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महासभा के अध्यक्ष महेन्द्र नाहटा और प्रधान न्यासी सुरेश गोयल का अभिनंदन

नई दिल्ली। राजधानी के अणुव्रत भवन में उस समय श्रद्धा, विश्वास और वंदना के स्वर एक साथ गूंज उठे, जब संस्था शिरोमणि जैन श्वेतांबर तेरापंथी महासभा के नवगठित ट्रस्ट बोर्ड के प्रधान न्यासी श्री सुरेश गोयल एवं श्री महेंद्र नाहटा के अध्यक्ष मनोनीत होने के उपलक्ष्य में अभिनंदन समारोह का आयोजन किया गया। यह आयोजन जैन श्वेतांबर तेरापंथी सभा, दिल्ली एवं आचार्य श्री महाश्रमण प्रवास व्यवस्था समिति दिल्ली के संयुक्त तत्वावधान एवं परम पूज्य आचार्य श्री महाश्रमण के विद्वान शिष्य शासनश्री मुनिश्री विमलकुमार जी एवं बहुश्रुत मुनिश्री उदितकुमार जी का पावन सान्निध्य प्राप्त हुआ। मंगलाचरण से प्रारंभ हुए इस समारोह में वातावरण श्रद्धा, अनुशासन और संघनिष्ठा की भावधारा से ओत-प्रोत रहा।
शासनश्री मुनि विमलकुमार जी ने अपने प्रेरक उद्बोधन में कहा कि किसी भी संस्था की वास्तविक शक्ति उसके पदाधिकारी होते हैं। पद केवल दायित्व का प्रतीक है, किंतु उसे सार्थक बनाती है-विनम्रता, संगठन निष्ठा और दूरदर्शी नेतृत्व क्षमता।

तेरापंथ धर्मसंघ में आचार्य महाश्रमण जी के नेतृत्व में संचालित संस्थाओं में इन गुणों का सुंदर समन्वय देखने को मिलता है। यही समन्वय समाज के विकास का मूलाधार है। उन्होंने विश्वास व्यक्त किया कि महासभा का नव मनोनीत नेतृत्व इन मूल्यों को और सशक्त करेगा। बहुश्रुत मुनिश्री उदितकुमार जी ने कहा कि जिस संगठन के कार्यकर्ताओं में धार्मिकता के साथ सामाजिकता-संवेदनशीलता का भाव होता है, उसका इतिहास स्वतः स्वर्णिम बन जाता है। उन्होंने कहा कि श्री सुरेश गोयल और श्री महेंद्र नाहटा में इन दोनों गुणों का सशक्त समावेश है। उनकी संघनिष्ठा, सेवा-भाव और समर्पण की साधना उन्हें इस दायित्व तक लाई है। उन्होंने कामना की कि उनका नेतृत्व महासभा को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाएगा। मुनि अभिजीतकुमार जी ने भी अपने विचार व्यक्त करते हुए नव नेतृत्व को कर्तृत्वशील एवं संवेदनशील बनने की प्रेरणा दी।

आचार्य महाश्रमण प्रवास व्यवस्था समिति के अध्यक्ष श्री कन्हैयालाल पटवारी जैन ने दोनों महानुभावों का अभिनंदन करते हुए कहा कि उनकी सुदीर्घ सेवाएं, विनम्र व्यवहार और संघ के प्रति अटूट निष्ठा ही उनके चयन का आधार बनी है। यह केवल व्यक्तिगत उपलब्धि नहीं, बल्कि दिल्ली समाज के लिए गौरव का क्षण है। तेरापंथ सभा के अध्यक्ष श्री सुखराज सेठिया ने कहा कि दोनों विभूतियां उदारता और दानशीलता की सजीव प्रतिमूर्ति हैं। समाजहित और संघकार्य के प्रति उनका समर्पण सदैव प्रेरक रहा है। उन्होंने विश्वास जताया कि उनके नेतृत्व में संगठन नई ऊर्जा के साथ आगे बढ़ेगा। प्रवास व्यवस्था समिति के वरिष्ठ उपाध्यक्ष श्री बजरंग बोथरा ने कहा कि दोनों ही महान विभूतियां महासभा के इतिहास में नया अध्याय लिखेंगी। इस बार महासभा में बड़ी संख्या में दिल्ली का प्रतिनिधित्व होना हम सबके लिए विशेष प्रसन्नता और गर्व का विषय है। उन्होंने कहा कि यह अवसर केवल अभिनंदन का नहीं, बल्कि उत्तरदायित्व के नए संकल्प का भी है।

श्री महेंद्र नाहटा ने गहन श्रद्धा के साथ गुरु के प्रति समर्पण भाव व्यक्त करते हुए कहा कि किसी भी व्यक्ति की सफलता का वास्तविक आधार गुरु कृपा ही होती है। हमारी सभी संस्थाओं की आत्मा भी गुरु हैं, उनकी दृष्टि, उनका मार्गदर्शन और उनका आशीर्वाद ही हमें दिशा देता है। उन्हें जो दायित्व प्राप्त हुआ है, वह उनकी व्यक्तिगत उपलब्धि नहीं, बल्कि गुरु अनुकम्पा का प्रतिफल है। गुरु चरणों में पूर्ण समर्पण के साथ उन्होंने संकल्प व्यक्त किया कि वे महासभा के कार्यों को नई ऊंचाइयों तक ले जाने का सतत प्रयास करेंगे।

वहीं श्री सुरेश गोयल ने अपने विचारों में महासभा के गौरवपूर्ण इतिहास का स्मरण कराते हुए बताया कि जैन श्वेतांबर तेरापंथी महासभा की स्थापना आचार्य श्री कालूगणी के शासनकाल में हुई थी और यह तेरापंथ धर्मसंघ की सबसे प्राचीन संस्था है, जिसने 113 वर्ष की प्रेरक यात्रा पूर्ण की है। उन्होंने कहा कि इस शिरोमणि संस्था के सतत विकास के लिए प्रत्येक कार्यकर्ता की सक्रिय सहभागिता आवश्यक है। गुरु को उन्होंने सिद्धत्व का सेतु और जीवन की सार्थकता का परम आयाम बताते हुए कहा कि गुरु मार्ग ही हमें आत्मोन्नति और संघविकास की ओर अग्रसर करता है। कार्यक्रम का कुशल संयोजन दिल्ली सभा के महामंत्री श्री प्रमोद घोड़ावत ने अत्यंत गरिमापूर्ण ढंग से किया।

अभिनंदन करने वाली संस्थाओं में तेरापंथ परिषद, तेरापंथ महिला मंडल, तेरापंथ प्रोफेशनल फोरम, अणुव्रत समिति ट्रस्ट, अखिल भारतीय अणुव्रत न्यास सहित अनेक संगठनों के प्रतिनिधि उपस्थित रहे। सभी ने एक स्वर से श्री महेंद्र नाहटा, श्री सुरेश गोयल एवं महासभा में दिल्ली का प्रतिनिधित्व करने वाले अन्य कार्यकर्ताओं के प्रति श्रद्धा और शुभकामनाओं के भाव व्यक्त किए। समारोह के अंत में वातावरण एक ही संकल्प से गूंज उठा-नेतृत्व केवल अधिकार नहीं, उत्तरदायित्व है और उत्तरदायित्व तभी सफल होता है जब उसमें संघ, समाज और साधना-तीनों के प्रति समर्पण हो।

प्रेषकः

(ललित गर्ग)
ए-56/ए, प्रथम तल, लाजपत नगर-2
नई दिल्ली-110024, मो. 9811051133

वैक्सीन मैत्री

कोरोना ने, पूरे विश्व में वैक्सीन का महत्व फिर से अधोरेखित (underline) किया। कोरोना की महामारी को रोकना, वैक्सीन के बगैर संभव ही नहीं था। भारत ने प्रारंभ से ही इस कोरोना महामारी की वैक्सीन विकसित करने का निश्चय प्रकट किया था। लॉकडाउन के दूसरे चरण में ही, प्रधानमंत्री मोदी जी ने, 14 अप्रैल 2020 को भारत के युवा वैज्ञानिकों से वैक्सीन विकसित करने का आवाहन किया था। देश में इसके प्रयास प्रारंभ हो गए थे। कई विकसित देशों ने भारत की इस पहल को गंभीरता से नहीं लिया। कुछ तथाकथित बुद्धिजीवियों ने इस घोषणा की खिल्ली भी उडाई।

वैसे भारत की, इसके पहले की स्थिति खिल्ली उड़ाने जैसी ही थी। हम मान कर चल रहे थे की वैक्सीन बनाने की हमारी क्षमता ही नहीं हैं।

पोलियो वैक्सीन का ही उदाहरण लेते हैं।

विश्व में पहला सफल पोलियो वैक्सीन बना, 1955 में, Jonas Salk द्वारा। पहली मुंह से दी जाने वाली वैक्सीन, Albert Sabin ने बनाई, 1961 में। उन दिनों भारत ने यह मान लिया था, कि किसी रोग या महामारी पर वैक्सीन खोज कर बनाना तो बहुत दूर की बात, पर दूसरे किसी ने खोजा हुआ वैक्सीन बनाने की भी हमारी क्षमता नहीं हैं। इसलिए हम यह सारे वैक्सीन, अमेरिका या यूरोप से आयात करते थे। विश्व में पोलियो के वैक्सीन की खोज के लगभग 35 वर्षों के बाद, भारत ने इस फार्मूले पर वैक्सीन बनाना प्रारंभ किया था।

आप गूगल में ढूंढेंगे, तो आपको पता चलेगा की वैक्सीन की खोज एडवर्ड जेनर ने वर्ष 1796 में की। किंतु एडवर्ड जेनर को वैक्सीन की कल्पना और प्रेरणा कहां से मिली यह बात सामने नहीं आती। डेविड अर्नाल्ड ने 1993 में एक सुंदर और महत्वपूर्ण पुस्तक लिखी हैं – Colonizing the Body : State, Medicine and Epidemic Disease in Nineteenth Century India. इस पुस्तक में डेविड अर्नाल्ड ने यह सप्रमाण सिद्ध किया है कि वैक्सीनेशन की पद्धति भारत में सैकड़ो वर्षों से चली आ रही थी। भारतीय समाज के रचयिता पुरखों ने, इस पद्धति को बड़े ही चतुराई से भारत की धार्मिक परंपराओं से जोड़ दिया। ‘शीतला माता व्रत’ यह मूलतः वैक्सीनेशन की पद्धती थी, जो बच्चों में माता (अर्थात चिकन पॉक्स) को रोकती थी। इसी पद्धति को ओलिवर कोल्ट ने पत्रों के माध्यम से, तो डॉक्टर जॉन हॉलवेल ने भाषणों के माध्यम से, इंग्लैंड में पहुंचाया। इसी से प्रेरणा लेकर, एडवर्ड जेनर ने वैक्सीन बनाया।

अर्थात, किसी जमाने में विश्व में महामारी की रोकथाम के लिए सबसे पहले वैक्सीन बनाने वाले हम, स्वतंत्रता के बाद सब कुछ भूल गए थे। हम हमारी शक्ति को पहचानने से इन्कार करते थे। इस हीन भावना से भारत को बाहर निकाला, कोरोना काल में मोदी सरकार ने।

दिनांक 24 नवंबर 2020 को प्रधानमंत्री मोदी जी ने, देश के आठ सबसे अधिक कोरोना प्रभावित राज्यों के मुख्यमंत्रियों के साथ बैठक की। इस बैठक में उन्होंने कोरोना वैक्सीन पर देशव्यापी योजना की बात की। उन्होंने राज्यों से वैक्सीन वितरण पर लॉजिस्टिक के साथ प्लान देने की भी बात की।

इस बीच हमारे वैज्ञानिक चुपचाप काम कर रहे थे। इस वैक्सीन के क्लिनिकल ट्रायल्स भी प्रारंभ हुए।

अंततः शनिवार, 16 जनवरी 2021 को प्रधानमंत्री मोदी जी ने भारत की स्वदेशी वैक्सीन ‘कोवैक्सीन’ का लोकार्पण किया। इस अवसर पर उन्होंने कहा, “हमारे सैकड़ो साथी ऐसे भी हैं, जो कभी घर वापस नहीं लौटे। उन्होंने एक-एक जीवन बचाने के लिए अपने जीवन की आहुति दे दी। इसलिए आज कोरोना का पहला टीका, स्वास्थ्य सेवा से जुड़े लोगों को लगाकर, एक तरह से समाज अपना ऋण चुका रहा हैं।”

यह कोवैक्सीन, हैदराबाद की भारत बायोटेक कंपनी ने ‘भारतीय चिकित्सा अनुसंधान संस्थान’ (ICMR) के सहयोग से विकसित किया था। वही पुणे की सिरम इंस्टीट्यूट, एस्ट्रोजेनिका कंपनी की ‘कोविडशील्ड’ वैक्सीन बना रही थी। इन वैक्सीन के भारत में बनने के कारण, भारत में वैक्सीन के टीकाकरण का कार्यक्रम तीव्र गति से चलाया गया। विश्व के पहले कुछ देशों में भारत का यह टीकाकरण अभियान शामिल था।

भारत, कोरोना के वैक्सीन का विश्व का सबसे बड़ा उत्पादक देश रहा। विश्व के कुल वैक्सीन का 60% उत्पादन भारत में हुआ।

भारत ने कोविड के इस कठिन समय में, ‘वसुधैव कुटुंबकम्’ की संकल्पना ‘वैक्सीन मैत्री’ अभियान के द्वारा प्रत्यक्ष में उतारी। न केवल अपने नागरिकों के लिए वैक्सीन का निर्माण किया, बल्कि विश्व के 100 से ज्यादा देशों को वैक्सीन उपलब्ध कराई। इसका स्वरूप व्यावसायिक आपूर्ति (Commercial Supply) के रूप में तो था ही, पर छोटे देशों को भारत ने दान (Grant) के रूप में भी वैक्सीन के टीके उपलब्ध कराए।

विश्व में इसका जबरदस्त सकारात्मक परिणाम हुआ। जब अधिकांश विकसित देश अपने लिए वैक्सीन जमा कर रहे थे (vaccine hoarding), तब भारत गरीब और विकासशील देशों की सहायता कर रहा था। भूटान यह भारत से वैक्सीन प्राप्त करने वाला पहला देश था। 20 जनवरी 2021 को भारत ने भूटान को वैक्सीन की पहली खेप भेजी। भूटान के प्रधानमंत्री डॉ. लोटे शेरिंग ने कहा कि, “भारत ने न केवल अपने मित्र भूटान का साथ दिया, वरन् मानवता की मिसाल पेश की। भारत ने भूटान को जीवनदान दिया।”

इसी प्रकार की भावनाएं नेपाल, बांग्लादेश, मालदीव्स, श्रीलंका जैसे पड़ोसी देशों ने व्यक्त की। मॉरीशस के प्रधानमंत्री प्रविंद्र जगन्नाथ ने वैक्सीन की पहली खेप मिलने पर कहा, “भारत ने केवल दवा नहीं भेजी, बल्कि उम्मीद भेजी हैं…” ब्राजील के राष्ट्रपति जैर बोल्सोनारो ने प्रधानमंत्री मोदी को धन्यवाद देते हुए जो ट्वीट किया, वह जबरदस्त वायरल हुआ। उन्होंने ट्वीट के साथ, ‘हनुमान जी संजीवनी बूटी ला रहे हैं’ यह चित्र जोड़ा और लिखा, “धन्यवाद भारत, हम इसे वैक्सीन संजीवनी कहते हैं।”

डोमिनिका के प्रधानमंत्री रूजवेल्ट स्केरिट भावूक होकर बोले, “भारत ने भगवान का काम किया हैं। हमारी छोटी सी आबादी की परवाह कि, जब हमें इसकी सबसे अधिक जरूरत थी।” संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंतोनियो गुटेरेस ने कहा, “भारत की वैक्सीन उत्पादन क्षमता, विश्व की सबसे बड़ी संपत्ति हैं।” कई अमेरिकी समाचार पत्रों ने भारत को ‘Moral Leadership in the Global South’ कहा।

इसका प्रभाव लंबे समय तक रहा। 21 मई 2023 को प्रधानमंत्री मोदी, ‘भारत प्रशांत द्वीप समूह सहयोग’ (FIPIC) के शिखर सम्मेलन के लिए पापुआ न्यू गिनी पहुंचे। हवाई तल पर उनकी अगवानी करने वहां के प्रधानमंत्री जेम्स मारापे उपस्थित थे। जैसे ही मोदी जी विमान से उतरे, जेम्स मारापे ने मोदी के पांव छुए। मोदी जी ने उन्हें गले लगा लिया।

यह अभूतपूर्व घटना थी। विश्व के किसी भी राष्ट्र प्रमुख ने, दूसरे राष्ट्र प्रमुख का पांव छूकर सार्वजनिक रूप से अभिवादन, इससे पहले कभी नहीं किया था। यह सम्मान इसलिए था, कारण भारत ने अत्यंत मैत्रीपूर्ण भाव से, कोरोना के कठिन कालखंड में पापुआ न्यू गिनी की मदद की थी।

भारत के इस वैक्सीन मैत्री अभियान ने, भारत को विश्व की औषधि शाला (फार्मेसी ऑफ द वर्ल्ड) के रूप में प्रतिष्ठित किया।

संक्षेप में, भारत को अपनी विस्मृत क्षमता का, विस्मृत शक्ति का पुर्नस्मरण हुआ। अपने अंदर के ऊर्जा की अनुभूति हुई। और फिर भारत ने, मात्र आठ – दस वर्षों में ही ऐसा कर दिखाया, जो हम स्वतंत्रता के बाद, साठ – पैंसठ वर्ष भी नहीं कर सके थे..!


(सोमवार, 16 फरवरी को प्रकाशित ‘इंडिया से भारत : एक प्रवास’ इस पुस्तक के अंश।)

योगी सरकार ने प्रस्तुत किया समग्र विकास का बजट

उत्तर प्रदेश की योगी सरकार ने 2027 में संभावित विधानसभा चुनावों से पूर्व 9 लाख करोड़ रु का अब तक का सबसे बड़ा बजट विधानसभा में प्रस्तुत किया है। सत्तापक्ष, विशेषज्ञ और मीडिया भी इस बजट की सराहना कर रहे हैं। परंपरागत रूप से विपक्ष इसकी आलोचना करते हुए इसे योगी सरकार का अंतिम बजट कह रहा है। योगीराज के इस बजट का आकार भारत के पड़ोसी राष्ट्रों पाकिस्तान ओैर बांग्लादेश के बजट से भी कई गुना बड़ा है।

यूपी के बजट में केंद्र सरकार द्वारा प्रस्तुत बजट की छाप दिख रही है। योगी सरकार का चुनावी वर्ष के पूर्व का यह बजट प्रदेश को समस्त क्षेत्र में विकसित बनाने का आश्वासन देने वाला बजट है, समाज को संतुष्टि प्रदान करने वाला बजटहै । बजट में समाज के चार स्तंभों युवा, किसान, गरीब व महिलाओं का विशेष ध्यान रखा गया है। बजट में सुशिक्षित समाज, स्वस्थ समाज, नारी सशक्तीकरण ,जल सरंक्षण, पर्यावरण संरक्षण पर पर्याप्त धन आबंटित किया गया है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का कहना है कि यह बजट नारी शक्ति, युवावर्ग, किसान, तथा वंचित वर्ग के उत्थान व खुशहाली को समर्पित है। यह विश्वस्तरीय अवस्थापना सुविधाएं, उत्कृष्ट निवेश का वतावरण, नारी समृद्धि के लिए अभूतपूर्व प्रयास, युवाओं को अद्वितीय अवसर, तकनीक संग रोजगार सृजन वाला बहुआयामी बजट है। योगी सरकार प्रदेश को देश का ग्रोथ इंजन बनाने के लिए प्रतिबद्ध है और यह बजट उसका प्रमाण है।

सरकार के दूसरे कार्यकाल का अंतिम पूर्ण बजट होने के बाड भी बजट में राजकोषीय अनुशासन पर बल दिया गया है और आधुनिकता पर भी ध्यान दिया गया है। सरकार लगातार बजट का आकार बड़ा करके प्रदेश के आर्थिक उन्नयन के लिए नई रणनीतियों के साथ अपनी व्यूह रचना को आगे बढ़ा रही है। महत्वपूर्ण बात है कि आइटी एवं इलेक्ट्रानिक्स क्षेत्र के बजट में 76 प्रतिशत की वृद्धि की गई है, कृषि के लिए 20 प्रतिशत सिंचाई एवं जल संसाधन के लिए विगत वर्ष की तुलना में 30 प्रतिशत अतिरिक्त धनराशि की व्यवस्था की गई है। ग्राम पंचायतों के लिए भी सरकार ने खजाना खोल दिया है ओैर इस बार उनके लिए बजट में 67 प्रतिशत की वृद्धि की गई है।

प्रदेश में विधानसभा चुनावों से पूर्व त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव भी संभावित हैं जिनके कारण सरकार ने नई मांगो के अनुरूप सबसे अधिक 10,695 करोड़ रु की धनराशि पंचायती राज विभाग को आवंटित की है। इस वर्ष के बजट में कई नए क्षेत्रों का सृजन किया गया है व धन आवंटित कर उन्हे पोषित करने का प्रयास किया गया है। एआई तकनीक तथा डाटा सेंटर के साथ औद्योगिक विकास पर बल दिया गया है। एमएसएमई पर विशेष ध्यान केंद्रित किया गया है। हर बार की तरह एक्सप्रेस वे योजनाओं को भी धन आवंटित कर विकास की गंगा बहाने पर ध्यान दिया गया है। बजट में ”एक जिला एक उत्पाद” व “एक जिला एक व्यंजन” जैसी योजनाओं को प्राथमिकता दी गई हैं। विकास को गति देने के लिए हर जिले व क्षेत्र का ध्यान रखा गया है।

पर्यटन के माध्यम से भी प्रदेश की आर्थिक स्थिति को मजबूत करने व युवाओं के लिए नये रोजगार सृजन पर बल दिया गया है। बजट को लेकर सरकारी पक्ष का जोरदार दावा है कि नए बजट से युवाओं के लिए रोजगार के नए अवसर खुलने जा रहे हैं। इंफ्रास्ट्रक्चर और स्वास्थ्य पर विशेष ध्यान दिया गया है। बजट के माध्यम से सरकार ने किसानों को साधने के लिए बजट में बीज से बाजार तक की विस्तृत योजना के साथ धन का खजाना खोल दिया है। सरकार का जोर फसलों की गुणवत्ता और उत्पादकता पर तो है ही साथ ही वो किसानों को उद्यम, प्रसंस्करण और बाजार से भी जोड़ना चाहती है। प्रदेश के बजट में पशुधन एवं दुग्ध विकास को भी स्थान देते हुए निराश्रित गोवंश के लिए व्यवस्था की गई है। प्रदेश में 220 नई दुग्ध समितियां गठित करने की घोषणा की गई है। विकास कार्यों के लिए बजट में 19.5 प्रतिशत पूंजीगत परिव्यय का प्रावधान किया गया है जो आधारभूत ढांचे, औद्योगिक विकास, सड़क, ऊर्जा और शहरी ग्रामीण अधोसंरचना को गति प्रदान करेगा, इससे सम्बंधित 43.5 हजार करोड़ रु की नई योजनाएं बजट में आवंटित की गई हैं।

बजट में बताया गया है कि प्रदेश में हो रहे बदलावों के अनुसार किस प्रकार राजस्व जुटाने में एआई तकनीक का प्रयोग किया जा रहा है। उत्तर प्रदेश, देश में आबकारी निर्यात नीति तैयार करने वाला पहला राज्य बना है । देश के मोबाइल निर्माण सेक्टर में 65 प्रतिशत मोबाइल यूपी में बन रहे हैं। 44.74 हजार करोड़ के इलेक्ट्रॉनिक्स निर्यात से यूपी देश की ताकत बन चुका है। भविष्य की चुनौतियों को ध्यान में रखते हुए तैयार तहसीलों के लिए योजना बनाई गई है ओैर शिक्षा पर खर्च बढ़ाया गया है।

प्रदेश के लघु उद्यमी बजट से खुश नजर आ रहे हैं उद्योगपतियां का कहना है कि बजट में ं हस्तकरघा और अन्य योजनाआें को काफी धन मिला है। महिलाए व युवा भी बजट का अपने अनुसार स्वागत कर रहे है। किंतु अगर बजट से कोइसर्वाकि निराश दिखा रहा है तो विरोधी दल ही हैं क्योकि अब प्रदेश में सब कुछ चंगा है कयोकि न कोई दंगा है। कानून व्यवस्था मे व्यापक सुधार देखने को मिल रहा है जिसके कारण अब निवेषक मभी प्रदेश में निवेश करने के लिए आकर्षित हो रहे हैं।

योगी सरकार ने अपने आखिरी बजट में भाजपा शासित अन्य राज्यो की अच्छी विकास योजाओ को भी समाहित करने का सफल प्रयास किया है। जिसमें राजस्थान सरकार द्वारा चलाई जा रही स्कूटी योजना एक प्रमुख उदाहरण हें।

बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार अपने बजट में चुनावों में वापसी के लिए जमकर रेवड़िया बांट रहे थे जबकि बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी मुस्लिम तुष्टिकरण पर इतना ध्यान ओैर धन देती है कि कुछ कहने को नहीं वह अपने बजट में 5 हजार करोड रूपए केवल मदरसों, मस्जिदां व मुस्लिम अल्पसख्यकों के कल्याण पर ही खर्च कर देती हैं और उद्योग व राज्य के आधुनिक विकास पर कोई ध्यान नहीं दे ं रही है और यही कारण है कि आज ंउत्तर प्रदेश जहां देश का विकसित राज्य बनने की ओर तीव्रता के साथ आगे बढ रहा है वहीं बंगाल में अथाह घोटालों व भ्रष्टाचार तथा मुस्लिम तुष्टिकरण की अंधी दौड में आकंठ डूबकर बरबादी की कगार पर पहुच गया है। यूपी में योगी बजट की एक और विशेषता यह रही है कि किसी मुख्यमंत्री के नेतृत्व मेंं लगातार 10वां बजट पेश किया गया हो अभी तक किसी भी मुख्यमंत्री को लगातार इतने बजट प्रस्तुत करने का सौभाग्य नहीं प्राप्त हुआ है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में प्रदेश आज कई सारे क्षेत्रों में नंबर वन पायदान पर पहुंच गया है जबकि भारत के टॉप तीन विकसित राज्यो की श्रेणी में भी आ गया है।

योगीराज मे सबसे बड़ा बदलाव यह आया है कि अब तक जितने भी बजट योगी कार्यकाल मे पेश किए गए हैं उन सभी नौ बजटो में कोई टैक्स नहीं लगाया गया है।

प्रेषक – मृत्युंजय दीक्षित

फोन नं. – 9198571540

 

शिव का मार्ग समर्पण का है, समर्पण से मिटोगे तो तुम्हारा नया जन्म होगा

(महाशिवरात्रि पर शिव पर ओशो के एक प्रमुख प्रवचन का अँश )

शिव कोई पुरोहित नहीं है। शिव तीर्थंकर हैं। शिव अवतार हैं। शिव क्रांतिद्रष्टा हैं। वे जो भी कहेंगे, वह आग है। अगर तुम जलने को तैयार हो, तो ही उनके पास आना; अगर तुम मिटने को तैयार हो, तो ही उनके निमंत्रण को स्वीकार करना। क्योंकि तुम मिटोगे तो ही नये का जन्म होगा। तुम्हारी राख पर ही नये जीवन की शुरुआत है।

ध्यान बीज है। तुम्हारी महत् यात्रा में, जीवन की खोज में, सत्य के मंदिर तक पहुंचने में— ध्यान बीज है। ध्यान क्या है जिसका इतना मूल्य है; जो कि खिल जायेगा तो तुम परमात्मा हो जाओगे; जो सड़ जायेगा तो तुम नारकीय जीवन व्यतीत करोगे? ध्यान क्या है? ध्यान है निर्विचार चैतन्य की अवस्था, जहां होश तो पूरा हो और विचार बिलकुल न हों। तुम तो रहो, लेकिन मन न बचे। मन की मृत्यु ध्यान है।

दूभर है मार्ग। उस दूभर से गुजरना होगा। और, इसीलिए उद्यम चाहिए। इतनी महान प्रयत्न करने की आकांक्षा चाहिए, अभीप्सा चाहिए कि तुम अपने को पूरा दांव पर लगा दो। मोक्ष खरीदा जा सकता है, लेकिन तुम अपने को दाव पर लगाओ तो ही; इससे कम में नहीं चलेगा। कुछ और तुमने दिया, वह देना नहीं है, वह कीमत नहीं चुकायी तुमने। अपने को पूरा दे डालोगे तो ही कीमत चुकती है और उपलब्धि होती है।

ओंम नम: श्रीशंभवे स्वात्मानन्दप्रकाशवपुषे।

अथ शिव—सूत्र:

चैतन्यमात्मा ज्ञानं बन्ध:। योनिवर्ग: कलाशरीरम्। क्समो भैरव:। शक्तिचक्रसंधाने विश्वसंहार:।

जीवन—सत्य की खोज दो मार्गों से हो सकती है। एक पुरुष का मार्ग है—आक्रमण का, हिंसा का, छीन—झपट का। एक शिव का मार्ग है—समर्पण का, प्रतिक्रमण का।

विज्ञान पुरुष का मार्ग है; विज्ञान आक्रमण है। धर्म शिव का मार्ग है; धर्म नमन है।

पूर्व के सभी शास्त्र परमात्मा को नमस्कार से शुरू होते है। वह नमस्कार केवल औपचारिक नहीं है। वह केवल एक परंपरा और रीति नहीं है। वह नमस्कार इंगित है कि मार्ग समर्पण का है, और जो विनम्र है, केवल वे ही उपलब्ध हो सकेंगे। और, जो आक्रमक है, अहंकार से भरे है; जो सत्य को भी छीन—झपटकर पाना चाहते है; जो सत्य के भी मालिक होने की आकांक्षा रखते है; जो परमात्मा के द्वार पर एक सैनिक की भांति पहुंचे हैं—विजय करने, वे हार जायेंगे।

विज्ञान इसीलिए आत्मा में भरोसा नहीं करता। भरोसा करे भी कैसे? इतनी चेष्टा के बाद भी आत्मा की कोई झलक नहीं मिलती। झलक मिलेगी ही नहीं। इसलिए नहीं कि आत्मा नहीं है; बल्कि तुमने जो ढंग चुना है, वह आत्मा को पाने का ढंग नहीं है। तुम जिस द्वार से प्रवेश किये हो, वह क्षुद्र को पाने का ढंग है। आक्रमण से, जो बहुमूल्य है, वह नहीं मिल सकता।

जीवन का रहस्य तुम्हें मिल सकेगा, अगर नमन के द्वार से तुम गये। अगर तुम झुके, तुमने प्रार्थना की, तो तुम प्रेम के केंद्र तक पहुंच पाओगे।उसके पास अति प्रेमपूर्ण, अति विनम्र, प्रार्थना से भरा हृदय चाहिए। और जल्दी वहां नहीं है। तुमने जल्दी की, कि तुम चूके। वहां बड़ा धैर्य चाहिए। तुम्हारी जल्दी और उसका हृदय बंद हो जायेगा। क्योंकि जल्दी भी आक्रमण की खबर है। इसलिए जो परमात्मा को खोजने चलते है, उनके जीवन का ढंग दो शब्दों में समाया हुआ है— प्रार्थना और प्रतीक्षा। प्रार्थना से शास्त्र शुरू होते है और प्रतीक्षा पर पूरे होते है। प्रार्थना से खोज इसलिए शुरू होती है। इस शास्त्र का पहला चरण है :

ओम स्वप्रकाश आनंद—स्वरूप भगवान शिव को नमन!

पूर्व में हम शाख का अध्ययन नहीं करते; हम शाख का पाठ करते है। अध्ययन शास्त्र का हो भी नहीं सकता। अध्ययन का अर्थ है कि एक बार समझ लिया, फिर कचरे में फेंक दिया, जैसे कि बात खतम हो गई। जब समझ ही लिया तो अब दुबारा क्या करना। पाठ का अर्थ होता है; समझ बुद्धि की होती तो एक बार में पूरी हो जाती। इसकी तो चुस्कियां बार—बार लेनी पड़ेगी। इसे तो जाने—अनजाने न मालूम कितनी बार दोहराना पड़ेगा। इसे बहुत—से भाव— क्षणों में, बहुत—सी मनोदशाओं में— कभी सुबह जब सूरज उगता है तब, कभी रात जब सब अंधकार हो जाता है तब, कभी मन जब प्रफुल्लित होता है तब, और कभी मन जब उदासी से भरा होता है तब— विभिन्न चित्त की दशाओं में, विभिन्न मनों— क्षणों में, इसमें उतरना होगा, तब इसके सभी पहलू धीरे— धीरे प्रकट होंगे। फिर भी तुम उसे चुकता न कर पाओगे।

कोई शास्त्र कभी चुकता नहीं। जितना ही तुम पाओगे कि खोज लिया, उतना ही तुम पाओगे कि खोज के लिए और भी ज्यादा बाकी रह गया। जितने तुम गहरे उतरोगे, पाओगे कि गहराई बढ़ती चली जाती है। शास्त्र को कभी पाठी चुका नहीं पाता। पाठ का मतलब ही यही है कि बार—बार, बहुत बार। पश्‍चिम इस बात को समझ ही नहीं पाता। उनकी पकड़ के बाहर है कि लोग गीता को हजारों साल से क्यों पढ रहे हैं?

उनको खयाल में नहीं कि पाठ की प्रक्रिया हृदय में उतारने की प्रक्रिया है। उसका समझ से बहुत वास्ता नहीं है; स्वाद से वास्ता है। तर्क और गणित और हिसाब से उसका कोई भी संबंध नहीं है। उसका संबंध तो अपने हृदय को और उसके बीच की जो दूरी है, उसको मिटाने से है। धीरे— धीरे हम इतने लीन हो जायें उसमें कि पाठी और पाठ एक हो जाये; पता ही न चले कि कौन गीता है और कौन गीता का पाठी।

ऐसे भाव से जो चले.. .यह की का भाव है। यह समर्पण की धारा है। इसे खयाल में ले लें।

नमन से हम चलें तो शिव के सूत्र समझ में आ सकेंगे। उन्हें तुम अपने में उतरने देना, और जल्दी निर्णय की मत करना कि वे ठीक हैं कि गलत हैं। क्योंकि सूत्रों के संबंध में एक बात खयाल में रख लेना— तुम्हारे ऊपर निर्भर नहीं है तय करना कि ये ठीक है या गलत हैं। तुम निर्णय कर भी कैसे पाओगे? जो अंधेरे में खड़ा है, वह प्रकाश के संबंध में क्या निर्णय करेगा! और जिसने कभी स्वास्थ्य नहीं जाना, जो रोग की शय्या से ही बंधा रहा, उसे स्वास्थ्य की परिभाषा कैसे समझ में आयेगी! जिसने कभी प्रेम की स्फुरणा नहीं पहचानी और जो जीवनभर घृणा, ईर्ष्या और द्वेष में जिया है, वह प्रेम की कविता तो पढ़ सकता है, क्योंकि शब्द उसकी समझ में आ जायेंगे; लेकिन शब्दों में जो छिपा है, अंतरगुंफित है, वह द्वार तो उसके लिए बंद ही रहेगा। इसलिए तुम निर्णय मत करना कि क्या ठीक, क्या गलत।

तुम सिर्फ पीना, —समझना भी नहीं कहता हूं— तुम सिर्फ पीना, तुम सिर्फ स्वाद में उतरना। और, अगर वह स्वाद तुम्हारे भीतर रहस्य के लोक खोलने लगे, और वह स्वाद अगर तुम्हारे भीतर नई सुगंध को जन्म दे दे और तुम पाओ की क्षणभर को ही सही, तुम्हारे दुर्गंध का व्यक्तित्व विलीन हो गया, और तुम्हारे भीतर कोई फूल खिला, और तुम सुगंधित हुए, क्षणभर को ही तुम पाओ कि तुम अंधकार नहीं हो, कोई दिया जल गया, एक झलक मिली; जैसे अंधेरे में बिजली कौंध गई हो, उसी से— उसी से समझ आयेगी, तुम्हारे समझने से नहीं। तुम्हारे अनुभव की झलक से समझ आयेगी। इसलिए तुम विनम्र रहना।

दूसरी बात— सूत्र का अर्थ होता है; संक्षिप्त से संक्षिप्त, सारभूत, टेलीग्राफिक। वहां एक—एक शब्द अत्यंत घना है; विस्तार नहीं होता सूत्र में, घनत्व होता है। लंबा नहीं होता सूत्र, बड़ा छोटा होता है; जैसे छोटा—सा बीज होता है। उसमें सारा वृक्ष समाया होता है। जैसा बीज है, ऐसा सूत्र है। बीज में तुम वृक्ष देख भी नहीं सकते। देखना भी चाहोगे तो बीज में तुम वृक्ष को पाओगे नहीं, क्योंकि उसके लिए बड़ी गहरी आंखें चाहिए—जो बीज में वृक्ष को देख लें, जो वर्तमान में भविष्य को देख लें, जो आज कल को देख लें, जो दृश्य से अदृश्य को खोज लें— बड़ी पैनी आंखें चाहिए। वैसी पैनी आंखें तुम्हारे पास अभी नहीं हैं। अभी तो तुम्हें बीज बीज ही दिखाई पड़ेगा। वृक्ष को देखना हो तो बीज को तुम्हें बोना पड़ेगा, और कोई रास्ता तुम्हारे पास देखने का नहीं है। और जो बीज टूटेगा जमीन में और वृक्ष अकुंरित होगा, तभी तुम पहचान पाओगे।

ये सूत्र बीज है। इन्हें तुम्हें अपने हृदय में बोना होगा। तुम अभी निर्णय मत करना। क्योंकि अभी तुमने अगर बीज पर निर्णय लिया तो तुम इसे फेंक ही दोगे; कचरा—कूड़ा मालूम पड़ेगा।

धर्म महान क्रांति है। धर्म के नाम से तुमने जो समझा हुआ है, उसका धर्म से न के बराबर संबंध है। इसलिए शिव के सूत्र तुम्हें चौकायेंगे भी। तुम भयभीत भी होओगे, डरोगे भी; क्योंकि तुम्हारे धर्म डगमगायेंगे। तुम्हारे मंदिर, तुम्हारी मस्जिद, तुम्हारे गिरजे— अगर ये सूत्र तुमने समझे तो— गिर जायेंगे! तुम उन्हें बचाने की कोशिश में मत लगना; क्योंकि वे बचे भी रहें, तो भी उनसे तुम्हें कुछ भी मिला नहीं। तुम उनमें जी ही रहे हो, और तुम मुर्दा हो। मंदिर काफी सजे है, लेकिन तुम्हारे जीवन में कोई भी खुशी की किरण नहीं है। मंदिर में काफी रोशनी है; उससे तुम्हारे जीवन का अंधकार नहीं मिटता। उससे भयभीत मत होना; क्योंकि ये सूत्र तुम्हें कठिनाई में तो डालेंगे ही। क्योंकि शिव कोई पुरोहित नहीं है। पुरोहित की भाषा तुम्हें हमेशा संतोषदायी मालूम पड़ती है; क्योंकि पुरोहित को तुम्हारा शोषण करना है। पुरोहित तुम्हें बदलने के लिए उत्सुक नहीं है। तुम जैसे हो ऐसे ही रहो, इसी में उसका लाभ है। तुम जैसे हो— रुग्ण, बीमार— ऐसे ही रहो, इसी में उसका व्यवसाय है।

चैतन्यमात्मा— चैतन्य आत्मा है।

चैतन्य हम सभी हैं, लेकिन आत्मा का हमें कोई पता नहीं चलता। अगर चैतन्य ही आआ है तो हम सभी को पता चल जाना चाहिए। हम सब चैतन्य है। लेकिन, चैतन्य आत्मा है, इसका क्या अर्थ होगा?

पहला अर्थ : इस जगत में, सिर्फ चैतन्य ही तुम्हारा अपना है। आत्मा का अर्थ होता है. अपना; शेष सब पराया है। शेष कितना ही अपना लगे, पराया है। मित्र हों, प्रियजन हों, परिवार के लोग हों, धन हो, यश, पद—प्रतिष्ठा हो, बड़ा साम्राज्य हो— वह सब जिसे तुम कहते हो मेरा— वहां धोखा है। क्योंकि वह सभी मृत्यु तुमसे छीन लेगी। मृत्यु कसौटी है— कौन अपना है, कौन पराया है। मृत्यु जिससे तुम्हें अलग कर दे, वह पराया था। और मृत्यु तुम्हें जिससे अलग न कर पाये, वह अपना था।

आत्मा का अर्थ है : जो अपना है। लेकिन जैसे ही हम सोचते है अपना, वैसे ही दूसरा प्रवेश कर जाता है। अपने का मतलब ही होता है कोई दूसरा, जो अपना है। तुम्हें यह खयाल ही नहीं आता कि तुम्हारे अतिरिक्त, तुम्हारा अपना कोई भी नहीं है; हो भी नहीं सकता। और जितनी देर तुम भटके रहोगे इस धारा में कि कोई दूसरा अपना है, उतने दिन व्यर्थ गये; उतना जीवन अकारण बीता। उतना समय तुमने सपने देखे। उतने समय में तुम जाग सकते थे, मोक्ष तुम्हारा होता; तुमने कचरा इकट्ठा किया।

सिर्फ तुम ही तुम्हारे हो।

यह पहला सूत्र है : मेरे अतिरिक्त मेरा कोई भी नहीं है। यह बड़ा क्रांतिकारी सूत्र है, बड़ा समाज—विरोधी है। क्योंकि समाज जीता इसी आधार पर है कि दूसरे अपने है; जाति के लोग अपने है; देश के लोग अपने है— मेरा देश, मेरी जाति, मेरा धर्म, मेरा परिवार; मेरे का सारा खेल है। समाज जीता है ‘मेरी’ की धारणा पर। इसलिए धर्म समाज—विरोधी तत्व है। धर्म समाज से छुटकारा है, दूसरे से छुटकारा है। और धर्म कहता है कि तुम्हारे अतिरिक्त तुम्हारा और कोई भी नहीं है।

ऊपर से देखें तो यह बडा स्वार्थी वचन मालूम पड़ेगा) क्योंकि यह तो यह बात हुई कि हम ही अपने है, तो तत्‍क्षण हमें लगता है कि यह तो स्वार्थ की बात है। यह स्वार्थ की बात नहीं है। अगर यह तुम्हें खयाल में आ जाये, तो ही तुम्हारे जीवन में परार्थ और परमार्थ पैदा होगा। र्क्यााक जो अभी आत्मा के भाव से ही नहीं भरा है, उसके जीवन में कोई परार्थ और कोई परमार्थ नहीं हो सकता।

ब तुम परोपकार करते हो, तब तुम कर नहीं सकते; क्योंकि जिसे अपना ही पता नहीं, वह परोपकार करेगा कैसे? तुम चाहे सोचते हो कि तुम कर रहे हो— गरीब की सेवा, अस्पताल में बीमार के पैर दबा रहे हो— लेकिन, अगर तुम गौर से खोजोगे, तो तुम कहीं—न—कहीं अपने अहंकार को ही भरता हुआ पाओगे। और, अगर तुम्हारा अहंकार ही सेवा से भरता है, तो सेवा भी शोषण है। आत्मज्ञान के पहले कोई व्यक्ति परोपकारी नहीं हो सकता; क्योंकि स्वयं को जाने बिना इतनी बड़ी क्रांति हो ही नहीं सकती।

अहंकार ऐसे रास्ते खोजता है। ऊपर से दिखता है कि तुम परोपकार कर रहे हो; लेकिन, भीतर तुम ही खड़े होते हो। और जितनी सूक्ष्म हो जाती है यात्रा, उतनी ही पकड़ के बाहर हो जाती है। दूसरे तो पकड़ ही नहीं पाते; तुम भी नहीं पकड पाते हो। दूसरे तो धोखे में पड़ते ही हैं; तुम भी अपने दिये, धोखे में, भूल जाते हो, भटक जाते हो। हम सभी ने अपनी—अपनी भूल— भुलैया बना ली हैं। उसमें हमने दूसरों को धोखा देने के लिए ही शुरू किया था सारा उपाय, आयोजन यह हमने कभी सोचा न था कि अपनी बनाई भूल— भूलैयां में हम खुद ही खो जायेंगे। लेकिन हम खो गये हैं।

पहली बात स्मरण रखो. तुम्हारे अतिरिक्त तुम्हारा कोई भी नहीं है। जैसे ही यह स्मरण सघन होता है कि चैतन्य ही आत्मा है, चैतन्य ही मैं हूं और सब ‘पर’ है, पराया है, विजातीय है—वैसे ही तुम्हारे जीवन में क्रांति की पहली किरण प्रविष्ट हो जाती है; वैसे ही तुम्हारे और समाज के बीच एक दरार पड़ जाती है; वैसे ही तुम्हारे और तुम्हारे संबंधों के बीच एक दरार पड़ जाती है। लेकिन आदमी अपनी तरफ देखना ही नहीं चाहता। देखना कठिन भी है; क्योंकि, देखने के पहले जिस प्रक्रिया से गुजरना पड़ता है, वह बहुत संघातक है।

आख दूसरे को देखती है। हाथ दूसरे को छूते हैं। मन दूसरे की सोचता है। और तुम सदा अंधेरे में खड़े रह जाते हो। तुम्हारी हालत वही है जो दीये तले अंधेरे की होती है। दीये की रोशनी सब पर पड़ती है, सिर्फ तुम्हें छोड़ देती है। इसलिए तुम भटकते हो उस रोशनी में सब तरफ; सब दिशाओं में यात्रा करते हो, और एक अपरिचित रह जाता है—वही तुम हो।

यह पहला सूत्र है. चैतन्य आत्मा। इस सूत्र को एक गहरे बीज की तरह हृदय में उतर जाने दो। व्यर्थ है सारे जगत की यात्रा, अगर तुम अपने से अपरिचित रह गये। अगर स्वयं को न जान पाये, और सब भी जान लिया तो वह सारा ज्ञान भी इकट्ठे जोड़ में अज्ञान सिद्ध होगा। अगर अपने को न देख पाये, और सारा जगत देख डाला, चांद—तारे छान डाले, तो भी तुम अन्य ही रहोगे। क्योंकि आख तो उसी को मिलती है, जो स्वयं को देख लेता है। ज्ञान तो उसी को मिलता है, जो स्वयं से परिचित हो जाता है। जो चैतन्य के स्वप्रकाश में नहा लेता है, वही पवित्र है। और कोई तीर्थ नहीं है; चैतन्य तीर्थ है। चैतन्य तुम्हारा स्वभाव है। उससे तुम क्षणभर को भी पार नहीं गये हो। लेकिन दीये तले अंधेरा है। तुम उससे दूर जा भी नहीं सकते, चाहो तो भी। लेकिन भ्रम पैदा हो सकता है कि तुम बहुत दूर चले गये हो। तुम सपना देख सकते हो संसार में। लेकिन, सपना सत्य नहीं हो सकता। सत्य तो सिर्फ एक बात है, वह है तुम्हारा चैतन्य स्वभाव।

चैतन्य आत्मा है। तो, पहली तो बात कि मेरा सिवाय चैतन्य के और कोई भी नहीं है। यह भाव तुममें सघन हो जाए, तो संन्यास का जन्म हुआ। क्योंकि मेरे अतिरिक्त भी मेरा कोई हो सकता है, यही भाव संसार है।

इसलिए पहले सूत्र में बड़ी क्रांति है। पहली चिनगारी है—शिव फेंकते हैं तुम्हारी तरफ—और वह यह है कि तुम जान लो कि तुम ही बस तुम्हारे हो, बाकी कोई तुम्हारा नहीं है। इससे बड़ा विषाद मन को पकड़ेगा; क्योंकि तुमने दूसरों के साथ बड़े संबंध बना रखे हैं, बड़े सपने संजो रखे हैं। दूसरों के साथ तुम्हारी बड़ी आशा जुडी हैं।

अपनी तरफ देखो—न तो पीछे, न आगे। कोई तुम्हारा नहीं है। कोई संबंध तुम्हारी आत्मा नहीं बन सकता। तुम्हारे अतिरिक्त तुम्हारा कोई मित्र नहीं है। लेकिन तब बड़ा डर लगता है; क्योंकि लगता है कि तुम अकेले हो गये। और आदमी इतना भयभीत है कि गली से गुजरता है अकेले में, तो भी जोर से गीत गाने लगता है। अपनी ही आवाज सुन के लगता है कि अकेला नहीं है। यह तुम अपनी ही आवाज सुन रहे हो।

संसार का इतना ही अर्थ है कि तुमने अपने सपनों कि नाव दूसरों के साथ बांध रखी है। संन्यास का अर्थ है कि तुम जाग गये। और तुमने एक बात स्वीकार कर ली—कितनी ही कष्टकर हो, कितनी ही दुखपूर्ण मालूम पडे प्रथम, और कितनी ही संघातक पीड़ा अनुभव हो—कि तुम अकेले हो। सब संग—साथ झूठा है। इसका यह अर्थ नहीं है कि तुम भाग जाओ हिमालय। क्योंकि जो अभी हिमालय की तरफ भाग रहा है, उसे सभी संग—साथ सार्थक हैं, झूठा नहीं हुआ। क्योंकि जो चीज झूठ हो गई, उससे भागने में भी कोई सार्थकता नहीं है। कोई भी सुबह जागकर भागता तो नहीं कि सपना झूठा है, भाग इस घर से। सपना झूठा हो गया, बात खत्म हो गई। उसमें भागना क्या है! लेकिन एक आदमी है जो भाग रहा है पली से, बच्चों से। इसका भागना बताता है—इसने सुन लिया होगा कि सपना झूठा है, लेकिन अभी इसे खुद पता नहीं चला। कल तक यह पली की तरफ भागता था, अब पत्नी की तरफ पीठ करके भागता है; लेकिन दोनों ही अर्थों में पत्नी सार्थक थी।

भागने की कोई भी जरूरत नहीं है, तो झंझट पीछे चली जायेगी। तुम जहां हो, वहीं रहना; रत्तीभर भी बाहर कोई फर्क करने की आवश्यकता नहीं है। लेकिन भीतर तुम अकेले हो जाना। भीतर तुम कैवल्य को अनुभव करना कि मैं अकेला हूं; कोई संगी—साथी नहीं है। और यह तुम दोहराना मत, क्योंकि दोहराने की कोई जरूरत नहीं कि रोज सुबह बैठकर तुम दोहराओ कि मैं अकेला हूं कोई संगी—साथी नहीं है। इससे कुछ भी न होगा। यह दोहराना तो सिर्फ यही बताएगा कि तुम्हें अभी खयाल नहीं हुआ। इसे समझना।

यह तथ्य है कि तुम अकेले हो। समझने में अड़चन है— वही तपश्रर्या है। तप का अर्थ नहीं है कि तुम धूप में खड़े हो जाओ। आदमी को छोड्कर सभी पशु—पक्षी धूप में खड़े हैं। उनमें से कोई भी मोक्ष नहीं चला जा रहा है। और तप का अर्थ यह नहीं है कि तुम भूखे खड़े हो जाओ, अनशन कर लो, उपवास कर लो; क्योंकि आधी दूनियां वैसे ही भूखी मर रही है। कोई उपवास करके मोक्ष नहीं पहुंच जाता है। शरीर को गला दो, जला दो— उससे कुछ हल नहीं है। वह सिर्फ आत्म—हिंसा है और महानतम पाप है। और सिर्फ छू उस पाप में उतरते हैं। जिन्हें थोड़ा भी बोध है, वे ऐसी नासमझियां न करेंगे।

दूसरे को भूखा मारना अगर गलत है तो खुद को भूखा मारना सही कैसे हो सकता है? दूसरे को सताना अगर हिंसा है, तो खुद को सताना अहिंसा कैसे हो सकती है? सताने में हिंसा है। किसको तुम सताते हो इससे क्या फर्क पड़ता है! जो हिम्मतवर हैं वे दूसरे को सताते हैं; जो कमजोर हैं वे खुद को सताते हैं। क्योंकि दूसरे को सताने में एक खतरा है, दूसरा बदला लेगा। खुद को सताने में वह खतरा भी नहीं है। कौन बदला लेगा? कमजोर अपने को सताते हैं।

ताकतवर दूसरे को पीटता है; क्योंकि उसमें खतरा तो है ही कि दूसरा क्या करेगा, कौन जाने! कमजोर आत्म—हिंसक हो जाता है, और ताकतवर पर—हिंसक होता है। और धार्मिक वह है जो अहिंसक है— न वह दूसरे को सताता है, न खुद को सताता है। सताने की बात व्यर्थ है।

तपश्रर्या का अर्थ है कि तुमने यह सत्य स्वीकार कर लिया कि तुम अकेले हो, कोई उपाय नहीं है संगी—साथी का। तुम कितना ही चाहो— कितना ही आंखें बंद करो, सपने देखो— तुम अकेले ही रहोगे। जन्मों—जन्मों से तुमने घर बसाये, परिवार बसाये, मिटाये; लेकिन तुम अकेले ही रहे हो। तुम्हारे अकेलेपन में रत्तीभर भी फर्क नहीं पड़ता। जिसने यह जान लिया— स्वीकार कर लिया— कि मैं अकेला हूं उसके लिए इंगित है इस सूत्र में ‘चैतन्य आत्मा है।’ वही तुम्हारा है और कोई तुम्हारा नहीं है।

और दूसरी बात जो इस सूत्र में है, वह है. चैतन्य। आत्मा कोई सिद्धांत नहीं है कि तुम शास्त्र में पढ़ो और मान लो। आत्मा कोई, जैसे गुरुत्वाकर्षण का सिद्धांत है, ऐसा कोई सिद्धांत नहीं है। आत्मा एक अनुभव है, सिद्धांत नहीं। और अनुभव है चैतन्य की तीव्रता का। इसलिए तुम जितने चैतन्य होते जाओगे, उतना ही तुम्हें आत्मा का पता चलेगा। तुम जितने बेहोश होते चले जाओगे, उतना ही तुम्हें अपना पता नहीं चलेगा। और तुम करीब—करीब बेहोश हो।

जो आत्मा को जानना चाहता है, उसे किसी दर्शन शाख की जरूरत नहीं है; उसे चैतन्य को जगाने की प्रक्रिया चाहिए उसे विधि चाहिए, जिससे वह ज्यादा चेतन हो जाये। जैसे कि आग को तुम उकसाते हो; राख जम जाती है, तुम उकसा देते हो— राख झड़ जाती है, अंगारे झलकने लगते हैं। ऐसी तुम्हें कोई प्रक्रिया चाहिए, जिससे राख तुम्हारी झड़े, और अंगार चमके; क्योंकि उसी चमक में तुम पहचानोगे कि तुम चैतन्य हो। और जितने तुम चैतन्य हो, उतने ही तुम आत्मवान हो। जिस दिन तुम पाओगे कि मैं परम चैतन्य हूं उस दिन तुम परमात्मा हो। तुम्हारी चेतना की मात्रा ही तुम्हारी आत्मा की मात्रा होगी। लेकिन अभी तुम करीब—करीब बेहोश हो। अभी करीब—करीब तुम जैसे शराब पिये हो। अभी तुम चल रहे हो, उठ रहे हो, काम कर रहे हो; लेकिन जैसे नींद में। होश तुम्हें नहीं है।

कभी तुमने खयाल किया किताब पढ़ते वक्त, तुम पूरा पेज पढ़ जाते हो, तब तुम्हें खयाल आता है— अरे! मैं पूरा पेज पढ़ भी गया, और एक शब्द याद नहीं! तुमने कैसे पढा होगा पूरा पेज? तुम पढ़ सकते हो सोये—सोये। मन कहीं और रहा होगा। तुम पढ़ गये, तब तुम्हें होश आता है— पता चलता है कि यह पूरा पेज व्यर्थ गया। तुम कई बार रास्ते से चलते हो, तुम पूरा रास्ता चल जाते हो, तब तुम्हें खयाल आता है कि तुम चल रहे हो। तुम काम करते हो, और तुम्हें पता नहीं चलता कि तुम कर रहे हो।

तुम बेहोशी में जी रहे हो और चैतन्य आत्मा है। और तुम पूछते हो, क्या आत्मा है। तुम चाहते हो कोई प्रमाण दे। तुम चाहते हो कोई सिद्ध करे, कोई तर्क से तुम्हें समझा दे तो तुम भी मान लो, नहीं तो तुम नास्तिक हो जाअतौ। नास्तिकता बेहोशी का सहज परिणाम है; आस्तिकता होश का फल है। जितना तुम्हारा होश बढ़ेगा, तो जरूरत नहीं है कि तुम मानो कि आत्मा है। क्योंकि कई नासमझ मान रहे हैं, उससे कुछ हल नहीं होता। इस मुल्क में तो सभी मानते हैं कि आत्मा है; लेकिन इससे क्या फर्क पड़ता है? तुम्हारे जीवन में कोई क्रांति इससे आती नहीं। शायद तुम इसलिए मान लेते हो, क्योंकि हजारों साल से दोहराया जा रहा है। सुनते—सुनते तुम्हारे कान पक गये है। सुनते—सुनते तुम भूल ही गये हो कि इस संबंध में सोचना भी है। सुनते—सुनते, पुनरुक्ति से आदमी सम्मोहित हो जाता है। एक ही बात बार—बार दोहरायी चली जाए, तो तुम भूल जाते हो कि वह संदिग्ध है, संदेह किया जा सकता है, विचार किया जा सकता है।

और, फिर आत्मा है— इससे तुम्हें बड़ा संतोष भी मिलता है। शरीर मरेगा, वह तुम्हें पता है; आत्मा नहीं मरेगी, इससे बडी हिम्मत बढ़ती है। और आला कभी नहीं मरेगी— अग्रि उसे जलायेगी नहीं, शख उसे छेदेंगे नहीं, मृत्यु उसका कुछ बिगाड़ न सकेगी, इससे तुम्हें बड़ी सांत्वना मिलती है। पर सांत्वना सत्य नहीं है। आत्मा को कोई न तो स्वीकार कर सकता है सिद्धांत की तरह, और न पुनरुक्ति की तरह कोई सम्मोहित हो सकता है; आत्मा को तो केवल वे ही लोग जान पाते हैं, जो लोग चैतन्य को बढाते हैं।

इस तरह जीयो कि तुम पर राख इकट्ठी न हो। इस तरह जीयो कि तुम्हारे भीतर का अंगारा जलता रहे, प्रकाशित हो। इस तरह जीयो कि प्रतिक्षण तुम होश में रहो, बेहोश नहीं।

चैतन्य आत्मा! — असंभव। इसलिए दुख से गुजरना होगा। उसको ही तपश्‍चर्या कहा है। जब कोई व्यक्ति जागना शुरू करता है, तो पहले उसे दुख में से ही गुजरना होगा। क्योंकि तुमने जन्मों—जन्मों तक दुख अपने चारों तरफ निर्मित किये हैं। कौन उनमें से गुजरेगा, तुम अगर न गुजरे तो? इसको हमने कर्म कहा है।

कर्म का कुल इतना ही अर्थ है कि हमने जन्मों—जन्मों तक चारों तरफ दुख निर्मित किये हैं। जाने—अनजाने हमने दुख की फसल बोयी है, काटेगा कौन? तो जब भी तुम होश में आते हो, तुम्हें फसल दिखायी पड़ती है— बड़ी लंबी। इस खेत से तुम्हें गुजरना पड़ेगा। डरके मारे तुम वहीं बैठ जाते हो। फिर आख बंद करके शराब पी लेते हो कि यह बहुत झंझट का काम है। लेकिन जितनी तुम शराब पीते हो, उतनी यह फसल बढ़ती जाती है। हर जन्म तुम्हारे कर्म की शृंखला में कुछ और जोड जाता है, घटाता नहीं। तुम और भी गर्त में उतर जाते हो। नरक और करीब आ जाता है। अगर तुम होश से भरोगे तो पहली तो घटना यह घटने ही वाली है कि तुम्हारे जीवन में चारों तरफ दुख दिखायी पड़ेगा, नरक। क्योंकि तुमने वह निर्मित किया है। और अगर तुमने हिम्मत रखी, साहस रखा, और तुम उस दुख से गुजर गये, तो जिस दुख से तुम सचेतन रूप से गुजर जाओगे, वह फसल कट गई। उन दुखों से तुम्हें न गुजरना पड़ेगा फिर से। और अगर एक बार तुम इस सारी दुख की शृंखला से गुजर जाओ— कर्म की शृंखला से— क्योंकि वे तुम्हारी आत्मा की चारों तरफ बंधी हुई जंजीरे है, अगर तुम उन सबसे गुजर जाओ, और होश न खोओ और हिम्मत जारी रखो कि कोई फिक्र नहीं है, जितना दुख मैंने पैदा किया है, मैं गुजरूंगा। मैं अंत तक जाऊंगा। मैं उस प्रथम घड़ी तक जाना चाहता हूं जब मै निर्दोष था, और दुख की यात्रा शुरू न हुई थी। जब मेरी आत्मा परम पवित्र थी, और मैंने कुछ भी संग्रह नहीं किया था दुख का। मैं उस समय तक प्रवेश करूंगा ही— चाहे कुछ भी परिणाम हो; कितना ही दुख, कितनी ही पीड़ा..! अगर तुमने इतना साहस रखा तो आज नहीं कल, दुख से पार होकर तुम उस जगह पहुंच जाओगे, जहां शिव का सूत्र तुम्हें समझ में आयेगा कि चैतन्य आत्मा है। और एक बार तुम अपने भीतर के चैतन्य में प्रतिष्ठित हो जाओ, फिर तुमसे कोई दुख पैदा नहीं होता; क्योंकि बेहोश आदमी ही अपने चारों तरफ दुख पैदा करता है।

शिव कह रहे हैं: चैतन्य आत्मा— चैतन्य को बढ़ाओ; धीरे—धीरे आत्मा की झलक तुम्हारे जीवन में आनी निश्चित है।

दूसरा सूत्र है:

ज्ञानम् बंध:।

ज्ञान बंध है।

बड़ी हैरानी का सूत्र है। ज्ञान के बहुत अर्थ है। एक तो, जब तक तुम इस ज्ञान से भरे हो कि मैं हूं तब तक तुम अज्ञान में रहोगे; क्योंकि ‘मैं’ अज्ञान है। अहंकार अज्ञान है। जिस दिन तुम आत्मा से भरोगे, उस दिन ‘हूं—पन’ तो रहेगा, ‘मैं—पन’ नहीं रहेगा।’मैं हूं, इसमें से ‘मै’ तो कट जायेगा, सिर्फ ‘हूं’ रहेगा।

इसे थोड़ा प्रयोग करके देखो। कभी किसी वृक्ष के नीचे शांत बैठकर खोजो कि तुम्हारे भीतर ‘मैं’ कहां है? तुम कहीं भी न पाओगे।’हूं, तो तुम सब जगह पाओगे।’मैं’ तुम कहीं भी न पाओगे। सब जगह तुम्हें अस्तित्व मिलेगा, लेकिन अस्तित्व के साथ अहंकार तुम्हें कहीं न मिलेगा। अहंकार तुम्हारी निर्मिति है। वह तुम्हारा बनाया हुआ है। वह झूठा है, वह असत्य है। उससे ज्यादा अप्रामाणिक और कुछ भी नहीं है। वह कामचलाऊ है। उसकी संसार में जरूरत है; लेकिन सत्य में उसका कहीं भी कोई स्थान नहीं है।

तो एक तो ‘मैं हूं, — यह ज्ञान बंध का कारण है। मेरा बोध, ‘हूं—पन’ का बोध नहीं, ‘हूं—पन’ का बोध तो शुद्ध है, उसमें कोई सीमा नहीं है। जब तुम कहते हो ‘हूं,, तो तुम्हारे ‘हूं में और वृक्ष के ‘हूं में कोई फर्क होगा? तुम्हारे ‘हूं, में और मेरे ‘हूं में कोई फर्क होगा? जब तुम सिर्फ ‘हो’, तो नदियां, पहाड़, वृक्ष, सभी एक हो गया। जैसे ही मैंने कहा ‘मैं’, वैसे ही मैं अलग हुआ। जैसे ही मैंने कहा ‘मैं’, वैसे ही तुम टूट गये, पर हो गये, अस्तित्व से मैं पृथक हो गया।

‘हूं—पन’ ब्रह्म है और ‘मैं’ मनुष्य की अज्ञान—दशा है। जब तुम जानते हो कि सिर्फ ‘हूं, तब तुम्हारे भीतर केंद्र नहीं होता। तब सारा अस्तित्व एक हो जाता है। तब तुम उस लहर की तरह हो, जो सागर में खो गई। अभी तुम उस लहर की तरह हो जो जम कर बर्फ हो गई है; सागर से टूट गई है।

‘ज्ञानं बंध:। पहला तो, ज्ञान बंध है— इस बात का ज्ञान कि मैं हूं। दूसरा, ज्ञान बंध है— वह सब ज्ञान जो तुम बाहर से इकट्ठा कर लिये हो, जो तुमने शास्त्रों से चुराया है, जो तुमने सदगुरुओं से उधार लिया है, जो तुम्हारी स्मृति है— वह सब बंधन है। उससे तुम्हें शक्ति न मिलेगी। इसलिए तुम पंडित से ज्यादा बंधा हुआ आदमी न पाओगे।

पंडित से ज्यादा कैंसरग्रस्त कोई भी नहीं है। उसका इलाज नहीं है। वह लाइलाज है। उसकी तकलीफ यह है कि वह जानता है। इसलिए, न वह सुन सकता है, न समझ सकता है। तुम उससे कुछ बोलो, इसके पहले कि तुम बोलो, उसने उसका अर्थ कर लिया है; इसके पहले कि वह तुम्हें सुने, उसने व्याख्या निकाल ली है। शब्दों से भरा हुआ चित्त, जानने में असमर्थ हो जाता है। वह इतना ज्यादा जानता है, बिना कुछ जाने; क्योंकि सब जाना हुआ उधार है।

शास्त्र से अगर ज्ञान मिलता होता, तो सभी के पास शास्त्र है, ज्ञान सभी को मिल गया होता। ज्ञान तो तब मिलता है, जब कोई निःशब्द हो जाता है; जब वह सभी शास्त्रों को विसर्जित कर देता है; जब वह उस सब ज्ञान को, जो दूसरों से मिला है, वापिस लौटा देता है जगत को; जब वह उसे खोजता है, जो मेरा मूल अस्तित्व है, जो मुझे दूसरों से नहीं मिला।

इसे थोड़ा समझें। तुम्हारा शरीर तुम्हें तुम्हारे मां और पिता से मिला है। तुम्हारे शरीर में तुम्हारा कुछ भी नहीं है। आधा तुम्हारी मां का दान है, आधा तुम्हारे पिता का दान है। फिर तुम्हारा शरीर तुम्हें भोजन से मिला है—वह जो रोज तुम भोजन कर रहे हो; पांच तत्वों से मिला है—वायु है, अग्रि है, पांचों तत्व हैं, उनसे मिला है। इसमें तुम्हारा कुछ भी नहीं है। लेकिन तुम्हारी चेतना, तुम्हें पांचों तत्वों में से किसी से भी नहीं मिली। तुम्हारी चेतना तुम्हें मां और पिता से भी नहीं मिली।

तुम जो—जो जानते हो वह तुमने स्कूल, विश्वविद्यालय से सीखा है, शास्त्रों से सुना है, गुरुओं से पाया है। वह तुम्हारे शरीर का हिस्सा है, तुम्हारी आत्मा का नहीं। तुम्हारी आत्मा तो वही है जो तुम्हें किसी से भी नहीं मिली है। जब तक तुम उस शुद्ध तत्व को न खोज लोगे, जो निपट तुम्हारा है, जो तुम्हें किसी से भी नहीं मिला है—न मां ने दिया, न पिता ने दिया, न समाज ने, न गुरु ने, न शास्त्र ने—वही तुम्हारा स्वभाव है।

ज्ञान बंध है—क्योंकि, वह तुम्हें इस स्वभाव तक न पहुंचने देगा। ज्ञान ने ही तुम्हें बांटा है। ज्ञान तुम्हें बांटता है; क्योंकि ज्ञान तुम्हारे चारों तरफ एक दीवार खींच देता है। और ज्ञान तुम्हें लड़ाता है, और ज्ञान तुम्हारे जीवन में वैमनस्य और शत्रुता पैदा करता है।

शिव कहते है ज्ञान बंध है—शान सीखा हुआ, ज्ञान उधार, ज्ञान दूसरे से लिया हुआ—बंधन का कारण है। तुम उस सबको छोड देना, जो दूसरे से मिला है। तुम उसकी तलाश करना, जो तुम्हें किसी से भी नहीं मिला। तुम उसकी खोज में निकलना, उस चेहरे की खोज में जो कि तुम्हारा है। तुम्हारे भीतर छिपा हुआ एक झरना है चैतन्य का, जो तुम्हें किसी से भी नहीं मिला। जो तुम्हारा स्वभाव है, जो तुम्हारी निज—संपदा है, निजत्व है—वही तुम्हारी आत्मा है।

तीसरा सूत्र है:

योनिवर्ग और कलाशरीरम।

योनि से अर्थ है: प्रकृति। इसलिए हम सी को प्रकृति कहते हैं। सी शरीर देती है; वह प्रकृति की प्रतीक है। और कला का अर्थ है: कर्त्ता का भाव। एक ही कला है—वह कला है, संसार में उतरने की कला और वह है—कर्त्ता का भाव। इन दो चीजों से मिलकर तुम्हारा शरीर निर्मित होता है—तुम्हारा कर्त्ता का भाव, तुम्हारा अहंकार, और प्रकृति से मिला हुआ शरीर। अगर तुम्हारे भीतर कर्ता का भाव है, तो तुम्हें योग्य—शरीर प्रकृति देती चली जायेगी। इसी तरह तुम बार—बार जन्मे हो। कभी तुम पशु थे, कभी पक्षी थे, कभी वृक्ष थे, कभी मनुष्य; तुमने जो चाहा है, वह तुम्हें मिला है, तुमने जो आकांक्षा की है, तुमने जो कर्तृत्व की वासना की है, वही घट गया है। तुम्हारे कर्तृत्व की वासना घटना बन जाती है। विचार वस्तुएं बन जाते हैं। इसलिए सोच—विचार से वासना करना; क्योंकि सभी वासनाएं पूरी हो जाती हैं—देर अबेर।

अगर तुम बहुत बार देखते हो आकाश में पक्षी को और सोचते हो कि कैसी स्वतंत्रता है पक्षी को! काश हम पक्षी होते! देर न लगेगी, जल्दी ही तुम पक्षी हो जाओगे। तुम अगर देखते हो एक कुत्ते को, संभोग करते हुए और तुम सोचते हो—कैसी स्वतंत्रता, कैसा सुख! जल्दी ही तुम कुत्ते हो जाओगे। तुम जो भी वासना अपने भीतर संगृहीत करते हो, वह बीज बन जाती है।

प्रकृति तो केवल शरीर देती है; कलाकार तो तुम्हीं हो, स्वयं को निर्माण करने वाले। अपने शरीर को तुमने ही बनाया है—यह कला का अर्थ है। कोई तुम्हें शरीर नहीं दे रहा है; तुम्हारी वासना ही निर्मित करती है।

तुम जो भी हो, वह तुम्हारा ही कृत्य है। किसी दूसरे को दोष मत देना। यहां कोई दूसरा है भी नहीं, जिसको दोष दिया जा सके। यह तुम्हारे ही कर्मों का संचित फल है। तुम जो भी हों—स्तर—कुरूप, दुखी—सुखी, स्री—पुरुष—तुम जो भी हो, यह तुम्हारे ही कृत्यों का फल है।

शिव कह रहे हैं: योनिवर्ग और कला शरीर है। प्रकृति तो सिर्फ योनि है। वह तो सिर्फ गर्भ है। तुम्हारा अहंकार उस योनि में बीज बनता है। तुम्हारे कर्तृत्व का भाव, कि मैं यह करूं, मैं यह पाऊं, मैं यह हो जाऊं—उसमें बीज बनता है। और जहां भी तुम्हारे कर्तृत्व का कला और प्रकृति की योनि का मिलन होता है, शरीर निर्मित हो जाता है।

उद्यमो भैरव:।

चौथा सूत्र है:

उद्यम ही भैरव है। उद्यम उस आध्यात्मिक प्रयास को कहते हैं, जिससे तुम इस कारागृह के बाहर होने की चेष्टा करते हो। वही भैरव है। भैरव शब्द पारिभाषिक है।’ भ’ का अर्थ है: ‘ भरण’,

‘र’ का अर्थ है रवण, ‘व’ का अर्थ है. वमन। भरण का अर्थ है भारण, रवण का अर्थ है संहार, और वमन का अर्थ है: फैलाना। भैरव का अर्थ है. ब्रह्म—जो धारण किये है, जो सम्हाले है, जिसमें हम पैदा होंगे, और जिसमें हम मिटेंगे; जो विस्तार है और जो ही संकोच बनेगा; जो सृष्टि का उद्भव है, और जिसमें प्रलय होगा। मूल अस्तित्व का नाम भैरव है।

शिव कहते हैं: उद्यम ही भैरव है। और जिस दिन भी तुमने आध्यात्मिक जीवन की चेष्टा शुरू की, तुम भैरव होने लगे; तुम परमात्‍मा के साथ एक होने लगे। तुम्हारी चेष्टा की पहली किरण और तुमने सूरज की तरफ यात्रा शुरू कर दी। पहला खयाल तुम्हारे भीतर मुक्त होने का, और ज्यादा दूर नहीं है मंजिल; क्योंकि पहला कदम करीब—करीब आधी यात्रा है।

उद्यम भैरव है। पाओगे, देर लगेगी। मंजिल पहुंचने में समय लगेगा। लेकिन तुमने चेष्टा शुरू की और तुम्हारे भीतर बीज आरोपित हो गया कि मैं उठूं इस कारागृह से बाहर; मैं जाऊं, शरीर से मुक्त होऊं; मैं हfऐऋ वासना से; मैं अब और बीज न बोऊं, इस संसार को बढाने के; मैं और जन्मों की आकांक्षा न करूं। तुम्हारे भीतर जैसे ही यह भाव सघन होना शुरू हुआ कि अब मैं मूर्च्छा को तोडू और चैतन्य बनूं वैसे ही तुम भैरव होने लगे; वैसे ही, तुम ब्रह्म के साथ एक होने लगे। क्योंकि वस्तुत: तो तुम एक हो ही, सिर्फ तुम्हें यह स्मरण आ जाए। मूलत: तो तुम एक हो ही। तुम उसी सागर के झरने हो, तुम उसी सूरज की किरण हो, तुम उसी महा आकाश के एक छोटे से खंड हो। पर तुम्हें यह स्मरण आना शुरू हो जाये और दीवालें विसर्जित होने लगें, तो तुम इस महा आकाश के साथ एक हो जाओगे।

उद्यम भैरव है। बड़ी सघन चेष्टा करना जरूरी है। क्योंकि नींद गहरी है; तोड़ोगे सतत, तो ही टूट पायेगी। आलस्प करोगे, संभव नहीं होगा। आज तोड़ोगे, कल फिर बना लोगे तो फिर भटकते रहोगे। एक हाथ से तोड़ोगे दृसरे से बनाते जाओगे, तो श्रम व्यर्थ होगा। उद्यम का अर्थ है—तुम्हारी पूरी चेष्टा संलग्र हो जाये।

इस जगत में अन्याय होता ही नहीं। इस जगत में जो भी होता है, न्याय है। क्योंकि यहां कोई आदमी नहीं बैठा है, न्याय—अन्याय करने को। जगत में तो नियम हैं, उन्हीं नियमों का नाम धर्म है। तुम अगर इरछे—तिरछे चले ग़िरोगे, टांग टूट जायेगी; तो तुम जाकर अदालत में यह नहीं कहोगे कि गुरुत्वाकर्षण के कानून पर एक मुकदमा चलाता हूं। तो अदालत कहेगी तुम तिरछे मत चलते। गुरुत्वाकर्षण न तुम्हें गिराने को उत्सुक है, न तुम्हें सम्हालने में उत्सुक है। तुम जब सीधे—सीधे चलते हो, वही तुम्हें संभालता है। जब तुम तिरछे चलते हो, वही तुम्हें गिराता है। न गिरने—गिराने की उसकी कोई आकांक्षा है, न सम्हालने की। तटस्थ है जगत का नियम। उस तटस्थ नियम का नाम धर्म है। उसको हिंदुओं ने ऋत कहा है। वह परम नियम है। वह तुम्हारी तरह पक्षपात नहीं करता कि किसी को गिरा दे, किसी को उठा दे। तुम जैसे ही ठीक चलने लगते हो, वह तुम्हें संभालता है। तुम गिरना चाहते हो वह तुम्हें गिराता है। वह हर हालत में उपलब्ध है। तुम जैसा भी उसका उपयोग करना चाहते हो, वह तुम्हें खुला है। उसके द्वार बंद नहीं है। तुम सिर ठोकना चाहते हो दरवाजे से, सिर ठोक लो। तुम दरवाजा खोलकर भीतर जाना चाहते हो, भीतर चले जाओ। वह तटस्थ है।

उद्यम भैरव है। महान श्रम चाहिए। उद्यम का अर्थ है: प्रगाढ़ श्रम। तुम्हारी समग्रता लग जाये श्रम में, उसका नाम उद्यम है। और, तब देर न लगेगी तुम्हारे भैरव हो जाने में।

शक्तिचक्र के संधान से विश्व का संहार हो जाता है—

पांचवा सूत्र है।

और अगर तुमने ठीक उद्यम किया, अगर तुमने अपनी संपूर्ण ऊर्जा को संलग्र कर दिया चेष्टा में—सत्य की खोज, परमात्मा की खोज या आत्मा की खोज में, तो तुम्हारे भीतर जो शक्ति का चक्र है, वह पूर्ण हो जाता है। अभी तुम्हारे भीतर शक्ति का चक्र पूर्ण नहीं है, कटा—बटा है।

पांचवा सूत्र है: शक्तिचक्र के संधान से विश्व का संहार हो जाता है। और जब भी तुम्हारी शक्ति का चक्र पूरा होता है—टोटल, समग्र; अंश—अंश नहीं, पूर्ण; उसी क्षण तुम्हारे लिए विश्व समाप्त हो गया। तुम्हारे लिए फिर कोई संसार नहीं। तुम परमात्मा हो गये। तुम भैरव हो गये। तुम मुक्त हो गये। फिर तुम्हारे लिए न कोई बंधन है, न कोई शरीर है, न कोई संसार है।

पूर्ण शक्ति का प्रयोग, स्मरण रखना। इस समाधि साधना शिविर में अगर तुमने पूरी शक्ति को लगाया—ऐसे ही ऊपर—ऊपर नहीं ध्यान किये, पूरी शक्ति लगा दी—तो तुम अनुभव करोगे कि जिस क्षण शक्ति पूरी लग जायेगी, उसी क्षण; फिर क्षणभर की देर नहीं लगती—अचानक संसार खो जाता है, परमात्मा सामने आ जाता है। तुम्हारी शक्‍ति का पूरा लग जाना ही तुम्हारे जीवन की क्रांति हो जाती है। फिर संसार की तरफ पीठ, परमात्मा की तरफ मुंह हो जाता है। उसकी तुम्हें एक झलक भी मिल जाए तो फिर तुम वही न हो सकोगे, जो तुम पहले थे। उसकी एक झलक काफी है। फिर तुम्हारा जीवन उसी यात्रा में संलग्र हो जायेगा।

तो ध्यान रखना, यहां पूरा अपने को डुबाना, तो ही कुछ हो सकेगा। अगर तुमने थोड़ा भी अपने को बचाया तो तुम्हारा श्रम व्यर्थ है। जब तक श्रम उद्यम न बन जाए—पूर्ण, टोटल एफर्ट न बन जाए—तब तक भैरव की उपलब्धि नहीं होगी।

~ओशो~
दिनांक 11 सितंबर, 1974; ओशो आश्रम, पूना।

तनाव, आतंक और अंधकार के बीच शिव का प्रकाश

15 फरवरी 2026 को जब समूचा भारत महाशिवरात्रि का पावन पर्व मनाएगा, तब यह केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं होगा, बल्कि आत्मजागरण का विराट अवसर होगा। महाशिवरात्रि वह रात्रि है जब साधक अपने भीतर के अंधकार को पहचानकर शिवत्व के प्रकाश से उसे आलोकित करने का संकल्प लेता है। शिव केवल देवता नहीं, वे चेतना के शाश्वत आयाम हैं-महाकाल, जो समय से परे हैं, नटराज, जो सृष्टि की लय और ताल के अधिपति हैं और नीलकंठ, जो विष को पीकर भी अमृत का संदेश देते हैं। आज का युग विज्ञान, तकनीक और उपभोग का युग है। मानव ने अंतरिक्ष को नापा, कृत्रिम बुद्धिमत्ता विकसित की, लेकिन अपने भीतर की शांति खो बैठा। तनाव, अवसाद, असंतोष, युद्ध, आतंकवाद और नैतिक विघटन की घटनाएँ विश्व को विचलित कर रही हैं। ऐसे दौर में शिव की प्रासंगिकता और बढ़ जाती है। शिव भक्ति कोई चमत्कारिक जादू नहीं, बल्कि जीवन को संतुलित करने का वैज्ञानिक और आध्यात्मिक मार्ग है।

शिव का स्वरूप द्वंद्वों से परे है। वे संहारक भी हैं और सृजनकर्ता भी। यह संदेश आज के समाज के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है जो जड़, जर्जर और अनैतिक है, उसका विनाश आवश्यक है ताकि नवजीवन अंकुरित हो सके। जब हम अपने भीतर के अहंकार, क्रोध, लोभ और मोह का संहार करते हैं, तभी सच्चा निर्माण संभव होता है। यही शिव का वास्तविक चमत्कार है भीतर के विष का रूपांतरण। समुद्र-मंथन की कथा केवल पौराणिक आख्यान नहीं, बल्कि मानवीय जीवन का प्रतीक है। जब संसार अमृत की खोज में लगा, तब सबसे पहले विष निकला। आज भी जब मानव प्रगति की दौड़ में है, तो साथ में प्रदूषण, हिंसा और असंतुलन का विष भी उत्पन्न हो रहा है। उस विष को कौन पियेगा? शिव का नीलकंठ रूप हमें सिखाता है कि समाज के संकट को दूर करने के लिए त्याग और सहनशीलता आवश्यक है। जब हम अपने स्तर पर कटुता को निगल लेते हैं और उसे बाहर नहीं फैलाते, तभी समाज में शांति बनी रहती है। इसी प्रकार गंगा के अवतरण की कथा बताती है कि अनियंत्रित शक्ति विनाशकारी हो सकती है। शिव ने उसे अपनी जटाओं में धारण कर संतुलित प्रवाह दिया। आज के संदर्भ में यह संदेश अत्यंत प्रासंगिक है। तकनीक, धन, सत्ता-ये सभी शक्तियाँ हैं। यदि वे अनियंत्रित हों तो विध्वंसक बनती हैं, और यदि शिव-संयम में हों तो कल्याणकारी। अतः शिव भक्ति का अर्थ है-शक्ति का संतुलन।

आधुनिक मनुष्य की सबसे बड़ी समस्या है-तनाव। प्रतिस्पर्धा, अपेक्षाएं और असुरक्षा ने उसे अशांत बना दिया है। शिवरात्रि की रात्रि जागरण की रात्रि है, लेकिन यह बाह्य जागरण से अधिक आंतरिक जागरण है। जब साधक “ऊँ नमः शिवाय” का जप करता है, तो वह अपने भीतर के कंपन को संतुलित करता है। यह पंचाक्षरी मंत्र मन, प्राण और चेतना को एकाग्र करता है। वैज्ञानिक शोध भी बताते हैं कि नियमित ध्यान और मंत्रजाप से तनाव कम होता है, रक्तचाप संतुलित होता है और मानसिक स्थिरता बढ़ती है। यह शिव साधना का प्रत्यक्ष प्रभाव है। शिव पुराण में वर्णित है कि फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी की निशीथ बेला में ज्योतिर्लिंग का प्रादुर्भाव हुआ। यह ज्योति केवल पत्थर की आकृति नहीं, बल्कि अनंत प्रकाश का प्रतीक है। शिवलिंग का अर्थ है-चिह्न, जो निराकार ब्रह्म का संकेत देता है। आधुनिक मनुष्य के लिए यह बोध आवश्यक है कि ईश्वर किसी सीमित रूप में बंधा नहीं है। वह ऊर्जा है, चेतना है, जो प्रत्येक कण में विद्यमान है।

आज विश्व युद्ध और आतंकवाद की विभीषिका से जूझ रहा है। हिंसा की ज्वाला में मानवता झुलस रही है। शिव का तांडव केवल विनाश नहीं, बल्कि संतुलन का नृत्य है। जब अन्याय बढ़ता है, तब परिवर्तन अनिवार्य होता है। किंतु शिव का संदेश यह भी है कि क्रोध नहीं, करुणा से परिवर्तन संभव है। वे रुद्र हैं-दुःखों का हरण करने वाले। शिव भक्ति का चमत्कार यह है कि वह मनुष्य के भीतर करुणा, सहिष्णुता और क्षमा का विकास करती है। जब व्यक्ति बदलता है, तब समाज बदलता है और जब समाज बदलता है, तब विश्व में शांति का मार्ग प्रशस्त होता है। शिव और शक्ति का मिलन भी आधुनिक जीवन के लिए महत्वपूर्ण प्रतीक है। यह पुरुष और प्रकृति, चेतना और ऊर्जा, विचार और क्रिया का समन्वय है। आज परिवारों में विघटन, संबंधों में दूरी और जीवन में असंतुलन इसलिए है क्योंकि यह समरसता टूट रही है। शिवरात्रि हमें स्मरण कराती है कि संतुलन ही जीवन का आधार है। व्रत और उपवास का आध्यात्मिक महत्व भी आज समझने योग्य है। उपवास केवल भोजन त्याग नहीं, बल्कि इंद्रियों का संयम है। यह आत्मशुद्धि की प्रक्रिया है। जब व्यक्ति एक दिन के लिए भी भोगों से दूर रहता है, तो उसे अपनी आवश्यकताओं का पुनर्मूल्यांकन करने का अवसर मिलता है। उपभोक्तावादी संस्कृति में यह अत्यंत आवश्यक साधना है।

शिव भक्ति का सिद्ध प्रभाव उन असंख्य भक्तों के अनुभवों में दिखाई देता है, जिन्होंने कठिन परिस्थितियों में भी आस्था नहीं छोड़ी। सच्चे मन से की गई प्रार्थना व्यक्ति को आंतरिक शक्ति देती है। यह शक्ति उसे संकटों से जूझने का साहस देती है। चमत्कार बाहर नहीं, भीतर घटित होता है-जब निराशा आशा में बदलती है, भय विश्वास में और अशांति शांति में। आज आवश्यकता है कि शिव को केवल मंदिरों तक सीमित न रखा जाए। वे काठ, पत्थर या मूर्ति में नहीं, बल्कि भाव में निवास करते हैं। जब हम सत्य बोलते हैं, करुणा का व्यवहार करते हैं, प्रकृति की रक्षा करते हैं, तब हम शिव की आराधना करते हैं। पर्यावरण संरक्षण भी शिव भक्ति है, क्योंकि वे कैलाशवासी योगी हैं, प्रकृति के संरक्षक हैं। जल, वायु, अग्नि और पृथ्वी के संतुलन की रक्षा करना ही शिव के प्रति सच्ची श्रद्धा है।

महाशिवरात्रि 2026 हमें यह संकल्प लेने का अवसर देती है कि हम अपने भीतर के विष को पहचानें और उसे शिवचेतना में रूपांतरित करें। हम अपने जीवन में संयम, संतुलन और साधना को स्थान दें। हम क्रोध के स्थान पर क्षमा, अहंकार के स्थान पर विनम्रता और अशांति के स्थान पर ध्यान को अपनाएं। शिवत्व की प्राप्ति कोई दूर की वस्तु नहीं। यह हमारे भीतर ही सुप्त है। आवश्यकता केवल जागरण की है। जब मनुष्य स्वयं को जीत लेता है, तभी वह सच्चे अर्थों में विजयी होता है। यही आत्मयुद्ध है, यही शिव की साधना है। इस महाशिवरात्रि पर हम सब मिलकर यह प्रार्थना करें-
“हे नीलकंठ! हमारे भीतर के विष को शांत करो।
हे महाकाल! हमें समय का सदुपयोग सिखाओ।
हे शंकर! हमारे जीवन में कल्याण का संचार करो।”

जब यह प्रार्थना सच्चे मन से होगी, तब निश्चित ही उसका प्रतिफल मिलेगा। क्योंकि शिव भाव के भूखे हैं। जहाँ निष्कपट श्रद्धा है, वहाँ शिव की कृपा अवश्य बरसती है। आधुनिक युग की जटिलताओं के बीच शिव भक्ति ही वह सेतु है, जो मनुष्य को स्वयं से, समाज को शांति से और विश्व को अमन से जोड़ सकती है। यही महाशिवरात्रि का सच्चा संदेश है-अंधकार से प्रकाश की ओर, अशांति से शांति की ओर, मृत्यु से अमृतत्व की ओर।

प्रेषकः

(ललित गर्ग)
ई-253, सरस्वती कुंज अपार्टमेंट
25 आई. पी. एक्सटेंशन, पटपड़गंज,
दिल्ली-110092, मो. 9811051133

प्राचीन भारतीय ज्ञान प्रणालियाँ और आज के दौर में उनका महत्व

“हम प्राचीन भारतीयों के बहुत ऋणी हैं, जिन्होंने हमें गिनती करना सिखाया। इसके बिना अधिकांश आधुनिक वैज्ञानिक खोजें असंभव होतीं।” ~ अल्बर्ट आइंस्टीन

भारतीय सभ्यता ने ज्ञान को अत्यंत महत्व दिया है – इसके विशाल बौद्धिक ग्रंथों का भंडार, विश्व का सबसे बड़ा पांडुलिपि संग्रह, और ज्ञान के अनेक क्षेत्रों में ग्रंथों, विचारकों और संप्रदायों की प्रमाणित परंपरा। श्रीमद् भगवद् गीता, 4:33, 37-38 में भगवान कृष्ण अर्जुन से कहते हैं कि ज्ञान ही आत्मा का महान शुद्धिकर्ता और मुक्तिदाता है। भारत की ज्ञान परंपरा गंगा नदी के प्रवाह के समान प्राचीन और निरंतर है; वेदों (उपनिषदों) से लेकर श्री अरबिंदो तक, ज्ञान ही सभी शोधों का केंद्र रहा है।

मुंडकोपनिषद में संगठित ज्ञान के संपूर्ण भंडार को दो भागों में विभाजित किया गया है – पारस विद्या और अपरा विद्या (मुंडकोपनिषद, 1.1.4), जिसमें परम सिद्धांत परमात्मा या ब्रह्म का ज्ञान, अर्थात् आध्यात्मिक क्षेत्र, और अक्षर-ब्रह्म को समझने से परे का ज्ञान, अर्थात् सांसारिक ज्ञान शामिल है । तदनुसार, प्रत्यक्ष जगत के तथ्यों के ज्ञान, ज्ञान और विज्ञान में भेद किया गया है। समय के साथ, विभिन्न क्षेत्रों के ज्ञान को विद्याओं और कलाओं के रूप में संस्थागत रूप दिया गया है । भारतीय अनुशासनिक संरचनाओं में दर्शन , वास्तुकला, व्याकरण, गणित, खगोल विज्ञान, छंदशास्त्र, समाजशास्त्र ( धर्मशास्त्र ), अर्थशास्त्र और राजनीति ( अर्थशास्त्र ), नीतिशास्त्र , भूगोल, तर्कशास्त्र, सैन्य विज्ञान, शस्त्र विज्ञान, कृषि, खनन, व्यापार और वाणिज्य, धातु विज्ञान, जहाज निर्माण, चिकित्सा, काव्यशास्त्र, जीव विज्ञान और पशु चिकित्सा विज्ञान जैसे विविध क्षेत्र शामिल हैं । इनमें से प्रत्येक में, व्यापक क्षति और ऐतिहासिक रूप से दर्ज विनाश के बावजूद, ग्रंथों की एक सतत और संचयी श्रृंखला उपलब्ध है।

परंपरा के अनुसार 18 प्रमुख विद्याएँ , या सैद्धांतिक विषय; और 64 कलाएँ , या व्यावहारिक विषय, शिल्प, मौजूद हैं। 18 विद्याएँ हैं: चार वेद, चार सहायक वेद ( आयुर्वेद – चिकित्सा, धनुर्वेद – शस्त्र विद्या, गंधर्ववेद – संगीत और शिल्प – वास्तुकला), पुराण, न्याय, मीमांसा, धर्मशास्त्र और वेदांग, छह सहायक विज्ञान, ध्वनिविज्ञान, व्याकरण, छंद, खगोल विज्ञान, अनुष्ठान और भाषाविज्ञान – ये प्राचीन भारत में 18 विज्ञानों का आधार थे। जहाँ तक व्यावहारिक विज्ञानों का संबंध है, इनकी संख्या 64 बताई जाती है। [i]

सबसे पहले भारतीय चिंतन के रचनावादी आयाम पर ध्यान देना आवश्यक है। अपने बौद्धिक इतिहास के एक कालखंड में, लगभग 1000 ईसा पूर्व से 600 ईस्वी तक, भारतीय मानस-नज़र ज़मीनी और बौद्धिक दोनों क्षेत्रों में साम्राज्य निर्माण में गहराई से लीन था। इस कालखंड के दौरान भारत में देखने को मिली व्यापक और सुगठित विचार प्रणालियाँ शायद ही किसी संस्कृति में पाई जाती हों। इससे विचारों का एक विशाल भंडार उत्पन्न हुआ, जिसने भारतीय मानस पर गहरी छाप छोड़ी और उसे स्वाभाविक रूप से चिंतनशील और वैचारिक बना दिया।

प्राचीन भारतीय राजनीतिज्ञ कौटिल्य, भीष्म या विदुर ने राजनीतिक विचारधाराओं के बजाय व्यावहारिक राजनीति का मार्ग अपनाया। यद्यपि, कुछ निश्चित सिद्धांत और मत थे जिन पर शास्त्रीय भारतीय शासन प्रणाली की नींव टिकी थी। इन सिद्धांतों, मतों और अनुभव-आधारित विधियों की चर्चा के लिए समर्पित भारतीय ज्ञान प्रणालियों की विशिष्ट विद्या या शाखा को दंडनीति कहा जाता था , जबकि अन्य तीन विद्याएँ आन्वीक्षिकी , त्रयी और वार्ता थीं । कौटिल्य के अर्थशास्त्र 1.2.1 (कांगले 1960) में इस चार-भाग वाले विभाजन का उल्लेख है। प्रत्येक विद्या में एक या एक से अधिक गुरुओं की परंपराएँ हैं जिन्होंने अनेक विचारधाराओं का सृजन किया है, इस प्रकार भारतीय ज्ञान प्रणालियों का संरक्षण, विस्तार और प्रसार किया है। दंडनीति के लिए , परंपरागत रूप से पूजे जाने वाले गुरु या आचार्य बृहस्पति, शुक्र, उशनस, भीष्म, कौटिल्य, कामंदक आदि हैं।

इन गुरुओं में, व्यास के महाभारत के शांति पर्व और अनुशासन पर्व में भीष्म की शिक्षाएँ, सत्ता, शासन, राजनीति और प्रशासन को आत्मसात करने और अभ्यास करने के इस अनूठे प्रतिमान पर एक व्यापक व्याख्या के रूप में उल्लेखनीय हैं। दंडनीति के विवेचन की व्यापकता में , इसकी तुलना केवल अर्थशास्त्र से ही की जा सकती है। [ii]

अब यह स्वीकार किया जाता है कि पश्चिमी मानदंड एकमात्र ऐसा मापदंड नहीं है जिसके आधार पर अन्य ज्ञान प्रणालियों का मूल्यांकन किया जाना चाहिए। जबकि ‘पारंपरिक’ शब्द अक्सर ‘आदिम’ या ‘अप्रचलित’ का संकेत देता है, कई पारंपरिक विज्ञान और प्रौद्योगिकी वर्तमान मानकों के अनुसार भी काफी उन्नत थे [iii] और अपने ‘आधुनिक’ विकल्पों की तुलना में विशिष्ट स्थानीय परिस्थितियों और आवश्यकताओं के लिए बेहतर अनुकूल थे।

संयुक्त राष्ट्र ‘पारंपरिक ज्ञान प्रणालियों’ को इस प्रकार परिभाषित करता है:

“पारंपरिक ज्ञान या स्थानीय ज्ञान, अक्सर प्रतिकूल वातावरण में जीवन और अस्तित्व की जटिलताओं को समझने में मानवीय उपलब्धि का एक रिकॉर्ड है। पारंपरिक ज्ञान, जो तकनीकी, सामाजिक, संगठनात्मक या सांस्कृतिक हो सकता है, अस्तित्व और विकास के महान मानवीय प्रयोग के हिस्से के रूप में प्राप्त किया गया था।” [iv]

लौरा नाडर पारंपरिक ज्ञान प्रणालियों (टीकेएस) के अध्ययन के उद्देश्य का वर्णन करते हुए कहती हैं: “इसका उद्देश्य लोगों के दिमाग को देखने और सवाल करने के अन्य तरीकों के लिए खोलना, ज्ञान के प्रति दृष्टिकोण को बदलना, विज्ञान के संगठन को फिर से परिभाषित करना और परंपराओं के बारे में वैश्विक स्तर पर सोचने का एक तरीका तैयार करना है।”

आधुनिक विज्ञान की उत्पत्ति संभवतः न्यूटन के समय से हुई है। लेकिन पारंपरिक ज्ञान प्रणालियाँ (टीकेएस) 20 लाख वर्ष से भी अधिक पुरानी हैं, जब होमो हैबिलिस ने अपने औजार बनाना और प्रकृति के साथ अंतर्संबंध स्थापित करना शुरू किया था । इतिहास के आरंभ से ही, विभिन्न जातियों ने विज्ञान और प्रौद्योगिकी की विभिन्न शाखाओं में योगदान दिया है, अक्सर दूरियों से अलग हुई संस्कृतियों के बीच पारस्परिक संपर्कों के माध्यम से। यह पारस्परिक प्रभाव अब और भी स्पष्ट होता जा रहा है क्योंकि शोधकर्ताओं द्वारा विशाल दूरियों में वैश्विक व्यापार और सांस्कृतिक प्रवासन की व्यापकता को पहचाना जा रहा है।

दंडनीति और राजधर्म के क्षेत्र में ही नहीं , भारतीय सभ्यता में विज्ञान और प्रौद्योगिकी की भी एक मजबूत परंपरा रही है। प्राचीन भारत ऋषियों और द्रष्टाओं की भूमि होने के साथ-साथ विद्वानों और वैज्ञानिकों की भी भूमि थी। [vi] शोध से पता चलता है कि विश्व का सर्वश्रेष्ठ इस्पात बनाने से लेकर दुनिया को गिनती सिखाने तक, भारत ने आधुनिक प्रयोगशालाओं की स्थापना से सदियों पहले विज्ञान और प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में सक्रिय योगदान दिया। प्राचीन भारतीयों द्वारा खोजे गए कई सिद्धांतों और तकनीकों ने आधुनिक विज्ञान और प्रौद्योगिकी की नींव को मजबूत किया है। हालांकि, भारतीय उपमहाद्वीप के विशाल और महत्वपूर्ण योगदानों को नजरअंदाज किया गया है। ब्रिटिश उपनिवेशवादी इस तथ्य को कभी स्वीकार नहीं कर सके कि भारतीय तीसरी सहस्राब्दी ईसा पूर्व में भी अत्यधिक सभ्य थे, जब ब्रिटिश अभी भी बर्बर अवस्था में थे। इस तरह की स्वीकृति यूरोप के उस सभ्यता मिशन को नष्ट कर देती, जिसने उपनिवेशवाद के लिए बौद्धिक औचित्य प्रदान किया था।

ब्रिटिश भारतविदों ने पारंपरिक ज्ञान और प्रौद्योगिकी (टीकेएस) का अध्ययन नहीं किया, सिवाय इसके कि चुपचाप उन्हें अपनी प्रणालियों के साथ प्रतिस्पर्धा करने वाली प्रणालियों के रूप में प्रलेखित किया जाए और ब्रिटेन की औद्योगिक क्रांति में प्रौद्योगिकी के हस्तांतरण को सुगम बनाया जाए। [vii] जो भी मूल्यवान पाया गया, उसे तुरंत हथिया लिया गया, और इसके भारतीय निर्माताओं को व्यवसाय से बाहर कर दिया गया, और कई मामलों में इसे उन्हें सभ्य बनाने के रूप में उचित ठहराया गया। इस बीच, भारत का एक नया इतिहास गढ़ा गया ताकि मानसिक रूप से उपनिवेशित लोगों की वर्तमान और भावी पीढ़ियाँ अपने प्राचीन ज्ञान की हीनता और पश्चिमी ‘आधुनिक’ ज्ञान की श्रेष्ठता में विश्वास करें। इसे ‘मैकालेवाद’ कहा गया है, जिसका नाम लॉर्ड मैकाले के नाम पर रखा गया है, जिन्होंने 1830 के दशक से इस औपनिवेशिक रणनीति का सफलतापूर्वक समर्थन किया। 3

अर्थशास्त्र

कौटिल्य (जिन्हें चाणक्य या विष्णुगुप्त के नाम से भी जाना जाता है) चंद्रगुप्त मौर्य (317-293 ईसा पूर्व) के प्रधान मंत्री और उनके शासन के सूत्रधार थे। उनकी रणनीति ने मौर्य साम्राज्य के सुदृढ़ीकरण में योगदान दिया और भारत के स्वर्ण युग का शुभारंभ किया। इससे सिकंदर के उत्तराधिकारियों के खतरे का भी अंत हुआ। उनकी रणनीति ने पूरे भारतीय उपमहाद्वीप को एकजुट करने में मदद की और भारतीय राष्ट्र की अवधारणा की नींव रखी। मौर्य साम्राज्य न केवल उपमहाद्वीप में फैला, बल्कि पश्चिम में फारस की सीमा तक और पूर्व में म्यांमार (पूर्ववर्ती बर्मा) तक विस्तृत था। कौटिल्य द्वारा प्रतिपादित रणनीति अर्थशास्त्र ग्रंथ था, जो राज्य पर शासन करने और शत्रुओं को परास्त करने की कला का एक व्यापक संग्रह है। श्लोक 1.1.19 में कहा गया है कि “यह ग्रंथ, जो सीखने और समझने में आसान, सिद्धांत, अर्थ और शब्द-विन्यास में सटीक है, कौटिल्य द्वारा रचा गया है”, जिससे इस ग्रंथ के लेखकत्व को लेकर संदेह दूर हो जाते हैं। इसके अलावा, कौटिल्य ने शुरुआत में ही कहा है कि अर्थशास्त्र पहले के शिक्षकों द्वारा लिखे गए समान ग्रंथों का एक संग्रह है। कामन्दक की नीतिसार, दण्डिन की दशकुमारचरित, विशाखदत्त की मुद्राराक्षस, और बाणभट्ट की कादम्बरी जैसी बाद की कृतियाँ पारंपरिक अर्थशास्त्र के कालनिर्धारण और लेखकत्व को विश्वसनीयता प्रदान करती हैं। [viii]

अर्थशास्त्र प्राचीन भारत में 12 वीं शताब्दी ईस्वी तक बहुत प्रभावशाली रहा, जिसके बाद इसका प्रभाव धीरे-धीरे कम हो गया। हालांकि, इस ग्रंथ को 1904 में डॉ. आर. श्यामा शास्त्री द्वारा पुनः खोजा गया और 1915 में अंग्रेजी में प्रकाशित किया गया।

डॉ. आर.पी. कांगले (कांगले 1960) ने अपने अध्ययन, “कौटिल्य अर्थशास्त्र” में आधुनिक युग में कौटिल्य की प्रासंगिकता पर प्रकाश डालते हुए कहा है, “आज भी एक राष्ट्र का दूसरे राष्ट्र के प्रति वही अविश्वास है, प्रत्येक राष्ट्र केवल व्यावहारिकता के आधार पर अपने हितों की रक्षा करता है, और स्वार्थवश गठबंधन बनाने के लिए उनकी अवहेलना करता है।” यह समझना कठिन है कि राष्ट्रों के बीच प्रतिद्वंद्विता और वर्चस्व के संघर्ष को कैसे टाला जा सकता है या इन मूलभूत तथ्यों पर आधारित अर्थशास्त्र की शिक्षाएँ कभी अप्रासंगिक कैसे हो सकती हैं। ऐतिहासिक रूप से, न तो राष्ट्र संघ के गठन और न ही बाद में संयुक्त राष्ट्र संगठन ने विश्व को उस रूप में बदला है जैसा कि कल्पना की गई थी। इसलिए, अर्थशास्त्र और इसके मूलभूत सिद्धांत निकट भविष्य में भी प्रासंगिक बने रहेंगे। [ix]

अर्थशास्त्र एक विशाल ग्रंथ है जिसमें 15 ग्रंथ हैं, जो 150 अध्यायों, 180 खंडों और 6000 श्लोकों में विभाजित हैं। संस्कृत में ‘ अर्थ’ का अर्थ धन है, लेकिन कौटिल्य के अनुसार इसका अर्थ कहीं अधिक व्यापक है। किसी राष्ट्र के धन के दो प्रमुख स्तंभ हैं – उसका क्षेत्र और उसकी प्रजा। यह ग्रंथ मूलतः शासन कला पर आधारित है और इसमें किसी समाज के आंतरिक कामकाज और एक राष्ट्र-राज्य के बाह्य संबंधों के लिए आवश्यक सभी पहलुओं को शामिल किया गया है। इस प्रकार, व्यापक स्तर पर, इसमें राज्य-प्रबंधन, युद्ध और कूटनीति जैसे विषयों को शामिल किया गया है। दूसरी ओर, राज्य के सूक्ष्म प्रबंधन का भी विस्तार से वर्णन किया गया है, जैसे राजस्व स्रोत और कराधान, वस्तुओं की कीमतें और उन पर कर, वजन और माप का मानकीकरण, सेना का संगठन, किलों और रक्षा प्रणालियों का विवरण। रोचक बात यह है कि द्वितीय खंड में नौसेना का विशेष उल्लेख मिलता है, क्योंकि इसमें ‘जहाजों के अधीक्षक’ का जिक्र है। कौटिल्य ने संभवतः समुद्री सेना और नौसेना के महत्व को पहले ही भांप लिया था।

कौटिल्य का ग्रंथ अनेक मायनों में वर्तमान विश्व की जटिलता को प्रतिबिंबित करता है। उनके समय की समस्याएं आज भी मौजूद हैं, हालांकि अधिक व्यापक रूप में। हेनरिक ज़िमर ने इसका सटीक वर्णन करते हुए कहा है, “उस प्रतिभा के प्रति गहरा सम्मान प्रकट होता है जिसने प्रारंभिक काल में ही उन मूलभूत शक्तियों और परिस्थितियों को पहचाना और स्पष्ट किया जो मानव राजनीतिक क्षेत्र में शाश्वत बनी रहने वाली थीं। भारतीय चिंतन की उसी शैली ने, जिसने शतरंज के खेल का आविष्कार किया, सत्ता के इस व्यापक खेल के नियमों को गहन अंतर्दृष्टि से समझा। और ये ऐसे नियम हैं जिन्हें राजनीतिक क्षेत्र में गंभीरता से प्रवेश करने की तैयारी करने वाला कोई भी व्यक्ति अनदेखा नहीं कर सकता, चाहे वह कठोर व्यक्तिवाद के उद्देश्यों से प्रेरित हो या विश्व को अपने हाथों में लेने के लिए।” [x] कौटिल्य केवल एक रणनीतिकार ही नहीं थे, बल्कि एक गुरु, एक शोधकर्ता और एक प्रेरक विचारक भी थे। वे नेतृत्व और सुशासन के क्षेत्र में विश्व के अग्रणी विशेषज्ञों में से एक हैं।

सैन्य रणनीति के संदर्भ में, कौटिल्य द्वारा प्रतिपादित सिद्धांत आज भी उतने ही प्रासंगिक हैं जितने कि लेखन के समय थे। उन्होंने राज्य-प्रबंधन और सैन्य रणनीति को अविभाज्य माना और कहा कि युद्ध इसका अभिन्न अंग है। सैन्य रणनीति पर विस्तार से चर्चा की गई है, जिसमें छल, प्रशिक्षण, योजना और वास्तविक युद्ध संचालन जैसे विभिन्न पहलुओं को शामिल किया गया है। राजा को सलाह दी जाती है कि वह अभियान शुरू करने से पहले आठ महत्वपूर्ण कारकों पर विचार करके राज्य के हितों का आकलन करे, जिससे यह सुनिश्चित हो सके कि लाभ हानि से अधिक हों। मात्रात्मक मापदंडों के अतिरिक्त, ये कारक पीछे से विद्रोह और बगावत की संभावना और अभियान के दौरान विश्वासघात जैसे खतरों के प्रति आगाह करते हैं। आंतरिक सुरक्षा को विशेष महत्व दिया गया और कौटिल्य ने इस बात पर जोर दिया कि राष्ट्रीय सुरक्षा के खतरों को हर कीमत पर समाप्त किया जाना चाहिए। उन्होंने तर्क दिया कि राज्य की आर्थिक समृद्धि के लिए आंतरिक स्थिरता आवश्यक है।

आंतरिक और बाह्य सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए कौटिल्य राज्य के भीतर और शत्रु राज्यों में सक्रिय जासूसों का एक जाल चाहते थे। वे षड्यंत्र, गुप्त अभियानों और कूटनीतिक आक्रमणों को राज्य नीति के साधन के रूप में उपयोग करने के आरंभिक समर्थकों में से थे। जासूसी और प्रति-जासूसी गतिविधियों के विस्तृत विवरण इस कृति को अन्य सभी राजनीतिक ग्रंथों से विशिष्ट बनाते हैं। ये सभी विचार आज भी प्रासंगिक हैं और व्यवहार में लाए जाते हैं।

अर्थशास्त्र में राजा के प्रमुख दायित्वों का वर्णन किया गया है – राज्य को बाह्य आक्रमणों से बचाना और विजय द्वारा उसके क्षेत्र का विस्तार करना। इन उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए उन्होंने चार प्रकार के युद्धों का उल्लेख किया है:

मंत्रयुद्ध या कूटनीति के प्रयोग द्वारा परामर्श से युद्ध। इस विकल्प का प्रयोग तब किया जाता था जब राजा अपने प्रतिद्वंद्वी की तुलना में कमजोर स्थिति में होता था।

प्रकाशयुद्ध या पारंपरिक युद्ध। इसका प्रयोग तब किया जाता था जब राजा लाभप्रद स्थिति में होता था।

कुतयुद्ध या गुप्त युद्ध, जिसे गुरिल्ला युद्ध के नाम से भी जाना जाता है। इस युद्ध में मनोवैज्ञानिक युद्ध और शत्रु खेमे में एजेंटों को सक्रिय करना शामिल है।

गुप्त युद्ध या गुदायुद्ध। जैसा कि नाम से ही स्पष्ट है, इसका उद्देश्य गुप्त साधनों से प्राप्त किया जाता है। राज्य सार्वजनिक रूप से आक्रामकता के कोई संकेत नहीं दिखाता, बल्कि गुप्त साधनों से शत्रु की सीमाओं के भीतर दुष्प्रचार और गलत सूचना फैलाता है। रोजर बोएशे ने अर्थशास्त्र पर अपनी पुस्तक में कहा है कि “मौन युद्ध एक प्रकार की लड़ाई है जिसके बारे में मेरी जानकारी में किसी अन्य विचारक ने चर्चा नहीं की है”।

सफल सैन्य रणनीति सुनिश्चित करने के लिए कौटिल्य ने सेना के संगठन और प्रबंधन का विस्तारपूर्वक वर्णन किया है। सेना की सफलता के लिए आवश्यक नेतृत्व गुणों पर उन्होंने विशेष बल दिया है। रोचक बात यह है कि उन्होंने सेना को नागरिक सर्वोच्चता के अधीन कार्य करने का आह्वान किया और इसके घटकों के बीच सुचारू समन्वय के माध्यम से संगठन को कुशलतापूर्वक संचालित करने का निर्देश दिया। कौटिल्य ने सेना के सामने आने वाली 34 प्रकार की चुनौतियों का भी विस्तृत वर्णन किया है। ये चुनौतियाँ और उनके द्वारा प्रस्तावित मूल संगठन, आधुनिक चुनौतियों और प्रौद्योगिकी को ध्यान में रखते हुए किए गए संशोधनों के साथ, आज भी काफी हद तक प्रासंगिक हैं।

कौटिल्य यथार्थवादी विचारधारा के समर्थक थे, जो सैन्य साधनों के बजाय राजनीतिक साधनों के माध्यम से शक्ति को अधिकतम करने की सलाह देती थी। वे वास्तविक राजनीति में विश्वास करते थे और मानते थे कि लक्ष्य प्राप्ति के लिए कोई भी साधन उचित है, जिसमें छल, कपट, चालाकी और कपट का प्रयोग शामिल है। वे युद्ध को प्राकृतिक शत्रु की अवधारणा से उचित ठहराते हैं, जिसके अनुसार यदि शत्रु को समाप्त नहीं किया गया, तो शत्रु किसी न किसी समय राज्य/राजा को समाप्त कर देगा।

आधुनिक युद्ध केवल वास्तविक संघर्ष तक ही सीमित नहीं है। बल्कि, इसमें सैन्य, राजनीतिक, आर्थिक और कूटनीतिक पहलू शामिल हैं। युद्ध या संघर्ष की दो विशिष्ट विशेषताएं हैं। एक प्रगति और परिवर्तन को दर्शाती है, जबकि दूसरी स्थिरता और स्थायित्व को। एक ओर, प्रगति और परिवर्तन की गतिशीलता काफी हद तक सेनापति की कल्पनाशीलता, नवीनता, प्रौद्योगिकी और जटिलता की समझ पर निर्भर करती है। वहीं दूसरी ओर, अर्थशास्त्र युद्ध की स्थिर और अपरिवर्तनीय प्रकृति का प्रमाण है। सैन्य इतिहास के अध्ययन से पता चलता है कि कुछ विशेषताएं लगातार दोहराई जाती हैं; कार्रवाई के प्रकार और सफलता के बीच कुछ संबंध अक्सर समान परिणाम देते हैं; कुछ परिस्थितियां बार-बार निर्णायक साबित हुई हैं। अतीत भविष्य की प्रस्तावना है, यह कथन अर्थशास्त्र या अन्य प्राचीन ग्रंथों द्वारा प्रचारित सैन्य इतिहास के अध्ययनों की प्रासंगिकता और महत्व को रेखांकित करता है। [xi]

सैन्य रणनीति में राज्य-प्रबंधन, कूटनीति और युद्ध शामिल हैं। युद्ध की दो विशेषताएं होती हैं – एक जो समय के साथ स्थिर रहती है, जबकि दूसरी प्रगति और प्रौद्योगिकी के साथ बदलती और विकसित होती रहती है। यह परिवर्तनशील पहलू किसी भी समय नेतृत्व की गुणवत्ता पर भी निर्भर करता है। युद्ध की स्थिर विशेषताओं का अध्ययन सैन्य इतिहास के माध्यम से किया जाता है, जो भविष्य के युद्धों/स्थितियों के लिए सबक प्रदान करता है। इससे वर्तमान संदर्भ में अर्थशास्त्र जैसे प्राचीन ग्रंथों की प्रासंगिकता स्पष्ट होती है।

सशस्त्र बलों में प्राचीन ग्रंथों को शामिल करने की स्थिति

इस संदर्भ में भारतीय सेना अग्रणी रही है और आधुनिक युद्धकला में प्राचीन ग्रंथों की प्रासंगिकता का अध्ययन कर रही है। महू स्थित सेना युद्ध महाविद्यालय ने 2016 में “प्राचीन भारत की सामरिक सैन्य संस्कृति की व्याख्या” शीर्षक से एक शोधपत्र प्रकाशित किया, जिसमें विभिन्न ग्रंथों से उदाहरण लेकर प्राचीन और वर्तमान काल में राज्यकला और युद्धकला के पहलुओं को सहसंबंधित किया गया। अध्ययन में कहा गया है कि “अर्थशास्त्र, महाभारत और अन्य साहित्य में पाए जाने वाले स्वदेशी सामरिक विचार और युद्धकला न केवल भारतीय मानस का अभिन्न अंग हैं, बल्कि आज के संदर्भ में भी प्रासंगिक हैं।”7 शोधपत्र में अध्ययन के लिए अन्य ग्रंथों का भी उल्लेख किया गया है, जैसे धनुर्वेद – जिसमें सैन्य रणनीति, युद्धनीति, संगठन, रक्षा कर्मियों का प्रशिक्षण, सैन्य संरचना, युद्ध विभाजन, उपकरण, हथियार आदि के बारे में चर्चा की गई है। शोधपत्र में भारत में सैन्य रणनीति के विकास का भी अध्ययन किया गया और कौटिल्य की सूचना युद्ध रणनीति, भारतीय युद्धकला और विदेश नीति पर जोर दिया गया।

लेख में उल्लिखित एक अन्य ग्रंथ मनुस्मृति था, जिसके अध्याय 7 में राज्य-प्रशासन, सेना का संगठन और कार्य, किलों का वर्णन और ऋषि शुक्राचार्य द्वारा रचित शुक्रनीति में आग्नेयास्त्रों का वर्णन है; और अग्नि पुराण, ब्रह्म पुराण और ब्रह्मांड पुराण जैसे पुराण, जो कूटनीति और युद्ध से संबंधित हैं। [xii]

भारतीय सेना के “भारतीयकरण” की दिशा में प्रयास किए जा रहे हैं और मार्च 2021 में गुजरात के केवडिया में आयोजित संयुक्त कमांडरों के सम्मेलन में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सशस्त्र बलों के सिद्धांतों और रीति-रिवाजों सहित राष्ट्रीय सुरक्षा तंत्र में अधिक स्वदेशीकरण पर जोर दिया था। [xiii]

परिणामस्वरूप, एकीकृत रक्षा स्टाफ मुख्यालय ने हैदराबाद के कॉलेज ऑफ डिफेंस मैनेजमेंट (सीडीएम) में “प्राचीन भारतीय संस्कृति और युद्ध तकनीकों के गुण और वर्तमान रणनीतिक चिंतन और प्रशिक्षण में इसका समावेश” विषय पर एक अध्ययन प्रायोजित किया। इस अध्ययन में प्राचीन भारतीय ग्रंथों अर्थशास्त्र, भगवद गीता और तिरुक्कुरल पर ध्यान केंद्रित किया गया और कौटिल्य के अर्थशास्त्र को सशस्त्र बलों के लिए “ज्ञान का भंडार” बताया गया। अध्ययन में यह बात सामने आई कि नेतृत्व, युद्ध और रणनीतिक चिंतन के संदर्भ में ये ग्रंथ वर्तमान समय में भी प्रासंगिक हैं। 2021 में प्रकाशित इस अध्ययन में कौटिल्य के अर्थशास्त्र और भगवद गीता जैसे प्राचीन भारतीय ग्रंथों की प्रासंगिक शिक्षाओं को वर्तमान सैन्य प्रशिक्षण पाठ्यक्रम में शामिल करने की सिफारिश की गई है। अध्ययन में आगे के शोध के लिए पाकिस्तान और चीन में मौजूद मंचों की तर्ज पर एक ‘भारतीय संस्कृति अध्ययन मंच’ स्थापित करने का भी सुझाव दिया गया है।

इस अध्ययन में मनुस्मृति, नीतिसार और महाभारत जैसे प्राचीन ग्रंथों के गहन अध्ययन की सिफारिश की गई है, साथ ही सशस्त्र बलों के लिए प्राचीन भारतीय संस्कृति और ग्रंथों से प्राप्त शिक्षाओं पर आवधिक कार्यशालाओं और वार्षिक सेमिनारों के आयोजन का भी सुझाव दिया गया है। इसमें सीडीएम को भारतीय सांस्कृतिक अध्ययन में उत्कृष्टता केंद्र बनाने और इस ज्ञान को सैन्य संस्थानों के औपचारिक प्रशिक्षण पाठ्यक्रम में शामिल करने का प्रस्ताव भी रखा गया है।

हाल ही में, सेना प्रमुख (सीओएएस) जनरल एमएम नरवणे ने 27 जनवरी 2022 को कॉलेज ऑफ डिफेंस मैनेजमेंट (सीडीएम) में राष्ट्रीय सुरक्षा पर आयोजित वार्षिक संगोष्ठी में मुख्य भाषण देते हुए, उपलब्ध प्राचीन ज्ञान के विशाल भंडार के उपयोग पर जोर दिया, जिससे वर्तमान रणनीतिक सोच को बढ़ावा मिल सकता है। उन्होंने समकालीन परिस्थितियों और युद्धक्षेत्र की संरचना की समझ के साथ इस ज्ञान के अनुप्रयोग पर बल दिया। इससे वर्तमान चुनौतियों के समाधान के लिए अधिक प्रभावी उपाय तैयार करने में सहायता मिलेगी। उन्होंने आगे कहा कि भारत को वर्तमान भू-रणनीतिक परिवेश में वास्तविक राजनीति के माध्यम से अपनी सुरक्षा चिंताओं को दूर करने का प्रयास करना चाहिए। इस संदर्भ में, हजारों वर्ष पूर्व प्रतिपादित राज्य-प्रशासन और सैन्य रणनीति पर प्राचीन भारतीय ज्ञान आज भी प्रासंगिक है। जनरल ने स्वदेशीकरण और आत्मनिर्भरता की आवश्यकता पर बल दिया और कहा कि यह हमारे चिंतन में उतना ही प्रासंगिक है जितना कि हथियारों और उपकरणों के लिए। इसलिए, आवश्यकता यह है कि हम अपने प्राचीन ग्रंथों पर आधारित, वर्तमान अवधारणाओं द्वारा संशोधित, भारतीय दृष्टिकोण विकसित करें ताकि हम अपनी चुनौतियों का सामना कर सकें। उन्होंने आगे उल्लेख किया कि सशस्त्र बलों ने समकालीन सुरक्षा चुनौतियों का सामना करने के लिए इन ग्रंथों की प्रासंगिकता की जांच करने हेतु एक अन्वेषणात्मक परियोजना शुरू की थी। [xiv]

निष्कर्ष
वैश्विक ज्ञान भंडार में चीन के योगदान को व्यापक रूप से स्वीकार किया जाता है। अरब विद्वानों ने यह सुनिश्चित किया है कि यूरोप को विचारों और आविष्कारों के प्रसार में इस्लामी देशों द्वारा निभाई गई महत्वपूर्ण भूमिका सर्वविदित है। हालांकि, बाद वाले मामले में, प्राचीन भारत में की गई कई खोजों को अक्सर अरब मूल का बताया जाता है, जबकि अरबों ने यूरोप को केवल वही ज्ञान दिया जो उन्होंने भारत में सीखा था। स्वतंत्रता के बाद भी, तथ्यों का ऐसा विकृतिकरण जारी है, जो प्राचीन भारतीय ज्ञान के प्रति सम्मान को नकारात्मक रूप से प्रभावित करता है। काफी हद तक, भारत का बौद्धिक अभिजात वर्ग औपनिवेशिक काल से पहले के भारत को सामंती, अंधविश्वासी, तर्कहीन और वैज्ञानिक सोच से रहित के रूप में बढ़ावा देता रहता है। इस धारणा ने समकालीन समाज में हमारी स्वदेशी ज्ञान प्रणालियों के प्रति एक गहरी जड़ें जमा चुकी पूर्वाग्रह को जन्म दिया है। इस प्रचलित धारणा का एक प्रमुख कारण भारत की दोषपूर्ण शिक्षा प्रणाली है, जिसने अपने पाठ्यक्रम में प्राचीन भारतीय ज्ञान और वैज्ञानिक उपलब्धियों के चित्रण को विकृत कर दिया है। इस प्रकार, जब तथ्य प्रस्तुत किए जाते हैं, तब भी पश्चिम में या अभिजात वर्ग के भारतीयों में से कुछ ही उन पर विश्वास करने को तैयार होते हैं, क्योंकि भारत के बारे में रूढ़िवादिताएँ गहराई से जड़ें जमा चुकी हैं। 3

प्राचीन भारतीय ग्रंथों में युद्ध का अध्ययन सैन्य संघर्ष के गतिशील तकनीकी आयामों में मानव स्वभाव के स्थायी गुणों की पड़ताल करता है। इस प्रकार कौटिल्य की वर्तमान प्रासंगिकता का प्रश्न उठता है। 7 वे प्राचीन और आधुनिक जगत में एक अपवाद बने हुए हैं, क्योंकि वे एकमात्र ऐसे रणनीतिकार थे जो अपने सिद्धांतों को व्यवहार में उतारने में सक्षम थे, जिससे एक विशाल साम्राज्य का निर्माण हुआ। अर्थशास्त्र में देश चलाने के लिए आवश्यक हर विषय का समावेश है, जिनमें से अधिकांश आज भी प्रासंगिक हैं। पूर्व राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार शिव शंकर मेनन ने 2013 में आईडीएसए द्वारा आयोजित एक संगोष्ठी में अर्थशास्त्र की प्रासंगिकता को संक्षेप में बताते हुए कहा था, “अर्थशास्त्र में प्रकट अवधारणाएँ और विचार विधियाँ उपयोगी हैं, क्योंकि कई मायनों में, आज हम जिस दुनिया का सामना कर रहे हैं, वह उस दुनिया के समान है जिसमें कौटिल्य ने मौर्य साम्राज्य का निर्माण करते समय कार्य किया था।” [xv]

लेखक का परिचय : इंजीनियर कोर में कमीशन प्राप्त ब्रिगेडियर एपी सिंह, एसएम*, वीएसएम, तृष्णा के उस दल का हिस्सा थे जिसने विश्व का चक्कर लगाया था। वे दो दशकों से अधिक समय तक ऑप्टिमिस्ट क्लास (8 से 16 वर्ष आयु वर्ग के उप-जूनियर वर्ग के लिए एक नौका) के राष्ट्रीय कोच रहे और उन्होंने कई राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में राष्ट्रीय टीम का साथ दिया।

साभार-  https://indiafoundation.in/  से 

गुलामी के दौर में पूरे हिंदू समाज को जाग्रत करने वाला महान संतः महर्षि दयानंद सरस्वती

(स्वामी दयानन्द के 200वें जन्मदिवस के अवसर पर )

 

वह मूलशंकर था, चैतन्य था, महाचैतन्य था, दयानन्द था। सरस्वती था, वेदरूपी सरस्वती को वह इस धरातल पर प्रवाहित कर गया। वह स्वामी था, वह सन्यासी था, परिव्राट था। दंडी था, योगी था, योगिराज था, महा तपस्वी था। योग सिद्धियों से संपन्न था-परन्तु उनसे अलिप्त था। मनीषी था, ऋषि था, महर्षि था, चतुर्वेद का ज्ञाता तथा मन्त्रद्रष्टा था। ब्रह्मचारी था, ब्रह्मवेत्ता था, ब्रह्मनिष्ठ था, ब्रहमानंदी था। अग्नि था, परम तपस्वी था, वर्चस्वी था, ब्रह्म वर्चस्वी था। इस धरातल पर शंकर होकर आया था। शंकर के मूल खोज कर गया और दयानन्द बनकर अपनी दया संसार पर कर गया। नश्वर देह के मोह को त्याग कर हंसते हंसते प्रसन्नता से, परम प्रभु के प्रेम में मस्त होकर ब्रह्मानंद में विलीन हो गया। एक अपूर्व जीवन, एक अद्भुत क्रांति, अतीत के गुण गौरव का एक मधुर लक्ष्य, एक महान आशा का संचार, एक अद्भुत जीवन-ज्योति इस जगत में अनंत समय के लिए छोड़ गया।

वह शंकर था- निस्संदेह शंकर ही था। प्राणिमात्र के कल्याण के लिए, विश्व के कल्याण के लिए उसकी अमर साधना थी। उसके जीवन का एक एक क्षण उसकी पूर्ति में लगा। हम जिस धरातल पर हैं, वह उससे बहुत ऊंचाई पर था। शुद्ध चैतन्य था। उसने हमारे अंदर चेतना का संचार किया। हमारे इस विश्व की जातियों में, हमारे देशों में, हमारे धर्म-कर्मों में, निस्तेजता, प्राणहीनता और मलिनता गहरी जड़े जमा चुकी थी। उस शुद्धबुद्ध चैतन्य ब्रह्मचारी ने अपने ब्रहा वर्चस तेज से हम सबके जीवन एवं धर्म-कर्म को चैतन्य, तेजोमय एवं ब्रह्मा से वेद से संयुक्त कर दिया। उस चैतन्य ब्रह्मचारी से चेतना एवं प्राण प्राप्त कर आज हम जीवित हैं, गौरवशाली हैं। हम सामाजिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक निस्तेजता को त्याग कर जीवन एवं चेतना का अनुभव कर रहे हैं और दूसरों को भी अब हमारी तेजस्विता का भान होने लगा है। आज विश्व की ऑंखें हमारी ओर किसी आशा से, किसी महान सन्देश को प्राप्त करने के लिए लगी हुई हैं।

वह सरस्वती था। वेद विद्या का अपार और अथाह समुद्र था। काशी की पंडित मण्डली ने उसकी थाह लेनी चाही परन्तु वे सब उसकी गहराई को न पहुंच सके। मत-मतान्तरों के विद्वानों ने भी अनेक बार उनके अगाध ज्ञान की थाह लेनी चाही। उनके ज्ञान सागर में गोते लगाये, परन्तु वे स्वयं अपने प्राण बचाकर भाग खड़े हुये। वह खारा समुद्र नहीं था, अपितु अत्यंत रसवान समुद्र था। उसके पास जो जाता तृप्त होकर ही आता था।

वह स्वामी था। विश्वनाथ मंदिर का वैभव काशी नरेश ने अर्पण करने की प्रार्थना की, उदयपुर महाराणा ने भी एकलिंग की गद्दी उनके चरणों में अर्पित की परन्तु वह लोभ लालच से विचलित होने वाला नहीं था। ब्रिटिश शासन काल में, पराधीन भारत में, स्वराज्य की सर्वप्रथम भावना का उसने निर्भया होकर सूत्रपात किया। वह भय से विकम्पित होने वाला नहीं था। मृत्यु से भी विचलित होने वाला नहीं था। मृत्युंजयी था। आत्मसंयमी था। केवल अपना ही स्वामी नहीं था-अपनी वृतियों का ही स्वामी नहीं था, अपितु संसार का स्वामी था। संसार का स्वामी होने पर ही एक लंगोटधारी, सर्वहुत, सर्वस्व त्यागी, सन्यासी था। राजा, महाराजा और सम्राटों की कृपा की उसे इच्छा नहीं थी। राजा-महाराजा और सम्राटों का भी सम्राट, परिव्राट था। जिनकी चारों दिशायें ही रक्षक थीं और परम प्रभु ही उसका मंत्रदाता था।

वह योगी था। उन्होंने तपस्या से अपने शरीर,मन और अंत:करण को पवित्र किया था। पवित्र अंत: करण में वह नित्य ब्रह्मा का दर्शन किया करता था। ब्रह्मा से नित्य योग-मेल मिलाप किया करता था। ब्रह्म के आनंद में नित्य निमग्न रहता था। अतएव निर्भय था, निर्भ्रम था, निःशंक था। उनके चारों और आनंद का ही साम्राज्य था। आनंद का ही सागर हिलौरें मार रहा था। ब्रह्मा का तेज-ब्रह्मा वर्चस उसके मुख मंडल पर देदीप्यमान था। ज्ञान और तेज की रश्मियां उससे प्रस्फुटित होती रहती थीं। वह कभी न थकने वाला और विश्राम न करने वाला था। वह सदा जाग्रत जागरूक था और सबको जगाने वाला था। सबको ज्ञान ज्योति से उसने प्रबुद्ध किया।

योगसाधना में रत रहकर अपना ही उद्धार करने वाला वह नहीं था। वह योगिराज था। भोगों की लालसाओं के पर्वत उससे टकराकर चकनाचूर हो जाते थे। अज्ञान, अविद्या के भयंकर प्रलयंकारी तूफान , वहां शांत हो जाते थे। लोभ एवं लालच की कीचड़ वहां जाकर शुष्क बालू बन जाती थी और उस परम तेजस्वी को अपने पंक में निमग्न न कर सकती थी। वह त्याग में अनुपम था, तपस्या में…

महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती (१८२५-१८८३) का महान चरित्र –
इतिहासचार्य निरंजनदेव केसरी ने कहा था –
कोई प्रभु-भक्त है तो विद्वान् नहीं,
कोई विद्वान् है तो योगी नहीं,
कोई योगी है तो सुधारक नहीं,
कोई सुधारक है तो दिलेर नहीं,
कोई दिलेर है तो ब्रह्मचारी नहीं,
कोई ब्रह्मचारी है तो वक्ता नहीं,
कोई वक्ता है तो लेखक नहीं,
कोई लेखक है तो सदाचारी नहीं,
कोई सदाचारी है तो परोपकारी नहीं,
कोई परोपकारी है तो कर्मठ नहीं,
कोई कर्मठ है तो त्यागी नहीं,
कोई त्यागी है तो देशभक्त नहीं,
कोई देशभक्त है तो वेदभक्त नहीं,
कोई वेदभक्त है तो उदार नहीं,
कोई उदार है तो शुद्धाहारी नहीं,
कोई शुद्धाहारी है तो योद्धा नहीं,
कोई योद्धा है तो सरल नहीं,
कोई सरल है तो सुन्दर नहीं,
कोई सुन्दर है तो बलिष्ठ नहीं,
कोई बलिष्ठ है तो दयालु नहीं,
कोई दयालु है तो संयमी नहीं ।
परंतु यदि आप ये सभी गुण एक ही स्थान पर देखना चाहें तो महर्षि दयानन्द को देखो – निष्पक्ष होकर देखो ।

(सन्दर्भ ग्रन्थः दिवंगत प्रो. डॉ. कुशलदेव शास्त्री रचित “महर्षि दयानन्दः काल और कृतित्व”,पृष्ठ ४२३)

प्रेषक – #डॉ_विवेक_आर्य

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विश्व रेडियो दिवस: रेडियो बोलता ही नहीं आपकी बात सुनता भी है

विश्व रेडियो दिवस प्रतिवर्ष 13 फरवरी को मनाया जाता है। यह दिन वर्ष 1946 में संयुक्त राष्ट्र रेडियो की स्थापना की स्मृति में समर्पित है।
विश्व रेडियो दिवस 2026 का विषय है — “रेडियो और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस: आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस एक उपकरण है, आवाज नहीं।”
भारत में पहले सामुदायिक रेडियो स्टेशन का उद्घाटन 1 फरवरी 2004 को भारत रत्न श्री लाल कृष्ण आडवाणी द्वारा किया गया था।
उत्तर प्रदेश के अमरोहा निवासी राम सिंह बौद्ध, जिन्हें “भारत का रेडियो मैन” कहा जाता है, को वर्ष 2025 में गिनीज वर्ल्ड रिकॉर्ड्स द्वारा 1,257 रेडियो के विश्व के सबसे बड़े संग्रह के लिए मान्यता प्रदान की गई।

विश्व रेडियो दिवस एक विश्वसनीय, सुलभ और समावेशी माध्यम के रूप में रेडियो की निरंतर प्रासंगिकता को उजागर करता है। तीव्र डिजिटलीकरण के बावजूद, रेडियो विविध और वंचित आबादी तक पहुंचने, साक्षरता, भाषा तथा कनेक्टिविटी की बाधाओं को दूर करने और सार्वजनिक सूचना, शिक्षा व आपदा संचार में सहयोग प्रदान करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

भारत में, सार्वजनिक सेवा एवं सामुदायिक रेडियो स्थानीय आवाजों को बुलंद करके और विकास एवं सामाजिक एकता में योगदान देकर सहभागी संचार को सशक्त बनाते हैं। यूनेस्को द्वारा बल दिया गया है कि स्वतंत्र अभिव्यक्ति, विश्वसनीय सूचना और समावेशी संवाद के मंच के रूप में रेडियो को संरक्षित रखने तथा तेजी से बदलते मीडिया परिदृश्य में इसकी स्थायी भूमिका सुनिश्चित करने के लिए निरंतर नीतिगत समर्थन और नवाचार आवश्यक हैं।

रेडियो का अपना एक अनोखा आकर्षण रहा है। यह अंतरंग होते हुए भी व्यापक और सरल होते हुए भी अत्यंत शक्तिशाली हैं। यह बिना किसी आडंबर के हमारे दैनिक जीवन में सहज रूप से घुलमिल जाता है। यह बहुत कम अपेक्षा करता है, बस थोड़ा-सा साथ और बदले में जानकारी, संवेदना तथा अपनत्व का एहसास देता है।

स्क्रीन युग के आगमन से बहुत पहले रेडियो ही वह भरोसेमंद आवाज थी, जो दूर-दराज के इलाकों, विविध भाषाओं और अनगिनत जिंदगियों को एक अदृश्य धागे में पिरोता था। सामूहिक श्रवण के माध्यम से यह लोगों को न केवल जोड़ता था, बल्कि उन्हें एक साझा अनुभव का हिस्सा भी बनाता था। इतिहास के अनेक निर्णायक क्षण रेडियो की घोषणाओं के माध्यम से हमारी सामूहिक स्मृति में अंकित हैं। भला कोई 14–15 अगस्त 1947 की उस ऐतिहासिक रात को कैसे भूल सकता है, जब रेडियो तरंगों पर भारत की स्वतंत्रता की घोषणा गूंज उठी थी। उस एक प्रसारण ने केवल समाचार नहीं सुनाया, बल्कि उसने एक विशाल और विविधतापूर्ण राष्ट्र को स्वतंत्रता की एक साझा ध्वनि में एकजुट कर दिया।

विश्व रेडियो दिवस (डब्ल्यूआरडी) की घोषणा संयुक्त राष्ट्र शैक्षिक, वैज्ञानिक और सांस्कृतिक संगठन (यूनेस्को) ने वर्ष 2011 में अपने 36वें आम सम्मेलन के दौरान की थी। इसके पश्चात् संयुक्त राष्ट्र महासभा ने 2012 में अपने 67वें सत्र में इसे औपचारिक रूप से अंगीकार किया, जिससे यह एक आधिकारिक अंतर्राष्ट्रीय दिवस के रूप में मान्यता प्राप्त हुआ। यह दिवस प्रतिवर्ष 13 फरवरी को मनाया जाता है, जो वर्ष 1946 में संयुक्त राष्ट्र रेडियो की स्थापना की स्मृति का प्रतीक है। द्वितीय विश्व युद्ध के तुरंत बाद आरंभ हुए इस रेडियो प्रसारण ने वैश्विक संचार, संवाद और सूचना साझाकरण के प्रति अंतरराष्ट्रीय समुदाय की प्रारंभिक प्रतिबद्धता को दर्शाया।

विश्व रेडियो दिवस 2026 की विषय-वस्तु “रेडियो और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस: आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस एक उपकरण है, आवाज नहीं” है, जो प्रसारण जगत में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की बढ़ती भूमिका को रेखांकित करता है।

यह इस बात को उजागर करता है कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस किस प्रकार सामग्री सृजन, अभिलेखीकरण, अनुवाद, श्रोता सहभागिता और सुलभता को सशक्त बना सकता है, जिससे रेडियो अधिक प्रभावी, कुशल व समावेशी बन सके। साथ ही, यह विषय स्पष्ट करता है कि प्रौद्योगिकी को एक सहायक साधन के रूप में ही देखा जाना चाहिए, न कि रेडियो की पहचान बन चुकी मानवीय आवाज, संपादकीय विवेक और विश्वसनीयता का विकल्प मानना चाहिए। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के नैतिक और उत्तरदायित्वपूर्ण उपयोग को प्रोत्साहित करते हुए यह विषय पुनः स्थापित करता है कि नवाचार का उद्देश्य डिजिटल युग में रेडियो के मूल मूल्यों यानी कि विश्वास, प्रामाणिकता एवं सामुदायिक जुड़ाव को और अधिक सुदृढ़ करना होना चाहिए।

ऑल इंडिया रेडियो (एआईआर), जिसे लोकप्रिय रूप से आकाशवाणी के नाम से जाना जाता है, भारत के राष्ट्रीय प्रसारक प्रसार भारती का रेडियो विभाग है और स्थापना से ही “बहुजन हिताय, बहुजन सुखाय” (जनता के कल्याण एवं सुख के लिए) के आदर्श वाक्य के साथ राष्ट्र की सेवा कर रहा है। 1936 में स्थापित और स्वतंत्रता के बाद सार्वजनिक स्वामित्व में लाया गया एआईआर, प्रसारित भाषाओं की संख्या तथा श्रोताओं की विविधता के मामले में विश्व के सबसे बड़े प्रसारण संगठनों में से एक बन गया है।

आकाशवाणी (एआईआर) की होम सर्विस देशभर में फैले 591 प्रसारण केंद्रों के माध्यम से संचालित होती है, जो भारत के लगभग 92% भौगोलिक क्षेत्र और 99.19% जनसंख्या को आच्छादित करती है। स्थलीय प्रसारण के जरिए यह 23 भाषाओं और 182 बोलियों में कार्यक्रम प्रस्तुत करती है, जो भारत की व्यापक सामाजिक-आर्थिक व सांस्कृतिक विविधता का सजीव प्रतिबिंब है। मीडियम वेव (एमडब्ल्यू), शॉर्ट वेव (एसडब्ल्यू), एफएम तथा डिजिटल प्लेटफॉर्म के माध्यम से आकाशवाणी महानगरों के साथ-साथ दूरदराज, ग्रामीण और सीमावर्ती क्षेत्रों तक प्रभावी रूप से पहुंच बनाती है।

इसके कार्यक्रमों में समाचार, समसामयिक विषय, कृषि परामर्श, शैक्षिक सामग्री, स्वास्थ्य जागरूकता, युवा कार्यक्रम, शास्त्रीय एवं लोक संगीत तथा विविध सांस्कृतिक प्रस्तुतियां शामिल हैं। आपात स्थितियों व प्राकृतिक आपदाओं के दौरान भी आकाशवाणी ने समयबद्ध चेतावनियां और प्रमाणित जानकारी उपलब्ध कराकर अपनी विश्वसनीयता तथा जनसेवा की प्रतिबद्धता को निरंतर सिद्ध किया है।

मीडिया परिदृश्य में हो रहे बदलावों के साथ, ऑल इंडिया रेडियो (एआईआर) समावेशिता, विश्वसनीयता और राष्ट्रीय एकता के प्रति अपनी प्रतिबद्धता को बनाए रखते हुए निरंतर रूपांतरित व विस्तारित हो रहा है, जो विश्व रेडियो दिवस की चिरस्थायी भावना को दर्शाता है। कोविड-19 महामारी के दौरान यह स्पष्ट रूप से देखा गया, जब ग्रामीण बिहार, झारखंड तथा मध्य प्रदेश के कुछ हिस्सों में स्कूल बंद थे और डिजिटल पहुंच सीमित थी, तब विधयर्थियों ने अपनी पढ़ाई जारी रखने के लिए ऑल इंडिया रेडियो (एआईआर) के शैक्षिक प्रसारणों पर भरोसा किया। जिन क्षेत्रों में स्मार्टफोन और स्थिर इंटरनेट की कमी थी, वहां रेडियो ने चुपचाप शिक्षा की निरंतरता सुनिश्चित की। इसी तरह, ओडिशा और तमिलनाडु के आपदा-ग्रस्त तटीय क्षेत्रों में, मछुआरे समुद्र में जाने से पहले नियमित रूप से एआईआर के मौसम बुलेटिन पर निर्भर रहते हैं। फानी (2019) जैसे भीषण चक्रवातों के दौरान, समय पर रेडियो अलर्ट ने कई लोगों को सुरक्षित रूप से तट पर लौटने में सक्षम बनाया, जिससे मोबाइल नेटवर्क के विफल होने पर एक विश्वसनीय आपातकालीन संचार उपकरण के रूप में रेडियो की भूमिका की पुष्टि हुई।

निजी एफएम रेडियो – पहुँच का विस्तार और स्थानीय सामग्री का सशक्तिकरण

निजी एफएम रेडियो शहरी और क्षेत्रीय भारत में स्थानीय मनोरंजन और सूचना प्रदान करते हुए सार्वजनिक प्रसारण का पूरक है। अगस्त 2024 में, केंद्रीय मंत्रिमंडल ने 234 पहले से अछूते शहरों और कस्बों में 730 नए एफएम चैनलों के विस्तार को ₹784.87 करोड़ के आरक्षित मूल्य के साथ स्वीकृति दी, जो क्षेत्रीय सामग्री के विस्तार और नए रोजगार अवसरों के सृजन की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। यह विस्तार निजी एफएम रेडियो की भूमिका को और सुदृढ़ करता है, जो शहरी और क्षेत्रीय भारत में स्थानीय मनोरंजन, समाचार और जानकारी उपलब्ध कराते हुए सार्वजनिक प्रसारण को मजबूती देता है। सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय के अनुसार, एफएम फेज-III नीति के अंतर्गत वर्तमान में 119 शहरों में 391 निजी एफएम चैनल संचालित हो रहे हैं।

भारत में सामुदायिक रेडियो: स्थानीय आवाजों के लिए जीवन रेखा
सामुदायिक रेडियो स्टेशन (सीआरएस) कम शक्ति वाले, गैर-व्यावसायिक स्टेशन हैं और इन्हें स्थानीय समुदायों द्वारा उनकी विशिष्ट संचार आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए स्थापित एवं संचालित किया जाता है। सामुदायिक रेडियो (सीआरएस) भारत में रेडियो प्रसारण का तीसरा स्तर है, जो सार्वजनिक सेवा और वाणिज्यिक रेडियो से अलग है। भारत में सामुदायिक रेडियो की यात्रा वर्ष 2002 में शुरू हुई, जब भारत सरकार ने आईआईटी/आईआईएम सहित सुस्थापित शैक्षणिक संस्थानों को सामुदायिक रेडियो स्टेशन स्थापित करने के लिए लाइसेंस प्रदान करने की नीति को मंजूरी दी।

पहले सामुदायिक रेडियो स्टेशन का उद्घाटन 1 फरवरी, 2004 को भारत रत्न श्री लाल कृष्ण आडवाणी द्वारा किया गया था। 2005 में अन्ना विश्वविद्यालय द्वारा अन्ना सामुदायिक रेडियो (90.4 मेगाहर्ट्ज) के शुभारंभ के साथ एक महत्वपूर्ण उपलब्धि हासिल हुई। सामुदायिक रेडियो स्थानीय आवाजों के लिए एक मंच के रूप में कार्य करता है, जो स्वास्थ्य, पोषण, शिक्षा, कृषि और सामाजिक विकास जैसे मुद्दों पर ध्यान केंद्रित करता है। स्थानीय भाषाओं व बोलियों में प्रसारण करके, यह व्यापक पहुंच और तत्काल सामुदायिक जुड़ाव सुनिश्चित करता है। भारत जैसे सांस्कृतिक और भाषाई रूप से विविध देश में, स्थानीय कलाकारों को अवसर प्रदान करने के साथ-साथ लोक परंपराओं, स्थानीय संगीत तथा सांस्कृतिक विरासत को संरक्षित करने में भी सीआरएस महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

पिछले कुछ वर्षों में, इस क्षेत्र में लगातार वृद्धि हुई है, और भारत में वर्तमान में 528 सामुदायिक रेडियो स्टेशन हैं, जो जमीनी स्तर पर संचार एवं सामुदायिक सशक्तिकरण के एक प्रभावी साधन के रूप में सामुदायिक रेडियो की भूमिका को रेखांकित करते हैं।

भारतीय सेना की सामुदायिक रेडियो पहल

• सुदूर और सीमावर्ती क्षेत्रों में रेडियो के रणनीतिक महत्व को दर्शाते हुए भारतीय सेना ने उत्तराखंड के ज्योतिर्मठ में (जून 2025 में) स्थानीय आवाजों को बुलंद करने और शिक्षा, स्वास्थ्य एवं आपदा तैयारियों से संबंधित जानकारी प्रसारित करने के लिए “इबेक्स ताराना 88.4 एफएम” का शुभारंभ किया।

• जनवरी 2026 में, सेना ने नागरिक अधिकारियों और स्थानीय निवासियों के साथ मिलकर जम्मू-कश्मीर के राजौरी में “रेडियो संगम 88.8 एफएम” का शुभारंभ किया। यह नियंत्रण रेखा के साथ स्थित पहला सामुदायिक रेडियो स्टेशन है, जिसका उद्देश्य सत्यापित जानकारी को बढ़ावा देना और सीमा पार दुष्प्रचार का मुकाबला करना है।

जमीनी आवाजें — रोजमर्रा के भारत में रेडियो

आपात स्थितियों में भी रेडियो की अहम भूमिका होती है। जब प्राकृतिक आपदाओं या संकटों के कारण बिजली, इंटरनेट सेवाएं या अन्य संचार नेटवर्क बाधित हो जाते हैं, तो रेडियो अक्सर विश्वसनीय और समय पर जानकारी का सबसे भरोसेमंद स्रोत बना रहता है। आज भी, यह जन सुरक्षा और जागरूकता के लिए जीवन रेखा बना हुआ है। रेडियो की ताकत न केवल इसकी व्यापक पहुंच में है, बल्कि इसकी प्रासंगिकता में भी है।

निम्नलिखित उदाहरण दर्शाते हैं कि भारत के सामाजिक, विकासात्मक और आपातकालीन संचार ढांचे में रेडियो किस प्रकार गहराई से समाहित है।

सामुदायिक भागीदारी रेडियो के जमीनी स्तर पर प्रभाव को और मजबूत करती है। बुंदेलखंड में, महिलाओं के नेतृत्व वाली सामुदायिक रेडियो पहलों ने लड़कियों की शिक्षा, कृषि और कल्याणकारी योजनाओं पर चर्चा के लिए मंच प्रदान किए हैं, जिससे पहली बार प्रसारण करने वालों को स्थानीय बदलाव लाने वालों के रूप में सशक्त बनाया गया है। कच्छ में, सामुदायिक रेडियो बोलियों और मौखिक परंपराओं को संरक्षित करता है, जिससे सांस्कृतिक विरासत की रक्षा होती है।

गुजरात के कच्छ में, सामुदायिक रेडियो स्टेशन कच्छी बोली में लोकगीत, मौखिक इतिहास और कहानी सुनाने के सत्र प्रसारित करते हैं। जैसे-जैसे स्थानीय बोलियां लुप्त होती जा रही हैं, रेडियो एक सांस्कृतिक संग्रह तथा घर से दूर रहने वाले प्रवासियों के लिए एक भावनात्मक सेतु का काम करता है।

दिल्ली की तिहाड़ जेल में कैदियों द्वारा संचालित रेडियो पहल कानूनी जागरूकता, मानसिक स्वास्थ्य, संगीत और कविता पर कार्यक्रम प्रस्तुत करती हैं, जिससे रचनात्मक सहभागिता के माध्यम से अभिव्यक्ति, आत्मविश्वास तथा पुनर्वास को बढ़ावा मिलता है।

उत्तराखंड की पहाड़ियों में, जहां पर इंटरनेट कनेक्टिविटी अक्सर अविश्वसनीय होती है, सामुदायिक रेडियो भूस्खलन की चेतावनी, कृषि संबंधी सलाह, रोजगार की जानकारी और लोक संगीत प्रसारित करता है, जिससे दूरस्थ तथा बुजुर्ग आबादी के लिए यह सुलभ एवं भरोसेमंद बना रहता है।

दिल्ली और मुंबई जैसे महानगरों में, एफएम रेडियो दैनिक शहरी जीवन का अभिन्न अंग बना हुआ है, जहाँ टैक्सी तथा ऑटो चालक यातायात अपडेट, क्रिकेट कमेंट्री, संगीत व इंटरैक्टिव शो सुनने के लिए रेडियो सुनते हैं – यह इस बात को रेखांकित करता है कि अत्यधिक डिजिटलीकृत शहर में भी रेडियो कितना प्रासंगिक है।

मन की बात — डिजिटल युग में रेडियो की शक्ति को सुदृढ़ करना

डिजिटल व सोशल मीडिया के प्रभुत्व वाले इस युग में, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा नागरिकों से सीधे संवाद के प्राथमिक माध्यम के रूप में रेडियो का चयन इसकी स्थायी प्रासंगिकता और उससे जुड़े भरोसे को रेखांकित करता है। 3 अक्टूबर 2014 को शुरू हुआ ‘मन की बात’ ऑल इंडिया रेडियो (एआईआर) पर प्रसारित होने वाला एक मासिक रेडियो कार्यक्रम है, जो कई भाषाओं और क्षेत्रों में उपलब्ध है, जिससे इसकी पहुंच देश के सुदूर कोनों तक सुनिश्चित होती है।

आमतौर पर हर महीने के आखिरी रविवार को प्रसारित होने वाला ‘मन की बात’ 130 एपिसोड पूरे कर चुका है, जिससे यह किसी राष्ट्राध्यक्ष द्वारा शुरू की गई सबसे लंबे समय तक चलने वाले रेडियो प्रचार कार्यक्रमों में से एक बन गया है। यह कार्यक्रम इस बात का उदाहरण है कि कैसे डिजिटल युग में भी रेडियो जनसंचार का एक प्रभावी साधन बना हुआ है, जो साक्षरता, इंटरनेट की पहुंच और भौगोलिक सीमाओं को पार करता है।

‘मन की बात’ के माध्यम से, प्रधानमंत्री जमीनी स्तर के नवाचारों, सामाजिक आंदोलनों, सांस्कृतिक परंपराओं और नागरिक-नेतृत्व वाली पहलों को उजागर करते हैं, जिससे सहभागी शासन एवं राष्ट्रीय एकता को बल मिलता है। डिजिटल प्लेटफॉर्म पर इसकी एक साथ उपलब्धता, रेडियो की नई तकनीकों के साथ सहजता से एकीकृत होने की क्षमता को और प्रदर्शित करती है, साथ ही इसकी मूल ताकत विश्वसनीयता, सरलता तथा समावेशिता को भी बरकरार रखती है।

‘मन की बात’ की निरंतर सफलता रेडियो की व्यापक स्तर पर लोगों से जुड़ने की अनूठी क्षमता की पुष्टि करती है, जिससे यह विश्व रेडियो दिवस की भावना के अनुरूप, समकालीन सार्वजनिक संचार में एक शक्तिशाली एवं प्रासंगिक माध्यम बन जाता है।

उत्तर प्रदेश के अमरोहा जिले के गजराउला निवासी राम सिंह बौद्ध, जिन्हें अक्सर “भारत का रेडियो मैन” कहा जाता है, ने अपने निजी शौक को राष्ट्रीय संस्कृति में एक महत्वपूर्ण योगदान में बदल दिया है। 2025 में गिनीज वर्ल्ड रिकॉर्ड्स द्वारा मान्यता प्राप्त बौद्ध के नाम दुनिया में रेडियो का सबसे बड़ा संग्रह है, जिसमें दशकों के तकनीकी विकास को समेटे हुए 1,257 अलग-अलग रेडियो सेट शामिल हैं। उनका संग्रह रेडियो की कहानी बयां करता है, जिसमें बीसवीं सदी के शुरुआती दौर के भारी-भरकम लकड़ी के रिसीवर से लेकर कॉम्पैक्ट ट्रांजिस्टर सेट तक शामिल हैं, जिन्होंने लाखों भारतीय घरों में समाचार और मनोरंजन पहुंचाया।

 

बौद्ध की यात्रा इतिहास और सार्वजनिक संचार के प्रति उनके गहरे लगाव से प्रेरित है। रेडियो की निरंतर प्रासंगिकता, विशेष रूप से ‘मन की बात’ जैसे कार्यक्रमों से प्रेरित होकर, उन्होंने पूरे भारत से रेडियो इकट्ठा करना शुरू किया। जो शौक के रूप में शुरू हुआ, वह धीरे-धीरे एक लुप्त होती विरासत को संरक्षित करने का मिशन बन गया। आर्थिक तंगी और सामाजिक संशय के बावजूद, उन्होंने असाधारण दृढ़ता के साथ अपना प्रयास जारी रखा।

आज उनका संग्रह सिद्धार्थ इंटर कॉलेज में स्थित एक संग्रहालय में रखा गया है, जिसका प्रबंधन उनका परिवार करता है। यह स्थान एक जीवंत संग्रह के रूप में कार्य करता है, जिससे विद्यार्थियों, शोधकर्ताओं और आगंतुकों को जनमत और राष्ट्रीय चेतना को आकार देने में रेडियो की भूमिका को समझने में मदद मिलती है। बौद्ध की उपलब्धि रेडियो की शाश्वत प्रासंगिकता और भारत की संचार विरासत को संरक्षित करने वाले व्यक्तिगत प्रयासों के प्रति एक श्रद्धांजलि है।

71 वर्ष की आयु में भी, सेवानिवृत्त सरकारी कर्मचारी राम सिंह बौद्ध अपने जुनून के सफर पर आश्चर्यचकित होते हैं। राम सिंह बौद्ध की कहानी सिर्फ रेडियो तक सीमित नहीं है, बल्कि यह इतिहास के प्रति प्रेम और एक व्यक्ति की पूरे राष्ट्र की आवाज़ को संरक्षित करने की क्षमता का प्रमाण है।

मृत माँ के शरीर ने तीन दिन तक अबोध बेटी को जीवित रखा

नौ महीने की नन्ही ग्रेट मिलर 7 नवम्बर 1917 को केंटकी के एप्पलाचियन पहाड़ों में एक सुनसान लकड़ी के केबिन में अपनी मां की निर्जीव देह के पास जीवित पाई गई।

ग्रेट तीन दिनों तक अपनी मां के शव के साथ अकेली रही — तीन दिन तक वह बार-बार अपनी मृत मां का दूध पीने की कोशिश करती रही, रो-रोकर अपनी आवाज खो बैठी, और अंत में चुप होकर अपनी मां के ठंडे शरीर से लिपटकर लेट गई… मानो मौत का इंतज़ार कर रही हो।

जब एक पड़ोसी परिवार का हालचाल जानने आया, तो उसने ग्रेट को मां के निर्जीव शरीर से सटी हुई पाया — भूखी, प्यास से कमजोर, लेकिन जिंदा। बाद में उस पड़ोसी ने कहा कि वह दृश्य उसे जीवन भर सताता रहा। जब उसने बच्ची को उठाया, तो वह रो भी नहीं पाई — बस एक हल्की सी कराह निकली, जैसे किसी घायल प्राणी की… एक ऐसी बच्ची की आवाज, जिसके आंसू और उम्मीद दोनों खत्म हो चुके हों।

ग्रेट की मां रेचल मिलर, केवल उन्नीस वर्ष की थीं। वह खुद भी एक बालिका वधू थीं — तेरह साल की उम्र में उनकी शादी कर दी गई थी। उनका पति उन्हें गर्भवती छोड़कर चला गया था, और वह सबसे नजदीकी पड़ोसी से सोलह मील दूर एक केबिन में अकेली रहती थीं।

4 नवम्बर 1917 को गर्भपात की जटिलताओं के कारण रेचल की मृत्यु हो गई। वह केबिन में अकेली थीं — तीस मील तक कोई डॉक्टर नहीं था। उनकी नौ महीने की बेटी ग्रेट उनकी आंखों के सामने उन्हें खून बहाते हुए मरते देख रही थी।

मरने से पहले रेचल ने आखिरी बार अपनी बेटी को दूध पिलाया। मरते हुए भी उन्होंने अपनी बच्ची को सीने से लगाया और जो कुछ उनके पास बचा था, वह उसे दे दिया।

उनकी मृत्यु के बाद ग्रेट तीन दिन तक मां के शव के पास लेटी रही — बार-बार दूध पीने की कोशिश करती, रोती, समझ नहीं पाती कि मां क्यों नहीं उठ रही, क्यों उसे गोद में नहीं ले रही।

जिस पड़ोसी ने ग्रेट को पाया, उनका नाम थॉमस वेब था। उन्होंने बच्ची को उठाया — वह इतनी कमजोर थी कि ठीक से रो भी नहीं पा रही थी। थॉमस उसे अपने घर ले गए। उनकी पत्नी मार्था ने उसे नहलाया, पानी पिलाया और खाना खिलाया। ग्रेट ने पानी ऐसे पिया जैसे वह प्यास से मरने वाली थी — और सच में वह मौत के बेहद करीब थी। फिर वह लगातार सोलह घंटे तक सोती रही।
थॉमस और मार्था वेब ने ग्रेट को पाला-पोसा। ग्रेट 2003 तक जीवित रहीं और 86 वर्ष की आयु में उनका निधन हुआ।

उन्हें उस घटना की कोई याद नहीं थी — वह बहुत छोटी थीं। लेकिन समुदाय में उनकी कहानी बार-बार सुनाई जाती रही — नौ महीने की बच्ची, जो तीन दिन तक अपनी मृत मां के पास पड़ी रही।

1985 में, जब ग्रेट 68 वर्ष की थीं, एक इतिहासकार ने उनका साक्षात्कार लिया। उन्होंने कहा: “मुझे अपनी मां याद नहीं। मैं नौ महीने की थी जब वह मर गईं। लोग मुझे बताते हैं कि मैं तीन दिन तक उनकी लाश के पास पड़ी रही, दूध पीने की कोशिश करती रही। लोग कहते हैं कि मेरा बच जाना चमत्कार है। लेकिन मैं इसलिए बची क्योंकि मेरी मां ने मरने से पहले आखिरी बार मुझे दूध पिलाया। उन्होंने अपना सब कुछ मुझे दे दिया।

मेरी मां उन्नीस साल की थीं। वह अकेली मरीं। खून बहता रहा। उनका आखिरी ख्याल अपनी बच्ची को खिलाना था।

मैं छियासी साल जिंदा रही — क्योंकि मेरी मां का आखिरी काम मुझे दूध पिलाना था। मेरी जिंदगी का हर दिन मेरी मां की आखिरी सांस का तोहफा है।

मैंने उन्हें कभी नहीं जाना। लेकिन मैं जानती हूं उन्होंने मेरे लिए क्या किया। यही प्यार है। यही मां का प्रेम है — जब मौत सामने हो और देने के लिए कुछ भी न बचा हो… सिवाय अपने बच्चे को एक आखिरी बार खिलाने के।”

साभार- https://www.facebook.com/HistoryUnfolded05 से

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शालीनता, सौम्यता और संस्कारों से दूरदर्शन के समाचारों को पहचान देने वाली सरला माहेश्वरी नहीं रही

जन्म वर्ष: 1954 (दिल्ली) निधन- 13 फरवरी 2025 दिल्ली

दूरदर्शन एंकर सरला माहेश्वरी का 71 वर्ष की आयु में निधन हो गया है। मधुर आवाज, सटीक उच्चारण और गरिमामय प्रस्तुति से उन्होंने दूरदर्शन पर अपनी खास पहचान बनाई थी।
वे अपनी शांत और सौम्य आवाज़, सटीक हिंदी उच्चारण, और गरिमापूर्ण प्रस्तुति के लिये दर्शकों के बीच बहुत लोकप्रिय थीं। सरला माहेश्वरी ने अपना करियर 1976 में दूरदर्शन से न्यूज़ अनाउंसर के रूप में शुरू किया, जब वे दिल्ली यूनिवर्सिटी में पीएचडी कर रही थीं। बाद में वे न्यूज रीडिंग की भूमिका में आईं और दूरदर्शन के बुलेटिन को प्रस्तुत करने लगीं।

उन्होंने दूरदर्शन के लिए 1976 से लगभग 2005 तक समाचार पढ़ा। अपने करियर के दौरान उन्होंने ब्लैक-एंड-व्हाइट से लेकर कलर टीवी तक के परिवर्तन को देखा और भारतीय टीवी समाचार के बदलते दौर को करीब से अनुभव किया। कुछ समय के लिए वे यूके में BBC के साथ भी न्यूज़रीडर के रूप में काम कर चुकी थी, जहाँ वे 1986 तक रहीं और फिर 1988 में भारत लौटकर दूरदर्शन से जुड़ीं।

सरला माहेश्वरी को उनकी शांत, सौम्य आवाज़, संयमित प्रस्तुति, और कठोर परिशुद्ध हिंदी उच्चारण के लिये याद किया जाता है। उस दौर में जब दूरदर्शन ही मुख्य सूचना स्रोत था, उनके समाचार पढ़ने का अंदाज़ लाखों दर्शकों के लिए विश्वास और भरोसे का प्रतीक बन गया। साथी पत्रकारों ने उन्हें शालीनता और गरिमा का पर्याय बताया है, और उनके काम को भारतीय टीवी पत्रकारिता की “गोल्डन एरा” का हिस्सा माना गया है।

उन्होंने बीए, एमए और PhD (हिंदी) – दिल्ली यूनिवर्सिटी से किया। उनके पति पवन माहेश्वरी (गैस्ट्रोएंटरोलॉजिस्ट) हैं। उनके दो बेटे — कविश माहेश्वरी (प्लास्टिक सर्जन) और हिमांशु माहेश्वरी
उनकी तीन बहनें हैं।

शुरुआत: 1976 में दूरदर्शन में ऑडिशन देकर उन्होंने पहले अन्नाउंसर/स्क्रिप्ट-राइटर के रूप में काम किया। 1982 में वे न्यूज़रीडर (News Reader) बनीं और जल्दी ही अपनी
शांत प्रस्तुति और सटीक हिंदी के लिए प्रसिद्ध हुईं।उन्होंने पहली बार भारत में Asiad (एशियाई खेलों) के कलर टेलीकास्ट को एंकर किया — यह टीवी पर रंगीन प्रसारण की नई शुरुआत का एक ऐतिहासिक पल था।

1984 में शादी के बाद उन्होंने बीबीसी (BBC) इंग्लैंड में भी न्यूज़ रीडर के रूप में काम किया। फिर 1986 में भारत लौटीं और दोबारा दूरदर्शन से जुड़ीं।

कुछ यादगार क्षण / उपलब्धियाँ
मई 1991 में भारत के प्रधानमंत्री राजीव गांधी की मृत्यु का समाचार उन्होंने भरे मन से गमनीम चेहरे के साथ दूरदर्शन पर देश को पहली बार पढ़कर सुनाया — जो उस समय का एक महत्वपूर्ण ऐतिहासिक प्रसारण था।

पंजाब में दशक 1980–90 के मिलिटेंसी दौर में खबर पढ़ने के कारण उन्हें धमकियाँ भी मिलीं — तब भी उन्होंने निर्भीकता से अपने कर्तव्य का निर्वाह किया। 1997 में मदर टेरेसा के अंतिम संस्कार के कवरेज के बाद उन्होंने परिवार को प्राथमिकता देने का निर्णय लिया और करीबी रिपोर्टिंग से दूरी बनाई।

उनके कई प्रसिद्ध सहकर्मी थे जैसे सलमा सुल्तान, मीना तलवार, शीला चमन और शम्मी नारंग, जो उस समय के दूरदर्शन न्यूज के अन्य प्रतिष्ठित चेहरों में से थे।

दूरदर्शन ने उन्हें भावपूर्ण श्रद्धांजलि दी और उनके योगदान को याद करते हुए कहा कि उन्होंने दर्शकों के दिलों में गहरा भरोसा और सम्मान प्राप्त किया।

सरला माहेश्वरी न केवल एक न्यूज एंकर थीं, बल्कि उन वर्षों के युग की भारतीय टेलीविजन समाचार की पहचान थीं — जब संदेशों को गर्व, शांत स्वभाव और सटीक भाषा के साथ प्रस्तुत करना बेहद महत्वपूर्ण माना जाता था।

लोग आज भी याद करते हैं कि जब वे शाम के समाचार देखते थे, तो सरला माहेश्वरी की सौम्य, शांत आवाज़ और स्पष्ट हिंदी ने उनके दिन को पूरा किया — इतनी विश्वसनीय आवाज़ कि दर्शक हर रोज़ आने वाले समाचार को उनका चेहरा और बोली से जोड़ लेते थे।

साक्षात्कारों में उन्होंने खुद याद किया कि उस जमाने में कोई टेलीप्रॉम्प्टर नहीं होता था और उन्हें समाचार को याद करके प्रस्तुत करना पड़ता था, जिससे दिन-प्रतिदिन का प्रसारण और भी चुनौतीपूर्ण और यादगार बन जाता था।

दर्शकों की व्यक्तिगत यादें
प्रसिद्ध वकील संजय हेगड़े जैसे लोग याद करते हैं:
“The passing of a gentle era of Doordarshan News. I remember my sister and me, looking forward to her reading of the Hindi news.”
(दूरदर्शन न्यूज़ के उस शांत समय के जाने का दुख; मैं और मेरी बहन उनके हिंदी समाचार पढ़ने का इंतज़ार करते थे)।

दूरदर्शन ने लिखा:
“Her simplicity, restraint and personality instilled a deep trust in her viewers.”
(उनकी सादगी, संयम और व्यक्तित्व ने दर्शकों में गहरा भरोसा पैदा किया)।

दूरदर्शन ने एक्स पर पोस्ट में लिखा- दूरदर्शन परिवार की ओर से हम श्रीमती सरला माहेश्वरी को भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं। वह एक सम्मानित और पूजनीय दूरदर्शन समाचार वाचक थीं, जिन्होंने अपनी मधुर आवाज, सटीक उच्चारण और गरिमामय प्रस्तुति से भारतीय समाचार जगत में एक विशेष स्थान बनाया। उनकी सादगी, संयम और व्यक्तित्व ने दर्शकों में गहरा विश्वास जगाया।

दिग्गज समाचार एंकर और माहेश्वरी के पूर्व सहकर्मी, शम्मी नारंग ने भी अपनी पूर्व सह-एंकर के निधन पर शोक व्यक्त किया। नारंग ने सोशल मीडिया पोस्ट में लिखा- वह शालीनता और शिष्टाचार की साक्षात मूर्ति थीं। न सिर्फ दिखने में सुंदर, बल्कि हृदय से भी कहीं अधिक उदार, भाषा पर उनकी अद्भुत पकड़ थी और वे ज्ञान का भंडार थीं। दूरदर्शन स्क्रीन पर उनकी उपस्थिति का एक अनूठा आकर्षण था। उन्होंने सभी का सम्मान किया और जिस भी क्षेत्र में वे रहीं, उसे बेहतर बनाया। मैं प्रार्थना करता हूं कि ईश्वर उनकी आत्मा को शाश्वत शांति प्रदान करें और महेश्वरी परिवार को शक्ति दें।

अखिल भारतीय महिला कांग्रेस ने सरला माहेश्वरी के निधन को टेलीविजन पत्रकारिता के स्वर्ण युग का अंत बताया। उनकी विश्वसनीयता और शालीनता आने वाली पीढ़ियों के लिए हमेशा प्रेरणा बनी रहेगी।