शाकद्वीप के राजा प्रियव्रत के पुत्र ‘मेघातिथी’ थे। उन्होंने शाकद्वीप में एक विशाल सूर्य नारायण मंदिर का निर्माण करवाया था। उसमें स्वर्ण निर्मित सूर्य प्रतिमा स्थापित की गई थी। उस समय शाकद्वीप में सूर्य भगवान की शास्त्र विधि से पूजा करने वाला कोई ब्राह्मण नहीं था
भगवान सूर्य ने तदुपरान्त मेघातिथी की प्रार्थना पर अपने तेज से अष्ट ब्राह्मण उत्पन्न किये। इन ब्राह्मणों ने सूर्य भगवान की आज्ञा शिरोधार्य कर मंदिर में सूर्य मुर्ति की प्राण प्रतिष्ठा की तथा सूर्य भगवान की विधि-विधान से नियमित पूजा-अर्चना करने लग गये। तभी से इन ब्राह्मणों को शाकद्वीपी ब्राह्मण के नाम से पुकारा जाने लगा।
द्वापर में जम्बूद्वीप में आगमन
शाकद्वीपीय ब्राह्मणों का जम्बूद्वीप में आगमन पुराणों के अनुसार द्वापर में हुआ । भगवान कृष्ण के पुत्र साम्ब को ऋषि दुर्वासा ने ही कुष्ठ रोग का श्राप दिया था, क्योंकि उन्होंने ऋषि का उपहास किया था । उनके रूप को लेकर मजाक उड़ाया था। साम्ब ने द्वारका आए ऋषि दुर्वासा का उनकी कृशता और कुरूपता पर उपहास किया, जिससे क्रोधित होकर ऋषि ने उन्हें कुष्ठ रोग का श्राप दिया था। एक अन्य कथा में नारद जी के बहकावे में आकर
राजकुमार सांब ने श्रीकृष्ण की कनिष्ठ पत्नी नंदिनी के साथ अनुचित व्यवहार किया था, जिससे क्रोधित होकर श्रीकृष्ण ने उन्हें कुष्ठ रोग का श्राप दिया था। बाद में भगवान कृष्ण अपने पुत्र साम्ब के कुष्ठ रोग से अत्यन्त चिंतित भी हुए। उन्हें एक विप्र जाति के संबंध में जानकारी हुई जो शाकद्वीप में रहती थी।जो अपने सूर्यमंत्र और चिकित्सा के लिए प्रख्यात थी। भगवान नें शाक द्वीप के अट्ठारह परिवारों को जम्बू द्वीप में सम्मान पूर्वक बुलवाया। शाकद्वीपीय चिकित्सको ने साम्ब के कुष्ठ रोग को अपने आध्यात्मिक चिकित्सा से समाप्त कर दिया।
राजा धृष्टकेतु के कुष्ठ का भी इलाज :-
उन ब्राह्मणों को द्वारका में ज्यादा समय व्यतीत करना अच्छा न लगा और गरुड़ पर सवार हो कर शाकद्वीप की ओर जा रहे थे। जब वे मगध-देश के ऊपर पहुंचे तो वहाँ रोना-पीटना सुनाई पड़ा। ब्राह्मण लोग बड़े व्यग्र थे। उनके पूछने पर गरुड़ ने कहा कि मगध-देश के राजा धृष्टकेतु को कोढ़ हो गया है इसी कारण उसने मरने की ठान ली है और चिता के लिये लकड़ियों का ढेर लगा है। राजा बड़ा धर्मात्मा है और उसके राज में सब सुखी हैं। इसी से उसकी सब प्रजा उसके लिये रो रही है। ब्राह्मणों को दया आई और उन्होंने गरुड़ से कहा कि ‘क्या इस देश में ऐसा तपस्वी नहीं है जो राजा को इस रोग से मुक्त करे? गरुड़ ने उत्तर दिया यहाँ ऐसा कोई होता तो शाम्ब आप लोगों को क्यों बुलाते। ब्राह्मणों ने गरुड़ से कहा कि पृथ्वी पर उतरो। राजा उनके दर्शनों से कृतकृत्य हो गया। मिहरांशु ने उसे अपना चरणोदक पिलाया और राजा का कोढ़ अच्छा हो गया।
राजा धृष्टकेतु ने मगध में शाक द्वीपियों को बसाया
जब ब्राह्मणों ने राजा धृतकेतु को निरोग करने के बाद गरुड़ से कहा कि हमें शाकद्वीप पहुँचा दो। तब गरुड़ ने कहा कि आप से प्रतिज्ञा करा चुका हूँ अब आप यहीं रहिये। कृतज्ञ राजा ने ब्राह्मणों को अपने देश में आदर से रक्खा और गङ्गा-तट पर कई गाँव दिये। ब्राह्मणों से चार अर्थात् श्रुतिकीर्ति, श्रुतायु, सुधर्म्मा, और सुमति ने सन्यास ले लिया और तपस्या करने को बदरिकाश्रम चले गये। शेष 14 मगध में रहे और वसु ने अपनी बेटियाँ उनको विवाह दी। उन्हीं की सन्तान आज-कल मगध देश में बसी है। मगध नरेश की आग्रह पर भगवान ने शाकद्वीपीय चिकित्सको के बहत्तर परिवारों को मगध के विभिन्न पुरों में बसा दिया।
त्रेता युग में राजा प्रतर्दन द्वारा शाकद्वीपी राजवंश का विस्तार :-
काशी के राजा प्रतर्दन त्रेतायुग में हुए थे। वे काशी के प्रसिद्ध राजा दिवोदास के पुत्र थे।
इनके अन्य नाम ‘द्युमान’, ‘शत्रुजित’, ‘वत्स’, ‘ऋतध्वज’ और ‘कुवलयाश्व’ भी मिलते हैं।
उनके पिता दिवोदास ने काशी में शासन किया था और वे त्रेतायुग के अंतिम चरण या द्वापर युग के शुरुआती दौर से पूर्व का समय मानते हैं, क्योंकि वे राम के पूर्वज के समकालीन संदर्भों में एक शक्तिशाली क्षत्रिय शासक के रूप में वर्णित किया गया है। वे अत्यंत तपस्वी और दूरदर्शी थे। उनके कठिन तप को देखकर सूर्य भगवान् स्वयं प्रसन्न हुए और उन्होंने सात ब्राह्मणों को आशीर्वाद दिया। उन ब्राह्मणों की संतानों ने पृथ्वी पर धर्म और न्याय का प्रचार किया।”
समय के साथ शाकद्वीपी राजवंश का विस्तार हुआ। मिहरांशु, शुभांशु, सुधर्मा, सुमति और अन्य ब्राह्मणों की संतानों ने विभिन्न क्षेत्रों में शाखाएँ बनाई। प्रत्येक शाखा ने अपने-अपने क्षेत्र में धर्म और ज्ञान का प्रचार किया।
गोत्र और शाखाएं
मिहरांशु, भारद्वाज, कौण्डिन्य, कश्यप, गर्ग की सन्तान बढ़ी और प्रसिद्ध हुई। इसी कारण शाकद्वीपियों के छः घर बन गये और प्रत्येक घर के मूल-पुरुष का नाम गोत्र कहलाया। आज-कल शाकद्वीपियों के 72 घर गिने जाते हैं, अर्थात् उर के 24 आदित्य के 12, मण्डल के 12 और अर्क 7 घर या पुर अस्तित्व में आए। शेष इन्हीं की शाखायें हैं।
मिहरांशु की प्रतिष्ठित शाखा रही:-
मिहरांशु की सन्तान ने बड़े – बड़े काम किये थे इसलिये उनकी शाखा अधिक प्रतिष्ठित मानी जाती है। जो शाखा जिस गाँव में बसी उसी गाँव के नाम से प्रसिद्ध हुई।
मगध चेदि नरेश ने शाकद्वीपीय ब्राह्मणों को मगध में बसाया :-
शाकद्वीपीय ब्राह्मणों की दो मुख्य शाखा ‘मग ब्राह्मण’ तथा ‘भोजक’ ब्राह्मण’ माने जाते हैं । मग ब्राह्मण मूलतः मगध (गया, बिहार) के निवासी बताये जाते हैं। शकद्वीपीय ब्राह्मण मुख्यतः मगध के थे, अतः उनको मग भी कहा गया है। मग के दो ब्राह्मण विक्रमादित्य काल में जेरूसलेम गये थे जो उस समय रोम के अधीन था। रोमन राज्य तथा विक्रमादित्य राज्य के बीच कोई अन्य राज्य नहीं था। इन लोगों ने ही ईसा के महापुरुष होने की भविष्यवाणी की थी। किन्हीं ग्रन्थों में द्वारका शाकद्वीप में स्थित कही गई है। वेद तथा पुराणों में इनका उल्लेख ब्राह्मणों की एक सर्वोत्तम जाति के रूप में है जिनका जन्म सूर्यदेव के अंश से हुआ था।
चेदि के राजा धृष्टकेतु के कुष्ठ का इलाज
चेदि राज्य का राजा और शिशुपाल का सबसे बड़ा पुत्र धृष्टकेतु है। धृष्ट का अर्थ है “साहसी,” “प्रवंचित,” या “साहसी” और केतु का अर्थ – “झंडा,” “पट्टिका,” या “प्रतीक” होता है । धृष्टकेतु शिशुपाल के पुत्र हैं , जो अपनी मातृ पक्ष से यदु के वंशज दशार्ह वंश से संबंधित हैं। धृष्टकेतु यह नाम धृष्टद्युम्न के पुत्र सहित कई अन्य व्यक्तियों के साथ साझा करते हैं । वह
एक महान धनुर्धर और महारथ थे । धृष्टकेतु को युधिष्ठिर की सेना के सात सेनापतियों में से एक नियुक्त किया गया था। युद्ध के दौरान, धृष्टकेतु ने कई दुर्जेय योद्धाओं से युद्ध किया था। वह पांडवों का वफादार सहयोगी है और कुरुक्षेत्र युद्ध में एक प्रमुख भूमिका निभाता है , जहाँ उसने उनकी सेना के सात सेनापतियों में से एक के रूप में कार्य किया है। कुरुक्षेत्र के युद्ध में उसने बहुत से योद्धाओं से युद्ध किया और वृहदवाहन का वध किया। उस सहित उसके तीनों भाइयों – पुरूजीत, धृष्टकेतु और वृहद्क्षत्र का वध चौदहवें दिन के युद्ध में द्रोणाचार्य के हाथों हुआ था। धृष्टकेतु ने अपनी मृत्यु के बाद स्वर्ग में ‘विश्वदेव’ का दर्जा प्राप्त किया था।
मगध चेदि नरेश जरासंघ के इस पूर्वज धृष्टकेतु को कुष्ठ हो गया था। जिनके उपचार के लिए शाकद्वीपीय ब्राह्मणों को मगध में लाया तथा कुष्ठ से त्राण पाकर उपहार स्वरूप उन्हें अठारह पुर (ग्राम) दिये तथा प्रत्येक के चार चार पुत्र उत्पन्न हुआ और वे सब पृथक पृथक 72 पुरों (ग्रामों) में निवास करने लगे । मगध- चेदि नरेश ने शाकद्वीपीय ब्राह्मणों के बहत्तर परिवारों को मगध के विभिन्न पुरों में बसा दिया गया । वहां से ये लोग भारत के विभिन्न भागों में फ़ैल गए । जैसे बिहार और उत्तरी भारत के अन्य भागों में एक प्रसिद्ध समुदाय है। इनकी दो उपशाखाएँ हैं- भोजक और मग। इनके गाँवों में अधिकांश सकलद्वीपी ब्राह्मणों के पास कृषि भूमि होती है, जिस पर भूमिहीन मजदूर खेती करते हैं। प्रत्येक शाक=सकलद्वीपी परिवार का अपना देवता होता है और वे पूर्वजों की पूजा करते हैं। उनके धार्मिक विशेषज्ञ भी उनके समुदाय से ही होते हैं। पुजारी और ज्योतिषी होने के नाते, सकलद्वीपी ब्राह्मणों का अन्य समुदायों के साथ संरक्षक-ग्राहक संबंध होता है।
पुराणों में उल्लेखित विवरण के पहले छठी पांचवी शताब्दी ई. पू. में शाकद्वीप से भारत आये उपयुक्त सभी साक्ष्यों से सवर्धा समर्थित हैं सूर्योपासक पुरोहितों को मग एवं भोजक इन दोनों श्रेणियों में विभाजित किया गया है । पुराणों के आन्तरिक साक्ष्य के आधार पर कहा जा सकता है कि मग और भोजक एक थे अन्तर मात्र इतना था कि –
(1) सूर्य का जो ध्यान करे उसे मग कहा जाता है । मग म अक्षर की पूजा करते थे म= मंत्र ग = गुरू मंत्रों के गुरू मग मे सूर्य गायन्तीति मगा:
(2) भोजक- धूप, दीप, माला से पूजन एवं विभिन्न उपहारों से सूर्य को भोग लगाते हैं उन्हे भोजक कहा जाता है ।
धूपमाल्यैर्मतश्चापि उपहारैस्तथैव च ।
भोजयन्ति सहस्रांशुं तेन ते भोजका: स्मृता: ।
यह भी सम्भव है कि भोजक भारतीय परम्परा के पुरोहित रहे हों। दोनों ही सूर्य के सकल एवं निष्कल रूप से उपासक थे ।
कालान्तर में भारत के कई प्रान्तों के रजवाड़ों द्वारा पूजा पाठ , रोग निवारण के लिए अपने अपने राज्यों में ले गये, जिनमें 72 पुरों में से 16 पुर के लोग पश्चिम में गये जो वहां गोत्र (खाप) से जाने गये।
लेखक परिचय:-


