Friday, April 4, 2025
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प्रो, कुमुद शर्मा ने महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा के कुलपति का कार्यभार ग्रहण किया

वरिष्ठ साहित्यकार, आलोचक एवं मीडिया विशेषज्ञ प्रोफेसर कुमुद शर्मा जी ने आज, शुक्रवार, 07 मार्च 2025 को महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा के कुलपति पद का पदभार संभाला। भारत सरकार के शिक्षा मंत्रालय के उच्चतर शिक्षा विभाग द्वारा 06 मार्च 2025 को जारी आदेश के अनुसार उन्हें इस पद पर नियुक्त किया गया है। महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा की पहली महिला कुलपति के रूप में प्रो. कुमुद शर्मा की नियुक्ति विश्वविद्यालय के लिए एक ऐतिहासिक उपलब्धि है।

प्रोफेसर कुमुद शर्मा  ने हिंदी कविता, कहानी, नाटक, आलोचना और अनुवाद के क्षेत्र में अपनी विशेष उपस्थिति बनाई है। उन्होंने अनेक लोकप्रिय काव्य संग्रह लिखे हैं जैसे “धूल के आँगन”, “आज फिर दिल ने पुकारा है”, “उस पार के बस्ती” और “सूरज के समान” आदि। उन्होंने नाटक लेखन के क्षेत्र में भी अपनी पहचान बनाई है और उनके लिखे नाटक जैसे “बेघर”, “प्रतिज्ञा”, “शोर”, “आँखों के सामने” और “आधे अधूरे” आदि लोकप्रिय हैं।

इसके अलावा, प्रोफेसर कुमुद शर्मा ने हिंदी साहित्य के क्षेत्र में आलोचना का भी अपना योगदान दिया है। उन्होंने अनेक विषयों पर अपने लेख लिखे हैं और हिंदी साहित्य के विकास में उनका महत्वपूर्ण योगदान है।  प्रोफेसर कुमुद शर्मा ने अनेक उत्कृष्ट लेखनों का अनुवाद भी किया है, जो अंग्रेजी साहित्य से हिंदी में अनुवादित किए गए हैं। उन्होंने उत्कृष्ट लेखन का अनुवाद किया है जैसे “सिद्धार्थ” (हर्मन हेस्से), “अज्ञातवास” (जोसेफ अग्नेल), “फ्रांकलिन डी रूजवेल्ट और मैं” (शिकागो ट्रिब्यून की संपादक जोन के। ओ’हारा) और “जीवन के उपहार” (ओशो) आदि।

सम्मानित प्रोफेसर कुमुद शर्मा का योगदान हिंदी साहित्य के विभिन्न क्षेत्रों में नहीं सीमित है, बल्कि उनका योगदान हिंदी साहित्य के विकास में महत्वपूर्ण और अमूल्य है।

प्रो. कुमुद शर्मा वर्तमान में दिल्ली विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग की विभागाध्यक्ष एवं वरिष्ठ प्रोफेसर रही हैं। इसके अतिरिक्त, वे विभिन्न महाविद्यालयों की प्रबंध समितियों की अध्यक्ष के रूप में भी कार्यरत रही हैं। उनका अकादमिक अनुभव अत्यंत व्यापक रहा है।
प्रो. कुमुद शर्मा ने 1985 में इलाहाबाद विश्वविद्यालय से “नई कविता में राष्ट्रीय चेतना का स्वरूप विकास” विषय पर पीएच.डी. पूरी की और 2002 में रांची विश्वविद्यालय से “भूमंडलीकरण: भारतीय मीडिया का बदलता परिदृश्य” विषय पर डी.लिट. की उपाधि प्राप्त की। आधुनिक साहित्य, स्त्री विमर्श और मीडिया अनुसंधान में उनकी विशेष रुचि रही है। उन्होंने अपने अकादमिक जीवन में अनेक महत्वपूर्ण शोधों का निर्देशन किया है और उनके मार्गदर्शन में कई शोधार्थियों ने एम.फिल एवं पीएच.डी. पूरी की है।

उनकी लेखनी भी अत्यंत समृद्ध रही है। उन्होंने भारतीय साहित्य के निर्माता: अंबिका प्रसाद बाजपेयी, समाचार बाज़ार की नैतिकता, आधी दुनिया का सच, हिंदी के निर्माता, विज्ञापन की दुनिया, जनसंपर्क प्रबंधन और भूमंडलीकरण और मीडिया जैसी चर्चित पुस्तकें लिखी हैं। उनके समीक्षात्मक लेख, अनुवाद एवं सामाजिक विषयों पर विश्लेषणात्मक लेख विभिन्न राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हुए हैं। वे साहित्य अमृत पत्रिका की संयुक्त संपादक भी रह चुकी हैं।
प्रो. कुमुद शर्मा को उनके उत्कृष्ट शैक्षणिक और साहित्यिक योगदान के लिए अनेक प्रतिष्ठित पुरस्कारों से सम्मानित किया गया है। उन्हें 2002 और 2009-10 में भारत सरकार के सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय द्वारा भारतेंदु हरिश्चंद्र सम्मान प्रदान किया गया। इसके अतिरिक्त, उन्हें दिल्ली हिंदी साहित्य सम्मेलन द्वारा साहित्य श्री सम्मान तथा प्रेमचंद रचनात्मक लेखन पुरस्कार भी प्राप्त हुआ है।

अपने शैक्षणिक एवं साहित्यिक योगदान के साथ-साथ प्रो. कुमुद शर्मा ने प्रशासनिक स्तर पर भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। वे भारत सरकार की विभिन्न समितियों में सलाहकार एवं सदस्य के रूप में कार्य कर चुकी हैं, जिनमें नागरी उड्डयन मंत्रालय, वाणिज्य मंत्रालय, खनन मंत्रालय, स्वास्थ्य मंत्रालय, मानव संसाधन विकास मंत्रालय, प्रसार भारती एवं एनसीईआरटी शामिल हैं।

महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा की पहली महिला कुलपति के रूप में प्रो. कुमुद शर्मा की नियुक्ति विश्वविद्यालय के लिए एक ऐतिहासिक उपलब्धि है। महिला दिवस से एक दिन पूर्व एक महिला कुलपति पाकर विश्वविद्यालय के समस्त हितधारक हर्षोल्लास से भरे हुए हैं।

सत्य घटनाओं पर बनाएं फिल्में, नकल न करें

दो दिवसीय ग्वालियर शॉर्ट फिल्म फेस्टिवल का समापन, विजेताओं को मिले एक लाख के पुरस्कार

ग्वालियर। फिल्म समाज का आईना होती हैं। लेखक की जिम्मेदारी होती है कि वह फिल्म के माध्यम से समाज को सच्चाई से अवगत कराएं। फिल्म निर्माता सत्य घटनाओं पर आधारित गंभीर फिल्में बनाएं। किसी भी फिल्म की नकल बिल्कुल न करें। यह बात आईआईटीटीएम में आयोजित दो दिवसीय ‘ग्वालियर शॉर्ट फिल्म फेस्टिवल’ के समापन समारोह में रविवार को वक्ताओं ने कही। मनोहारी सांस्कृतिक प्रस्तुतियों के साथ कार्यक्रम का समापन ओम नम: शिवाय फेम प्रख्यात अभिनेता समर जयसिंह एवं चर्चित फिल्म ‘द कन्वर्जन’ के निर्माता-निर्देशक विनोद तिवारी, प्रख्यात फिल्म निर्देशक देवेंद्र मालवीय, प्राध्यापक डॉ.श्रीनिवास सिंह, विक्रांत विश्वविद्यालय की कुलगुरू अमरीका सिंह के सानिध्य में हुआ। अध्यक्षता सतपुड़ा चलचित्र समिति मध्य प्रदेश के अध्यक्ष लाजपत आहूजा ने की। कार्यक्रम सह संयोजक संजीव गोयल भी मंचासीन रहे।

श्री तिवारी ने कहा कि नए फिल्म निर्माताओं से कहा कि वह गंभीर विषयों पर फिल्में बनाएं। हांलाकि ऐसी फिल्में बनाने में थोड़ी परेशानी भी आती हैं। अपना उदाहरण देते हुए बताया कि जब उन्होंने लव जिहाद फिल्म बनाई तो इसे सेंसर बोर्ड ने प्रसारित करने की अनुमति नहीं दी। 14 बार इस फिल्म को रिजेक्ट किया गया। न्यायालय की वजह से यह फिल्म प्रदर्शित हो पायी। मेरी आगे भी कोशिश रहेगी कि फिल्मों के माध्यम से समाज को सच्चाई से अवगत कराता रहूंगा।

अभिनेता समर जय सिंह ने इस आयोजन के लिए सतपुड़ा चलचित्र, भोपाल एवं विश्व संवाद केंद्र, भोपाल का आभार व्यक्त करते हुए कहा कि इससे नए कलाकारों को मंच मिलने से वह प्रोत्साहित होंगे। उन्हें मुंबई जाने की जरूरत नहीं पड़ेगी। उन्होंने कलाकारों से आह्वान करते हुए कहा कि वह समाज में घटित घटनाओं के आधार पर फिल्म बनाएं। इसके लिए समाचार पत्र भी पढ़ते रहें। समर जय सिंह ने फिल्मकारों से कहा कि वह नकल करके फिल्में नहीं बनाएं।

फ़िल्म निर्देशक देवेंद्र मालवीय ने फिल्मकारों से कहा कि अगर आपके पास विचार हैं तो आप ग्वालियर में भी फिल्में बना सकते हैं। कार्यक्रम के प्रारंभ में अतिथियों का स्वागत मुकुंद पाठक, प्रवीण दुबे, अतुल दुबे, लक्ष्मीनारायण प्रजापति, तपन भार्गव, हर्षिता श्रीवास्तव, मनीष मांझी ने किया। कार्यक्रम का संचालन डॉ.अश्विनी अग्रवाल, अभिनव द्विवेदी, उमेश गोंजे ने किया।

कैंपस फिल्म कैटेगरी में प्रथम स्थान पर ध्रुव तारा फिल्म रही। इसके डायरेक्टर नवीन कुमार थे। दूसरे स्थान पर आशीष मिश्रा द्वारा निर्देशित फिल्म कहानी एवं तीसरे स्थान पर विजय बोडके की फिल्म किताबी मस्ती रही। वहीं  डाक्यूमेंट्री कैटेगरी में प्रथम सेकेंड चांस (फिल्म निर्माता हर्षित मिश्रा),द्वितीय स्थान पर गल देव: एक अनोखी मान्यता (तनिष्क भूरिया) और तीसरे स्थान पर काशी: आदि, अंत और मोक्ष (दिव्यांशी बुंदेला) रही। शॉर्ट फिल्म श्रेणी में प्रथम लोन आसान दरों पर (आशीष जी), द्वितीय फोन कॉल (विशेष शर्मा), तृतीय स्थान पर अब होगा इंसाफ फिल्म (विजय तिवारी) रही। रील कैटेगरी में प्रथम धरती पुत्र अगरिया(कृतार्थ देव चतुर्वेदी) और स्पेशल जूरी अवार्ड डॉक्यूमेंट्री चंबल: सत्य और मिथ्या (आशुतोष भार्गव), डिग्री फिल्म (दीपक दुबे) को दिया गया। विजेताओं को करीब एक लाख के पुरस्कार प्रदान किए गए।

पश्चिम रेलवे द्वारा प्रेरणादायक पहल के साथ मनाया गया अंतरराष्‍ट्रीय महिला दिवस

मुंबई। पश्चिम रेलवे द्वारा अंतरराष्‍ट्रीय महिला दिवस 2025 के अवसर पर अपनी महिला कर्मचारियों के उत्कृष्ट योगदान को सम्मानित करने और कार्यस्थल पर लैंगिक समावेशिता को बढ़ावा देने के उद्देश्य से कई प्रेरणादायक और महत्वपूर्ण कार्यक्रमों का आयोजन किया गया। इन कार्यक्रमों के माध्यम से रेलवे क्षेत्र में महिलाओं को समान अवसर प्रदान करने और उनकी भूमिका को और अधिक सशक्त बनाने के लिए प्रोत्साहित किया गया।

पश्चिम रेलवे के मुख्य जनसंपर्क अधिकारी श्री विनीत अभिषेक द्वारा जारी एक प्रेस विज्ञप्ति के अनुसार, पश्चिम रेलवे द्वारा महिला दिवस के उपलक्ष्य में वसई रोड स्टेशन से एक कंटेनर मालगाड़ी का परिचालन पूर्णतः महिला क्रू द्वारा किया गया। इस क्रू में लोको पायलट (मालगाड़ी) श्रीमती मीरा बाई मीणा, वरिष्ठ सहायक लोको पायलट श्रीमती उत्कर्षा शर्मा तथा गार्ड (ट्रेन प्रबंधक) श्रीमती कैरल डिसूजा शामिल रहीं। यह विशेष पहल रेलवे के परिचालन क्षेत्र में महिलाओं के समावेश और उनकी दक्षता को दर्शाने का एक सराहनीय प्रयास था। इस सफल परिचालन के माध्यम से पश्चिम रेलवे ने महिला सशक्तिकरण का एक मजबूत संदेश दिया और यह साबित किया कि महिलाएं किसी भी तकनीकी एवं परिचालन क्षेत्र में समान रूप से सक्षम हैं।

श्री अभिषेक ने आगे बताया कि महिला दिवस के अवसर पर पश्चिम रेलवे के महालक्ष्मी ट्रैक्शन सबस्टेशन (TRD) पर कार्यरत सम्पूर्ण महिला मेंटेनेंस टीम का सम्मान किया गया। इस टीम को पश्चिम रेलवे की प्रमुख मुख्य कार्मिक अधिकारी (PCPO) श्रीमती मंजुला सक्सेना द्वारा सम्मानित किया गया। यह टीम 25 केवी और 110 केवी के ट्रैक्शन पावर सप्लाई उपकरणों का रखरखाव करती है, जिससे उपनगरीय रेल सेवाओं का निर्बाध परिचालन सुनिश्चित होता है। यह टीम रेलवे में तकनीकी क्षेत्र में कार्य करने वाली महिलाओं के लिए प्रेरणा का स्रोत बन गई है।

इसी क्रम में, पश्चिम रेलवे ने माटुंगा रोड रेलवे स्टेशन पर कार्यरत सम्पूर्ण महिला टीम का भी सम्मान किया। यह स्टेशन पूरी तरह से महिला कर्मचारियों द्वारा संचालित किया जाता है, जिसमें स्टेशन मास्टर, बुकिंग क्लर्क, टिकट चेकिंग स्टाफ, रेलवे सुरक्षा बल (RPF) कर्मी और हाउसकीपिंग स्टाफ शामिल हैं। इन सभी महिला कर्मचारियों के सामूहिक प्रयासों से यह स्टेशन सुचारू रूप से संचालित हो रहा है। इस सराहनीय कार्य के लिए प्रमुख मुख्य कार्मिक अधिकारी श्रीमती मंजुला सक्सेना द्वारा इन महिला कर्मचारियों को सम्मानित किया गया, जिससे उनके समर्पण और सेवा भावना को सराहना दिया जा सके।

महिला दिवस के अवसर को और अधिक खास बनाने के लिए पश्चिम रेलवे द्वारा रेडियो चैनल फीवर 104 एफएम के सहयोग से “पश्चिम रेलवे की नायिका” शीर्षक से एक विशेष वीडियो जारी किया गया। यह वीडियो पश्चिम रेलवे की महिला कर्मचारियों की प्रेरणादायक कहानियों को प्रदर्शित करता है, जिन्होंने रेल परिचालन को सुरक्षित और सुविधाजनक बनाने के लिए अपनी सेवाएं दी हैं। इसके अलावा, पश्चिम रेलवे की वरिष्ठ मोटरमैन श्रीमती प्रीति कुमारी के संघर्ष और सफलता की कहानी को दर्शाने वाला एक विशेष पॉडकास्ट भी जारी किया गया, जिसे पश्चिम रेलवे के आधिकारिक यूट्यूब चैनल पर जारी किया गया है। इस पॉडकास्ट के माध्यम से आम जनता महिला कर्मचारियों के योगदान और उनकी कार्यक्षमता को नजदीकी से समझ सकेगी।

महिला दिवस के उपलक्ष्य में पश्चिम रेलवे के मुंबई सेंट्रल मंडल द्वारा रेलवे स्टेशनों और कार्यस्थलों के लिए ‘लैंगिक समावेशी प्रणाली के लिए दिशा-निर्देश’ भी जारी किए गए। इन दिशा-निर्देशों का उद्देश्य कार्यस्थल पर लैंगिक समानता को बढ़ावा देना, एक सुरक्षित एवं समावेशी कार्यसंस्कृति सुनिश्चित करना और रेल परिचालन के सभी क्षेत्रों में महिला कर्मचारियों की भागीदारी को प्रोत्साहित करना है।

पश्चिम रेलवे अपने महिला कर्मचारियों के महत्वपूर्ण योगदान को पहचानते हुए भविष्य में भी महिला सशक्तिकरण और लैंगिक समानता को बढ़ावा देने के लिए प्रतिबद्ध है। अंतरराष्‍ट्रीय महिला दिवस 2025 के अवसर पर किए गए इन सभी कार्यक्रमों और पहलों ने पश्चिम रेलवे की प्रगतिशील सोच और महिला कर्मचारियों के प्रति सम्मान का एक उदाहरण प्रस्तुत किया। पश्चिम रेलवे का यह प्रयास कार्यस्थल पर समान अवसरों और समावेशी वातावरण को बढ़ावा देने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।

होली बाल कविता की राष्ट्रीय प्रतियोगिता में 24 विजेता रहे

कोटा/ होली बाल कविता की राष्ट्रीय प्रतियोगिता के परिणाम घोषित कर दिए गए हैं। प्रतियोगिता का आयोजन संस्कृति, साहित्य, मीडिया फोरम, कोटा तथा समरस संस्थान साहित्य सृजन गांधीनगर, कोटा इकाई, कोटा के संयुक्त तत्वाधान में किया गया।  समरस संस्थान की राष्ट्रीय अध्यक्ष डॉ. शशि जैन ने बताया कि  राजस्थान सहित उत्तरप्रदेश, उत्तराखंड, ओडिशा, गुजरात, महाराष्ट्र, झारखंड, पश्चिमी बंगाल राज्यों के चार वर्ग में आयोजित प्रतियोगिता में 89 प्रतियोगियों ने भाग लिया। विजेता प्रतियोगियों को शीघ्र ही कार्यक्रम में प्रमाण पत्र से पुरस्कृत किया जाएगा।
 पुरुष वर्ग के लिए साहित्यकार वैदेही गौतम और विजय जोशी निर्णायक रहे। इस वर्ग में 27 प्रतियोगियों में प्रथम स्थान पर संयुक्त रूप से भाटूंद जिला पाली के विनोद कुमार दवे , मथुरा के अंजीव अंजुम और अल्मोड़ा उत्तराखंड के डॉ.पवनेश ठकुराठी  का चयन किया गया। द्वितीय स्थान पर संयुक्त रूप से पाली के श्रीराम वैष्णव कोमल, बाड़मेर के नरसिंगाराम  जीनगर निजरूप , कोटा के डॉ. रघुराज सिंह कर्मयोगी एवं विष्णु शर्मा ‘हरिहर ‘ रहे। तृतीय स्थान पर संयुक्त रूप से झालावाड़ के राकेश कुमार नैयर, जोधपुर के, महेश सोलंकी और छबड़ा जिला बारां के टीकम चन्दर ढोडरिया रहे।
महिला वर्ग में रामेश्वर शर्मा रामू भैया कोटा, रेखा लोढ़ा भीलवाड़ा और दिनेश कुमार माली ओडिशा निर्णायक रहें। इस वर्ग में प्राप्त 40 प्रविष्टियों में संयुक्त रूप से प्रथम  कोटा की डॉ. अपर्णा पांडेय , स्नेहलता शर्मा, श्यामा शर्मा और बूंदी की सुमन लता शर्मा रहे। द्वितीय स्थान पर संयुक्त रूप से जयपुर की डॉ. प्रीति शर्मा, कोटा की  मंजू किशोर’रश्मि’, अर्चना शर्मा और भीलवाड़ा की शिखा अग्रवाल रहे।
तृतीय स्थान पर संयुक्त रूप से उदयपुर की  डॉ.प्रियंका भट्ट, जयपुर की सुशीला शर्मा, कोटा की पल्लवी दरक रहे।
युवा वर्ग में डॉ. अपर्णा पाण्डेय और डॉ. प्रभात कुमार सिंघल निर्णायक रहे। इस वर्ग में कुल 11 प्रतियोगियों में से प्रथम भवानीममंडी की शुभांगी शर्मा, द्वितीय कोटा की ज्योतिरमयी एवं तृतीय स्थान पर बकानी झालावाड़ की अदिती शर्मा ‘सलोनी’ रहें।
बाल वर्ग में साहित्यकार श्यामा शर्मा और डॉ . प्रभात कुमार सिंघल निर्णायक रहे। इस वर्ग में कुल 11 बाल प्रतियोगियों में पलल्वन उच्च प्राथमिक स्कूल झालावाड़ के कक्षा 4 के मीस्टी माल्या प्रथम, याना शर्मा द्वितीय और कक्षा 9 की नमामि शर्मा रही।
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डॉ. प्रभात कुमार सिंघल
पत्रकार, कोटा

लैंगिक भेद मिटाना सामूहिक जिम्मेदारी – नूपुर प्रसाद

दिल्ली। हिन्दू महाविद्यालय में अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस की पूर्व संध्या पर महिला विकास प्रकोष्ठ द्वारा परिचर्चा का आयोजन किया। आयोजन में कॉलेज की प्राचार्य प्रो अंजू श्रीवास्तव एवं  उप प्राचार्य प्रो रीना जैन ने परिचर्चा में भाग लेने आई अपने अपने क्षेत्रों की विदुषी महिलाओं का स्वागत किया। परिचर्चा में भारतीय पुलिस सेवा की वरिष्ठ अधिकारी नूपुर प्रसाद ने अलग-अलग स्तरों पर स्त्रियों के साथ होने वाले शोषण और विभिन्न क्षेत्रों में असमान प्रतिनिधित्व पर  तथ्यों को प्रस्तुत करते हुए बताया कि स्त्री सशक्तीकरण राजनीतिक, आर्थिक और सामाजिक संसाधनों तक महिलाओं की पहुँच सम्भव करता है। प्रसाद ने आर्थिक क्षेत्र में असमान वेतन दर और इस असमानता को कम करने के तरीकों पर भी विस्तार से चर्चा की। कार्य क्षेत्र में असमानता और शारीरिक शोषण जैसे संजीदा मुद्दों पर बोलते हुए उन्होंने ज़ोर दिया कि लैंगिक भेद को कम करने में केवल स्त्रियों की नहीं अपितु पूरे समाज की समान भूमिका होती है।

भारतीय राजस्व सेवा की वरिष्ठ अधिकारी शुभ्रता प्रकाश ने पुराने समय की स्त्री समस्याओं और समय के साथ उसके बदलते स्वरूप की चर्चा की। प्रकाश ने अवसाद की दोहरी लड़ाई का उल्लेख करते हुए बताया कि स्त्रियों के लिए मानसिक स्वास्थ्य किस तरह सर्वाधिक महत्वपूर्ण हो जाता है।  उन्होंने अपने सेवा काल के अनुभवों का उल्लेख करते हुए कहा कि सामाजिक समानता के लिए प्रत्येक मोर्चे पर बहुत अधिक चुनौतियाँ हैं जिनसे लड़कर ही बदलाव संभव होगा।

मनोविज्ञान की विशेषज्ञ और सलाहकार वसुधा चतुर्वेदी ने परिचर्चा में कहा कि स्त्रियों के लिए अपनी देखभाल या सेल्फ केयर अभी भी एक अज्ञात विचार है, जबकि वे ख़ुद सभी की जरूरतों का पूरा खयाल रखतीं हैं। खुद की मानसिक जरूरत और देखभाल उनकी वैचारिक और व्यवहारिक परिधि से बाहर की बात है। चतुर्वेदी ने मनोवैज्ञानिक उदाहरण देकर अपनी बात को स्पष्ट किया और युवा महिलाओं आह्वान किया कि वे सेल्फ केयर को आवश्यक समझें ताकि समाज की वास्तविक बेहतरी हो सके।

होम्योपैथी की चिकित्सक डॉ गीता सिद्धार्थ ने कहा स्त्रियों को एक जीवन काल में चार बार जन्म लेना पड़ता है। पहली बार जब उसका जन्म होता है, दूसरी बार जब वह युवती होती है,  तीसरी बार जब वह माँ बनती है और चौथी बार जब उसका मेनोपोज़ होता है। इन चारों पड़ावों से जुड़े स्वास्थ्य और मनोवैज्ञानिक  पक्षों को विस्तार से बताते हुए डॉ सिद्धार्थ ने शारीरिक जागरूकता के सम्बन्ध में होम्योपैथी की उपयोगिता बताई।

योग एवं प्राकृतिक चिकित्सक डॉ दीपाली ने विविध क्रियाकलापों के माध्यम से शारीरिक तनाव  कम करने के तरीके बताए और इनके महत्त्व को स्पष्ट किया। आपने रोज़मर्रा के जीवन में सेल्फ केयर की महत्ता और सेल्फ टॉक (स्वयं से बात करना) के मानसिक स्वास्थ्य पर होने वाले सकारात्मक और जादुई प्रभावों की ओर भी ध्यान इंगित किया।

आयोजन में  डॉ मनीषा पांडे, डॉ अनिरुद्ध प्रसाद, डॉ पल्लव एवं अभय रंजन ने वक्ताओं का फूलों से अभिनन्दन किया। प्रकोष्ठ की छात्राओं अनुजा दीक्षित, भव्या शुक्ला, स्मृति और तनिष्का ने मंच संचालन किया। प्रकोष्ठ अध्यक्ष अवंतिका और उपाध्यक्ष रुचिका ने अतिथि परिचय दिया। अंत में महिला विकास प्रकोष्ठ की परामर्शदाता डॉ नीलम सिंह ने धन्यवाद ज्ञापित किया और कहा कि महिला दिवस का आयोजन सशक्तीकरण को प्रतिबिंबित करता है। परिचर्चा में राष्ट्रीय सेवा योजना के  स्वयं सेवकों, विद्यार्थियों और शोधार्थियों की भारी उपस्थिति रही।

अभिनव झा
महिला विकास प्रकोष्ठ
हिन्दू महाविद्यालय
दिल्ली

             

 

योग वशिष्ठः मन की छुपी चेतना और ब्रह्माण्ड के रहस्यों को उजागर करने वाला ग्रंथ

योग वशिष्ठ एक बहुत ही महत्वपूर्ण ग्रंथ है, लेकिन यह शायद दुनिया में उतना प्रसिद्ध नहीं है, जितना कि भगवद गीता है। इस ग्रंथ में एक ब्रह्मांड विज्ञान है जो सबसे आधुनिक है। इसमें भौतिकी के ऐसे सिद्धांत हैं जो न केवल परमाणु हैं, बल्कि उप-परमाणु भी हैं; और, जो अत्यंत महत्वपूर्ण है, यह एक ऐसा दृष्टिकोण देता है जो एक ही समय में भव्य और सूक्ष्म दोनों है। हाल ही में मैं लुईस थॉमस द्वारा लिखित लाइव्स ऑफ ए सेल नामक एक बहुत ही रोचक पुस्तक पढ़ रहा था, जिसमें उन्होंने मानव शरीर का ब्रह्मांडीय आयामों में वर्णन किया है, जिसका अर्थ है कि इस शरीर में प्रत्येक कोशिका एक विशाल जीव है जिसके भीतर स्वतंत्र जीव हैं, जो स्वयं अन्य जीवों को आश्रय देते हैं – दुनिया के भीतर दुनिया। यह योग वशिष्ठ के मूल सिद्धांत के बारे में है। थॉमस कहते हैं कि उनके अध्ययन के आधार पर, वे पृथ्वी को एक जीव के रूप में भी नहीं देखते हैं। दुनिया का सबसे अच्छा दृश्य यह हो सकता है कि यह एक एकल कोशिका है। वशिष्ठ एक सुंदर कहानी देते हैं जो बिल्कुल इसी से मिलती जुलती है। यदि कोई ऐसा दृष्टिकोण रखता है, तो मुझे लगता है कि हमारी दृष्टि को परेशान करने वाले सभी विभाजन गायब हो जाएंगे। आप और मैं, जिसमें कुत्ता भी शामिल है, न केवल एक हैं, बल्कि हम सभी कोशिकाएं हैं – एक कोशिका के भीतर छोटी-छोटी चीजें।

इस धर्मग्रंथ में स्वास्थ्य से जुड़े अद्भुत संकेत, मनोदैहिक सिद्धांत, ध्यान और पूजा के लिए अद्भुत निर्देश और युद्ध के बारे में निर्देश नहीं तो सुंदर वर्णन शामिल हैं। यह सब और साथ ही बेहद रोमांटिक कहानियाँ भी।

हालाँकि, हम वास्तव में इन सब से चिंतित नहीं हैं। हमारी ज़्यादातर समस्याएँ इन सवालों के इर्द-गिर्द घूमती हैं: हमारा जीवन क्या है? मैं क्या हूँ? मुझे क्या करना चाहिए? मैं यहाँ क्यों हूँ? हममें से कुछ लोग अपने जीवन में कभी न कभी इस बिंदु पर पहुँच जाते हैं जहाँ हमें लगता है: “मैं एक बेकार जीवन जी रहा हूँ। यह सब किस लिए है? मैं खुद को बहुत तुच्छ महसूस करता हूँ – एक सूखे पत्ते की तरह जो हवा में उड़ रहा है।” निराशा पैदा होती है – जिसे सेंट जॉन ऑफ़ द क्रॉस ने आत्मा की अंधेरी रात कहा होगा। इस सवाल का जवाब शास्त्र में निहित शिक्षा है।

वशिष्ठ ने शुरू में ही कहा है कि यह भावना कि मैं मानसिक रूप से बंधा हुआ हूँ और मैं इस कारागार से बाहर निकलना चाहता हूँ, इस ग्रंथ के अध्ययन से लाभ उठाने वाले की योग्यता है। यदि आत्मा इस अँधेरी रात का अनुभव करती है और प्रकाश की लालसा रखने वाली आत्मा को इस शिक्षा से अवगत कराया जाता है, तो वह तुरन्त प्रबुद्ध हो जाती है।

हमारे जीवन में निराशा और भय क्यों आते हैं? हम इस जीवन में किसी भी चीज़ से क्यों आसक्त हो जाते हैं? हम इस जीवन में किसी भी चीज़ से क्यों घृणा करते हैं? ये सब सुख की, मन की शांति की आशा या इच्छा से उत्पन्न होते हैं। यह आशा अनिवार्य रूप से हमें अपने विनाश की ओर ले जाती है, हमें दुःख की ओर ले जाती है। वसिष्ठ कहते हैं: “इस संसार से भागने के सभी विचार त्याग दो। यह जानने की कोशिश भी मत करो कि यह निराशा क्या है, जो कुछ भी एक क्षणिक घटना है, उसकी जाँच करने की कोशिश भी मत करो। अपने मन को उस चीज़ पर भी मत लगाओ जिसे असत्य माना गया है।”

एक श्लोक बहुत सुन्दर है:

भ्रमस्य जगतस्य ‘स्य जातस्य’ कसावर्णवत्
अपुनः स्मरणं मन्ये साधो विस्मरणं वरम्

संसार भ्रम है – एक दिखावा, भ्रम। वशिष्ठ संसार के दिखावे की तुलना आकाश के नीलेपन से करते हैं; हालाँकि वहाँ कुछ भी नीला नहीं है, फिर भी अगर आप इसे देखेंगे तो आपको नीला ही दिखाई देगा। यह भ्रम तब तक जारी रहेगा जब तक आप इसे देखते रहेंगे और आश्चर्य करते रहेंगे। आपने इस संसार को भ्रम में डाल दिया है और आपने लगातार यह सोचकर इस भ्रम को और मजबूत कर दिया है कि यह वास्तविक है या अवास्तविक। वसिष्ठ कहते हैं: “कुछ और सोचना बेहतर है।”

वास्तविकता क्या है? जो है, वही वास्तविक है। निम्नलिखित उदाहरण शास्त्र में अक्सर आता है: सोने से बना एक कंगन है। कंगन एक ऐसा शब्द है जिसका हम परंपरागत रूप से इस्तेमाल करते आए हैं। हम इसे एक रूप के रूप में भी देखते हैं और जैसे ही रूप दिखता है, यह मन में एक अवधारणा और एक शब्द उत्पन्न करता है। अगर हम शब्द को हटा दें और रूप को देखें, तो हम एक बहुत ही दिलचस्प खेल खेल सकते हैं: क्या यह सोना है या कंगन? दोनों। सिर्फ़ एक चीज़ दो कैसे हो सकती है? पदार्थ सोना है; वास्तविकता सोना है। यह एक निश्चित रूप में दिखाई देता है और परंपरा ने इसे एक नाम दिया है।

अगर यह स्पष्ट है, तो सब कुछ स्पष्ट है। उदाहरण के लिए, अगर किसी ने मुझे मूर्ख कहा, तो उस पर प्रतिक्रिया करके, मैं यह स्वीकार कर रहा हूँ कि मैं मूर्ख हूँ। इस कथन का एक निश्चित मनोवैज्ञानिक रूप था, लेकिन इसकी वास्तविकता भीतर की शुद्ध चेतना के अलावा और कुछ नहीं है। बाहरी दुनिया में कुछ ऐसा हुआ जिसने मुझे निराशा के इस सागर में धकेल दिया। मैं डर गया और मैंने इस पर गौर करने की जहमत नहीं उठाई, क्योंकि मैंने बाहरी परिस्थिति को कुछ वास्तविक मान लिया। और इसलिए मेरा ध्यान पूरी तरह से इस बाहरी अनुभव की ओर चला गया। अगर मैं मूर्ख नहीं हूँ, तो मुझे उस पर प्रतिक्रिया क्यों करनी चाहिए? ऐसी स्थिति में, क्या मैं वास्तविकता की तलाश कर सकता हूँ? मैं जिसे दूसरा व्यक्ति कहता हूँ, उसकी वास्तविकता क्या है? उस शरीर, उस मन की वास्तविकता क्या है? साथ ही वह वास्तविकता क्या है जिसे मैं खुद कहता हूँ, जो प्रतिक्रिया करती है? क्या ये दोनों पूरी तरह से अलग और स्वतंत्र वास्तविकताएँ हैं? इस दोहरी जाँच को एक साथ जारी रखना है, एक के बाद एक नहीं। विषय और वस्तु को एक साथ देखना है।

योग वशिष्ठ के एक शिष्य ने पाया कि आत्मज्ञान में केवल तीन चरण होते हैं: एक आभास होता है; आभास के पीछे क्या तत्व है? मन। मन का तत्व क्या है, और यह सब कौन समझता है? इसका उत्तर है शुद्ध चेतना। उस चेतना में आप और मैं, विषय और वस्तु, विभाजित प्रतीत होते हैं।

चेतना, सर्वव्यापी और अनंत होने के कारण, हर जगह अनंत तरीकों से खुद को प्रकट करती है (कोई अन्य शब्द संभव नहीं है)। इस विविधता का गायब होना संभव नहीं है, लेकिन जो गायब हो सकता है और होना चाहिए वह है इसे एक दूसरे के विपरीत विभिन्न वस्तुओं के रूप में देखना। अनंत हर समय अनंत रहता है और अनंत अपने भीतर सृष्टि में इन सभी की कल्पना करता है।

हमें एक सुंदर प्रतीकात्मकता दी गई है: वसिष्ठ कहते हैं कि यह वस्तुगत रचना संगमरमर की पटिया पर बिना काटे गए आकृतियों की तरह है – आप एक मूर्तिकार हैं और आप उन सुंदर आकृतियों के बारे में सोचते हैं जिन्हें आप उसमें से तराश सकते हैं। वे सभी आकृतियाँ पहले से ही, संभावित रूप से, उसमें मौजूद हैं। आप एक बड़े बुद्ध की कल्पना कर सकते हैं या आप बुद्ध की उस एक आकृति में सैकड़ों छोटे बुद्धों की कल्पना कर सकते हैं। इस तरह से यह पूरी दुनिया मौजूद है।

दुनिया एक वास्तविकता के रूप में मौजूद नहीं है; दुनिया एक शब्द है और इसका एक मनोवैज्ञानिक रूप है। मनोवैज्ञानिक रूप चेतना में उठने वाले भ्रम से ज़्यादा कुछ नहीं है। इसे एक स्वतंत्र वास्तविकता के रूप में स्वीकार करते हुए, हम एक चीज़ का पीछा करते हैं और दूसरी चीज़ को अस्वीकार करते हैं। ये सभी अनुभव फिर से मन पर छाप छोड़ते हैं, बंधन को मजबूत करते हैं या यूँ कहें कि बंधन के बारे में हमारे विचार को मजबूत करते हैं।

बाह्य जगत और बाह्य परिस्थितियाँ इस ब्रह्माण्डीय चेतना (जिसे आप ईश्वर कहते हैं) में उत्पन्न होती हैं; वही चेतना इन बाह्य परिस्थितियों का अनुभव करती है और इन्हें व्यक्तिपरक अनुभव कहते हैं, जो बदलते रहते हैं – बस इतना ही। यह समझ लेने पर तुम इन दिखावों को ही वास्तविकता मानने के भ्रम से मुक्त हो जाते हो। वसिष्ठ कहते हैं, मुक्त होने पर तुम निष्क्रिय नहीं बैठते, तुम जीवन के प्रवाह को अस्वीकार करते हो। अंत में वसिष्ठ सलाह देते हैं: इस संसार में वैसे ही जियो जैसे यहाँ जीवन जिया जाता है, लेकिन सभी दुखों से पूरी तरह मुक्त होकर। फिर अगर तुम्हें रोना है, तो रोओ; अगर तुम्हें दुख व्यक्त करना है, तो दुख व्यक्त करो; अगर तुम्हें खुशी और आनंद व्यक्त करना है, तो करो – क्योंकि तुम मुक्त हो।

मैंने सिर्फ़ एक ही व्यक्ति को देखा है जो इस विवरण को मापता है- मेरे गुरु, स्वामी शिवानंद, जो पूरी तरह से प्रबुद्ध और मुक्त व्यक्ति थे और पूरी तरह से इंसान भी। अगर आप उनके पास कोई दुखद कहानी लेकर जाते, तो आपके आंसू बहने से पहले ही आप उनकी आंखों में आंसू देख लेते; अगर आप उन्हें कुछ खुशी की बात बताते, तो वे आपसे ज़्यादा खुश होते। वे पूरी तरह से उन्मुक्त थे; मनोवैज्ञानिक और आध्यात्मिक रूप से मुक्त; वे बेहद व्यस्त रहते थे- इसलिए नहीं कि वे कुछ हासिल करना चाहते थे, बल्कि इसलिए कि उन्हें एहसास हो गया था कि जीवन में उपलब्धि या असफलता दोनों ही अप्रासंगिक हैं।

आपका जीवन आपका जीवन नहीं है। यह इस ब्रह्मांडीय सत्ता का हिस्सा है और जो कुछ भी ब्रह्मांडीय सत्ता तय करती है, उसे होना ही है। इसका सीधा बोध समर्पण है। इसे देखने के लिए आपको इस निराशा से गुजरना होगा। आपको यह सीधा बोध होना चाहिए कि आप जो चाहते हैं, वह नहीं होता। अगर आप कुछ चाहते हैं, तो उसके लिए काम करें और अगर वह हो जाए, तो वसिष्ठ कहेंगे कि यह एक आकस्मिक संयोग है। यह हर बार नहीं होता और आपने देखा होगा कि अक्सर ऐसा नहीं होता। जब कोई यह देखता है, तो वह पूरी तरह से समर्पण कर देता है और उस समय वह अपना ध्यान इन सभी लालसाओं, इच्छाओं, आशाओं और चिंताओं के स्रोत की ओर केंद्रित करता है और मन के आमने-सामने आता है। उसे पता चलता है कि वह मन ही शुद्ध चेतना है। इसमें सशर्त प्रेरणाएँ दिखाई देती हैं और यहाँ तक कि वह दिखावा भी त्याग दिया जाता है। वह एक पूरी तरह से मुक्त, तत्काल मुक्त और दिव्य जीवन है।

जब तक आपके भाव समृद्ध नहीं होंगे शब्द उसके साथ यात्रा नहीं करते: विजय जोशी

( युवा कवि व उपन्यासकार किशन प्रणय द्वारा वरिष्ठ कथाकार और समीक्षक विजय जोशी से साक्षात्कार )
जब तक आपके भाव समृद्ध नहीं होंगे शब्द उसके साथ यात्रा नहीं करते हैं। कृति समीक्षा में तुलना परिवेश को मार देती है। यह विचार वरिष्ठ कथाकार-समीक्षक विजय जोशी ने एक साक्षात्कार में बोलते हुए व्यक्त किए ।  युवा कवि-उपन्यासकार किशन प्रणय ने साक्षात्कार में वरिष्ठ कथाकार-समीक्षक विजय जोशी से ” कहानी कला और समीक्षा” पर चर्चा कर रहे थे। किशन प्रणय ने चर्चा करते हुए कहा कि कोटा में नया रचनाकार उभरता है या लिखने के लिए प्रयासरत् रहता है तो वह विजय जोशी जी के सम्पर्क में आकर उत्तरोत्तर अपने रचनाकर्म में प्रगति करता जाता है।
एक प्रश्न के जवाब में जोशी ने कहा कि लेखक की कृति की समीक्षा करते वक्त कई समीक्षक भारतीय संस्कृति को छोड़कर पाश्चात्य संस्कृति के लेखकों के विचारों से तुलना करने लग जाते हैं और यही तुलना अपने परिवेश के लेखक को मार देती है। मेरा मानना है कि जो किताब प्रायोजित होगी वो आपके विचारों को बाँध देगी और जो नैसर्गिक रूप से आयेगी वह आपके विचारों को खोल देगी और आपके पथ को प्रदर्शित कर देगी। मेरी समीक्षा पद्धति यही है। मेरी विचारधारा यही है कि आप रचनात्मकता को आधार देने के लिए वट वृक्ष तो बनें परन्तु उसे स्वयं ही सूर्य की किरणों की ओर जाने की प्रेरणा देते रहें। मेरी समीक्षाओं में यही कुछ है। हर पुस्तक में कोई न कोई सच्चाई होती है। नैसर्गिक रूप से लिखी पुस्तक विचारों को स्वयं उद्वेलित करती है। उन्होंने बिना किसी पूर्वाग्रह के रचना की समीक्षा करने पर बल दिया।
प्रणय ने विज्ञान के विद्यार्थी तथा वनस्पति शास्त्र में अधिस्नातक होते हुए हिन्दी और राजस्थानी में सतत् रूप से लेखन करने की बात कहते हुए जब साहित्य की ओर रुझान के बारे में जानना
चाहा तो विजय जोशी ने कहा कि मेरा जन्म राजस्थान के हाड़ौती अंचल की साहित्यिक एवं सांस्कृतिक नगरी झालावाड़ में हुआ और साहित्य और कला-संस्कृति पर लेखन अपने गुरु पिता श्री रमेश वारिद से विरासत में  मिला। साथ ही कला एवं संगीत के प्रति रूझान अपने सुसंस्कृत संयुक्त परिवार से प्राप्त हुआ। बचपन से किशोरावस्था तक चित्रकला और संगीत को समर्पित रहा। एम.एससी. करने के बाद वर्ष 1985 से विज्ञान-पर्यावरण सन्दर्भित लेखन प्रारम्भ किया। मेरा प्रथम आलेख ‘कटते हुए वृक्ष : गहराता हुआ प्रदूषण’ एक समाचार पत्र में 1985 में प्रकाशित हुआ। इसी प्रकार ‘कचरे के तेवर में कैद हुआ एक शहर’ तथा ‘शहर की नदी चम्बल को लील रहा प्रदूषण’ एवं ‘एक शहर ज़हरीली हवा में’ आलेख लिखे। यहीं से लेखन के प्रति आश्वस्ति और विश्वास बढ़ा और लेखन प्रारम्भ हुआ। साथ ही कला-समीक्षा और कला सन्दर्भित लेखन भी होता रहा। जहाँ तक कथा -साहित्य  की ओर प्रेरित होने की बात है तो यह भी सहज रूप में हुआ। वृक्षों से सम्बन्धित पहली कहानी ‘टीस’ लिखी। जिसका प्रसारण आकाशवाणी कोटा से हुआ। इससे मेरे कथा लेखन को प्रोत्साहन मिला ।
जोशी ने कहा  हिन्दी और  राजस्थानी में अब तक दो हिन्दी उपन्यास, पाँच हिन्दी कहानी संग्रह, चार हिन्दी समीक्षा आलेख ग्रन्थ, दो राजस्थानी कहानी संग्रह, एक राजस्थानी समीक्षा ग्रन्थ के साथ राजस्थानी अनुवाद जिसे बावजी चतर सिंह अनुवाद पुरस्कार मिला है।          राजस्थानी की भावाँ की रामझोळ और अभी अनुभूति के पथ पर : जीवन की बातें कृतियों को इंगित करते हुए प्रश्न किया कि आपकी कहानियों में आपका ही परिवेश या उसका अंश या यूँ कहें उसी की अनुभूति दिखती है, जबकि अभी की कहानियों में बनावटीपन दिखता है और वहीं भाषा के साथ थोड़ा खेलने की कोशिश करते हैं, तो आप यह बताएँ कि आपका जो भावात्मक पक्ष है क्या आपको लगता है वो कहानी को अधिक सुन्दर बनाता है या भाषा में तोड़-मरोड़ करके ? इस पर जवाब देते हुए विजय जोशी ने कहा कि जब तक आपके भाव समृद्ध नहीं होंगे शब्द उसके साथ यात्रा नहीं करते। मेरा मानना है कि शब्दों से खेलना इतना आवश्यक नहीं है जितना भावों के पथ पर चलना। साहित्य सृजन में शब्दों के साथ कभी भी खिलवाड़ नहीं करना चाहिए।भावनाओं के साथ शब्द स्वयं चलते हैं ।
चर्चा की विशेषता रही कि श्रोताओं की ओर से पूछे गए प्रश्नो लेखन, नवाचार और समीक्षा प्रक्रिया के उत्तर में विजय जोशी ने कहा कि साहित्य अपने समय के समाज की अभिव्यक्ति होता है जो आने वाली पीढ़ी का मार्ग तो प्रशस्त कर सकता है पर लेखन की दृष्टि से सामयिक नहीं हो सकता। इस संदर्भ में उन्होंने कई उदाहरण से अपनी बात को पुष्ट करते हुए कहा कि आज समय आ गया है जब हमें साहित्य में नवाचार के लिए सोचना होगा और नई सोच के साथ लिखना होगा। इसके लिए उन्होंने तुरन्त ईसी भाव-परिवेश से लेकर स्व रचित एक लघुकथा  सुनाई। उन्होंने स्पष्ट किया कि कहानियाँ अपने परिवेश के प्रति सजगता और भावों के प्रति समर्पण से उभरती है वहीं समीक्षा रचना के भीतर की संवेदना को ही नहीं वरन् है उसके सकारात्मक पक्ष के साथ सामाजिक सरोकारों को उजागर करती है।
गीत विधा में दखल रखने वाले जोशी के कला-संगीत के पक्ष को उजागर करने के साथ अंत में जब विजय जोशी से उनके प्रसिद्ध तथा लोगों द्वारा उनकी पसंद का गीत सुनाने की गुज़ारिश की तो विजय जोशी ने ‘रे  बंधु तेरा कहाँ मुकाम, भोर हुई जब सूरज निकला छूटा तेरा धाम”  जिस तान से सुनाया श्रोता गदगद हो गए।
प्रस्तुति : डॉ.प्रभात कुमार सिंघल

‘घुमक्कड़ी’ पढ़ते हुए आप सुध-बुध खोकर लेखिका के साथ-साथ चलते हैं

‘घुमक्कड़ी’ एक किताब नहीं नशा है और नशा भी ठीक वैसा ही जैसा घुमक्कड़ी में होता है। मनीषा कुलश्रेष्ठ का यात्रा संस्मरण ‘घुमक्कड़ी- अंग्रेज़ी साहित्य के गलियारों में’ जब उठाया तो पिछले पाठकीय अनुभवों के आधार पर मानस को तैयार कर ही लिया था कि इसमें है कुछ ख़ास और यक़ीनन मनीषा जी की लेखनी ने मानस को वही असीम तृप्ति दी जिसकी आशा बँधी थी। यह किताब सिर्फ यात्रा संस्मरण नहीं है यह एक संवेदनशील मन के साथ शेक्सपियर, वर्ड्सवर्थ, कीट्स, कॉलरिज, जेन आस्टेन जैसे कई कलमकारों को मन की गहराइयों से अभिस्पर्श करने का सुअवसर और सौभाग्य देती है।

जिस तन्मयता से इस किताब को लिखा गया है मेरे पाठक-मन ने उसी तल्लीनता से उसे पढ़ा और कहने से बच नहीं सकूँगी कि नशा अब भी तारी है… और मैं उसे दुबारा पढ़ रही हूँ उसी मनोयोग के साथ।

मनीषा कुलश्रेष्ठ की पूर्व प्रकाशित किताब ‘होना अतिथि कैलाश का’ पढ़कर मुझे कई दिनों तक कैलाश मानसरोवर के सपने आए और इस किताब के बाद मैं यक़ीन से कह सकती हूँ कि अब अंग्रेज़ी साहित्य के गलियारों में मेरा मन अटकता-भटकता रहेगा।

किताब की सबसे आकर्षक बात है मनीषा कुलश्रेष्ठ के कहन की सम्मोहित कर देने वाली जीवंत शैली। यूँ लगता है जैसे जो वे अनुभूत कर रही हैं वह सब हमारे भीतर पर्त दर पर्त उतर रहा है। और हर वह मशहूर किरदार आपको उसी तरह रोमांचित करता है जैसे रचनाकार ने महसूस करते हुए और फिर शब्दों में बाँधकर हम तक पहुँचाते हुए किया होगा।

अगर आपने अंग्रेज़ी साहित्य को पढ़ा है तो निश्चित रूप से कल्पना में आपने उन रचनाकारों की जीवनशैली को उकेरा होगा, यह किताब उसी कल्पना को सुंदरता और सहजता से साकार करती है और सार्थक रंग भी देती है।

सुध-बुध खोकर आप लेखिका के साथ-साथ चलते हैं, थकते हैं, रुकते हैं, दौड़ते हैं, मुस्कुराते हैं, भीगते हैं। यही तो यात्रा संस्मरण की सफलता है कि आप आप नहीं रहते हैं आप जादू भरी अनोखी दुनिया में किताब के माध्यम से प्रवेश कर जाते हैं। जब आप कीट्स के घर में होते हैं तो आपको उनकी पंक्तियाँ धुँधली सी याद आती हैं और चमत्कार तो तब होता है कि वही पंक्तियाँ अगले पेज (पेज 52) पर आपको छपी हुई मिलती है।

मनीषा कुलश्रेष्ठ इसमें लिखती हैं- मैं उत्साह से भरी हुई थी और मिलने विषाद से आई थी। कीट्स हाउस आकर यह तो तय था लौटना उदास होगा। एक युवा कवि जो अपना बेहतरीन लिखकर अपने वतन से दूर इटली में एक शांत सीले घर में, उस ज़माने की घातक बीमारी ट्यूबरक्यूलोसिस से जूझता हुआ महज 25 साल की उम्र में उस चहल पहल को छोड़कर चला गया जो उसके होने से थी।

मनीषा सिर्फ उन विशिष्ट जगहों पर जाकर हमें वहाँ की ख़ुशबू से सराबोर ही नहीं करती बल्कि वे संबंधित सवाल भी उठाती हैं और जवाब भी खोजती हैं। वे कोरी भावुकता से बचकर अपने स्तर पर विमर्श भी करती हैं, सोच को उद्वेलित करती हैं तो कभी अपनी पलकों की कोर से छलकी बूँद से हमारी मन धरा को सींच जाती हैं…

डिकेंस और कैथरीन के रिश्तों का गणित उन्हें बेचैन कर देता है-

”डिकेंस ने दावा किया कि कैथरीन बाद में एक अक्षम माँ और गृहणी बन गई थी और 10 बच्चे भी उनकी ज़िद का नतीजा थे…

वे अपनी डिकेंस के प्रति सम्मान की भावना को क़ायम रखते हुए भी सवाल कर उठती है.. इतने बरसों घर सहेजने वाली कैथरीन अचानक अक्षम गृहणी कैसे हो गई? क्या बच्चे एकतरफ़ा ज़िद से होते हैं? एक महान लेखक के कितने मूर्खतापूर्ण आरोप थे!”

इस किताब की महीन कारीगरी आपको उलझाती नहीं बल्कि रेशों-रेशों की कोमलता से अवगत कराती है। चाहे आर्थर कौनन डायल के गढ़े किरदार शरलॉक होम्स हों या टाइटैनिक का मार्मिक यथार्थ.. मनीषा की कलम उन्हें इस ख़ूबी से पाठक के सामने लाती है कि उनके अपने विचारों के नन्हे अंकुरण भी लहलहाते रहें और आँखों देखे जो स्निध फूल उन्होंने सँजोये हैं उनकी दृश्यावली भी घूमती रहे।

इस किताब के माध्यम से लेखिका ने यात्राओं के ज़रिए अपने प्रिय विदेशी लेखकों-शख्सियतों को क़रीब से देखने-जानने और महसूस करने का जो अनुभव सहेजा है उसे कई गुना ख़ूबसूरती से अभिव्यक्त भी किया है। अनुभूतियाँ अक्सर अभिव्यक्ति की पगडंडियों में अर्थ बदल देती हैं लेकिन यह किताब इस मायने में श्रेष्ठ कही जाएगी कि यहाँ अभिव्यक्ति ने व्यक्ति, विचार और वस्तुओं के अर्थों को पूरी प्रामाणिकता, भावप्रवणता और प्रभावोत्पादकता से प्रस्तुत किया है।

किताब की कई अच्छी बातों में एक यह भी कि चित्रों को अंतिम पृष्ठों पर स्थान दिया है ताकि पढ़ने की तंद्रा न टूटे और कल्पना के शिखर अंतिम पायदान पर दमकते हुए साकार हों। चाहे फिर वह फ्रायड का म्यूज़ियम हो, बैठे हुए ऑस्कर वाइल्ड हो, शेक्सपियर का स्मारक हो या फिर स्टोन हैंज में खोया जामुनी मफ़लर ही क्यों न हो। शिवना प्रकाशन से आई इस कृति का पढ़ कर पाठक कुछ समय के लिए किसी दूसरी दुनिया में खो जाता है। या एक बिलकुल नया तरीक़ा है यात्रा संस्मरण लिखने का, जिसमें यात्रा संस्मरण के बहाने स्त्री-विमर्श जैसे सरोकार पर पूरी मज़बूती से मनीषा कुलश्रेष्ठ न केवल अपना पक्ष रखती हैं बल्कि उसके सूत्र भी उन स्थानों पर तलाशते हुए चलती हैं। इस कारण यह केवल यात्रा वृत्तांत न रह कर स्त्री विमर्श का एक दस्तावेज़ बन जाता है। शिवना प्रकाशन ने इस किताब को बहुत ख़ूबसूरती के साथ प्रकाशित किया है। एक आवश्यक किताब है यह।

समीक्षक- स्मृति आदित्य
घुमक्कड़ी – (अंग्रेज़ी साहित्य के गलियारों में)
यात्रा संस्मरण
लेखिका – मनीषा कुलश्रेष्ठ
प्रकाशक- शिवना प्रकाशन, सम्राट कॉम्प्लैक्स बेसमेंट, बस स्टैंड के सामने, सीहोर मप्र 466001

मोबाइल- 9806162184, ईमेल- shivna.prakashan@gmail.com

मूल्य- 350रुपये

प्रकाशन वर्ष- 2025

स्मृति आदित्य

ईमेल- smritiadityaa@gmail.com

मोबाइल – 9424849649


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रामेश्वरम का रामसेतु धनुषकोडी औरअरिचल मुनई का इतिहास अनोखा है

रामसेतु को आज कई नामों से जाना जाता है। जैसे नल सेतु, सेतु बांध और एडम ब्रिज। इसे नल सेतू इसलिए कहा जाता है क्योंकि यह पुल बनाने का विचार वानर सेना के एक सदस्‍य नल ने ही अन्‍य सदस्‍यों को दिया था। इसलिए नल को रामसेतु का इंजीनियर भी कहते हैं।
इस पुल का नाम एडम्स ब्रिज इसलिए रखा गया है क्योंकि बाइबिल और कुरान के अनुसार, एडम ने ईडन गार्डन से निकाले जाने के बाद श्रीलंका से भारत तक पुल पार किया था। एडम्स ब्रिज का नाम कुछ प्राचीन इस्लामी ग्रंथों में भी आया है। राम सेतु भारत के पंबन द्वीप और श्रीलंका के मन्नार द्वीप के बीच चूना पत्थर की एक विशाल श्रृंखला है। मद्रास विश्वविद्यालय और अन्ना विश्वविद्यालय द्वारा किए गए एक अध्ययन के अनुसार, राम सेतु ब्रिज का निर्माण 18,400 साल पहले हुआ था।
रामसेतु तमिलनाडु के दक्षिण-पूर्वी तट से दूर पंबन द्वीप, जिसे रामेश्वरम द्वीप के नाम से भी जाना जाता है, श्रीलंका के उत्तर पश्चिमी तट पर मन्नार द्वीप के बीच चूना पत्थर की एक श्रृंखला मार्ग है। रामायण में इस बात का साफ तौर पर जिक्र है कि भगवान राम और उनकी सेना ने अपनी पत्नी सीता को बचाने लंका तक पहुंचने के लिए उस पुल का निर्माण करवाया था। भौगोलिक प्रमाणों से यह पता चलता है कि किसी समय यह सेतु भारत तथा श्रीलंका को भू मार्ग से आपस में जोड़ता था। हिन्दू पुराणों की मान्यताओं के अनुसार इस सेतु का निर्माण अयोध्या के राजा श्रीराम की सेना के दो सैनिक जो की वानर थे, जिनका वर्णन प्रमुखतः नल-नील नाम से रामायण में मिलता है, द्वारा किये गया था।
अर्थात करीब 1200 किलोमीटर थी। साइंस से जुड़े लोगों के मुताबिक, रामसेतु 35 से 48 किलोमीटर लंबा था तथा  यह मन्नार की खाड़ी (दक्षिण पश्चिम) को पाक जलडमरू मध्य (उत्तर पूर्व) से अलग करता है। कुछ रेतीले तट शुष्क हैं तथा इस क्षेत्र में समुद्र बहुत उथला है, कुछ स्थानों पर केवल 3 फुट से 30 फुट (1मीटर से 10 मीटर) जो नौगमन को मुश्किल बनाता है। रामायण (5000 ईसा पूर्व) का समय और पुल का कार्बन एनालिसिस का तालमेल एकदम सटीक बैठता है। हालांकि, आज भी ऐसा कोई वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है जो यह बताता है कि पुल मानव निर्मित है।यह सेतु तब पांच दिनों में ही बन गया था। इसकी लंबाई 100 योजन व चौड़ाई 10 योजन थी। इसे बनाने में रामायण काल में श्री राम नाम के साथ, उच्च तकनीक का प्रयोग किया गया था। रामसेतु के पत्थर करीब 7000 साल पुराने हैं।
15 वीं शताब्दी तक, पुल पर चलकर जा सकते थे।  गहराई तीन फीट से लेकर 30 फीट तक है। कई वैज्ञानिक रिपोर्टों के अनुसार, राम सेतु 1480 तक पूरी तरह से समुद्र तल से ऊपर था, लेकिन यहाँ एक चक्रवात आने से यह क्षतिग्रस्त हो गया था। 1480 तक पुल पूरी तरह से समुद्र तल से ऊपर था। हालांकि, प्राकृतिक आपदाओं ने पुल को समुद्र में पूरी तरह से डुबो दिया। इस प्रकार, यह कहा जा सकता है कि रामसेतु प्राकृतिक चूना पत्थर के शोल से बना एक पुल है। मन्दिर के अभिलेखों के अनुसार रामसेतु पूरी तरह से सागर के जल से ऊपर स्थित था, जब तक कि इसे 1480 ई० में एक चक्रवात ने तोड़ नहीं दिया। इस सेतु का उल्लेख सबसे पहले वाल्मीकि द्वारा रचित प्राचीन भारतीय संस्कृत महाकाव्य रामायण में किया गया था, जिसमें राम ने अपनी वानर (वानर) सेना के लिए लंका तक पहुंचने और रक्ष राजा, रावण से अपनी पत्नी सीता को छुड़ाने के लिए इसका निर्माण कराया था। राम सेतु के बारे में हम वाल्मिकी रामायण में बताते हैं। भगवान राम ने अपनी सेना के साथ राम सेतु पार किया और अपनी अपहृत पत्नी सीता को राक्षस राजा रावण से पार कराया। इसके बाद भगवान राम ने अपने धनुष और बाण से पुल को तोड़ दिया।
पूरे भारत, दक्षिण पूर्व एशिया और पूर्व एशिया के कई देशों में हर साल दशहरे पर और राम के जीवन पर आधारित सभी तरह के नृत्य-नाटकों में सेतु बंधन का वर्णन किया जाता है। राम के बनाए इस पुल का वर्णन रामायण में तो है ही, महाभारत में भी श्री राम के नल सेतु का उल्लेख आया है। कालीदास की रघुवंश में सेतु का वर्णन है। अनेक पुराणों में भी श्रीरामसेतु का विवरण आता है। एन्साइक्लोपीडिया ब्रिटेनिका मे राम सेतु कहा गया है। नासा और भारतीय सेटेलाइट से लिए गए चित्रों में धनुषकोडि से जाफना तक जो एक पतली सी द्वीपों की रेखा दिखती है, उसे ही आज रामसेतु के नाम से जाना जाता है।
राम सेतु का पत्थर आखिर पानी में कैसे तैरता है ये पहेली आज तक कोई भी वैज्ञानिक नहीं सुलझा पाया है. कोई इसे भगवान राम का चमत्कार कहता है तो कोई इसके पीछे साइंटिफिक कारण बताता है. मगर आज तक सही वजह नहीं पता चल पाई है. इस पर कई वैज्ञानिकों ने भी खोज की है. रामसेतु का पत्थर दुनियाभर में प्रसिद्ध है.
इस पुल को बनाने के लिए भगवान राम ने एक विशेष तरह के पत्थर का इस्तेमाल किया था, जिसे अग्निकुंड शिला कहा जाता है. नल-नील, भगवान विश्वकर्मा के वानर पुत्र थे।ये बचपन में बहुत शरारती थे। ये ऋषियों की पूजा सामग्री पानी में फेंक देते थे। परेशान ऋषियों ने नल-नील को श्राप दिया कि अब वे जो भी चीज़ पानी में फेंकेंगे वह डूबेगी नहीं। इस श्राप की वजह से इन दोनों के स्पर्श से पत्थर पानी पर तैरने लगे थे फलत : इनके द्वारा रामसेतु का निर्माण हो पाया। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, भगवान वरुण के आशीर्वाद और उन पत्थरों पर भगवान राम के नाम लिखे होने के कारण पत्थर पानी में नहीं डूबते हैं।राम ने हनुमान कोकोड भगवान धनुर्धर और श्रीलंका को जोड़ने वाला पुल बनाने का ऑर्डर दिया था। हनुमान राम के दिव्य वानर दोस्त थे और एक हिंदू देवता थे। जैसा कि कोई उम्मीद कर सकता है, हनुमान और उनकी वानर सेना ने पुल का निर्माण किया। हनुमान, बाली और सुग्रीव ने सेना का संचालन किया।कहते हैं ये पत्थर कभी पानी में डूबा नहीं है और ये पुल आज भी बना हुआ है. इस पुल को देखने के लिए दूर-दूर से सैलानी आते हैं और इस पत्थर का रहस्य जानना चाहते हैं. लेकिन इस रहस्य को कोई जान नहीं पाया है. सभी लोग इसको भगवान राम की महिमा कहते हैं. ये भगवान राम द्वारा बनाया गया पुल है.
पौराणिक प्रमाणों से इतर कई वैज्ञानिकों ने तैरते पत्थरों के पीछे विज्ञान के कुछ पहलुओं को उजागर किया है। वे कहते हैं कि राम सेतु ज्वालामुखियों के तैरते हुए पत्थर से बना है।
 गूगल अर्थ पर श्रीलंका और रामेश्वरम को जोड़ने वाले रामसेतु को गौर से देखने पर दोनों के बीच 50 किलोमीटर के रास्ते पर समुंद्र बेहद उथला दीखता है। यानी एक समय ऐसा भी रहा होगा जब श्रीलंका और रामेश्वरम के मध्य एक नॉर्मल रास्ता हुआ करता होगा जो धीरे-धीरे समुद्र में विलीन हो गया। 15 वी सदी तक लोग वहां से पैदल ही पार कर जाते थे। ये सेतू अगर किसी नदी पर बना होता तब उस पुल की वास्तविकता को सही तरीके से समझा जा सकता था।
 उथले समुंद्र में जहां का तापमान लगभग 20 डिग्री या उससे अधिक हो, प्रवालों द्वारा कैल्सियम कार्बोनेट का उत्सर्जन होता है, जो झालरदार या चट्टानी रुप भी ले लेते हैं जिसे कोरल रीफ कहा जाता है। यह भारत में अंडमान- निकोबार लक्षद्वीप और मन्नार की खाड़ी में स्थित दीखता है। उनके अनुसार राम सेतु में जो पत्थर दिखाई दे रहे हैं वो कोरल रीफ भी हो सकते हैं।
 राम सेतु के पत्थरों के बारे में कहा जाता है कि ये प्यूमिस स्टोन या अग्निकुंड शिला थे।ये पत्थर ज्वालामुखी के लावा से बने होते हैं और इनमें कई छेद होते हैं। इन छिद्रों की वजह से ये पत्थर हल्के होते हैं और पानी में तैरते रहते हैं। वैज्ञानिकों ने इसका अध्ययन किया और बाद में बताया कि रामसेतु के पत्थर अंदर से खोखले होते हैं। इसके अंदर छोटे-छोटे छेद होते हैं।पत्थरों का वजन
कम होने से इन पर पानी की ओर लगने वाला फोर्स इन्हें डूबने से रोक लेता है।
पानी में तैरने वाले ये पत्थर चूना पत्थर की श्रेणी के हैं। ज्वालामुखी के लावा से बने ये स्टोन अंदर से खोखले होते हैं। इनमें बारीक-बारीक छेद भी होते हैं। वजन कम होने और हवा भरी होने की वजह ये पानी में तैरते रहते हैं। वैज्ञानिक इसका नाम प्यूमिस स्टोन बताते हैं। प्यूमिस स्टोन वह पत्थर है जो पानी में नहीं डूबता। यह एक आग्नेय चट्टान है।यह ज्वालामुखी के विस्फोट के दौरान बनती है। यह पानी में नहीं डूबता क्योंकि इसका घनत्व कम होता है। इसमें कई छोटे-छोटे छिद्र होते हैं। इसमें हवा की छोटी-छोटी जेबें होती हैं। वैज्ञानिकों की मानें तो ये पुल चूना पत्थर, ज्वालामुखी से निकली चट्टानों और कोरल रीफ से बना हुआ है। इसी वजह से पानी के जहाज इस रास्ते से कभी नहीं गुजरते हैं। इन जहाजों को श्रीलंका का चक्कर लगाना पड़ता है। जब ज्वालामुखी का लावा ज़मीन के ऊपर तेज़ी से ठंडा होता है, तो लावा की ऊपरी सतह पर बुलबुले निकलते हैं। जब लावा ठंडा होने लगता है, तो इन बुलबुलों के कारण उनमें गुहाएं (cavity) बन जाती हैं। यही हवा उस पत्थर को इतना हल्का कर देती है कि वह पानी में तैरने लगता है। इसी क्रिया से प्यूमिस स्टोन बनता है।
नीलगिरी की पहाड़ियों में ज्वाला मुखी के विस्फोट बहुत हुए हैं। यहां से रामेश्वरम की दूरी 477 किमी है। भूविज्ञान में इन चट्टानों की पुरातनता अजोइक काल यानी 3000 से 500 मिलियन वर्ष पूर्व माना गया है।
रामायण के पात्र बालि सुग्रीव की राजधानी किष्किंधा नगरी थी। किष्किंधा नगरी कर्नाटक के हम्पी के आसपास बसी थी। हम्पी कभी विजयनगर साम्राज्य की राजधानी थी। किष्किंधा की चट्टानें बहुत मशहूर हैं। हो सकता है ये वहीं से लाई गई हों। सतह पर पहुँचने के बाद, यह अंततः ज्वालामुखी के गड्ढे के शिखर बिंदु से फट जाता है। जब यह पृथ्वी की सतह के नीचे होता है तो इसे मैग्मा के रूप में जाना जाता है और जब इसे सतह पर लाया जाता है तो राख के रूप में फट जाता है। हर विस्फोट के परिणाम स्वरूप ज्वालामुखी के मुहाने पर चट्टानों, लावा और राख की दीवार बन जाती है।
रामसेतु/एडम ब्रिज में ये पत्थर भौतिक रूप में तो देखे जा सकते हैं। रामसेतु पत्थर रामेश्वरम के पंचमुखी हनुमान मंदिर, रामेश्वरम में राम सेतु के पास कोथंडारामस्वामी  विभीषण मन्दिर के पास समुद्र तट भी मैने इसे देखा है।  इसके अलावा भारत के अनेक स्थलों पर भी इसे देखा जा सकता है।
जयपुर के खजाना महल संभवत देश का पहला ऐसा म्यूजियम है, जहां पर एक साथ 7 राम सेतु पत्थर के दर्शन करने का अनुभव लोगों को होता है। पटना में भी  गंगा नदी में तैरता एक पत्थर मिला। इस पत्थर पर भगवान श्रीराम का नाम लिखा है। अब इसे देख कुछ लोग हैरान हैं तो कुछ श्रद्धा से इसे निहारने पहुंच रहे हैं। यह खास पत्थर आलमगंज थाना अन्तर्गत राजा घाट के पास मिला है।इसे लेकर स्थानीय लोगों ने कहा कि पानी में तैरते पत्थर का वजन लगभग 12 किलोग्राम है। पत्थर को घाट स्थित शिव मंदिर के समीप रखा गया है।स्थानीय लोग इसके लिए मंदिर की स्थापना की तैयारी में जुट गए हैं।
छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में स्थित जैतु साव में रामसेतु का एक पत्थर रखा है। बताया जा रहा है कि 140 साल पहले इस पत्थर को रामेश्वरम से लाया गया था। यह पत्थर पानी में तैरता है। इस पत्थर के दर्शन के लिए लोगों का भारी जमावड़ा लगा रहता है।
धनुषकोडी का मतलब होता है, ‘धनुष की नोक’. यह भारत के तमिलनाडु राज्य के रामनाथपुरम ज़िले में स्थित एक अभूतपूर्व नगर है। धनुषकोडी, रामेश्वरम द्वीप के दक्षिण-पूर्वी कोने में है। सूरज, रेत और पानी समुद्र तट पर सबसे बेहतरीन अनुभव जो यात्रियों को आकर्षित करते हैं, वे यहीं धनुषकोडी में हैं। नीले समुद्र की विशालता और गहराई देखने लायक है; और तट पर अंतहीन आकर्षण का अनुभव करना भी उतना ही आसान है। धनुषकोडी में समुद्र तट का एक विशाल विस्तार है। यह श्रीलंका से लगभग 15 किलोमीटर दूर , मदुरै अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डा से लगभग 191 किमी दूर,रामेश्वरम स्टेशन से लगभग 24 किमी दूर तथा रामेश्वरम बस स्टैंड से लगभग 13 किमी दूर पर स्थित है। यहां से अरिचल मुनई (आखिरी भारतीय स्थल) लगभग 5 किमी रह जाता है। 15 किलोमीटर तक फैला धनुषकोडी बीच ऐसा बीच है, जहां अक्सर ऊंची लहरें उठती हैं। इस क्षेत्र में कई प्रवासी पक्षी जैसे गल्स और फ्लेमिंगो भी देखे जा सकते हैं, जो इस इलाके के प्राकृतिक आनंद को और बढ़ा देते हैं।
रामेश्वरम द्वीप के दक्षिणी किनारे पर स्थित यह एक भुतहा शहर बन गया है।। इसी स्थान के पास से सेतुबंध भी है। धनुषकोडी शहर पंबन द्वीप के दक्षिण-पूर्व में स्थित है। यह रामेश्वरम के मुख्य शहर से 20 किमी दूर स्थित एक स्थान है, जहां से राम सेतु का दर्शन किया जा सकता है। इस जगह तक पहुँचने के लिए मुख्य भूमि से पंबन द्वीप को पार किया जाता है। ऐसा करने का सबसे अच्छा तरीका पहले प्रसिद्ध पंबन ब्रिज के माध्यम से ट्रेन द्वारा था। अब तो सड़क मार्ग से ही जाया जाता है। यहीं से धनुषकोडी की यात्रा शुरू होती है, जहाँ से कई मछली पकड़ने वाले गाँव गुजरते हैं, साथ ही दोनों तरफ पाक जलडमरूमध्य के मनमोहक दृश्य भी दिखाई देते हैं। पाक जलडमरूमध्य भारत और श्रीलंका के बीच फैला हुआ है।
एक तरफ बंगाल की खाड़ी और दूसरी तरफ हिंद महासागर से घिरा धनुषकोडी कभी व्यापारियों और तीर्थयात्रियों दोनों के लिए एक महत्वपूर्ण बंदरगाह के रूप में कार्य करता था। धनुषकोडी और श्रीलंका (तब सीलोन के रूप में जाना जाता था) के एक शहर तलाईमन्नार के बीच नौका सेवाएं उपलब्ध थीं। ये नौकाएं माल और यात्रियों दोनों को समुद्र के पार एक देश से दूसरे देश में ले जाती थीं। धनुषकोडी शहर में सभी प्रकार की सुविधाएं थीं जिनकी एक यात्री को आवश्यकता होती है जैसे – होटल, धर्मशालाएं, और तीर्थयात्रियों, यात्रियों और व्यापारियों की सेवा करने वाली कपड़ा दुकानें आदि।  श्रीलंका इस शहर से सिर्फ 31 किमी की दूरी पर स्थित है। लेकिन ये सभी चीजें अब इतिहास बन चुकी हैं।
एक ऊबड़-खाबड़ सवारी के बाद, जो केवल 4×4 वाहनों पर ही संभव है, रास्ते में कुछ बड़े रेतीले इलाकों की बदौलत, धनुषकोडी का ‘भूत शहर’ दिखाई देता है। बहुत समय पहले, खासकर ब्रिटिश राज के दौरान, धनुषकोडी एक छोटा लेकिन समृद्ध शहर था। इसमें वह सब कुछ था जो एक भरे-पूरे शहर में होने की उम्मीद किया जाता है यथा- रेलवे स्टेशन, एक चर्च, एक मंदिर, एक डाकघर और घर और अन्य घरेलू बस्तुएं देखी जा सकती थी।
22 दिसंबर 1964 की रात कोकोडी और रामातारम् में एक बड़ा तूफान आया। हवा की गति 280 किलोमीटर प्रति घंटा थी और ज्वार की लहरें 23 फीट ऊपर उठ रही थी। पंबन-धनुषकोडी ट्रेन में मीटर ब्जॉइस लाइन पर सवार सभी 115 यात्री मारे गए। पूरे शहर में अलग-अलग जांच की गई और करीब 1,800 लोगों की जान चली गई। बाद में सरकार ने धनुकोड़ी को एक परित्यक्त शहर घोषित कर दिया।
तूफान के बाद रेल की पटारियां क्षतिग्रस्‍त हो गईं और कालांतर में, बालू के टीलों से ढ़क गईं और इस प्रकार विलुप्‍त हो गई। भगवान राम से संबंधित यहां कई मंदिर हैं। यह पूरा 15 किमी का रास्‍ता सुनसान और रहस्‍यमय है! पर्यटन इस क्षेत्र में उभर रहा है। भारतीय नौसेना ने भी अग्रगामी पर्यवेक्षण चौकी की स्‍थापना समुद्र की रक्षा के लिए की है और यात्रियों की सुरक्षा के लिए पुलिस की उपस्‍थिति महत्‍वपूर्ण है। धनुषकोडी में हम भारतीय महासागर के गहरे और उथले पानी को बंगाल की खाड़ी के छिछले और शांत पानी से मिलते हुए देख सकते हैं।
अरिचल मुनई (आखिरी भारतीय स्थल)से लगभग 5 किलोमीटर पश्चिम में धनुष्कोडी के बिखरे हुए अवशेष हैं।1964 के रामेश्वरम चक्रवात में धनुषकोडी नगर ध्वस्त हो गया था। इस चक्रवात में अनुमानित 1,800 लोगों की मौत हो गई थी. मद्रास सरकार ने धनुषकोडी को एक भूतहा शहर घोषित कर दिया था।
सड़क के उत्तरी किनारे पर एक परित्यक्त रेलवे स्टेशन है। स्टेशन का कुछ भी नहीं बचा है, जिसका मूल रूप से अंतरराष्ट्रीय कनेक्शन था, सिवाय तीन ऊंचे मेहराबों के।
धनुष्कोडी में सबसे लोकप्रिय आकर्षण बिना छत वाला परित्यक्त चर्च है। लंबे समय से परित्यक्त चैपल के दोनों ओर अस्थायी दुकानें थीं जो सीप से संबंधित सामान बेचती थीं। चर्च के बचे हुए हिस्से में केवल सामने का दरवाज़ा, कुछ मेहराब और वेदी का एक टुकड़ा है।
वर्तमान में, औसनत, करीब 500 तीर्थयात्री प्रतिदिन धनुषकोडी आते हैं और त्‍योहार और पूर्णिमा के दिनों में यह संख्‍या हजारों में हो जाती है, जैसे नए निश्‍चित दूरी तक नियमित रूप से बस की सुविधा रामेश्वरम से कोढ़ान्‍डा राम कोविल ( रामेश्वरम मंदिर) होते हुए उपलब्ध है और कई तीर्थयात्री को, जो धनुषकोडी में पूर्जा अर्चना करना चाहते हैं, उन्हें निजी वाहनों पर निर्भर होना पड़ता है जो यात्रियों की संख्‍या के आधार पर 50 से 100 रूपयों तक का शुल्‍क लेते हैं। संपूर्ण देश से रामेश्‍वरम जाने वाले तीर्थयात्रियों की मांग के अनुसार, 2003 में, दक्षिण रेलवे ने रेल मंत्रालय को रामेश्‍वरम से धनुषकोडी के लिए 16 किमी के रेलवे लाइन को बिछाने का प्रोजेक्‍ट रिपोर्ट भेजा है। यह धरातल पर अब तक नहीं आ सका है। धनुषकोडी ही भारत और श्रीलंका के बीच केवल स्‍थलीय सीमा है जो जलसन्धि में बालू के टीले पर सिर्फ 50 गज की लंबाई में विश्‍व के लघुतम स्‍थानों में से एक है।
धनुषकोडी और सिलोन के थलइ मन्‍नार के बीच यात्रियों और सामान को समुद्र के पार ढ़ोने के लिए कई साप्‍ताहिक फेरी सेवाएं थीं। इन तीर्थयात्रियों और यात्रियों की आवश्‍यकताओं की पूर्ति के लिए वहां होटल, कपड़ों की दुकानें और धर्मशालाएं थी।
धनुषकोडी के लिए रेल लाइन:- जो तब रामेश्‍वरम नहीं जाती थी और जो 1964 के चक्रवात में नष्‍ट हो गई, सीधे मंडपम से धनुषकोडी जाती थी। उन दिनों धनुषकोडी में रेलवे स्‍टेशन, एक लघु रेलवे अस्‍पताल, एक पोस्‍ट ऑफिस और कुछ सरकारी विभाग जैसे मत्‍स्‍य पालन आदि थे। यह इस द्वीप पर जनवरी 1897में तब तक था, जब स्‍वामी विवेकानंद सितंबर 1893 में यूएसए में आयोजित धर्म संसद में भाग लने के लेकर पश्‍चिम की विजय यात्रा के बाद अपने चरण कोलंबो से आकर इस भारतीय भूमि पर रखे।
हाल ही में, केंद्र सरकार ने राम सेतु ब्रिज की संरचना का स्टडी करने और राम सेतु की आयु और इसके बनने की प्रक्रिया जानने के लिए पानी के अंदर खोज और शोध करने की मंजूरी दी है। यह अध्ययन यह समझने में भी मदद करेगा कि क्या यह संरचना रामायण काल जितनी पुरानी है। साथ ही, राम सेतु ब्रिज को राष्ट्रीय स्मारक बनाने की मांग की जा रही है, हालांकि यह मामला विचाराधीन है। इसके साथ ही यह जानना और दिलचस्प हो जाता है कि क्या भारतीय पौराणिक कथाओं को आधुनिक समय की संरचनाओं से लिंक करने की संभावनाएं हैं। इसे इस लिंक से और आसानी से समझा जा सकता है –
अरिचल मुनई वह बिंदु है जहां हिंद महासागर बंगाल की खाड़ी से मिलता है और इस स्थान को धनुषकोडी से देखा जा सकता है।एक तरह से, अरिचल मुनई भारतीय महाद्वीप के अंत का प्रतीक है। मन्नार की खाड़ी और बंगाल की खाड़ी यहीं मिलती हैं।अरिचल मुनई पॉइंट का इतिहास काफी पुराना है. मान्यता है कि यह स्थान भगवान शिव और माता पार्वती के निवास स्थान था।
श्रीलंका का बंदरगाह शहर तलाईमन्नार, पाक जलडमरूमध्य से मात्र 35 किलोमीटर दूर है। शीर्ष पर अशोकन प्रतीक वाला एक स्तंभ टर्मिनस को चिह्नित करता है। यह भारत और श्रीलंका के बीच एकमात्र स्थलीय सीमा है। यह हिंद महासागर और बंगाल की खाड़ी के पानी का मिलन स्थल है। हिंदू मान्यताओं के मुताबिक, विभीषण के कहने पर श्री राम ने अपने धनुष के एक सिरे से सेतु को तोड़ दिया था। इसे इस लिंक से और अच्छी तरह से समझा जा सकता है  https://mindiafilms.com/arichal-munai-ram-setu-viewpoint-tamil-nadu-experience-india/
लेखक परिचय:-
(लेखक भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण, में सहायक पुस्तकालय एवं सूचनाधिकारी पद से सेवामुक्त हुए हैं। वर्तमान समय में उत्तर प्रदेश के बस्ती नगर में निवास करते हुए सम सामयिक विषयों,साहित्य, इतिहास, पुरातत्व, संस्कृति और अध्यात्म पर अपना विचार व्यक्त करते रहते हैं।

इति शिवहरे भाषा सारथी सम्मान से सम्मानित

इंदौर। उत्कृष्ट कविता एवं प्रांजल भाषा में लेखन करने वाली औरैया उत्तरप्रदेश निवासी कवयित्री इति शिवहरे को मातृभाषा उन्नयन संस्थान ने भाषा सारथी सम्मान से सम्मानित किया। इन्दौर प्रेस क्लब में आयोजित आवाज़ ए मालवा कवि सम्मेलन में संस्थान के राष्ट्रीय अध्यक्ष डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’, कवि पंकज दीक्षित व विवेक गौड़ ने सम्मानित किया।
हिन्दी भाषा के प्रसार के लिए लगातार कार्यरत मातृभाषा उन्नयन संस्थान अब तक एक हज़ार से अधिक साहित्यकारों को भाषा सारथी सम्मान से सम्मानित कर चुका है। और 30 लाख से अधिक लोगों के हस्ताक्षर अन्य भाषा से हिन्दी में बदलवा चुका है।
इस मौके पर कवि अमन जादौन, एकाग्र शर्मा, शुभम शर्मा, भरतदीप माथुर, राहुल शर्मा, जी आर वशिष्ठ, सचिन सावन, विशाल शर्मा आदि मौजूद रहे।