कोटा /दुनिया में अजब – गजब लोगों की कमी नहीं। ऐसे ही राजस्थान में कोटा के एक युवा साहित्यकार है किशन प्रणय। अमूमन साहित्यकार अपनी कृति का विमोचन घूमघाम से समारोह पूर्वक करवाते हैं। समाज के प्रतिष्ठित व्यक्तियों को अतिथियों के रूप में बुलाता जाने की परम्परा है। इन महाशय को अजीब ही शौक है, पर्वतों के ऊंचे शिखरों पर अपने कुछ साथियों के साथ पहुंच कर अपनी कृति के विमोचन करवाने का। शहर के कोलाहल से दूर और परंपरा के विपरीत। इन्हें और इनके मित्रों का पहाड़ों पर लंबी दूरी की ट्रेकिंग का जुनून की हद तक गजब का शौक है।
हाल ही में विगत दिनों ये अपने मित्रों के साथ 24 किलोमीटर कर ट्रेकिंग कर जा पहुंचे 3500 मीटर की ऊंचाई पर उत्तराखंड में स्थित मदमेश्वर महादेव के मंदिर में। इन्होंने वहां 4 डिग्री सेल्सियस तापक्रम में इनकी हालिया आई नई कृति ” ‘इं का ओगण चित मत धरज्यो “का विमोचन करवा कर पर्वतों पर पुस्तक विमोचन की अपनी परम्परा को बरकरार रखा। यह इनकी तीसरी राजस्थानी भाषा की पुस्तक है। विमोचन की खास बात यह है कि अभी चार दिन पहले ही पंच केदार में से एक केदार मदमहेश्वर के कपाट खोले गए है। इस मौके पर विमोचन में उनके साथी मुकेश आजाद, रूपेश गुप्ता, दीपक नागर और जयप्रकाश आर्य साथ रहे। पहाड़ों के ऊंचे ऊंचे शिखरों पर राजस्थानी कृतियों का विमोचन करवाने की पीछे क्या उद्देश्य है इन्होंने बताया, ” ये राजस्थान भाषा को बुलंदियों तक पहुंचना चाहते हैं।”
उल्लेखनीय है कि किशन प्रणय इससे पहले भी माइनस डिग्री में विश्व के सबसे ऊंचे शिव मंदिर तुंगनाथ चंद्रशिला 4000 मीटर में अपनी पुस्तक का विमोचन कर चुके है और माइनस डिग्री में ही हिमाचल के 14000 फीट ऊंचे सर पास पर ट्रैकिंग करके राजस्थानी पुस्तक का विमोचन कर चुके है। यह किसी भी लोकभाषा की पुस्तक का विश्व में किया सबसे ऊंची जगह विमोचन है। यह मुहिम किशन प्रणय ने अपनी राजस्थानी भाषा को देश और विश्व स्तर पर पहचान दिलाने के लिए शुरू की है।
ऐसे ही बर्फ के तूफ़ानों के बीच इनकी सातवीं कृति और राजस्थानी भाषा की चौथी कृति ‘अंतरदस’ का विमोचन हिमाचल प्रदेश के 14000 फीट की ऊँचाई पर स्थित सर पास दर्रे में -10 डिग्री में किया जा चुका है। हिन्दी और राजस्थानी भाषा के कवि किशन प्रणय इससे पहले भी अपनी राजस्थानी की तीसरी पुस्तक पंचभूत का विमोचन उत्तराखंड में स्थित 4000 मीटर ऊपर चन्द्रशीला पर कर चुके है।
पुस्तक अंतरदस की कविताएँ गहन अंतरदृष्टि और भारतीय दर्शन से ओतप्रोत है। यह किशन प्रणय की एक नई मुहिम ‘शिखरों पर राजस्थानी भाषा’ के तहत दूसरा पुस्तक विमोचन है। इस विमोचन में किशन प्रणय के साथ उनके मित्र और साथी रुपेश गुप्ता, मुकेश आज़ाद, जयप्रकाश आर्य, गाइड सुनील नेगी, आदित्य नेगी और दिल्ली के डॉ आयुष गुप्ता आदि लोगों ने भी उनके साथ सर पास दर्रे तक सफ़र किया। यह सफ़र हिमाचल प्रदेश के बर्फ के तूफ़ान के अलर्ट के बावजूद किया गया और 40 किलोमीटर की चढ़ाई बर्फ के तूफ़ानो को पार करके शिखर पर पहुंचे।
परिचय:
कवि और उपन्यासकार के रूप में पहचान बनाने वाले युवा रचनाकार प्रणय विजय का जन्म कोटा में 3 मार्च 1992 को हुआ। आपने कला संकाय में स्नातक शिक्षा ग्रहण की। विगत 10 वर्षों से आप राज्य सेवा में महात्मा गाँधी राजकीय विद्यालय अंग्रेजी माध्यम, मल्टीपरपज, गुमानपुरा, कोटा अंग्रेजी भाषा अध्यापक के रूप में सेवाएं प्रदान कर काव्य सृजन में लगे हैं। बचपन से ही आध्यात्म से प्रेरित कबीर के भजन सुनते थे। उनका अध्यात्म इतना प्रभावी था कि ईश्वरीय तत्व के बारे में जानने के लिए विख्यात दार्शनिक आइंस्टीन ख़ुद उनसे मिलने भारत आये थे। रवींद्र नाथ टैगौर से प्रभावित और बचपन से मिले आध्यात्मिक माहोल से यह भी आध्यात्म से प्रेरित हो गए और इसका प्रभाव इनकी काव्य सृजनशीलता पर स्पष्ट दिखाई देता है। इनका मानना हैं कि अध्यात्म भारतीय दर्शन का मुख्य केंद्र रहा है और हमारी संस्कृति विश्व में गुरुत्व को अध्यात्म की कहीं ना कही मुख्य भूमिका रखती है।
ये हिंदी,राजस्थानी,मालवी,उर्दू और अंग्रेजी भाषा पर समान अधिकार रखते हैं। हिंदी की गद्य और पद्य दोनों विधाओं में इनका लेखन चर्चित है। शांत और स्वांतसुखाय काव्य सृजन करने वाले रचनाकार की अब तक प्रकाशित कृतियों में हिंदी काव्य संग्रह के रूप में बहुत हुआ अवकाश मेरे मन , बरगद में भूत, पोथी काव्य संग्रै (राजस्थानी), तत् पुरुस एवं पंचभूत , राजस्थानी उपन्यास “अबखाया का रींगटां ” “प्रणय की प्रेयसी”, “प्रणय का निकष और अन्य कविताएँ ” शामिल हैं। आपको प्रतिष्ठित संस्थाओं द्वारा कई बार सम्मानित किया जा चुका है।
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डॉ. प्रभात कुमार सिंघल
लेखक एवं पत्रकार, कोटा


