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हिंदू व्यापारी मुगलों और अंग्रेजों के शोषण व अत्याचार के शिकार हुए और आज भी निशाने पर हैं

क्या हिंदू व्यापारी और साहूकार समुदायों (जैसे जैन/बनिया बैंकर्स, खत्री व्यापारी आदि) लोगों को मुस्लिम शासकों (नवाब, मुग़ल आदि) या औपनिवेशिक शक्तियों (मुख्यतः ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी) के हाथों उत्पीड़न, हत्या, विश्वासघात, आर्थिक तबाही या संबंधित संपत्तियों को गँवा देने का सामना नहीं करना पड़ा?

मध्यकाल में क्या गैर-मुस्लिम व्यापारियों (हिंदू/जैन बैंकर्स और व्यापारी) पर जजिया कर बार बार नहीं लगाया गया, आर्थिक दबाव नहीं बढ़ाया गया और वैश्य समुदाय से जुड़े मंदिरों को अपवित्र नहींकिया गया? क्या इससे उनकी समृद्धि प्रभावित नहीं हुई और कुछ ने प्रवास किया? 14वीं शताब्दी में फिरोज शाह ने हिंदू व्यापारियों का जो गंभीर आर्थिक शोषण और धार्मिक उत्पीड़न किया, जबरन धर्मांतरण और मंदिर विध्वंस किए, जिससे व्यापारियों पर जजिया जैसे बोझ बढ़े और असुरक्षा फैली थी, वह सब किसी को याद है?
मुग़ल काल में प्रसिद्ध जैन जौहरी और व्यापारी शांतिदास झवेरी की किसी को याद है? 1645 में क्या औरंगजेब (तब प्रिंस/गवर्नर) के आदेश पर अहमदाबाद में उनके चिंतामणि पार्श्वनाथ मंदिर में मिहराब (इस्लामी प्रार्थना स्थल) बनवाकर अपवित्र नहीं किया गया था ? औरंगजेब के शासन (1658–1707) में हिंदू व्यापारियों (बनिया आदि) पर मुस्लिमों की तुलना में दोगुना सीमा शुल्क (5% बनाम 2.5%) और काबुल जैसे स्थानों पर बिक्री/खरीद पर अधिक कर लगाए गए। जजिया कर की पुनर्स्थापना से आर्थिक तनाव बढ़ा और कई व्यापारी प्रभावित हुए।

परवर्ती मुग़ल शासन और ब्रिटिश प्रभुत्व (18वीं शताब्दी) के दौरान व्यापारियों को व्यापारिक विशेषाधिकारों में कमी कर उन पर भारी करारोपण और बंदरगाहों पर उनकी स्वायत्तता खत्म करने के पाठ कभी पढ़ाये गये, जिससे उन हिन्दू व्यापारियों का आर्थिक हाशियाकरण हुआ था? 18वीं शताब्दी की शुरुआत में नवाब मुर्शिद कुली खान ने अधिकार का विरोध करने वाले हिंदू जमींदारों और व्यापारियों को कैसे कुचला था? छोटे व्यापारियों पर भारी कर और दमन से आई तबाही की याद करें।

ये भी याद करें कि 18वीं शताब्दी की शुरुआत में सूरत के बनिया व्यापारियों को काज़ियों और अधिकारियों से असीमित रिश्वत देनी पड़ती थी ताकि उनके मंदिरों को अपवित्र होने या जब्त होने से बचाया जा सके। धार्मिक कट्टरता से क्रूर उत्पीड़न हुआ, जिससे कई परिवार प्रांत छोड़कर भाग गए थे। 1831 में तालपुर मीरों (सिंध के मुस्लिम शासकों) के शासन में एक मुस्लिम भीड़ ने सेठ होतचंद को पकड़ लिया और जबरन इस्लाम कबूल करने की कोशिश की। उन्होंने विरोध किया, लेकिन यह घटना हिंदू व्यापारियों की धार्मिक उत्पीड़न की कमजोरी को दर्शाती है। सेठ नाओमल को तालपुरों के तहत निरंतर धमकियाँ और हाशिए पर धकेला गया।

यदि गजनवी गोरी आदि का मुख्य धंधा सोना चाँदी लूटना था तो क्या वे सिर्फ मंदिरों का ही धन लूट रहे थे?

बंगाल के प्रसिद्ध जैन साहूकार जगत सेठ परिवार के महताब चंद की याद है जिसे 1763 में मुस्लिम नवाब मीर कासिम ने मुंगेर किले से फेंककर या डुबोकर मार डाला? नवाब को परिवार के बंगाल के टकसाल व खजाने पर प्रभाव से नफरत थी। स्वरूप चंद की याद है जिसे 1763 में नवाब मीर कासिम ने मार डाला था? जगत सेठ जैसे प्रमुख व्यापारियों को सीधे धमकियाँ और अपमान झेलना पड़ा। सिराज-उद-दौला ने 3 करोड़ रुपये का Tribute मांगा और इनकार पर महताब चंद की पिटाई की गई थी।

क्या गोवा इंक्विजिशन (1560 से आगे) के दौरान हिंदू व्यापारियों को जबरन धर्मांतरण, संपत्ति जब्ती और निर्वासन का सामना हकरना पड़ा था जिससे स्थापित व्यापारिक नेटवर्क बाधित हुए?

क्या किसी को कलकत्ता में रहने वाले धनी पंजाबी खत्री व्यापारी ओमिचंद (अमीर चंद) की याद है जिसे रॉबर्ट क्लाइव ने नकली संधि से धोखा दिया था और लाखों रुपये का वादा किया था लेकिन धोखा पता चलने पर वे मानसिक रूप से टूट गए और 1767 में ब्रिटिश कंपनी शासन के तहत मर गए?

यदि अंग्रेज भारत के पैसे का इतना ड्रेन कर रहे थे कि दादा भाई नौरोज़ी को उस युग में उस पर एक पूरी पुस्तक लिखनी पड़ी तो वह किस वर्ण का सबसे बड़ा pauperisation था? 1765 के बाद (दिवानी अधिकार मिलने पर) ब्रिटिश नीतियों ने व्यापार पर एकाधिकार किया, कपड़ा उद्योग को नष्ट किया और ब्रिटिश माल से बाजार भर दिया, जिससे पारंपरिक हिंदू व्यापारिक नेटवर्क ढह गए।

क्या वैश्य समुदाय का देशप्रेम कुछ कम था? भामाशाह कौन थे? गुरु गोबिंद सिंह जी के छोटे साहिबजादों (ज़ोरावर सिंह और फतेह सिंह) और माता गुजरी जी की शहादत के बाद, मुग़ल अधिकारियों ने उनके अंतिम संस्कार के लिए सरहिंद की ज़मीन पर सोने के सिक्के खड़े करके (लगभग 7,800 अशर्फ़ी) बिछाने की शर्त रखी। तब हिन्दू वैश्य तोदार मल ने अपनी पूरी संपत्ति बेचकर यह किया और शवों को संस्कार के लिए भूमि को प्राप्त किया था। गुरु तेग बहादुर जी को 500 सोने की मोहरें चढ़ा देने वाले मक्खन शाह लुबाना की याद करें। 12वीं शताब्दी में दिल्ली के आसपास के जैन व्यापारियों ने पृथ्वीराज चौहान जैसे राजपूत राजाओं को आर्थिक सहायता दी थी और युद्धों में योगदान किया था।
तब कैसा लगता है जब अत्याचारों को झेलने की इकतरफ़ा कल्प-कथाएँ सुनाई जाती हैं?

(लेखक सेवानिवृत्त आईएएस अधिकारी हैं और मध्य प्रदेश के चुनाव आयुक्त हैं)

साभार-https://www.facebook.com/share/1RYa6gn9jv/  से

आत्महत्या और अवसाद को जन्म दे रही है ऑनलाईन गेमिंग की लत

ऑनलाइन गेमिंग की लत एवं आभासी दुनिया कितनी भयावह एवं घातक हो सकती है, इसकी एक ही दिन में दो अलग-अलग जगह घटी घटनाओं ने न केवल झकझोरा है, बल्कि यह हमारे समय, हमारी सामाजिक संरचना और हमारी सामूहिक असावधानी पर लगा हुआ एक गहरा प्रश्नचिह्न बना है। धीरे-धीरे किशोरवय को अपने चपेट में लेने वाली यह प्रवृत्ति कितनी हृदयविदारक हो सकती है, उसका उदाहरण बुधवार को घटी ये दो भयावह घटनाएं हैं। एक हृदयविदारक घटना में गाजियाबाद की तीन अल्पवयस्क बहनों ने नौवीं मंजिल से कूदकर आत्महत्या कर ली।

इस दुर्भाग्यपूर्ण घटना में 12, 14 और 16 साल की तीन सुकोमल बहनें असमय काल-कवलित हो गईं। ऑनलाइन कोरियन गेम की दीवानी बहनें कोरिया में जाकर बसने और वहीं नया जीवन शुरू करने का सपना देखती थीं। घर वालों ने जब उनकी ऑनलाइन सनक से परेशान होकर उनसे मोबाइल छीन लिए, तो वे तनाव व अवसाद में घिर गई। फिर तीनों बहनों ने नौवीं मंजिल से कूदकर आत्महत्या कर ली। ऐसी ही घटना हिमाचल प्रदेश के कुल्लू में भी घटी जहां एक पंद्रह वर्षीय किशोर ने ऑनलाइन गेम के अपने एक विदेशी साथी के बिछुड़ने के गम में घर में आत्महत्या कर ली। किशोर दसवीं का छात्र था। इन घटनाओें ने समाज को स्तब्ध ही नहीं किया, बल्कि भीतर तक गहरा घाव दिया है। यह कोई आकस्मिक या अलग-थलग घटना नहीं है। इससे पहले झाबुआ, भोपाल और देश के अन्य हिस्सों में सामने आई ऐसी घटनाएं यह संकेत देती हैं कि आभासी दुनिया किस तरह वास्तविक जीवन पर हावी होती जा रही है और हम अनजाने में एक ऐसे समाज का निर्माण कर रहे हैं जहां संवेदनाएं, संवाद और जीवन-मूल्य स्क्रीन के पीछे दम तोड़ते जा रहे हैं।

ऑनलाइन गेमिंग अपने आप में अपराध नहीं है, न ही तकनीक शत्रु है, लेकिन जब यह बच्चों और किशोरों के लिए लत बन जाए, तो यह एक धीमा जहर बन जाती है। यह जहर चुपचाप बच्चों के मस्तिष्क में प्रवेश करता है, उनकी सोच, उनकी भावनात्मक संरचना और उनके निर्णय लेने की क्षमता को विकृत करता है। गेमिंग की दुनिया बच्चों को तात्कालिक रोमांच, आभासी जीत और काल्पनिक पहचान देती है, लेकिन धीरे-धीरे वही दुनिया उन्हें वास्तविक जीवन से काट देती है। परिवार, मित्र, पढ़ाई, प्रकृति, खेल और संवाद-सब कुछ पीछे छूटने लगता है। गाजियाबाद की तीनों बहनों का यह कदम इसी कटाव का चरम और भयावह परिणाम है। विशेषज्ञ मानते हैं कि अत्यधिक ऑनलाइन गेमिंग बच्चों के मस्तिष्क में आवेग नियंत्रण को कमजोर करती है। जोखिम का आकलन करने की क्षमता घटती है और भावनात्मक अस्थिरता बढ़ती है। हार, असफलता या गेम से वंचित किए जाने की स्थिति में अवसाद, क्रोध और निराशा गहराने लगती है। कई बार बच्चे आत्महत्या जैसे चरम कदम को भी एक ‘गेम ओवर’ की तरह देखने लगते हैं। यह सोच अपने आप में अत्यंत खतरनाक है। आत्महत्या की प्रवृत्ति का बढ़ना केवल मानसिक स्वास्थ्य का प्रश्न नहीं है, बल्कि यह एक सामाजिक चुनौती है, जो हमारी परवरिश, हमारी प्राथमिकताओं और हमारी नीतियों पर सवाल उठाती है।

आज के परिवारों में माता-पिता की व्यस्तता, एकल परिवारों की बढ़ती संख्या और संवाद की कमी ने बच्चों को अकेलेपन की ओर धकेला है। स्मार्टफोन कई घरों में बच्चों की चुप्पी खरीदने का सबसे आसान साधन बन गया है। रोता बच्चा हो, जिद करता बच्चा हो या समय न देने की मजबूरी-मोबाइल फोन एक त्वरित समाधान बन चुका है। लेकिन यही समाधान आगे चलकर सबसे बड़ी समस्या बन जाता है। हम यह भूल जाते हैं कि बच्चा केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि मार्गदर्शन, स्नेह और समय चाहता है। जब यह सब उसे स्क्रीन से मिलने लगता है, तो परिवार की भूमिका स्वतः कमजोर हो जाती है। यह भी एक कठोर सत्य है कि कई माता-पिता स्वयं डिजिटल लत के शिकार हैं। ऐसे में बच्चों को रोकने का नैतिक और व्यवहारिक अधिकार भी कमजोर पड़ जाता है। हम बच्चों से अपेक्षा करते हैं कि वे मोबाइल कम चलाएं, जबकि हमारे अपने हाथों में हर समय फोन रहता है। यह दोहरा व्यवहार बच्चों के मन में भ्रम और विद्रोह दोनों पैदा करता है। इसलिए समस्या का समाधान केवल बच्चों पर नियंत्रण नहीं, बल्कि पूरे पारिवारिक वातावरण में संतुलन लाने से जुड़ा है।

सरकार और समाज की भूमिका भी इस संकट में कम महत्वपूर्ण नहीं है। ऑनलाइन गेमिंग उद्योग तेजी से बढ़ रहा है, लेकिन उसके सामाजिक प्रभावों पर पर्याप्त नियंत्रण और निगरानी का अभाव है। कई गेम्स में हिंसा, आक्रामकता और जोखिम भरे व्यवहार को सामान्य और रोमांचक रूप में प्रस्तुत किया जाता है। बच्चों के लिए आयु-उपयुक्त सामग्री, समय-सीमा और चेतावनी संकेतों को सख्ती से लागू करना अब विकल्प नहीं, बल्कि अनिवार्यता बन चुका है। सरकार को चाहिए कि वह ऑनलाइन गेमिंग और डिजिटल कंटेंट के लिए स्पष्ट और कठोर नियामक ढाँचा विकसित करे, जिसमें बच्चों की सुरक्षा सर्वोपरि हो। विद्यालयों की भूमिका भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। शिक्षा केवल पाठ्यक्रम तक सीमित नहीं रह सकती। डिजिटल साक्षरता, मानसिक स्वास्थ्य और जीवन-कौशल को शिक्षा का अनिवार्य हिस्सा बनाया जाना चाहिए। बच्चों को यह सिखाना आवश्यक है कि तकनीक का उपयोग कैसे किया जाए, न कि तकनीक के गुलाम कैसे बना जाए। शिक्षकों को भी बच्चों के व्यवहार में होने वाले बदलावों, अकेलेपन, चिड़चिड़ेपन और अचानक गिरते शैक्षणिक प्रदर्शन जैसे संकेतों को गंभीरता से लेना होगा।

मनोवैज्ञानिक सहायता को लेकर समाज में जो झिझक और संकोच है, उसे भी तोड़ना होगा। मानसिक स्वास्थ्य को कमजोरी नहीं, बल्कि स्वास्थ्य का अभिन्न अंग माना जाना चाहिए। यदि किसी बच्चे में अवसाद, अत्यधिक चुप्पी, आक्रामकता या आत्मघाती विचारों के संकेत दिखें, तो समय रहते विशेषज्ञ की मदद लेना अत्यंत आवश्यक है। देर करना कई बार अपूरणीय क्षति में बदल जाता है। निस्संदेह, ये आत्मघात की घटनाएं, ऑनलाइन गतिविधियों के अतिरेक से मानसिक स्वास्थ्य पर पड़ने वाले घातक प्रभाव को लेकर गंभीर सवालों को जन्म देती हैं। निश्चित रूप से आत्मघात की ये घटनाएं हमारे नीति-नियंताओं और अभिभावकों को आसन्न संकट के प्रति सचेत करती हैं। दरअसल,ये दुखद घटनाएं एक घातक प्रवृत्ति को ही उजागर करती हैं कि गेमिंग और डिजिटल संपर्क लाखों युवाओं को आभासी समुदाय और मनोरंजन तो प्रदान कर सकते हैं, लेकिन साथ ही ये भावनात्मक कमजोरियों,सामाजिक अलगाव और मानसिक स्वास्थ्य संबंधी जरूरतों की पूर्ति न होने जैसी समस्याओं को भी जन्म दे सकते हैं। हालांकि, वहीं दूसरी ओर समाज विज्ञानी इस बात पर भी बल देते हैं कि केवल गेमिंग या ऑनलाइन मित्रता ही आत्महत्या का कारण नहीं बन सकती हैं। निस्संदेह, आत्महत्या एक जटिल और बहुआयामी घटना है। लेकिन समस्याग्रस्त डिजिटल जुड़ाव, विशेष रूप से जब यह ऑफलाइन जीवन से अलगाव, बाधित शिक्षा और तीव्र भावनात्मक तनाव के साथ होता है तो संवेदनशील युवा मन में परेशानी को और बढ़ा सकता है।

गाजियाबाद की यह घटना हमें यह भी सोचने पर मजबूर करती है कि हमने बच्चों के लिए कैसी दुनिया बनाई है। क्या हमने उन्हें संवाद दिया, या केवल उपकरण थमा दिए? क्या हमने उन्हें संस्कार दिए, या केवल सुविधाएं? क्या हमने उन्हें सुनने का समय दिया, या केवल आदेश? यह आत्ममंथन केवल पीड़ित परिवारों तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि पूरे समाज को अपने भीतर झांककर देखना होगा। यह घटना एक चेतावनी है, एक टर्निंग पॉइंट है। यदि अब भी हमने इसे एक सामान्य समाचार की तरह भुला दिया, तो भविष्य में ऐसी घटनाएं और बढ़ेंगी। समाज को, सरकार को और प्रत्येक परिवार को मिलकर कड़े और संवेदनशील कदम उठाने होंगे। तकनीक को नकारना समाधान नहीं है, लेकिन उसे बिना नियंत्रण स्वीकार करना भी आत्मघाती है। संतुलन, संवाद और सहभागिता ही बच्चों की सुरक्षा का वास्तविक आधार हैं। गाजियाबाद की तीनों बहनों हो या कूल्लु के किशोर की असमय मृत्यु हमें यह याद दिलाती है कि अगर हमने अभी नहीं संभला, तो यह इलेक्ट्रॉनिक खतरा हमारे घरों, हमारे भविष्य और हमारी संवेदनाओं को निगलता चला जाएगा। यह समय है जागने का, सोचने का और ठोस कदम उठाने का-क्योंकि यह सवाल केवल तकनीक का नहीं, बल्कि जीवन का है।

(ललित गर्ग)


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राहुल गांधी की पिच पर लुढ़कते नरेंद्र मोदी और उन की भाजपा

पता नहीं क्यों कुछ लोग राहुल गांधी को पप्पू और नासमझ आदि-इत्यादि बताते रहते हैं। मेरा मानना है कि राहुल गांधी में समझ तो है l बिना समझ के तो हर बार संसद का अपहरण कर लेना आसान नहीं है l पट्ठा समूची भाजपा को नचा देता है l शीर्षासन करवा देता है। सारे योग प्राणायाम भी। फिर भी कुछ परिणाम हासिल नहीं होता। चिल्लाते रहिए संसदीय नियम , यह-वह। पर वह अपनी अराजकता के दम पर सही , समूची भाजपा को सिर के बल खड़ा कर देता है l लोकसभा में ऐन स्पीकर के सामने पूरी हेकड़ी से खड़े हो कर चाय की चुस्कियां लेते रहने का आत्मविश्वास और अभद्रता भी सोची समझी बात है। नासमझी नहीं। अभी तक किसी नेता प्रतिपक्ष को ऐसा करते देखा या सुना नहीं गया। यह मोदी की कायरता से उपजी हुई हनक है।

राहुल का चुनाव न जितवा पाना , कांग्रेस की हार का रिकार्ड बनाना , कांग्रेस को निरंतर दीमक बन कर ख़त्म करते जाना , अपनी अराजक , सामंती और नशेड़ी छवि बना लेना आदि-इत्यादि यह सब अलग विषय है।

जब तक देश की जनता राहुल गांधी को प्रधान मंत्री नहीं बनवा देती तब तक उसे यह सब देखने और बर्दाश्त कर लेने की क्षमता विकसित कर लेनी चाहिए। क्यों कि दुनिया एक बार ट्रंप को शायद समझ ले , राहुल गांधी को समझना नामुमकिन है। क्यों कि वह बहुत समझदार आदमी है। पहले के समय में लोग कहते थे कि भाजपा और मोदी की पिच पर राहुल गांधी खेलता है। लोग जाने क्या – क्या कहते थे।

अब का मंज़र यह है कि मोदी समेत समूची भाजपा राहुल गांधी की पिच पर पस्त है। हर बार मोदी को राहुल लोकसभा में घेर कर गिरा देता है। चुनाव जीतना भले मोदी को आता हो। दुनिया भर की डिप्लोमेसी आती हो। ट्रंप को झुकाना भी आता हो , पाकिस्तान की चटनी बनाना भी आता हो पर लोक सभा में राहुल से लड़ना नहीं आता। हार-हार जाता है मोदी , राहुल के आगे।

तो सिर्फ़ इस लिए कि राहुल समझदार बहुत है। यह राहुल का ही डर है कि ओ बी सी को ख़ुश करने के लिए जातीय जनगणना और यू जी सी एक्ट लाना पड़ता है मोदी को। यह राहुल गांधी की पिच है। आप होंगे 370 हटाने के उस्ताद , तीन तलाक़ को ख़त्म करने के मास्टर। सी ए ए के शौक़ीन। मुफ़्त अनाज , शौचालय , गैस जैसी लोकल्याणकारी बातें करने के बाजीगर होंगे आप। देते रहिए देश को इंफ्रास्ट्रक्चर। पर जो आत्मविश्वास राहुल गांधी के चेहरे पर मोदी को अपनी अराजकता में चित्त करने के बाद दीखता है , मोदी के चेहरे पर यह आत्मविश्वास कभी किसी ने देखा हो तो बताए भी।

इस लिए भी कि राहुल गांधी अपने कोर वोटर की पीठ में कभी मोदी की तरह छुरा नहीं घोंपता। मोदी को इस में महारत है। महारत तो ममता बनर्जी की भी देखने लायक़ है कि दिल्ली आ कर जिस तरह चुनाव आयोग में अपनी बात चुनाव आयुक्त को सुना कर बिना उस को सुने उठ गई। कपिल सिब्बल , सिंघवी जैसे वकीलों की फ़ौज को साथ ले कर सुप्रीम कोर्ट में बतौर वकील ख़ुद को उपस्थित किया , शेरनी की तरह गरज कर मोदी के चेहरे का रंग उड़ा दिया है। तो ममता बनर्जी भी यह सारी नौटंकी अपने कोर वोटर कहिए , घुसपैठिया वोटर कहिए , के लिए कर रही है। दहाड़ती हुई घूम रही है।

पर मोदी ?

अपने वोटर का दुःख-दर्द नहीं जानता। अपने वोटर को चूस कर सिर्फ़ सत्ता का शहद जानता है। अपने वोटर को इमोशनली ब्लैकमेल करता रहता है। टेकेन फॉर ग्रांटेड लिए रहता है। अपने वोटरों को जातियों के खाने में बांट कर आपस में लड़ा देता है। आरक्षण अस्सी से पचासी प्रतिशत करने के मंसूबे पाले हुए है ताकि 2029 में फिर सत्ता का शहद चखे। इसी लिए कभी राहुल गांधी तो कभी ममता बनर्जी अपनी ही पिच पर ला कर मोदी को लुढ़का देती है। अब आप ही बताइए कि नासमझ कौन है ?

राहुल गांधी कि नरेंद्र मोदी ?

दिग्विजय सिंह की अमृता राय के साथ की अंतरंग फ़ोटो कंप्यूटर पर हैक करवा कर दिग्विजय सिंह की थू-थू करवा दी। संजय जोशी की अंतरंग वीडियो निकलवा ली। सार्वजनिक जीवन ख़त्म हो गया संजय जोशी का। प्रणव पांड्या पागल बने घूम रहे। गोविंदाचार्य पता नहीं कहां धूल फांक रहे हैं। एक से एक सूरमा सांस नहीं ले पा रहे। हार्दिक पटेल की अय्याशी भी दिखा दी सब को। सब जानते हैं राहुल गांधी भी अय्याश है। विदेश यात्राओं के लिए बदनामी इसी लिए है राहुल की। पर एक फ़ोटो भी नहीं निकाल पाए ? वीडियो तो बहुत दूर की बात है। राहुल तो ललकार रहा है कि एप्स्टीन फ़ाइल के कारण मोदी ट्रंप से कंप्रोमाइज कर गए। अभी बहुत माल है उस के पास।

यह भी राहुल की पिच है जहां वह मोदी को लुढ़का रहा है। कौन सा खेत चर रहे हैं भाजपा के चाणक्य लोग ? क्यों भैंस बन गए हैं। और यह भैंस भी किस पानी में थाह ले रही है। नक्सली देश से ख़त्म करने की गर्जना करने वाले लोग इस अराजक की चिकित्सा करने में अक्षम क्यों हैं भला !

सोचिए कि जो एक समझदार राहुल गांधी का इलाज नहीं कर पा रहा , वह देश का , देश की समस्याओं का क्या इलाज करेगा ? फिर तमन्ना ग्लोबल लीडर बनने की है।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार, राजनीतिक विश्लेषक हैं और कई पुस्तकें लिख चुके हैं https://sarokarnama.blogspot.com/ उनका ब्लॉग है)

गुरुकुल प्रणाली जीवित होगी तो हमारा देश, संस्कृति और नई पीढ़ी बचेगी

भारत में प्राचीन काल से ही शिक्षा और विद्या के क्षेत्र में समृद्ध परंपरा रही है। यह सर्वविदित है कि यूरोप, मध्य पूर्व और पुर्तगाल जैसे अन्य देशों के लोग गुणवत्तापूर्ण शिक्षा प्राप्त करने के लिए भारत आते थे। प्राचीन काल में भारत में प्रचलित प्रसिद्ध शिक्षा प्रणालियों में से एक गुरुकुल प्रणाली थी। आप सोच रहे होंगे कि गुरुकुल प्रणाली वास्तव में क्या है। आइए इसके बारे में और अधिक जानें।

गुरुकुल प्रणाली क्या है?
यह एक आवासीय शिक्षा प्रणाली थी जिसकी उत्पत्ति भारतीय उपमहाद्वीप में लगभग 5000 ईसा पूर्व हुई थी। यह वैदिक काल में अधिक प्रचलित थी, जहाँ छात्रों को विभिन्न विषयों की शिक्षा दी जाती थी और उन्हें सुसंस्कृत एवं अनुशासित जीवन जीना सिखाया जाता था। गुरुकुल वास्तव में शिक्षक या आचार्य का घर होता था और यह शिक्षा का केंद्र था जहाँ छात्र अपनी शिक्षा पूरी होने तक रहते थे। गुरुकुल में सभी को समान माना जाता था और गुरु (शिक्षक) और शिष्य (छात्र) एक ही घर में या एक-दूसरे के पास रहते थे। गुरु और शिष्य का यह संबंध इतना पवित्र था कि छात्रों से कोई शुल्क नहीं लिया जाता था। हालांकि, छात्र को गुरुदक्षिणा देनी पड़ती थी , जो शिक्षक के प्रति सम्मान का प्रतीक थी। यह मुख्य रूप से धन के रूप में या किसी विशेष कार्य के रूप में होती थी जिसे छात्र को शिक्षक के लिए करना होता था।

वर्तमान समय में गुरुकुल प्रणाली का महत्व
गुरुकुलों का मुख्य उद्देश्य छात्रों को प्राकृतिक वातावरण में शिक्षा प्रदान करना था, जहाँ शिष्य भाईचारे, मानवता, प्रेम और अनुशासन के साथ एक-दूसरे के साथ रहते थे। भाषा, विज्ञान, गणित जैसे विषयों की शिक्षा समूह चर्चाओं और स्व-अध्ययन आदि के माध्यम से दी जाती थी। इतना ही नहीं, कला, खेल, शिल्प और गायन पर भी ध्यान दिया जाता था, जिससे उनकी बुद्धि और आलोचनात्मक सोच का विकास होता था। योग, ध्यान, मंत्रोच्चार आदि गतिविधियों से सकारात्मकता और मन की शांति उत्पन्न होती थी और वे स्वस्थ रहते थे। व्यावहारिक कौशल विकसित करने के उद्देश्य से दैनिक कार्य स्वयं करना भी अनिवार्य था। इन सभी से उनके व्यक्तित्व का विकास हुआ और उनका आत्मविश्वास, अनुशासन, बुद्धि और जागरूकता बढ़ी, जो आज भी आने वाली दुनिया का सामना करने के लिए आवश्यक है।

वर्तमान शिक्षा प्रणाली की खामियाँ:
दुर्भाग्यवश, उपरोक्त अवधारणा लुप्त हो चुकी है और लॉर्ड मैकाले द्वारा 1835 में भारत में लाई गई आधुनिक शिक्षा प्रणाली पूरी तरह से दूसरों से आगे निकलने की होड़ में लगी है। इसमें व्यक्तित्व विकास, नैतिक चेतना का सृजन और नैतिक प्रशिक्षण का पूर्ण अभाव है। इस शिक्षा प्रणाली की सबसे बड़ी खामियों में से एक यह है कि यह छात्रों को समग्र शिक्षा प्रदान करने वाली संस्थागत अवधारणा के बजाय अधिक व्यावसायिक प्रकृति की है। यह शारीरिक गतिविधियों और अन्य कौशल विकास के लिए बहुत कम समय देती है जो एक छात्र को बेहतर इंसान बनने में सहायक हो सकते हैं।

क्या भारत में गुरुकुल प्रणाली की आवश्यकता है
? कई लोग गुरुकुल प्रणाली को अव्यवस्थित और विचित्र मानते हैं। शिक्षक के साथ रहना, पाठ्यक्रम का अभाव या नियमित दिनचर्या न होना, ये सब बातें बच्चों के लिए सीखने का एक अनूठा अवसर हो सकता है। हालांकि, आधुनिक शिक्षाविदों ने इस पर गहराई से विचार किया है और पाया है कि गुरुकुल प्रणाली की कई शिक्षण पद्धतियों को वर्तमान शिक्षा प्रणाली में शामिल किया जा सकता है। यहाँ कुछ उदाहरण दिए गए हैं, जिनसे हमें यह समझने में मदद मिलेगी कि गुरुकुल प्रणाली क्यों महत्वपूर्ण है।

आधुनिक अवसंरचना – छात्रों की सशक्त शिक्षा तभी संभव है जब व्यावहारिक ज्ञान पर ध्यान केंद्रित किया जाए। लेकिन अफसोस, हमारी वर्तमान शिक्षा प्रणाली केवल किताबी ज्ञान और रटने पर ही आधारित है, जो पर्याप्त नहीं है। गुरुकुल प्रणाली व्यावहारिक ज्ञान पर केंद्रित थी, जिसने छात्रों को जीवन के सभी क्षेत्रों में तैयार किया। वर्तमान समय में, यह शैक्षणिक और पाठ्येतर गतिविधियों के साथ-साथ ध्यान और आध्यात्मिक जागरूकता के क्षेत्र में शिक्षा प्रदान करके किया जा सकता है, जिससे छात्र बेहतर व्यक्ति बन सकें।
समग्र शिक्षा – आज की शिक्षा प्रणाली मुख्य रूप से रैंक आधारित प्रणाली पर केंद्रित है, जो साथियों के प्रति द्वेष से प्रेरित है। महत्वाकांक्षी माता-पिता भी इसमें योगदान देते हैं, जो छात्रों के ज्ञान का आकलन केवल शैक्षणिक प्रदर्शन के आधार पर करते हैं। इसके विपरीत, गुरुकुल प्रणाली मूल्य आधारित प्रणाली पर काम कर सकती है, जहाँ बच्चे की विशिष्टता पर ध्यान केंद्रित किया जा सकता है ताकि वे अपनी रुचि के क्षेत्र में उत्कृष्टता प्राप्त कर सकें। इससे एक अच्छा चरित्र भी विकसित होगा जो तीव्र प्रतिस्पर्धा और बढ़ते तनाव से दूर रहेगा, जो आमतौर पर अवसाद का कारण बनता है।
शिक्षक और विद्यार्थी का संबंध – वर्तमान समय की आवश्यकता यह सुनिश्चित करना है कि शिक्षकों और विद्यार्थियों के बीच मैत्रीपूर्ण और सम्मानजनक संबंध हो। ऐसा इसलिए है क्योंकि जब बच्चे सुरक्षित महसूस करते हैं और अपने अभिभावक पर भरोसा करते हैं, तो वे भी वैसा ही व्यवहार करने की अधिक संभावना रखते हैं। यह संबंध गुरुकुल प्रणाली में मौजूद था, जिसे आज गतिविधियों और प्रशिक्षण कार्यशालाओं के माध्यम से विद्यार्थियों के साथ घनिष्ठ संबंध स्थापित करने के द्वारा विकसित किया जा सकता है।

अंत
में, भारतीय शिक्षा में गुरुकुल प्रणाली को शामिल करने का मुख्य उद्देश्य बच्चों को संतुलित जीवन की अवधारणा को समझने में सहायता करना है। संतुलन की यह विचारधारा बच्चों को छोटी उम्र से ही सिखाई जानी चाहिए ताकि वे काम, भोजन, व्यायाम और अपने जीवन जीने के तरीके के बारे में सोच-समझकर निर्णय ले सकें।

लेखक के बारे मेंः निखिल चंदवानी 10 पुस्तकों के लेखक, TED(x) वक्ता और राइटर्स रेस्क्यू सेंटर के संस्थापक हैं। उन्हें हाल ही में 2019 में लेखन में उत्कृष्टता के लिए राष्ट्रीय गौरव पुरस्कार से सम्मानित किया गया है।
 
साभार – https://timesofindia.indiatimes.com/ से

भारत सरकार का राष्ट्रीय क्वांटम मिशन (एनक्यूएम)

भारत सरकार आठ वर्षों की अवधि के लिए ₹6003.65 करोड़ के परिव्यय के साथ राष्ट्रीय क्वांटम मिशन (एनक्यूएम) का कार्यान्वयन कर रही है। राष्ट्रीय क्वांटम मिशन (एनक्यूएम) के प्राथमिक उद्देश्य क्वांटम कंप्यूटिंग, क्वांटम संचार, क्वांटम सेंसिंग-मेट्रोलॉजी और क्वांटम सामग्री के क्षेत्र में अत्याधुनिक क्वांटम प्रौद्योगिकियों का विकास करना और अनुसंधान एवं विकास, बुनियादी ढांचे, स्टार्टअप और कुशल मानव संसाधनों को शामिल करते हुए एक मजबूत राष्ट्रीय पारिस्थितिकी तंत्र का निर्माण करना है। मिशन के अंतर्गत, वित्तीय वर्ष 2024-25 में चार विषयगत केंद्र (टी-हब) स्थापित किए गए हैं। इन केंद्रों को उनके संबंधित मेजबान संस्थानों द्वारा धारा 8 कंपनियों के रूप में पंजीकृत किया गया है और प्रभावी शासन एवं प्रशासन के लिए उनके संबंधित हब गवर्निंग बोर्ड (एचजीबी) का गठन किया गया है। आईआईएससी बेंगलुरु, आईआईटी बॉम्बे, आईआईटी कानपुर और आईआईटी दिल्ली में अत्याधुनिक निर्माण और केंद्रीय सुविधाएं भी स्थापित की जा रही हैं। सभी चार टी-हबों को अपना परिचालन शुरू करने के लिए धनराशि जारी कर दी गई है। ये केंद्र अब पूरी तरह से कार्यरत हैं और प्रौद्योगिकी विकास, मानव संसाधन विकास, उद्यमिता विकास, उद्योग सहयोग और अंतर्राष्ट्रीय सहयोग सहित कई गतिविधियों में लगे हुए हैं। विषयगत केंद्रों का विवरण नीचे दिया गया है:

राष्ट्रीय क्वांटम मिशन के कार्यान्वयन के लिए मोटे तौर पर तीन समयसीमाएँ निर्धारित की गई हैं, अर्थात् 3 वर्ष, 5 वर्ष और 8 वर्ष। मिशन के अंतर्गत निम्नलिखित प्रमुख उपलब्धियाँ निर्धारित की गई हैं:

क्रमशः 3 वर्ष, 5 वर्ष और 8 वर्षों में 20-50 भौतिक क्यूबिट, 50-100 भौतिक क्यूबिट और 50-1000 भौतिक क्यूबिट वाले मध्यम स्तर के क्वांटम कंप्यूटर विकसित करना।
भारत के भीतर 2000 किलोमीटर की दूरी पर स्थित दो जमीनी स्टेशनों के बीच उपग्रह आधारित सुरक्षित क्वांटम संचार विकसित करना, साथ ही अन्य देशों के साथ लंबी दूरी के सुरक्षित क्वांटम संचार स्थापित करना।

मौजूदा ऑप्टिकल फाइबर पर वेवलेंथ डिवीजन मल्टीप्लेक्सिंग का उपयोग करके विश्वसनीय नोड्स के साथ 2000 किमी से अधिक की अंतर-शहर क्वांटम कुंजी वितरण प्रणाली विकसित करना।
प्रत्येक नोड पर क्वांटम मेमोरी, एंटैंगलमेंट स्वैपिंग और सिंक्रोनाइज्ड क्वांटम रिपीटर्स के साथ मल्टी-नोड क्वांटम नेटवर्क विकसित करना (2-3 नोड)।

परमाणु प्रणालियों में 1 फेम्टो-टेस्ला/√(हर्ट्ज़) संवेदनशीलता वाले मैग्नेटोमीटर तथा नाइट्रोजन वैकेंसी सेंटर्स में 1 पिको-टेस्ला/√(हर्ट्ज़) से बेहतर संवेदनशीलता वाले मैग्नेटोमीटर का विकास; परमाणुओं का उपयोग करते हुए 100 नैनो-मीटर/सेकंड² से बेहतर संवेदनशीलता वाली गुरुत्व माप तकनीक, तथा सटीक समय निर्धारण, संचार और नेविगेशन के लिए 10⁻¹⁹ अंशीय अस्थिरता वाले परमाणु घड़ियों का विकास।

क्वांटम कंप्यूटिंग और संचार के लिए क्वांटम उपकरणों के निर्माण हेतु सुपरकंडक्टर्स, नवीन सेमीकंडक्टर संरचनाओं और टोपोलॉजिकल सामग्रियों जैसे क्वांटम सामग्रियों का डिजाइन और संश्लेषण।

क्वांटम कंप्यूटिंग, क्वांटम संचार, क्वांटम सेंसिंग और क्वांटम सामग्री अनुसंधान अवसंरचना की स्थापना में आवंटित धनराशि और हुई प्रगति का विवरण अनुलग्नक–I में दिया गया है।

भारत सरकार ने क्वांटम प्रौद्योगिकियों में भारत की रणनीतिक क्षमताओं, तकनीकी आत्मनिर्भरता और वैश्विक स्तर पर स्थिति को मजबूत करने के उद्देश्य से राष्ट्रीय क्वांटम मिशन (एनक्यूएम) का व्यापक मूल्यांकन किया है। इस मिशन की संरचना स्वदेशी क्वांटम कंप्यूटिंग, क्वांटम संचार, क्वांटम सेंसिंग और क्वांटम सामग्री क्षमताओं को विकसित करने; निर्माण और केंद्रीकृत सुविधाओं सहित विषयगत केंद्रों के माध्यम से राष्ट्रीय स्तर के अनुसंधान अवसंरचना का निर्माण करने; कुशल मानव संसाधनों और स्टार्टअप्स को पोषित करने; और चुनिंदा क्षेत्रों में अंतरराष्ट्रीय सहयोग को बढ़ावा देने के लिए की गई है। ये उपाय महत्वपूर्ण प्रौद्योगिकी निर्भरता को कम करने, रणनीतिक क्षेत्रों के लिए प्रासंगिक सुरक्षित संचार और उन्नत कंप्यूटिंग क्षमताओं को बढ़ाने और भारत को वैश्विक क्वांटम पारिस्थितिकी तंत्र में एक अग्रणी योगदानकर्ता के रूप में स्थापित करने में योगदान करते हैं।

जैन श्वेतांबर तेरापंथी महासभा के अध्यक्ष बने महेंद्र नाहटा

नई दिल्ली।  तेरापंथ धर्मसंघ की सर्वोच्च एवं शिरोमणि संस्था श्री जैन श्वेतांबर तेरापंथी महासभा की साधारण सभा हाल ही में युगप्रधान आचार्य श्री महाश्रमणजी के सान्निध्य में छोटी खाटू (राजस्थान) में संपन्न हुई। इस अवसर पर वर्ष 2026-28 के लिए महासभा की नई कार्यकारिणी का गठन किया गया, जिसमें प्रसिद्ध उद्योगपति, सामाजिक चिंतक एवं संघनिष्ठ व्यक्तित्व श्री महेंद्र नाहटा को सर्वसम्मति से अध्यक्ष निर्वाचित किया गया।
इस अवसर पर महासभा की नवीन कार्यकारिणी एवं न्यासी मंडल का भी गठन किया गया। श्री सुरेशचंद गोयल (कोलकाता) को प्रधान न्यासी चुना गया। न्यासी मंडल में संजय सुराणा (सूरत), जसराज मालू (दिल्ली), कमलकिशोर ललवानी (कोलकाता), नरेंद्र नखत (इरोड), बाबूलाल बोथरा (कोलकाता), नगराज बरमेचा (कोलकाता), शुभकरण बोथरा (दिल्ली), नरेंद्र पोरवाल (अहमदाबाद), मुकेश बाफना (चेन्नई), दिनेश बांठिया (बेंगलुरु) एवं आशीष जैन (फरीदाबाद) को न्यासी एवं किशनलाल डागलिया (मुंबई), अरविंद संचेती (अहमदाबाद) तथा सुरेंद्र जैन (भिवानी) को पंचमंडल सदस्य निर्वाचित किया गया। महासभा के महामंत्री पद का दायित्व विनोद बैद (कोलकाता) को सौंपा गया।
नई कार्यकारिणी को दायित्व हस्तांतरण समारोह 8 फरवरी 2026 को कोलकाता स्थित श्री जैन श्वेतांबर तेरापंथी महासभा के प्रधान कार्यालय में आयोजित किया जाएगा। पूर्व अध्यक्ष श्री मनसुखलाल सेठिया अपने दायित्व का हस्तांतरण नव मनोनीत अध्यक्ष श्री महेंद्र नाहटा को करेंगे। अपने मनोनयन पर प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए अध्यक्ष श्री महेंद्र नाहटा ने इसे आचार्य श्री तुलसी, आचार्य श्री महाप्रज्ञजी एवं वर्तमान आचार्य श्री महाश्रमणजी की अनुकंपा और आशीर्वाद का प्रतिफल बताया। उन्होंने कहा कि तेरापंथी महासभा तेरापंथ समाज की अग्रणी संस्था है, यह आचार्य तुलसी के उदात्त एवं मानवतावादी पुरुषार्थ की प्रतीक है। आज जैन समाज में तेरापंथ समाज जिस ऊंचाई पर स्थित है उसमें इस संस्था की जनकल्याणकारी प्रवृत्तियां, संप्रदायमुक्त एवं मानवता के अभ्युदय की योजना और नई पीढ़ी के संस्कार निर्माण की परिकल्पना मुख्य है। आगामी कार्यकाल में इसकी बहुआयामी समाज एवं संस्कार निर्माण की गतिविधियों को व्यापक, प्रभावी और समाजोपयोगी स्वरूप देने का सतत प्रयास किया जाएगा।
सरदारशहर निवासी एवं दिल्ली प्रवासी श्री महेंद्र नाहटा वर्ष 2027 एवं 2028 में आचार्य श्री महाश्रमण के दिल्ली प्रवास के लिए गठित प्रवास व्यवस्था समिति के स्वागताध्यक्ष हैं। श्री नाहटा ने अपने व्यावसायिक जीवन में सफलता के नए कीर्तिमान स्थापित किए हैं, वहीं तेरापंथ धर्मसंघ में अपनी संघनिष्ठा, गुरुभक्ति, सरलता, नेतृत्व क्षमता, सहयोगी भावना और आध्यात्मिक दृष्टि के बल पर एक विशिष्ट पहचान बनाई है। उनकी संवेदनशील कार्यशैली, संगठन कुशलता, मैत्री भावना और दूरदर्शी सोच से तेरापंथ समाज को नई दिशा और नया मुकाम मिलने की व्यापक अपेक्षा व्यक्त की जा रही है।

प्राचीन भारतीय ज्ञान केंद्रों का पुनरुद्धार

नालंदा, तक्षशिला, विक्रमशिला और अन्य प्राचीन ज्ञान केंद्रों को विदेशी आक्रमणकारियों ने नष्ट करने के कई प्रयास किए पर इन हमलों के बावजूद, ज्ञान विभिन्न उपायों से बचा रहा:

1. मौखिक परंपरा और गुरु-शिष्य परंपरा

कई प्राचीन शैक्षणिक संस्थान ज्ञान के मौखिक शिक्षण पर निर्भर थे। भौतिक रूप से इन केंद्रों के नष्ट होने के बाद भी विद्वानों ने ज्ञान को संरक्षित रखा और गुरू-शिष्‍य श्रव्‍यपाठ माध्यम से इसे आगे बढ़ाया।

2. विद्वानों का प्रवासन

नालंदा और विक्रमशिला जैसे संस्थानों पर जब हमले हुए, तो विद्वान अपने ज्ञान के साथ अलग-अलग क्षेत्रों में चले गए। कई लोग दक्षिण भारत, तिब्बत, चीन और दक्षिण-पूर्व एशिया पहुंच गए, ताकि अपने ज्ञान और शिक्षा को संरक्षित रख सकें और उनका प्रसार कर सकें।

3. धार्मिक संस्थाएं और मठ

बौद्ध और हिंदू मठ, मंदिरों के साथ-साथ, द्वितीयक ज्ञान केंद्रों के रूप में संचालित थे। भिक्षुओं और विद्वानों ने गुप्त रूप से सुरक्षित स्थलों पर ज्ञान का प्रचार-प्रसार जारी रखा। भारत में बौद्ध धर्म के पतन के समय तिब्बती बौद्ध मठों ने भारतीय ग्रंथों और परंपराओं को संरक्षित रखा।

4. विदेशी अनुवाद और अभिलेख

आक्रमणकारियों ने जहां पुस्तकालयों को नष्ट किया वहीं, ह्वेनसांग और अल-बिरूनी जैसे विदेशी यात्रियों ने भारत के प्राचीन ज्ञान को संकलित किया। कई भारतीय ग्रंथों का चीनी, अरबी और फ़ारसी में अनुवाद किया गया, जो भारत के बाहर इस ज्ञान को संरक्षित रखने में सहायक सिद्ध हुआ।

5. ताड़ के पत्ते की पांडुलिपियां और भूमिगत पुस्तकालय

कुछ विद्वानों ने आक्रमणकारियों से बचाकर पांडुलिपियों को दूरदराज के स्थानों या भूमिगत भंडारों में छिपा दिया। ज्ञान के इस अद्वितीय भंडार- प्राचीन ग्रंथों की मंदिरों और निजी संग्रहों में आज भी खोज की जा रही है।

6. शिक्षा का पुनरुत्थान

विध्‍वंस और विनाश के बाद भी भारत में शिक्षा के कई पुनरुत्थान हुए। वाराणसी और कांचीपुरम जैसे ज्ञान के नए केंद्र उभरे, जहां बौद्धिक परंपराएं निरंतर जारी रहीं।

7. अन्य संस्कृतियों में एकीकरण

भारतीय गणितीय, वैज्ञानिक और दार्शनिक ज्ञान को इस्लामी और यूरोपीय विद्वानों ने भी आत्मसात किया। दशमलव प्रणाली और आयुर्वेद जैसी अवधारणाओं ने वैश्विक सभ्यताओं में अपना स्‍थान बनाया, जिससे संस्थानों के ध्‍वस्‍त किए जाने के बावजूद उनका अस्तित्व बना रहा।

इस प्रकार, जब प्राचीन ज्ञान केंद्रों पर हमला हुआ तब ये बौद्धिक और सांस्कृतिक विरासत- स्थिति अनुकूलन, रूपांतरण और व्यापक प्रसार द्वारा संरक्षित रहे।

इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र (आईजीएनसीए) ने भारत की प्राचीन ज्ञान पद्धतियों और केंद्रों को पुनर्जीवित करने और पुनरुद्धार की कई पहल की हैं:

1. वैदिक हेरिटेज पोर्टल

27 मार्च, 2023 को आरंभ किया गया वैदिक हेरिटेज पोर्टल आईजीएनसीए की एक महत्वपूर्ण परियोजना है। इसका उद्देश्य वेदों की समृद्ध विरासत को संरक्षित और प्रसारित करना है। यह पोर्टल 550 घंटे से अधिक दृश्‍य-श्रव्य सामग्री प्रदान करता है, जिसमें 18,000 से अधिक वैदिक मंत्र शामिल हैं। इसमें वेद, उपनिषद, वेदांग, उपवेद जैसे प्राचीन ग्रंथों के प्रतिलेखन और दृश्‍य-श्रवय दोनों प्रारूपों में वैदिक अनुष्ठानों का विवरण उपलब्‍ध है। यह पहल पारंपरिक वैदिक ज्ञान विद्वानों, चिकित्सकों और आम जनता के लिए सुलभ बनाना सुनिश्चित करती है।

2. भारतीय ज्ञान प्रणाली (आईकेएस) पहल

राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 के अनुरूप, आईजीएनसीए शिक्षा मंत्रालय के तहत भारतीय ज्ञान प्रणाली पहल को आगे बढ़ाता है। अक्टूबर 2020 में स्थापित, भारतीय ज्ञान प्रणाली प्रभाग भारतीय पारंपरिक ज्ञान को समकालीन शिक्षा के साथ एकीकृत करने पर ध्यान केंद्रित कर रहा है। इसमें वैदिक गणित, आयुर्वेद, योग और प्राचीन भारतीय विज्ञान जैसे विषयों को विश्वविद्यालय के पाठ्यक्रम में शामिल करना शामिल है। भारतीय प्रौद्योगिकी संस्‍थान जैसे शीर्ष शिक्षण संस्थानों के सहयोग से ऐसे पाठ्यक्रम और शोध कार्यक्रम विकसित किए गए हैं जो भारतीय संगीत और अन्य स्वदेशी ज्ञान प्रणालियों के चिकित्सीय समाधान से अवगत कराते हैं।

3. प्रोजेक्ट ‘मौसम’

आईजीएनसीए की परियोजना ‘मौसम’ एक बहु-विषयक पहल है जिसका उद्देश्य हिंद महासागर के किनारे स्थित देशों के बीच प्राचीन ऐतिहासिक समुद्री सांस्कृतिक और आर्थिक संबंधों को पुनर्जीवित और सुदृढ़ करना है। इन मार्गों में फैले साझा ज्ञान प्रणालियों और विचारों का दस्तावेजीकरण और इनका उपयोग महत्‍वपूर्ण पहल है। परियोजना का उद्देश्य लंबे समय से टूटे संबंधों के तार फिर से जोड़ने और सहयोग और आदान-प्रदान के नए मार्ग प्रशस्‍त करना है।

4. शैक्षणिक कार्यक्रम और शोध

आईजीएनसीए विभिन्न शैक्षणिक पाठ्यक्रम प्रदान करता है, जिसमें स्नातकोत्तर डिप्लोमा पाठ्यक्रम शामिल हैं, जो भारत की कला, संस्कृति और पारंपरिक ज्ञान प्रणालियों पर गहन अध्ययन का अवसर देते हैं। अनुसंधान, प्रकाशन और प्रशिक्षण के माध्यम से यह केंद्र प्राचीन प्रथाओं और दर्शन को समझने और पुनर्जीवित करने के बहु-विषयक दृष्टिकोण पर जोर देता है।

आईजीएनसीए अपने पहल के माध्यम से भारत के प्राचीन ज्ञान केंद्रों और प्रणालियों के पुनर्निर्माण, पुनरुद्धार और पुनर्स्थापना में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है तथा समकालीन दौर में उनकी प्रासंगिकता और निरंतरता भी सुनिश्चित करता है।

इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र (आईजीएनसीए) ने भारत में प्राचीन ज्ञान प्रणालियों पर शोध को बढ़ावा देने के लिए कई पहल की हैं:

1. संभागीय अनुसंधान पहल

आईजीएनसीए की संगठनात्मक संरचना में विशेष प्रभाग शामिल हैं जो भारत की सांस्कृतिक विरासत के विभिन्न पहलुओं पर ध्यान केंद्रित करते हैं:

कलानिधि: यह मानविकी और कला में शोध और संदर्भ सामग्री के भंडार का काम करता है तथा विद्वतापूर्ण शोध के लिए पाठ्य, दृश्य और श्रवण संबंधी डेटा प्रदान करता है।

कलाकोष: शोध और प्रकाशन में संलग्न है, विभिन्न विषयों में बौद्धिक परंपराओं की खोज की जाती है जिससे प्राचीन ज्ञान प्रणालियों की समझ समृद्ध होती है।

जनपद सम्पदा: जीवनशैली अध्ययन के लिए समर्पित यह प्रभाग जनजातीय और लोक कलाओं पर व्यवस्थित शोध और लाइव प्रस्तुतियों की सुविधा प्रदान करता है तथा स्वदेशी ज्ञान की गहन समझ को बढ़ावा देता है।

कलादर्शन: प्रदर्शनियों के माध्यम से शोध निष्कर्षों को दृश्यात्‍मक प्रारूपों में परिवर्तित करना, प्राचीन ज्ञान को लोगों के लिए सुलभ बनाना तथा आगे विद्वत्तापूर्ण शोध को प्रोत्साहित करना इसका मुख्‍य उद्देश्‍य है।

सांस्कृतिक सूचना विज्ञान प्रयोगशाला: दुर्लभ अभिलेखीय संग्रहों से समाहित डिजिटल भंडार है जिसमें सांस्कृतिक संरक्षण और प्रसार के लिए प्रौद्योगिकी उपकरणों का प्रयोग किया जाता है तथा ‘कलासम्पदा’ विकसित की जाती है।

2. क्षेत्रीय केंद्र

शोध को विकेंद्रीकृत करने और क्षेत्रीय सांस्कृतिक अध्ययनों को बढ़ावा देने के लिए, आईजीएनसीए के पूरे देश में कई केंद्र हैं, जिनमें वाराणसी, गुवाहाटी, बेंगलुरु, रांची, पुडुचेरी, त्रिशूर, गोवा, वडोदरा और श्रीनगर शामिल हैं। ये केंद्र स्थानीय कला स्‍वरूपों, परंपराओं और ज्ञान प्रणालियों पर ध्यान केंद्रित करते हैं और क्षेत्र-विशिष्ट शोध और संरक्षण प्रयासों को बढ़ावा देते हैं।

3. सहयोगात्मक शोध परियोजनाएं

आईजीएनसीए अंतःविषयक शोध परियोजनाओं के लिए विभिन्न राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय संस्थानों के साथ सहयोग करता है।

4. प्रकाशन और प्रसार

आईजीएनसीए प्राचीन ज्ञान प्रणालियों से संबंधित शोध निष्कर्ष, शब्दावलियां, शब्दकोश और विश्वकोश प्रकाशित करता है। ये प्रकाशन पूरे विश्‍व के विद्वानों और शोधकर्ताओं के लिए मूल्यवान संसाधन हैं, जो भारत की समृद्ध बौद्धिक परंपराओं पर वैश्विक विमर्श में योगदान देते हैं।

इन व्यापक पहल द्वारा आईजीएनसीए प्राचीन ज्ञान पद्धतियों पर शोध को बढ़ावा देने, उनके संरक्षण और निरंतरता को सुनिश्चित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है।

केंद्रीय संस्कृ

भारत वसुधैव कुटुम्बकम के भाव के साथ मुक्त व्यापार समझौते सम्पन्न कर रहा है

दिनांक 27 जनवरी 2026 को यूरोपीय यूनियन के 27 सदस्य देशों के साथ भारत ने एक ऐतिहासिक मुक्त व्यापार समझौते को अंतिम रूप दिया है। अब, इस समझौते की शर्तों को इन देशों की संसद द्वारा पारित किया जाएगा, इसके बाद यह मुक्त व्यापार समझौता यूरोपीय यूनियन एवं भारत के बीच होने वाले विदेशी व्यापार पर लागू हो जाएगा। इस मुक्त व्यापार समझौते को “मदर आफ ऑल डील्स” कहा जा रहा है। क्योंकि, यह मुक्त व्यापार समझौता विश्व के 28 देशों के उस भूभाग पर लागू होने जा रहा है, जहां विश्व की 30 प्रतिशत आबादी निवास करती है। पृथ्वी के इस भूभाग पर 200 करोड़ से अधिक नागरिकों का निवास है। इन 28 देशों की संयुक्त रूप से विश्व के कुल सकल घरेलू उत्पाद में 25 प्रतिशत की हिस्सेदारी है। विश्व की दूसरी सबसे बड़ी (संयुक्त रूप से) अर्थव्यवस्था (यूरोपीय यूनियन – 22 लाख करोड़ अमेरिकी डॉलर) एवं चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था (भारत – 4 लाख करोड़ अमेरिकी डॉलर) के बीच यह मुक्त व्यापार समझौता सम्पन्न होने जा रहा है। वैश्विक स्तर पर होने वाले विदेशी व्यापार में इन समस्त देशों की हिस्सेदारी 33 प्रतिशत है। पूरी दुनिया में 33 लाख करोड़ अमेरिकी डॉलर का विदेशी व्यापार होता है, इसमें से 11 लाख करोड़ अमेरिकी डॉलर का विदेशी व्यापार उक्त 28 देशों द्वारा किया जाता है।

 

उक्त वर्णित मुक्त व्यापार समझौता विश्व का सबसे बड़ा व्यापार समझौता है। इसके पूर्व, सबसे बड़े मुक्त व्यापार समझौते के रूप में चीन एवं 10 आशियान देशों के बीच सम्पन्न हुए मुक्त व्यापार समझौते को माना जाता है। यह केवल एक मुक्त व्यापार समझौता नहीं बल्कि यूरोपीय यूनियन के 27 देशों एवं भारत के बीच साझा समृद्धि का एक ब्लूप्रिंट है। इस समझौते में पूरी दुनिया की आर्थिक दशा एवं दिशा बदलने की क्षमता है। उक्त व्यापार समझौता को सम्पन्न करने के प्रयास पिछले 18 वर्षों से हो रहे थे। परंतु, कुछ विपरीत परिस्थितियों के चलते इस समझौते को सम्पन्न होने में इतना लम्बा समय लग गया है, अतः यह अब भारत एवं यूरोपीय यूनियन के 27 देशों के बीच एक नए युग की शुरुआत के रूप में देखा जा रहा है। उक्त मुक्त व्यापार समझौते के सम्पन्न होने के पश्चात वर्ष 2032 तक यूरोपीयन यूनियन के सदस्य देशों एवं भारत के बीच विदेशी व्यापार के दुगना होने की सम्भावना व्यक्त की जा रही है। इसके पूर्व भारत एवं यूनाइटेड किंगडम के बीच भी मुक्त व्यापार समझौता सम्पन्न किया जा चुका है। अब कनाडा के प्रधानमंत्री भी संभवत: मार्च माह में भारत के दौरे पर आने वाले है और भारत एवं कनाडा के बीच भी कुछ क्षेत्रों में व्यापार समझौता सम्पन्न होने की सम्भावना व्यक्त की जा रही है। अमेरिका मुक्त व्यापार समझौतों को हथियार के रूप में इस्तेमाल कर रहा है, जबकि भारत मानवतावादी दृष्टिकोण को अपनाते हुए विभिन्न देशों के साथ मुक्त व्यापार समझौते कर रहा है ताकि भारत एवं अन्य समस्त देशों में निवासरत नागरिकों को इन समझौतों से लाभ मिले। यह भारतीय संस्कृति के वसुधैव कुटुम्बकम के भाव को दर्शाता है। भारत की इस नीति के चलते ही विश्व के कई देश अब भारत के साथ मुक्त व्यापार समझौते शीघ्र ही सम्पन्न करना चाह रहे हैं। वैश्विक स्तर पर हाल ही के समय में आर्थिक क्षेत्र में भारी उथल पुथल दिखाई दे रही है। भारत एवं यूरोपीय यूनियन के 27 सदस्य देशों के बीच सम्पन्न हुए मुक्त व्यापार समझौते से इस उथल पुथल में कुछ सुधार आता हुआ दिखाई देगा।

 

भारत में कृषि एवं डेयरी क्षेत्र अतिसंवेदनशील है। क्योंकि, भारत की कुल आबादी का लगभग 60 प्रतिशत भाग आज भी ग्रामीण इलाकों में उक्त क्षेत्रों पर अपनी आजीविका के लिए निर्भर है। अतः उक्त दोनों क्षेत्रों को मुक्त व्यापार समझौते से बाहर रखा गया है। हां, भारत के समुद्री उत्पाद उद्योग, वस्त्र एवं परिधान उद्योग, जेम्स एवं ज्वेलरी उद्योग, चमड़ा उद्योग, खिलौना उद्योग जो श्रम आधारित उद्योग हैं, को उक्त मुक्त व्यापार समझौते से अधिकतम लाभ होगा क्योंकि यूरोपीय यूनियन के समस्त 27 देशों द्वारा भारत से उक्त उत्पादों के आयात पर आयात ड्यूटी को शून्य किया जा रहा है। वर्तमान में भारत से समुद्रीय उत्पादों के निर्यात पर 26 प्रतिशत का आयात कर लगाया जाता है, जिसे मुक्त व्यापार समझौता के लागू होने के पश्चात शून्य कर दिया जाएगा। इसी प्रकार, वस्त्र एवं परिधान के आयात पर वर्तमान में लागू 12 प्रतिशत के आयात कर को शून्य किया जा रहा है, खिलौना पर लागू 4.7 प्रतिशत के आयात कर को शून्य, जेम्स एवं ज्वेलरी के आयात पर 4 प्रतिशत से शून्य, केमिकल उत्पादों के आयात पर 12.8 प्रतिशत से शून्य, चमड़ा से निर्मित उत्पादों के आयात पर 17 प्रतिशत से शून्य, फर्नीचर उत्पादों के आयात पर 10.7 प्रतिशत से शून्य आयत कर किया जा रहा है।

 

यूरोपीय यूनियन के 27 देश, जो विकसित देशों की श्रेणी में शामिल हैं, में जन्म दर पिछले कई वर्षों से लगातार गिर रही है एवं कुछ देशों में तो यह शून्य के स्तर पर पहुंच गई है जिससे इन देशों में प्रौढ़ नागरिकों की संख्या तेजी से बढ़ रही है। सेवा क्षेत्र में कार्य करने वाले नागरिकों का इन देशों में नितांत अभाव दिखाई देता है। अतः इन देशों में श्रमबल की भारी कमी है। उक्त मुक्त व्यापार समझौते के सम्पन्न होने के पश्चात भारतीय नागरिकों को यूरोपीय यूनियन के समस्त 27 देशों में तकनीकी क्षेत्र, चिकित्सा क्षेत्र, निर्माण क्षेत्र, सेवा क्षेत्र, आदि में रोजगार के भारी मात्रा में अवसर प्राप्त होंगे। इन समस्त देशों द्वारा भारतीय नागरिकों को वीजा प्रदान करने की प्रक्रिया को सरल बनाया जाएगा। युनाईटेड किंगडम, जर्मनी, फ्रान्स आदि जैसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं जैसे देशों में भारतीय इंजिनीयरों एवं डाक्टरों की भारी मांग है। उक्त देशों द्वारा भारतीयों के परिवार के सदस्यों को रोजगार प्रदान करने के अवसर भी प्रदान करने सम्बंधी प्रक्रिया को सरल बनाया जाएगा। भारतीय विद्यार्थियों द्वारा यूरोपीय यूनियन के सदस्य देशों के विश्वविद्यालयों में अपनी शिक्षा समाप्त करने के उपरांत 9 माह से 12 माह तक का समय रोजगार तलाशने के लिए प्रदान किया जाएगा। इस समयावधि तक भारतीय युवाओं को इन देशों में प्रवास की अनुमति प्रदान की जाएगी।

 

भारतीय कारीगरों के लिए अब वैश्विक बाजार खुल रहा है। साथ ही, भारत अब विनिर्माण इकाईयों का वैश्विक केंद्र बन सकता है। क्योंकि, यूरोपीयन यूनियन के समस्त देश विकसित देशों की श्रेणी में शामिल हैं एवं वे अपनी सम्पत्ति/पूंजी का निवेश भारत में विनिर्माण इकाईयों में कर सकते हैं एवं कुछ लाभप्रद क्षेत्रों में वे अपनी विनिर्माण इकाईयों की स्थापना भी कर सकते हैं। अधिक उत्पादन इकाईयों की स्थापना से भारत में रोजगार के अधिक अवसर भी निर्मित होंगे। इससे भारत में बेरोजगारी की समस्या का हल भी निकलता हुआ दिखाई दे रहा है।

 

भारत द्वारा विभिन्न देशों के साथ मुक्त व्यापार समझौतों को इस दृष्टि के साथ सम्पन्न किया जा रहा है ताकि इससे भारत के किसान, मजदूर, कारीगर, पेशेवर नागरिकों एवं सूक्ष्म, छोटे एवं मध्यम उद्योगों को विशेष लाभ हो। यूरोपीयन यूनियन के समस्त 27 देशों में वस्त्र एवं परिधान क्षेत्र का आकार 26,300 करोड़ अमेरिकी डॉलर का है, इससे भारत से वस्त्र एवं परिधान का निर्यात वर्तमान में 64,000 करोड़ रुपए से बढ़कर 3 लाख करोड़ रुपए तक पहुंचने की सम्भावना व्यक्त की जा रही है। इसी प्रकार, चमड़ा उत्पादों का बाजार 10,000 करोड़ अमेरिकी डॉलर का है एवं जेम्स एवं ज्वेलरी का बाजार 7,900 करोड़ अमेरिकी डॉलर का है। 27 देशों में इस विशाल क्षेत्र में भारतीय वस्त्र एवं परिधान उद्योग एवं अन्य उत्पादों को प्रवेश मिलने से भारत में श्रम आधारित कई सूक्ष्म, छोटी एवं मध्यम इकाईयों को लाभ होने जा रहा है। लगभग इसी प्रकार का लाभ अन्य क्षेत्रों यथा, समुद्री उत्पाद, चमड़ा उत्पाद, खिलोना उत्पाद, जेम्स एवं ज्वेलरी उत्पाद, केमिकल उत्पाद, फर्नीचर उत्पाद आदि, में कार्यरत इकाईयों की भी होने जा रहा है। इन क्षेत्रों में कार्यरत विनिर्माण इकाईयों के व्यापार में वृद्धि का आश्य सीधे सीधे अधिक श्रमबल की आवश्यकता होना भी है, जिसकी पूर्ति आज विश्व में केवल भारत ही कर सकता है।

 

रक्षा के क्षेत्र में भारत बहुत तेज गति से विकास कर रहा है। इस क्षेत्र में भारत का अंतिम लक्ष्य आत्मनिर्भरता हासिल करने का है। वहीं दूसरी ओर अमेरिका के ट्रम्प प्रशासन द्वारा यूरोपीय यूनियन के सदस्य देशों को सुरक्षा के सम्बंध में अमेरिका पर निर्भर नहीं रहते हुए अपने पैरों पर खड़े होने की सलाह दी है। अतः यूरोपीय देश अपने सुरक्षा बजट में अत्यधिक वृद्धि करने का विचार कर रहे हैं। भारत के लिए ऐसे समय पर उक्त मुक्त व्यापार समझौते को अंतिम रूप दिया जाना एक सुनहरे अवसर के रूप में सामने आया है। इससे सुरक्षा के क्षेत्र में उत्पादन कर रही भारतीय कम्पनियों को यूरोपीय यूनियन का अति विशाल बाजार मिलने जा रहा है। इसी के साथ ही यूरोपीय यूनियन के सदस्य देशों से सुरक्षा के क्षेत्र में उच्च तकनीकी का हस्तांतरण भारतीय कम्पनियों को सम्भव हो सकेगा। कुल मिलाकर यूरोपीय यूनियन के समस्त 27 देशों के साथ सम्पन्न किए जा रहे मुक्त व्यापार समझौते से भारत के लिए अतिलाभप्रद स्थिति बनने जा रही है।

 

प्रहलाद सबनानी

सेवानिवृत्त उपमहाप्रबंधक,

भारतीय स्टेट बैंक

के-8, चेतकपुरी कालोनी,

झांसी रोड, लश्कर,

ग्वालियर – 474 009

मोबाइल क्रमांक – 9987949940

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भारत-अमेरिका व्यापार समझौताः मोदी नेतृत्व की वैश्विक दृढ़ता

अंतरराष्ट्रीय राजनीति और वैश्विक व्यापार के परिदृश्य में कोई भी समझौता केवल आंकड़ों या कर-प्रतिशतों तक सीमित नहीं होता, वह राष्ट्र की संप्रभुता, नेतृत्व की दृढ़ता और भविष्य की दिशा का भी संकेतक होता है। भारत और अमेरिका के बीच हालिया व्यापारिक सहमति, जिसके अंतर्गत प्रस्तावित 50 प्रतिशत टैरिफ को घटाकर 18 प्रतिशत किया गया है, इसी दृष्टि से एक अत्यंत महत्वपूर्ण और दूरगामी घटना है। यह निर्णय केवल आर्थिक राहत नहीं, बल्कि बदलते वैश्विक शक्ति-संतुलन और भारत की बढ़ती सौदेबाजी क्षमता का प्रमाण है। यहां “देर आए, दुरुस्त आए” की कहावत पूरी तरह चरितार्थ होती है। जब अमेरिका द्वारा भारतीय उत्पादों पर ऊँचे टैरिफ का दबाव बनाया गया था, तब यह आशंका व्यक्त की जा रही थी कि भारत जैसी उभरती अर्थव्यवस्था को अंततः झुकना पड़ेगा। वैश्विक व्यापार का हालिया इतिहास इस बात का साक्षी रहा है कि बड़ी शक्तियां अक्सर दबाव की राजनीति के माध्यम से अपने हित साधती हैं। किंतु फरवरी 2025 में आरंभ हुई इस व्यापारिक प्रक्रिया का फरवरी 2026 में सकारात्मक दिशा में आगे बढ़ना यह दर्शाता है कि भारत ने न तो जल्दबाजी दिखाई और न ही अपने राष्ट्रीय हितों से समझौता किया। भारत ने समय लिया, परिस्थितियों का मूल्यांकन किया और अंततः संतुलित व सम्मानजनक परिणाम प्राप्त किया।

50 प्रतिशत से 18 प्रतिशत तक की टैरिफ कटौती का तात्कालिक प्रभाव व्यापारिक जगत और शेयर बाजार में दिखाई दिया। निवेशकों का भरोसा लौटा, निर्यातकों को राहत मिली और बाजार में सकारात्मक संकेत उभरे। किंतु इस निर्णय का वास्तविक महत्व इससे कहीं अधिक व्यापक है। यह इस बात की पुष्टि करता है कि भारत अब केवल नियमों का पालन करने वाला देश नहीं, बल्कि नियमों के निर्माण और पुनर्परिभाषा में अपनी भूमिका सुनिश्चित करने वाला राष्ट्र बन चुका है। अमेरिका जैसी महाशक्ति का अपने रुख में नरमी लाना भारत की आर्थिक ताकत, रणनीतिक धैर्य और राजनीतिक आत्मविश्वास का प्रत्यक्ष प्रमाण है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की विदेश नीति की सबसे बड़ी विशेषता यही रही है कि उसमें संवाद है, पर दबाव के आगे समर्पण नहीं। चाहे वह रक्षा सहयोग हो, ऊर्जा सुरक्षा हो या व्यापारिक समझौते-हर क्षेत्र में भारत ने अपने हितों को केंद्र में रखते हुए आगे बढ़ने का प्रयास किया है।

इस व्यापारिक डील में भी भारत ने बिना झुके, बिना रुके और बिना कमजोर पड़े अपनी शर्तें स्पष्ट रूप से रखीं। यही कारण है कि अंततः अमेरिका को अपने प्रस्तावों में संशोधन करना पड़ा। यह केवल एक व्यापारिक जीत नहीं, बल्कि राजनीतिक परिपक्वता और नेतृत्व की दृढ़ता का उदाहरण है। इस समझौते से भारतीय उद्योगों को वैश्विक प्रतिस्पर्धा में एक उन्नत स्थिति प्राप्त होगी। कम टैरिफ का अर्थ है कि भारतीय उत्पाद अमेरिकी बाजार में अधिक प्रतिस्पर्धी होंगे, उनकी पहुंच बढ़ेगी और “मेक इन इंडिया” को नया प्रोत्साहन मिलेगा। टेक्सटाइल, फार्मास्यूटिकल्स, ऑटोमोबाइल, कृषि-आधारित उत्पाद और उभरते तकनीकी क्षेत्र-सभी को इससे दीर्घकालिक लाभ होने की संभावना है। भारत अब केवल सस्ता श्रम या कच्चा माल उपलब्ध कराने वाला देश नहीं, बल्कि मूल्यवर्धित उत्पादन और नवाचार की दिशा में अग्रसर अर्थव्यवस्था बनता जा रहा है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने संसदीय दल की बैठक में जिस संयम और आत्मविश्वास के साथ भारत-अमेरिका व्यापार समझौते को “निरंतर धैर्य का परिणाम” बताया, वह उनकी कूटनीतिक शैली का सार है। यह समझौता किसी अचानक हुए घटनाक्रम का नतीजा नहीं, बल्कि एक वर्ष तक चली रणनीतिक प्रतीक्षा, विकल्पों के विस्तार और संतुलित संवाद का परिणाम है। मोदी ने स्पष्ट संकेत दिया कि सरकार ने विपक्ष की आलोचनाओं और तात्कालिक दबावों के बावजूद धैर्य नहीं छोड़ा, क्योंकि वैश्विक व्यापार और भू-राजनीति में जल्दबाज़ी अक्सर महंगी पड़ती है। अमेरिका का झुकना किसी भावनात्मक मित्रता का परिणाम नहीं, बल्कि ठोस रणनीतिक विवशता का नतीजा है। बीते एक वर्ष में भारत ने यह स्पष्ट कर दिया कि उसके पास विकल्प हैं-रूस के साथ ऊर्जा सहयोग, यूरोपीय संघ के साथ ऐतिहासिक मुक्त व्यापार समझौता और वैश्विक आपूर्ति शृंखलाओं में अपनी बढ़ती भूमिका।

यदि वाशिंगटन भारत पर एकतरफा दबाव बनाए रखता, तो अमेरिकी कंपनियां दुनिया के सबसे तेजी से बढ़ते बड़े बाजार से बाहर हो जातीं। ट्रंप द्वारा 500 अरब डॉलर के आयात, शून्य टैरिफ और रूसी तेल त्यागने जैसे नाटकीय दावे इसी दबाव की राजनीति का हिस्सा थे, जिन्हें भारत ने न तो सार्वजनिक टकराव का मुद्दा बनाया और न ही स्वीकारोक्ति दी। मोदी का इन पर मौन यह दर्शाता है कि भारत इस घटनाक्रम को अंतिम समझौते के रूप में नहीं, बल्कि दिशा-निर्धारण के रूप में देख रहा है। इसके विपरीत, भारतीय विपक्ष इस पूरे प्रकरण में अपनी राजनीतिक अधीरता और रणनीतिक अपरिपक्वता को उजागर करता रहा। उसने टैरिफ को लेकर तात्कालिक लाभ-हानि की भाषा में सरकार को घेरने की कोशिश की, जबकि अंतरराष्ट्रीय व्यापार वार्ताएं समय, धैर्य और बहुस्तरीय गणनाओं की मांग करती हैं। विपक्ष यह समझने में असफल रहा कि कूटनीति में कभी-कभी पीछे हटना नहीं, बल्कि प्रतीक्षा करना ही सबसे बड़ा कदम होता है।

आज जब अमेरिका को अपना अड़ियल रुख छोड़ना पड़ा है और भारत फिर से वैश्विक प्रतिस्पर्धा की अग्रिम पंक्ति में खड़ा दिख रहा है, तब यह स्पष्ट है कि मोदी की नीति न केवल दबाव से मुक्त थी, बल्कि दूरदर्शी भी। यही नीति भारत को एक आत्मविश्वासी, प्रभावशाली और सौदे की शर्तें तय करने वाली शक्ति के रूप में स्थापित कर रही है।

इस पूरे घटनाक्रम का एक महत्वपूर्ण पक्ष यह भी है कि यह वैश्विक व्यापार में दबाव आधारित राजनीति के अंत का संकेत देता है। लंबे समय से बड़ी अर्थव्यवस्थाएं टैरिफ, प्रतिबंध और नीतिगत दबावों के माध्यम से छोटे या उभरते देशों को अपनी शर्तें मानने के लिए विवश करती रही हैं। भारत ने इस प्रवृत्ति को न केवल चुनौती दी, बल्कि यह भी सिद्ध किया कि आत्मविश्वास, आर्थिक क्षमता और राजनीतिक इच्छाशक्ति के बल पर किसी भी दबाव को संतुलित संवाद में बदला जा सकता है। भारत-अमेरिका संबंधों के संदर्भ में यह समझौता एक नए राजनीतिक आभामंडल के निर्माण का भी संकेत देता है। यह संबंध अब केवल रणनीतिक या सामरिक सहयोग तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि आर्थिक साझेदारी के एक नए स्तर की ओर बढ़ रहा है। इसका प्रभाव केवल इन दो देशों तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि वैश्विक राजनीति में बहुध्रूवीय व्यवस्था को और अधिक मजबूती देगा। दुनिया धीरे-धीरे यह स्वीकार कर रही है कि भविष्य का नेतृत्व किसी एक शक्ति के हाथ में नहीं, बल्कि संतुलित साझेदारियों के माध्यम से उभरेगा, और भारत उसमें एक केंद्रीय भूमिका निभाने के लिए तैयार है।

इस व्यापारिक प्रगति से मोदी सरकार की अंतरराष्ट्रीय साख में भी उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। यह साख किसी प्रचार या दावे पर नहीं, बल्कि ठोस परिणामों पर आधारित है। भारत आज विश्व मंच पर एक ऐसे राष्ट्र के रूप में देखा जा रहा है, जो अपने हितों की रक्षा करते हुए वैश्विक स्थिरता और सहयोग में भी सकारात्मक भूमिका निभाता है। यही संतुलन उसे अन्य उभरती अर्थव्यवस्थाओं से अलग पहचान देता है। महाशक्ति बनने की भारत की यात्रा भावनात्मक नारों पर नहीं, बल्कि आर्थिक आंकड़ों, रणनीतिक समझौतों और वैश्विक स्वीकार्यता पर आधारित है। दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने की दिशा में भारत तेजी से आगे बढ़ रहा है, और इस प्रकार के व्यापारिक समझौते उस यात्रा के महत्वपूर्ण पड़ाव हैं। यह स्पष्ट होता जा रहा है कि भारत को आगे बढ़ने से रोक पाना अब किसी के लिए आसान नहीं है।

निश्चित तौर पर यह व्यापारिक समझौता भारत की परिपक्व कूटनीति और दूरदर्शी नेतृत्व का परिणाम है। अंतरराष्ट्रीय राजनीति और वैश्विक व्यापार की दुनिया में कोई भी निर्णय केवल आर्थिक गणित नहीं होता, वह राष्ट्र की संप्रभुता, आत्मसम्मान और नेतृत्व की परिपक्वता का भी प्रमाण होता है। देर से लिया गया सही निर्णय, जल्दबाजी में किए गए गलत समझौतों से कहीं अधिक मूल्यवान होता है। भारत ने धैर्य रखा, आत्मसम्मान बनाए रखा और अंततः अपने हितों के अनुरूप परिणाम हासिल किया। निश्चित ही नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारत न केवल सुरक्षित है, बल्कि आत्मविश्वास के साथ भविष्य की ओर अग्रसर है और यह विश्वास ही उसे महाशक्ति बनने की उड़ान देता है।
प्रेषकः

(ललित गर्ग)
ई-253, सरस्वती कुंज अपार्टमेंट
25 आई॰ पी॰ एक्सटेंशन, पटपड़गंज, दिल्ली-110092
मो. 9811051133

महाराजा दर्शन सिंह के कल्याणकारी कार्य

1798 ई.मे हुआ था अयोध्या के शाक वंशीय राजवंश का उदय :-

अवध के नवाब सआदत अली खां द्वितीय 1798 ई.के शासनकाल में अयोध्या में शाक द्वीपीय ब्राह्मण राज वंश का उदय हुआ था।

जब राजा बख्तावर सिंह ने राजा दर्शन सिंह दोनों भाई जब ऊंचे ऊंचे पद हासिल किए तब दोनों ने 1500 गांव मोल लेकर महादौना की जमींदारी विस्तारित कर इस क्षेत्र को महत्वपूर्ण बना लिया।

महादौना (शाहगंज ) और अयोध्या (राजसदन ) से संचालित किया प्रशासन
मातृ भूमि पलिया के पास शाहगंज में बनवाई गई हवेली प्रारम्भ में राजा की शानो- शौकत और प्रशासनिक शक्ति का प्रतीक बनी। राजा दर्शनसिंह और उनके वंशजों ने शाहगंज में 70 एकड़ में सुदृढ़ विशाल कोट, बाजार और महल बनवाये थे।

यहां इस वंश परम्परा से जुड़े लाल अम्बिका प्रताप सिंह और कई अन्य शाही परिवार आज भी अपनी परम्परा का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं। ये मूलतः पाठक लोगों का गांव है।

बाद में 1842 ई में जनता की सुविधा देखते हुए अयोध्या धाम के मध्य तत्कालीन लालबाग में कचहरी और महल बनवाया जो राज सदन के रूप में लगभग 20 एकड़ में फैला हुआ है।इसी समय बीमार होकर वे अयोध्या चले आये और श्रावण सुदी सत्तमी को अयोध्यावास लिया था। धर्मनगरी अयोध्या में राजा दर्शन सिंह का आलिशान महल आज भी है। राजा दर्शन सिंह का इंतकाल 1844 ई. में और बख्तावर सिंह का भी इंतकाल 1846 ई.में हो गया था और सत्ता मानसिंह के हाथ में आ गई थी। वर्तमान समय में अयोध्या राजघराने में आरा से आए मिश्र परिवार इस वंश परम्परा की यश वृद्धि कर रहे हैं।

सुल्तानपुर और बहराइच के राजा बने :-
राजा दर्शन सिंह का समय लगभग 1800- 1844 के मध्य था। उन्हे सुल्तानपुर और बहराइच के क्षेत्र का प्रमुख नियुक्त किया गया और उन्हें “बहादुर ” के नाम से जाना जाने लगा। वे गोण्डा क्षेत्र के अधिकारी भी बन गए और राजा की उपाधि प्राप्त कर ली । 1825 ई. में वे बाराबंकी के नाज़िम भी रहे। उन्होंने अपने इलाके का बहुत अच्छा प्रबन्ध किया था। उन्हें राजा की पदवी भी मिल गई थी।

प्रमुख शासकीय कार्य :-
राजा दर्शन सिंह के समय शिवदीन एक बड़ा डाकू था। वादशाह की आज्ञा से दर्शन सिंह ने उसका दमन किया। उनको बादशाही से “सरकोबे सरकशां सलतनत बहादुर ” की उपाधि मिली थी। राजा दर्शनसिंह 5 वर्ष तक वैसवाड़े के नाज़िम रहे । अवध के पांचवें नवाब बादशाह अमजद अली शाह के शासन काल 1842-1847 जब तक नव्वाब मुनव्वरउद्दौला वज़ीर रहे तो सारी सलतनत का प्रबन्ध राजा दर्शनसिंह को सौंपा गया था। 1842 ई में दर्शन सिंह बहुत प्रभाव शाली राजा हो गए थे। उन्होंने बलरामपुर की गढ़ियों पर तरकीब व चालाकी से कब्ज़ा कर लिया। प्रतिद्वंदी भाग खड़े हुए या प्रशासनिक शक्ति से वश में कर लिए गए थे।

धार्मिक-लोककल्याणकारी कार्य:-
अयोध्या की गलियाँ और मंदिर हमेशा राजा और प्रजा की साझा आस्था का केंद्र रही हैं। राजा दर्शन सिंह और महाराजा मानसिंह केवल योद्धा ही नहीं थे, बल्कि वे धर्म और संस्कृति के संरक्षक भी थे। वे अपने समय में हवेलियों, कुओं, सरायों और सार्वजनिक बागानों,नदी के घाटों ,सरोवरों और कुछ प्रमुख मन्दिरों का निर्माण और जीर्णोद्धार करवाये थे । यह उनकी धार्मिक दृष्टि और समाज सेवा का सबसे बड़ा प्रमाण था। लोग आज भी इन स्थलों की ओर देखते हुए अपने पूर्वजों की भक्ति, शौर्य और दूरदर्शिता को याद करते हैं। उनके द्वारा निर्मित कुछ प्रमुख लोक कल्याणकारी कार्यों का उल्लेख किया जा रहा है।

दर्शनेश्वर नाथ महादेव का शिवाला:-
धर्म नगरी अयोध्या में राजा दर्शन सिंह का आलिशान महल (राजसदन) और लालबाग आज भी है। बाग के दक्षिण भाग में राजा दर्शनसिंह ने एक सुन्दर शिवालय बनवाया था। इसीलिये दर्शनेश्वर का मन्दिर कहलाता है।

यह केवल धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि समाज और धर्म का प्रतीक भी है। उन्होंने अयोध्या स्थित अपने महल राजसदन के शिवाला में शिवलिंग स्थापित करवाई थी। शिवजी की इस प्रतिमा के स्थापित करने का कारण यह रहा कि राजकार्य के वजह से राजा को प्रत्येक दिन बाहर जाना संभव नही हो पाता था अतः शिव आराधना के लिए उन्होंने महल के प्रांगण में शिवालय की पूरे विधि विधान से स्थापना करवाई थी। इस शिवाला को आज लोग ‘श्री दर्श्नेश्वर नाथ महादेव’ के नाम से पूरे अवध में जानते हैं।

यह मंदिर केवल भगवान शिव का निवास स्थान नहीं है, बल्कि शहर के लोगों के लिए आश्रय और भक्ति का केन्द्र भी बन गया है ।अवध गजेटियर के अनुसार “अवध भर में इससे बढकर सुंदर शिवालय नही है।” यह मंदिर बढ़िया चुनार के पत्थर का बना हुआ है और बहुत सी नक्काशी का काम मिर्जापुर से बनकर यहाँ आया था। यहाँ का शिवलिंग नर्मदा नदी के पत्थर का बना हुआ है। इसका दाम उस समय 250 रुपया था। मंदिर में स्थापित संगमरमर की मूर्तियां जयपुर से लायी गयी थी। पहिले यह विचार था कि नेपाल से घंटा मंगवाकर यहाँ लटकाया जाय। परन्तु घंटा रास्ते में ही में टूट गया था। तब उसी नमूने का घंटा अयोध्या में बनवाया गया। वह भी स्थानीय कारीगर द्वारा बनाया हुआ अच्छा नमूना है। मंदिर की भव्य मीनारें, नक्काशीदार दरवाजे, और शिलालेख राजा की दूरदर्शिता और धर्मपरायण दृष्टि को बखानते हैं।यह शिवालय अत्यंत ही सिद्ध मन से पूजा जाता है यहाँ पर शिव पंचाक्षर मंत्र और शिव पंचाक्षर स्तोत्र के पाठ से बहुत लाभ होता है।

सरयू नदी का घाट और नागेश्वरनाथ मन्दिर का जीर्णोद्धार :-
राजा दर्शन सिंह ने सरयू के तट वर्तमान में राम की पैड़ी वाले जगह पर के पुराने घाटों का पक्का निर्माण कराया था। उन्होंने नागेश्वर नाथ मंदिर का भी जीर्णोद्धार कराया था। इसके अलावा अपने क्षेत्र में अनेक प्राचीन मंदिरों तालाबों सरायों का निर्माण करा कर लोक उपकार के लिए अच्छा प्रयास किया था।

दर्शन नगर बाजार को बसाया:-
दर्शन नगर अयोध्या ज़िले का एक कस्बा अयोध्या से 5 किमी दक्षिण में और फैज़ाबाद से 4 किमी दूरी पर स्थित है। इसे अयोध्या के शाक द्वीपीय राजा दर्शन सिंह ने एक बाजार के रूप में बसाया था। उन्हीं के नाम पर ही इस बाजार का नाम दर्शन नगर पड़ा है। इसे राजा ने केवल व्यापारिक केंद्र के रूप में नहीं बनाया, बल्कि यह सामाजिक जीवन का हृदय भी बन गया है। बाजार में व्यापारियों के लिए शुद्ध और सुरक्षित स्थान, बच्चों के खेल और सांस्कृतिक कार्यक्रमों के लिए खुले मैदान और बुजुर्गों के बैठने के लिए छायादार जगहें बनाई गईं थीं।

यह कार्य केवल शानो-शौकत दिखाने के लिए नहीं अपितु उनका उद्देश्य समाज और धर्म के कल्याण को बढ़ावा देना था।

चार प्रवेश द्वार वाले प्राचीर का निर्माण:-
दर्शन नगर बाजार में अयोध्या के राजा दर्शन सिंह ने चारों दिशाओं में लखौरी ईंटों द्वारा निर्मित चार गेट व किलानुमा बाउंड्रीवॉल बनवाई थी। अयोध्या से अंबेडकरनगर जाने वाले वाहन इसी गेट से होकर गुजरते थे। वाहन की संख्या बढ़ने से प्रवेश द्वार संकरा हो गया था। इस गेट के चलते अक्सर यहां जाम लगा रहता था, जिससे यातायात बाधित होता था। चारों दिशाओं में बने गेट में से पश्चिमी गेट को पूर्व जिलाधिकारी किंजल सिंह ने यातायात की परेशानी को देखते हुए गिरवा दिया था। पूर्वी गेट जर्जर अवस्था में ही रह गया था जिसे भी बाद में गिरवा दिया गया। अब राजा दर्शन सिंह द्वारा निर्मित एक भी द्वार नहीं बचा है।

अयोध्या विकास प्राधिकरण द्वारा वर्तमान समय में इस नगर के लिए 4 नए प्रवेश द्वार, बाउंड्री वाल का निमार्ण,तीर्थ यात्रियों के लिए अनेक सुविधाएँ, कैटीन का निर्माण,सूर्य कुण्ड का सौन्दर्यीकरण, पार्क का निमार्ण, लाइट एण्ड साउण्ड शो का संचालन और बच्चो के खेलने की व्यवस्था की गई है।

दर्शन नगर, अयोध्या में लगभग ₹21.9 करोड़ की लागत से रेलवे स्टेशन का विकास किया जा रहा है, जिसे राम मंदिर के मॉडल की तर्ज पर आधुनिक सुविधाओं के साथ भव्य रूप दिया जाएगा।

उत्तर प्रदेश राज्य सेतु निगम द्वारा 104 करोड़ की लागत से 614 मीटर बना लम्बा ब्रिज बनकर चालू हो गया है। इससे पूर्वांचल के कई जिले के लोगों को इसका फायदा हो रहा है। शिवनगरी काशी से रामनगरी अयोध्या आने वाले पर्यटकों को इसका सीधा फायदा मिल रहा है।

सूर्य /घोषार्क कुंड की कहानी :-
पौराणिक कथाओं के अनुसार , सूर्यकुंड का निर्माण भगवान राम के भाई लक्ष्मण ने सीता को उनके वनवास के दौरान ठंडे पानी का स्रोत प्रदान करने के लिए किया था । सूर्यकुंड के चमचमाते जल में चमत्कारी उपचार गुण माने जाते हैं, जिसके कारण यह आध्यात्मिक शांति की तलाश करने वाले तीर्थयात्रियों के लिए एक पवित्र स्थान बन गया है।

इस कुंड के प्रसिद्ध होने और घोषार्क कुंड कहलाने की घटनाएँ काफी रोचक हैं। अयोध्या में भगवान राम के प्रकट होने के बाद, सूर्यदेव भगवान राम से मिलने गए। वे भगवान राम के बाल रूप के दर्शन करना चाहते थे।

भगवान से मिलने के लिए उन्होंने कुछ देर प्रतीक्षा की, जिसके कारण सारा ब्रह्मांड थम सा गया। अतः भगवान राम को सूर्यदेव से शीघ्र ही मिलना पड़ा। सूर्यदेव ने अयोध्या में उसी स्थान को अपना निवास स्थान चुना जहाँ वे भगवान राम से मिलने की प्रतीक्षा कर रहे थे। जिस स्थान पर वे खड़े होकर प्रतीक्षा कर रहे थे, उसे सूर्य कुंड के नाम से जाना जाता है।

कई वर्षों बाद, इक्ष्वाकु वंश के राजा घोष पृथ्वी और सागरों पर निर्विवाद रूप से शासन कर रहे थे। अपनी प्रतिभा के कारण वे तीनों लोकों में बहुत लोकप्रिय थे। उन्होंने अपनी बलिष्ठ भुजाओं से अनेक शत्रुओं का वध किया था। अपने शौर्य के कारण वे सूर्य के समान प्रतीत होते थे। यद्यपि राजा घोष सुंदर थे, परन्तु अपने पिछले जन्म के पाप कर्मों के कारण उनके हाथों में कृमि फैले हुए थे।

राजा घोष ने घोषार्क कुंड की खोज की:-
एक बार राजा घोष जंगल में शिकार करने गए। वैदिक काल में राजा जंगल के कुछ हिस्सों में खूंखार जानवरों का शिकार करते थे ताकि जंगल में रहने वाले और तपस्या करने ऋषियों की रक्षा हो सके। शिकार के कारण राजा थक गए थे और उनका शरीर कमजोर हो गया था। ऊपर से वे बिल्कुल अकेले थे। अचानक उन्होंने एक छोटी झील देखी जिसमें ऋषि स्नान कर रहे थे और अपने धार्मिक अनुष्ठान कर रहे थे।

अब राहत पाकर राजा ने आचमन किया और विधिपूर्वक झील में स्नान किया। स्नान समाप्त होते ही राजा का शरीर रोगों से मुक्त होकर दिव्य अवस्था में पहुँच गया। प्रसन्नता के कारण उनका मन अशुद्धियों से मुक्त हो गया।

वहां उपस्थित ऋषियों से यह जानने के बाद कि यह सूर्यदेव को समर्पित तीर्थ है, उन्होंने सूर्यदेव को प्रसन्न करने के लिए प्रार्थना की।

राजा घोष की विनम्र प्रार्थनाओं से प्रसन्न होकर सूर्यदेव उनके समक्ष प्रकट हुए और वरदान प्रदान किया। राजा ने इच्छा व्यक्त की कि वहाँ सूर्यदेव की एक प्रतिमा स्थापित की जाए, जिसका नाम राजा के नाम पर रखा जाए। सूर्यदेव ने वरदान देते हुए कहा, “हे मनुष्यों के स्वामी, ऐसा ही हो। आपकी इच्छा अत्यंत मनभावन है। जो मनुष्य आपके द्वारा रचित और पाठ की गई इस प्रार्थना को पढ़ेंगे, मैं उनसे प्रसन्न होऊंगा। हे राजा! मैं उनकी सभी मनोकामनाएँ पूरी करूँगा। यह पवित्र स्थान आपके नाम से संसार में अत्यंत प्रसिद्ध होगा। जो यहाँ स्नान करता है, उसकी सभी मनोकामनाएँ पूरी होती हैं। यहां स्नान करना सदा मेरे भक्त का कर्तव्य है। वह जो चाहेग प्राप्त होगा।”

इतना कहकर सूर्यदेव अंतर्धान हो गए। तब से इस तीर्थ को घोषार्क कुंड के नाम से जाना जाने लगा। समय बीतने के साथ-साथ यह सूर्य कुंड के नाम से लोकप्रिय हो गया।

एक छोटी झील होने के कारण, राजा ने इसकी खुदाई करवाई थी। खुदाई के दौरान, सूर्यदेव की एक छोटी मूर्ति मिली थी। इस मूर्ति को घोष कुंड के किनारे स्थापित किया गया और आज भी इसकी पूजा की जाती है।

घोषार्क /सूर्य कुंड व मंदिर :-
अयोध्या का प्राचीन सूर्य कुंड व मंदिर ‘घोषार्क तीर्थ’ है। इसका उल्लेख डच इतिहासकार हंस बेकर की पुस्तक ‘अयोध्या’, ‘स्कन्द पुराण’ और रुद्रयामल में मिलता है। स्कन्द पुराण के अनुसार यह तीर्थ स्थल सभी पापों को नाश करने वाला है। सूर्य मंदिर तथा कुंड स्नान के लिए आदि काल से ही प्रसिद्ध रहा है।

घोषार्क कुंडा की महिमा :-
स्कंद पुराण के अयोध्या महात्म्य में कहा गया है कि घोषार्क कुंड में स्नान करने वाले भक्त की सभी मनोकामनाएं पूरी होती हैं। राजा घोष द्वारा अर्पित प्रार्थनाओं का पाठ करने से सूर्यदेव प्रसन्न होते हैं और भक्त की मनो- कामनाएं पूर्ण होती हैं।

यदि कोई बीमार व्यक्ति, दरिद्र व्यक्ति और दुख में जी रहा व्यक्ति निर्धारित विधि से कुंड में पवित्र स्नान करे तो उसकी मनोकामनाएं पूरी हो जाएंगी। घोषार्क कुंड में स्नान करने से भक्त को यश प्राप्त होता है और सूर्यलोक में निवास का वरदान मिलता है। इसी प्रकार, सूर्यदेव की श्रद्धापूर्वक पूजा करना और अशुद्धियों से मुक्त होकर कुंड में स्नान करना भी निष्कलंक प्रतिष्ठा प्रदान करता है। इससे भी सूर्यलोक में निवास का वरदान मिलता है।विशेष रूप से रविवार को किया जाने वाला पवित्र स्नान उत्तम फल प्रदान करता है। भाद्रपद या माघ माह के शुक्ल पक्ष के छठे दिन उचित विधि से किया गया पवित्र स्नान सूर्यलोक में निवास प्रदान करता है।

डच इतिहासकार हंस बेकर के अनुसार उस स्थान पर पौष महीने के मकर संक्रांति के दिन सूर्य कुंड मंदिर में पूजा स्नान करने की बड़ी महत्ता बताई गई है। उस दिन लोगों की वहाँ बहुत भीड़ उमड़ती है, तथा लोग वहाँ प्राचीन सूर्य कुंड मंदिर में स्नान कर तथा सूर्य उपासना कर बड़े पुण्य के भागी बनते हैं।

स्कन्द पुराण तथा रुद्रयामल की कथाओं के अनुसार सूर्य कुंड में स्नान करने से कुष्ठ और चर्म रोग से मुक्ति मिलती है। सूर्यकुंड में स्नान, दर्शन और पूजन का विधान शायद इसी सोच से समाज में बलवती हुई है।

वेदों में भगवान सूर्य को जड़-चेतन जगत की आत्मा कहा गया है. सूर्यवंशी राजा घोष का कुष्ठरोग इस कुंड में स्नान करने से ठीक हुआ था। मान्यता है कि इस सूर्य कुंड में स्नान और सूर्य मंदिर में दर्शन-पूजन करने से सभी मनोकामनाएं पूरी होती हैं।

राजा दर्शन सिंह द्वारा जीर्णोद्धार :-
शाकद्वीपीय ब्राह्मण अपने अराध्य देव सूर्य की पूजा के लिए आदिकाल से जाने जाते रहे हैं। अयोध्या के शाकद्वीपीय ब्राह्मण राजा दर्शन सिंह भी अपने अराध्य देव सूर्य की आराधना करने के लिए इस प्राचीन सूर्य कुंड मंदिर का जीर्णोद्धार करवाए थे।

अनुश्रुतियों में यह भी कहा गया है कि एक बार राजा दर्शन सिंह शिकार करने के लिए उस क्षेत्र में घूम रहे थे, तो उन्हें जोड़ो की प्यास लगी। उनके सेवक ने जब जल को ढूंढा तो उसे थोड़ी दूर पर एक कुंड मिला। उस कुंड का जल बड़ा निर्मल था। सेवक ने उसी कुंड का जल लाकर अपने राजा को प्यास बुझाने के लिए दिया।

राजा ने उस जल का पान किया तथा उसके कुष्ठ भाग को अपने शरीर पर हुए चर्म रोग पर रगडा। थोड़े ही देर में उनके शरीर पर हुवे चर्म रोग जैसे ठीक हो गया। राजा को लगा उस स्थान पर मानो कोई दैविक शक्ति है। अतः उन्होंने सात दिनों तक वहाँ तपस्या की। सातवें दिन राजा को एक आकाशवाणी सुनाई पड़ी जिसके आज्ञा के अनुसार उन्होंने वहाँ उस स्थान पर खुदाई भी करवाई।

खुदाई में राजा को सात घोड़ों पर सवार एक सूर्यदेव की मूर्ति, शिवलिंग तथा ढेरो खजाना प्राप्त हुआ था। राजा ने उस खजाने से वहाँ एक विशाल सूर्यकुंड तथा सूर्य मंदिर का निर्माण करवाया।

महाराजा द्वारा पुनः निर्मित सूर्यकुंड ना केवल जल प्रबंधन के लिए था, बल्कि धार्मिक अनुष्ठानों और पर्वों को और सुनियोजित ढंग से आकर्षित करने का माध्यम भी बन गया। लोगों ने इसे “जीवनदायिनी धारा” कहकर सम्मान दिया। यह जल संरक्षण और धार्मिक अनुष्ठानों के लिए निर्मित किया गया है।

प्राचीन काल से निभाई जा रही यह परंपरा उतनी ही आस्था और निष्ठा के साथ अयोध्या के राजा दर्शन सिंह द्वारा जीर्णोद्धार किये गए तथा निर्मित सूर्यकुंड में भी उस काल में मनाई जाती रही। उसका निर्वहन आज भी ठीक वैसा ही किया जाता है।

वार्षिक मेला:-
इस स्थान पर हर वर्ष मेले का आयोजन भी किया जाता है। जिसका प्रबंधन राजा दर्शन सिंह के वंशज आज भी करते हैं। सूर्य मंदिर का रखरखाव अयोध्या स्थित हनुमान गढ़ी प्रबंधन द्वारा किया जाता है। इस मंदिर में सूर्य देव की प्रतिमा के अतिरिक्त उनके चरणों में दोनों ओर सूर्य पुत्र और पुत्री शनि देव और यमुना देवी की अष्टधातु की मूर्तियां स्थापित की गई हैं। सूर्य कुंड की खोदाई से प्राप्त एक और सूर्य की प्रतिमा को भी वहीं स्थापित किया गया है। गर्भगृह में राम-जानकी,शिव-पार्वती, गणेश- कार्तिकेय, हनुमान जी तथा शालिग्राम के विग्रह भी स्थापित किए गए हैं।

वर्तमान काल मेंअयोध्या के प्राचीन सूर्य कुंड मंदिर स्थान पर मेले की ब्यवस्था की देखभाल राजा दर्शन सिंह के बंशजों के द्वारा किया जाता है। सूर्य मंदिर तथा सूर्य कुंड के रख रखाव की जिम्मेवारी अयोध्या के हनुमान गढ़ी के प्रबंधन के पास है। राज्य सरकार ने इसे भव्यता प्रदान कर रखी है।

लाइट एंड साउंड शो का आयोजन

प्रतिदिन शाम के समय इस कुंड में लाइट एंड साउंड शो का आयोजन भी किया जाता है. जिसमें सूर्यवंश की महिमा और सूर्य मंदिर के इतिहास के विषय में बताया जाता है। आधे आधे घंटे के दो शो आयोजित होते हैं ।प्रतिदिन शाम 7:30 बजे और 8:30 बजे ये शो शुरू होते हैं। जिसका प्रवेश टिकट: रु. 30 प्रति व्यक्ति है। उम्मीद की जा रही है कि जो राम भक्त अयोध्या श्री राम के दर्शनों के लिए आएंगे, वह इस पौराणिक सूर्यकुंड के दर्शन भी करने आएंगे। सरकार चाहती है कि अयोध्या में धार्मिक पर्यटन बढ़े और यहां आने वाले श्रद्धालु कम से कम दो-तीन दिन रुक कर पौराणिक स्थलों के दर्शन भी करें। इससे क्षेत्र में रोजगार और आर्थिक गतिविधियां भी बढ़ेंगी. जिससे क्षेत्र के विकास को भी गति मिलेगी। यह भी कहा जाता है कि जब श्रीराम का राज्याभिषेक हो रहा था, तब सभी सभी देवी-देवता अयोध्या आए थे। इनमें सूर्य देव भी शामिल थे. वह इसी स्थान पर रुके थे, जिसे आज सूर्य कुंड के नाम से जाना जाता है।यह सुबह आठ बजे से रात 10 बजे तक यह स्थान दर्शनार्थियों के लिए खुला रहता है।

लेखक परिचय:-

(लेखक भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण, में सहायक पुस्तकालय एवं सूचनाधिकारी पद से सेवामुक्त हुए हैं। वर्तमान समय में उत्तर प्रदेश के बस्ती नगर में निवास करते हुए सम सामयिक विषयों,साहित्य, इतिहास, पुरातत्व, संस्कृति और अध्यात्म पर अपना विचार व्यक्त करते रहते हैं। वॉट्सप नं.+919412300183)