बरसों से इस देश में एक नारा चल रहा है हिंदुस्तान में रहना है तो वंदे मातरम् गाना होगा…लगता है अब यह नारा हकीकत बन रहा है, केंद्र सरकार ने निर्णय लिया है कि अब हर जगह वंदे मातरम् आधा अधूरा नहीं पूरा गना होगा।
केंद्रीय गृह मंत्रालय (MHA) ने भारत के राष्ट्रीय गीत ‘वंदे मातरम्’ के गायन को लेकर एक विस्तृत अधिसूचना जारी की है। इस अधिसूचना में दिशा-निर्देश हैं कि अब सरकारी कार्यक्रमों, स्कूलों और कई महत्वपूर्ण आयोजनों में ‘वंदे मातरम्’ बजना अनिवार्य होगा। सभी लोगों को खड़े होकर इसका सम्मान करना होगा, जैसे ‘राष्ट्रगान’ का होता है।
सबसे अहम बात है कि गीत के 3 मिनट 10 सेकेंड के पूरे 6 छंद बजाए जाएँगे, जिनमें से 4 छंद 1937 में कॉन्ग्रेस ने हटा दिए थे।
अधिसूचना में यह भी कहा गया कि जब भी राष्ट्रीय गीत और राष्ट्रगान दोनों को किसी भी कार्यक्रम में साथ गाया या बजाया जाए, तो सबसे पहले राष्ट्रीय गीत ‘वंदे मातरम्’ प्रस्तुत किया जाएगा।
सरकार ने तिरंगा फहराने, कार्यक्रमों में राष्ट्रपति के आगमन, राष्ट्र के नाम उनके भाषणों और संबोधनों से पहले और बाद में, और राज्यपालों के आगमन और भाषणों से पहले और बाद में सहित कई आधिकारिक अवसरों पर वंदे मातरम बजाना अनिवार्य किया है। हालाँकि, सिनेमा हॉल को नए नियमों से दूर रखा गया है। यानी सिनेमाघरों में फिल्म शुरू होने से पहले ‘वंदे मातरम’ बजाना और खड़ा रहना अनिवार्य नहीं होगा।
सरकार ने इस आदेश का उद्देश्य राष्ट्रीय प्रतीकों के सम्मान और उनके सही तरीके से पालन को सुनिश्चित करना है, ताकि सभी सरकारी और सार्वजनिक आयोजनों में एक समान प्रक्रिया अपनाई जा सके।
वंदे मातरम् भारत का राष्ट्रीय गीत है जिसकी रचना बंकिम चन्द्र चट्टोपाध्याय द्वारा की गई थी। इन्होंने 7 नवम्बर, 1876 ई. में बंगाल के कांतल पाडा नामक गाँव में इस गीत की रचना की थी। वंदे मातरम् गीत के प्रथम दो पद संस्कृत में तथा शेष पद बांग्ला भाषा में थे। राष्ट्रकवि रवींद्रनाथ टैगोर ने इस गीत को स्वरबद्ध किया और पहली बार 1896 में कांग्रेस के कलकत्ता अधिवेशन में यह गीत गाया गया। अरबिंदो घोष ने इस गीत का अंग्रेज़ी में और आरिफ़ मोहम्मद ख़ान ने इसका उर्दू में अनुवाद किया। ‘वंदे मातरम्’ का स्थान राष्ट्रीय गान ‘जन गण मन’ के बराबर है। यह गीत स्वतंत्रता की लड़ाई में लोगों के लिए प्ररेणा का स्रोत था।
बंकिमचन्द्र चटर्जी द्वारा संस्कृत और बाँग्ला मिश्रित भाषा में रचित एक गीत है जिसका प्रकाशन सन् १८८२ में उनके उपन्यास आनन्द मठ में अन्तर्निहित गीत के रूप में हुआ था। इस गीत से सदियों से सुप्त भारत देश जग उठा और आधी शताब्दी तक यह भारत के स्वतंत्रता संग्राम का प्रेरक बना रहा।
इस उपन्यास में यह गीत भवानन्द नाम के संन्यासी द्वारा गाया गया है। इसकी धुन यदुनाथ भट्टाचार्य ने बनायी थी। सन् २००३ में, बीबीसी वर्ल्ड सर्विस द्वारा आयोजित एक अन्तरराष्ट्रीय सर्वेक्षण में, जिसमें उस समय तक के सबसे मशहूर दस गीतों का चयन करने के लिये दुनिया भर से लगभग ७,००० गीतों को चुना गया था और बी.बी.सी. के अनुसार १५५ देशों/द्वीप के लोगों ने इसमें मतदान किया था उसमें वन्दे मातरम् शीर्ष के १० गीतों में दूसरे स्थान पर था।
डिजिटल युग ने भारत की अर्थव्यवस्था और सामाजिक जीवन को अभूतपूर्व गति प्रदान की है। मोबाइल बैंकिंग, यूपीआई, ई-कॉमर्स और ऑनलाइन सेवाओं ने लेन-देन को सरल, त्वरित और पारदर्शी बनाया है। आज एक सामान्य नागरिक भी कुछ सेकंड में देश के किसी भी कोने में धन भेज सकता है, बिल जमा कर सकता है या निवेश कर सकता है। यही डिजिटल क्रांति ‘नए भारत’ और ‘विकसित भारत’ की आधारशिला मानी जा रही है। किंतु इसी क्रांति के साथ एक गहरी विडंबना भी उभरकर सामने आई है-डिजिटल धोखाधड़ी और साइबर लूट की भयावह बढ़ोतरी। हजारों करोड़ रुपये की ऑनलाइन ठगी की घटनाएँ न केवल आमजन को आर्थिक रूप से आहत कर रही हैं, बल्कि देश की आर्थिक सुरक्षा और वित्तीय प्रणाली की विश्वसनीयता पर भी प्रश्नचिह्न लगा रही हैं।
डिजिटल व्यवस्था की मूल आत्मा ‘विश्वास’ है। जब कोई व्यक्ति मोबाइल स्क्रीन पर उभरे एक क्यूआर कोड को स्कैन करता है या किसी लिंक पर क्लिक करता है, तो वह केवल तकनीक पर ही नहीं, बल्कि उस संपूर्ण तंत्र पर भरोसा करता है जो उसे सुरक्षित लेन-देन का आश्वासन देता है। किंतु जब यही विश्वास ठगी, फर्जी कॉल, फिशिंग, निवेश घोटालों और पहचान चोरी के कारण टूटने लगता है, तब डिजिटल विकास की पूरी अवधारणा कमजोर पड़ने लगती है। यदि बैंकिंग व्यवस्था में नकली नोटों की भरमार हो जाए तो मुद्रा पर विश्वास डगमगा जाता है, उसी प्रकार यदि डिजिटल लेन-देन में ठगी सामान्य अनुभव बन जाए, तो नागरिक डिजिटल माध्यमों से दूरी बनाने लगते हैं। यह स्थिति केवल व्यक्तिगत हानि का प्रश्न नहीं, बल्कि राष्ट्रीय आर्थिक ढांचे के लिए भी खतरे की घंटी है। परंपरागत अपराधों और डिजिटल अपराधों की तुलना करें तो दोनों के स्वरूप और प्रभाव में महत्वपूर्ण अंतर दिखाई देता है। पहले चोरी या डकैती किसी सीमित भौगोलिक क्षेत्र तक सीमित होती थी, अपराधी की पहचान अपेक्षाकृत स्पष्ट होती थी और जांच प्रक्रिया स्थानीय स्तर पर संचालित होती थी। डिजिटल अपराधों में अपराधी अदृश्य है, वह किसी दूसरे राज्य या देश में बैठकर वारदात कर सकता है, और कुछ मिनटों में सैकड़ों लोगों को निशाना बना सकता है। पारंपरिक अपराध में जोखिम अपराधी के लिए अधिक था, डिजिटल अपराध में जोखिम कम और लाभ अधिक है। यही असंतुलन इसे अत्यंत खतरनाक बनाता है।
एक अन्य तुलनात्मक पक्ष यह है कि डिजिटल अपराधों में पीड़ित की मनोवैज्ञानिक स्थिति भी अलग होती है। ठगी का शिकार व्यक्ति स्वयं को अपराधी के सामने असहाय पाता है। पुलिस और साइबर क्राइम कार्यालयों के चक्कर लगाने के बाद भी जब उसे तकनीकी कारणों का हवाला देकर लौटा दिया जाता है, तो उसके भीतर व्यवस्था के प्रति गहरा अविश्वास जन्म लेता है। कई मामलों में यह देखा गया है कि शिकायत दर्ज करने की प्रक्रिया जटिल है, समुचित मार्गदर्शन नहीं मिलता, और समय पर कार्रवाई न होने से धन की रिकवरी असंभव हो जाती है। इससे यह धारणा बनती है कि डिजिटल अपराध का कोई वास्तविक दंड नहीं है। सरकार और न्यायपालिका ने समय-समय पर इस समस्या की गंभीरता को स्वीकार किया है। शीर्ष अदालत द्वारा ऑनलाइन धोखाधड़ी को आर्थिक सुरक्षा से जोड़कर देखना इस बात का संकेत है कि यह केवल व्यक्तिगत अपराध नहीं, बल्कि संगठित आर्थिक आक्रमण भी हो सकता है। किंतु नीति-निर्माण और क्रियान्वयन के बीच की दूरी अभी भी बनी हुई है। अनेक प्लेटफार्म और हेल्पलाइन स्थापित किए गए हैं, परंतु उनकी कार्यप्रणाली में त्वरित प्रतिक्रिया, पारदर्शिता और उत्तरदायित्व की कमी स्पष्ट दिखती है। यदि शिकायत के बाद प्रारंभिक “गोल्डन ऑवर” में ही बैंक खाते फ्रीज करने और ट्रांजैक्शन ट्रैक करने की प्रभावी व्यवस्था न हो, तो बाद की प्रक्रिया औपचारिकता बनकर रह जाती है।
वित्तीय प्रणाली की दृष्टि से देखें तो डिजिटल धोखाधड़ी का बढ़ना निवेश, उपभोग और बैंकिंग व्यवहार पर भी प्रतिकूल प्रभाव डालता है। यदि आमजन को यह आशंका सताने लगे कि ऑनलाइन निवेश योजनाएँ या भुगतान सुरक्षित नहीं हैं, तो वह नकद लेन-देन की ओर लौट सकता है। यह प्रवृत्ति सरकार की कैशलेस अर्थव्यवस्था की नीति को कमजोर करेगी। इसके अतिरिक्त, विदेशी निवेशकों के लिए भी यह संकेत नकारात्मक हो सकता है कि साइबर सुरक्षा का ढांचा पर्याप्त सुदृढ़ नहीं है। अतः यह केवल कानून-व्यवस्था का विषय नहीं, बल्कि आर्थिक नीति का भी केंद्रीय प्रश्न है। समाधान के स्तर पर तुलनात्मक रूप से देखें तो विकसित देशों ने साइबर सुरक्षा को राष्ट्रीय सुरक्षा के दायरे में रखा है। वहाँ विशेषीकृत एजेंसियाँ, उच्च प्रशिक्षित तकनीकी विशेषज्ञ, त्वरित डेटा साझा करने की प्रणाली और सख्त दंडात्मक प्रावधान हैं। भारत में भी साइबर क्राइम ब्यूरो और डिजिटल सुरक्षा तंत्र मौजूद हैं, परंतु उनकी क्षमता, संसाधन और प्रशिक्षण को और अधिक सुदृढ़ बनाने की आवश्यकता है। स्थानीय पुलिस बल को केवल पारंपरिक अपराधों की नहीं, बल्कि डिजिटल फॉरेंसिक, ब्लॉकचेन ट्रैकिंग और डेटा विश्लेषण की भी विशेषज्ञता दी जानी चाहिए। जब तक जांच एजेंसियाँ तकनीकी रूप से अपराधियों से एक कदम आगे नहीं होंगी, तब तक रोकथाम कठिन रहेगी।
एक महत्वपूर्ण पक्ष नागरिक जागरूकता का भी है। तकनीक जितनी उन्नत होती है, अपराधी भी उतने ही नए तरीके अपनाते हैं। अतः केवल सरकारी तंत्र पर निर्भर रहना पर्याप्त नहीं है। विद्यालयों, महाविद्यालयों और सामाजिक संगठनों के माध्यम से डिजिटल साक्षरता अभियान चलाना आवश्यक है, ताकि लोग संदिग्ध लिंक, कॉल और निवेश प्रस्तावों से सावधान रहें। किंतु यह भी ध्यान रखना होगा कि जागरूकता का दायित्व पीड़ित पर डालकर व्यवस्था अपनी जिम्मेदारी से मुक्त नहीं हो सकती। सुरक्षा का मूल दायित्व तंत्र का है, नागरिक का नहीं। भ्रष्टाचार और लापरवाही भी इस समस्या को जटिल बनाते हैं। यदि बैंक या भुगतान प्लेटफार्म समय पर कार्रवाई नहीं करते, या आंतरिक मिलीभगत से फर्जी खाते संचालित होते हैं, तो यह केवल तकनीकी त्रुटि नहीं, बल्कि संस्थागत विफलता है। इसलिए पारदर्शी ऑडिट प्रणाली, जवाबदेही और कठोर दंड अनिवार्य हैं। डिजिटल प्लेटफार्मों की केवाईसी प्रक्रिया को अधिक कठोर और वास्तविक बनाना होगा, ताकि फर्जी पहचान के माध्यम से खाते खोलना कठिन हो।
अंततः डिजिटल क्रांति का उद्देश्य सुविधा, पारदर्शिता और समृद्धि है। यदि यही क्रांति भय, असुरक्षा और अविश्वास का कारण बनने लगे, तो उसका नैतिक औचित्य कमजोर पड़ जाएगा। भारत जैसे विशाल देश में डिजिटल परिवर्तन को रोकना संभव नहीं, और न ही यह वांछनीय है। किंतु इसे सुरक्षित और विश्वसनीय बनाना अनिवार्य है। सरकार को नीति, तकनीक और प्रशासन-तीनों स्तरों पर समन्वित रणनीति अपनानी होगी। साइबर अपराध के विरुद्ध त्वरित कार्रवाई, पीड़ितों को समयबद्ध राहत, जांच एजेंसियों का सशक्तीकरण और वित्तीय संस्थानों की जवाबदेही-ये सब मिलकर ही धोखाधड़ी मुक्त डिजिटल परिवेश का निर्माण कर सकते हैं। डिजिटल भारत की सफलता केवल ऐप्स और आंकड़ों से नहीं, बल्कि उस विश्वास से मापी जाएगी जो नागरिक अपने मोबाइल स्क्रीन पर उभरते हर ट्रांजैक्शन संदेश के साथ महसूस करता है। यदि यह विश्वास सुरक्षित रहा, तो डिजिटल क्रांति राष्ट्र को नई ऊँचाइयों पर ले जाएगीय यदि यह टूट गया, तो समृद्धि का सपना भी अधूरा रह जाएगा। अतः समय की मांग है कि डिजिटल धोखाधड़ी को एक राष्ट्रीय चुनौती मानकर उसके समाधान की दिशा में ठोस, निर्णायक और पारदर्शी कदम उठाए जाएँ, ताकि विकसित भारत की आधारशिला मजबूत और अडिग रह सके।
पद्मश्री शेखर सेन का नाम आते ही वह व्यक्तित्व आँखों के सामने आ जाता है जिसने सुर-तुलसी-कबीर-विवेकानंद की एकल प्रस्तुतियाँ दी हैं। एक मुलाकात में सेन ने कहा था कि वे कलाकार हैं और खुद को माँजते रहते हैं। रविवार को गोस्वामी तुलसीदास पर आधारित हुई ‘तुलसी’ की 176वीं प्रस्तुति को उसी परिष्कार की तरह देख सकते हैं। पुणे के महाराष्ट्र एजुकेशन सोसाइटी के एमईएस सभागार कोथरूड में दर्शकों की न्यून उपस्थिति निराश करने वाली थी लेकिन कलाकार का अभिनय उससे ठीक विपरीत था। वे अपनी चिर-परिचित शैली में थे। आपसी बातचीत में उन्होंने सहज बताया कि वे बीमार चल रहे थे लेकिन ‘शो मस्ट गो ऑन’ को बीमारी रोक नहीं सकती थी तो दर्शकों की कमी क्या रोक पाती।
अपने होम प्रोडक्शन ‘संस्कृति सौरभ’ के बैनर तले की इस प्रस्तुति में वे गा रहे थे, अभिनय कर रहे थे। इसका लेखन-निर्देशन और संगीत संयोजन भी उनका ही था। उनका कितना कठिन परिश्रम और घंटों रियाज़ रहा होगा कि दो घंटे की पूरी प्रस्तुति उन्हें कंठस्थ थी। तुलसीदास का पूरा जीवन चरित्र उनके मुखाग्र था। वे जिस शैली में प्रस्तुत कर रहे थे उससे कहीं भी आत्मकथा की उकताहट नहीं हो रही थी। वे रो रहे थे, तुलसीदास के मित्र बजरंग बली से बातें कर रहे थे, बीच-बीच में मंच से वे किसी अदृश्य मनसुखा को आवाज़ दे रहे थे। मनसुखा ही क्यों, उनकी इस प्रस्तुति में कितने ही पात्र आए थे, सूर, रहीम और कबीर, राजा टोडरमल भी अपरोक्ष रूप से हाजिर थे।
कहा तो यह भी जाता है कि सूरदास से एक बार मथुरा में तुलसीदास की भेंट हुई थी और दोनों में मैत्री-भाव हो गया था। सूर से प्रभावित होकर ही तुलसीदास में ‘श्रीकृष्ण–गीतावली’ की रचना की थी। मंच पर अनदेखे काशी के पंडित थे, चित्रकूट के संत थे, अनाथ तुलसी को रामबोला नाम देने वाली पार्वती अम्मा थीं। जाने कितने किरदारों को वे अपनी एकल प्रस्तुति में सामने रख रहे थे। शास्त्रीय और लोक गायिकी की समझ भी उनके अभिनय का हिस्सा थी। तुलसी के जन्म से लेकर देवलोक गमन तक का वर्णन तुलसी रचित दोहों के साथ आगे बढ़ रहा था। वे किस्सा इस तरह बता रहे थे कि गोया तुलसीदास एक दिन के लिए पृथ्वी पर वापिस आ गए हों। निर्धन अनाथ की लगभग पाँच सौ साल पुरानी कहानी को दो घंटे में समाने का यह प्रयास था।
सबसे पहले आया अयोध्या कांड, जिसमें आया प्रचलित पद ठुमक चलत रामचंद्र… फिर आया उनकी पत्नी रत्नावली का वह प्रसिद्ध किस्सा जिसमें रत्नावली उनसे कहती है कि जितना प्रेम इस हाड़-मांस के शरीर के लिए है, उतना प्रेम राम के लिए हो तो मैं भी अपने आपको गौरवशाली महसूस करूँगी। तुलसीदास के जीवन का यही तो टर्निंग पॉइंट था। फिर रामचरित मानस, राम शलाका, हनुमान चालीसा का रचना-प्रसंग…घटनाओं के सिरे जुड़ते चले गए। रामलीला का प्रारंभ, बजरंग अखाड़ों की शुरुआत इतिहास की घटनाएँ भी काव्यात्मक शैली में आती गईं।
इस दौरान उन्होंने 52 गीतों की बानगी दी। रामायण का अवधी संस्करण तुलसीदास ने लिखा और शेखर सेन के मुख से भी भाखा, गरियाना जैसे शब्दों को सुनना ठेठ देसीपन की छाप छोड़ गया। वैसे हिंदी नाटकों को दर्शक नहीं मिलते कहकर गरियाने वाले नाटक देखने क्यों नहीं आते? हिंदी का रोना रोने वालों को हिंदी के आयोजनों को करना-कराना चाहिए, किताबें खरीदकर पढ़ना चाहिए, टिकट लेकर नाटक देखने आना चाहिए। या आपका चुनाव है मराठी-बंगाली की समृद्ध सांस्कृतिक परंपरा का हवाला देते रहिए, खुद कोई मिसाल कायम न कीजिए। यह नाटक भी बंगाली बाबू ने हिंदी की भक्ति परंपरा के श्रेष्ठ कवि तुलसीदास को लेकर खेला और देखने वालों में भी मराठी-बंगाली समुदाय के दर्शकों की संख्या अधिक थी, तो हिंदी के दर्शक कहाँ हैं? अब उन्हें भी हिंदी नाटक देखने और हिंदी नाट्य परंपरा को समृद्ध करने रंगमंच तक आना ही होगा।
लेखिका परिचयः स्वरांगी साने एक स्वतंत्र हिंदी अनुवादक, लेखिका और पत्रकार हैं, , उन्होंने विभिन्न भारतीय भाषाओं की फिल्मों, वैज्ञानिक दस्तावेजों और पुस्तकों का अंग्रेजी से हिंदी में अनुवाद किया है। वह समाचार पत्रों में संपादकीय जिम्मेदारी भी वहन कर चुकी है और वर्तमान में कला, साहित्य व संस्कृति पर स्वतंत्र लेखन कर रही हैं)
लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला के विरुद्ध अविश्वास प्रस्ताव लाने की तैयारी लोकतंत्र के लिये एक चिन्ताजनक घटना है। क्योंकि लोकतंत्र केवल शासन की एक प्रणाली नहीं, बल्कि निरंतर संवाद, असहमति के सम्मान और संस्थागत विश्वास पर टिकी हुई एक जीवंत परंपरा है। भारत जैसे विशाल और विविधतापूर्ण देश में संसद इस लोकतंत्र का सर्वोच्च मंच है, जहाँ न केवल नीतियाँ बनती हैं, बल्कि राष्ट्र की आत्मा बोलती है। ऐसे में जब लोकसभा अध्यक्ष जैसे संवैधानिक पद के विरुद्ध अविश्वास प्रस्ताव लाने की तैयारी की खबरें सामने आती हैं, तो यह घटना किसी एक व्यक्ति या दल तक सीमित न रहकर पूरे लोकतांत्रिक ढांचे पर प्रश्नचिह्न खड़ा कर देती है। विपक्षी दलों द्वारा यह आरोप लगाया जाना कि उन्हें, विशेषकर नेता प्रतिपक्ष को, सदन में बोलने का समुचित अवसर नहीं मिल रहा, और इसी आधार पर अध्यक्ष की निष्पक्षता पर सवाल उठाना, एक गहरी चिंता का विषय है। यह चिंता इसलिए भी अधिक गंभीर हो जाती है क्योंकि अध्यक्ष का पद परंपरागत रूप से सत्ता और विपक्ष के बीच संतुलन का प्रतीक माना जाता रहा है।
लोकसभा अध्यक्ष की भूमिका केवल कार्यवाही संचालित करने तक सीमित नहीं होती, बल्कि वह सदन की गरिमा, लोकतांत्रिक मर्यादा और सभी पक्षों के लिए समान अवसर सुनिश्चित करने की संवैधानिक जिम्मेदारी भी निभाते हैं। यदि विपक्ष का एक बड़ा वर्ग यह महसूस करने लगे कि अध्यक्ष का व्यवहार पक्षपातपूर्ण है या उनकी आवाज को व्यवस्थित रूप से दबाया जा रहा है, तो यह केवल राजनीतिक असंतोष नहीं, बल्कि संस्थागत अविश्वास का संकेत होता है। 100 से अधिक सांसदों द्वारा हस्ताक्षर कर अविश्वास प्रस्ताव लाने की तैयारी यह दर्शाती है कि मामला क्षणिक आक्रोश का नहीं, बल्कि लंबे समय से पनप रही असहमति और संवादहीनता का परिणाम है। लोकसभा अध्यक्ष सदन के संरक्षक की भूमिका में होते हैं, जिनके प्रति विश्वास जरूरी होता है और उनसे भी निष्पक्षता की उम्मीद की जाती है। हालांकि यह भी उतना ही सत्य है कि संख्या बल के आधार पर इस तरह का प्रस्ताव पारित होना कठिन है, लेकिन लोकतंत्र में कई बार प्रतीकात्मक कदम भी गहरे संदेश देते हैं।
विपक्षी दलों द्वारा यह स्पष्ट करना कि वे टकराव के साथ-साथ सुलह का विकल्प भी खुला रखे हुए हैं, और इसी क्रम में विभिन्न वरिष्ठ नेताओं का अध्यक्ष से मुलाकात कर संवाद का प्रयास करना, इस बात का संकेत है कि अभी भी समाधान की गुंजाइश समाप्त नहीं हुई है। यह स्थिति हमें यह सोचने पर मजबूर करती है कि आखिर संसद जैसे सर्वोच्च मंच पर संवाद की जगह हंगामा, नारेबाजी और गतिरोध क्यों हावी होता जा रहा है। क्या यह केवल सत्तापक्ष और विपक्ष के बीच अविश्वास का परिणाम है, या फिर संसदीय परंपराओं के क्षरण का संकेत? विगत वर्षों में बार-बार यह देखने को मिला है कि महत्वपूर्ण विधेयकों और राष्ट्रीय महत्व के मुद्दों पर गंभीर चर्चा के बजाय सदन की कार्यवाही बाधित होती रही है। इससे न केवल विधायी कामकाज प्रभावित होता है, बल्कि जनता के बीच यह संदेश भी जाता है कि उनके चुने हुए प्रतिनिधि अपने दायित्वों के प्रति गंभीर नहीं हैं।
लोकतंत्र की सबसे बड़ी शक्ति यह है कि वह असहमति को स्थान देता है। विपक्ष का काम केवल विरोध करना नहीं, बल्कि सरकार को जवाबदेह ठहराना और वैकल्पिक दृष्टिकोण प्रस्तुत करना भी है। इसके लिए सदन में बोलने का अवसर, प्रश्न पूछने की स्वतंत्रता और आलोचना का सम्मान अनिवार्य है। यदि विपक्ष यह महसूस करता है कि उसके लिए ये रास्ते संकुचित किए जा रहे हैं, तो उसका आक्रोश सड़कों या नारेबाजी के रूप में फूट पड़ता है, जो अंततः संसद की गरिमा को ही नुकसान पहुँचाता है। दूसरी ओर, विपक्ष द्वारा बार-बार सदन की कार्यवाही बाधित करना भी उतना ही गंभीर दोष है, क्योंकि इससे शासन की प्रक्रिया ठप होती है और जनता के मुद्दे पीछे छूट जाते हैं। इस दोतरफा अविश्वास और आक्रामकता के बीच लोकतंत्र का मूल उद्देश्य कहीं खोता हुआ दिखता है।
दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र में यदि संसद बार-बार हंगामे, निलंबन और गतिरोध की खबरों में रहे, तो यह अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी भारत की लोकतांत्रिक छवि को प्रभावित करता है। विकास, नीति और जनकल्याण की चर्चा के स्थान पर यदि टकराव और अविश्वास केंद्र में आ जाए, तो यह भविष्य के लिए शुभ संकेत नहीं है। लोकतंत्र की मजबूती केवल मजबूत सरकार से नहीं, बल्कि मजबूत विपक्ष और निष्पक्ष संस्थानों से भी आती है। लोकसभा अध्यक्ष जैसे पद से अपेक्षा की जाती है कि वह न केवल नियमों का पालन कराए, बल्कि विश्वास का सेतु भी बने। वहीं विपक्ष से भी यह अपेक्षा है कि वह विरोध को रचनात्मक बनाए, न कि अवरोध का माध्यम।
आज आवश्यकता इस बात की है कि संसद को फिर से संवाद का मंच बनाया जाए, जहाँ तीखी असहमति भी मर्यादा में व्यक्त हो और सत्ता व विपक्ष दोनों ही लोकतांत्रिक मूल्यों के प्रति अपनी प्रतिबद्धता दोहराएँ। अविश्वास प्रस्ताव जैसे कदम यदि चेतावनी के रूप में लिए जा रहे हैं, तो उन्हें आत्ममंथन का अवसर भी बनना चाहिए। प्रश्न यह नहीं है कि कौन सही है और कौन गलत, बल्कि यह है कि लोकतंत्र की संस्था को कैसे स्वस्थ, विश्वसनीय और प्रभावी बनाया जाए। जनता ने सांसदों को नारे लगाने या कार्यवाही बाधित करने के लिए नहीं, बल्कि देश के भविष्य पर गंभीर विमर्श के लिए चुना है। यदि संसद इस अपेक्षा पर खरी नहीं उतरती, तो लोकतंत्र की नींव कमजोर होती है।
यह भी तथ्य है कि लोकसभा अध्यक्ष के रूप में श्री ओम बिरला का संसदीय संचालन अब तक सामान्यतः अनुशासित, कार्यकुशल और नियमसम्मत माना जाता रहा है। उनके कार्यकाल में लोकसभा की कार्यवाही को समयबद्ध ढंग से आगे बढ़ाने, विधायी कार्यों को प्राथमिकता देने और विभिन्न दलों को साथ लेकर चलने का प्रयास स्पष्ट रूप से दिखाई देता है। अनेक अवसरों पर उन्होंने सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों के बीच संतुलन साधने की कोशिश की है तथा संसदीय परंपराओं और नियमों के पालन पर बल दिया है। उनकी छवि एक ऐसे अध्यक्ष की रही है जो सदन को सुचारु रूप से चलाने के लिए होशियारी, धैर्य और व्यावहारिक समझ का प्रयोग करते हैं। लोकतांत्रिक संस्थाओं के प्रति उनकी प्रतिबद्धता, संसदीय मर्यादाओं का आग्रह और संवाद के लिए दरवाज़े खुले रखने की प्रवृत्ति को देखते हुए उनके जैसे लोकसभा अध्यक्ष के विरुद्ध अविश्वास प्रस्ताव लाने की स्थिति अपने आप में एक त्रासद और चिंताजनक घटना प्रतीत होती है। यह घटना व्यक्ति विशेष से अधिक उस माहौल की ओर संकेत करती है, जहाँ अविश्वास इतना गहरा हो चुका है कि संवाद और विश्वास के पुल कमजोर पड़ते जा रहे हैं।
अंततः यह समय आरोप-प्रत्यारोप से आगे बढ़कर जिम्मेदारी स्वीकार करने का है। सत्तापक्ष को यह समझना होगा कि मजबूत विपक्ष लोकतंत्र की कमजोरी नहीं, बल्कि उसकी ताकत है। विपक्ष को यह स्वीकार करना होगा कि विरोध की भी एक मर्यादा और रचनात्मकता होती है। और अध्यक्ष जैसे संवैधानिक पदों को यह स्मरण रखना होगा कि उनकी निष्पक्षता केवल नियमों के पालन से नहीं, बल्कि व्यवहार और अवसर की समानता से भी सिद्ध होती है। यदि संसद को संवाद का मंच बनाए रखने में हम विफल रहते हैं, तो यह केवल एक सत्र या एक सरकार की विफलता नहीं होगी, बल्कि लोकतांत्रिक मूल्यों के प्रति हमारी सामूहिक असफलता मानी जाएगी। यही वह बिंदु है जहाँ हर नागरिक, हर जनप्रतिनिधि और हर संस्था को आत्मचिंतन करना होगा, ताकि विकास की राह में विनाश की संभावनाएँ नहीं, बल्कि संवाद, विश्वास और लोकतांत्रिक परिपक्वता का मार्ग प्रशस्त हो सके।
भारत और अमेरिका के मध्य अंतरिम व्यापार समझौते पर संयुक्त बयान जारी कर दिया गया है। साझा बयान के बाद अमेरिका के व्यापार प्रतिनिधि (यूएसटीआर) ने भारत का जो मानचित्र जारी किया उसमें पूरे जम्मू -कश्मीर जिसमें पाक अधिकृत गुलाम कश्मीर भी शामिल है को भारत का अविभाज्य अंग दिखाया गया है, इसमें न तो नियंत्रण रेखा दिखाई गई है और ना ही चीन के कब्जे वाले अक्साई चिन वाले हिस्से को अलग किया गया है। अमेरिका ने पहली बार भारत के मानचित्र को लेकर भारत के पक्ष का समर्थन किया है। इससे पूर्व अमेरिकी एजेंसियां प्रायः ही जम्मू -कश्मीर और अक्साई चिन के क्षेत्र को लेकर भारत के मानचित्र से छेड़छाड़ करती रही हैं । इस मानचित्र के कारण भारत के परंपरागत शत्रु चीन और पाकिस्तान तनाव में आ गए हैं।
स्मरणीय है कि 1957 में तिब्बत पर कब्जे के बाद चीन पूरे अक्साई चिन इलाके में बहुत ही सक्रिय हो गया था 1962 में भारत -चीन की ल़ड़ाई का मुख्य केंद्र बिंदु भी यही था। युद्ध में भारत को मिली पराजय के बाद लगभग 38 हजार वर्ग किलोमीटर का इलाका चीन के पास चला गया। इसी प्रकार 1947 के हमले के बाद से पाकिस्तान ने जम्मू कश्मीर के बड़े हिस्से पर कब्जा कर रखा है। इन्हीं दोनों क्षेत्रों को लेकर अमेरिका भारत के मानचित्र से छेड़छाड़ करता था अतः अमेरिका द्वारा भारत का सही मानचित्र जारी किया जाना उतना ही महत्वपूर्ण है जितना ये व्यापार समझौता। ऐसा लग रहा है कि वहीं भारत के विरोधी दल संसद में भारत -अमेरिका समझौते पर इतने स्पष्ठीकरण की मांग करके इसलिए भी हंगामा कर रहे हैं कि मानचित्र वाले विषय को छुपाया जा सके ।
यह भारत की राष्ट्र प्रथम की नीति का ही परिणाम है जो भारत बिना दबाव में आए अपने किसानों के हित में अडिग रहा और अंततः अमेरिका भारत के साथ न केवल व्यापार समझौता करने पर सहमत हुआ है वरन उसने भारत का सही मानचित्र भी जारी किया। भारत और अमेरिका के मध्य अंतरिम द्विपक्षीय समझौते की रूपरेखा तय होने के बाद नई संभावनाओं के द्वार खुलने की बात की जा रही है। विशेषज्ञ अपने अपने आकलन के अनुसार इस पर चर्चा कर रहे हैं । सोशल मीडिया प्लेटफार्म एक्स पर लिखा गया है कि इस समझौते को अगर “फादर ऑफ ऑल डील्स” कहा जाए तो अतिशयोक्ति नहीं होगी।
समझौते के प्रारूप में भारतीय किसानों के हितों से जुड़े कृषि तथा डेयरी उत्पादों जैसे मक्का,गेहूं, काबुली चना, चावल, दूध, चीज, इथनॉल्र तंबाकू तथा कुछ सब्जियों और फलो को संरक्षित किया गया है। जिन सब्जियों व फ्रोजन सब्जियों को संरक्षित किया गया है, उनमें प्याज, आलू , मटर, मशरूम, तोरी, भिंडी, कद्दू, लहसुन ,खीरा, शिमला मिर्च, शकरकंद आदि शामिल है। केला, आम, स्ट्राबेरी चेरी, सूखा आलू बुखारा, सूखा सेब, इमली, सिंघाड़ा, गरी आदि का भी संरक्षण किया गया है। इस समझौते के बाद टेक्सटाइल्स व एप्रेल्स, चमड़ा व फुटवेयर, प्लास्टिक व रबर, कुछ मशीनरी, सजावटी सामान, हस्तशिल्प उत्पाद तथा सामान्य फार्मास्युटिकल, एयरक्राफ्ट पाटर्स, जेम्स एंड ज्वैलरी क्षेत्र में बड़ा लाभ होगा और निर्यात भी बढ़ेगा।
विशेषज्ञों का मत है कि यह फ्रेमवर्क वैश्विक निवेशकों के भरोसे की मजबूती का प्रतीक है और प्रतिस्पर्धा, प्रौद्योगिकी तक पहुंच और आपूर्ति श्रृंखला की मजबूती को भी बढ़ावा दे रहा है। यह समझौता दुनिया के दो सबसे बड़े लोकतंत्रो के बीच आर्थिक तालमेल आगे बढ़ाने वाला सराहनीय कदम है। यह रणनीतिक साझेदारी टैरिफ कम करने, नियामक बाधाओं को दूर करने और सभी सेक्टरों में नए अवसर खोलने के लिए बनाई गई है। इस समझौते के लागू हो जाने के बाद निर्यातकों के लिए बाजार पहुंच बढ़ेगी और मेक इन इंडिया को बढ़ावा मिलेगा।
केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान व वाणिज्य व उद्योग मंत्री पीयूष गोयल इसे भारत के हित मे बता रहे हैं। इस समझौते के बाद चीन के मुकाबले मेड इन इंडिया को बढ़त मिलने जा रही है और जल्द ही इसका असर दिखने लग जाएगा। इलेक्ट्रानिक्स, ऑटो मोबाइल, टैक्सटाइल, फार्मा, इंजीनियरिंग वस्तुओं, रत्न, आभूषण व चर्म उत्पाद क्षेत्र में निर्माण बढ़ने से निर्यात को बढ़ावा मिलेगा।
उत्तर प्रदेश को लाभ: विशेषज्ञों का कहना है कि भारत अमेरिका समझौते का बड़ा लाभ उतर प्रदेश को होने जा रहा है। यह यूपी के निर्यात और एमएसएमई के लिए गेमचेंजर साबित होगा। इसका प्रत्यक्ष लाभ प्रदेश के टेक्स्टाइल, कार्पेट, लेदर, गृहसज्जा , कृषि आधारित उद्योग को होगा। इससे रोजगार सृजन भी व्यापक स्तर पर होगा। कालीन सेक्टर में भदोही- मिर्जापुर कालीन उद्योग और वाराणसी के रेशम व हैंडलूम उत्पादों को अमेरिकी बाजार में बेहतर पहुंच मिलने के संकेत हैं । इसे गृह सज्जा व हस्तशिल्प से जुड़े मेरठ, सहारनपुर, मुरादाबाद, बुलंदशहर व गौतमबुद्ध नगर के लिए भी अहम माना जा रहा है।
लेकिन क्या सबसे बड़ा गेमचेंजर अमेरिका द्वारा जारी भारत का मानचित्र है? यह अवश्य ही अमेरिका के रुख में बड़े परिवर्तन को रेखांकित कर रहा है और इस नये मानचित्र के कारण चीन व पाकिस्तान का चिंतित होना स्वाभाविक ही है। भारत के मीडिया चैनलों में इस मानचित्र की चर्चा नहीं हो रही है किंतु पाकिस्तान के मीडिया चैनलों में इस पर बहस छिड़ गई है।
“क्या अब समय नहीं आ गया है कि भारतीय अपने शास्त्रों में छिपे खजाने को पहचानें, जो पश्चिमी विद्वानों के अनुमान से कहीं अधिक प्राचीन हैं? वे विद्वान ईसाई मान्यता से प्रभावित थे कि संसार की रचना केवल 6000 वर्ष पहले हुई थी। ऋषियों का चिंतन हमेशा विशाल रहा है और ब्रह्मांड की आयु के बारे में उनका अनुमान खगोल विज्ञान द्वारा समर्थित है। इसके अलावा, उनके इस दावे का कि “संसार माया है”, उपहास उड़ाया गया था, लेकिन आजकल कोई भी इसका उपहास नहीं उड़ाता, सिवाय इसके कि वह स्वयं को मूर्ख बनाना चाहता हो।” – मारिया विर्थ
लगभग पाँच साल पहले एक राष्ट्रीय समाचार पत्र में एक छोटी सी खबर छपी थी। उस समय जयराम रमेश पर्यावरण और वन राज्य मंत्री थे और उन्होंने कहा था, “भारत पारंपरिक औषधियों पर आधारित कम से कम 2000 पेटेंट हर साल खो रहा है क्योंकि इनसे संबंधित ज्ञान को कभी दस्तावेजीकृत नहीं किया गया है।”
मुझे आश्चर्य होता है कि क्या राजनेता, प्रशासक और शिक्षाविद वास्तव में जानते हैं कि उनकी प्राचीन परंपरा कहाँ लिखित रूप में मौजूद है और उसमें क्या समाहित है। अंग्रेज़ी भाषी शिक्षाविदों और वैदिक पंडितों के बीच एक बड़ा अंतर है। अंग्रेज़ी भाषी शिक्षाविद खुद को श्रेष्ठ मानते हैं और भारत के बुद्धिजीवी वर्ग का प्रतिनिधित्व करते हैं। वहीं, संस्कृत पंडितों के दूसरे समूह में अपार ज्ञान का भंडार है, जिसका अक्सर अभी तक उपयोग नहीं किया गया है। उनका ज्ञान एक सामंजस्यपूर्ण समाज के लिए शायद और भी अधिक महत्वपूर्ण हो सकता है। दुख की बात है कि दोनों समूह आपस में नहीं मिलते क्योंकि वे एक-दूसरे को समझ नहीं पाते। यदि वे मिलें और विचारों का आदान-प्रदान करें, तो भारत वैज्ञानिक नवाचार के साथ-साथ दर्शन और चेतना अनुसंधान में भी अग्रणी बन सकता है। उदाहरण के लिए, वेदों का यह कथन कि परब्रह्म ने स्वयं को अनेक रूपों में रूपांतरित करने की इच्छा की और ब्रह्म चेतना है, आइंस्टीन से बहुत पहले इस खोज का मार्ग प्रशस्त कर सकता था कि पदार्थ मूल रूप से ऊर्जा (या बल्कि चेतना) है ।
दुर्भाग्यवश, स्वतंत्र भारत में भारतीय परंपराओं के अध्ययन की घोर उपेक्षा की गई। यहाँ तक कि तथाकथित बुद्धिजीवियों द्वारा भी इसका अपमान किया गया, जिनकी बुद्धि स्पष्ट रूप से ब्रिटिश शिक्षा से प्रभावित या विकृत हो गई थी। नई सरकार के आने से यह दयनीय स्थिति बदल सकती है, और मानव संसाधन विकास मंत्रालय से मिल रहे संकेत उत्साहजनक हैं।
लेकिन कई वामपंथी ‘बुद्धिजीवी’ भगवाकरण का शोर मचाएंगे। और वे अक्सर जोर-शोर से शोर मचाते हैं। बेशक, हर किसी को अपनी राय खुलकर व्यक्त करने का अधिकार है, लेकिन पूरी दुनिया में अपनी बात सुनाने का अधिकार कुछ ही लोगों को प्राप्त है, और अब तक उन्हीं बुद्धिजीवियों को यह विशेषाधिकार प्राप्त रहा है। दूसरी ओर, वैदिक पंडित, जो पारंपरिक ज्ञान को संरक्षित करते हैं, हाशिए पर धकेल दिए गए हैं और उन पर भारत के पिछड़ेपन का मुख्य कारण होने का अनुचित आरोप भी लगाया गया है।
भारतीय परंपरा के प्रति पूर्वाग्रह को समझना कठिन है, सिवाय आत्मविश्वास की कमी के, क्योंकि ऋषियों द्वारा खोजा गया ज्ञान वास्तव में अद्भुत है। यह सभी भारतीयों की विरासत है। यदि किसी अन्य देश का इतना लंबा इतिहास और इतनी महान उपलब्धियाँ होतीं, तो वे हर अवसर पर इसका बखान करते। फिर भी भारत में इस ज्ञान को नजरअंदाज किया गया है। इसके बजाय, शिक्षाविद पश्चिम से आने वाली किसी भी परिकल्पना को स्वीकार करने के लिए हमेशा तत्पर रहते थे।
उदाहरण के लिए, डार्विन का विकासवादी सिद्धांत । भारतीयों को यह एहसास नहीं है कि पश्चिमी देशों के पास चुनने के लिए केवल डार्विन या चर्च ही हैं, और डार्विन का सिद्धांत अधिक संभावित लगता है, हालांकि पूरी तरह से विश्वसनीय नहीं है। भारतीयों के पास अन्य विकल्प भी हैं: वे सत्य युग से कलियुग तक के चक्रों की संभावना पर विचार कर सकते हैं । भारतीय धर्मग्रंथों में इस बात के पर्याप्त प्रमाण हैं कि प्राचीन काल में भारत आध्यात्मिक और तकनीकी रूप से अत्यधिक विकसित था।
पिछले कुछ वर्षों में, भारत के ज्ञान के खजाने को खोजने के कुछ प्रयास किए गए। उदाहरण के लिए, कुछ विश्वविद्यालयों में अब भारतीय मनोविज्ञान पर एक पाठ्यक्रम उपलब्ध है, जो प्राचीन ग्रंथों और श्री अरबिंदो के इस विषय पर किए गए चिंतन पर आधारित है। यह तभी संभव हुआ जब पश्चिमी विद्वानों ने वैदिक अंतर्दृष्टि पर आधारित एक नई धारा को पश्चिमी मनोविज्ञान में शामिल कर लिया। फिर भी, ‘ पारलौकिक मनोविज्ञान ‘ की भारतीय उत्पत्ति को स्वीकार नहीं किया गया है।
मनोविज्ञान और दर्शन के क्षेत्र में प्राचीन भारत आधुनिक पश्चिम से कहीं आगे था। फिर भी, आज भी भारतीय मनोविज्ञान के छात्र पावलोव और स्किनर के सरल सिद्धांतों को ही सीखते हैं , जबकि पश्चिम में कई विश्वविद्यालयों और संस्थानों में “चेतना अध्ययन” काफ़ी लोकप्रिय हो चुका है।
भारत में आयुर्वेद को एक बार फिर से सराहना मिल रही है, जिसका श्रेय मुख्य रूप से स्वामी रामदेव और आचार्य बालकृष्ण के प्रयासों को जाता है । हालांकि, पश्चिम में भी आयुर्वेद का प्रभाव पहले से ही मौजूद था। चरक संहिता , जो स्वास्थ्य के सार, स्वस्थ रहने के तरीके और स्वास्थ्य को पुनः प्राप्त करने के तरीकों पर एक व्यापक ग्रंथ है, लगभग 2500 वर्ष पुरानी है। सुश्रुत संहिता भी उसी काल का एक ग्रंथ है। इन ग्रंथों में वर्णित कई औषधियों का आधुनिक समय में अभी तक परीक्षण नहीं किया गया है। कुछ औषधियों का परीक्षण हो चुका है और प्राचीन ग्रंथों का गंभीरता से अध्ययन करने के परिणामस्वरूप कई बहुमूल्य औषधियां विकसित हुई हैं।
लेकिन आयुर्वेद, मनोविज्ञान और योग तो भारत के प्राचीन ज्ञान के कुछ ही पहलू हैं। इससे कहीं अधिक ज्ञान मौजूद है, जिसका अब तक मुख्य रूप से विदेशियों ने अपने लाभ के लिए दोहन किया है।
वेदों में पाई जाने वाली कुछ महत्वपूर्ण अवधारणाएँ विज्ञान द्वारा सही सिद्ध हो चुकी हैं। कुछ अन्य अवधारणाओं की अभी भी गहन जाँच-पड़ताल की आवश्यकता है, लेकिन कोई भी अवधारणा आज तक गलत साबित नहीं हुई है। फिर भी, अधिकांश शिक्षित भारतीय अपने महान पूर्वजों के बारे में अनभिज्ञ हैं और उन्हें वह सम्मान नहीं देते जिसके वे हकदार हैं।
उदाहरण के लिए, पृथ्वी के सूर्य के चारों ओर घूमने की खोज का श्रेय वैदिक ऋषियों को दिया जाना चाहिए, न कि कोपरनिकस को , जो केवल कुछ सौ वर्ष पहले ही जीवित थे। या फिर, सौर रंगों के स्पेक्ट्रम और ब्रह्मांडीय किरणों की खोज का श्रेय भी इन्हीं को दिया जाना चाहिए, न कि न्यूटन और हेस को । यहाँ कुछ उदाहरण दिए गए हैं जो एक वैदिक पंडित ने मेरे लिए अनुवादित और लिखित रूप में प्रस्तुत किए थे:
पृथ्वी सूर्य के चारों ओर घूमती है – ऋग्वेद 10. 22. 14. और यजुर्वेद 3. 6.
सूर्य न तो उगता है और न ही अस्त होता है – अत्रय ब्राह्मण 3’44 और गोपथ ब्राह्मण 2’4’10।
सूर्य और संपूर्ण ब्रह्मांड गोलाकार हैं – यजुर्वेद 20.23
चंद्रमा सूर्य द्वारा प्रकाशित होता है – यजुर्वेद 18, 20.
अनेक सूर्य हैं – ऋग्वेद 9. 114. 3.
सूर्य में सात रंग – अथर्ववेद 7. 107. 1.
विद्युतचुंबकीय क्षेत्र, द्रव्यमान और ऊर्जा का रूपांतरण – Rg 10. 72.
चूंकि प्राचीन ऋषियों के इन मुद्दों पर विचार सटीक थे, इसलिए उनके अन्य कथन भी संभवतः सही हों या कम से कम गंभीरता से विचार करने योग्य हों। इस संदर्भ में भारत के ज्ञान और आधुनिक विज्ञान पर मेरा लेख देखें ।
चीन अपने प्राचीन ज्ञान का भरपूर लाभ उठाने में जरा भी संकोच नहीं कर रहा है, और क्यों न करे? फेंग शुई और एक्यूपंक्चर के माध्यम से विश्व स्तर पर उत्पन्न होने वाली अधिकांश धनराशि चीन में ही वापस आती है। इसके विपरीत, एक रिपोर्ट के अनुसार, भारत को पश्चिम के विशाल योग बाजार से मात्र 2 प्रतिशत धनराशि ही प्राप्त हो रही है।
क्या अब समय नहीं आ गया है कि भारतीय अपने शास्त्रों में छिपे खजाने को पहचानें, जो पश्चिमी विद्वानों के अनुमान से कहीं अधिक प्राचीन हैं? वे विद्वान ईसाई मान्यता से प्रभावित थे कि संसार की रचना केवल 6000 वर्ष पहले हुई थी । ऋषियों का चिंतन हमेशा विशाल रहा है और ब्रह्मांड की आयु के बारे में उनका अनुमान खगोल विज्ञान द्वारा समर्थित है। इसके अलावा, उनके इस दावे का कि ” संसार माया है ” उपहास उड़ाया गया था, लेकिन आजकल कोई भी इसका उपहास नहीं उड़ाता, सिवाय इसके कि वह स्वयं को मूर्ख बनाना चाहता हो।
भारत के ज्ञान का सबसे बड़ा खजाना मनुष्य के वास्तविक स्वरूप के ज्ञान में निहित है: वेद कहते हैं कि मनुष्य एक अलग व्यक्ति नहीं है। वह ब्रह्म के साथ एक है। उसका सार शुद्ध, अनंत चेतना है। और इस सत्य को धार्मिक जीवन जीने और साधना करने से ही प्राप्त किया जा सकता है । जब विचारों को त्यागकर मन शांत हो जाता है, तो व्यक्ति के अस्तित्व के दिव्य आयाम तक पहुंचा जा सकता है। सच्ची प्रेरणा और अंतर्ज्ञान इसी स्तर से प्राप्त होते हैं, और सच्चा सुख भी।
और विचारों को कैसे त्यागें? कश्मीर शैव धर्म के प्रमुख ग्रंथों में से एक, विज्ञानभैरव में 112 विधियाँ वर्णित हैं। शायद ये विधियाँ पश्चिम में पहले से ही पेटेंट करा ली गई हों और भारी शुल्क लेकर विदेशियों द्वारा आयोजित सेमिनारों के रूप में भारत में आ रही हों? धनी वर्ग के प्रतिभागियों को शायद इसकी जानकारी न हो।
हालांकि, अंग्रेजी भाषी वर्गों में पारंपरिक ज्ञान की कमी के बावजूद, सौभाग्य से भारतीय परंपरा उन लोगों में अभी भी जीवित है जो अंग्रेजी नहीं बोलते हैं। मीडिया द्वारा भारत की छवि को धूमिल करने के जोरदार प्रयासों के बावजूद, ये लोग भारत को अन्य देशों से अलग और विशिष्ट बनाते हैं।
इन भारतीयों को ब्रिटिश शिक्षा द्वारा “हिंदू” विचारधारा के विरुद्ध गुमराह नहीं किया गया था। उन्हें मनोवैज्ञानिक कार्यशालाओं की आवश्यकता नहीं है। वे आज भी अपने पूर्वजों के प्रति श्रद्धा रखते हैं, भले ही उन्हें उनकी विरासत की विस्तृत जानकारी न हो, फिर भी वे बुनियादी बातें जानते हैं जैसे: ” ईश्वर या ब्रह्म सर्वव्यापी है ” और “दूसरों को हानि पहुँचाने से उन्हें भी हानि पहुँचेगी”। कई लोग विशेषकर ब्राह्मणों के प्रति कृतज्ञ हैं, जिन्होंने सदियों से वेदों को भावी पीढ़ियों के लिए संरक्षित करने के लिए अथक परिश्रम किया है और आज भी कर रहे हैं, जिसके लिए वे अनगिनत श्लोकों को कंठस्थ करते हैं।
यदि भारतीय प्रशासन भी प्राचीन वैदिक ऋषियों और आधुनिक संस्कृत पंडितों के ज्ञान को खोजकर और उसका प्रसार करके उन्हें सम्मान दे, तो इससे न केवल चरित्र निर्माण में बहुत मदद मिलेगी, बल्कि भारतीयों में ऐसे महान पूर्वजों की संतान होने का गौरव भी उत्पन्न होगा। वैदिक ज्ञान एक बार फिर सर्वत्र फैल सकेगा, जैसा कि पहले हुआ था, और इससे संपूर्ण मानवता को लाभ होगा। – मारिया विर्थ ब्लॉग , 7 जून 2014
मारिया विर्थ जर्मन हैं और हैम्बर्ग विश्वविद्यालय से मनोविज्ञान की पढ़ाई पूरी करने के बाद छुट्टियां मनाने भारत आई थीं। कई संतों के आशीर्वाद से, वह भारत में ही रहती हैं और लेखों और पुस्तकों के माध्यम से जर्मन और भारतीय पाठकों के साथ अपने विचार साझा करती हैं। हालांकि, हाल के वर्षों में, जब उन्होंने देखा कि भारतीयों और दुनिया को इस प्राचीन भारतीय विरासत के महत्व से अवगत होने से रोकने के लिए सुनियोजित प्रयास किए जा रहे हैं, तो उन्होंने भारतीय परंपराओं के अनूठे महत्व को उजागर करना शुरू कर दिया।
(मारिया विर्थ जर्मनी की एक प्रसिद्ध लेखिका, विचारक और भारत-प्रेमी अध्येता हैं। वे विशेष रूप से भारतीय दर्शन, खासकर अद्वैत वेदांत की व्याख्या और प्रचार के लिए जानी जाती हैं।)
जैविक उत्पादों के लिए विश्व के अग्रणी व्यापार मेले बायोफैच 2026 में भारत को ‘कंट्री ऑफ द इयर’ नामित किया गया है। इसका आयोजन 10 से 13 फरवरी 2026 तक जर्मनी के नूरेमबर्ग में किया जा रहा है।
भारत सरकार के वाणिज्य और उद्योग मंत्रालय के अधीन कृषि और प्रसंस्कृत खाद्य उत्पाद निर्यात विकास प्राधिकरण (एपीईडीए) बायोफैच 2026 में भारत की प्रमुख और प्रभावशाली भागीदारी का आयोजन कर रहा है। इसमें भारत की भागीदारी देश की समृद्ध कृषि विरासत और जैविक उत्पादों के प्रमुख वैश्विक आपूर्तिकर्ता के रूप में इसकी मजबूत क्षमता को दर्शाएगी।
जर्मनी में आयोजित बायोफैच जैविक खाद्य पदार्थों और कृषि को समर्पित विश्व की सबसे बड़ी और सबसे प्रभावशाली प्रदर्शनी है। एपीडा एक दशक से अधिक समय से बायोफैच में भाग ले रहा है और इसमें लगातार अपनी मजबूत उपस्थिति बनाए हुए है।
बायोफैच 2026 में भारत की भागीदारी पिछले संस्करणों की तुलना में इस बार महत्वपूर्ण विस्तार को दर्शाती है जो भारतीय जैविक निर्यात के बढ़ते प्रभाव, जैविक उत्पादों की बढ़ती वैश्विक मांग और निर्यातकों, संघों और किसान उत्पादक संगठनों (एफपीओ) की बढ़ती हिस्सेदारी को प्रतिबिंबित करती है।
14 वर्षों के अंतराल के बाद भारत का जैविक कृषि क्षेत्र एक बार फिर बायोफैच 2026 में केंद्र बिंदु बनने के लिए तैयार है।
बायोफैच 2026 में एपीडा की ओर से बनाया गया भारत का राष्ट्रीय मंडप 1,074 वर्ग मीटर क्षेत्र में फैला होगा और इसमें जैविक उत्पादों के निर्यातकों, किसान उत्पादक संगठनों (एफपीओ), सहकारी समितियों, जैविक प्रयोगशालाओं, राज्य सरकारी संगठनों और कमोडिटी बोर्ड सहित 67 सह-प्रदर्शक शामिल होंगे। भारतीय मंडप में चावल, तिलहन, जड़ी-बूटियां, मसाले, दालें, काजू, अदरक, हल्दी, बड़ी इलायची, दालचीनी, आम की प्यूरी और आवश्यक तेलों सहित विभिन्न प्रकार के जैविक उत्पादों का प्रदर्शन किया जाएगा।
भारत के मंडप में 20 से अधिक राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के प्रदर्शक भाग ले रहे हैं जो देश की व्यापक कृषि और क्षेत्रीय विविधता को दर्शाते हैं। इनमें असम, मेघालय, मणिपुर, दिल्ली, गुजरात, हरियाणा, कर्नाटक, केरल, पश्चिम बंगाल, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, राजस्थान, अरुणाचल प्रदेश, तमिलनाडु, तेलंगाना, उत्तर प्रदेश, जम्मू-कश्मीर और उत्तराखंड शामिल हैं। यह भागीदारी अलग-अलग क्षेत्रों के विशिष्ट जैविक उत्पादों और मूल्यवर्धित खाद्य उत्पादों को दर्शाने के साथ अंतरराष्ट्रीय जैविक व्यापार में भारत की वार्षिक वृद्धि को प्रदर्शित करती है।
भारतीय मंडप में उत्पादों के प्रदर्शन के अतिरिक्त आगंतुकों को भारतीय जैविक उत्पादों के स्वाद और सुगंध को प्रदर्शित करने वाले विशेष खाद्य पदार्थों को चखने का अवसर भी मिलेगा। इस दौरान प्रीमियम जैविक बासमती चावल और मसालों से तैयार की गई ताजा सुगंधित बिरयानी के नमूने की भी प्रस्तुति की जाएगी। इसके अतिरिक्त चावल की भारत की पारंपरिक किस्मों को दर्शाने के लिए पांच जीआई-टैग वाली चावल की किस्में, इंद्रायणी चावल, नवारा चावल, गोविंदभोग चावल, लाल चावल और चक हाओ (काला चावल) आगंतुकों को परोसी जाएंगी।
एपीडा ने बायोफैच 2026 में भारत को ‘कंट्री ऑफ द ईयर’ नामित किए जाने के उपलक्ष्य में नूरेमबर्ग मेस्से प्रदर्शनी केंद्र के प्रमुख स्थानों पर व्यापक ब्रांडिंग और अत्यधिक प्रभावशाली प्रचार गतिविधियां भी आयोजित की हैं।
विश्व का ध्यान सतत विकास और पर्यावरण के प्रति उत्तरदायी जीवनशैली की ओर बढ़ता जा रहा है। ऐसे में, बायोफैच 2026 में ‘कंट्री ऑफ द ईयर’ के रूप में भारत की भागीदारी जैविक कृषि में वैश्विक रूप से अग्रणी देश के रूप में इसकी स्थिति को और मजबूत करती है। भारत अंतरराष्ट्रीय मानकों को पूरा करने वाले उच्च गुणवत्ता वाले, दीर्घकालिक रूप से उत्पादित जैविक उत्पादों की आपूर्ति के लिए प्रतिबद्ध है।
एपीडा ने वैश्विक प्रतिस्पर्धा को बढ़ाने और विश्व को जैविक खाद्य-पदार्थों के बड़े आपूर्तिकर्ता के रूप में भारत की स्थिति को मजबूत करने के उद्देश्य से लक्षित पहलों के माध्यम से भारतीय निर्यातकों का सहयोग जारी रखा है।
भारत वैश्विक स्तर की समस्याओं के निदान में ‘ महत्वपूर्ण भूमिका’ निभाकर दुनिया में अपने काबिलियत का स्वीकारोक्ति दिखाया है। भारत ने लोकतांत्रिक मूल्यों में प्रबल आस्था, संयुक्त राष्ट्र के सिद्धांतों एवं उद्देश्यों में पूर्ण सहमति, नैतिकता एवं नैतिक मूल्यों में आस्था एवं वैश्विक संस्थानों में अपनी उपादेयता को निभाने में उच्चीकृत भूमिका प्रदान किया है। भारत वर्तमान में विज्ञान, तकनीक, नवाचार, नवोन्मेष एवं उद्योग में महत्ती योगदान कर रहा है।
बदलते भू – राजनीतिक परिदृश्य में “नए भारत” ने हर क्षेत्र में अपनी साख एवं वैश्विक व्यक्तित्व का असाधारण प्रदर्शन करते हुए वैश्विक समुदाय को नेतृत्व कर रहा है। संयुक्त राज्य अमेरिका, चीन, रूस, कनाडा एवं यूरोपियन संघ (EU ) सभी भारत के साथ “निकट संबंध एवं राजनयिक संबंध” बनाने के लिए आतुर है। समकालीन में भारत वैश्विक नेतृत्व की धारिता के लिए तैयार है। भारत वैश्विक स्तर पर अपनी महत्ती भूमिका निभाने के लिए तैयार है। भारत समकालीन में 40 से अधिक देशों को अनाज का निर्यात कर रहा है।
भारत ने स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात से ही’ वैश्विक दक्षिण’ की एकता के लिए काम किया है, ताकि वह इन देशों के विश्वास को जीत सके। “विश्वास भारत की मजबूत पूंजी बन गई है।” इसी विश्वास के कारण यूरोपीय यूनियन, ब्रिटेन एवं संयुक्त राज्य अमेरिका भारत के व्यापार साझेदार बनने के लिए हृदय से आकर्षित हैं। इससे भारत वैश्विक स्तर पर ‘ वैश्विक दक्षिण के देशों’ से अपने हित को सुरक्षित कर सकता है। भारत ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद,( जो वैश्विक व्यवस्था के कार्यकारिणी) है जिसमें संरचनात्मक सुधार की पुरजोर पैरवी करता है एवं सुरक्षा परिषद की स्थाई सदस्यता के लिए अपना दावा भी प्रस्तुत करता है। सुरक्षा परिषद की स्थाई सदस्यता भारत के वैश्विक व्यवस्था में महत्वपूर्ण भूमिका के लिए अति आवश्यक है। इस तरह भारत वैश्विक स्तर पर शांति ,सुरक्षा एवं स्थायित्व प्रदान करने में महनीय भूमिका का निर्वहन कर रहा है।
भारत वैश्विक स्तर की ‘ तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था ‘ बनने के लक्ष्य की प्राप्ति की दिशा में अग्रसर है। चीन के साथ रिश्तों में सुधार, निवेश से पाबंदियों को हटाने में अथक परिश्रम एवं संयुक्त राज्य अमेरिका से दंडात्मक आयात शुल्क से मुक्ति एवं पारस्परिक आयात शुल्क 18% पर लाना “भारत की कूटनीतिक सफलता” है। इन सबके अतिरिक्त एवं वैश्विक चुनौतियों के बावजूद वित्त वर्ष2025- 2026 के लिए विकास दर 7.4 प्रतिशत है। वैश्विक स्तर के राज्यों के अर्थव्यवस्थाओं में अनिश्चितताओं के बावजूद भारत की आर्थिक विकास गति स्थाई एवं स्थिरांक को बनाए हुए हैं। इस उपादान के द्वारा भारत वैश्विक स्तर पर अपने नेतृत्व को उन्नयन कर रहा है। भारत ने अपने व्यवहारिकता, राजनीतिक नेतृत्व की दूरदर्शिता एवं उपादेयता के साथ” सामयिक हालात” पर नियंत्रण प्राप्त कर लिया है। भारत ने चुनौतियों को अवसर में बदलकर वैश्विक नेतृत्व में सहयोग किया है। सुधारों के प्रति मजबूत प्रतिबद्धता, व्यापक आर्थिक नीतियों एवं वैश्विक परिस्थितियों से मिले अवसरों की महती भूमिका है।
भारत विकासशील देश होने के नाते ‘ ग्लोबल साउथ के देशों’ के उत्थान की बड़ी नैतिक जिम्मेदारी है। भारत का नैतिक दायित्व है कि ‘ वैश्विक ऋण प्रणाली ‘ को विकासशील देशों के लिए हितकारी बनाएं। अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष ( आईएमएफ) एवं विश्व बैंक (WB ) की कर्ज देने की” कठोर शर्तों” पर विकासशील देश इनके “मानकों” पर खरे नहीं उतर पाते, जिससे इन देशों को वांछित ऋणनहीं मिल पाता है। यह देश अपने ज्वलंत समस्याओं का आर्थिक अक्षमता के कारण समाधान नहीं कर पाते हैं जिससे उनके शासकीय व्यवस्था से ‘ जन विश्वास’ उठने लगता है।
डोनाल्ड ट्रंप के कार्यकारी निर्णय के कारण वैश्विक स्तर के विकसित देशों व विकासशील देशों में “मनोनमालिन्य “की स्थिति उत्पन्न हो जा रही है। वीजा नियमों एवं कटौती शुल्क ( टैरिफ) के कारण वैश्विक स्तर की शासकीय नीतियों में भय, दबाव एवं असमर्थता उत्पन्न हो रही है। ऐसी स्थिति में भारत ने “BRICS ” एवं “SCO”के मंचों से संयुक्त राज्य अमेरिका को प्रति संतुलित किया है। वैश्विक स्तर पर इस कदम से ‘ अमेरिका के तानाशाही कार्यकारी निर्णय’ का निष्क्रिय विरोध करके भारत ने उन देशों का साथ दिया है, जो डोनाल्ड ट्रंप की कार्यकारी नीतियों का विरोध नहीं कर पा रहे हैं। भारत संयुक्त राज्य अमेरिका की दादागिरी से परेशान एवं भयभीत विश्व के सभी देशों का नेतृत्व कर रहा है। यही भारत के लिए सबसे उपयुक्त
एवं राजनयिक सफलता है।
भारत को बौद्धिक एवं मानसिक स्तर पर सशक्त होकर वैश्विक नेतृत्व को मार्गदर्शन करना है। वर्तमान सामायिक परिदृश्य में भारत एक समृद्ध , सशक्त एवं महान अर्थव्यवस्था है। यह विश्व समुदाय को सहयोग एवं समन्वय के लिए नेतृत्व कर रहा है। महान आध्यात्मिक संत एवं राष्ट्रवाद के उन्नयन के प्रबल प्रणेता विवेकानंद जी ने” शिशु नेतृत्व” की संकल्पना दिया था, अर्थात विचार, बौद्धिक एवं मानसिक व्यवहार के आधार पर वैश्विक नेतृत्व प्रदान करना है।
भारत वैश्विक स्तर की आपदाओं में राष्ट्रों को बौद्धिक एवं व्यवहार के स्तर पर सहयोग करता है। यह देश के सांस्कृतिक अवयवों में सहयोग करता है। भारत विषम और दुर्लभ क्षणों में सहयोग के लिए तत्पर रहता है। प्राकृतिक आपदाओं में सबसे पहले सहयोग के लिए संकल्पित रहता है। भारत को समृद्ध, सशक्त एवं महानता के साथ वैश्विक स्तर पर सहयोग, समन्वय ,बंधुत्व एवं परिवार भाव की भावना का उन्नयन करके वैश्विक स्तर पर “भारतीय कदम” को बढ़ाना होगा। संपूर्ण मानवता की संरक्षा करना, मानवीय समुदाय को धैर्य देना, मनोबल बढ़ाना एवं सामयिक में संयुक्त राज्य अमेरिका एवं चीन की’ विस्तारवादी नीतियों’ का विरोध करना भारत का वैश्विक स्तर पर’ भारतीयता के भावना ‘ का उन्नयन करना है।
प्रमुख मुद्देः
1. भारत एक तेज, स्थिर एवं प्रदर्शन आधारित अर्थव्यवस्था है, जो वैश्विक निवेशकों का ‘ विश्वसनीय गंतव्य’ है।
2. भारत’ हरित अर्थव्यवस्था’ एवं ‘ नरम शक्ति’ (सॉफ्ट पावर) में केंद्रीय भूमिका निभा रहा है।
3. भारत वैश्विक स्तर पर सहयोग, समन्वय एवं संतुलन की नीति का समर्थक है। यह ‘ जिम्मेदार नेतृत्व’ है जो ग्लोबल साउथ का वैश्विक मंचों पर नेतृत्व कर रहा है।
4. हर देश और हर निवेशक भारत को ‘ प्रथम वरीयता’ दे रहे हैं।
5. भारत वैश्विक स्तर पर ‘ स्वहित’ के बजाय ‘ वैश्विक हित’ की आवाज है।
(लेखक अखिल भारतीय इतिहास संकलन योजना केशवकुंज झंडेवालान, नई दिल्ली के राष्ट्रीय संगठन सचिव हैं)
नाथद्वारा / कोटा । नाथद्वारा में साहित्य मंडल की ओर से दो दिवसीय पाटोत्सव ब्रजभाषा समारोह रविवार को शुरू हुआ। कार्यक्रम के अध्यक्षता आगरा के प्रसिद्ध साहित्यकार एवं कवि श्री शिव सागर शर्मा ने ब्रजभाषा को सर्वश्रेष्ठ भाषा बताते हुए कहा कि यह वही भाषा है जिसने भगवान कृष्ण को भी बोलना सिखाया है। इस भाषा में सर्वाधिक रचना लेखन हुआ है। ब्रजभाषा के लिए आज साहित्य मंडल का यह पावन और पुनीत कार्य प्रशंसनीय है। कार्यक्रम के मुख्य अतिथि श्री चेतन स्वामी बीकानेर ने कहा साहित्य मंडल वह उपवन है जहां पूरे भारतवर्ष के पुष्पों की प्रदर्शनी इन कार्यक्रमों के द्वारा की जाती है। यहां साहित्य के सम्मान के साथ-साथ साहित्यकारों का सम्मान भी होता है। श्रीनाथजी की इस नगरी में सरस्वती के मंदिर में सम्मान पाना हर एक साहित्यकार का स्वप्न है।
विशिष्ट स्थिति एवं हिन्दी साहित्य सेवी श्री एम श्रीधर सेलम तमिलनाडु ने कहा कि साहित्य मंडल द्वारा हिंदी भाषी साहित्यकारों का सम्मान भारतीय एकता और अखंडता का परिचायक है। यह राष्ट्रीय एकता के लिए किए गए उन प्रयासों में से है जो कभी देश के करण धारों ने भारत की एकता के लिए किया था।
विशिष्ट अतिथि श्री देवी प्रसाद जी गौड ने कहा कि आज हिंदी और ब्रज भाषा का यह सम्मान समारोह अपनी विशेषता, उपलब्धियां और सम्मान समारोह के साथ-साथ ब्रजभाषा की परंपरागत विधाओं के लिए पूरे देश भर में विख्यात है। श्याम प्रकाश जी देवपुरा द्वारा किया गया ब्रजभाषा के लिए यह कार्य उल्लेखनीय है।
ब्रजभाषा उपनिषद के अंतर्गत डॉ. बृजभूषण चतुर्वेदी द्वारा सूरदास के काव्य में दर्शन गोपाल कृष्ण दुबे द्वारा कुंभनदास के काव्य मं दर्शन हरिओम हरि — गोविंददास के काव्य में दर्शन श्रीमती संतोष रिचा राया द्वारा नंददास के काव्य में दर्शन विषय पर विद्वतापूर्ण आलेख प्रस्तुत कियै गए।
समारोह में अनेक साहित्यकारों की कृतियों का विमोचन किया गया। अंजीव अंजुम कृत डॉ रामकुमार घोटड़ की सर्वश्रेष्ठ कहानियां, सतरंगी गीत डॉ रविंद्र शर्मा रवि, काव्य मंजरी, गीत प्रेम, अमृत ब्रज रास आदि कृतियों का विमोचन मंच द्वारा किया गया। इस अवसर पर बीकानेर राजस्थान के वरिष्ठ साहित्यकार श्री चेतन स्वामी को ब्रजकांत साहित्य सम्मान एवं श्री एम श्रीधर सेलम तमिलनाडु को श्रीमती कमला देवी अग्निहोत्री स्मृति सम्मान एवं इक्यावन सौ रुपए की राशि सहित साहित्य मर्मज्ञ की मानद उपाधि से अभिवंदित किया गया।
ब्रजभाषा एवं हिंदी साहित्य के लिए समर्पित श्री रमेश पंडित आगरा को पंडित विश्वंभर दयाल दौनेरिया स्मृति सम्मान, श्री रवि पुरोहित बीकानेर राजस्थान को डॉ के आर कल्याण रमन स्मृति सम्मान, श्री विश्वनाथ तंवर सरदारशहर को श्रीमती शारदा देवी स्मृति सम्मान , डॉ बसंत सिंह सोलंकी उदयपुर राजस्थान को पंडित सेवाराम शर्मा स्मृति सम्मान, डॉ सुरेश वशिष्ठ गुरुग्राम हरियाणा को राव महेंद्र मानसिंह स्मृति सम्मान, डॉ मंजरी पांडे वाराणसी को राजमाता मीरा मानसिंह स्मृति सम्मान, डॉ विजयलक्ष्मी अल्मोड़ा को श्रीमती राजरानी शर्मा स्मृति सम्मान एवं डॉ रामकुमार घोटड़ सादुलपुर राजस्थान को श्री भगवती प्रसाद देवपुरा स्मृति सम्मान सहित हिंदी साहित्य विभूषण की मानद उपाधि से सम्मानित किया गया। डॉ गुलाबचंद और पटेल गांधीनगर गुजरात को श्री नरेंद्र गिलड़ा स्मृति सम्मान, पंडित रामेश्वर दयाल महेरे शूकर क्षेत्र सौरों जी उत्तर प्रदेश को श्री गया प्रसाद शर्मा स्मृति सम्मान एवं समाज सेवा मर्मज्ञ की मानद उपाधि सहित 2100 रुपए की राशि से सम्मानित किया गया।
हिंदी साहित्य के क्षेत्र में कार्य कर रहे श्री राजेंद्र प्रसाद शांतेय झालावाड़, श्री आनंद शर्मा दिल्ली, डॉ महामाया प्रसाद चौबीसा उदयपुर, श्री माता प्रसाद शुक्ल ग्वालियर, डॉ गिरी गिरिवर कोटा, श्रीमती अक्षय लता शर्मा जयपुर को हिंदी साहित्य मनीषी, कुंवर शिवदान सिंह राणावत उदयपुर, श्रीमती रितु चतुर्वेदी भीलवाड़ा, डॉ छगन राज राव दीप जोधपुर, डॉ दीपा परिहार दीप्ति जोधपुर को हिंदी काव्य मनीषी श्री राजेंद्र केशोरैया मथुरा, श्री कृष्ण कुमार सैनी दौसा, श्रीमती देवकी केसौरैया मथुरा, डॉ देवराज शर्मा देव पाली, श्री नंदकिशोर काबरा उदयपुर , सुश्री उमा शर्मा मथुरा को समाज सेवा कला सेवा रत्न की मानद उपाधि से विभूषित किया गया। इस अवसर पर कहीं शर्मा वेतन काली मुस्की है सब कुछ आ रही एवं बनमली समस्या पूर्ति कार्यक्रम भी संपन्न हुआ कार्यक्रम की शुरुआत रेनू गोर एवं साथी कलाकार उदयपुर के द्वारा मनमोहक प्रस्तुतियों के माध्यम से हुई।
कार्यक्रम कौ शुभारंभ दौसा के कवि अंजीव रावत द्वारा गणेश वंदना,सुश्री माद्री सिंह द्वारा सरस्वती वंदना,भरतपुर के कवि हरिओम हरि द्वारा ब्रज वंदना और वृंदावन के कवि सत्यप्रकाश शर्मा द्वारा ब्रज वंदना से किया गया। उदयपुर की रेणु गोर और साथी कलाकारों द्वारा मनमोहक सांस्कृतिक प्रस्तुतियाँ दी गईं। संचालन संस्था के प्रधानमंत्री श्री श्याम प्रकाश देवपुरा ने किया। सम्मानित साहित्यकारों का गद्य आत्मक एवं पदयात्मक परिचय कवि एवं साहित्यकार श्री हरि ओम हरि, श्री नरेंद्र निर्मल एवं डॉ. अंजीव अंजुम द्वारा किया गया। इस अवसर पर श्री सुरेंद्र सार्थक, डीग, श्रीमती संतोष रिचा, राया, श्री प्रदुम्न देवपुरा, श्री अनिरुद्ध देवपुरा, श्रीनाथद्वारा,श्री सत्येंद्र यादव कोटा, श्री कृष्ण शरद कासगंज, श्री सुरेश कुमार शर्मा भरतपुर आदि साहित्यकार उपस्थित रहे।
संघ के शताब्दी वर्ष के उपलक्ष्य में मुंबई के नेहरू सेंटर, वर्ली में आयोजित ‘संघ यात्रा के १०० वर्ष : नए क्षितिज’ इस दो दिवसीय संवाद कार्यक्रम में प्रश्नोत्तर सत्र में डॉ. मोहन भागवत ने विभिन्न राष्ट्रीय, अंतरराष्ट्रीय, सामाजिक तथा सांस्कृतिक विषयों से जुड़े प्रश्नों के बेबाक उत्तर दिए। इस व्य़ाख्यानमाला में मुंबई के कॉर्पोरेट जगत से लेकर फिल्म, खेल, सामाजिक व सांस्कृतिक क्षेत्र के लगभग एक हजार लोग उपस्थित थे। संघ प्रमुख के साथ इस अवसर पर मंच पर संघ के पश्चिम क्षेत्र संघचालक डॉ. जयंतीभाई भाडेसिया, कोंकण प्रांत संघचालक श्री अर्जुन चांदेकर, मुंबई महानगर संघचालक श्री सुरेश भगेरिया भी उपस्थित थे।
पुणे के पेशवा के समय का उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि उनके महल के बाहर एक बच्चा गणेश जी की एक मुहर लेकर बैठता था, जो भी व्यक्ति पेशवा के दरबार में अपनी मांग लेकर जाता, वह उस कागज पर गणेशजी की मुहर लगा देता था। एक बार एक गाँव के लोग ये शिकायत लेकर आए कि उनके गाँव में पिछले कई सालों से तालाब नहीं बना।
जब पेशवा ने इस मामले की जाँच करवाई तो दरबारियों ने कहा कि इस पर गणेशजी की मुहर नहीं लगी थी, इसलिए इस पर काम नहीं हुआ। पेशवा ने कहा कि ये मुहर कौन लगाता है, तो पता चला कि महल के बाहर एक बच्चा सबसे पैसे लेकर ये मुहर लगाता है।
पेशवा ने उस बच्चे को गिरफ्तार करवाया तो उस बच्चे ने चुनौती दी कि आप मुझे गिरफ्तार कर सकते हो मगर भ्रष्टाचार खत्म नहीं कर सकते। इस पर पेशवा ने उसे गाँव के बाहर जंगल में नदी के किनारे एक झोपड़ी बनाकर दी और दोनों समय के खाने की व्यवस्था की और उसे चुनौती दी कि वह यहाँ जंगल में भ्रष्टाचार करके दिखाए।
उसने देखा कि नदी में नाविक नाव चलाते हैं। उसने सभी नाविकों को कहा कि मुझे राजा ने यहाँ रखा है। दोनों समय मुझे भोजन राजा की ओर से आता है। तुम लोग जो नाव चलाते हो इससे नदी में लहरें पैदा होती हैं, इन लहरों पर टैक्स देना पड़ेगा।
इस तरह उसने महीने भर में बोरा भरकर पैसे इकट्ठे किए और पेशवा के दरबार में जाकर रख दिए कि मैंने जंगल में बैठकर भी भ्रष्टाचार कर लिया।
चाणक्य ने कहा कि “मछली पानी में कब जल पीती है, पता नहीं चलता — वैसे ही सरकार में कर्मचारी कब भ्रष्टाचार कर लेते हैं, पता नहीं चलता।” “तोरा मन दर्पण कहलाए” — ये गाना यही बात कहता है।
संघ द्वारा संचालित एक छात्रावास का उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि गुरुदक्षिणा का पैसा छात्रावास में रखा था। उसी समय छात्रावास के बच्चों के लिए तीन दिन तक खाना नहीं था और खरीदने के पैसे भी नहीं थे।
जब अधिकारियों को पता चला कि बच्चों के लिए खाना नहीं है, तो उन्होंने कहा कि जब यहाँ गुरुदक्षिणा का पैसा रखा था तो इससे खाने की व्यवस्था क्यों नहीं की। तब उनको बताया गया कि ये गुरुदक्षिणा का पैसा है, इसको हम अपने काम में कैसे ले सकते हैं।
इसलिए भ्रष्टाचार कायदा, कानून और सजा से नष्ट नहीं होगा — वह होगा तो केवल संस्कारों से ही होगा।
संघ प्रमुख के उद्बोधन की यूट्यूब लिंक
इस कार्यक्रम में समाज के विभिन्न क्षेत्रों का प्रतिनिधित्व करने वाले प्रमुख लोग उपस्थित थे। संन्यास आश्रम के महामंडलेश्वर स्वामी विश्वेश्वरानंद जी, एस्सेल समूह व ज़ी नेटवर्क के संन्यास आश्रम के महामंडलेश्वर स्वामी विश्वेश्वरानंद जीडॉ. सुभाष चन्द्रा, उद्योगपति हर्ष गोयनका, सज्जन जिंदल, अजय पीरामल, कुमार मंगलम बिड़ला, अनन्या बिड़ला, एल एंड टी के एस. सुब्रह्मण्याम, एच डीएफसी बैंक के सीईओ शशिधर जगदीशन, मोर्गन स्टेनली के रिथम देसाई, फिल्म जगत की हस्तियों में अक्षय कुमार, विक्की कौशल, अनन्या पांडेय, हृदयनाथ मंगेशकर, करण जोहर, रवीना टंडन, शिल्पा शेट्टी, सुबोध भावे, महेश मांजरेकर, जैकी श्रॉफ, विनीत कुमार सिंह, रवि दुबे, रुपाली गांगुली, वाईआरएफ के सीईओ अक्षय विधानी आदि विशेष तौर पर उपस्थित थे। इसके अलावा डॉक्टर, वैज्ञानिक, शिक्षाविद, विधि विशेषज्ञ, खिलाड़ी, मीडिया प्रतिनिधि, सामाजिक संस्थाओं के सदस्य, धर्मगुरु, लेखक, सोशल मीडिया तथा विज्ञापन क्षेत्र के प्रमुख लोगों के साथ ही कई देशों को राजदूत भी उपस्थित थे।
उपस्थित लोगों द्वारा पूछे गए कुल १४३ प्रश्नों को १४ श्रेणियों में वर्गीकृत किया गया। इनमें संघनीति, हिंदुत्व, राष्ट्रीय परिदृश्य, शिक्षा, अर्थव्यवस्था, राजनीति, विदेश नीति, राष्ट्रीय सुरक्षा, संस्कृति, कला, खेल व भाषा, जीवनशैली, पर्यावरण आदि विभिन्न विषयों से जुड़े प्रश्नों पर डॉ. भागवत ने रोचक व तथ्यपूर्ण उत्तर देकर उपस्थित श्रोताओं की जबर्दस्त वाहवाही लूटी।
व्याख्यानमाला में संघ प्रमुख डॉ. मोहन भागवत का प्रश्न-उत्तर सत्र केवल संवाद भर नहीं था, बल्कि वह देश की राजनीति, समाज और सांस्कृतिक दिशा को लेकर संघ की दीर्घकालिक सोच का स्पष्ट प्रतिबिंब भी था। उनके उत्तरों में संतुलन, समावेशन और स्थिरता की स्पष्ट झलक दिखाई दी। दो दिनों में आयोजित चार सत्रों में उन्होंने संघ, राजनीति, समाज से लेकर राष्ट्रीय व अंतर्राष्ट्रीय राजनीति से जुड़े हर सवाल के बेबाक और तथ्यपूर्ण जवाब दिए।
उन्होंने कहा कि भारत पर ५०० वर्षों तक शासन करने के बाद भी आक्रमणकारी जो नहीं कर सके, वे अब क्या करेंगे? उन्होंने २०४७ में भारत विभाजित होगा जैसी बातों को तथ्यहीन बताते हुए कहा कि भारत को तोड़ने का सपना देखने वाले खुद टूट जाएंगे तथा उनके सपने कभी पूरे नहीं होंगे।
उन्होंने कहा कि ईसा मसीह द्वारा प्रतिपादित ईसाई धर्म और पैगंबर मोहम्मद द्वारा बताए गए इस्लाम का स्वरूप आज उसी रूप में दिखाई नहीं देता। इसका कारण यह है कि उनके बाद इन दोनों पंथों पर तत्कालीन राजनीति का प्रभाव बढ़ गया। परिणामस्वरूप इन पंथों की आध्यात्मिकता पीछे रह गई और राजनीतिक हित अधिक प्रभावी हो गए। इन पंथों के मूल आध्यात्मिक तत्वों को प्रोत्साहन दिया जाए तो विश्वभर के राजनीतिक संघर्ष कम हो सकते हैं।
वीर सावरकर को भारत रत्न नहीं दिए जाने पर तालियों की गड़गड़ाहट के बीच उन्होंने कहा कि स्वातंत्र्यवीर सावरकर करोड़ों भारतीयों के हृदय पर राज कर रहे हैं। किंतु यदि उन्हें भारत रत्न से सम्मानित किया जाता है, तो इससे इस सम्मान की ही प्रतिष्ठा बढ़ेगी।
–डॉ. हेडगेवार कहा करते थे कि भारत को अपनी मातृभूमि मानने वाला एक भी हिंदू इस भारत भूमि पर है तब तक यह हिन्दूराष्ट्र है भाजपा के सत्ता में आने से हमारे अच्छे दिन शुरू नहीं हुए, ऐसा उल्टा है. हम एक विचार और नीति लेकर चलते हैं. जैसे-जैसे हमारी शक्ति बढ़ती है, हम उसका प्रचार और प्रतिपादन करते हैं, लोग उसे मानने लगते हैं। जो चुनावी राजनीति में इस नीति का पुरस्कार करते हैं, उन्हें उसका लाभ मिलता है. हम राम मंदिर के पक्ष में थे, तो जो लोग उसके पक्ष में आए, उन्हें उसका लाभ मिला।
डॉ. भागवत ने कहा कि भाजपा के सत्ता में आने से संघ को कोई प्रत्यक्ष लाभ हुआ ऐसा नहीं है, बल्कि समाज में संघ की बढ़ती शक्ति और स्वीकार्यता का लाभ समान विचारधारा और भारतीय नीतियों का पालन करने वाले दलों को मिला है। संघ के स्वयंसेवकों के निरंतर परिश्रम तथा समाज द्वारा संघ को दिए गए स्नेह और विश्वास के कारण ही संघ का कार्य बढ़ा है।
आपातकाल, गुरूजी जन्मशती, राम मंदिर आंदोलन आदि के माध्यम से आप सभी के सहयोग और स्वयंसेवकों के पुरूषार्थ से ही हमारे अच्छे दिन आए हैं. उसका लाभ हमारा समर्थन करने वालों को मिला है।
उन्होंने स्पष्ट किया कि संघ से संबंधित संस्थाओं, संगठनों या दलों पर संघ दबाव नहीं डालता। यहां कार्य करने वाले स्वयंसेवकों को पर्याप्त स्वतंत्रता होती है, जिससे वे अपने क्षेत्र में आवश्यक निर्णय और प्रयोग जिम्मेदारी से कर सकते हैं। वे जो अच्छे कार्य करते हैं, उसका श्रेय उन्हीं को जाता है, लेकिन जहां कमियां रह जाती हैं, उसके प्रश्न अभिभावक के नाते हमारे पास आते हैं और उसकी नैतिक जिम्मेदारी हम लेते हैं। संघ का कार्य केवल व्यक्तिनिर्माण का कार्य है। किसी विशेष क्षेत्र में कार्य करना संघ का कार्य नहीं है।
समान नागरिक संहिता पर अपनी भूमिका स्पष्ट करते हुए उन्होंने कहा कि समाज की मानसिकता तैयार करके तथा सभी समाज घटकों को विश्वास में लेकर इस प्रकार का कानून लागू किया जाना चाहिए। उत्तराखंड तथा अन्य कुछ राज्यों में ऐसे प्रयोग हो रहे हैं, इसलिए हम उसका स्वागत करते हैं। भारत विविधता में एकता को बनाए रखने वाला देश है, यह सिद्धांत ऐसे कानून बनाते समय प्राथमिकता से ध्यान में रखना चाहिए।
क्या संघ प्रमुख कोई पिछड़ी जाति का व्यक्ति बन सकता है इसको लेकर पूछे गए सवाल के जवाब में डॉ. भागवत ने स्पष्ट कहा कि जाति न तो योग्यता है और न ही बाधा, ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य या शूद्र इनमें से कोई नहीं, बल्कि कोई हिंदू ही संघ का सरसंघचालक होगा। भविष्य में अनुसूचित जाति या जनजाति के कार्यकर्ता भी सरसंघचालक बन सकते हैं।
बांग्लादेश में हिंदुओं पर हो रहे अत्याचार पर डॉ. भागवत ने कहा कि बांग्लादेश के सवा करोड़ हिंदुओं से संगठित होने का आह्वान किया। ऐसा होने पर अत्याचार पर स्वतः ही रोक लग जाएगी।
सब सुखी हो। अन्यथा दुखी लोग सुखी लोगों का सुख नष्ट कर देते है, इसीलिए समाज का हर घटक सुखी हो, यह सभी को सुनिश्चित करना चाहिए।
आरक्षण को लेकर डॉ. भागवत ने कहा कि जिन पर पीढ़ी दर पीढ़ी अन्याय या अत्याचार हुआ है, उनके सर्वांगीण उत्थान होने तक तथा उनके मन में सुरक्षा की भावना उत्पन्न होने तक संविधानसम्मत आरक्षण जारी रहना चाहिए, यह संघ की स्पष्ट भूमिका है।
डॉ. भागवत ने कहा कि समान नागरिक संहिता का विचार अच्छा है. विविधता में भी हमारा कोई विरोध नहीं है. पर यदि समानता से देश की एकता मजबूत होती है तो हमारा उसे समर्थन है. उत्तराखंड ने समान नागरिक संहिता के संबंध में पहले प्रस्ताव किया, फिर लोगों के सुझाव मांगे, तीन लाख सुझाव आए. उसके बाद उन्होंने कानून बनाया. कानून बन जाना पर्याप्त नहीं है. कानून का पालन होना चाहिए।
डॉ. मोहन भागवत ने भारत अमेरिका ट्रेड डील पर कहा, “आज के दौर में कोई एकाकी नहीं रह सकता. अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर डील करनी ही पड़ती है. उसमें कुछ लेना पड़ता है तो कुछ छोड़ना भी पड़ता है. अपने हित में क्या है? इसका ध्यान रखना ही चाहिए. हमें विश्वास है कि वर्तमान समय में उसका ध्यान रखा ही गया होगा. पिछले 10 वर्षों का जो एडमिनिस्ट्रेशन है, वह अडने वाला और तन कर खड़ा रहने वाला है.”
उन्होंने कहा कि संघ के स्वयंसेवकों को भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलनों तथा सभी प्रकार के प्रयासों में सहभागी होना चाहिए, यह संघ की भूमिका है। किंतु केवल कानून बनाकर भ्रष्टाचार पर नियंत्रण करना कठिन है, इसके लिए संस्कारित समाज मन का निर्माण उतना ही महत्वपूर्ण है। साथ ही कोई भी व्यवस्था मूल रूप से भ्रष्ट नहीं होती, बल्कि उस व्यवस्था में कार्य करने वाले व्यक्तियों का मन भ्रष्ट होता है और उसी कारण व्यवस्था भ्रष्ट होती है।
जबरदस्ती या लालच देकर धर्मांतरण किया जाता है तो वह निंदनीय है और उसका प्रत्युत्तर घर वापसी होगा, यह स्पष्ट करते हुए उन्होंने कहा कि यदि कोई व्यक्ति स्वेच्छा या स्वप्रेरणा से धर्म परिवर्तन करता है तो उसका विरोध नहीं किया जाना चाहिए। जनसंख्या का अनुपात केवल जन्मदर में कमी से नहीं बदलता, बल्कि धर्मांतरण और अवैध घुसपैठ के कारण भी बदलता है, इस ओर ध्यान दिलाते हुए अवैध घुसपैठ के संदर्भ में ‘डिटेक्ट एंड डिपोर्ट’ नीति को कठोरता से लागू करने का आह्वान उन्होंने किया। विदेशी अवैध घुसपैठियों को रोजगार देने के बजाय वह अपने देश के हिंदू या मुस्लिम नागरिकों को क्यों न दिया जाए, ऐसा प्रश्न उन्होंने उठाया।
उन्होंने कहा कि हिंदू और सिख पहले से ही एक थे और आज भी उनके बीच रोटी-बेटी के संबंध हैं। उनका रक्त संबंध है। पूजा पद्धति अलग मानी जा सकती है, उनकी विशिष्टता को मान्यता दी जानी चाहिए, लेकिन वे अलग नहीं हैं। हम सभी धर्म एक ही परंपरा से आए हैं। गुरु ग्रंथ साहिब में केवल सिख गुरुओं की ही नहीं, बल्कि संपूर्ण भारत के संतों की वाणी संकलित की गई है।
‘हिंद की चादर’ के रूप में पहचानी जाने वाली यह प्राचीन एकता पुनः स्थापित करनी है। समाज के नाते हम सभी एक हैं, यह ध्यान में रखना चाहिए। हिंदू नाम से कोई अलग धर्म अस्तित्व में नहीं है। आज जिसे हिंदू धर्म कहा जाता है, वही प्राचीन सनातन धर्म है। तथागत बुद्ध ने अपने उपदेशों के माध्यम से इसी सनातन धर्म में समयानुकूल सुधार किए।
संस्कृत भाषा को लेकर पूछे गए सवाल पर उन्होंने कहा कि संस्कृत बोलनी चाहिए तब जीवित रहेगी- बोलेंगे तो भाषा जीवित रहेगी। संस्कृत भारती- १० दिन के संवाद शिविर चलते हैं- रामरक्षा, गीता पढने से संस्कृत का व्याकरण जाना जा सकता है- संस्कृत स्तात्र कंठस्थ करने की परंपरा थी- सरकार का भाषा विभाग भी ऐसा प्रयास कर रहा है- समाज गुरुकुल खोले और स्वयंसेवक उसमें सहायता करेंगे- हमारे स्वयंसेवक गुरुकुल चला रहे हैं, जिनमें संस्कृत शिक्षण होता है।
उन्होंने कहा कि – हमारी हिंदू राष्ट्र की कल्पना में हिंदूराष्ट्र-जनपदवती भूमि- भूमि,जन जंगल, जानवर, बायोडायवर्सिटी सबका अपना महत्व है। जनपदवती भूमि, जहाँ भूमि, जल, जंगल, और वन्यजीव ecosystem/biodiversity के साथ एकीकृत हैं, जब ‘जन’ (लोग) उस विशिष्ट भौगोलिक क्षेत्र से भावनात्मक, आर्थिक और सांस्कृतिक रूप से जुड़कर उसमें स्थायी निवास करने लगते हैं, तब वह ‘जनपद’ कहलाता है। जब यही ‘जन’ साझा संस्कृति, नियमों और परस्पर निर्भरता के साथ एक व्यवस्थित इकाई में रहने लगता है, तब वह ‘समाज’ कहलाता है, जो आपस में जुड़े और आत्मनिर्भर होते हैं।
अमीर गरीब सभी जीवन के लिए कहते हैं कि साईं इतना दीजिए-जा में कुटुंब समाय… सभी के लिए यही गुण अच्छा लगता है- इस भूमि के साथ पुत्रत्व का संबंध, भारत माता हमारी माँ है। ये संस्कृति सनातन काल से जो है जो दुनिया की प्रथम संस्कृति है वह हिंदू संस्कृति ही है- गुरुजी ने कहा था कि भारत में खुद को हिंदू कहने वाला एक भी हिंदू जब तक जीवित है तब तक भारत हिंदूराष्ट्र है- बाकी बातें आने जाने वाली है- यह आत्मा है- शरीर हम सब मिलकर बना रहे हैं- राज्य, अमात्य, बल, दुर्ग, कोष, अमात्य, श्रुत राष्ट्र के शरीर हैं।
सतयुग में राजा नहीं होता था, समाज नैतिकता से चलता था। फिर राजा की आवश्यकता महससू हुई। राज्य के लिए राजा है तो राज्य को शक्ति चाहिए।
देश का व्यवहार चलाने के लिए इकॉनामी, कोष, भूमि, विद्वान सभी की आवश्यकता है। हमें श्रुत यानी मित्र भी चाहिए। ये सब शरीर के बाहरी अंग हैं।
हमारी राष्ट्र को लेकर जो कल्पना है वह नेशन की कल्पना नहीं है। हमारी राष्ट्र की कल्पना में हम पर्यावरण, राष्ट्र व समाज के लिए जिएं। हम कहाँ हैं इसका ज्ञान हमें होना चाहिए।
हमारे अंदर शत्रु और मित्र बोध होना चाहिए। ये बात एक बार में समझ में नहीं आती है। बार बास सुनने पर ही समझ में आती है।
विनोबाजी कहते थे ऋग्वेद में समाज समिति और सहचित्त की बात कही गई है। हम सब असहमत होकर भी सहभावना से काम करें। यही हमारा राष्ट्रवाद है।
सृष्टि में मेंढक, सांप गरुड़ का भी स्थान है। सृष्टि में एक धूल का कण भी सहयोगी है। किसी भी विचार में हमारा मत विचार विमर्श तक रहता है। लेकिन एक बार विमर्श अंतिम हो जाए तो वो सबका मत हो जाता है, हमारा मत नहीं होता, सबके मत में हमारा मत होता है।
वैदिक मंत्र समानो मन्त्रः समितिः समानी समानं मनः सह चित्तमेषाम्।
की व्याख्या करते हुए उन्होंने कहा कि यह मंत्र समान रूप, समरसता और सहमति को दर्शाता है। सभी की एकरूपता और समरसता से पूजा की जानी चाहिए ताकि वह सफल और सामंजस्यपूर्ण हो। सद्भाव और एकता के माध्यम से इष्ट देवों को प्रसन्न किया जाता है।
हमारा समावेशी स्वभाव है- समानो मंत्र समिति समानि, चित्त एक होना असंभव है- जितने लोग उतने- इसीलिए कहा सहचित्त होना चाहिए- विचार अलग हों लेकिन हमें साथ में रहकर देश को बडा करना है- यह सह भावना हमारे विचारों में आती है- सृष्टि के हर जीव को स्थान है- सॉंप, गरुड, मेंढक को भी स्थान है- अपना मत चर्चा तक, निर्णय होने के बाद सबका मत अपना मत होना चाहिए
डॉ. भागवत ने बताया कि विद्याभारती के लगभग 27 हजार विद्यालय चल रहे हैं और इसमें संस्कृत के साथ ही भारतीता की शिक्षा दी जाती है। ये गार्जियन के ऊपर है कि वे बच्चों को अपनी भाषा में शिक्षा के लिए प्रोत्साहित करें। विद्याभारती द्वारा अंग्रेजी में पढ़ने वाले बच्चों के लिए सीबीएसई स्कूल भी चला रहा है और उसमें भी बच्चे टॉप पर आ रहे हैं।
सरकार ने इंडियन नॉलेज सिस्टम बनाया है इसका नाम भारतीय शिक्षण मंडल होना चाहिए, बारतीय शिक्षा के लिए विदेशी भाषा में नाम क्यों…
समाज को सामाजिक कार्यों के लिए आगे आने और दान देने का आव्हान करते हुए उन्होंने यह नीतिशतकम् के श्लोक “दानं भोगो नाशस्तिस्रो गतयो भवन्ति वित्तस्य। यो न ददाति न भुङ्क्ते तस्य तृतीया गतिर्भवति।।” की व्याख्या करते हुए कहा कि धन की तीन ही गतियां (परिणाम) होती हैं: दान (देना), भोग (उपयोग करना), और नाश (नष्ट हो जाना)। जो व्यक्ति न दान करता है और न ही उपभोग, उसका धन निश्चित रूप से नष्ट हो जाता है।
वैदिक श्लोक यावद् भ्रियेत जठरं तावत् स्वत्वं हि देहिनाम्। अधिकं योऽभिमन्येत स स्तेनो दण्डमर्हति॥ का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि अपने स्वयम के पोषण के लिए जितना धन आवश्यक है उतने पर ही अपना अधिकार है। यदि इससे अधिक पर हमने अपना अधिकार जमाया तो यह सामाजिक अपराध है तथा हम दण्ड के पात्र है।
उन्होंने कहा कि खेती में किसान अपना मालिक हो- जेनेटिकली मॉडिफाइड सीड अपना पौधा नहीं बनाता- उसे खरीदना होगा- किसान दूसरे पर निर्भर हो जाता है- पारंपरिक रूप से अपना बीज, अपना खाद होता था- ८ से ९ हजार चावल की किस्में थीं- ये किस्में किसानों ने पैदा कीं- सदियों से हमारी वरायटी चल रही है- अब जितना उपयोगी है वह हमारे हाथ में है- हम “आ नो भद्राः क्रतवो यन्तु विश्वतः” ऋग्वेद के इस मंत्र क अपना आदर्श मानते हैं जिसका अर्थ है- “हमारे पास चारों ओर से कल्याणकारी (शुभ) और ज्ञानवर्धक विचार आते रहें“।
संघ प्रमुख ने आगे कहा, ज्ञान तो सारी दुनिया से आना चाहिए, परंतु जो लेना है, परीक्षण करके लेना चाहिए. बिना अपने देश की आकांक्षा, परंपरा और किसानों के हित को जाने, नया है इसलिए बराबर स्वीकार कर लेना ठीक नहीं. इसलिए हमारा संवेदनशील होना ठीक है।
डॉ. मोहन भागवत ने आगे कहा कि कम्युनिस्ट पार्टी का 100 वर्षों में विस्तार नहीं हुआ, यह प्रश्न उनसे पूछना चाहिए. अगर वे हमसे आकर पूछते हैं, तो हम उनका मार्गदर्शन करने को तैयार हैं. सिद्धांतहीन राजनीति चल जाती है, इसलिए चलाते हैं. जब पता चलेगा कि नहीं चलेगी तो वे करना बंद कर देंगे. राजनीति पर संघ का नहीं, मतदाताओं का दबाव होता है।
डॉ. मोहन भागवत ने कहा, अपनी आय का 1/6 खुद के लिए रखना, 1/6 अपने परिवार के लिए, 1/6 भगवान के लिए रखना, 1/6 आड़े वक्त के लिए बचत करके रखना, 1/6 धर्म-समाज के लिए रखना और 1/6 राजा [सरकार] को देना. अपनी आय में ये छह हिस्से रहते हैं, हमारी परंपरा में हजारों साल ये हम यही करते आए हैं।
संघ प्रमुख ने कहा कि सारी उपासनाएं चित्त शुद्धि के लिए है- धर्म के नाते कोई अंतर नहीं-रिलीजन दोनों अलग है- आप मुसलिम इसाइयों को समझाने के झंझट में मत पडें- दोनों में जो शाश्वत है जो बाद में जुडा है वो अलग है- इसीलिए सुसंगत नहीं है- शांति का पंथ कहा जानेवाला इस्लाम कहा जाता है लेकिन शांति कहीं नहीं है- जब अध्यात्म पर अधिष्ठित है पंथ तो वह ईश्वर की तरफ ले जाता है- पहले आप समझो फिर बताओ की धर्म एक ही है वह मानवधर्म है और वह हिंदू धर्म है- उस पर आना है- आप सच्चे इसाइयत-इसलाम पर आओ- यह होने के बाद ही संघर्ष खत्म होगा- दोस्ती होने के बाद ही यह होगा- दुनिया उसी की सुनती है जिसके पास ताकत है- हिंदू को शांति बात कहनी है लेकिन दुनिया हाथ में डंडा है तिक नहीं यह देखती है- ताकतवर की बात दुनिया सुनेगी। इसाईयत और इस्लाम में शाश्वत और बाद में जोडा गया हैं वो सुसंगत नही हैं।
आज जो इस्लाम या क्रिश्चिनिटी हम देखते है, वो मोहम्मद पैगम्बर या ईसा मसीहा ने बताया हुआ नहीं है। उनके तुरंत बाद इन रिलीजन्स को तत्कालीन राजनीति से जोड़ा गया। जिसके कारण हम इस्लाम या क्रिश्चिनिटी का आज का अलग स्वरूप देखते है।
इसलिये सच्चे स्वरूप में इसाईयत और इस्लाम आने से बात सरल होगी, सफल होगी.
गौतम बुध्द को लेकर उन्होंने कहा कि जिस प्रकार हनुमान के मूर्ति पर लगाया हुआ सिंदूर जमने के बाद उसे निकलना पड़ता है, वैसे ही सनातन धर्म में आए कालबाह्य तत्व को हटाने का कार्य तथागत गौतम बुद्ध ने किया।
उन्होंने कहा कि संघ अपनी यात्रा के एक सौ वर्षों में लगातार युवा हो रहा है आज संघ के कार्यकर्ताओं की औसत आयु २८ वर्ष है और इसे २५ वर्ष से नीचे लाने का प्रयास चल रहा है। देश का युवा देशभक्त और नैतिक आचरण करने वाला है। यदि उन्हें उनकी भाषा में विषय समझाए जाएं, तो वे उन्हें स्वीकार करते हैं और उसका आचरण भी करते हैं। इसलिए तार्किक पद्धति से उन्हें अपने मूल विचारों तक पहुंचाया जाना चाहिए। उन्हें प्रयोग करने की स्वतंत्रता और अवसर देना चाहिए तथा यदि प्रयोग में कोई त्रुटि हो जाए तो उनके पीछे दृढ़ता से खड़ा रहना चाहिए। यदि वर्तमान पीढ़ी युवाओं की जिज्ञासा शांत करने की क्षमता विकसित करे, तो युवा पीढ़ी और वर्तमान पीढ़ी के समन्वय से भविष्य का सशक्त भारत निर्माण होगा। भारतीय दर्शन का प्रभाव अंतरात्मा तक पहुंचता है, जबकि पाश्चात्य प्रभाव बाहरी स्तर तक सीमित रहता है।
संघ प्रमुख ने कहा कि हम एक समाज हैं. अल्पसंख्यक और बहुसंख्यक मानकर विचार नहीं करना चाहिए. अलग-अलग होने पर हम सब अल्पसंख्यक ही हैं.फास्डफूड खाने के लिए कोई कानून नहीं लाया गया, तो उसे बैन करने के लिए कानून क्यों लाना चाहिए? फास्डफूड लालच के चलते आया. खुद पर संयम रखकर उससे दूर रहना ही उससे बचने का उपाय है.
हर काम संघ को ही करना चाहिए, ऐसा नहीं है. चरित्रवान समाज के निर्माण का हमारा काम हम पूरा समय देकर भी पूरा नहीं कर पा रहे हैं. पेरिस समझौते के वादों को सबसे पहले पूरा करने में भारत सर्वप्रथम है. पर्यावरण के बारे में केवल संघ को विचार नहीं करना है. सारे समाज को विचार करना चाहिए. हालांकि पर्यावरण संरक्षण हमारी गतिविधियों में से एक है.
संघ चिरतरुण संगठन है, उसमें सभी पीढ़ियाँ काम करती हैं, और नई पीढ़ी को जल्दी आगे लाने का काम होता है. इसलिए पुरानी पीढ़ी जगह बना देती है. यह काम पीढ़ी-दर-पीढ़ी चलता है. संघ की औसत आयु आज की तारीख में 28 साल है. हम चाहते हैं कि यह 25 साल के भीतर आ जाए. रेव पार्टी के स्थान पर सत्संग पार्टी का चलन शुरू हुआ, यह हमने नहीं किया, सहजता से यह परिवर्तन हुआ है।
संस्कृत बोलनी चाहिए. भाषा वही जीवित रहती है जो चलन में रहती है. संघ केवल शाखा चलाने का कार्य करता है. संघ कोई गुरूकुल नहीं चलाता, चलाएगा भी नहीं. संघ के स्वयंसेवक गुरुकुल चलाते हैं, समाज के लोग गुरूकुल चलाते हैं तो संघ उनकी सहायता करता है. भारतीय शिक्षण मंडल के माध्यम से देशभर में गुरूकुल आदि का संचालन किया जाता है. मातृभाषा में उत्तम शिक्षा देने का कार्य विद्या भारती के माध्यम से किया जा रहा है.
सरकार के माध्यम से भी शिक्षा क्षेत्र में परिवर्तन के प्रयास किए जा रहे हैं. वैचारिक और राजनीतिक विरोध के चलते राज्य स्तर पर उसमें अवरोध पैदा नहीं किये जाने चाहिए. कला के क्षेत्र में संस्कार भारती और खेल के क्षेत्र में क्रीड़ा भारती के माध्यम से बहुत सारे कार्यक्रम चल रहे हैं. ध्येय के लिए आत्मीयतापूर्ण वातावरण से स्व अनुशासन ही संघ के कार्य का आधार है।
संघ का कार्य पहुंचाने के लिए संघ के स्वयंसेवक को ही वहां पहुंचना होता है. संघ को समझना है तो परसेप्शन या प्रोपेगेंडा से नहीं, खुद के अनुभव के आधार पर समझिए. साम्यवादी लेखिका रजनी पामदत्त ने अपनी पुस्तक में ब्रिटिशों को सुनाया है कि भारत में आपकी वजह से नहीं, बल्कि भारत की परंपरा से राष्ट्र संकल्पना स्थापित हुई है. अपने बारे में, अपनी पहचान के बारे में, अपने देश के बारे में स्पष्ट कल्पना कर सक्रिय हो जाइए, यही मेरा आप सभी से आह्वान है।
संघ प्रमुख द्वारा दिए गए संबोधनों के बाद कार्यक्रम के दूसरे दिन प्रश्न उत्तर सत्र में कई रोचक और तीखे सवाल श्रोताओँ ने पूछे, जिनका जवाब संघ प्रमुख ने तथ्यों, तर्कों व मजेदार ढंग से दिया।
नेतृत्व और आयु पर सवाल — संगठनात्मक स्थिरता का संकेत
प्रश्न: 75 वर्ष की आयु के बाद भी पद पर बने रहने पर सवाल। उत्तर:“जब संघ कहेगा, मैं पद छोड़ दूँगा… सेवा से सेवानिवृत्ति नहीं होती।”
राजनीतिक व्याख्या:
यह उत्तर संघ की निरंतरता और अनुशासन को दर्शाता है।
इससे यह संदेश गया कि RSS किसी व्यक्ति पर नहीं, बल्कि संस्था और परंपरा पर आधारित है।
यह उन राजनीतिक चर्चाओं का उत्तर भी था, जहाँ नेतृत्व परिवर्तन को सत्ता-राजनीति से जोड़कर देखा जा रहा था।
सामाजिक व्याख्या:
समाज में वरिष्ठता और अनुभव को सम्मान देने की भारतीय परंपरा को पुष्ट करता है।
युवाओं को यह संकेत भी कि नेतृत्व केवल उम्र से नहीं, बल्कि योग्यता और सेवा-भाव से तय होता है।
जाति और संघ प्रमुख पद — सामाजिक समावेशन की रणनीति
प्रश्न: क्या RSS प्रमुख बनने में जाति बाधा है? उत्तर:“जाति कोई बाधा नहीं… सबसे योग्य व्यक्ति चुना जाएगा।”
राजनीतिक व्याख्या:
यह बयान जातिगत राजनीति से दूरी का संकेत है।
इससे संघ यह दिखाना चाहता है कि वह सामाजिक न्याय और समावेशन के विरोध में नहीं है।
यह विशेष रूप से उन आलोचनाओं का उत्तर था कि RSS केवल उच्च जातियों का संगठन है।
सामाजिक व्याख्या:
यह समाज में जाति-आधारित विभाजन को कम करने का प्रयास है।
SC/ST और अन्य वंचित वर्गों के लिए यह एक प्रतीकात्मक संदेश है कि संघ नेतृत्व के दरवाज़े सबके लिए खुले हैं।
UCC (एक नागरिक संहिता) — सामाजिक संतुलन बनाम राजनीतिक निर्णय
प्रश्न: UCC पर आपका दृष्टिकोण? उत्तर:“सबकी सहमति से UCC बननी चाहिए, ताकि मतभेद न हों।”
राजनीतिक व्याख्या:
यह बयान सरकार के एजेंडे से पूरी तरह असहमति भी नहीं, और अंधसमर्थन भी नहीं है।
संघ यह दिखाना चाहता है कि वह संवैधानिक सुधार का समर्थक है, लेकिन सामाजिक स्थिरता की कीमत पर नहीं।
सामाजिक व्याख्या:
यह अल्पसंख्यकों के प्रति एक आश्वासन है कि उनकी भावनाओं और परंपराओं को नजरअंदाज नहीं किया जाएगा।
साथ ही बहुसंख्यक समाज को यह संकेत कि सुधार संघर्ष से नहीं, सहमति से होना चाहिए।
“घुसपैठियों” पर बयान — सुरक्षा बनाम सामाजिक सौहार्द
प्रश्न: अवैध घुसपैठियों पर आपका मत? उत्तर:“उनकी पहचान कर पुलिस को सूचना दें, उनको रोजगार न दें उन पर लगातार निगरानी रखें।”
राजनीतिक व्याख्या:
यह बयान राष्ट्रीय सुरक्षा और सीमावर्ती राजनीति से जुड़ा हुआ है।
यह सरकार की सीमा-सुरक्षा नीतियों के प्रति वैचारिक समर्थन का संकेत देता है।
सामाजिक व्याख्या:
यह स्थानीय समुदायों में डेमोग्राफिक परिवर्तन की चिंता को संबोधित करता है।
साथ ही यह नागरिकों को कानून के भीतर रहकर कार्य करने का संदेश देता है — स्वयं हिंसा या टकराव की अनुमति नहीं देता।
संस्कृति और पहचान — “हिंदू” शब्द का सामाजिक अर्थ
प्रश्न: भारत की सांस्कृतिक पहचान पर संघ का संदेश? उत्तर:“हमें अपनी सांस्कृतिक पहचान गर्व से बतानी चाहिए।”
राजनीतिक व्याख्या:
यह बयान राष्ट्रवादी विमर्श को सुदृढ़ करता है।
यह उन बहसों का उत्तर भी है जहाँ “हिंदू” शब्द को संकीर्ण धार्मिक अर्थ में देखा जाता है।
सामाजिक व्याख्या:
संघ “हिंदू” को केवल धार्मिक नहीं, बल्कि सभ्यतागत पहचान के रूप में प्रस्तुत करता है।
यह समाज में आत्म-गौरव और सांस्कृतिक आत्मविश्वास बढ़ाने की रणनीति है।
राजनीति औरRSS संबंध — दूरी बनाकर प्रभाव बनाए रखना
हालाँकि प्रश्न सीधे राजनीति पर नहीं था, लेकिन उन्होंने कहा: “BJP के अच्छे दिन RSS की वजह से आए, और हमारे लिए इसका उल्टा हो गया।
राजनीतिक व्याख्या:
यह RSS की वैचारिक श्रेष्ठता और दीर्घकालिक सामाजिक प्रभाव को रेखांकित करता है।
साथ ही यह दावा करता है कि संघ सत्ता का उपकरण नहीं, बल्कि सत्ता को दिशा देने वाला नैतिक स्रोत है।
सामाजिक व्याख्या:
यह स्वयंसेवकों को यह संदेश देता है कि उनका कार्य राजनीति से ऊपर है।
इससे संगठन के भीतर सेवा-भाव और त्याग की भावना को मजबूत किया जाता है।
नेतृत्व और आयु: संगठन व्यक्ति से बड़ा
एक प्रश्न के उत्तर में, जब उनसे 75 वर्ष की आयु के बाद भी पद पर बने रहने को लेकर सवाल किया गया, तो उन्होंने कहा कि जब भी संघ कहेगा, वे पद छोड़ देंगे, लेकिन सेवा से सेवानिवृत्ति संभव नहीं है। यह उत्तर संघ की उस परंपरा को रेखांकित करता है जिसमें संगठन व्यक्ति से ऊपर होता है। राजनीतिक दृष्टि से यह नेतृत्व परिवर्तन को सत्ता-राजनीति से अलग रखने का संकेत है, जबकि सामाजिक स्तर पर यह वरिष्ठता और अनुभव के सम्मान की भारतीय परंपरा को पुष्ट करता है।
घुसपैठ और सुरक्षा: सतर्कता, न कि टकराव
अवैध घुसपैठियों पर उन्होंने नागरिकों से अपील की कि वे सतर्क रहें और ऐसी स्थिति में पुलिस को सूचना दें, लेकिन स्वयं कानून हाथ में न लें। यह बयान राष्ट्रीय सुरक्षा के मुद्दे पर संघ की चिंता को दर्शाता है, वहीं सामाजिक स्तर पर यह शांति और कानून-व्यवस्था बनाए रखने की अपील भी है।
मुंबई में हुआ यह प्रश्न-उत्तर सत्र केवल संवाद नहीं, बल्कि संघ की भविष्य-दृष्टि का सार्वजनिक प्रदर्शन था। इसमें तीन बातें स्पष्ट रूप से उभरकर सामने आईं—
पहला, संगठनात्मक स्थिरता और अनुशासन;
दूसरा, सामाजिक समावेशन और सहमति पर आधारित सुधार;
तीसरा, राजनीति से संतुलित दूरी रखते हुए वैचारिक प्रभाव बनाए रखना।
इस सत्र ने यह संकेत दिया कि RSS आने वाले वर्षों में टकराव की बजाय संवाद, विभाजन की बजाय एकता और तात्कालिक राजनीति की बजाय दीर्घकालिक सामाजिक परिवर्तन की दिशा में आगे बढ़ना चाहता है।
संघ प्रमुख के उद्बोधन के दो रोचक उदाहरणः
– समाज में भाषा के आधार पर भेद नहीं है- तरह तरह की बातें उभारने पर ऐसा होता है- यह लोकलाइज्ड बीमारी है उसे सार्वजनिक नहीं करना- हर आदमी के आचरण की गारंटी कोई नहीं दे सकता- राजनीतिक स्वार्थ के कारण ये बातें होती हैं- ऐसा घावों का उपचार होना चाहिए- ये जहां है वही तक सीमित रहे- आम न बने- हमें सबसे मिलते रहना चाहिए- उनके घर में जाना चाहिए- भारत की एकता के पक्ष में खडे रहना चाहिए- गुंडागर्दी समाज का दुर्गुण नहीं-एक की करनी का दोष सबके माथे पर नहीं मढना।
ऐसा है कि पूरे समाज को देखा जाए जगह जगह पर मुंबई सहित समाज में भाषा के आधार पर भेदभाव है ऐसा नहीं है। कुछ मराठी लोग तलवार लेकर आए ऐसा नहीं है। ये लोकलाईज बीमारी है। राजनीति में स्वार्थ के कारण होती है। बाकी समाज को ये ध्यान रखना है कि ऐसी बातें फैले नहीं हम सब लोगों को आपस में मिलनते रहना चाहिए। क दूसरे के घर जाना चाहिए ।
भ्रष्टाचार के विरोध में आंदोलन में संघ आगे रहता है। भ्रष्टाचारियों को एक्सपोज़ करना ये हमारा प्रस्ताव है।
युत्तुर में संघ की प्रतिनिधि सभा में ये प्रस्ताव पारित किया गया कि स्वयं सेवक शुध्चार में खड़े होंगे। लोगों की मदद करेंगे। भ्रष्टाचार व्यवस्था में नहीं है आदमी के आचरण में रहता है।