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भारतीय तटरक्षक बल ने समन्वित समुद्री-हवाई अभियान के जरिए अंतरराष्ट्रीय तेल तस्करी रैकेट का भंडाफोड़ किया

मुंबई। भारतीय तटरक्षक बल (आईसीजी) ने 5-6 फरवरी 2026 को एक सुनियोजित समुद्री-हवाई समन्वित अभियान के जरिए एक अंतरराष्ट्रीय तेल तस्करी रैकेट का सफलतापूर्वक भंडाफोड़ किया। इस अभियान से संघर्षग्रस्त क्षेत्रों से उत्पन्न होने वाले भारी मात्रा में तेल और तेल-आधारित कार्गो के अवैध हस्तांतरण में शामिल एक जटिल नेटवर्क ध्वस्त हुआ है।

5 फरवरी 2026 को, मुंबई से लगभग 100 समुद्री मील पश्चिम में भारतीय तटरक्षक बल के जहाजों ने तीन संदिग्ध जहाजों को रोका। आईसीजी की विशेषज्ञ बोर्डिंग टीमें जहाजों की लगातार तलाशी, जहाज पर बरामद इलेक्ट्रॉनिक डेटा की पुष्टि, दस्तावेजों का सत्यापन और चालक दल के सदस्यों से विस्तृत पूछताछ के द्वारा घटनाक्रम की पूरी जानकारी जुटाने और आपराधिक कार्यप्रणाली की पुष्टि कर पाई।

तस्करी करने वाले गिरोह ने एक ऐसी कार्यप्रणाली अपनाई जिसमें सस्ते तेल को समुद्री जहाजों द्वारा ले जाया जाता था और अंतरराष्ट्रीय जलक्षेत्र में मोटर टैंकरों में स्थानांतरित किया जाता था। प्रारंभिक जांच से पता चला कि गिरोह में कई देशों में काम करने वाले दलाल शामिल थे, जो समुद्र में जहाजों के बीच माल की बिक्री और हस्तांतरण कार्य का समन्वय करते थे।

आईसीजी की तकनीक-आधारित निगरानी प्रणालियों द्वारा पता चलने के बाद यह अभियान शुरू किया गया, जिसमें भारतीय विशिष्ट आर्थिक क्षेत्र (ईईजेड) के भीतर संदिग्ध गतिविधि में लिप्त एक मोटर टैंकर की पहचान की गई। इसके बाद, जहाजों की आवाजाही की डिजिटल जांच और डेटा पैटर्न विश्लेषण से टैंकर की ओर आ रहे दो अतिरिक्त जहाजों की पहचान हुई, जिन पर अवैध रूप से तेल के जहाज-से-जहाज पर हस्तांतरण में शामिल होने का संदेह था, जिससे भारत सहित तटीय राज्यों को देय भारी शुल्क की चोरी हो रही थी।

5 फरवरी 2026 को भौतिक तलाशी से डिजिटल साक्ष्य की पुष्टि होने पर तीनों जहाजों को जब्त कर लिया गया। प्रारंभिक जांच से पता चलता है कि समुद्री कानून प्रवर्तन एजेंसियों से बचने के लिए ये जहाज अक्सर अपनी पहचान बदलते रहते थे। शुरुआती जांच से यह भी पता चलता है कि जहाजों के मालिक विदेशी देशों में रहते हैं। जब्त किए गए जहाजों को आगे की जांच के लिए मुंबई ले जाया जाएगा और बाद में उचित कानूनी कार्रवाई के लिए भारतीय सीमा शुल्क और अन्य कानून प्रवर्तन एजेंसियों को सौंप दिया जाएगा।

उन्नत डिजिटल निगरानी के माध्यम से शुरू किया गया और भारतीय तटरक्षक बल की बढ़ती समुद्री उपस्थिति द्वारा लागू किया गया यह अभियान, समुद्री क्षेत्र में एक प्रमुख सुरक्षा प्रदाता के रूप में और समुद्र में अंतरराष्ट्रीय नियमों पर आधारित व्यवस्था के एक दृढ़ प्रवर्तक के रूप में भारत की भूमिका को दर्शाता है।

यूआईडीएआई द्वारा स्कूली बच्चों के लिए एक करोड़ अनिवार्य बायोमेट्रिक अपडेट (एमबीयू) पूरे किए गए

मिशन-मोड के अंतर्गत चल रहे अभियान ने एक महत्वपूर्ण उपलब्धि हासिल करते हुए, भारतीय विशिष्ट पहचान प्राधिकरण (यूआईडीएआई) ने देश भर के 83000 स्कूली छात्रों के लिए एक करोड़ से अधिक अनिवार्य बायोमेट्रिक अपडेट (एमबीयू) को पूरा करने लक्ष्‍य हासिल किया।

यूआईडीएआई ने सितंबर 2025 में स्कूली छात्रों के लिए यह विशेष एमबीयू अभियान शुरू किया था। यह अभियान यूनिफाइड डिस्ट्रिक्ट इंफॉर्मेशन सिस्टम फॉर एजुकेशन प्लस (यूडीआईएसई+) एप्लिकेशन के साथ सफल तकनीकी एकीकरण के बाद शुरू किया गया था, जिससे स्कूलों में बच्चों के एमबीयू की स्थिति को देखना संभव हुआ था। इस सफलता ने यूआईडीएआई और स्कूलों को संयुक्त रूप से उन बच्चों की पहचान करने में मदद की, जिनका एमबीयू होना बाकी था और एमबीयू पूरा करने के लिए स्कूलों में शिविर आयोजित किए गए।

यूआईडीएआई के सीईओ श्री भुवनेश कुमार ने सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के मुख्य सचिवों को पत्र लिखकर यूआईडीएआई की इस कदम से अवगत कराया और विद्यालयों में लक्षित एमबीयू शिविर आयोजित करने में उनके सहयोग का अनुरोध किया। देश भर में आठ स्थानों पर स्थित यूआईडीएआई के क्षेत्रीय कार्यालयों ने इस व्यापक अभियान को सभी हितधारकों, अर्थात् राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के शिक्षा विभागों, जिला स्तरीय प्रशासन, यूआईडीएआई रजिस्ट्रारों और विद्यालय अधिकारियों के साथ समन्वयित करने के लिए पांच महीने तक अथक परिश्रम किया है। यह मिशन मोड अभियान तब तक चलता रहेगा जब तक देश के सभी विद्यालय इसमें शामिल नहीं हो जाते। इस पहल से अब तक 83,000 विद्यालयों के 1 करोड़ बच्चे लाभान्वित हुए और कई और भी बच्चों को इससे लाभान्वित होने की आशा है।

पांच वर्ष से कम आयु का बच्चा आधार कार्ड के लिए पंजीकरण कराते समय अपनी फोटो, नाम, जन्मतिथि, लिंग, पता और जन्म प्रमाण पत्र प्रदान करता है। पांच वर्ष से कम आयु के बच्चों के फिंगरप्रिंट और आइरिस बायोमेट्रिक्स आधार पंजीकरण के लिए नहीं लिए जाते हैं क्योंकि इस आयु में ये परिपक्व नहीं होते हैं। इसलिए, 5 से 15 वर्ष की आयु पार करने के बाद, फिंगरप्रिंट और आइरिस बायोमेट्रिक्स (एमबीयू) प्रक्रिया का पालन करते हुए आधार में फिंगरप्रिंट और आइरिस बायोमेट्रिक्स की जानकारी देना बच्चों के लिए अनिवार्य है। आधार में एमबीयू न होने से विभिन्न सरकारी योजनाओं के तहत लाभ प्राप्त करने, एनईईटी, जेईई, सीयूईटी आदि जैसी प्रतियोगी और विश्वविद्यालय परीक्षाओं में पंजीकरण कराने के दौरान प्रमाणीकरण में कठिनाइयां आ सकती हैं।

बच्चों को एमबीयू पूरा करने के लिए प्रोत्साहित करने और इस सेवा को सभी के लिए सुलभ बनाने के उद्देश्य से, यूआईडीएआई ने 7-15 आयु वर्ग के बच्चों के लिए एमबीयू के शुल्क को 1 अक्टूबर 2025 से एक वर्ष की अवधि के लिए माफ कर दिया था। इसके अलावा, 5-7 वर्ष और 15-17 वर्ष के बच्चों के लिए एमबीयू निःशुल्क बना हुआ है।

स्कूलों में आयोजित शिविरों के अलावा, बच्चे देश भर में चल रहे आधार नामांकन केंद्रों और आधार सेवा केंद्रों में भी अपना आधार पंजीकरण फॉर्म भर सकते हैं। इसी अवधि में इन केंद्रों पर आने वाले बच्चों द्वारा लगभग 1.3 करोड़ आधार पंजीकरण फॉर्म भरे जा चुके हैं।

आईएनएस सुदर्शिनी ने लोकायन 26 के पहले पोर्ट कॉल को पूरा किया, भारत–ओमान समुद्री संबंधों को मजबूत किया

भारतीय नौसेना की सेल ट्रेनिंग शिप आईएनएस सुदर्शिनी ने 05 फरवरी 2026 को सलालाह, ओमान में अपना पहला पोर्ट कॉल सफलतापूर्वक पूरा किया। यह यात्रा जहाज की महत्वाकांक्षी दस महीने की महासागरीय यात्रा लोकायन 26 में एक महत्वपूर्ण पड़ाव साबित हुई। इसका उद्देश्य भारत की समृद्ध समुद्री विरासत और विश्व परिवार (वसुधैव कुटुम्बकम) के सिद्धांत को दुनिया भर में प्रदर्शित करना है।

भ्रमण के दौरान आईएनएस सुदर्शनिनी के कमांडिंग ऑफिसर ने ओमान की रॉयल नेवी के साउदर्न नेवल एरिया कमांडर कैप्टन मोहम्मद अल ग़ैलेनी और रॉयल नेवी ऑफ़ ओमान के जहाज अल मोज़ेर के कमांडिंग ऑफिसर कैप्टन मोहम्मद अल महारी के साथ बातचीत की। इन संवादों में भारत और ओमान के बीच ऐतिहासिक समुद्री संबंधों को रेखांकित किया गया और दोनों नौसेनाओं के बीच मित्रता को और मजबूत किया गया। पेशेवर सहयोग को जारी रखते हुए जहाज ने रॉयल नेवी ऑफ़ ओमान के अधिकारियों के लिए भी एक यात्रा का आयोजन किया।

लोगों के बीच संपर्क के प्रदर्शन में सेैल ट्रेनिंग जहाज आगंतुकों के लिए खुला था। स्कूल के बच्चो सहित 600 से अधिक आगंतुकों को तीन-मास्टेड बार्क का प्रत्यक्ष अनुभव कराया गया और उन्हें महासागर में नौकायन की बारीकियों से परिचित कराया गया।

आईएनएस सुदर्शिनी अब लोकायन 26 के अपने अगले चरण पर आगे बढ़ रही है और भारत की शाश्वत समुद्री विरासत को महासागरों में ले जा रही है। पाल फहराए और उत्साह बनाये रखते हुए, वह समुद्री उत्कृष्टता, मित्रता और सद्भावना का प्रतीक बनकर सेवा जारी रखती है।

भारत में आधुनिक समुद्र विज्ञान के जनक

वर्ष 1960-65 के मध्य संचालित किया गया अन्तर्राष्ट्रीय हिन्द महासागर अभियान (IIOE – International Indian Ocean expedition) न केवल अपनी तरह का पहला समुद्रवैज्ञानिक अभियान था बल्कि इसके नेपथ्य में अनूठे विश्व सहयोग और बहु-जलयानों का योगदान भी था जिसकी बदौलत अभियान के दौरान की गईं खोजों और उनसे प्राप्त परिणामों ने भूवैज्ञानिक सिद्धांतों और संकल्पनाओं में क्रांति ला दी। इस अभियान का वैज्ञानिक उद्देश्य हिन्दमहासागर का अन्वेषण तथा विशिष्ट समुद्रवैज्ञानिक संकल्पनाओं का परीक्षण करना था।

क्या है समुद्रविज्ञान?

समुद्र विज्ञान पृथ्वी विज्ञान की शाखा है, जिसमें समुद्र का अध्ययन किया जाता है। इसके अन्तर्गत समुद्री जीवों और पारिस्थितिकी तंत्र की गतिशीलता सहित समुद्र संबंधी अनेक विषयों जैसे समुद्र धाराओं, लहरों, और भूभौतिकीय तरल गतिकी; प्लेट टेक्टोनिक्स और समुद्र तल के भूविज्ञान; और समुद्र के भीतर विभिन्न पदार्थों के भौतिक और रासायनिक गुणों का विस्तृत अध्ययन शामिल है। विश्व महासागरों में समुद्र के भीतर की प्रक्रियाओं को समझने के लिए समुद्रविज्ञान का विज्ञान की अन्य शाखाओं के साथ गहरा संबंध होता है जिनमें खगोल विज्ञान, जीव विज्ञान, रसायन विज्ञान, जलवायुविज्ञान, भूगोल, भूविज्ञान, जल विज्ञान, मौसम विज्ञान और भौतिकी आदि हैं। अतः समग्ररुप में समुद्रविज्ञान इन समस्त विषयों का मिश्रण है। पुरासमुद्रविज्ञान भूगर्भिक अतीत के महासागरों के इतिहास का अध्ययन कराता है। अतः समुद्र का अपना एक विज्ञान है, जो उसके गुणों की विशेषताओं के आधार पर उसे समुद्री भौतिकविज्ञान, समुद्री रसायनविज्ञान, समुद्री जीवविज्ञान और भू-भौतिक समुद्र विज्ञान की शाखाओं में विभक्त करता है।

उन दिनों हिन्दमहासागर का परिचय केवल एक अनजान अध्रुवीय महासागर के रुप में ही था, परंतु इस अभियान ने विश्व को इस महासागर की पारिभाषिक पहचान से अवगत कराया। समुद्र वैज्ञानिक दृष्टिकोण से तो यह अभियान अब तक के सफलतम अभियानों में से एक साबित हुआ है। इसका जितना वैज्ञानिक लाभ हुआ, उतना ही विश्वसमाज पर भी इसका असर देखने को मिला। इस अभियान ने 14 विभिन्न देशों के वैज्ञानिकों को एक साथ मिलकर काम करने की ओर प्रोत्साहित किया। इसमें अपनी भागीदारी दर्ज करने वाले थाइलैंड, भारत और पाकिस्तान को समुद्रविज्ञान के क्षेत्र में अपनी छिपी क्षमताओं को उभारने का भरपूर अवसर मिला।

अन्तर्राष्ट्रीय हिन्द महासागर अभियान में भारत की भागीदारी ने देश में समुद्रविज्ञान अध्ययन की नवीन सम्भावनाओं को जन्म दिया है। इसके माध्यम से भारत में विज्ञान की इस सद्यउद्भवित शाखा के भावी सृजन के कर्णधार रहे महान समुद्रवैज्ञानिक प्रोफेसर एन.के. पणिक्कर। उन दिनों पणिक्कर दिल्ली में खाद्य व कृषि मंत्रालय में मत्स्य विकास सलाहकार थे। वे इस अभियान की शुरुआत के पूर्व भी स्कॉर (SCOR या Scientific Committee on Oceanic Research) की बैठकों में भारत का प्रतिनिधित्व कर चुके थे। स्कॉर अंतर्राष्ट्रीय समुद्र वैज्ञानिक गतिविधियों को बढ़ावा देने और उनके समन्वयन करने वाला एक प्रमुख अंतर्राष्ट्रीय गैर-सरकारी व गैर-लाभकारी संगठन है। इसकी स्थापना 1957 में समुद्र विज्ञान अनुसंधान के लिए बनाई जाने वालीं योजनाओं के निर्धारण व संचालन में अंतर्राष्ट्रीय सहयोग को बढ़ावा देने और समुद्र वैज्ञानिक गतिविधियों के दौरान आने वाली प्रायोगिक एवम् सैद्धांतिक समस्याओं को सुलझाने के उद्देश्य से की गई थी। इसका सचिवालय डेलावेयर विश्वविद्यालय, अमरीका में है।

समुद्री अनुसंधान के अपने अनुभव के कारण पणिक्कर एकमात्र ऐसे भारतीय समुद्रवैज्ञानिक थे जो सम्भवतः अच्छी तरह जानते थे कि देश के अन्य समुद्रवैज्ञानिकों, शोधार्थियों और विद्यार्थियों को अन्तर्राष्ट्रीय हिन्दमहासागर अभियान में भाग लेने के लिए किस तरह एकत्रित किया जा सकता है। 1960 में पेरिस और हेलसिंकी में स्कॉर-यूनेस्को की बैठकों में भाग लेने के बाद उन्होंने इस दिशा में गम्भीरता से कार्य प्रारंभ किया। उसी वर्ष उनकी सलाह पर डॉ. डी.एन.वाडिया की अध्यक्षता में एक भारतीय राष्ट्रीय समुद्री अनुसंधान समिति (Indian National Committee on Oceanic Research) गठित की गई जिसे अन्तर्राष्ट्रीय हिन्द महासागर अभियान के दौरान भारतीय वैज्ञानिक कार्यक्रमों की योजनाओं के निर्धारण व समन्वयन का उत्तरदायित्व सौंपा गया था। समिति के विचार-विमर्श के परिणामों को सीधे अन्तर्राष्ट्रीय हिन्द महासागर अभियान निदेशालय को भेजा जाता था, और फिर अभियान में भारत की पूर्ण भागीदारी सुनिश्चित करने के लिए पर्याप्त निधि और स्टाफ का आवंटन करने की स्वीकृति प्रदान की जाती थी।

राष्ट्रीय समुद्र विज्ञान संस्थान के पहले निदेशक समुद्रवैज्ञानिक डॉ एन.के.पणिक्कर (1913-1977) को भारत में समुद्रविज्ञान का कर्णधार माना जाता है

1961 में यूनेस्को से वित्तीय सहायता प्राप्त एक अन्तर्राष्ट्रीय मौसमविज्ञान बैठक मुम्बई में आयोजित की गई जिसमें हिन्दमहासागर से संलग्न दस देशों के अलावा ब्रिटेन और अमरिका के प्रतिनिधियों ने भाग लिया था। इस बैठक में संयुक्त राष्ट्र और विश्व मौसमविज्ञान संगठन (World Meteorological Organization) के प्रतिनिधि भी शामिल हुए थे। इसके बाद कोलाबा, मुम्बई में अंतर्राष्ट्रीय मौसम विज्ञान केन्द्र और कोचीन में हिंद महासागर जैव विज्ञान केन्द्र की स्थापना की गई थी, जो बाद में समुद्री वैज्ञानिकों के लिए विश्वस्तरीय केंद्र के रुप में उभरकर सामने आए।

अन्तर्राष्ट्रीय हिन्द महासागर अभियान के शुरु होने के कुछ दिनों पहले ही प्रोफेसर पणिक्कर ने भारत सरकार की ओर से अमेरिका के स्क्रिप्स समुद्रविज्ञान संस्थान (Scripps Institution of Oceanography) के प्रख्यात समुद्रवैज्ञानिक प्राध्यापक यूजीन लाफॉण्ड से भारतीय समुद्रविज्ञान केंद्रों का दौरा कर वहाँ अपने व्याख्यान देने का आग्रह किया। लाफॉण्ड, जो अपने मित्रों के बीच जीन नाम से लोकप्रिय थे, को भारत से बड़ा ही लगाव था। उनके भारत आगमन का उद्देश्य था कि वे देश के विभिन्न संस्थानों में काम कर रहे उत्साही वैज्ञानिकों को इस अभियान के महत्व से परिचित करवा सकें और विशेष रुप से अमेरिका के जीवविज्ञान कार्यक्रमों व जलयान एण्टोन ब्रून की समुद्री यात्राओं से संबंधित जानकारियाँ प्रदान करें क्योंकि इन यात्राओं में अनेक भारतीय वैज्ञानिकों की भागीदारी भी सुनिश्चित हो चुकी थी। लाफॉण्ड ने बॉम्बे विज्ञान अकादमी, तारापोरेवाला समुद्र जीववैज्ञानिक अनुसंधान स्टेशन मुम्बई, नौसेना भौतिकीय प्रयोगशाला कोचीन, राष्ट्रीय भूभौतिकीय अनुसंधान संस्थान कोचीन, केंद्रीय मत्स्य अनुसंधान संस्थान के अलावा आँध्रप्रदेश, गुजरात, केरल, दिल्ली इत्यादि स्थित लगभग दो दर्जन विश्वविद्यालयों में अपने व्याख्यानों के द्वारा भारतीय वैज्ञानिकों को प्रोत्साहित किया। लाफॉण्ड ने 1952-56 के दौरान आंध्र विश्वविद्यालय में समुद्र विज्ञान के अतिथि प्राध्यापक के रूप में अपनी सेवाएँ प्रदान कीं, यहीं से 1956 में उन्हें डॉक्टर ऑफ साइंस की उपाधि से सम्मानित किया गया।

प्रोफेसर यूजीन लाफॉण्ड (1909-2002) को “भारत में आधुनिक समुद्र विज्ञान के जनक” के रूप में जाना जाता है।

प्रोफेसर लाफॉण्ड को “भारत में आधुनिक समुद्र विज्ञान के जनक” के रूप में जाना जाता है। उन्होंने भारतीय समुद्रवैज्ञानिकों का एक ऐसा प्रशिक्षित दल तैयार किया जिसने बहुत ही कम समय में अपनी रचनात्मक समुद्रवैज्ञानिकता का परिचय देते हुए तटीय कटाव, समुद्र तट के भू-आकृति विज्ञान, विभिन्न प्रकार की समुद्री धाराओं, ध्वनि प्रसार, आंध्र, कृष्णा और महादेवन समुद्रीघाटियों की खोज, समुद्री प्रकाशीय विशेषताओं, अवसादन दर, अवसादों के भूरासायनिक गुणों, हाइड्रोग्राफी, जल संसाधनों, समुद्री ज्वार-भाटों, पोषक तत्व रसायन विज्ञान, प्लवक उत्पादन, और सूचक प्रजातियों जैसे विषयों पर अनुसंधान की एक अद्भुत विविधता से देश को चकित कर दिया। भारत सरकार ने उनके अमूल्य योगदान की स्मृति में उनके नाम पर एक अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता प्राप्त “यूजीन लाफॉण्ड पदक” की स्थापना की है।

राष्ट्रीय समुद्र विज्ञान संस्थान (National Institute of Oceanography) भारत सरकार के वैज्ञानिक एवं औद्योगिक अनुसंधान परिषद (CSIR) की एक प्रयोगशाला है। इसका मुख्यालय गोवा में स्थित है तथा मुम्बई, कोच्चि एवं विशाखापट्टनम में इसके क्षेत्रीय कार्यालय हैं। इसकी स्थापना 1966 में हुई थी। प्रोफेसर लाफॉण्ड का इस संस्थान के प्रति विशेष स्नेह रहा है। इस बात की पुष्टि इससे होती है कि 80 के दशक के पूर्वार्ध में उन्होंने अपने व्यक्तिगत संग्रह से जर्नल ऑफ जिओफिजिकल रिसर्च (Journal of Geophysical Research) के कई पुराने अंकों से लेकर अनेक अन्य पत्रिकाएँ, किताबें, रिपोर्टें और हजारों रिप्रिंट एनआईओ को दान कर दिये। इसके पहले निदेशक प्रोफेसर पानिक्कर ही थे। 1973 में पानिक्कर को राष्ट्रपति द्वारा पद्मश्री से सम्मानित किया गया। यह सम्मान पाने वाले वे पहले भारतीय समुद्रवैज्ञानिक थे।

प्रोफेसर पणिक्कर व प्रोफेसर लाफॉण्ड और उनके जैसे अनेक महान समुद्रवैज्ञानिकों के अथक परिश्रम से हमारा देश समुद्रविज्ञान के क्षेत्र में अनुसंधान करने वाले प्रमुख राष्ट्रों में सम्मिलित है। प्रथम अन्तर्राष्ट्रीय हिन्द महासागर अभियान के पश्चात् बीते पाँच दशकों में भारत ने समुद्रविज्ञान में अनुसंधानों के अनेक कीर्तिमान स्थापित किए हैं। अब 2015-20 के बीच एक नये अभियान IIOE-2 में अत्याधुनिक तकनीकों द्वारा समुद्र में बायोजियोकेमिकल प्रक्रिया, पर्यावरण पर समुद्र के असर, मछली के अत्यधिक शिकार के प्रभाव, समुद्री जल के अम्लीकरण एवं समुद्री जीवन पर इसके प्रभाव आदि का अध्ययन किया जायेगा।

लेखिका डॉ. शुभ्रता मिश्रा के बारे में
डॉ शुभ्रता मिश्रा मध्यप्रदेश से हैं, प्रारम्भ से ही एक मेधावी शोधार्थी रहीं हैं। उन्होंने डॉ. हरिसिंह गौर विश्वविद्यालय, सागर से वनस्पतिशास्त्र में स्नातक व स्नातकोत्तर उपाधियाँ विश्वविद्यालय में प्रथम स्थान के साथ प्राप्त कीं। उन्होंने विक्रम विश्वविद्यालय उज्जैन से वनस्पतिशास्त्र में डॉक्टरेट की उपाधि प्राप्त की है तथा पोस्ट डॉक्टोरल अनुसंधान कार्य भी किया है। उन्हें उनके शोधकार्य के लिए मध्यप्रदेश युवा वैज्ञानिक पुरस्कार मिला है। डॉ. मिश्रा की अँग्रेजी भाषा में वनस्पतिशास्त्र व पर्यावरणविज्ञान से संबंधित 15 से अधिक पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। साथ ही विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में डॉ. मिश्रा के हिन्दी में वैज्ञानिक लेख प्रकाशित होते रहते हैं। डॉ. मिश्रा वर्तमान में गोवा में हिन्दी के क्षेत्र में सक्रिय लेखन कार्य कर रही हैं। उनकी पुस्तक “भारतीय अंटार्कटिक संभारतंत्र” को राजभाषा विभाग के राजीव गाँधी ज्ञान-विज्ञान मौलिक पुस्तक लेखन पुरस्कार 2012 से सम्मानित किया गया है।

साभार

श्री अमित शाह ने भारत की पहली सहकारिता-आधारित टैक्सी सेवा ‘भारत टैक्सी’ का

‘भारत टैक्सी’ से सरकार नहीं, सहकार, टैक्सी के क्षेत्र में प्रवेश कर रही है
‘भारत टैक्सी’ विश्व की ऐसी अनूठी सहकारी कंपनी है, जिसको चलाने वाला मालिक सारथी ही होगा, जो उनकी आर्थिक उन्नति का आधार बनेगा
‘भारत टैक्सी’ का उद्देश्य कमीशन काटकर बड़ी कंपनियों की तरह पूँजी बढ़ाना नहीं, बल्कि सारथियों को उनके मुनाफे का मालिक बनाकर उनकी आय बढ़ाना है

नई दिल्ली।
केन्द्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री श्री अमित शाह ने आज नई दिल्ली में भारत की पहली सहकारिता-आधारित टैक्सी सेवा ‘भारत टैक्सी’ का औपचारिक शुभांरभ किया। इस अवसर पर केन्द्रीय सहकारिता राज्य मंत्री श्री कृष्ण पाल गुर्जर एवं श्री मुरलीधर मोहोल और सहकारिता सचिव डॉ. आशीष कुमार भूटानी सहित अनेक गणमान्य व्यक्ति उपस्थित थे। इस ऐतिहासिक कार्यक्रम में देश के विभिन्न राज्यों से आए 1,200 से अधिक “सारथियों” (ड्राइवर पार्टनर्स) ने भाग लिया, जो भारत टैक्सी के चालक सशक्तिकरण और सहकारी स्वामित्व आधारित मॉडल के प्रति व्यापक समर्थन को दर्शाता है।

कार्यक्रम को संबोधित करते हुए केन्द्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री श्री अमित शाह ने कहा कि प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी के नेतृत्व में सहकारिता मंत्रालय असंगठित क्षेत्र में काम करने वाले लोगों के लिए मालिकाना हक का एक मॉडल तैयार कर रहा है। उन्होंने कहा कि तीन साल के अंदर कश्मीर से कन्याकुमारी और द्वारका से कामख्या तक सहकार टैक्सी हमारे टैक्सी सार्थियों के कल्याण का एक बहुत बड़ा माध्यम बन जाएगी। श्री शाह ने कहा कि जब पहली बार उन्होंने संसद के सामने सहकार टैक्सी का विषय रखा तो बहुत सारे लोगों, खासकर टैक्सी परिचालन से जुड़ी कंपनियों, ने सवाल उठाया कि सरकार टैक्सी के क्षेत्र में क्यों प्रवेश कर रही है। उन्होंने कहा कि ऐसे लोगों को ‘सहकार’ और ‘सरकार’ के बीच का भेद नहीं मालूम है। श्री शाह ने कहा कि सरकार टैक्सी के क्षेत्र में प्रवेश नहीं रही, बल्कि सहकार (Cooperation) टैक्सी के क्षेत्र में प्रवेश कर रहा है।

केन्द्रीय सहकारिता मंत्री श्री अमित शाह ने कहा कि शायद पूरी दुनिया में पहली बार ऐसी अनूठी कंपनी अस्तित्व में आ रही है, जिसका असली मालिक कोई व्यक्ति या बाहरी कंपनी नहीं, बल्कि टैक्सी चलाने वाला सारथी ही है। सहकार टैक्सी से जुड़े हर एक सारथी भाई-बहन ही इस सहकारी टैक्सी समिति के सच्चे मालिक हैं। उन्होंने कहा कि यह संकल्पना सहकार टैक्सी से जुड़ने वाले सारथियों के जीवन, आत्मविश्वास और आर्थिक स्थिति में आमूल-चूल परिवर्तन लाने वाली है। श्री शाह ने यह भी कहा कि हमारे देश में पहले ऐसे कई मॉडल सफल हो चुके हैं। सिर्फ 11 दूध उत्पादकों ने अमूल की शुरुआत की थी। आज गुजरात में 36 लाख से अधिक पशुपालक महिलाओं का विशाल वटवृक्ष खड़ा हो चुका है। यह पशुपालक महिलाएं सवा लाख करोड़ रुपए से अधिक का कारोबार करती हैं। उन्होंने कहा कि यह मॉडल दर्शाता है कि जब आम लोग स्वयं मालिक बनते हैं, तो छोटी शुरुआत भी बहुत बड़े परिणाम दे सकती है। उन्होंने कहा कि पशुपालक बहनें आज दूध बेचकर एक करोड़ रुपए तक की सालाना कमाई कर रही हैं, जो सहकारी मॉडल का कमाल है।

श्री अमित शाह ने टैक्सी सारथियों से अपील की कि वे अभी भी टैक्सी चलाते हैं, सहकार टैक्सी से जुड़ने के बाद भी टैक्सी चलाएँगे, लेकिन दोनों में एक बड़ा फर्क होगा। उन्होंने कहा कि अभी टैक्सी का पहिया किसी और की जेब में पैसे डालता है, लेकिन अब सारथियों की टैक्सी के पहिये की कमाई सारथियों की जेब में ही जाएगी। उन्होंने कहा कि यह विचार सहकारिता की भावना से ही जन्म लेता है। सहकारिता का असली अर्थ यही है कि जब ढेर सारे छोटे-छोटे पूंजी वाले लोग अपनी ताकत को एकत्रित कर लेते हैं, तो वे मिलकर बहुत बड़े-बड़े काम कर पाते हैं। जिनके पास बहुत बड़ी पूंजी होती है, वे अकेले बड़ा काम करते हैं और मुनाफा भी कुछ ही लोगों तक सीमित रहता है। श्री शाह ने कहा कि आज जिस सहकारिता मॉडल की बात की जा रही है, वही आज के समय में सबसे नई और सबसे सफल शुरुआत है। उन्होंने कहा कि अब टैक्सी का पहिया किसी और की कमाई के लिए नहीं, बल्कि टैक्सी सारथियों की समृद्धि और खुशहाली के लिए घूमेगा।

केन्द्रीय सहकारिता मंत्री श्री अमित शाह ने कहा कि भारत में कई विश्व-स्तरीय सहकारी मॉडल खड़े हो चुके हैं, जिनमें अमूल, इफको, कृभको जैसी संस्थाएं शामिल हैं। उन्होंने कहा कि इनमें से किसी भी सहकारी संस्था में शुरूआती पूंजी बहुत बड़ी नहीं थी। इसी तरह सहकार टैक्सी में सबसे बड़ी शेयर पूंजी सिर्फ 500 रुपये है और वही 500 रुपये सारथियों को असली मालिक का दर्जा दे रहा है। उन्होंने कहा कि यह छोटी सी राशि टैक्सी सारथियों की मेहनत, आत्मसम्मान और उनकी आर्थिक आजादी की नींव बनने जा रही है।

श्री अमित शाह ने कहा कि हर पाँच साल पर होने वाले चुनाव के बाद टैक्सी सारथियों द्वारा चुने गए दो प्रतिनिधि बोर्ड में बैठेंगे। वे ही उनके हितों की देखभाल करेंगे और उनके लिए फैसले करेंगे। यही सहकारिता की आत्मा और सच्चे मालिकाना हक की भावना है। उन्होंने कहा कि सहकार टैक्सी कुल मुनाफे में सिर्फ 20 फीसदी पैसे ही अपने पास रखेगी, यानि 100 रुपए में से 20 रुपए ही सहकार टैक्सी अपने पास रखेगी, जिसके मालिक सारथी ही हैं। श्री शाह ने कहा कि सारा मुनाफा भारत टैक्सी से जुड़े सारथी के अकाउंट में ही जाएगा। उन्होंने कहा कि भारत टैक्सी के पूंजी खाते में पड़े 20 रुपए के मालिक भी सारथी ही होंगे।

केन्द्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री ने कहा कि भारत टैक्सी की कल्पना मौजूदा तीनों प्रकार के टैक्सी वाहनों को एक साथ जोड़कर की गई है जिसमें चार पहिया टैक्सी, तीन पहिया और दो पहिया वाहन शामिल हैं। उन्होंने देश की मातृ शक्ति को संदेश दिया कि भारत टैक्सी उनकी सुरक्षा को सर्वोपरि रखेगी। उन्होंने कहा कि हमने सारथी दीदी की एक खास संकल्पना तैयार की है जिसके तहत आने वाले समय में ऐप में ‘सारथी दीदी’ के लिए एक अलग विंडो होगी, जिसके जरिए रजिस्ट्रेशन कराने वाली किसी भी महिला को केवल ‘सारथी दीदी’ ही पिक करने आएंगी। श्री शाह ने कहा ‘सारथी दीदी’ दो पहिया वाहन लेकर आएंगी और बहुत कम किराए में सुरक्षित रूप से गंतव्य तक पहुंचाएंगी। उन्होंने कहा कि यह सुविधा महिलाओं के लिए बहुत बड़ी और व्यावहारिक राहत साबित होगी। आने वाले दिनों में सारथी दीदी के माध्यम से देश की मातृ शक्ति को एक सुरक्षित, किफायती और सम्मानजनक यात्रा का विकल्प उपलब्ध होगा। यह सिर्फ एक सेवा नहीं बल्कि महिलाओं की सुरक्षा, स्वावलंबन और सम्मान की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।

केन्द्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री ने कहा कि दिल्ली ट्रैफिक पुलिस, दिल्ली मेट्रो रेल निगम, एयरपोर्ट अथॉरिटी, इफको टोक्यो इंश्योरेंस, स्टेट बैंक ऑफ इंडिया सहित कुल नौ प्रमुख संस्थाओं के साथ भारत टैक्सी ने समझौता (एमओयू) किया है। इन समझौतों के जरिए भारत टैक्सी के ग्राहकों को कई अतिरिक्त सुविधाएँ मिलेंगी और साथ ही इन सभी संस्थाओं को भारत टैक्सी की सेवाएँ आसानी से उपलब्ध हो सकेंगी। उन्होंने कहा कि ये संस्थाएँ अब सहकार टैक्सी की सफलता में हिस्सेदार बन चुकी हैं। यह स्वामित्व मॉडल पर आधारित नया टैक्सी कॉन्सेप्ट आज पहली बार भारत में लॉन्च किया गया है, जो न केवल सारथियों के लिए मालिकाना हक की भावना लाता है, बल्कि यात्रियों और विभिन्न संस्थाओं के लिए भी एक भरोसेमंद और सुविधाजनक विकल्प प्रस्तुत करता है।

श्री अमित शाह ने कहा कि भारत टैक्सी द्वारा तय किया गया फिक्स्ड चार्ज सारथियों के अकाउंट से अलग रहेगा। इसके अलावा, भारत टैक्सी सारथियों की पसीने की कमाई से एक प्रतिशत भी कमीशन नहीं काटेगी, जिससे उनकी समृद्धि तेजी से बढ़ेगी। उन्होंने कहा कि भारत टैक्सी का उद्देश्य कंपनी की पूंजी को बढ़ाना नहीं, बल्कि भारत टैक्सी के असली मालिक, सारथी भाइयों और सारथी दीदियों, का मुनाफा और आय बढ़ाना है। श्री शाह ने कहा कि ग्राहक द्वारा किया गया भुगतान सीधे सारथी के अकाउंट में तत्काल ऑटोमैटिकली ट्रांसफर हो जाएगा। इसके लिए इंतजार नहीं करना पड़ेगा। किसी भी सारथी का अकाउंट बिना उचित सुनवाई के बंद नहीं किया जाएगा। हालांकि, सारथियों का भी दायित्व है कि वे ग्राहकों के साथ अच्छा व्यवहार करें, अपनी टैक्सी की गुडविल बनाए रखें और सेवा की गुणवत्ता पर ध्यान दें। उन्होंने कहा कि शिकायतों की सुनवाई के लिए पूरी व्यवस्था की गई है और निष्पक्ष सुनवाई के बाद ही कोई कार्रवाई की जाएगी।

केन्द्रीय सहकारिता मंत्री श्री अमित शाह ने कहा कि अब तक बुकिंग फीस, प्लेटफॉर्म फीस और भारी कमीशन जैसी बातें कंपनी की बैलेंस शीट को मोटा करती थीं और सारथी की कमाई को घटाती थीं। भारत टैक्सी में ऐसी कोई फीस या कमीशन की व्यवस्था ही नहीं है और सारथी ही मालिक होंगे। यह विचार पश्चिमी सोच वाले लोगों को शायद समझ न आए, लेकिन यही सहकारिता की असली ताकत है।

श्री अमित शाह ने कहा कि भारत टैक्सी की शुरुआत सहकारिता क्षेत्र के लिए नए आयाम खोलने की भी शुरुआत है। पिछले 125 वर्षों से भारत में सहकारिता आंदोलन चल रहा है, लेकिन अब समय आ गया है कि सहकारी मॉडल को नए-नए क्षेत्रों में ले जाया जाए। उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी के नेतृत्व में सहकारिता मंत्रालय असंगठित क्षेत्र में काम करने वाले लोगों के लिए मालिकाना हक वाला मॉडल तैयार कर रहा है। आने वाले समय में हम तीन-चार ऐसे क्षेत्रों में इस मॉडल को आगे बढ़ाएंगे, जहां मेहनत करने वाले व्यक्ति के पसीने और परिश्रम का फल उसी के पास रहेगा।

केन्द्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री ने कहा कि भारत टैक्सी के चार मूल मंत्र हैं—स्वामित्व (ownership), सुरक्षा कवच (security), सम्मान (dignity) और सबका पहिया, सबकी प्रगति, यानी सभी के लिए लाभांश का उचित वितरण। इन्हीं चार उद्देश्यों के साथ भारत टैक्सी की शुरुआत हुई है और आने वाले समय में यह एक बहुत सफल प्रयोग साबित होगा। उन्होंने कहा कि 6 जून 2025 को इसकी स्थापना हुई और आज से यह कमर्शियली लॉन्च हो रही है। महज 8 महीनों के भीतर दिल्ली और गुजरात में किसी भी अन्य टैक्सी कंपनी से ज्यादा सारथी और ग्राहक भारत टैक्सी से जुड़ चुके हैं। इतने कम समय में इतने बड़े पैमाने पर रजिस्ट्रेशन किसी अन्य कंपनी ने नहीं कराए हैं। उन्होंने कहा कि आने वाले दिनों में हमारे सारथी भाइयों-बहनों को इंश्योरेंस, सरकारी रोजगार योजनाओं, लोन, सब्सिडी और गिग वर्कर से जुड़ी सभी सरकारी योजनाओं का लाभ स्वतः मिल सकेगा। हम इस दिशा में लगातार काम कर रहे हैं ताकि हर सारथी को पूरा सम्मान, सुरक्षा और आर्थिक मजबूती मिल सके।

श्री अमित शाह ने कहा कि प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी ने वर्ष 2020-21 में Gig Workers के कल्याण के लिए एक महत्वपूर्ण पहल शुरू की थी। अब 2025-26 के बजट में भारत सरकार देश भर के सवा करोड़ से अधिक Gig Workers के लिए ढेर सारी योजनाएं और सुविधाएं लेकर आई हैं। पहले ई-श्रम पोर्टल पर रजिस्ट्रेशन का अधिकार केवल उन लोगों को था जिनकी पेंशन कटती थी या जो औपचारिक रूप से मान्यता प्राप्त श्रमिक के रूप में पंजीकृत थे। अब इस सीमा को हटाकर देश के सवा करोड़ Gig Workers ई-श्रम पोर्टल पर अपना रजिस्ट्रेशन करा सकते हैं। उन्होंने कहा कि भारत टैक्सी से जुड़े सभी सारथी अब आसानी से ई-श्रम पोर्टल पर रजिस्ट्रेशन करवा सकते हैं। रजिस्ट्रेशन के बाद उन्हें प्रधानमंत्री जन आरोग्य योजना के तहत पांच लाख रुपए तक का मुफ्त इलाज अपने और अपने परिवार के लिए स्वतः उपलब्ध हो जाएगा। भारत टैक्सी से जुड़ते ही सारथियों को यह मुफ्त चिकित्सा सुविधा मिलनी शुरू हो जाएगी। इसके अलावा ई-श्रम पोर्टल पर पंजीकृत श्रमिकों के लिए उपलब्ध अन्य कई सामाजिक सुरक्षा योजनाएं भी आपके लिए अपने आप सक्रिय हो जाएंगी।

केन्द्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री ने कहा कि भारत टैक्सी का मॉडल न केवल सारथियों की आर्थिक स्थिति को मजबूत करेगा, बल्कि उनके सम्मान, सुरक्षा और स्वामित्व को भी सुनिश्चित करेगा। उन्होंने कहा कि भारत टैक्सी के ऐप में SoS अलर्ट की सुविधा उपलब्ध करा दी गई है, जिसके माध्यम से आपातकालीन स्थिति में तुरंत सुरक्षा और सहायता प्राप्त की जा सकती है। अभी दिल्ली-एनसीआर में आठ हेल्पलाइन और सहायता केन्द्र स्थापित किए जा चुके हैं और आने वाले समय में देशभर में ऐसे केन्द्रों का एक व्यापक जाल बिछाया जाएगा। शिकायत निवारण की पूरी प्रक्रिया तीन स्तरों पर संचालित होगी—ऐप के माध्यम से, वेबसाइट पर और टोल-फ्री नंबर के जरिए। इसके साथ ही हमारे प्रतिनिधि नियमित रूप से सारथियों के साथ बैठकें करेंगे ताकि हर समस्या का समय पर समाधान हो सके। उन्होंने कहा कि आज से सारथी hidden charges से पूरी तरह मुक्त हैं। hidden charge लेना सारथी के साथ एक तरह का छल है। टोल, पार्किंग और अन्य सभी तरह के अतिरिक्त शुल्क से भी मुक्ति मिलेगी। साथ ही 24 घंटे, सातों दिन हेल्पलाइन सारथियों के लिए हमेशा उपलब्ध रहेगी। फिलहाल इसकी शुरुआत गुजरात के कुछ शहरों, दिल्ली और एनसीआर में हो रही है। लेकिन अगले तीन साल से भी कम समय में हम देश के हर राज्य और हर बड़े शहर तक पहुंच जाएंगे।

केन्द्रीय सहकारिता मंत्री श्री अमित शाह ने कहा कि आने वाले दिनों में हम भारत टैक्सी में बहुत सारी नई सेवाओं को शामिल करेंगे और इसे लगातार विस्तार देंगे। उन्होंने दिल्ली-एनसीआर के सभी ग्राहकों और सारथियों को संदेश दिया कि आज से भारत टैक्सी उनकी सेवा में पूरी तरह शुरू हो रही है। यह सिर्फ एक टैक्सी सेवा नहीं है, बल्कि हमारे देश के करोड़ों सारथियों की समृद्धि, आत्मसम्मान और आर्थिक मजबूती बढ़ाने का एक सशक्त माध्यम बनने जा रही है। उन्होंने कहा कि अब तक दिल्ली-एनसीआर में 2.5 लाख से ज्यादा ड्राइवर भारत टैक्सी के साथ जुड़ चुके हैं, 8.5 लाख से अधिक यात्री इस परिवार का हिस्सा बन चुके हैं और कई बड़ी कंपनियों के साथ हमारे समझौते भी अंतिम चरण में हैं। उन्होंने विश्वास जताया कि भारत टैक्सी का भविष्य बेहद उज्ज्वल है।

कार्यक्रम से पूर्व दिन में, भारत टैक्सी के शुभारंभ को प्रतीकात्मक रूप से इंदिरा गांधी अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे से विज्ञान भवन तक निकाली गई 100 कारों की भव्य रैली के माध्यम से चिह्नित किया गया। इस रैली ने देश के टैक्सी समुदाय की एकता, आत्मगौरव और सामूहिक शक्ति का सशक्त प्रदर्शन किया।

कार्यक्रम के दौरान उत्कृष्ट प्रदर्शन करने वाले शीर्ष पांच सारथियों को उनके उल्लेखनीय योगदान के लिए सम्मानित किया गया, जिससे सहकारी मॉडल के अंतर्गत चालक स्वामित्व और भागीदारी को प्रोत्साहन मिले। प्रत्येक सम्मानित सारथी को व्यक्तिगत दुर्घटना बीमा प्रमाणपत्र तथा ₹5 लाख की पारिवारिक स्वास्थ्य बीमा कवरेज प्रदान की गई, जो चालक कल्याण और सामाजिक सुरक्षा के प्रति भारत टैक्सी की प्रतिबद्धता को दर्शाती है।

कार्यक्रम के दौरान माननीय केंद्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री की उपस्थिति में अग्रणी सार्वजनिक एवं निजी भागीदारों के साथ नौ समझौता ज्ञापनों (MoUs) का आदान-प्रदान भी किया गया, जिनका उद्देश्य परिचालन एकीकरण, डिजिटल सक्षमता तथा सेवा गुणवत्ता को सुदृढ़ करना है।

दिल्ली यातायात पुलिस और सहकार टैक्सी कोऑपरेटिव लिमिटेड के मध्य किये गए समझौता ज्ञापन (MoU) के तहत भारत टैक्सी को दिल्ली में 21 स्थानों पर स्थित 34 प्री-पेड टैक्सी बूथों के डिजिटल संचालन की अनुमति मिलेगी, जिससे यात्री सुरक्षा, पारदर्शिता, चालक आय और सेवा गुणवत्ता में वृद्धि होगी। दिल्ली यातायात पुलिस के सहयोग से भारत टैक्सी ने एक संयुक्त कमांड एवं कंट्रोल सेंटर भी स्थापित किया है, जिसमें रीयल-टाइम राइड मॉनिटरिंग, SOS अलर्ट और त्वरित आपातकालीन प्रतिक्रिया तंत्र शामिल हैं, जो सड़क सुरक्षा, नियामक अनुपालन और यात्रियों की सुरक्षा को बढ़ावा देंगे।

राष्ट्रीय ई-गवर्नेंस प्रभाग (NeGD), MeitY के साथ गए समझौता ज्ञापन के तहत डिजिटल इंडिया ढांचे के अंतर्गत भारत टैक्सी को परामर्श एवं तकनीकी सहायता प्रदान की जाएगी, जिससे DigiLocker, UMANG और API Setu के साथ एकीकरण संभव होगा। इससे सारथियों को पेपरलेस ऑनबोर्डिंग, सरकारी सेवाओं तक एकीकृत पहुंच, सुरक्षित इंटरऑपरेबल संचालन, कैशलेस भुगतान और बेहतर परिचालन दक्षता का लाभ मिलेगा।

दिल्ली मेट्रो रेल कॉरपोरेशन (DMRC) के साथ साझेदारी के तहत 10 प्रमुख मेट्रो स्टेशनों पर बाइक टैक्सी, ई-ऑटो/सीएनजी ऑटो और कैब के माध्यम से अंतिम-मील कनेक्टिविटी उपलब्ध कराई जाएगी, जिससे यात्री एक ही प्लेटफॉर्म पर पूरे सफर की योजना और भुगतान कर सकेंगे, साथ ही चालकों को अधिक ट्रिप्स और कम निष्क्रिय समय का लाभ मिलेगा।

भारतीय विमानपत्तन प्राधिकरण (AAI) के साथ किया गया MoU देशभर के AAI हवाई अड्डों पर भारत टैक्सी के संचालन को नियंत्रित करेगा, जिसमें पिक-अप ज़ोन, साइनज की अनुमति तथा कड़े सुरक्षा एवं सेवा मानक निर्धारित किए गए हैं, जिससे पूरे भारत में विनियमित हवाई अड्डा संचालन संभव होगा।

दिल्ली पर्यटन एवं परिवहन विकास निगम / दिल्ली एयरपोर्ट पार्किंग सर्विसेज (DAPS – GMR समर्थित) के साथ हुए समझौते के तहत IGI एयरपोर्ट टर्मिनलों पर कई पार्किंग स्थानों पर भारत टैक्सी की व्हाइट कैब सेवाओं को अनुमति दी गई है। DAPS पहले वर्ष के लिए प्रति ट्रिप ₹245 के पिक-अप शुल्क पर 20% की छूट प्रदान करेगा, जो भारत टैक्सी की काली-पीली सेवाओं का पूरक बनेगा तथा एयरपोर्ट राइड्स की संख्या और राजस्व में उल्लेखनीय वृद्धि करेगा।

IFFCO Tokio को भारत टैक्सी के बीमा भागीदार के रूप में जोड़ा गया है, जो नाममात्र दरों पर चालकों को ₹5 लाख का व्यक्तिगत दुर्घटना बीमा प्रदान करेगा, साथ ही दीर्घकालिक चालक कल्याण एवं बीमा समाधानों पर परामर्श सहयोग भी देगा।

पेटीएम (Paytm) के साथ MoU  के तहत डिजिटल भुगतान, को-ब्रांडेड ऑफरिंग्स तथा फिनटेक सक्षमता को सक्षम करेगा, जिसमें पेमेंट गेटवे एकीकरण और पेटीएम के पार्टनर इकोसिस्टम तक पहुंच शामिल है। पेटीएम पारिवारिक कवरेज सहित चालक समूह स्वास्थ्य बीमा में भी सहयोग कर रहा है।

GMR के साथ साझेदारी एयरपोर्ट मोबिलिटी संचालन को और सुदृढ़ करते हुए IGI एयरपोर्ट टर्मिनलों पर भारत टैक्सी की विनियमित पहुंच और सेवा विस्तार को मजबूती प्रदान करेगी।

SBI  के साथ हुए MoU पर हस्ताक्षर के तहत प्रधानमंत्री मुद्रा योजना जैसी योजनाओं के अंतर्गत वाणिज्यिक यात्री वाहनों के लिए प्राथमिकता वित्तपोषण उपलब्ध कराया जाएगा। सहकार टैक्सी पात्र चालक-मालिकों की पहचान और सहायता करेगा, जबकि SBI अपनी प्रचलित दिशानिर्देशों के अनुरूप शीघ्र विचार सुनिश्चित करेगा।

अमूर्त सांस्कृतिक विरासत का संरक्षण

केंद्र सरकार ने पूरे देश में लोक कला एवं संस्कृति के विभिन्न रूपों की रक्षा, संवर्धन और संरक्षण के लिए सात क्षेत्रीय सांस्कृतिक केंद्र (जेडसीसी) स्थापित किए हैं, जिनके मुख्यालय पटियाला, नागपुर, उदयपुर, प्रयागराज, कोलकाता, दीमापुर और तंजावुर में हैं। ये जेडसीसी अपने सदस्य राज्यों में नियमित रूप से विभिन्न सांस्कृतिक गतिविधियों और कार्यक्रमों का आयोजन करते हैं।

ये जेडसीसी लुप्तप्राय कला रूपों, लोककथाओं, मौखिक परंपराओं और प्रथाओं का ऑडियो, वीडियो और लिखित सामग्री के रूप में दस्तावेजीकरण भी करते हैं। दस्तावेजीकरण और डिजिटलीकरण की प्रक्रियाएँ निरंतर जारी हैं।

जेडसीसी द्वारा संचालित गुरु-शिष्य परंपरा योजना ऐसी ही एक पहल है, जिसमें पारंपरिक गुरु, युवा शिष्यों को प्रशिक्षित करते हैं ताकि सांस्कृतिक ज्ञान की निरंतरता सुनिश्चित हो सके, जिससे कलाकारों, शोधकर्ताओं और परंपराओं के सामुदायिक वाहकों को सहायता मिलती है।

जेडसीसी द्वारा कई लोक कला रूपों/मौखिक परंपराओं की पहचान की गई है, जैसे कि: लोरी और कायन गायन, दांडी, अंगीगर, प्रधानी, भदम और शैतान नृत्य, बुर्रा कथा, वीरनाट्यम, बुट्टा बोम्मलु, दप्पू, तप्पेटा गोलू, कोलनालु, गरागालु, विलासिनी नाट्यम, पुलिवेशालु, पगती वेशालु, डोल्लू और पूजा कुनिथा, वीरगासे, यक्षगान, कराडी माजलु, लम्बानी कुनिथा, नंदी ध्वजा कुनिथा, कराडी गोम्बे, उम्माथाटा, सुग्गी कुनिथा, सोमन कुनिथा, कनियारकली, कोलकली, कुम्माट्टी काली, थुंबी थुल्लल, मारगम काली, कथकली, ओप्पना, तिरुवथिराकली, थेय्यम, पदयानी, पूथन और थिरा, मुदियेतु, अर्जुन निरथियम, चकयार कुथु, ओट्टन थुल्लल, पुलिकाली, करगट्टम, ओयिलट्टम, परायट्टम (थप्पट्टम), पुलियाट्टम, पुरविअट्टम, कावड़ी अट्टम, देवराट्टम, जुमला मेलम, कनियान कूथु, कालियाट्टम, थुडुम्बट्टम, कोलकलियाट्टम, बोम्मालट्टम, थोलपावैकुथु, थेरुकुथु, चेक्काबजाना, बोनालु, पोथिराजू, चिरुथलबजाना, ओग्गु कथा, चिंदु यक्षगान, कालियाअट्टम, गराडी नृत्य, करगट्टम, निकोबारी नृत्य, रांची के ओरांव, मुंडा और खरिया सामुदायिक नृत्य, लावा नृत्य, कोलकाली, परिचाकली, डफुमुत्तु, ओप्पाना।

साम्राज्य और साहित्य दोनों के सर्जक:अयोध्या के महाराजा मानसिंह

महाराजा मानसिंह को अयोध्या का पावन भूमि भी दीर्घ समय तक अपने अंचल की छाया में ना रख सकी थी। उन्होंने अपने पिता और तातुल्य से बचपन से ही युद्ध- कौशल का साक्षात्कार किया और साम्राज्य को विभिन्न संरचनाओं द्वारा विस्तृत आयाम भी दिया लेकिन मन में वैराग्य आने पर सब कुछ तिलांचलकर वृंदावन में भक्ति रस की साधना में लीन हो शाश्वत साहित्य का सृजन भी किया।

अतीत का इतिहास :-

शाकद्वीपीय ब्राह्मण सदासुख पाठक के बेटे गोपाल राम पाठक ने अपने बेटे पुरन्दर राम पाठक का विवाह पलिया गाँव के गङ्गाराम मिश्र की बेटी के साथ किया था जो अयोध्या के पलिया में आकर बस गये थे। इनके पांच संताने हुई। जिनका नाम ओरी पाठक उर्फ बख्तावर सिंह, शिवदीन सिंह, दर्शन सिंह, इक्षा सिंह और देवी प्रसाद सिंह था। इनमें से तीन ओरी सिंह , दर्शन सिंह और इच्छा सिंह ने अपने पुरुषार्थ और हुक़्मरानों के हुकुम से अवध अंचल के विभिन्न क्षेत्रों के राजा बन अपने अपने राज्य का विस्तार किया था। शेष दो शिव दीन और देवी प्रसाद के बारे में कोई उल्लेख नहीं मिलता है। प्रतीत होता है कि ये किसी दैवी कारणों या अपने विस्तार वादी भाइयों की उपेक्षा का शिकार हो अपना अस्तित्व बचा ना सके होंगे और इतिहास के पन्ने से सदा सदा के लिए तिरोहित हो गए होंगे।ओरी पाठक उर्फ बख्तावर सिंह निसंतान थे।

उन्होंने अपने भतीजे अर्थात भाई दर्शन सिंह के पुत्र मान सिंह को गोद ले लिया था। ओरी पाठक उर्फ बख्तावर सिंह की भांति उनके भाई दर्शन सिंह ने मिलकर मेहदौना की जागीर को बहुत आगे बढ़ाया था। 2/5 पैतृक और दोनों द्वारा अर्जित संपत्ति के मालिक मान सिंह हो ही गए थे। पिता की पीढ़ी में एक मात्र इच्छा सिंह का पृथक अस्तित्व रहा। जो सुल्तानपूर, गोंडा और बहराइच के नाजिम रहे। सरकारी कोष का धन हडपने के जुर्म में उन्हें भी एक ही वर्ष निजामत नसीब रही। 1841 में वे हटा दिए गए थे। इस प्रकार मान सिंह उनके हिस्से के भी वारिस हो गए। उनके शेष दो पितृव्य शिवदीन और देवीप्रसाद के बारे में कोई उल्लेख न मिलने से उनका हिस्सा भी इन्हीं मानसिंह के पास आ गया होगा।

अनेक उपाधियो के धारक :-

महाराजा मानसिंह को ब्रिटिश सरकार द्वारा नाइटहुड (Knighthood) के तहत सम्मानित व्यक्तियों को दी जाने वाली ‘सर’ की एक सर्वोच्च उपाधि प्रदान की थी । यह सम्मान कला, साहित्य, खेल, विज्ञान या सार्वजनिक सेवा में असाधारण योगदान के लिए दिया जाता है। उन्हें एक और सम्मानजनक उपाधि बहादुर भी मिली थी जो तुर्की भाषा से आई है, जिसका अर्थ “वीर” या “साहसी” होता है। ब्रिटिश शासन के दौरान, यह उपाधि विशिष्ट जन कल्याणकारी कार्यों या निष्ठापूर्ण सेवा के लिए दी जाती थी।

के.सी.एस.आई.KnightCommander of the Order of the Star of India

नाइट कमांडर ऑफ द ऑर्डर ऑफ द स्टार ऑफ इंडिया (KCSI) 1861 में महारानी विक्टोरिया द्वारा स्थापित ‘द मोस्ट एक्सॉल्टेड ऑर्डर ऑफ द स्टार ऑफ इंडिया’ का दूसरा सबसे वरिष्ठ वर्ग था। यह ब्रिटिश राज के दौरान भारतीय रियासतों के शासकों, सरदारों और अधिकारियों को उनकी निष्ठा और सेवाओं के सम्मान में दिया जाने वाला प्रतिष्ठित नाइटहुड (Sir) खिताब था। इस गौरव को भी मानसिंह जी ने हासिल कर लिया था।

क़ायमजंग जिसका अर्थ स्थिर या दृढ़ युद्ध होता है। यदि इसे उर्दू/फारसी शब्दों (Qayam = स्थिर, Jang = युद्ध) के संयोजन के रूप में देखा जाए, तो इसका मतलब ‘लंबे समय तक चलने वाली’ या ‘दृढ़ता से लड़ी जाने वाली’ लड़ाई हो सकता है। यह एक ऐसी जंग या संघर्ष को दर्शाता है जो रुकी नहीं है और निरंतर जारी है। इस उपाधि को भी मानसिंह जी अर्जित कर चुके थे। इसके अलावा द्विजदेव (साहित्यिक ) उपाधि भी उन्होंने अंगीकार कर लिया था और उच्च कोटि की साहित्यिक रचना का सृजन किया था।

जीवन परिचय :-

‘तारीखें अयोध्या’ की अनुक्रमणिका से ज्ञात होता है कि उनका जन्म मार्ग शीर्ष शुक्ल 5, सं. 1877 तदनुसार 10 दिसंबर 1820 ई को बहराइच, उत्तर प्रदेश में हुआ था। उनका निधन कार्तिक कृष्णा द्वितीया, सं.1927वि.तदनुसार 10 अक्तूबर 1870 को हुआ था। कहीं कहीं उनको 1871 में मृत्यु दिखाया गया है।

राजा दर्शनसिंह के मरने पर सारे राज में गड़बड़ मच गया।जिन ताल्लुकेदारों का राज राजा बख़तावर सिंह ने ले लिया था, सब बिगड़ गये और अपनी-अपनी ज़मींदारी दबा बैठे हुए थे। इन्हें बड़ी सूझ बूझ से राजा मान सिंह ने सुलझाया था। उनके पिता अयोध्या के राजा दर्शनसिंह थे उनके तीन बेटे थे –

1.रामाधीन सिंह – बड़े होने के कारण राजा रामाधीन पाठक सिंह खजाने के मालिक थे और राजा भी थे। ये बड़े शिव भक्त थे। राज काज में रुचि कम थी। बाद में अपने बड़े बेटे विश्वनाथ सिंह के साथ शाहगंज का महल छोड़ बनारस का रुख कर लिया। वहां वह शिव भक्ति में खूब रम गए और प्रसन्न भी थे। शासकीय जीवन में 1253 फसली अर्थात 1843 ई में राजा रामाधीन सिंह के ऊपर रुपया 51,921- 1.II देनदारी थी । उसे भी मानसिंह ने खजाने में जमा करके रामाधीन सिंह का हिस्सा अपने नाम करा लिया था। इस प्रकार सम्पूर्ण सम्पत्ति या जागीर के मालिक मान सिंह बन गए थे। अपनी पीढ़ी के अपने बड़े भाई और अपना हिस्सा तो इन्होंने पहले ही पा लिया था।

2.रघुबर दयाल सिंह –

दर्शन सिंह के सबसे छोटे बेटे का नाम रघुबर दयाल था वह बहराइच के नाज़िम और राजा बहादुर (राय बहादुर से उच्च कोटि की उपाधि)की उपाधि पाए थे

 वह भी 1253 फ़सली अर्थात 1843ई . में गोंडा और बहराइच के नाज़िम हुये और उनको राजा रघुबर सिंह बहादुर की उपाधि मिली। राजा रघुबर दयाल सिंह को बस्ती जिले का धनगवां जागीर मिली हुई थी। बस्ती जिले के हर्रैया तहसील के परशुराम पुर ब्लाक में गोण्डा के सीमा पर धनुगवां के दो गांव है एक धनुगवां खुर्द और दूसरा धनुगवां कला जो बस्ती से 52 किमी. और परशुरामपुर से 8- 9 किमी. की दूरी पर बस्ती गोंडा के सीमा पर यह गांव पर बसा हुआ है।

3.हनुमान सिंह उर्फ राजा मान सिंह :-

इनको फौज की कमान मिली हुई थी। जमींदारी छोड़ अंग्रेजों की शरण में जाने की मंत्रणा इनके कुल खानदान में हो रही थी। इनके कुछ और प्रतिष्ठित अधिकारियों ने यह निश्चय किया कि ये अपना देश छोड़ कर अंग्रेजी राज में चले जायें। जो धन अपने पास है उससे दिन कट जायँगे। उस समय महाराजा मानसिंह जिनका पूरा नाम हनुमानसिंह था, केवल 18 वर्ष के थे। उनकी छोटी अवस्था के कारण उनकी कोई सुनता न था। महाराजा मानसिंह में उत्साह भरा हुआ था। उन्होंने यह सोचा कि बादशाही को छोड़ कर अंग्रेजी राज में जाकर रहना, खाना और पाँव फैला कर सोना बनियों का काम है। हमारे पूर्व-पुरुषों  ने बड़ी वीरता दिखाई जिससे उनको इतनी प्रतिष्ठा मिली। हमको भी चाहिये कि ऐसे राज को न छोड़ें जो लाखों रुपये के व्यय से प्राप्त हुआ है। लोग यही कहेंगे कि राजा दर्शनसिंह के मरने पर उनकी सन्तान में कोई ऐसा न निकला जो राज को सँभालता और अपने घर को देखभाल करता। हम लोग ऐसे उत्साहहीन हुये कि बिना लड़े भिड़े अपने बाप दादों की कमाई खो बैठे।”

राजकवि लक्षिराम लछिराम के भाव-

दरसनसिंह नरेस भी, राजन को सिर मौर।

बादसाह मनसब दियौ,देसअवध सब ठौर।

श्री सलतनत बहादुरी, कीने भुजबल बैस।

अरि-गन-गजपै सिंह सौं दरसनसिंह नरेस।

तिनको लघुभूपालमनि,मानसिंह महाराज।

जिनकीनेलछिरामकौं,निजद्वारे कविराज।।

इनको अपनी वीरता तथा कौशल के कारण राजाबहादुर की उपाधि मिली थी। राज्य में अशांति होने पर इन्होंने अनेक बार राज्य-व्यवस्था कायम की थी। तीन डाकुओं को बंदी बनाने पर इन्हें 11 तोपों की सलामी, ईरान के बादशाह की तलवार, झालरदार शामला, ताज के आकार की टोपी तथा पालकी उपहार में दी गयी थी। इन्होंने ‘अवध की संधि’ में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी, जिससे सन् 1869 में इन्हें ‘नाइट कमांडर आफ दी स्टार आफ इंडिया’ की उपाधि से विभूषित किया गया। किंवदंती है कि द्विजदेव ने भिनगा नरेश पर आक्रमण किया। राजा ने द्विजदेव को एक कवित्त लिखकर भेजा –

बिनु मकरंद बृंद कुसुम समूहन के,

कौलों दिन बीतिहैं मलिदं के कलीन तें।

बिनु चारु चेटक चिलक चोखी चंद्रिकाकी,

कौलों हौंस राखिहैं चकोर चिनगीन तें।।

जुबराज कौलों बिनु ब्रजराज प्रानप्यारे,

 कौन जिय राखिहै या मदन मलीन तें।

मुकुट कलिज मानसर बिनु आली अब,

कौलों काल कटिहैं मराल पोखरीन तें।।’’

इसका उत्तर द्विजदेव ने इस प्रकार दिया था –

आजु तैं कोटि हार बरीस लौं,

रीति यहै नित ही चलि आई।

लाहु लह्यो तिनहीं जग में जिन्ह,

कीन्हीं कछू न कछू सिवकाई।

ऐ नृपहंस! विचार विचारु,

रहौ किन आपने काज लजाई।

आपही दूरी बसे तो कहा

कहौ मानसरोवर की कृपनाई।।

इस प्रकार युद्ध समाप्त हो गया। द्विजदेव के हृदय की सरसता उनकी समरतत्परता के साथ ही प्रस्तुत थी जो कठोरत एवं मृदुता का अपूर्व समन्वय उपस्थित करती है। सं. 1913 में बादशाह की मृत्यु हो जाने के पश्चात् इन्हें अंग्रेजों की शत्रुता का भरपूर सामना करना पड़ा, किंतु कुछ ही समय पश्चात् सं. 1916 वि. में लखनऊ दरबार में अंग्रेजी शासन की ओर से इन्हें ‘महाराजा’ की तथा सं. 1926 वि. में ‘के.सी.एस.आई.’ की उपाधियाँ मिलीं।

मानसिंह महाराज को, छायो प्रबल प्रताप।

सुहृद सुमन सीतल करन,अरि घन-वन-तन ताप।।

जाकौ जस लखि भुअन में, चंद चंद अनुरूप।

कबिगन कौ सुरतरु सुभग, सागर सील स्सरूप।।

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मानसिंह महाराज को, सुभा सितारा हिंद

कायमगंज बहादुरी, के.सी.एस. कल इंद।

विरोधियों को मात दी :-

ऐसा विचार कर के उन्होंने अपने भाईयों से कहा कि आपलोगअंग्रेजी राज में जायँ,  मैं यहीं रहूँगा। उनके पास उस समय न कोष था और न सेना थी। इसी से बिना पूछे थोड़े से वीरों के साथ निकल पड़े और कुछ विरोधियों से भिड़ गये। इसमें उनकी जीत हुई। इससे उनके सारे राज में उनकी धाक बंध गई। उस समय किसी कारण से राजा बखतावरसिंह बादशाही में नजरबन्द थे। महाजन से 3 लाख रुपये लेकर उन्हें भी छुड़ाया और राजा बख्तावरसिंह फिर दरबार में पहुँच गये। महाराजा मानसिंह के सुप्रबन्ध का समाचार बादशाह के कानों तक पहुँचा।

प्रजा की रक्षा की प्राथमिकता:-

महाराजा मानसिंह का उदय अयोध्या का महल उस समय शांति और गर्व दोनों का प्रतीक था, लेकिन राजा दर्शन सिंह के निधन के बाद राज्य में हलचल की लहर दौड़ गई। लोगों के मन में भय और अनिश्चितता ने जगह बना ली थी। वहीं, युवा मानसिंह, जिसे लोग प्यार से हनुमान सिंह कहते थे, अपने पिता की मृत्यु की खबर सुनकर गंभीर हो गया। “मैं अब अकेला हूँ… पर प्रजा को मेरी रक्षा चाहिए,” मानसिंह ने खुद से कहा, उसकी आँखों में वीरता और दृढ़ संकल्प की झलक थी।

युद्ध और प्रशासन :-

अयोध्या के चारों ओर के क्षेत्र में शांति और व्यवस्था बनाए रखना महाराजा मानसिंह के लिए चुनौतीपूर्ण कार्य था। विद्रोही और डाकू लगातार राज्य की सीमाओं को असुरक्षित बनाने की कोशिश कर रहे थे। लेकिन महाराजा के साहस और दूरदर्शिता ने उन्हें कभी पीछे नहीं हटने दिया। वे सब बाधाओं को पार करते हुए आगे बढ़ते रहे।

 

सूरजपुर गढ़ी में कैदियों को मुक्त कराया :-

एक दिन सूचना मिली कि सूरजपूर की गढ़ी में बंदियों को कैद कर लिया गया है। महाराजा ने तुरंत अपने सेनापतियों को बुलाया। “तीन हजार सिपाही गढ़ी में हैं,” सेनापति ने डरते हुए कहा, “यदि हम सीधे हमला करेंगे तो भारी नुकसान हो सकता है।”

मानसिंह ने शांत स्वर में उत्तर दिया, “हमारा उद्देश्य केवल जीत नहीं, बल्कि न्याय और प्रजा की रक्षा है। जो रास्ता सबसे कठिन है, वही हमें अपनाना होगा।” रात के अंधेरे में महाराजा ने गुप्त मार्गों से सेना भेजी। स्वयं महाराजा एक छोटी इकाई के साथ गढ़ी में घुसा। तलवारों की चमक, युद्ध की चिल्लाहट और सिपाहियों की दौड़- हर क्षण रोमांच से भरा हुआ था।

राज्य के विद्रोहियों ने इस अवसर का फायदा उठाना शुरू कर दिया। तीन हजार सिपाही अचानक सूरजपूर की गढ़ी में बंदियों को कैद कर रहे थे। कोई भी सामान्य सेनापति इतनी संख्या के सामने डर जाता, लेकिन मानसिंह ने अपनी तलवार उठाई और रणनीति बनाई। उसने रात के अंधेरे का फायदा उठाया। गुप्त मार्गों से सेना को भेजा और स्वयं गढ़ी में घुसा। भीषण युद्ध हुआ। तलवारें चमकीं, घोड़े दौड़े, और चिल्लाहटें गूंज उठीं। तीन हजार सिपाही भयभीत हो गए और बंदियों को मुक्त करने के बाद भाग खड़े हुए।अंततः तीन हजार सिपाही भयभीत होकर भाग खड़े हुए, और बंदियों को मुक्त कराया गया।

 जैसे ही वह बाहर आया, सैनिकों ने नतमस्तक होकर कहा, “महाराज, आपकी वीरता ने हमें जीने की राह दिखाई।” मानसिंह ने गंभीरता से उत्तर दिया, “वीरता केवल युद्ध में नहीं, बल्कि न्याय और प्रजा की रक्षा में है। हम अयोध्या को सुरक्षित रखेंगे, चाहे किसी भी कीमत पर।”

इस घटना के बाद महाराजा मानसिंह की ख्याति दूर -दूर तक फैल गई। राज्य के लोग उसे केवल राजा नहीं, बल्किअयोध्या का संरक्षक और धर्म का प्रहरी माननेलगे।

सूरजपुर के किले पर विजय:-

राजा मान सिंह ने  सूरजपुर के किले पर विजय प्राप्त की और  दिल्ली के राजा ने उन्हें “राजा-बहादुर” की उपाधि से सम्मानित किया। बाद में “कायम – जंग” की उपाधि उन्हें प्रदान की गई। जब राजा बख्तावर सिंह की मृत्यु हुई, तो मान सिंह  अयोध्या सहित पूरे क्षेत्र के शासक बन गए। उन्हें लखनऊ दरबार में 1859 में रु। 7000 की राशि के साथ “महाराजा ” की उपाधि दी गई थी। वे इस क्षेत्र के सबसे महत्वपूर्ण तालुकदारों में से एक थे और उन्हें ब्रिटिश साम्राज्य द्वारा नाइट कमांडर्स स्टार ऑफ़ इंडिया (KCSI) का खिताब भी दिया गया था।

सीहीपूर के विद्रोहियों का दमन :-

कुछ महीनों बाद सीहीपूर में डाकूओं का आतंक बढ़ गया। महाराजा ने बिना किसी विलंब के अभियान शुरू किया। उन्होंने छिपकर गढ़ी के आसपास की पहाड़ियों पर कब्ज़ा किया, और रणनीति के अनुसार हमला किया। डाकुओं ने कभी मुकाबला नहीं किया- उनकी हिम्मत महाराजा की दूरदर्शिता और वीरता के सामने ठहर नहीं सकी।उनकी रणनीति, साहस और दूरदर्शिता ने राज्य की स्थिरता और प्रजा की सुरक्षा सुनिश्चित की।महाराजा मानसिंह ने न केवल युद्ध कौशल में महारत हासिल की, बल्कि प्रशासन में भी अपनी बुद्धिमत्ता दिखाई। उन्होंने जनता की समस्याओं को ध्यान से सुना, कर प्रणाली में सुधार किया और किसानों के लिए नई योजनाएँ बनाईं।

एक रात, अपने निजी कक्ष में बैठकर उन्होंने चुपचाप कहा, “मेरे पिता ने मुझे वीरता और धर्म की नींव दी। अब यह जिम्मेदारी मेरी है कि मैं इसे आगे बढ़ाऊँ। अयोध्या केवल हमारी धरती नहीं, बल्कि हमारे वंश की पहचान है।” उस समय महाराजा के मन में एक अटूट विश्वास और निश्चय था-वीरता, न्याय और धर्म का पालन ही शाकद्वीपी वंश की असली शक्ति है।

शाहगंज के विद्रोहियों का दमन

सीहीपुर की भांति शाहगंज की गढ़ी पर विद्रोहियों को परास्त करना भी महाराजा के साहस और चतुराई का प्रतीक बना। उन्होंने न केवल तलवार और सेना का उपयोग किया, बल्कि कूटनीति और प्रशासनिक उपायों का भी सहारा लिया।

प्रशासन में सुधार

युद्ध की समाप्ति के बाद महाराजा ने प्रशासन में सुधार किए। उन्होंने कर प्रणाली में पारदर्शिता लाई, किसानों और व्यापारियों के हितों की सुरक्षा सुनिश्चित की, और न्यायप्रियता के नए मानक स्थापित किए। एक शाम महाराजा अपने निजी कक्ष में बैठकर चुपचाप बोले, “युद्ध केवल शक्ति का खेल नहीं है। यदि हम न्याय, धर्म और प्रजा की रक्षा के उद्देश्य से लड़ें, तो हर कठिनाई संभव है। यही वीरता और शासन का असली अर्थ है।” महाराजा मानसिंह की यह दृष्टि अयोध्या को न केवल सामरिक दृष्टि से सुरक्षित रखती थी, बल्कि राज्य में स्थिरता और प्रजा में विश्वास भी बनाए रखती थी।

वंश और उत्तराधिकार :-

अयोध्या का सिंहासन केवल शक्ति का प्रतीक नहीं था; यह वंश और धर्म की विरासत भी था। राजा दर्शन सिंह और महाराजा मानसिंह ने अपने जीवनकाल में अपने उत्तराधिकारियों को तैयार किया ताकि उनका राज्य सुरक्षित और प्रजा खुशहाल रहे। कार्तिक कृष्णा द्वितीया, सं.1927 वि. को महाराजा मानसिंह का देहावसान हो गया। मान सिंह ने दो शादियां की थीं दोनों से  मानसिंह को कोई औलाद नहीं हुई। वे निसंतान थे। इनकी एक कन्या थी, जिसका विवाह मरवया नगर में बाल मुकुंद के पौत्र नृसिंह नारायण के साथ हुआ था, जिनसे महाराजा प्रतापनारायण सिंह ‘ददुआ साहब’ का जन्म हुआ। इन्हीं ददुआ साहब को महाराज मानसिंह ने गोद ले लिया। यही मानसिंह की मृत्यु के पश्चात्, अयोध्या के राजा हुए।

जागीर त्याग कर भक्ति में लीन :-

1857 के गदर में अंग्रेजों का साथ देने के कारण उन्हें जागीर मिली थी, लेकिन बाद में वे सब कुछ त्याग कर वृंदावन चले गए। उनकी कविता में राधा-माधव प्रेम का चित्रण, प्रांजल भाषा और कवित्त/सवैया छंदों का प्रयोग प्रमुख था।

‘द्विजदेव’ साहित्यिक उपाधि :-

रीतिकालीन स्वच्छंद काव्य परंपरा के अंतिम कवि अयोध्या के महाराजा मानसिंह का साहित्यिक नाम ‘द्विजदेव’ है, जो रीतिकालीन स्वच्छंद मुक्तक काव्य परंपरा के अंतिम प्रसिद्ध कवि माने जाते हैं। वे रीतिकाल के श्रृंगार रस के कवि थे ।

वे बड़ी ही सरस कविता करते थे। ऋतुओं के वर्णन इनके बहुत ही मनोहर हैं। इनके भतीजे महाराज थे और बड़ी ही सरस कविता करते थे। ऋतुओं के वर्णन इनके बहुत ही मनोहर हैं। इनकी कविता में सरसता, सरल भाववेग, सुकुमार कल्पना, सूक्ष्म अनुभूति तथा अप्रतिम सौंदर्य बोध है।

हिन्दी साहित्य के इतिहास में आचार्य रामचन्द्र शुक्ल समेत अनेक विद्वानों ने इन्हें रीतिकाल के शृंगारी कवियों की परम्परा में रीतिमुक्त कविता का अन्तिम प्रसिद्ध कवि माना है। भाषा की प्रांजलता, बखान की सजीवता और भाव-व्यंजना की सूक्ष्मता के साथ द्विजदेव की कविता छप्पय, दोहा, सवैया, घनाक्षरी आदि विभिन्न छन्दों के माध्यम से प्रेम के अनन्य सनातनी प्रतीक राधा-माधव को अपनी कविता का विषय बनाती है। ऐसे भावमयी अलौकिक वर्णन के साथ द्विजदेव भक्ति में संयोग और विरह का अछोर निर्मित करते हैं। इस अध्ययनपरक ग्रन्थ को, ऐसे महाकवि के सन्दर्भ में रचा गया है, जिन्हें समकालीन अर्थों में देखने, समझने की नयी दृष्टि मिलती है। द्विजदेव की शृंगारिक कविता को काव्य-रसिकों के बीच पुनर्जीवित करने के उद्देश्य से प्रणीत यह मनोहारी शोध रीतिकाल को समग्रता में देखने की कोशिश है। इस अध्ययन की गम्भीर अर्थ भंगिमा पूर्वज कवियों के प्रति लेखिका का साहित्यिक अर्थों में कृतज्ञता ज्ञापन है।

 

1.’श्रृंगारबत्तीसी’

2.श्रृंगारलतिका’

3. ‘शृंगार चालीसी’

4. ‘अवमुक्त पंचदशी’

5. ‘मान मयंक’

श्रृंगारलतिका :-

‘श्रृंगारलतिका’ का एक बहुत ही विशाल और सटीक संस्करण महारानी अयोध्या की ओर से हाल में प्रकाशित हुआ है। इसके टीकाकार भूतपूर्व अयोध्या नरेश महाराज प्रतापनारायण सिंह जी हैं ।

श्रृंगारबत्तीसी :-

‘श्रृंगारबत्तीसी’ भी एक बार छपी थी। द्विजदेव के कवित्त काव्य प्रेमियों में वैसे ही प्रसिद्ध हैं जैसे पद्माकर के। ब्रजभाषा के श्रृंगारी कवियों की परंपरा में इन्हें अंतिम प्रसिद्ध कवि समझना चाहिए। जिस प्रकार लक्षण ग्रंथ लिखनेवाले कवियों में पद्माकर अंतिम प्रसिद्ध कवि हैं उसी प्रकार समूची श्रृंगार परंपरा में ये। इनकी सी सरस और भावमयी फुटकल श्रृंगारी कविता फिर दुर्लभ हो गई।

‘मान मयंक’ :-

मान मयंक के अन्तर्गत संकलित छंदों में अधिक संख्या प्रेम रस अथवा शृंगार रस से संबंधित पदों की ही है। यद्यपि शास्त्रीय दृष्टि से तो इनके शृंगार निरूपण का महत्व अधिक नहीं है क्योंकि द्विजदेव रीतिमुक्त काव्य परंपरा के कवि हैं। उन्होंने शृंगार रस का लक्षणबद्ध विवेचन अपने काव्य में नहीं किया है तथापि उनके वर्णन-पक्ष पर दृष्टि डालकर निःसंकोच यह कहा जा सकता है कि कवि ने भावात्मक परितोष के लिए शृंगार रस का जी खोलकर वर्णन किया है। कवि ने नायिका भेद की चर्चा करते हुए शृंगार के दोनों पक्षों संयोग और वियोग का सुंदर ढंग से निर्वाह किया है।

शृंगार चालीसी’:-

शृंगार चालीसी’ में राधा-कृष्ण की प्रेम लीलाओं के स्थान पर लौकिक नायक-नायिका के विरह और मिलन का भी सरस वर्णन मिलता है।

लतिका सौरभ:-

दोहा:

तिन कौ सुत अति अल्प-मति, ‘मानसिंह’ ‘द्विजदेव’।

किय ‘सिँगार-लतिका ‘ललित, हरि-लीला पर भेव॥

भावार्थ: जिनके पुत्र महाराज‘मानसिंह’ ने जिनका कविता का नाम ‘द्विजदेव’ है ‘शृंगार लतिका’ नामक ग्रंथ श्रीराधा कृष्ण की लीला के विषय में लिखा।

भाषा :-

इनमें बड़ा भारी गुण है भाषा कीस्वच्छता। अनुप्रास आदि चमत्कारों के लिए इन्होंने भाषा भद्दी कहीं नहीं होने दी है। ऋतु वर्णनों में इनके हृदय का उल्लास उमड़ पड़ता है। बहुत से कवियों के ऋतुवर्णन हृदय की सच्ची उमंग का पता नहीं देते, रस्म सी अदा करते जान पड़ते हैं। पर इनके चकोरों की चहक के भीतर इनके मन की चहक भी साफ़ झलकती है। एक ऋतु के उपरांत दूसरी ऋतु के आगमन पर इनका हृदय अगवानी के लिए मानो आप से आप आगे बढ़ता था-

 

मिलि माधावी आदिक फूल के ब्याज विनोद-लवा बरसायो करैं।

रचि नाच लतागन तानि बितान सबै विधि चित्त चुरायो करैं।

द्विजदेव जू देखि अनोखी प्रभा अलिचारन कीरति गायो करैं।

चिरजीवो बसंत! सदा द्विजदेव प्रसूननि की झरि लायो करैं।।

 

आजु सुभायन ही गई बाग, बिलोकि प्रसून की पाँति रही पगि।

ताहि समय तहँ आये गोपाल, तिन्हें लखि औरौ गयो हियरो ठगि।

पै द्विजदेव न जानि परयो धौं कहा तेहि काल परे अंसुवा जगि।

तू जो कही सखि! लोनो सरूप सो मो अंखियान कों लोनी गईलगि।।

 

सुर ही के भार सूधो सबद सुकीरन के

मंदिरन त्यागि करैं अनत कहूँ न गौन।

द्विजदेव त्यौं ही मधुभारन अपारन सों

नेकु झुकि झूमि रहै मोगरे मरुअ दौन

खोलि इन नैनन निहारौं तौ निहारौं कहा?

सुषमा अभूत छाय रही प्रति भौन भौन।

चाँदनी के भारन दिखात उनयो सो चंद,

गंधा ही के भारन बहत मंद मंद पौन।।

 

बोलि हारे कोकिल, बुलाय हारे केकीगन,

सिखै हारी सखी सब जुगुति नई नई।

द्विजदेव की सौं लाज बैरिन कुसंग इन

अंगन हू आपने अनीति इतनी ठई।

हाय इन कुंजन तें पलटि पधारे स्याम,

देखन न पाई वह मूरति सुधामई।

आवन समै में दुखदाइनि भई री लाज,

चलत समैं मे चल पलन दगा दई।

बाँके संकहीने राते कंज छबि छीने माते,

झुकिझुकि, झूमिझूमि काहू को कछू गनैन

 

द्विजदेव की सौं ऐसी बनक बनाय बहु,

भाँतिन बगारे चित चाहन चहूँधा चैन

पेखि परे प्रात जौ पै गातिन उछाह भरे,

बार बार तातें तुम्हैं बूझती कछूक बैन।

एहो ब्रजराज! मेरो प्रेमधान लूटिबे को,

बीराखाय आये कितै आपके अनोखे नैन।।

 

भूले भूले भौंर बन भाँवरें भरैंगे चहूँ,

फूलि फूलि किंसुक जके से रहि जायहैं।

द्विजदेव की सौं वह कूजन बिसारि कूर,

कोकिल कलंकी ठौर ठौर पछिताय हैं

आवत बसंत के न ऐहैं जो पै स्याम तौ पै,

बावरी! बलाय सों हमारेऊ उपाय हैं।

पीहैं पहिलेई तें हलाहल मँगाय या,

कलानिधिकी एकौ कला चलन न पायहैं।।

 

घहरि घहरि घन सघन चहूँधा घेरि,

छहरि छहरि विष बूँद बरसावै ना।

द्विजदेव की सौं अब चूक मत दाँव,

एरे पातकी पपीहा तू पिया की धुनि गावैना

फेरि ऐसो औसर न ऐहै तेरे हाथ,

एरे मटकि मटकि मोर सोर तू मचावै ना।

हौं तौ बिन प्रान, प्रान चाहत तजोई अब,

कत नभ चंद तू अकास चढ़ि धावै ना।।

 

लेखक परिचय:-

(लेखक भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण, में सहायक पुस्तकालय एवं सूचनाधिकारी पद से सेवामुक्त हुए हैं। वर्तमान समय में उत्तर प्रदेश के बस्ती नगर में निवास करते हुए सम सामयिक विषयों,साहित्य, इतिहास, पुरातत्व, संस्कृति और अध्यात्म पर अपना विचार व्यक्त करते रहते हैं। वॉट्सप नं.+919412300183)

हिंदू व्यापारी मुगलों और अंग्रेजों के शोषण व अत्याचार के शिकार हुए और आज भी निशाने पर हैं

क्या हिंदू व्यापारी और साहूकार समुदायों (जैसे जैन/बनिया बैंकर्स, खत्री व्यापारी आदि) लोगों को मुस्लिम शासकों (नवाब, मुग़ल आदि) या औपनिवेशिक शक्तियों (मुख्यतः ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी) के हाथों उत्पीड़न, हत्या, विश्वासघात, आर्थिक तबाही या संबंधित संपत्तियों को गँवा देने का सामना नहीं करना पड़ा?

मध्यकाल में क्या गैर-मुस्लिम व्यापारियों (हिंदू/जैन बैंकर्स और व्यापारी) पर जजिया कर बार बार नहीं लगाया गया, आर्थिक दबाव नहीं बढ़ाया गया और वैश्य समुदाय से जुड़े मंदिरों को अपवित्र नहींकिया गया? क्या इससे उनकी समृद्धि प्रभावित नहीं हुई और कुछ ने प्रवास किया? 14वीं शताब्दी में फिरोज शाह ने हिंदू व्यापारियों का जो गंभीर आर्थिक शोषण और धार्मिक उत्पीड़न किया, जबरन धर्मांतरण और मंदिर विध्वंस किए, जिससे व्यापारियों पर जजिया जैसे बोझ बढ़े और असुरक्षा फैली थी, वह सब किसी को याद है?
मुग़ल काल में प्रसिद्ध जैन जौहरी और व्यापारी शांतिदास झवेरी की किसी को याद है? 1645 में क्या औरंगजेब (तब प्रिंस/गवर्नर) के आदेश पर अहमदाबाद में उनके चिंतामणि पार्श्वनाथ मंदिर में मिहराब (इस्लामी प्रार्थना स्थल) बनवाकर अपवित्र नहीं किया गया था ? औरंगजेब के शासन (1658–1707) में हिंदू व्यापारियों (बनिया आदि) पर मुस्लिमों की तुलना में दोगुना सीमा शुल्क (5% बनाम 2.5%) और काबुल जैसे स्थानों पर बिक्री/खरीद पर अधिक कर लगाए गए। जजिया कर की पुनर्स्थापना से आर्थिक तनाव बढ़ा और कई व्यापारी प्रभावित हुए।

परवर्ती मुग़ल शासन और ब्रिटिश प्रभुत्व (18वीं शताब्दी) के दौरान व्यापारियों को व्यापारिक विशेषाधिकारों में कमी कर उन पर भारी करारोपण और बंदरगाहों पर उनकी स्वायत्तता खत्म करने के पाठ कभी पढ़ाये गये, जिससे उन हिन्दू व्यापारियों का आर्थिक हाशियाकरण हुआ था? 18वीं शताब्दी की शुरुआत में नवाब मुर्शिद कुली खान ने अधिकार का विरोध करने वाले हिंदू जमींदारों और व्यापारियों को कैसे कुचला था? छोटे व्यापारियों पर भारी कर और दमन से आई तबाही की याद करें।

ये भी याद करें कि 18वीं शताब्दी की शुरुआत में सूरत के बनिया व्यापारियों को काज़ियों और अधिकारियों से असीमित रिश्वत देनी पड़ती थी ताकि उनके मंदिरों को अपवित्र होने या जब्त होने से बचाया जा सके। धार्मिक कट्टरता से क्रूर उत्पीड़न हुआ, जिससे कई परिवार प्रांत छोड़कर भाग गए थे। 1831 में तालपुर मीरों (सिंध के मुस्लिम शासकों) के शासन में एक मुस्लिम भीड़ ने सेठ होतचंद को पकड़ लिया और जबरन इस्लाम कबूल करने की कोशिश की। उन्होंने विरोध किया, लेकिन यह घटना हिंदू व्यापारियों की धार्मिक उत्पीड़न की कमजोरी को दर्शाती है। सेठ नाओमल को तालपुरों के तहत निरंतर धमकियाँ और हाशिए पर धकेला गया।

यदि गजनवी गोरी आदि का मुख्य धंधा सोना चाँदी लूटना था तो क्या वे सिर्फ मंदिरों का ही धन लूट रहे थे?

बंगाल के प्रसिद्ध जैन साहूकार जगत सेठ परिवार के महताब चंद की याद है जिसे 1763 में मुस्लिम नवाब मीर कासिम ने मुंगेर किले से फेंककर या डुबोकर मार डाला? नवाब को परिवार के बंगाल के टकसाल व खजाने पर प्रभाव से नफरत थी। स्वरूप चंद की याद है जिसे 1763 में नवाब मीर कासिम ने मार डाला था? जगत सेठ जैसे प्रमुख व्यापारियों को सीधे धमकियाँ और अपमान झेलना पड़ा। सिराज-उद-दौला ने 3 करोड़ रुपये का Tribute मांगा और इनकार पर महताब चंद की पिटाई की गई थी।

क्या गोवा इंक्विजिशन (1560 से आगे) के दौरान हिंदू व्यापारियों को जबरन धर्मांतरण, संपत्ति जब्ती और निर्वासन का सामना हकरना पड़ा था जिससे स्थापित व्यापारिक नेटवर्क बाधित हुए?

क्या किसी को कलकत्ता में रहने वाले धनी पंजाबी खत्री व्यापारी ओमिचंद (अमीर चंद) की याद है जिसे रॉबर्ट क्लाइव ने नकली संधि से धोखा दिया था और लाखों रुपये का वादा किया था लेकिन धोखा पता चलने पर वे मानसिक रूप से टूट गए और 1767 में ब्रिटिश कंपनी शासन के तहत मर गए?

यदि अंग्रेज भारत के पैसे का इतना ड्रेन कर रहे थे कि दादा भाई नौरोज़ी को उस युग में उस पर एक पूरी पुस्तक लिखनी पड़ी तो वह किस वर्ण का सबसे बड़ा pauperisation था? 1765 के बाद (दिवानी अधिकार मिलने पर) ब्रिटिश नीतियों ने व्यापार पर एकाधिकार किया, कपड़ा उद्योग को नष्ट किया और ब्रिटिश माल से बाजार भर दिया, जिससे पारंपरिक हिंदू व्यापारिक नेटवर्क ढह गए।

क्या वैश्य समुदाय का देशप्रेम कुछ कम था? भामाशाह कौन थे? गुरु गोबिंद सिंह जी के छोटे साहिबजादों (ज़ोरावर सिंह और फतेह सिंह) और माता गुजरी जी की शहादत के बाद, मुग़ल अधिकारियों ने उनके अंतिम संस्कार के लिए सरहिंद की ज़मीन पर सोने के सिक्के खड़े करके (लगभग 7,800 अशर्फ़ी) बिछाने की शर्त रखी। तब हिन्दू वैश्य तोदार मल ने अपनी पूरी संपत्ति बेचकर यह किया और शवों को संस्कार के लिए भूमि को प्राप्त किया था। गुरु तेग बहादुर जी को 500 सोने की मोहरें चढ़ा देने वाले मक्खन शाह लुबाना की याद करें। 12वीं शताब्दी में दिल्ली के आसपास के जैन व्यापारियों ने पृथ्वीराज चौहान जैसे राजपूत राजाओं को आर्थिक सहायता दी थी और युद्धों में योगदान किया था।
तब कैसा लगता है जब अत्याचारों को झेलने की इकतरफ़ा कल्प-कथाएँ सुनाई जाती हैं?

(लेखक सेवानिवृत्त आईएएस अधिकारी हैं और मध्य प्रदेश के चुनाव आयुक्त हैं)

साभार-https://www.facebook.com/share/1RYa6gn9jv/  से

आत्महत्या और अवसाद को जन्म दे रही है ऑनलाईन गेमिंग की लत

ऑनलाइन गेमिंग की लत एवं आभासी दुनिया कितनी भयावह एवं घातक हो सकती है, इसकी एक ही दिन में दो अलग-अलग जगह घटी घटनाओं ने न केवल झकझोरा है, बल्कि यह हमारे समय, हमारी सामाजिक संरचना और हमारी सामूहिक असावधानी पर लगा हुआ एक गहरा प्रश्नचिह्न बना है। धीरे-धीरे किशोरवय को अपने चपेट में लेने वाली यह प्रवृत्ति कितनी हृदयविदारक हो सकती है, उसका उदाहरण बुधवार को घटी ये दो भयावह घटनाएं हैं। एक हृदयविदारक घटना में गाजियाबाद की तीन अल्पवयस्क बहनों ने नौवीं मंजिल से कूदकर आत्महत्या कर ली।

इस दुर्भाग्यपूर्ण घटना में 12, 14 और 16 साल की तीन सुकोमल बहनें असमय काल-कवलित हो गईं। ऑनलाइन कोरियन गेम की दीवानी बहनें कोरिया में जाकर बसने और वहीं नया जीवन शुरू करने का सपना देखती थीं। घर वालों ने जब उनकी ऑनलाइन सनक से परेशान होकर उनसे मोबाइल छीन लिए, तो वे तनाव व अवसाद में घिर गई। फिर तीनों बहनों ने नौवीं मंजिल से कूदकर आत्महत्या कर ली। ऐसी ही घटना हिमाचल प्रदेश के कुल्लू में भी घटी जहां एक पंद्रह वर्षीय किशोर ने ऑनलाइन गेम के अपने एक विदेशी साथी के बिछुड़ने के गम में घर में आत्महत्या कर ली। किशोर दसवीं का छात्र था। इन घटनाओें ने समाज को स्तब्ध ही नहीं किया, बल्कि भीतर तक गहरा घाव दिया है। यह कोई आकस्मिक या अलग-थलग घटना नहीं है। इससे पहले झाबुआ, भोपाल और देश के अन्य हिस्सों में सामने आई ऐसी घटनाएं यह संकेत देती हैं कि आभासी दुनिया किस तरह वास्तविक जीवन पर हावी होती जा रही है और हम अनजाने में एक ऐसे समाज का निर्माण कर रहे हैं जहां संवेदनाएं, संवाद और जीवन-मूल्य स्क्रीन के पीछे दम तोड़ते जा रहे हैं।

ऑनलाइन गेमिंग अपने आप में अपराध नहीं है, न ही तकनीक शत्रु है, लेकिन जब यह बच्चों और किशोरों के लिए लत बन जाए, तो यह एक धीमा जहर बन जाती है। यह जहर चुपचाप बच्चों के मस्तिष्क में प्रवेश करता है, उनकी सोच, उनकी भावनात्मक संरचना और उनके निर्णय लेने की क्षमता को विकृत करता है। गेमिंग की दुनिया बच्चों को तात्कालिक रोमांच, आभासी जीत और काल्पनिक पहचान देती है, लेकिन धीरे-धीरे वही दुनिया उन्हें वास्तविक जीवन से काट देती है। परिवार, मित्र, पढ़ाई, प्रकृति, खेल और संवाद-सब कुछ पीछे छूटने लगता है। गाजियाबाद की तीनों बहनों का यह कदम इसी कटाव का चरम और भयावह परिणाम है। विशेषज्ञ मानते हैं कि अत्यधिक ऑनलाइन गेमिंग बच्चों के मस्तिष्क में आवेग नियंत्रण को कमजोर करती है। जोखिम का आकलन करने की क्षमता घटती है और भावनात्मक अस्थिरता बढ़ती है। हार, असफलता या गेम से वंचित किए जाने की स्थिति में अवसाद, क्रोध और निराशा गहराने लगती है। कई बार बच्चे आत्महत्या जैसे चरम कदम को भी एक ‘गेम ओवर’ की तरह देखने लगते हैं। यह सोच अपने आप में अत्यंत खतरनाक है। आत्महत्या की प्रवृत्ति का बढ़ना केवल मानसिक स्वास्थ्य का प्रश्न नहीं है, बल्कि यह एक सामाजिक चुनौती है, जो हमारी परवरिश, हमारी प्राथमिकताओं और हमारी नीतियों पर सवाल उठाती है।

आज के परिवारों में माता-पिता की व्यस्तता, एकल परिवारों की बढ़ती संख्या और संवाद की कमी ने बच्चों को अकेलेपन की ओर धकेला है। स्मार्टफोन कई घरों में बच्चों की चुप्पी खरीदने का सबसे आसान साधन बन गया है। रोता बच्चा हो, जिद करता बच्चा हो या समय न देने की मजबूरी-मोबाइल फोन एक त्वरित समाधान बन चुका है। लेकिन यही समाधान आगे चलकर सबसे बड़ी समस्या बन जाता है। हम यह भूल जाते हैं कि बच्चा केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि मार्गदर्शन, स्नेह और समय चाहता है। जब यह सब उसे स्क्रीन से मिलने लगता है, तो परिवार की भूमिका स्वतः कमजोर हो जाती है। यह भी एक कठोर सत्य है कि कई माता-पिता स्वयं डिजिटल लत के शिकार हैं। ऐसे में बच्चों को रोकने का नैतिक और व्यवहारिक अधिकार भी कमजोर पड़ जाता है। हम बच्चों से अपेक्षा करते हैं कि वे मोबाइल कम चलाएं, जबकि हमारे अपने हाथों में हर समय फोन रहता है। यह दोहरा व्यवहार बच्चों के मन में भ्रम और विद्रोह दोनों पैदा करता है। इसलिए समस्या का समाधान केवल बच्चों पर नियंत्रण नहीं, बल्कि पूरे पारिवारिक वातावरण में संतुलन लाने से जुड़ा है।

सरकार और समाज की भूमिका भी इस संकट में कम महत्वपूर्ण नहीं है। ऑनलाइन गेमिंग उद्योग तेजी से बढ़ रहा है, लेकिन उसके सामाजिक प्रभावों पर पर्याप्त नियंत्रण और निगरानी का अभाव है। कई गेम्स में हिंसा, आक्रामकता और जोखिम भरे व्यवहार को सामान्य और रोमांचक रूप में प्रस्तुत किया जाता है। बच्चों के लिए आयु-उपयुक्त सामग्री, समय-सीमा और चेतावनी संकेतों को सख्ती से लागू करना अब विकल्प नहीं, बल्कि अनिवार्यता बन चुका है। सरकार को चाहिए कि वह ऑनलाइन गेमिंग और डिजिटल कंटेंट के लिए स्पष्ट और कठोर नियामक ढाँचा विकसित करे, जिसमें बच्चों की सुरक्षा सर्वोपरि हो। विद्यालयों की भूमिका भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। शिक्षा केवल पाठ्यक्रम तक सीमित नहीं रह सकती। डिजिटल साक्षरता, मानसिक स्वास्थ्य और जीवन-कौशल को शिक्षा का अनिवार्य हिस्सा बनाया जाना चाहिए। बच्चों को यह सिखाना आवश्यक है कि तकनीक का उपयोग कैसे किया जाए, न कि तकनीक के गुलाम कैसे बना जाए। शिक्षकों को भी बच्चों के व्यवहार में होने वाले बदलावों, अकेलेपन, चिड़चिड़ेपन और अचानक गिरते शैक्षणिक प्रदर्शन जैसे संकेतों को गंभीरता से लेना होगा।

मनोवैज्ञानिक सहायता को लेकर समाज में जो झिझक और संकोच है, उसे भी तोड़ना होगा। मानसिक स्वास्थ्य को कमजोरी नहीं, बल्कि स्वास्थ्य का अभिन्न अंग माना जाना चाहिए। यदि किसी बच्चे में अवसाद, अत्यधिक चुप्पी, आक्रामकता या आत्मघाती विचारों के संकेत दिखें, तो समय रहते विशेषज्ञ की मदद लेना अत्यंत आवश्यक है। देर करना कई बार अपूरणीय क्षति में बदल जाता है। निस्संदेह, ये आत्मघात की घटनाएं, ऑनलाइन गतिविधियों के अतिरेक से मानसिक स्वास्थ्य पर पड़ने वाले घातक प्रभाव को लेकर गंभीर सवालों को जन्म देती हैं। निश्चित रूप से आत्मघात की ये घटनाएं हमारे नीति-नियंताओं और अभिभावकों को आसन्न संकट के प्रति सचेत करती हैं। दरअसल,ये दुखद घटनाएं एक घातक प्रवृत्ति को ही उजागर करती हैं कि गेमिंग और डिजिटल संपर्क लाखों युवाओं को आभासी समुदाय और मनोरंजन तो प्रदान कर सकते हैं, लेकिन साथ ही ये भावनात्मक कमजोरियों,सामाजिक अलगाव और मानसिक स्वास्थ्य संबंधी जरूरतों की पूर्ति न होने जैसी समस्याओं को भी जन्म दे सकते हैं। हालांकि, वहीं दूसरी ओर समाज विज्ञानी इस बात पर भी बल देते हैं कि केवल गेमिंग या ऑनलाइन मित्रता ही आत्महत्या का कारण नहीं बन सकती हैं। निस्संदेह, आत्महत्या एक जटिल और बहुआयामी घटना है। लेकिन समस्याग्रस्त डिजिटल जुड़ाव, विशेष रूप से जब यह ऑफलाइन जीवन से अलगाव, बाधित शिक्षा और तीव्र भावनात्मक तनाव के साथ होता है तो संवेदनशील युवा मन में परेशानी को और बढ़ा सकता है।

गाजियाबाद की यह घटना हमें यह भी सोचने पर मजबूर करती है कि हमने बच्चों के लिए कैसी दुनिया बनाई है। क्या हमने उन्हें संवाद दिया, या केवल उपकरण थमा दिए? क्या हमने उन्हें संस्कार दिए, या केवल सुविधाएं? क्या हमने उन्हें सुनने का समय दिया, या केवल आदेश? यह आत्ममंथन केवल पीड़ित परिवारों तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि पूरे समाज को अपने भीतर झांककर देखना होगा। यह घटना एक चेतावनी है, एक टर्निंग पॉइंट है। यदि अब भी हमने इसे एक सामान्य समाचार की तरह भुला दिया, तो भविष्य में ऐसी घटनाएं और बढ़ेंगी। समाज को, सरकार को और प्रत्येक परिवार को मिलकर कड़े और संवेदनशील कदम उठाने होंगे। तकनीक को नकारना समाधान नहीं है, लेकिन उसे बिना नियंत्रण स्वीकार करना भी आत्मघाती है। संतुलन, संवाद और सहभागिता ही बच्चों की सुरक्षा का वास्तविक आधार हैं। गाजियाबाद की तीनों बहनों हो या कूल्लु के किशोर की असमय मृत्यु हमें यह याद दिलाती है कि अगर हमने अभी नहीं संभला, तो यह इलेक्ट्रॉनिक खतरा हमारे घरों, हमारे भविष्य और हमारी संवेदनाओं को निगलता चला जाएगा। यह समय है जागने का, सोचने का और ठोस कदम उठाने का-क्योंकि यह सवाल केवल तकनीक का नहीं, बल्कि जीवन का है।

(ललित गर्ग)


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राहुल गांधी की पिच पर लुढ़कते नरेंद्र मोदी और उन की भाजपा

पता नहीं क्यों कुछ लोग राहुल गांधी को पप्पू और नासमझ आदि-इत्यादि बताते रहते हैं। मेरा मानना है कि राहुल गांधी में समझ तो है l बिना समझ के तो हर बार संसद का अपहरण कर लेना आसान नहीं है l पट्ठा समूची भाजपा को नचा देता है l शीर्षासन करवा देता है। सारे योग प्राणायाम भी। फिर भी कुछ परिणाम हासिल नहीं होता। चिल्लाते रहिए संसदीय नियम , यह-वह। पर वह अपनी अराजकता के दम पर सही , समूची भाजपा को सिर के बल खड़ा कर देता है l लोकसभा में ऐन स्पीकर के सामने पूरी हेकड़ी से खड़े हो कर चाय की चुस्कियां लेते रहने का आत्मविश्वास और अभद्रता भी सोची समझी बात है। नासमझी नहीं। अभी तक किसी नेता प्रतिपक्ष को ऐसा करते देखा या सुना नहीं गया। यह मोदी की कायरता से उपजी हुई हनक है।

राहुल का चुनाव न जितवा पाना , कांग्रेस की हार का रिकार्ड बनाना , कांग्रेस को निरंतर दीमक बन कर ख़त्म करते जाना , अपनी अराजक , सामंती और नशेड़ी छवि बना लेना आदि-इत्यादि यह सब अलग विषय है।

जब तक देश की जनता राहुल गांधी को प्रधान मंत्री नहीं बनवा देती तब तक उसे यह सब देखने और बर्दाश्त कर लेने की क्षमता विकसित कर लेनी चाहिए। क्यों कि दुनिया एक बार ट्रंप को शायद समझ ले , राहुल गांधी को समझना नामुमकिन है। क्यों कि वह बहुत समझदार आदमी है। पहले के समय में लोग कहते थे कि भाजपा और मोदी की पिच पर राहुल गांधी खेलता है। लोग जाने क्या – क्या कहते थे।

अब का मंज़र यह है कि मोदी समेत समूची भाजपा राहुल गांधी की पिच पर पस्त है। हर बार मोदी को राहुल लोकसभा में घेर कर गिरा देता है। चुनाव जीतना भले मोदी को आता हो। दुनिया भर की डिप्लोमेसी आती हो। ट्रंप को झुकाना भी आता हो , पाकिस्तान की चटनी बनाना भी आता हो पर लोक सभा में राहुल से लड़ना नहीं आता। हार-हार जाता है मोदी , राहुल के आगे।

तो सिर्फ़ इस लिए कि राहुल समझदार बहुत है। यह राहुल का ही डर है कि ओ बी सी को ख़ुश करने के लिए जातीय जनगणना और यू जी सी एक्ट लाना पड़ता है मोदी को। यह राहुल गांधी की पिच है। आप होंगे 370 हटाने के उस्ताद , तीन तलाक़ को ख़त्म करने के मास्टर। सी ए ए के शौक़ीन। मुफ़्त अनाज , शौचालय , गैस जैसी लोकल्याणकारी बातें करने के बाजीगर होंगे आप। देते रहिए देश को इंफ्रास्ट्रक्चर। पर जो आत्मविश्वास राहुल गांधी के चेहरे पर मोदी को अपनी अराजकता में चित्त करने के बाद दीखता है , मोदी के चेहरे पर यह आत्मविश्वास कभी किसी ने देखा हो तो बताए भी।

इस लिए भी कि राहुल गांधी अपने कोर वोटर की पीठ में कभी मोदी की तरह छुरा नहीं घोंपता। मोदी को इस में महारत है। महारत तो ममता बनर्जी की भी देखने लायक़ है कि दिल्ली आ कर जिस तरह चुनाव आयोग में अपनी बात चुनाव आयुक्त को सुना कर बिना उस को सुने उठ गई। कपिल सिब्बल , सिंघवी जैसे वकीलों की फ़ौज को साथ ले कर सुप्रीम कोर्ट में बतौर वकील ख़ुद को उपस्थित किया , शेरनी की तरह गरज कर मोदी के चेहरे का रंग उड़ा दिया है। तो ममता बनर्जी भी यह सारी नौटंकी अपने कोर वोटर कहिए , घुसपैठिया वोटर कहिए , के लिए कर रही है। दहाड़ती हुई घूम रही है।

पर मोदी ?

अपने वोटर का दुःख-दर्द नहीं जानता। अपने वोटर को चूस कर सिर्फ़ सत्ता का शहद जानता है। अपने वोटर को इमोशनली ब्लैकमेल करता रहता है। टेकेन फॉर ग्रांटेड लिए रहता है। अपने वोटरों को जातियों के खाने में बांट कर आपस में लड़ा देता है। आरक्षण अस्सी से पचासी प्रतिशत करने के मंसूबे पाले हुए है ताकि 2029 में फिर सत्ता का शहद चखे। इसी लिए कभी राहुल गांधी तो कभी ममता बनर्जी अपनी ही पिच पर ला कर मोदी को लुढ़का देती है। अब आप ही बताइए कि नासमझ कौन है ?

राहुल गांधी कि नरेंद्र मोदी ?

दिग्विजय सिंह की अमृता राय के साथ की अंतरंग फ़ोटो कंप्यूटर पर हैक करवा कर दिग्विजय सिंह की थू-थू करवा दी। संजय जोशी की अंतरंग वीडियो निकलवा ली। सार्वजनिक जीवन ख़त्म हो गया संजय जोशी का। प्रणव पांड्या पागल बने घूम रहे। गोविंदाचार्य पता नहीं कहां धूल फांक रहे हैं। एक से एक सूरमा सांस नहीं ले पा रहे। हार्दिक पटेल की अय्याशी भी दिखा दी सब को। सब जानते हैं राहुल गांधी भी अय्याश है। विदेश यात्राओं के लिए बदनामी इसी लिए है राहुल की। पर एक फ़ोटो भी नहीं निकाल पाए ? वीडियो तो बहुत दूर की बात है। राहुल तो ललकार रहा है कि एप्स्टीन फ़ाइल के कारण मोदी ट्रंप से कंप्रोमाइज कर गए। अभी बहुत माल है उस के पास।

यह भी राहुल की पिच है जहां वह मोदी को लुढ़का रहा है। कौन सा खेत चर रहे हैं भाजपा के चाणक्य लोग ? क्यों भैंस बन गए हैं। और यह भैंस भी किस पानी में थाह ले रही है। नक्सली देश से ख़त्म करने की गर्जना करने वाले लोग इस अराजक की चिकित्सा करने में अक्षम क्यों हैं भला !

सोचिए कि जो एक समझदार राहुल गांधी का इलाज नहीं कर पा रहा , वह देश का , देश की समस्याओं का क्या इलाज करेगा ? फिर तमन्ना ग्लोबल लीडर बनने की है।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार, राजनीतिक विश्लेषक हैं और कई पुस्तकें लिख चुके हैं https://sarokarnama.blogspot.com/ उनका ब्लॉग है)