहा शिखा ने आज हमें स्वयं को तराशने की आवश्यकता है।
शिखा  का साहित्य से जुड़ाव और लेखन उन्हें उनके पिता  डॉ. प्रभात कुमार सिंघल से विरासत में मिला है। राजस्थान साहित्य अकादमी के आर्थिक सहयोग से प्रकाशित यह पुस्तक भाव प्रधान ऐसी कविताओं का संग्रह है जो जीवन के कईं अनछुए पहलुओं का हमारे सामने शब्दों में पिरोकर गजरा बनाकर रखती हैं।
      हां, गर कोई कमी मुझे खटकी तो वह यह है कि कवयित्री ने उर्दू ,अरबी, फारसी के कईं ऐसे शब्दों का इस्तेमाल किया है जिनका हिन्दी से कोई संबंध भी नहीं है किन्तु ये शब्द कविता का कलेवर पाठक तक पहुंचाने में समर्थ भी हैं। आशा करता हूं कि आगे आने वाली उनकी रचनाओं में हिन्दी शब्दों की प्रधानता रहेगी और उर्दू  और अरबी के कठिन शब्दावली से परहेज करेंगी।
कवयित्री शिखा को अनन्त शुभकामनाएं। मां वीना उनकी कलम को निरन्तर गतिमान बनाए रखे, यही ईश्वर से प्रार्थना करता हूं ताकि समाज को अच्छी कविताओं की सौगात उनकी कलम से मिलती रहे।
पुस्तक – मन दर्पण के प्रतिबिम्ब
विधा – कविता
कवयित्री – शिखा अग्रवाल
प्रकाशक : साहित्यागार, जयपुर
मूल्य : 225 ₹
समीक्षक
जयसिंह आशावत, एडवोकेट, नैनवां, जिला बून्दी, राजस्थान ।
मोबाइल नंबर – 9414963266

ऑन द फास्ट ट्रैक : रेलवे के इंफ्रास्‍ट्रक्‍चर और विकास को पुनर्परिभाषित करता गुजरात

औद्योगिक विस्तार और इंफ्रास्‍ट्रक्‍चर के विकास में उल्लेखनीय उपलब्धियों के कारण गुजरात को लंबे समय से भारत के विकास इंजन के रूप में जाना जाता है। उद्यमशीलता और विनिर्माण को बढ़ावा देकर राज्य ने एक लचीले परिवहन नेटवर्क द्वारा मजबूत और संपन्न अर्थव्यवस्था का निर्माण किया है। इस वर्ष का रेल बजट रेलवे के इंफ्रास्‍ट्रक्‍चर के आधुनिकीकरण के प्रति गुजरात की प्रतिबद्धता को पुष्ट करता है। इस महत्वपूर्ण निवेश का उद्देश्य संरक्षा में वृद्धियात्री अनुभव में सुधार और क्षेत्रीय आर्थिक विकास को बढ़ावा देना है।

रेल बजट की घोषणा को व्यापक सराहना मिली। बजट में विभिन्न परियोजनाओं के माध्यम से भारतीय रेल पर सुरक्षा बढ़ाने के लिए 40% व्यय आवंटित किया गया। माननीय रेल मंत्री श्री अश्विनी वैष्णव के अनुसार राज्यों में चल रही विभिन्न रेल परियोजनाओं में 17,155 करोड़ रुपये का रिकॉर्ड-तोड़ आवंटन किया जाएगा।

रेल संरक्षा गुजरात के आधुनिकीकरण प्रयासों का मुख्य आधार बनी हुई है। सबसे महत्वपूर्ण उपायों में से एक है रेलवे लेवल क्रॉसिंग को खत्म करनाउनकी जगह रोड ओवर ब्रिज (ROB) और रोड अंडर ब्रिज (RUB) बनाना। इस पहल से दुर्घटनाएं कम होती हैंवाहनों की निर्बाध आवाजाही को बढ़ावा मिलता है और रेल दक्षता बढ़ती है। पिछले एक दशक मेंलगभग 1050 लेवल क्रॉसिंग को आरओबी/आरयूबी से बदला गया है। इसके अलावागुजरात में ब्रॉड गेज नेटवर्क पर सभी मानव रहित लेवल क्रॉसिंग को 2018 में समाप्त कर दिया गया है।

गुजरात सरकार रेलवे के साथ मिलकर गुजरात को पूरी तरह से लेवल-क्रॉसिंग मुक्त (फाटक-मुक्त गुजरात) बनाने की दिशा में काम कर रही है। राज्य सरकार ने 83 लेवल क्रॉसिंग को खत्म करके उनकी जगह आरओबी/आरयूबी बनाने के लिए 1372.91 करोड़ रुपये मंजूर किए हैंजिनमें से 11 लेवल क्रॉसिंग को पहले ही आरओबी/आरयूबी से बदला जा चुका है और बाकी पर काम चल रहा है। इससे न केवल सड़क उपयोगकर्ताओं की सुरक्षा में सुधार होगाबल्कि लेवल क्रॉसिंग पर प्रतीक्षा समय भी खत्म होगाजिससे समय और ईंधन दोनों की बचत होगी। राज्य ने रेल मंत्रालय यानी गुजरात रेल इंफ्रास्ट्रक्चर डेवलपमेंट कॉरपोरेशन लिमिटेड (G-RIDE) के साथ एक संयुक्त उद्यम भी बनाया हैजिसने बेदी बंदरगाह तक कनेक्टिविटी विकसित कीकटोसन-बेचराजी-रणुंज लाइन का गेज परिवर्तन किया और मारुति सुजुकी कार प्लांट में निर्मित कारों को देश के विभिन्न हिस्सों और बंदरगाहों तक ले जाने के लिए मारुति सुजुकी कार प्लांट तक रेलवे साइडिंग विकसित की।

इसके अलावास्वदेशी रूप से विकसित कवच प्रौद्योगिकी की तैनाती 1800 रूट किलोमीटर (RKM) पर तेजी से की जा रही है। ऐसी पहल रेलवे सुरक्षा के लिए एक व्यापक दृष्टिकोण को दर्शाती है।

संरक्षा से परे गुजरात में रेलवे का इंफ्रास्‍ट्रक्‍चर बड़े पैमाने परइंफ्रास्‍ट्रक्‍चर में निवेश के साथ बदलाव के दौर से गुजर रहा हैजिसका उद्देश्य यात्री और माल ढुलाई दोनों संपर्क को मजबूत करना है। वर्तमान मेंगुजरात के 87 स्टेशनों का नवीनीकरण किया जा रहा है ताकि स्टेशन सुविधाओं का आधुनिकीकरण किया जा सके और सुविधाओं और उनकी पहुंच में सुधार किया जा सके। कांडलामुन्‍द्रादहेजहजीरासिक्काबेदी आदि जैसे सभी प्रमुख बंदरगाह पहले से ही रेलवे से जुड़े हुए हैं और जखाऊ बंदरगाह को जोड़ने की योजना भी प्रक्रियाधीन है। माल ढुलाई को बढ़ावा देने के लिए राज्य में निजी माल टर्मिनल (PFT) और 10 गतिशक्ति कार्गो टर्मिनल (GST) पहले ही स्थापित किए जा चुके हैं और कुछ और विकसित होने की उम्मीद है। हाल ही मेंऊंझा में एक विशेष रेलवे कंटेनर टर्मिनल खोला गया हैजो देश के विभिन्न हिस्सों में कृषि उत्पादों की निर्बाध आवाजाही की सुविधा प्रदान करता है और निर्यात को बढ़ावा देता है।

मिशन रफ़्तार और वेस्टर्न डेडिकेटेड कॉरिडोर (WDFC) दो उल्लेखनीय परियोजनाएँ हैं जो यात्रियों और माल परिवहन दोनों के लिए गति और दक्षता के प्रति प्रतिबद्धता को रेखांकित करती हैं। मिशन रफ़्तार का उद्देश्य मुंबई-सूरत-वडोदरा-दिल्ली और मुंबई-वडोदरा-अहमदाबाद मार्गों जैसे अधिक आवागमन वाले कॉरिडोर पर ट्रेन की गति बढ़ाना है। वेस्टर्न डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर (WDFC) एक महत्वाकांक्षी परियोजना है जिसका उद्देश्य यात्री मार्गों पर भीड़भाड़ को कम करने के लिए माल के तेज़ और कुशल परिवहन के लिए समर्पित ट्रैक की सुविधा प्रदान करना है। WDFC का 565 किलोमीटर का हिस्सा (कुल लंबाई का 38%) गुजरात से होकर गुजरता है और अब पूरी तरह से चालू हो चुका है।

आधुनिक रेलवे के इंफ्रास्‍ट्रक्‍चर के इस दृष्टिकोण का अभिन्न अंग है मुंबई-अहमदाबाद बुलेट ट्रेन परियोजनाजिसका नेतृत्व नेशनल हाई-स्पीड रेल कॉर्पोरेशन लिमिटेड (NHSRCL) कर रहा है। बुलेट ट्रेन भारत में तेज गति से यात्रा को फिर से परिभाषित करनेयात्रा के समय को बेहद कम करने और क्षेत्रीय परिवहन परिदृश्य को बदलने का वादा करती है। जैसे-जैसे इस महत्वाकांक्षी परियोजना पर काम तेजी से आगे बढ़ रहा हैगुजरात अत्याधुनिक रेलवे के इंफ्रास्‍ट्रक्‍चर के केंद्र के रूप में अपनी प्रतिष्ठा को मजबूत कर रहा है।

अंततःइन प्रगति की सफलता यात्रियों पर उनके प्रभाव में निहित है। शहरीकरण की तीव्र गति से यात्रा की गतिशीलता में बदलाव के साथ रेलवे को केवल पटरियों और स्टेशनों के विस्तार से आगे बढ़ना चाहिए – इसे कुशल एकीकृत परिवहन समाधानों को प्राथमिकता देनी चाहिए। राज्य का मल्टी-मॉडल ट्रांसपोर्ट हब (MMTH) एक ऐसी पहल है जिसका उद्देश्य परिवहन के विभिन्न साधनों के बीच निर्बाध संपर्क सुनिश्चित करना है। दो प्रमुख परियोजनाएँसाबरमती MMTH और सूरत MMTH, एक ही सुविधा के भीतर रेलमेट्रोबुलेट ट्रेन और बस सेवाओं को एकीकृत करके यात्री सुविधाओं में क्रांति लाने के लिए तैयार हैं। डिजिटल टिकटिंगआधुनिक वेटिंग लाउंज और रिटेल स्पेस जैसी सुविधाएँ यात्रियों के अनुभव को काफी बेहतर बनाएँगी। इन पहलों के साथगुजरात भारत में सार्वजनिक परिवहन में उत्कृष्टता का बेंचमार्क बनने की राह पर है।

राज्य में चार वंदे भारत ट्रेनों की मौजूदगीजिनमें से दो उच्च मांग वाले मुंबई-गांधीनगर और मुंबई-अहमदाबाद सेक्टरों में सेवा प्रदान करती हैंउच्च गति वाली प्रीमियम यात्रा प्रदान करने के प्रयासों को उजागर करती हैंताकि यात्रियों की बढ़ती मांगों को पूरा किया जा सके। अहमदाबाद और भुज के बीच नमो भारत रैपिड रेल की शुरूआत कच्छ के रण जैसे गंतव्यों के लिए तेज़ और आरामदायक यात्रा प्रदान करके पर्यटन को बढ़ावा देने की दिशा में एक कदम है।

स्वदेशी रूप से निर्मित इस ट्रेन में केवल अनारक्षित कोच हैं और यह पूरी तरह से वातानुकूलित है और साथ ही इसमें आधुनिक यात्री सुविधाओं की भरमार है।

यात्रियों की सुविधा के अलावारेलवे के इंफ्रास्‍ट्रक्‍चर के आधुनिकीकरण में निवेश से रोजगार के अवसर पैदा होते हैंऔद्योगिक विकास को बढ़ावा मिलता है और व्यापार संचालन को सुगम बनाया जाता है। बेहतर रेलवे कनेक्टिविटी से माल की आवाजाही की दक्षता में काफी वृद्धि होती है – जिससे लागत कम होती है और व्यवसायों और निवेशकों के लिए एक प्रमुख गंतव्य के रूप में गुजरात की मान्‍यता और भी बढ़ जाती है। इसके अतिरिक्तनिर्बाध एकीकृत परिवहन इंफ्रास्‍ट्रक्‍चर के साथ ही पर्यटन के भी फलने-फूलने की उम्मीद बढ़ाता है। आधुनिक रेलवे स्टेशनहाई-स्पीड कनेक्टिविटी और सुव्यवस्थित यात्रा के विकल्प गुजरात को व्यवसाय और अवकाश यात्रा दोनों के लिए एक पसंदीदा गंतव्य बनाने के लिए तैयार हैंजो घरेलू और अंतर्राष्ट्रीय लोगों और संस्थाओं को समान रूप से आकर्षित करते हैं।

गुजरात में रेलवे का ट्रांसफार्मेशन‌ निर्बाध एकीकृत परिवहन के भविष्य की दिशा में एक दूरदर्शी छलांग है। तीन प्रमुख क्षेत्रों – सुरक्षाअत्याधुनिक इंफ्रास्‍ट्रक्‍चर और यात्री अनुभव पर ध्यान केंद्रित करकेराज्य भारत में रेलवे आधुनिकीकरण के लिए एक बेंचमार्क स्थापित कर रहा है। जैसे-जैसे ये महत्वाकांक्षी परियोजनाएँ आकार ले रही हैंगुजरात यह साबित कर रहा है कि परिवहन में रणनीतिक निवेश व्यापक आर्थिक समृद्धि की ओर ले जा सकता हैजिससे भारत के इंफ्रास्‍ट्रक्‍चर के विकास में एक नेता के रूप में इसकी स्थिति मजबूत हो रही है। यहाँ सिर्फ़ रेलवे के बारे में नहीं हैबल्कि उस विकास के बारे में है जहाँ कनेक्टिविटी अनंत संभावनाओं को उजागर करती है।

(लेखक प्रवीण परमार आईआरटीएस (सेवानिवृत्त),  पश्चिम रेलवे के पूर्व प्रमुख मुख्य वाणिज्य प्रबंधक हैं) 

वक्फ: साल 1185 से झेल रहा भारत, मोहम्मद गोरी ने की थी शुरुआत, 2 गाँवों से आज बन गया देश का सबसे बड़ा भू माफिया

दो गाँवों से शुरू हुआ वक्फ आज 9.4 लाख एकड़ तक पहुँच गया है। इसमें 8.7 लाख से ज्यादा संपत्तियाँ शामिल हैं। मस्जिदें, दरगाहें, कब्रिस्तान और इमामबाड़े इसके बड़े हिस्से हैं।

तमिलनाडु के तिरुचिरापल्ली जिले में 70 साल के किसान राजगोपाल अपनी बेटी की शादी के लिए अपनी 1.2 एकड़ जमीन बेचने की तैयारी कर रहे थे। सपने संजोए हुए थे कि बेटी का हाथ पीले करके उसे विदा करेंगे। लेकिन जब वे सब-रजिस्ट्रार ऑफिस पहुँचे, तो उनके पैरों तले जमीन खिसक गई। उन्हें 20 पन्नों का एक दस्तावेज थमाया गया, जिसमें लिखा था कि उनकी जमीन तमिलनाडु वक्फ बोर्ड की है।

सिर्फ उनकी जमीन ही नहीं, बल्कि उनका पूरा गाँव तिरुचेन्थुरई, जहाँ 1500 साल पुराना सुंदरेश्वरार मंदिर भी है, सभी को वक्फ की संपत्ति बता दिया गया। गाँव वाले हैरान थे, गुस्से में थे और डरे हुए भी। यह खबर जंगल की आग की तरह फैली और पूरे देश में वक्फ कानून पर बहस छिड़ गई।

यह कोई अकेला मामला नहीं था। आसपास के 18 और गाँवों को भी वक्फ की संपत्ति घोषित कर दिया गया। लोग सवाल उठाने लगे कि आखिर यह वक्फ बोर्ड है क्या, जिसके पास आज 9.4 लाख एकड़ जमीन है? यह करीब 3,804 वर्ग किलोमीटर का इलाका है, जो भारतीय रेलवे और भारतीय सेना के बाद देश का सबसे बड़ा जमींदार माना जाता है।

इसकी शुरुआत 12वीं सदी में दो गाँवों के दान से हुई थी, और आज यह एक विशाल साम्राज्य बन चुका है। केंद्र सरकार अब वक्फ संशोधन विधेयक ला रही है। ऐसे में चलते हैं वक्फ की जड़ों तक, और समझते हैं कि वक्फ क्या है, भारत में कैसे आया और आज क्यों विवादों में है।

वक्फ का मतलब क्या है?
वक्फ अरबी शब्द ‘वकुफा’ से आया है, जिसका मतलब है ठहरना या रोकना। इस्लाम में वक्फ का अर्थ है ऐसी संपत्ति जो जन-कल्याण के लिए दान की जाए। इसे एक तरह का स्थायी दान कह सकते हैं, जिसे न बेचा जा सकता है, न उपहार में दिया जा सकता है, और न ही विरासत में हस्तांतरित किया जा सकता है। जो इसे दान करता है, उसे ‘वाकिफ’ कहते हैं

वाकिफ यह भी तय कर सकता है कि उसकी संपत्ति या उससे होने वाली कमाई का इस्तेमाल किस काम के लिए होगा। मिसाल के तौर पर, अगर कोई कहे कि उसकी जमीन से होने वाली कमाई सिर्फ अनाथ बच्चों की पढ़ाई पर खर्च हो, तो ऐसा ही होगा।

इस्लाम में वक्फ की शुरुआत पैगंबर मोहम्मद के समय से मानी जाती है। एक कहानी है कि खलीफा उमर ने खैबर में एक जमीन हासिल की और पैगंबर से पूछा कि इसका सबसे अच्छा इस्तेमाल क्या हो सकता है। पैगंबर ने कहा, “इसे रोक लो, बाँध लो, और इससे होने वाला फायदा लोगों की जरूरतों पर खर्च करो।” इसी तरह, मदीना में 600 खजूर के पेड़ों का एक बाग वक्फ किया गया था, जिसकी कमाई से गरीबों की मदद होती थी। यह वक्फ के सबसे पुराने उदाहरणों में से एक है।

भारत में वक्फ की कहानी इस्लाम के साथ शुरू होती है। इस्लामिक परंपरा के महत्वपूर्ण हिस्से वक्फ की भारत में सैकड़ों सालों से मौजूदगी है। इसका मतलब है ऐसी संपत्ति को जन-कल्याण के लिए दान करना, जिसे न बेचा जा सके, न उपहार में दिया जा सके, और न ही किसी को विरासत में हस्तांतरित किया जा सके।

भारत में इसकी शुरुआत इस्लाम के आगमन से मानी जाती है, जो 7वीं सदी में अरब व्यापारियों के साथ शुरू हुई। लेकिन इसे शासकीय स्तर पर लागू करने की कहानी 12वीं सदी से शुरू होती है, जब मोहम्मद गोरी ने पहला कदम उठाया। इसके बाद कुतुबुद्दीन ऐबक, इल्तुतमिश, मुगल शासकों, ब्रिटिश काल और 20वीं सदी में मोहम्मद अली जिन्ना से जुड़े मुस्लिम वक्फ एक्ट तक यह परंपरा विकसित होती रही। आइए, इसकी पूरी कहानी को विस्तार से समझते हैं।

भारत में वक्फ की औपचारिक शुरुआत का श्रेय अक्सर अफगानी आक्रमणकारी और लुटेरे शासक मोहम्मद गोरी को दिया जाता है। गोरी अफगानिस्तान के घोर प्रांत से आया एक तुर्की शासक था, जिसने 12वीं सदी के अंत में भारत पर कई हमले किए। 1175 में उसने मुल्तान के इस्माइली शासक को हराया और 1192 में तराइन के दूसरे युद्ध में पृथ्वीराज चौहान को हराकर दिल्ली और उत्तर भारत के बड़े हिस्से पर कब्जा किया। गोरी का मकसद सिर्फ सत्ता हासिल करना नहीं था, बल्कि इस्लामी संस्थानों को मजबूत करना भी था।

इतिहासकार विपुल सिंह की किताब इंटरप्रेटिंग मेडिवल इंडिया और अयनुल मुल्क मुल्तानी की फारसी किताब इन्शा-ए-महरु के अनुसार, गोरी ने 1185 में मुल्तान की जामा मस्जिद के लिए दो गाँव दान में दिए। इन गाँवों का मैनेजमेंट शेख-अल-इस्लाम को सौंपा गया, जो उस समय एक प्रमुख मजहबी नेता की उपाधि थी। यह भारत में वक्फ का पहला दर्ज उदाहरण माना जाता है।

गोरी का यह कदम धार्मिक और सामुदायिक कल्याण के लिए था, ताकि मस्जिद की देखभाल और मुसलमानों की शिक्षा के लिए संसाधन जुटाए जा सकें। हालाँकि, कुछ वामपंथी इतिहासकार जैसे प्रोफेसर इरफान हबीब मानते हैं कि वक्फ की अवधारणा इससे पहले भी व्यक्तिगत स्तर पर मौजूद थी, लेकिन गोरी ने इसे शासकीय पहचान दी। इन दो गाँवों से शुरू हुई यह परंपरा आगे चलकर लाखों एकड़ तक फैल गई। गोरी की मृत्यु 1206 में हुई, लेकिन उसके गुलाम कुतुबुद्दीन ऐबक ने उनकी विरासत को आगे बढ़ाया।

मोहम्मद गोरी का गुलाम और सेनापति कुतुबुद्दीन ऐबक साल 1206 में दिल्ली सल्तनत का पहला सुल्तान बना। उसने 1206 से 1210 तक शासन किया और भारत में इस्लामी शासन की नींव रखी। ऐबक के दौर में वक्फ को औपचारिक रूप से लागू करने का कोई स्पष्ट दस्तावेज नहीं मिलता, लेकिन उसने इस्लामिक परंपराओं को बढ़ावा देने के लिए कई कदम उठाए, जो वक्फ के विकास में मददगार साबित हुए।

ऐबक ने दिल्ली में कुतुब मीनार और कुव्वत-उल-इस्लाम मस्जिद की नींव रखी। ये मजहबी स्थल बाद में वक्फ संपत्तियों का हिस्सा बने। इतिहासकार जियाउद्दीन बरनी की किताब तारीख-ए-फिरोज शाही के मुताबिक, उस दौर में शासक अक्सर मस्जिदों और मदरसों के लिए जमीनें दान करते थे। ऐबक का शासन छोटा था, लेकिन उसने इस्लामी कानूनों को लागू करने की शुरुआत की, जिसने वक्फ को मजबूत करने का रास्ता खोला। उसकी मृत्यु के बाद उसका दामाद इल्तुतमिश सत्ता में आया, जिसने वक्फ को और व्यवस्थित किया।

दिल्ली सल्तनत का तीसरा सुल्तान शम्सुद्दीन इल्तुतमिश 1211 से 1236 तक शासक रहा। उसे भारत में इस्लामी शासन को मजबूत करने वाला पहला शासक माना जाता है। इल्तुतमिश ने न सिर्फ सल्तनत को संगठित किया, बल्कि इस्लामी कानूनों और परंपराओं को व्यवस्थित करने में भी अहम भूमिका निभाई। वक्फ इसकी एक बड़ी मिसाल है।

इल्तुतमिश के शासन में मस्जिदों, मदरसों और अन्य मजहबी कार्यों के लिए संपत्तियाँ दान करने की प्रथा बढ़ी। बदायूँ में शम्सी मस्जिद, जिसका निर्माण उसके शासनकाल में हुआ, एक वक्फ संपत्ति का उदाहरण है।

इतिहासकार विपुल सिंह लिखते हैं कि इल्तुतमिश ने वक्फ संपत्तियों के प्रबंधन के लिए स्थानीय स्तर पर कमेटियाँ बनाईं, जिन्हें मुतवल्ली कहा जाता था। ये कमेटियाँ संपत्ति की देखभाल और उससे होने वाली आय को जन-कल्याण में लगाने का काम करती थीं। इल्तुतमिश के दौर में ज्यादातर संपत्ति शासकों के पास होती थी, इसलिए वे ही वाकिफ (दानदाता) बनते थे।

उसकी बनाई मस्जिदें और मदरसे वक्फ के तहत संरक्षित किए गए। विद्वान अमीर अफाक अहमद फैजी के मुताबिक, बदायूँ में मिरान मुलहिम की कब्र और बिलग्राम में ख्वाजा मजद अल-दीन का मकबरा भी इल्तुतमिश के समय की वक्फ संपत्तियों के उदाहरण हैं। इल्तुतमिश ने वक्फ को एक संस्थागत रूप दिया, जो बाद के शासकों के लिए आधार बना।

मुगल काल में वक्फ ने नया आयाम लिया। बाबर (1526-1530) ने 1526 में पानीपत की पहली लड़ाई जीतकर मुगल साम्राज्य की नींव रखी। उसके बाद हुमायूँ, अकबर, जहाँगीर, शाहजहाँ और औरंगजेब जैसे शासकों ने वक्फ को और संगठित किया।

बाबर और हुमायूँ: बाबर ने अपने छोटे शासन में वक्फ को बढ़ावा दिया। उसने दिल्ली में मस्जिदें बनवाईं, जो बाद में वक्फ संपत्ति बनीं। हुमायूँ का शासन अस्थिर रहा, लेकिन उसने भी इस काम को जारी रखा।

अकबर (1556-1605): अकबर ने वक्फ को व्यापक रूप दिया। उसने लखनऊ में फरांगी महल को वक्फ किया, जो एक बड़ा इस्लामिक शिक्षण केंद्र बना। अकबर ने मजहबी कार्यों के लिए जमीनें दान कीं और वक्फ के प्रबंधन को मजबूत करने के लिए नियम बनाए।

शाहजहाँ (1628-1658): शाहजहाँ ने ताजमहल के रखरखाव के लिए 30 गाँव और एक परगना वक्फ में दिया। विद्वान अमीर अफाक अहमद फैजी लिखते हैं कि यह मुगल काल में वक्फ का सबसे बड़ा उदाहरण था। शाहजहाँ ने दिल्ली में जामा मस्जिद भी बनवाई, जो वक्फ संपत्ति का हिस्सा बनी।

औरंगजेब (1658-1707): औरंगजेब ने भी वक्फ को बढ़ावा दिया, लेकिन उसका फोकस मजहबी कार्यों पर ज्यादा था। उसने कई मस्जिदों और कब्रिस्तानों के लिए जमीनें दान की।

मुगल काल में वक्फ संपत्तियों की संख्या तेजी से बढ़ी। शासकों के अलावा आम लोग भी अपनी जमीनें दान करने लगे। ग्रामीण इलाकों में मुस्लिम समुदाय के फैलने और धर्म परिवर्तन के साथ वक्फ का दायरा बढ़ता गया।

ब्रिटिश शासन में वक्फ को कानूनी और संगठित रूप मिला। उससे पहले यह व्यक्तिगत और समुदाय स्तर पर चलता था। प्रोफेसर इरफान हबीब बताते हैं कि ब्रिटिश सरकार ने वक्फ को नियंत्रित करने की कोशिश की, ताकि उसकी संपत्तियों का प्रबंधन व्यवस्थित हो सके।

साल 1913 में वक्फ बोर्ड की शुरुआत: 1913 में ब्रिटिश सरकार ने मुसलमान वक्फ वैलिडेटिंग एक्ट (Mussalman Waqf Validating Act, 1913) पारित किया। इसका मकसद वक्फ संपत्तियों की निगरानी करना और उनके दुरुपयोग को रोकना था। यह पहला मौका था जब वक्फ को सरकारी स्तर पर मान्यता मिली।

साल 1923 का वक्फ एक्ट: 5 अगस्त 1923 को मुसलमान वक्फ एक्ट 1923 लाया गया, जिसने वक्फ को कानूनी आधार दिया। इस एक्ट के तहत वक्फ संपत्तियों का रजिस्ट्रेशन और प्रबंधन शुरू हुआ। बोर्ड बनाए गए, जिनमें समुदाय के लोग और सरकार के प्रतिनिधि शामिल थे।

हबीब कहते हैं, “ब्रिटिश काल में जमींदार और नवाब अपनी अतिरिक्त संपत्तियाँ दान कर दिया करते थे। यह प्रथा पहले से थी, लेकिन इसे संगठित करने की कोशिश ब्रिटिश सरकार ने की।” इस दौर में वक्फ की संपत्तियाँ मस्जिदों, कब्रिस्तानों और मदरसों तक सीमित नहीं रहीं, बल्कि इसमें नकदी और इमारतें भी शामिल हुईं।

क्या था जिन्ना का मुस्लिम वक्फ एक्ट?
केंद्र सरकार वक्फ संशोधन बिल लोकसभा में लाई। इसे लेकर सरकार और विपक्ष में जमकर रस्साकसी चली। इसी बीच बीजेपी सांसद निशिकांत दुबे ने मोहम्मद अली जिन्ना का जिक्र छेड़ दिया। एक इंटरव्यू में उन्होंने कहा, “1911 में जिन्ना मुस्लिम वक्फ एक्ट लेकर आए थे, और 1954 तक इसे ‘जिन्ना लॉ’ के नाम से जाना जाता था। हिंदुओं और मुसलमानों के अलग-अलग कानूनों ने इस देश में विभाजन को जन्म दिया।” तो आखिर क्या है ये जिन्ना का मुस्लिम वक्फ एक्ट? ये भी समझ लेते हैं।

मोहम्मद अली जिन्ना 20वीं सदी की शुरुआत में कॉन्ग्रेस का नेता था। वो एक बड़ा वकील था और उस समय तक उसका इस्लामी कट्टरता वाला चेहरा सामने नहीं आया था। रिपोर्ट्स के मुताबिक, 1911-1913 के दौरान जिन्ना ने ब्रिटिश औपनिवेशिक सरकार के तहत इंपीरियल लेजिस्लेटिव काउंसिल में एक महत्वपूर्ण कानून को पेश करने में अहम भूमिका निभाई, जिसे मुसलमान वक्फ वैलिडेटिंग एक्ट, 1913 कहा जाता है। यह एक्ट वक्फ संपत्तियों से संबंधित कानूनी विवादों को सुलझाने के लिए बनाया गया था।

1913 का एक्ट क्यों बना?
19वीं सदी के अंत में ब्रिटिश अदालतों और प्रिवी काउंसिल ने कई फैसले दिए, जिनमें वक्फ की वैधता पर सवाल उठे। खास तौर पर, 1894 के अब्दुल फतह बनाम सईदन मामले में प्रिवी काउंसिल ने फैसला दिया कि अगर कोई वक्फ अपने परिवार के लाभ (वक्फ-अलाल-औलाद) के लिए बनाया गया है, तो वह इस्लामी कानून के तहत वैध नहीं होगा। इस फैसले ने भारत में मुस्लिम समुदाय में चिंता पैदा की, क्योंकि पारिवारिक वक्फ उनकी परंपरा का हिस्सा थे।

इस समस्या को हल करने के लिए मुस्लिम नेताओं ने ब्रिटिश सरकार से एक नया कानून बनाने की माँग की। जिन्ना तब इंपीरियल लेजिस्लेटिव काउंसिल के सदस्य था। उसने इस मुद्दे को जोरशोर से उठाया। 7 मार्च 1911 को यह बिल पेश किया गया, जिसे बाद में संशोधनों के साथ 1913 में पारित किया गया। यह कानून 7 मार्च 1913 को लागू हुआ। इसका मकसद था कि पारिवारिक वक्फ को कानूनी मान्यता मिले और प्रिवी काउंसिल के फैसले से सामने आया असमंजस खत्म हो।

निशिकांत दुबे का दावा है कि 1954 तक इसे जिन्ना लॉ कहा जाता था, लेकिन ऐतिहासिक दस्तावेजों में कहीं भी इसका जिक्र नहीं मिलता। चूँकि यह जिन्ना के प्रयासों से आया था, इसलिए इसे जिन्ना लॉ के रूप में जोड़ा जाता है। लेकिन आधिकारिक तौर पर इसका नाम हमेशा मुसलमान वक्फ वैलिडेटिंग एक्ट- 1913 ही रहा।

साल 1923 में मुसलमान वक्फ एक्ट 1923 पारित हुआ, जो वक्फ संपत्तियों के प्रबंधन से जुड़ा था। आजादी के बाद भारत सरकार ने वक्फ संपत्तियों के बेहतर प्रबंधन के लिए 1954 में एक नया वक्फ एक्ट बनाया। इसके बाद 1995 और 2013 में इसमें संशोधन हुए और अब 2025 में वक्फ संशोधन बिल पेश किया जा रहा है।

वक्फ की कहानी सिर्फ शासकों तक सीमित नहीं है। 7वीं सदी में अरब व्यापारियों ने दक्षिण भारत में इस्लाम के साथ वक्फ की परंपरा लाई। मालाबार क्षेत्र में मस्जिदें और कब्रिस्तान इसके शुरुआती उदाहरण हैं।

इतिहासकार सतीश चंद्रा की किताब मेडिवल इंडिया के मुताबिक, दक्कन के बहमनी सल्तनत और विजयनगर साम्राज्य के बीच संपर्क में भी वक्फ का जिक्र मिलता है। स्वतंत्रता के बाद 1954 में वक्फ एक्ट आया, जिसे 1995 और 2013 में संशोधित किया गया। आज वक्फ बोर्ड के पास 9.4 लाख एकड़ जमीन है, जो इसे देश का तीसरा सबसे बड़ा जमींदार बनाती है।

दो गाँवों से शुरू हुआ वक्फ आज 9.4 लाख एकड़ तक पहुँच गया है। इसमें 8.7 लाख से ज्यादा संपत्तियाँ शामिल हैं। मस्जिदें, दरगाहें, कब्रिस्तान और इमामबाड़े इसके बड़े हिस्से हैं।

वामपंथी इतिहासकास इरफान हबीब की चिंता है, “जिस संपत्ति का कोई मालिक नहीं होता, उसके सब मालिक बन जाते हैं। वक्फ के साथ भी यही हुआ। कई जगह इसका दुरुपयोग हुआ।” वे कहते हैं कि लोग संशोधन बिल पर शक करते हैं कि सरकार इसके जरिए जमीनों पर कब्जा करना चाहती है। हबीब कहते हैं, “वक्फ समाज के लिए बना था। इसे उसी भावना से चलाना चाहिए।”

मौलाना खालिद रशीद फिरंगी महली कहते हैं, “वक्फ में कोई गैर-कानूनी कब्जा नहीं होता। यह आरोप बेबुनियाद हैं। मुसलमानों ने अपनी जमीनें दान की हैं।” मौलाना खालिद कहते हैं, “वक्फ इस्लाम में नमाज और हज जितना अहम है। यह 1400 साल से चली आ रही परंपरा है।” लेकिन वे मानते हैं कि इसमें नीयत बदल गई है।

आज वक्फ बोर्ड की ताकत और उससे जुड़े विवाद सरकार के लिए चुनौती हैं। यह संशोधन कितना कारगर होगा, यह वक्त बताएगा। लेकिन राजगोपाल जैसे लोगों का दर्द और सवाल अभी अनसुने हैं।

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