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पाकिस्तान से आए हिन्दुओं के लिए मोदी सरकार ने उठाया बड़ा कदम

पाकिस्तान के करीब 60 हजार हिंदू शरणार्थियों को भारतीय नागरिकता प्रदान करने की दिशा में मोदी सरकार ने पहला कदम बढ़ा दिया है। लंबी अवधि के वीजा के लिए आवेदन जमा करने और विभिन्न एजेंसियों द्वारा उसके संसाधन के लिए ऑनलाइन सिस्टम शुरू किया गया है।

गृह मंत्रालय ने यह फैसला पाकिस्तान के उन हिंदू अल्पसंख्यकों की मुश्किलों को दूर करने के इरादे से किया है, जो स्थायी रूप से बसने के इरादे से भारत आते हैं।

अभी तक ऐसे सभी वीजा आवेदनों को कागजी तौर पर स्वीकार किया जाता है। लंबी अवधि वाले वीजा के पात्र पाकिस्तानी अब www.indianfrro.gov.in/frro पर लॉग इन करके ऑनलाइन अर्जी जमा कर सकते हैं।

नए सिस्टम की मदद से आवेदनकर्ता अपनी अर्जी पर निगरानी रख सकेंगे। साथ ही, अर्जी के तुरंत निस्तारण में मदद मिलेगी। लंबी अवधि वाले वीजा के लिए कागज पर आवेदन करने का सिस्टम भी 1 अगस्त 2015 से तीन महीने तक जारी रहेगा।

इसके बाद सभी आवेदन ऑनलाइन स्वीकार किए जाएंगे। बीते साल मई में मोदी सरकार आने के बाद गृह मंत्रालय ने पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान के अल्पसंख्यक समुदायों के उन सदस्यों के लिए प्रक्रिया को सरल बनाने के लिए कई कदम उठाए हैं, जो यहां स्थायी रूप से बसने के इरादे से आते हैं।

रेल्वे को स्वतंत्र नियामक की ज़रुरतः श्री सुरेश प्रभु

रेल मंत्री श्री सुरेश प्रभु ने रेलवे में निजी पूंजी आकर्षित करने के लिए इस संगठन से अलग एक स्वतंत्र नियामक तंत्र बनाए जाने की वकालत की है। प्रभु ने कहा, 'इसके लिए खासतौर पर एक नियामक तंत्र की जरूरत है। इसी लिए हम एक नियामकीय व्यवस्था चाहते हैं ताकि निजी भागीदारी में सार्वजनिक हितों से समझौता न हो, सार्वजनिक कामकाज प्रभावित न हो और निजी क्षेत्र को अपने निवेश की सुरक्षा को लेकर चिंता करने की जरूरत भी न हो। 

उन्होंने कहा कि अरविंद पानगढिय़ा से एक रोडमैप का सुझाव देने का अनुरोध किया गया है। वह स्वतंत्र हैं, बहुत ही विद्वान और बहुत ही सक्षम हैं और साथ ही वह हमारी व्यवस्था का हिस्सा भी हैं क्योंकि वह नीति आयोग के उपाध्यक्ष हैं। रेल मंत्री ने कहा कि वह हाल में मुझसे मिले थे और हमने मुद्दे पर चर्चा की। जब एक बार वह इसका खाका तैयार कर लेंगे तो तो हम इस पर विस्तृत चर्चा करेंगे और हम उस पर लोगों की राय समझने के लिए उसे वेबसाइट पर भी डालेंगे। गौरतलब है कि भारतीय रेल ने क्षमता विस्तार, यात्री सुविधाओं को बेहतर बनाने तथा हाई-स्पीड रेल सेवा और कुछ अन्य क्षेत्रों में निजी कंपनियों के लिए परियोजनाओं की पेशकश की है। सॉफ्टवेयर में हेरफेर के जरिए मालगाडिय़ों में लदान किए जाने वाले सामानों के वास्तविक वजन को कथित रूप से कम करके दिखाने के मामले में हाल ही में सीबीआई के छापे के बारे में पूछे जाने पर प्रभु ने कहा कि भ्रष्टाचार को समाप्त करने के लिए यह एक संयुक्त अभियान था।

सामाजिक बिखराव रोकना आज सबसे बड़ी जरूरत-भैयाजी जोशी

मुंबई। राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के सर कार्यवाह भैयाजी जोशी ने कहा है कि राष्ट्र की अखंडता के लिए समाज के बिखराव को रोकना आज सबसे बड़ी जरूरत है। उन्होंने कहा कि हम लोकतांत्रिक रूप से स्वतंत्र है और संवैधानिक रूप से भी सब समान है। लेकिन हमारे बीच समता नहीं है, यह गंभीर स्थिति है। उन्होंने कहा कि लगातार बढ़ती विषमता की खाई को पूरी कठोरता के साथ समाप्त करना होगा। भैयाजी जोशी सामाजिक समरसता मंच की विशाल धर्मसभा को संबोधित कर रहे थे। इस सभा में बौद्ध धर्मगुरू भंते राहुल बोधीजी, विभिन्न तीर्थों के पीठाधीश्वरों सहित राज्यसभा सांसद महंत शम्भूप्रसाद महाराज, समरसता मंच के केंद्रीय संयोजक भिकूजी इदाते, बीजेपी के वरिष्ठ विधायक मंगल प्रभात लोढ़ा, कई संत – महंत व बौद्ध भिक्षुगण भी मंच पर उपस्थित थे। रेसकोर्स के विशाल ग्राउंड में देर रात तक चली इस धर्मसभा में 50 हजार से भी ज्यादा लोग उपस्थित थे।

धर्मसभा को संबोधित करते हुए भैयाजी जोशी ने कहा कि सामाजिक विषमता समाप्त किए बिना विकास की कल्पना व्यर्थ है। उन्होंने कहा कि हमारा धर्म एक, हमारे संस्कार एक, हमारी जीवन पद्धति एक, हमारे भगवान भी एक और हमारे सिद्धांत भी एक, लेकिन फिर भी हमारे आपस के बीच ही व्यवहार में बहुत फर्क है, इसे समाप्त करना है। एक ही भगवान को माननेवाले आज शत्रु बनते जा रहे हैं, यह हमारा अज्ञान है। उन्होंने कहा कि आज जब समस्त भारतीय समाज को एकजुट होने की सबसे ज्यादा जरूरत है, तभी हमारे समाज को बांटने की कोशिशें भी ज्यादा हो रही हैं। ऐसी स्थिति में देश के लिए एक सोच और एक दिशा सबसे महत्वपूर्ण है। इस सोच के साथ भेदभाव को मिटाए बिना सामाजिक समरसता हो ही नहीं सकती। उन्होंने कहा कि हम सब मिलकर एक शक्ति बनें, और आगे बढ़े। सामाजिक बिखराव को रोकने के लिए भैयाजी ने इस तरह की धर्मसभाओं की आवश्यकता बताते हुए कहा कि हमारा देश लाखों वर्षों की परंपरा की भूमि है, जहां हमेशा से शस्त्र को नहीं, बल्कि शास्त्र को सर्वोपरि माना गया है। भैयाजी जोशी ने डॉ भीमराव आंबेडकर के कार्यों को भी याद किया। उन्होंने कहा कि हम राष्ट्र को मां मानते हैं, इस मां के सम्मान के लिए आज समाज के बिखराव को रोकना हमारे लिए सबसे बड़ी चुनौती है।

रेसकोर्स में संपन्न 50 हजार लोगों के इस विशाल आयोजन की सफलता में महत्वपूर्ण भूमिका निभानेवाले भाजपा विधायक मंगल प्रभात लोढ़ा का नागरिक अभिनंदन किया गया। इस अवसर पर मोहन साळेकर, प्रेमभाई गोहिल, विधायक भाई गिरकर का भी अभिनंदन किया गया। इस अवसर पर मुम्बई मेघवाल पंचायत द्वारा आयोजित समूह लग्न आयोजन में 39 जोड़े परिणय सूत्र में बंधे। धर्मसभा में बड़ी संख्या में लोग सपरिवार आए थे। 

संपर्क .. Niranjan Parihar / 09821226894. 

विज्ञापनों पर 780 करोड़ लुटा दिए सरकार ने

विज्ञापन और दृश्‍य प्रचार निदेशालय (डीएवीपी) ने विज्ञापन और प्रचार पर छह महीने में मार्च 2015 तक लगभग 780 करोड़ रुपये खर्च किए हैं। राज्‍य सभा में एक प्रश्‍न के जवाब में सूचना और प्रसारण राज्‍यमंत्री राज्‍यवर्धन सिंह राठौड़ ने यह जानकारी दी। राठौड़ ने बताया कि इस समय अंतराल में डीएवीपी द्वारा प्रिंट मीडिया पर करीब 260 करोड़ जबकि ऑडियो विजुअल पब्लिसिटी पर करीब 451 करोड़ रुपये खर्च किए गए हैं।  डीएवीपी द्वारा आउटडोर पब्लिसिटी पर करीब 69 करोड़ रुपये खर्च किए गए।  कुल मिलाकर इस साल मार्च तक छह महीने में 780 करोड़ और साठ लाख रुपये खर्च किए गए हैं।  ॉ

घाटी में अब 60 लाख मुसलमान और मात्र 5 हजार पंडित हैं

असयि गछय पाकिस्तान, बट्ट रोस्तयू बटनिन सान् (हमें पाकिस्तान चाहिए, कश्मीरी पंडितों के बिना लेकिन उनकी महिलाओं के साथ)', हमें चाहिए निजामे मुस्तफा, हमें क्या चाहिए-'आजादी', आजादी का मतलब क्या -'ला इल्हा इल इल्लाह।' जनवरी 19, 1990 की रात कश्मीर की मस्जिदों के लाउडस्पीकरों से लगातार ये नारे गूंज रहे थे। घाटी का कोई ऐसा कोना नहीं था, जहां ये आवाजें नहीं पहुंच रही थीं। डरे सहमे कश्मीरी हिन्दू अपने बच्चों के साथ घरों में दुबके हुए थे। घाटी की गलियों में हाथों में मशालें और आधुनिक हथियार लिए हुए नारे लगाते हुए कट्टरपंथी जुलूस निकाल रहे थे। पुलिस कहीं नहीं थी।
 
हिन्दुओं को धमकी दी जा रही थी कि 'कश्मीर छोड़कर चले जाओ नहीं तो कत्ल कर दिए जाओगे।' दहशतगर्दों की आवाज पूरी रात कश्मीर की वादियों में गूंजती रही। सुबह जब हिन्दू उठे और डरे सहमे अपने घरों से बाहर निकले तो हर हिन्दू के घर के बाहर पोस्टर चिपके हुए थे जिन पर लिखा था 'यदि अपनी जान की सलामती चाहते हो तो कश्मीर छोड़कर चले जाओ नहीं तो तुम्हारी नस्लों को नेस्तोनाबूद कर दिया जाएगा' ये आंखों देखा मंजर 'पनुन कश्मीर' के अध्यक्ष अश्वनी कुमार चिरंगू का है। पनुन का कश्मीरी में अर्थ होता है 'हमारा अपना।' श्री अश्वनी फिलहाल जम्मू में रहते हैं, वे विस्थापित कश्मीरी हिन्दुओं के अधिकारों के लिए वर्षों से समाजसेवा में जुटे हैं।
 
जम्मू में रहने वाले वीरेंद्र रैना दवाइयों का व्यवसाय करते हैं। उनका कहना है कि श्रीनगर के पॉश इलाकों में से एक जवाहर कॉलोनी में उनका तीन मंजिला मकान था। वे तब दवाइयों की एक कंपनी में मैनेजर थे। 21 जनवरी, 1990 तक उनके परिवार के सभी लोग जम्मू पहुंच गए थे। सिर्फ वे वहां रुके रहे ताकि हालात सामान्य हों तो वे परिजनों को वापस बुला सकें, लेकिन ऐसा मौका ही नहीं आया। उन्हें भी 28 फरवरी, 1990 को अपना सब कुछ वहीं पर छोड़कर जम्मू आना पड़ा। बाद में उन्हें पता चला कि उनके मकान पर कब्जा हो चुका है। उनके मकान की तीनों मंजिलों पर अलग-अलग मुस्लिम परिवारों ने कब्जा कर लिया था। आज भी उनका वहां पर मकान है और वहां कोई और रहता है।
कश्मीरी हिन्दुओं की ऐसी इक्की-दुक्की नहीं हजारों कहानियां हैं। इसके बाद जनवरी, 1990 से जो कश्मीरी हिन्दुओं के पलायन का जो सिलसिला शुरू हुआ फिर थमा नहीं। अपनी जान और बहू-बेटियों की इज्जत बचाने के लिए चार लाख से ज्यादा हिन्दुओं ने अगले दो महीनों के दौरान कश्मीर छोड़ दिया। उन्हें अपने पुरखों की जमीन, मकान, खेत-खलिहान सब कुछ छोड़कर जाना पड़ा। आज जब कश्मीर में उन्हें फिर से बसाने की बात हो रही है तो बिलों में घुसे अलगाववादी फिर से सिर उठा रहे हैं और विरोध कर रहे हैं। मसरत आलम जैसे अलगाववादी खुले तौर पर पाकिस्तान जिंदाबाद के नारे लगा रहे हैं। यासीन मलिक जैसे देशद्रोही बयान दे रहे हैं कि यदि कश्मीरी पंडितों के लिए अलग से 'टाउनशिप' बसाई गई तो यहां इस्रायल जैसी स्थितियां पैदा हो जाएंगी।
कश्मीरी और हिन्दी की प्रसिद्ध साहित्यकार श्रीमती बीना बुदकी अब मुंबई में रहती हैं। उनके पति श्री दीपक बुदकी जम्मू-कश्मीर के पोस्टमास्टर जनरल थे। जनवरी, 1990 में जब कश्मीर से पलायन शुरू हुआ तब वे कश्मीर के लाल चौक पर सरकारी मकान में अपने पति के साथ रहती थीं। उन्होंने बताया कि शाम को पांच से छह बजे तक कर्फ्यू हटाया जाता था। जैसे ही कर्फ्यू में ढील मिलती तो उनके घर के बाहर लोगों की भीड़ जमा हो जाती थी। सभी कश्मीरी हिन्दू होते थे, जो अपना सामान उनके घर पर रखने के लिए आते थे। सुबह पांच से सात बजे के बीच कर्फ्यू फिर से खोला जाता था तो उनके घर से रोजाना एक गाड़ी डाक लेकर जम्मू के लिए निकलती थी। जो लोग रात को सामान घर पर रखकर जाते थे, वे गाड़ी में जगह पाने के लिए टूट पड़ते थे ताकि वे सुरक्षित जम्मू पहुंच जाएं। उन्होंने बताया कि उस दृश्य को याद करके आज भी वे भावुक हो जाती हैं। छोटे दुधमुंहे बच्चों को छाती से चिपकाए उनकी माताएं गाड़ी में जगह पाने की कोशिश में रहती थीं ताकि वे जम्मू पहुंच जाएं। हर किसी को जान बचाने की फिक्र रहती थी।
यदि कश्मीर के बिगड़ते हालातों की बात करें तो 1985 से कश्मीर में हालात बिगड़ने शुरू हो गए थे । वर्ष 1986 में कट्टरपंथियों ने मंदिरों पर हमले करने शुरू कर दिए। अनंतनाग में सबसे ज्यादा मंदिरों पर हमले किए गए। गांवों में रहने वाले हिन्दुओं के घरों और खेतों को जला दिया गया। कितनी ही घटनाएं ऐसी हैं जिनमें पड़ोस में रहने वाले मुसलमानों ने ऐसी घटनाओं को अंजाम दिया। तीन अप्रैल, 1987 में कश्मीर में अशोक कुमार गुंजू नाम के युवक की हत्या कर दी गई। यह पहली हत्या थी, जो कि खुलेआम की गई। जेकेएलएफ के आतंकवादियों ने ताबड़तोड़ गोलियां बरसाकर श्रीनगर में उनकी हत्या कर दी। इसके बाद दहशत फैलाने के लिए आतंकियों ने जगह-जगह बम धमाके शुरू कर दिए। वर्ष 1988, अप्रैल में दुकानदार पवन कुमार और पुजारी स्वामीनाथ की हत्या कर दी गई। 13 सितंबर को पेशे से अधिवक्ता टीकालाल टपलू की जेकेएलएफ के आतंकियों ने हत्या कर दी। उस समय उनके पास भाजपा के प्रदेश उपाध्यक्ष का दायित्व था। एक नवंबर, 1989 को आतंकवादियों ने शीला तिक्कु नाम की महिला को गोलियों से भून दिया। इसके बाद चार नवंबर, 1989 को न्यायाधीश नीलकंठ गुंजू की इसलिए हत्या कर दी गई क्योंकि उन्होंने एक आतंकी को फांसी की सजा सुनाई थी। इसके बाद अनंतनाग में केंद्र सरकार के कर्मचारी आर. पी. एन. सिंह की हत्या कर दी गई।
 
आठ दिसंबर, 1989 तत्कालीन गृह मंत्री वर्तमान में जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री मुफ्ती मोहम्मद सईद की बेटी रूबिया सईद का जम्मू-कश्मीर लिब्रेशन फ्रंट (जेकेएलएफ) के आतंकवादियों ने अपहरण कर लिया। उस वक्त जेकेएलएफ का सरगना आतंकी जावेद मीर था। आतंकवादियों ने अपने पांच साथियों शेख अब्दुल हामिद, मोहम्मद अल्ताफ बट, शेर खान, जावेद अहमद जरगर और मोहम्मद कलवाल को रिहा करने की मांग रखी। सरकार को मजबूरन आतंकवादियों को रिहा करना पड़ा। आतंकवादियों को जैसे ही छोड़ा गया वैसे ही पूरी कश्मीर घाटी में कट्टरपंथी सड़कों पर निकल आए।
 
 
श्रीनगर के राजौरी कदल इलाके में जब आतंकवादियों को रिहा किया गया तो सैकड़ों की संख्या में वहां हाथों में हथियार लिए हुए आतंकी मौजूद थे। उन्होंने हवा में गोलियां चलाकर खुशियां मनाईं। घाटी में उस दौरान रहने वाले हिन्दू बताते हैं कि सड़कों पर खुशी का माहौल था। कट्टरपंथी सड़कों पर पटाखे फोड़कर खुशियां मना रहे थे। मिठाइयां बांटी जा रही थीं। लाल चौक पर हजारों की संख्या में कट्टरपंथी जुटे और उन्होंने पाकिस्तान जिंदाबाद और हिन्दुस्थान मुर्दाबाद के नारे लगाए। उनके हाथों में पाकिस्तान के झंडे थे।
 
27 दिसंबर, 1989 को पेशे से अधिवक्ता व अनंतनाग में कश्मीरी पंडितों के नेता रहे श्री प्रेमनाथ बट्ट को आतंकियों ने मार डाला। 1990 में अनंतनाग की रहने वाली सरला बट्ट नाम की महिला का अपहरण कर लिया गया। आतंकियों ने उनके साथ पहले दुष्कर्म किया और बाद में 25 अप्रैल, 1990 को आरा मशीन पर रखकर उन्हें बीच में से चीर कर उनकी हत्या कर दी। आतंकवादियों को छोड़े जाने के बाद उनके हौसले और बुलंद हो गए। ऐसी बर्बरता की घटनाएं थमी नहीं, बल्कि बढ़ती गईं। वर्ष 1991 से 1996 में जब पीवी नरसिंहा राव प्रधानमंत्री थे, तब कश्मीर में हालात और भी बिगड़ गए। सैकड़ों कश्मीरी पंडितों की निर्मम हत्याएं की गईं। 1990 में शुरू हुए इस पाक प्रायोजित आतंकवाद के चलते कश्मीर से हिन्दुओं को निकालने की जो साजिश रची गई उसमें कट्टरपंथी कामयाब भी हुए। यही कारण है कि आज कश्मीरी हिन्दू अपने ही पुस्तैनी आशियानों में शरणार्थी बनकर रहने को मजबूर हैं। इतने बड़े पलायन का उदाहरण देश के अन्य किसी राज्य में नहीं हैं।
 
जम्मू के शक्ति नगर में रहने वाले कश्मीरी पंडित सभा के अध्यक्ष के. के. कोसा कहते हैं कि 'घाटी में लगभग 60 लाख मुसलमान हैं, जबकि हिन्दुओं की संख्या करीब पांच हजार ही बची है वे भी डर- डरकर वहां रहते हैं। वर्ष 1990 से पहले हिन्दुओं की आबादी यहां चार लाख से ज्यादा थी। हिन्दुओं के यहां से पलायन करने के बाद मुसलमानों ने उनकी संपत्तियों पर कब्जा कर लिया या फिर हिन्दुओं को अपनी संपत्ति को सस्ते दामों पर बेचना पड़ा। अब जबकि केंद्र सरकार ने कश्मीरी हिन्दुओं को बसाने के लिए ' टाउनशिप' बनाने की बात कही वैसे ही उसका विरोध शुरू हो गया है। अलगावादियों ने प्रदर्शन करने शुरू कर दिए हैं। यहां तक कि जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री मुफ्ती मोहम्मद सईद ने भी अलग से टाउनशिप बसाने की बात से इंकार कर दिया है। श्री कोसा का कहना है कि यदि केंद्र सरकार वास्तव में कश्मीरी हिन्दुओं को फिर से बसाना चाहती है तो उसे ठोस रणनीति बनानी होगी।
 
साभार- साप्ताहिक पांचजन्य से

वाराणसी में 5 मई से हस्तशिल्प मेला

वाराणसी में राष्ट्रीय सद्भावना, हस्तशिल्प मेले का आयोजन इस वर्ष 5 मई से शुरू होगा। वाराणसी में राष्ट्रीय सद्भावना एकता व पर्यावरण संरक्षण व हस्तशिल्पियों के विकास के मकसद से भारतेंदु अकादमी द्वारा आयोजित इस 54 दिवसीय मेले में देश भर के करीब 80 से ज्यादा प्रतिभागी भाग लेंगे। अकादमी के अध्यक्ष राजेंद्र त्रिवेदी ने बताया कि मेले में जहां जयपुर की लाख की चूडिय़ां होंगी तो सहारनपुर के लकड़ी के सजावटी सामान, तो मुंबई की कृत्रिम आभूषण, आगरा और कानपुर से चमड़े से निर्मित सामानो के साथ हरियाणा की हस्तकला व प्रतापगढ़ के घरेलू उत्पाद के साथ कई अन्य हस्तशिल्पी भाग ले रहे है। 

उन्होंने बताया कि मेले में मनोरंजन के विभिन्न साधन भी मौजूद होंगे तो वही प्रदेश सरकार की जनहितकारी नीतियों व कार्यक्रमों के व्यापक प्रचार प्रसार हेतु स्वयं सहायता समूहों द्वारा  राष्ट्रीय आजीविका योजना, ग्राम विकास की सरस योजना, पंचायती राज, स्वास्थ्य विभाग, डूडा सहित कई विभागों के स्टाल भी लगाए जा रहे है। 28 जून तक चलने वाले इस मेले को लेकर आयोजक भारतेंदु अकादमी के अध्यक्ष ने बताया कि मेले में कारोबार का कोई लक्ष्य निर्धारित नहीं है बस संस्था मेले में हस्तशिल्प का विकास करना चाहती है जिससे लोगो को कला संस्कृति से रूबरू हो सके।

अमिताभ बच्चन के नाम ने बचाया आतंकवादियों से

पत्रकार-लेखक एस हुसैन जैदी ने नई किताब मुंबई एवेंजर्स लिखी है। वे किस्‍सों के आधार पर किताब लिखते हैं और हर किस्‍सा एक से एक रोमांचकारी होता है। फिर चाहें वह किस्‍सा इराक में आतंकियों द्वारा उन्‍हें बंधक बनाए जाने का ही क्‍यों न हो।
 
जैदी ने ब्लैक फ्राइडे, डोंगरी टू दुबई और भायखला से बैंकॉक जैसी पुस्तकें लिखी है। अपनी ताजी किताब मुंबई एवेंजर्स में उन्‍होंने भारतीय सेना के कमांडोज़ के पाकिस्‍तान की सीमा के अंदर किए गए सीक्रेट मिशन के काल्‍पनिक किस्से को बयां किया गया है।
 
जैदी ने एक किस्‍सा बताया कि जब वह इराक में अपहृत कर लिए गए थे, तो अमिताभ बच्‍चन ने उनकी जान बचाई। उन्‍होंने बताया कि मैं उस वक्‍त इराक गया था, जब अमेरिका ने सद्दाम हुसैन को सत्‍ता से हटा दिया गया था। मैं सद्दाम के करीबी लोगों से बात करना चाहता था और मैं उन लोगों तक पहुंचने की कोशिश कर रहा था कि इसी बीच बगदाद में मेरा अपहरण हो गया।
 
मुझे एक सूनसान जगह पर ले जाया गया और आप यकीन नहीं मानेंगे कि किसने मेरी जान बचाई। अमिताभ बच्‍चचन। दरअसल, जब मेरी आंखों की पट्टी हटाई गई, तो वहां सिर्फ एक क्‍लीनशेव लंबे बाल वाले आदमी के अलावा बाकी सभी को बड़ी दाढ़ी के साथ देखा। उसने मुझसे पूछा कि क्‍या मैं पाकिस्‍तानी हूं। मैंने कहा मैं हिंदी हूं, भारत से। फिर उसने अरबी भाषा में कुछ कहा, जो मैं नहीं समझ सका।
 
इसके बाद उसने मुझसे कहा क्‍या तुम अमीशा बक्‍कन को जानते हो? मैंने कहा मैं एक ही अमीशा को जानता हूं जो अमीषा पटेल है। उसने मुझे बुरी तरह फटकार लगाई कि तुम अमीशा बक्‍कन को नहीं जानते। वह गुस्‍से में अपने कमरे में गया और 1982 की फिल्‍म शक्‍ित का पोस्‍टर ले आया।
 
तभी मेरे दिमाग में आया कि यह शक्‍ित के अमिताभ बच्‍चन को कॉपी कर रहा है। इस खुलासे के बाद मैं खुशी से चीख पड़ा कि वह मुझे गलती से अमीशा बक्‍कन (अमितजी) का दोस्‍त समझ रहा है। फिर उसने मुझसे एक नोट लिखवाया कि जब भी वह मुंबई आएगा, तो मैं उसे अमिताभ बच्‍चन से मिलवाऊंगा। मैंने उसे तुरंत हां कर दी और मेरी जान बच गई।

80 घंटे बाद मलवे से जीवित निकाला

भूकंप में सब कुछ तबाह हो गया था। उसका अपार्टमेंट गिर चुका था। उसके इर्द-गिर्द तीन लाशें पड़ी थीं। वह एक ऐसी जगह पर था जहां हिलना-डुलना भी नामुमकिन सा था। लेकिन फिर भी एक आस थी कि कभी कोई आएगा और उसे बचा लेगा। अंत में उसकी उम्मीद सही साबित हुई और 80 घंटे बाद उसे मलबे के ढेर से बाहर निकाला गया।
 
28 वर्षीय ऋषि खनाल के पास न तो भोजन था और न ही पानी। शनिवार दोपहर जब 7.9 तीव्रता वाले भूकंप ने नेपाल को हिला दिया, तो उसमें कई इमारतों के साथ ही खनाल का अपार्टमेंट भी गिर गया। अगले 80 घंटे तक उसे अगर किसी ने जिंदा रखा तो वह थी उसकी इच्छाशक्ति।
 
मंगलवार को नेपाल-फ्रांस की संयुक्त टीम ने पांच घंटे तक चले बचाव कार्यक्रम के बाद ऋषि को जिंदा बाहर निकाला।
 
जब भूकंप आया तो खनाल सात मंजिला इमारत की दूसरी मंजिल पर थे। ऊपरी पांच मंजिल जुड़ी हुई थीं और बचाव दल ने उन सभी को ड्रिल कर ऋषि को बाहर निकाला। ऋषि ने जब नेपाली में पूछे गए सवालों के जवाब दिए तब बचाव दल को उसके वहां होने का पता चला।
 
डॉक्टरों का कहना है कि इस दुर्घटना में ऋषि की टांग टूट गई है।
 
इस भयानक प्राकृतिक आपदा से बचने वालों में सुनीत शिटौला भी शामिल हैं। जब भूकंप आया तब सुनीता रसोई में खाना पका रही थी। महाराजगंज के बंसुधरा इलाके में पांच मंजिला इमारत गिरने से सुनीता उसमें फंस गई थीं। भूकंप के 50 घंटे बाद भारतीय बचाव दल ने उसे मलबे के ढेर से बाहर निकाला।
 
सुनीता अब एक स्थानीय स्कूल में बने अस्थायी कैंप में अपने पति दो बच्चों के साथ रह रही है। सुनीता का कहना है कि मुझे लगता है कि मैं अब बिलकुल ही नई दुनिया में आ गई हूं।
 
एनडीआरएफ के एक अधिकारी का कहना है कि हमें खबर मिली थी एक महिला दो स्लैब के बीच में फंस गई है। वहां खाली जगह है और वह जिंदा है।
 
मलबे के नीचे अब भी सैकड़ों लोगों के फंसे होने की आशंका है। ग्रामीण इलाकों में हालात और खराब हो सकते हैं। बचाव दल अब भी जीवित बचे लोगों को तलाश रहे हैं।

लोगों की उम्मीदें न्यायालयों से भी टूट रही है और सरकारों से भी

आज के लोकतंत्र में किसी भी सरकार को न तो ईमानदार मीडिया चाहिए, न ही ईमानदार न्यायाधीश। हमारे पास दो ही विकल्प हैं- या तो हम कार्यपालिका की तरह सरकार की हां में हां भरने लग जाएं अथवा हम दोनों मिलकर एक संकल्प के साथ आगे बढ़ें। प्रकृति का नियम है कि जल और मन दोनों ढलान की ओर ही बढ़ते हैं और बढ़ते हुए दिखाई भी देने लगे हैं। अगर अभी मौन रहे तो यह लोकतंत्र फिर सामंतशाही की भेंट चढ़ जाएगा।

जिस प्रकार राजस्थान में जिला कलेक्टरों ने डोडो-पोस्त के आवंटन के लिए झूठी रिपोट्र्स लिख कर दी अथवा बड़े-बड़े अधिकारी सीना फुलाकर खनन या व्यापमं के भ्रष्टाचार के पक्ष में रिपोट्र्स बना देते हैं, वैसे ही न्यायाधीश भी सरकार के पक्ष में फैसले देने को मजबूर होने लगेंगे। मौन रहना शुरू तो हो ही गया है। देश के कई पूर्व मुख्य न्यायाधीश भी भ्रष्टाचारियों की सूची में शामिल हो चुके हैं। कारण है न्यायपालिका और मीडिया के बीच बढ़ता अविश्वास। दोनों ही अपनी-अपनी जगह स्वच्छन्द रहना चाहते हैं। अत: बड़े घरानों की तरह इनमें भी परदे के पीछे भ्रष्टाचार अपने पैर पसार रहा है। इस समस्या का एक ही समाधान है- न्यायपालिका और मीडिया की सलामी जोड़ी बने। देखना, भष्टाचार थर्रा जाएगा।

न्यायपालिका करे तय

न्यायपालिका को अब तो यह मान ही लेना चाहिए कि विधायिका और कार्यपालिका मिलकर कार्य करेंगे और न्यायपालिका को तय करना पड़ेगा कि वह स्वतंत्र पहचान बनाए रखना चाहती है अथवा वह भी बहती गंगा में हाथ धोना चाहती है? इसके बाद ही मीडिया की भूमिका पर बात हो सकती है। विधायिका में दल का नेता, कार्यपालिका में मुख्य सचिव और न्यायपालिका में मुख्य न्यायाधीश अपने-अपने क्षेत्र का भविष्य तय करते हैं। मीडिया में ऎसा कोई नेतृत्व नहीं होता। सब अपने-अपने उद्देश्य के अनुरूप निर्णय करते हैं। इसीलिए संविधान ने मीडिया को अनिवार्यता तो दी, किन्तु चौथा पाया नहीं माना।

आज देश जिस चौराहे पर खड़ा है, भ्रष्टाचार के दरिया में तैर रहा है, आम नागरिक संत्रस्त है और सरकारें मस्त हैं; वहां आशा की एक ही किरण दिखाई पड़ती है- न्यायपालिका और मीडिया की सलामी जोड़ी। ये दोनों मिलकर सार्वजनिक मद्दों पर खुले दिमाग से चर्चा का मार्ग प्रशस्त करें, उसी के अनुरूप परिणाम आने लगें। फैसलों पर सार्वजनिक रूप से टिप्पणियां लिखी जाएं, तो बहुत कुछ सुधार संभव है।

आज तो कई बार कानून अंधा भी दिखाई देता है और गूंगा भी। कई पूर्व मुख्य न्यायाधीश यहां बैठे हैं, जिन्होंने इन परिस्थितियों को जिया है। कई लोग तो मन-मारकर भी जी रहे होंगे। हमें इसके निवारण के लिए छुई-मुई वाली स्थिति से बाहर आना होगा। मीडिया के साथ जुड़ना होगा। आज मीडिया इतने बड़े-बड़े मुद्दे उठाता है और न्यायपालिका को मौन देखता है तो मन में प्रश्नों का उठना स्वाभाविक भी है। मीडिया एक ही अपेक्षा रखता है न्यायपालिका से, जब भी कोई सरकार प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर अंकुश लगाने का प्रयास करे, न्यायपालिका इसकी रक्षा को तत्पर दिखाई पड़े।

बनें मीडिया कमेटियां

इसके लिए सभी स्तरों के न्यायालयों में मीडिया कमेटियां बनें, जिनमें केवल न्यायाधीश ही सदस्य हों। इनकी मीडिया संपादकों के साथ सार्वजनिक मुद्दों पर नियमित चर्चाएं हों। पिछली बैठक के बाद किए गए फैसलों पर खुली चर्चा भी हो। मीडिया में उठाए गए मुद्दों पर क्या अमल हुआ, न्यायपालिका में, इस पर भी चर्चा हो। तब कहीं जाकर हमारी स्वतंत्र छवि बन पाएगी। मीडिया यदि दस्तावेज पेश करता है इन बैठकों में, तो उन्हें भी स्व प्रंसज्ञान से याचिका का दर्जा दिया जाना चाहिए। आम नागरिक के पास दस्तावेज नहीं हो सकते। प्रत्येक मुद्दे पर मीडिया भी याचिकाएं दायर नहीं कर सकता । सारा कार्य विश्वास पर चल सकता है।

स्व प्रसंज्ञान ले न्यायपालिका

मीडिया की तरह न्यायपालिका को भी सरकारों का कोपभाजन होने की तैयारी दिखानी पड़ेगी। घड़ी की सुई यहीं आकर ठहर जाती है। मीडिया में उठाए गए बड़े-बड़े मुद्दे आज तो न्यायालय नजर अंदाज ही करने लग गया है। अफसरों के खिलाफ भ्रष्टाचार के मुद्दे सरकार वापस ले लें, सीबीआई और ईडी जैसे विभाग मुद्दों पर अनिश्चित अवधि तक कुंडली मारकर बैठे रहें। प्रभावशाली लोग बचते रहें और लोग वर्षों जेल में बन्द रहें कोई पूछने वाला नहीं। सरकारें तो यही चाहेंगी। तब समाधान तो मीडिया और न्यायालय की सलामी जोड़ी ही दे सकती है। जब-जब न्यायपालिका तथ्यों से आंखें मूंद कर, जनहित को भी नजरअंदाज कर देती है, तब इसकी मार भी मीडिया को ही खानी पड़ती है। तब सरकारें न्यायपालिका के कंधों पर बन्दूकें रखकर मीडिया पर सीधे गोलियां दागती है।

मुझे यह भी याद है कि किस तरह राजस्थान उच्च न्यायालय के माननीय न्यायाधीश राजस्थान पत्रिका में प्रकाशित समाचारों को, स्वप्रेरणा से प्रसंज्ञान लेकर, याचिका मान लेते थे। हाल ही के रामगढ़ बांध, अमानीशाह नाला, जलमहल-मानसागर झील, मोबाइल रेडिएशन और मास्टर प्लान के मामले इसके प्रमुख उदाहरण हैं। मध्यप्रदेश में ड्रग ट्रायल और खान नदी के मामले कोर्ट में पत्रिका के मार्फ त उठे।

आज तो लगता है प्रसंज्ञान लेना उनके अधिकार के बाहर का हो गया। सरकार विरोधी मुद्दों पर जिस प्रकार लम्बे काल तक अनिर्णय की स्थिति रहती है, तब मीडिया क्या भूमिका निभा सकता है। स्वयं मुख्य न्यायाधीश, चाहे किसी न्यायालय स्तर के हों, जब भ्रषचार प्रभावित फैसलों को सुनकर मौन रहते हैं, "अंकल जजेज" के मामलों को चुप रहकर बर्दाश्त करते हैं, अथवा विवेकहीन पूर्वाग्रह से युक्त फैसलों को भी गंभीर नहीं मानते, तब मीडिया क्या कर सकता है? प्रकाशित कर दे तो बड़े घर का अपमान माना जाता है।

खुलेआम पत्रकारों को भेंट!

जब, कहीं भी और कभी भी, किसी सरकार और मीडिया के बीच विवाद होता है, तब न्यायालय भी या तो मौन धारण कर लेते हैं अथवा मीडिया का ही विरोध करते हैं। "पेड न्यूज" के लिए प्रेस परिषद मीडिया की आलोचना तो करेगा, किंतु किसी न्यायाधीश ने सरकार और नेताओं द्वारा दिए जाने वाले प्रलोभन और मीडिया-खरीद के मुद्दों पर किसी नेता या दल को कटघरे में खड़ा नहीं किया। हाल ही में राजस्थान विधानसभा अध्यक्ष ने पत्रकारों को एक-एक हजार रूपए के गिफ्ट वाउचर बांटे। किसी कोर्ट अथवा लोकायुक्त को भी गैर कानूनी नहीं लगा। नेता ही तो "पेड न्यूज" का रास्ता दिखाते हैं। क्या आज तक इस अपराध के लिए किसी का चुनाव रद्द हुआ? इसी प्रकार चुनाव सम्बंधी विवाद पांच साल पड़े ही रहते हैं। जनता को संदेश क्या जाता है?

राजनेताओं को तो विश्वास हो चला है कि वे कार्यपालिका की तरह न्यायपालिका को भी खरीद सकेंगे। थोड़ा समय और लग जाएगा। आज बड़े-बड़े अधिकारी भी नेताओं के इशारों पर बड़े-बड़े झूठे दस्तावेजों पर हस्ताक्षर कर देते हैं, मानो वे सरकार के बंधुआ मजदूर हों। कल न्यायपलिका को भी सरकार के साथ होना पड़ जाएगा। तब हमारा लोकतंत्र स्वत: ही मर जाएगा। किसी पाए की फिर कोई आवश्यकता नहीं रह जाएगी। अभी तो समय है, निर्णय करने का अवसर भी है, सन्तानों के गर्व करने लायक इतिहास पीछे छोड़ सकते हैं। वरना, हमारा भी वही हाल होगा जो कोल्ड स्टोरेज में पड़े बीज का होता है। सड़ जाता है, किन्तु पेड़ नहीं बन पाता। किसी के काम नहीं आ पाता। सार्थकता तो इसमें है कि हमारे कायों� के फ ल नई पीढ़ी को खाने को उपलब्ध हों। कोई पेड़ अपने फ ल स्वयं नहीं खाता।

आज जब हम मीडिया की भूमिका की बात करते हैं, तब पहले यह बात भी करनी चाहिए कि मीडिया के प्रति हमारा नजरिया क्या है? इस तथ्य को भी मानना पड़ेगा कि मीडिया पहले लोकहित का ध्यान रखेगा, किसी एक नेता, जज या अधिकारी का नहीं । अत: मीडिया समिति का गठन ही वह रास्ता है, जहां न्यायपालिका के साथ मीडिया की सकारात्मक भूमिका बनी रह सकती है।

(लेखक राजस्थान पत्रिका के संपादक हैं)
(साभार: राजस्थान पत्रिका)

अब एटीएम से जाएगी स्पीड पोस्ट

डाक विभाग और स्टेट बैंक ऑफ इंडिया एक नया प्रयोग शुरु करने जा रहे हैं, अब एटीएम मशीन की मदद से आप अपने पार्सल और लेटर भी भेज पाएंगे. जी हां, इंडिया पोस्ट के आंध्र प्रदेश सर्किल जल्द एक ही सेवा शुरू करने जा रहा है। 

 
इसके लिए डाक विभाग स्टेट बैंक ऑफ इंडिया के साथ करार करेगा. अभी हाल ही में डाक विभाग ने पेस्ट ऑफिस सेविंग बैंक सेवा एटीएम के लिए स्टेट बैंक ऑफ इंडिया से करार किया है. इसके लिए एसबीआई ने आंध्र प्रदेश में 95 एटीएम उपलब्ध कराए हैं. 
 
इस नई योजना के तहत आपको स्पीड पोस्ट करने के लिए लिए डाक घर जाने के बजाए अपने नजदीकी एटीएम तक जाना होगा. एटीएम से स्पीड पोस्ट भेजने की प्रक्रिया में महज दो मिनट का समय लगेगा. इस बात की जानकारी आध्र प्रदेश सर्किल के चीफ पोस्ट मास्टर जनरल बी वी सुधाकर ने दी. एटीएम में जाने के बाद आपको स्पीड बुकिंग का ऑप्शन चुनना होगा. इसके बाद पास में लगी वजन तौलने वाली मशीन पर अपने पैकेट का वजन करना होगा. इसके बाद इस पर जो फीस लगेगी वो आपको एटीएम की स्क्रीन पर दिखाई देगी. इस पूरी प्रक्रिया के बाद एटीएम से एक पर्ची निकलेगी जिसे आपको अपने पैकेट पर लगाना होगा.
 
इसके बाद अपने पार्सल को एटीएम में लगे बॉक्स में डालना होगा. बस आपका काम यहां पर खत्म इसके बाद डाक विभाग एटीएम से उस पैकेट को लेकर आपके बताए गए पते पर पहुंचाएगा.  अभी यह सेवा सिर्फ आंध्र प्रदेश में ही उपलब्ध होगी।