Homeअध्यात्म गंगाआदम की पसली, मैक्समूलर और वेद

आदम की पसली, मैक्समूलर और वेद

अठारह शताब्दियों तक ईसाई विद्वान् इस उलझन में पड़े रहे कि हव्वा के ‘उत्पत्ति विधान’ (आदम की पसली से उत्पत्ति)को बुद्धिमान और विद्वान पुरुषों के स्वीकार करने योग्य कैसे बनाया जाय? परंतु उनको किसी प्रकार की सफलता नहीं मिली ! कुछ ईसाई विद्वानों ने कभी-कभी जो टीका- टिप्पणियां दीं उनसे तो अवस्था और भी बिगड़ गई और स्त्री का पद जनता की दृष्टि में बहुत गिर गया! कौरंथियनों को लिखे हुए पत्रों में तो यहां तक कह दिया गया कि आदमी औरत से नहीं बना ! औरत आदमी से पैदा हुई है ! आदमी औरत के लिए नहीं बना था! औरत आदमी के लिए बनी है ! (देखो – कौरंथियन,भाग१,अध्याय११ आयत८,९)
यह एक छोटा सा वाक्य है जो केवल एक पत्र में बिना सोचे समझे लिखा गया था परंतु इस विष के बीज ने समस्त भ्रांति- आहत ईसाई घरों में विष फैला दिया!
कुछ पादरी लोग तो यहां तक बढ़ गए कि उन्होंने बाइबल में से पूरी संगति संपुष्टि करने के लिए यहां तक कह डाला कि स्त्रियों में जीव नहीं है क्योंकि ईश्वर ने रूह को आदम के पुतले में फूंका था न कि हव्वा के पुतले में ! हव्वा तो केवल आदम के शरीर की एक पसली है!
 यूरोप में जब विज्ञान का प्रबल हुआ तो घोर विरोध होते हुए भी पादरी लोग इस उलझन की उपेक्षा नहीं कर सके! कुछ न कुछ तो सोचना ही पड़ गया!
 इन्हीं दिनों में भारतवर्ष की प्राचीन भाषा संस्कृत की ओर लोगों का ध्यान गया ! यूरोप वालों ने भारत की ओर दृष्टि दौड़ाई और उस पर शासन करने के लिए आवश्यक समझा गया कि भारतीय लोगों के प्राचीन पुस्तकों का अवलोकन किया जाय! इसी काल में भिन्न-भिन्न भाषाओं का अनुसंधान और मूल्यांकन होने लगा! 19वीं शताब्दी के जर्मनी के एक प्रसिद्ध संस्कृतज्ञ मैक्समूलर को यह यश प्राप्त है कि उसने हव्वा की उत्पत्ति के विषय में जो उलझन थी उसको सुलझा दिया ! अपनी प्रसिद्ध पुस्तक ‘साइंस ऑफ रिलीजन्स (धर्म-विज्ञान) की भूमिका में वह लिखते हैं –
“Bone seemed a telling expression for what we should call the innermost essence.”
उन्होंने यूनानी भाषा की किसी धातु से यह सिद्ध किया है कि यूनानी भाषा में ‘हड्डी’ शब्द का प्रयोग ‘भीतरी प्रकृति’ के लिए होता था!
 फिर वह लिखते हैं –
“In the ancient hyms of the Veda,too, a poet asks, “Who has been the first, when, he who had no bones, i,e, no form,bore him that has bones,i,e when which was formless, assumed from,or it may be, when that had no essence, received an essence.”
अंग्रेजी के इस वाक्य से गुत्थी सुलझ जाती है,परंतु जब तक हम ऋग्वेद को उठाकर न देखें या थोड़ा सा संस्कृत का अध्ययन न करें यह व्याख्या सब की समझ में नहीं आ सकती ! सार तो इतना ही है कि जिसको हम हड्डी कहते हैं इसका अभिप्राय है- ‘निज प्रकृति !’
इसको मैक्समूलर ने ईसएंस (Essence ) कहा है ! मैक्समूलर ने ‘वेद’ का उल्लेख किया है परंतु प्रमाण नहीं दिया ! वस्तुत: यहां ऋग्वेद के पहले मंडल के १६४ वें सूक्त की ओर संकेत है! इसमें सृष्टि की उत्पत्ति का वर्णन है और ‘अस्थि’ शब्द का प्रयोग हुआ है! लोक भाषा में ‘अस्थि’ का अर्थ है ‘हड्डी’! परंतु यदि धात्वर्थ पर विचार किया जाय तो रहस्य खुल जाता है! ‘स्था’ का अर्थ है- ‘खड़ा होना’ या स्थित होना ! मनुष्य के शरीर में यदि हड्डी न हो तो वह खड़ा नहीं हो सकता इसलिए उपचार की भाषा में हड्डी का नाम ‘अस्थि’ पड़ गया! वस्तुत: ‘अस्थि’, ‘स्थिति’ आदि शब्दों का संबंध है किसी वस्तु की नैसर्गिक वास्तविकता से! क्योंकि प्रत्येक वस्तु अपनी निज नैसर्गिक प्रकृति के आधार पर स्थित रहती है! इसी वास्तविक प्रकृति के लिए वेद में एक और शब्द आया है ‘तनु’! इसका अर्थ है ‘तानना’! सूत अपनी नैसर्गिक प्रकृति के कारण ही ताना जाता है! एक और वेद मंत्र में हमको मिलता है कि परमात्मा ने जो निराकार और शरीर रहित है मनुष्य के माता-पिता को एक ही प्रकृति से उत्पन्न किया और एक साथ उत्पन्न किया !
क उ नु ते महिमन: समस्याsस्मत् पूर्व ऋषयोsन्तमापु: !
यन मातरं च पितरं च  साकमजनयथास्तन्व:  स्वाया:  !!
— ऋ०मण्डल १० सू०५४ मं०३
‘सूरत नसा’ की पहली आयत यह है-
 जिस ने तुमको एक ही नफस से बनाया और उसी नफस से उसका जोड़ा बनाया!
वेद की रऋचा और कुरान की आयत की संगति : –
क्या हम इस आयत का यह अर्थ नहीं ले सकते कि यहां नफ़स का आशय नैसर्गिक प्रकृति या एसेंस से है! जैसा कि संस्कृत के शब्दों ‘अस्थि’ या ‘तनु’ से प्रकट होता है! यदि वेद के मंत्र और कुरान की आयत की संगति सिद्ध हो जाय तो सारी उलझन दूर हो जाय ! लेकिन इसके साथ समग्र इस्लामी जगत् की मनोवृत्ति में परिवर्तन हो जायेगा ! ऋग्वेद के वर्णन और उन प्रचलित कथाओं में जो तौरेत से लेकर कुरान तक चली आती हैं व्यवहार की दृष्टि से बड़ा अंतर है !
वेद यह नहीं मानता : –
वेद यह नहीं मानता कि आरंभ में केवल एक नर उत्पन्न हुआ  और उसकी पसली से नारी बनाई गई! या एक बैल बनाया और उसकी पसली से गाय बनाई गई या एक ऊंट बनाया गया और उसकी पसली से ऊंटनी बनाई गई जिससे आदमी और औरत, बैल और गाय, ऊंट और ऊंटनी में परस्पर प्रेम हो सके और गृहस्थ धर्म (संतानोत्पत्ति) का कार्य संपादित हो सके ! वेद का सिद्धांत है कि जब सृष्टि रची गई तो बहुत से पुरुष और स्त्रियां उत्पन्न हुए ! उनका मूल तत्व एक था अर्थात् सब जीव या आत्मा थे ! उत्पत्ति की विधि भी एक थी ! शरीर का उपादान भी एक था! पत्नी के लिए यह आवश्यक न था कि वह अपने पति के शरीर का ही अंश हो! व्यवहार रूप से तो इस प्रतिपत्ति को ईसाई और मुसलमान भी नहीं मानते ! कोई मर्द अपनी पुत्री से इसलिए विवाह न करेगा कि वह उसके शरीर का अंश है और न कोई माता अपने पुत्र से विवाह करेंगी क्योंकि वह उसी के शरीर से उत्पन्न हुआ है ! कुदरत ने पति और पत्नी के संबंध का आधार इन कारणों को नहीं बनाया था !
स्रोत- गंगा- ज्ञान सागर भाग 3
लेखक- पंडित गंगाप्रसाद उपाध्याय
संपादक व अनुवादक – प्रा. राजेंद्र जिज्ञासु
प्रस्तुतकर्ता – रामयतन
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