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सफल जीवन की एक नई राह बनाएं

व्यक्ति अपने जीवन को सफल और सार्थक बनाने के लिये समाज से जुड़कर जीता है, इसलिए समाज की आंखों से वह अपने आप को देखता है। साथ ही उसमें यह विवेक बोध भी जागृत रहता है ‘मैं जो भी हूं, जैसा भी हूं’ इसका मैं स्वयं जिम्मेदार हूं। उसके अच्छे बुरे चरित्र का बिम्ब समाज के दर्पण में तो प्रतिबिम्बित होता ही है, उसका स्वयं का जीवन भी इसकी प्रस्तुति करता है। हमारी जिंदगी उतार-चढ़ावों से भरी होती है। और हम सब सोचते हैं कि यदि अवसर मिलता तो एक बढि़या और नेक काम करते। लेकिन हमारी बढि़या या नेक काम करने की इच्छा अधूरी ही रहती है क्योंकि अक्सर जब हम जिंदगी के बुरे दौर से गुजरते हैं, तब उससे निकलने में और जब अच्छे दौर में होते हैं, तब उस स्थिति को बरकरार रखने में जिन्दगी बिता देते है। 

हमारे संकल्प और हमारे आदर्श सांसारिक जीवन के बंधनों में बंधे रहने के बजाय उच्च लक्ष्यों की प्राप्ति के लिए बढ़ना चाहते हंै, लेकिन मन की इच्छाएं इसके विपरीत होती हैं। इन दोनों में लगातार संघर्ष चलता रहता है। इस संघर्ष में जीत अक्सर मन की इच्छाओं की ही होती है। इसका कारण यह है कि इच्छाओं की मांगें पूरी करने में मनुष्य को तुरंत सुख और आनंद मिलता है। इसके विपरीत आदर्श को जीने या आदर्श की अपेक्षाओं को पूरा करने में मनुष्य को शुरुआती दौर में अपने सुख और आनंद का बलिदान करना होता है। इसलिए लोग सामान्यतया ऐसा करने से बचते हैं। अगर यही स्थिति लंबे समय तक बनी रहे और आदर्श की अपेक्षाओं को दबाया जाता रहे, तो धीरे-धीरे आदर्श की उड़ान समाप्त होने लगती है। महान और आदर्श काम करने के लिए अक्ल से ज्यादा दिलेरी की जरूरत होती है और यह दिलेरी लुप्तप्राय होती जा रही है। आज लगभग देश और दुनिया इसी आदर्शहीनता के स्थिति से ही मुखातिब है। इसीलिये हेलन केलर ने प्रेरणा देते हुए कहा है कि कभी अपने सिर को झुकने मत दो। अपना सिर हमेशा ऊंचा उठाये रखो। दुनिया की आंखों में आंखें डाल कर देखो।

मैंने अपने जीवन में आदर्श एवं नैतिकता की आदर ओढ़कर अपने जीवन को सार्थक करते हुए लोगों को भी देखा है और ऐसे लोगों को भी देखा है जिनका मानना है कि आदर्श एवं नैतिकता से कोरी झोपडि़या बनायी जा सकती है, महल खड़े नहीं हो सकते हंै। इसका सीधा-सा अर्थ तो यही हुआ कि आज जो-जो विकास के नये कीर्तिमान स्थापित हो रहे हैं, त्यो-त्यो आदर्श धूल-धूसरित होे रहे हैं। लेकिन ऐसा नहीं है, हर दौर में अच्छे, ईमानदार और आदर्शवादी व्यक्ति मौजूद होते हैं। अपने जीवन में जब भी हम ऐसे गुणों का निर्वाह करते हैं, तो इससे न केवल हमारे चेहरे पर संतुष्टि का भाव झलकने लगता है, बल्कि हमारे व्यक्त्तिव में भी उसकी गरिमा दिखाई पड़ती है। जैसा कि किसी ने कहा है-‘‘जीवन बस एक दर्पण है और बाहर की दुनिया अंदर की दुनिया का प्रतिबिम्ब है।’’ एक बार अपने अंदर सफलता प्राप्त कर लें, बाहर खुद-ब-खुद वह प्रतिबिम्बित होगा।  

 प्रश्न उठता है कि अच्छाई, ईमानदारी और आदर्श आदि उदात्त गुणों के निर्वाह से हमारे चेहरे पर सकारात्मक भाव क्यों और कैसे प्रकट हो जाते हैं? क्या इन भावों का हमारे स्वास्थ्य और विचारों से भी कोई संबंध है? अपने बीते हुए दिनों और घटनाओं पर जरा नजर डालिए। आपने भी अपने जीवन में कई बार इन अच्छाइयों का परिचय दिया होगा। उस समय आपकी मनोदशा कैसी थी और उस मनोदशा का आपके स्वास्थ्य और विचारों पर क्या प्रभाव पड़ा था? निश्चित ही आपका उत्तर सकारात्मक होगा क्योंकि आप या तो इस बात पर सिर धुन सकते हैं कि गुलाब में कांटे हैं या इस पर खुश हो सकते हैं कि कांटों से भी गुलाब खिलते हैं। जब भी हम ईमानदारी से अपने कर्तव्य का पालन करते हैं, किसी की मदद करते हैं अथवा कोई अच्छा कार्य करते हैं, तो उससे अपने भीतर हम अपार संतोष महसूस करते हैं। तब वही भाव हमारे चेहरे और विचारों पर भी झलकने लगता है। इससे हमारे पूरे व्यक्तित्व में एक सकारात्मक परिवर्तन होता है। संतुष्टि और आनंद की अवस्था में व्यक्ति तनावमुक्त रहता है और इसलिए स्वस्थ रहता है। यह अवस्था मनुष्य के अच्छे स्वास्थ्य के साथ-साथ एक सफल एवं सार्थक जीवन की परिचायक है। इलेनोर रूजवेल्ट के ये शब्द मार्मिक लगेंगे-‘‘आखिरकार जीवन का उद्देश्य उसे जीना और इष्टतम अनुभवों को हासिल करना, नए और समृद्ध अनुभवों को उत्सुकता से और निर्भर होकर आजमाना है।’’ इसलिए अपने लिए एक नई राह बनाएं, ताकि अपने जीवन को भरपूर जी सकें।

आजकल भगवान की आराधना का रिश्ता केवल मतलब का होता है जब कभी कुछ चाहिए दौड़कर भगवान के आगे हाथ फैलाकर मांग लिया। मांगने से भगवान देनेवाला नहीं है। भगवान उन्हीं को देता है जो एकाग्रता और पवित्रता के साथ अपना कर्म करते है, जिसमें परोपकार की भावना होती है। कहीं दूर जा अगरबत्तियां जलाकर पूजा करने से बेहतर है कि अपने आसपास वालों से रहमदिली से पेश आएं, उनके दुःखों को दूर करने में सहयोगी बने। यही आध्यात्मिक सोच आसपास विश्वास की जोत जगाती है। जहां इस तरह का विश्वास सच में, प्यार में, व्यवस्था में, कर्म में, लक्ष्य में होता है, वहां आशा जीवन बन जाती है। इसके वितरीत जब कभी इंसान के भीतर द्वंद्व चलता है तो जिंदगी का खोखलापन उजागर होने लगता है। 

अक्सर आधे-अधूरे मन और निष्ठा से हम कोई भी कार्य करते हैं तो उसमें सफलता संदिग्ध हो जाती है। सफलता या ऊंचाइयों आप तभी पा सकते हैं, जब अपना काम करते हुए इस बात को नजरअंदाज कर दें कि इसकी वाहवाही किसे मिलेगी? हम तो मन्दिर, मस्जिद, गुरुद्वारे, चर्च में जाकर भी अपने धनबल, बाहुबल या सत्ताबल के आधार पर लम्बी-लम्बी लाइनों के बजाय वीआईपी दर्शन करके लौट जाते हैं। क्या हमारा ईश्वर से मिलने का यह तरीका परिणामकारी हो सकता है? हम हमारी आस्था या भगवान के प्रति निष्ठा को सस्ता न बनने दें। हमें अपना हर काम इस तरह करना चाहिए, जैसे हम सौ साल तक जीयेंगे, पर ईश्वर से रोजाना प्रार्थना ऐसे करनी चाहिए, जैसे कल हमारी जिंदगी का आखिरी दिन हो। जब हम ईश्वर के प्रति इतने पवित्र एवं परोपकारी बनकर प्रस्तुत होंगे तभी जीवन को सार्थकता तक पहुंचा सकेंगे। वैसे भी अमीर वह नहीं है, जिसके पास सबसे ज्यादा है, बल्कि वह है, जिसे और कुछ नहीं चाहिए। सच्चाई तो यही है कि जिसे और कुछ नहीं चाहिए वही सच्चे रूप में ईश्वर से साक्षात्कार की पात्रता अर्जित करता है।

जिन्दगी तो सभी जीते हैं, लेकिन यहां बात यह मायने नहीं रखती कि आप कितना जीते हैं, बल्कि लोग इसी बात को ध्यान में रखते हैं कि आप किस तरह और कैसे जीते हैं। जीवन में आधा दुख तो इसलिए उठाते फिरते हैं कि हम समझ ही नहीं पाते हैं कि सच में हम क्या हैं? क्या हम वही है जो स्वयं को समझते हैं? या हम वो हैं जो लोग समझते हैं। 

जिंदगी का कोई लम्हा मामूली नहीं होता, हर पल वह हमारे लिए कुछ-न-कुछ नया पेश करता रहता है-जब हमारी ऐसी सोच बनती है तभी हम अपने आप से रूबरू होते। स्वयं से स्वयं के साक्षात्कार के बिना हमारी लक्ष्य की तलाश और तैयारी दोनों अधूरी रह जाती है। स्वयं की शक्ति और ईश्वर की भक्ति भी नाकाम सिद्ध होती है और यही कारण है कि जीने की हर दिशा में हम औरों के मुहताज बनते हैं, औरों का हाथ थामते हैं, उनके पदचिन्ह खोजते हैं।  प्रेषकः

 (ललित गर्ग)
ई-253, सरस्वती कंुज अपार्टमेंट
25 आई. पी. एक्सटेंशन, पटपड़गंज, दिल्ली-92
फोनः 22727486, 9811051133

माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्वविद्यालय के सत्र 2015-16 के पाठ्यक्रमों में प्रवेश हेतु प्रवेश प्रक्रिया प्रारम्भ

एम.एससी. फिल्म प्रोडक्शन तथा एम.ए. न्यू मीडिया कंटेंट डिजाईन तथा बी.बी.ए. ई-कॉमर्स जैसे तीन नए प्रारम्भ होंगे
भोपाल, 25 अप्रैल। माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, भोपाल में शैक्षणिक सत्र 2015-2016 में संचालित होने वाले विभिन्न पाठ्यक्रमों में प्रवेश के लिए प्रवेश प्रक्रिया प्रारम्भ हो गई है। विभिन्न पाठ्यक्रमों में प्रवेश हेतु केवल ऑनलाईन आवेदन ही किये जा सकते हैं। ऑनलाईन आवेदन करने की अंतिम तिथि 25 मई 2015, रात 12.00 बजे तक है। ऑनलाईन आवेदन हेतु www.mponline.gov.in लॉगऑन कर सिटीजन सर्विसेस लिंक पर क्लिक करना होगा। विश्वविद्यालय की वेबसाइट www.mcu.ac.in एवं www.mcu.testbharati.com से भी आवेदन किये जा सकते हैं। विभिन्न पाठ्यक्रमों में प्रवेश हेतु प्रवेश परीक्षा का आयोजन किया जायेगा। इस वर्ष तीन नए पाठ्यक्रम प्रारम्भ किये जा रहे हैं। नए पाठ्यक्रमों में दो वर्षीय एम.एससी. फिल्म प्रोडक्शन तथा एम.ए. न्यू मीडिया कंटेंट डिजाईन तथा तीन वर्षीय बी.बी.ए. ई-कॉमर्स शामिल हैं।

विश्वविद्यालय में सत्र 2015-16 में दो वर्षीय स्नातकोत्तर पाठ्यक्रम के अंतर्गत एम.जे. (पत्रकारिता स्नातकोत्तर), एम.ए.विज्ञापन एवं जनसंपर्क, एम.ए.जनसंचार, एम.ए.प्रसारण पत्रकारिता, एम.एससी. इलेक्ट्रॉनिक मीडिया तथा एम.एससी. मीडिया शोध जैसे पाठ्यक्रम संचालित किये जा रहे हैं। चार वर्षीय बी.टेक. प्रिंटिंग एवं पैकेजिंग, तीन वर्षीय  बी.टेक. प्रिंटिंग एवं पैकेजिंग (लेटरल एंट्री) का पाठ्यक्रम भी उपलब्ध है। तीन वर्षीय स्नातक पाठ्यक्रमों के अंतर्गत बी.ए.जनसंचार, बी.एससी. इलेक्ट्रॉनिक मीडिया, बी.बी.ए. जनसंचार, बी.एससी.ग्राफिक्स एवं एनीमेशन, बी.एससी.मल्टीमीडिया तथा बी.सी.ए. पाठ्यक्रम संचालित किये जा रहे हैं। कम्प्यूटर में स्नातकोत्तर पाठ्यक्रमों के अंतर्गत एमसीए के अतिरिक्त एमसीए (दो वर्षीय- लेटरल एंट्री) पाठ्यक्रम भी संचालित है। साथ ही एकवर्षीय पी.जी.डी.सी.ए. तथा डी.सी.ए. पाठ्यक्रम भी संचालित हो रहा है। मीडिया अध्ययन में एम.फिल. हेतु आवेदन आमंत्रित किये गए हैं। इसके अतिरिक्त विश्वविद्यालय द्वारा मीडिया मैनेजमेंट, विज्ञापन एवं विपणन संचार, मनोरंजन संचार तथा कॉरपोरेट संचार में एम.बी.ए. पाठ्यक्रम संचालित किये जा रहे हैं। एम.बी.ए.पाठ्यक्रमों में प्रवेश हेतु एआईसीटी द्वारा आयोजित सीमेट परीक्षा के माध्यम से किया जाएगा जिसकी काउंसलिंग मध्यप्रदेश तकनीकी शिक्षा संचालनालय द्वारा शीघ्र की जाएगी।

            यह प्रवेश प्रक्रिया विश्वविद्यालय के भोपाल, नोएडा, खंडवा, ग्वालियर एवं अमरकंटक स्थित परिसरों के लिए है। अहर्ताकारी परीक्षा के अंतिम वर्ष की परीक्षा में शामिल ऐसे विद्यार्थी जिनका परीक्षा परिणाम अभी घोषित नहीं हुआ है वे भी प्रवेश हेतु आवेदन कर सकते हैं। प्रवेश हेतु प्रवेश परीक्षा का आयोजन 7 जून 2015 को भोपाल, कोलकाता, जयपुर, पटना, रांची, लखनऊ, नोएडा, रायपुर, खंडवा, इंदौर, ग्वालियर, जबलपुर एवं अनूपपुर केन्द्रों पर किया जायेगा। इस वर्ष विभिन्न पाठ्यक्रमों की प्रवेश परीक्षा हेतु केवल ऑनलाईन आवेदन किया जा सकता है। ऑनलाईन आवेदन हेतु www.mponline.gov.in पर लॉगऑन कर सिटीजन सर्विसेस लिंक पर क्लिक करें। अधिक जानकारी के लिए विवरणिका और आवेदन पत्र हेतु विश्वविद्यालय की वेबसाइट www.mcu.ac.in एवं www.mcu.testbharati.com पर लॉगऑन करें या किसी भी परिसर में पधारें अथवा फोन/ईमेल करें 0755-2553523 (भोपाल), 0120-4260640 (नोएडा), 0733-2248895 (खंडवा), 0751-2343665 (ग्वालियर). ईमेल – mcu.pravesh@gmail.com. विश्वविद्यालय के सभी पाठ्यक्रम रोजगारोन्मुखी हैं एवं मीडिया के क्षेत्र में रोजगार के बेहतर अवसर उपलब्ध कराते हैं।
(डॉ पवित्र श्रीवास्तव)
निदेशक-जनसंपर्क 

मुंबई के रेसकोर्स में मुख्यमंत्री और भैयाजी जोशी की उपस्थिति में विशाल धर्मसभा

 मुंबई। महालक्ष्मी रेसकोर्स में होनेवाली धर्म सभा में करीब 50 हजार से भी ज्यादा अनुसूचित जाति, जनजाति एवं इतर समाज के लोग भाग लेंगे। रेसकोर्स में मंगलवार (21 अप्रेल) को होनेवाली इस विशाल धर्म सभा की सारी तैयारियां पूरी हो गई हैं। सामाजिक समरसता मंच की धर्म सभा में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरकार्यवाह भैयाजी जोशी शाम के सत्र में विशेष रूप से उपस्थित होंगे। मंगलवार को सुबह 9 बजे महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस द्वारा इस धर्मसभा में अविचल स्तंभ सवरा मंडप की सत्य की डोरी का ध्वजारोहण किया जाएगा। मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस द्वारा रेसकोर्स के पोलो ग्राउंड पर सुबह 9 बजे सवरा मंडप में ध्वजारोहण के साथ ही कार्यक्रमों की शुरूआत हो जाएगी। सुबह भी बड़ी संख्या में लोग उपस्थित होंगे। 

इस धर्मसभा के पावन अवसर पर मुंबई मेघवाल पंचायत द्वारा आयोजित सामूहिक विवाह कार्यक्रम में 50 जोड़े एक साथ परिणय बंधन में बंधेंगे। शाम 5 बजे से शुरू होनेवाली विशेष धर्म सभा में अनुसूचित जाति, जनजाति एवं इतर समाज के सभी प्रमुख संतों की बड़ी संख्या में उपस्थिति रहेगी। मुंबई में अनुसूचित जाति, जनजाति एवं इतर समाज का यह सबसे बड़ा धार्मिक आयोजन होगा। पूरे दिन चलनेवाले विभिन्न आयोजनों में महाराष्ट्र के सामाजिक न्यायमंत्री राजकुमार बडोले एवं सामाजिक न्याय राज्यमंत्री दिलीप कांबले सहित सामाजिक समरसता मंच के अखिल भारतीय संयोजक भीकूजी इदाते भी उपस्थित होंगे। इस अवसर पर महिलाओं के लिए विशेष हेल्थ चेकअप कैंप का भी आयोजन किया गया है। देश भर से आए हुए संतों की शोभा यात्रा सुबह 6 बजे तुलसीवाड़ी से शुरू होकर रेसकोर्स पहुंचेगी। इस शोभायात्रा में बड़ी संख्या में संतों के साथ साथ धार्मिक श्रद्धालू भी हिस्सा लेंगे।  सामाजिक विकास के लिए ‘एक सोच, एक दिशा’ के उद्देश्य लिए हो रहे इस विशाल सामाजिक आयोजन में सभा स्थल पर सुबह 9 बजे से समरसता यज्ञ शुरू होगा। इस मौके पर सामाजिक विकास के लिए चलाए जा रहे सरकारी योजनाओं एवं कार्यक्रमों की जानकारी देने के लिए रेसकोर्स में 30 से भी ज्यादा स्टॉल लगाए जा रहे हैं। इन स्टॉल्स पर अनुसूचित जाति, जनजाति एवं इतर समाज के विकास के लिए चलाई जा रही विभिन्न सरकारी योजनाओं की जानकारी लोगों को दी जाएगी। सभा स्थल पर पहुंचने के लिए महालक्ष्मी स्टेशन से बसों का विशेष इंतजाम किया गया है।

संपर्क 
पंंकज पाठक 
09167978358

मोदीजी भारतमाला से जोड़ेंगे पूरब से पश्चिम के भारत को

अटल बिहारी वाजपेयी ने स्वर्णिम चतुर्भुज बनाने का कदम बढ़ाया था। नरेंद्र मोदी भारतमाला बनाना चाहते हैं। भारतमाला मोदी सरकार की एक महत्वाकांक्षी योजना का नाम है। इसके तहत भारत के पूरब से पश्चिम तक यानी मिजोरम से गुजरात तक सीमावर्ती इलाकों में सड़क बनाई जाएगी। इस पर करीब 14,000 करोड़ रुपये खर्च होंगे। इस सड़क को महाराष्ट्र से पश्चिम बंगाल तक तटीय राज्यों में एक रोड नेटवर्क से जोड़ा जाएगा।
 
सड़क परिवहन और राजमार्ग सचिव विजय छिब्बर ने ईटी को बताया, 'हमारी योजना अपनी सीमाओं, खासतौर से उत्तरी सीमाओं पर सड़कें बनाने की है। हमने इसे भारतमाला नाम दिया है।' छिब्बर ने बताया कि सभी जरूरी मंजूरियां मिल जाने पर इस साल काम शुरू हो सकता है। मोदी का इस प्रॉजेक्ट पर खास जोर है, लिहाजा मंत्रालय को उम्मीद है कि अगले कुछ महीनों में एक विस्तृत प्रॉजेक्ट रिपोर्ट तैयार कर ली जाएगी।
 
अधिकारियों ने बताया कि सरकार को पूरब से पश्चिम तक भारत की पूरी सीमा को कवर करने के लिए लगभग 5,300 किमी की नई सड़कें बनानी होंगी और इस पर 12,000-14,000 करोड़ रुपये का खर्च आएगा। सरकार को पांच साल में यह प्रॉजेक्ट पूरा करने की उम्मीद है। इसका काम गुजरात और राजस्थान से शुरू होगा। फिर पंजाब और जम्मू-कश्मीर, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड का नंबर आएगा। इसके बाद उत्तर प्रदेश और बिहार के तराई क्षेत्र में काम पूरा करने के बाद सिक्किम, असम, अरुणाचल प्रदेश से होते हुए मणिपुर और मिजोरम में भारत-म्यांमार बॉर्डर तक सड़कें बनाई जाएंगी।
 
 
 
भारतमाला प्लान में रणनीतिक पहलू भी है। इससे सीमावर्ती इलाकों से बेहतर संपर्क संभव होगा, जिनके एक बड़े हिस्से के उस पार चीन का शानदार रोड इंफ्रास्ट्रक्चर है। सड़कें बेहतर होने पर मिलिट्री ट्रांसपोर्ट बेहतर हो सकेगा। अधिकारियों ने कहा कि ये सड़कें बन जाने पर बॉर्डर ट्रेड भी बढ़ेगा। साथ ही, कई राज्यों में बेहतर सड़कों से आर्थिक गतिविधियों में तेजी आएगी। इस योजना में सड़कों का ज्यादातर हिस्सा पहाड़ी राज्यों में बनेगा, जहां संपर्क और आर्थिक गतिविधियों का मामला कमजोर है।
 
सड़क परिवहन विभाग का कहना है कि इसमें फंडिंग की दिक्कत नहीं आएगी क्योंकि उसे हर साल कम से कम एक लाख करोड़ रुपये खर्च करने का अधिकार दिया गया है। विभाग का हालांकि मानना है कि जमीनों का अधिग्रहण और पर्यावरण से जुड़ी मंजूरियां हासिल करना चुनौती भरा होगा। विजय छिब्बर ने कहा कि भारतमाला एक तरह से एक और बड़े प्रॉजेक्ट सागरमाला को भी जोड़ेगा। सागरमाला के तहत बंदरगाहों और तटीय इलाकों को रेल और रोड नेटवर्क के जरिये देश के भीतरी क्षेत्रों से जोड़ने का प्लान है।
 
 
 
भूकंप की त्रासदी झेल रहे नेपाल से भारत ने स्पेन के 71 नागरिकों सहित 15 देशों के 170 नागरिकों को बाहर निकाला है। यमन के बाद अब नेपाल में इस व्यापक राहत अभियान के लिए अमेरिका ने भारत की तारीफ की है।
साभार- इकॉनामिक टाईम्स से 

​”कवि एक रंग अनेक “कार्यक्रम संपन्न

 नई दिल्ली। इंडिया हैबिटैट सेंटर के अमलतास सभागार में साक्षी संस्था की और से ​​"कवि एक रंग अनेक "कार्यक्रम आयोजित किया गया जिसमे सुप्रसिद्ध कवि ग़ज़लकार लक्ष्मी शंकर वाजपेयी ने कविता की 11  विधाओं में रचना पाठ किया।  कार्यक्रम का शुभारम्भ साक्षी संस्था की अध्यक्ष डॉक्टर मृदुला टंडन के स्वागत भाषण और दीप  प्रज्ज्वलन से हुआ जिसमे पद्म भूषण सुभाष कश्यप , पद्मश्री आलोक मेहता , डॉक्टर एच के कौल , विदेश मंत्रालय की सुनीति शर्मा , ममता किरण आदि शामिल हुए। 

कवि का परिचय देते हुए कवयित्री  अलका सिन्हा ने श्री वाजपेयी की अनेक उपलब्धियों पर प्रकाश डाला जिनमे वेनेज़ुएला के विश्व कविता महोत्सव में भारत के एकमात्र प्रतिनिधि के रूप में उनकी भागीदारी तथा लंदन में अंतर्राष्ट्रीय वातायन कविता सम्मान प्रमुख थीं। इस अवसर पर काव्यपाठ से पूर्व श्री वाजपेयी ने कहा कि जिस तरह संगीत में  हमारी चिंता कुछ साज़ों और रागों को बचाने की है  उसी तरह कविता की अनेक श्रेष्ठ विधाओं को विलुप्त होने से बचाने की होनी चाहिए ।  अनेक विधाओं में लेखन तो हो रहा है पर उनका समुचित मूल्यांकन नहीं हो रहा। तत्पश्चात श्री वाजपेयी ने गीत ,ग़ज़ल , दोहा ,छंदमुक्त कविता , हाइकू , माहिया , घनाक्षरी , सवैया ,मुक्तक ,पद , क्षणिका , नवगीत , कुंडली आदि अनेक विधाओं में कवितापाठ किया।

श्री वाजपेयी की कुछ ग़ज़लों का सुप्रसिद्ध ग़ज़ल गायक शकील अहमद ने गायन किया। इन  ताज़ी रची हुई ग़ज़लों को  श्रोताओं ने भरपूर सराहा और पसंद किया. शकील अहमद की गायकी ने ईस शाम में मौसिकी के खूबसूरत रंग भर दिए.  पूरी तरह भरे इस सभागार में विख्यात थिसॉरस लेखक अरविन्द कुमार फिल्म निर्माता लवलीन थडानी ,लेखिका शीला झुनझुनवाला,चित्रकार संगीता गुप्ता, आकाशवाणी दिल्ली के निदेशक राजीव शुक्ल  समेत अनेक प्रतिष्ठित विभूतियां उपस्थित थीं।

संपर्क
Shailesh Nevatia+91-9716549754

जीवन को स्वस्थ कैसे बनाएँ

1- 90 प्रतिशत रोग केवल पेट से होते हैं। पेट में कब्ज नहीं रहना चाहिए। अन्यथा रोगों की कभी कमी नहीं रहेगी।
2- कुल 13 असाधारणीय शारीरिक वेग होते हैं । उन्हें रोकना नहीं चाहिए ।।
3-160 रोग केवल मांसाहार से होते है
4- 103 रोग भोजन के बाद जल पीने से होते हैं। भोजन के 1 घंटे बाद ही जल पीना चाहिये।
5- 80 रोग चाय पीने से होते हैं।
6- 48 रोग ऐलुमिनियम के बर्तन या कुकर के खाने से होते हैं।
7- शराब, कोल्डड्रिंक और चाय के सेवन से हृदय रोग होता है।
8- अण्डा खाने से हृदयरोग, पथरी और गुर्दे खराब होते हैं।
9- ठंडेजल (फ्रिज)और आइसक्रीम से बड़ीआंत सिकुड़ जाती है।
10- मैगी, गुटका, शराब, सूअर का माँस, पिज्जा, बर्गर, बीड़ी, सिगरेट, पेप्सी, कोक से बड़ी आंत सड़ती है।
11- भोजन के पश्चात् स्नान करने से पाचनशक्ति मन्द हो जाती है और शरीर कमजोर हो जाता है।
12- बाल रंगने वाले द्रव्यों(हेयरकलर) से आँखों को हानि (अंधापन भी) होती है।
13- दूध(चाय) के साथ नमक (नमकीन पदार्थ) खाने से चर्म रोग हो जाता है।
14- शैम्पू, कंडीशनर और विभिन्न प्रकार के तेलों से बाल पकने, झड़ने और दोमुहें होने लगते हैं।
15- गर्म जल से स्नान से शरीर की प्रतिरोधक शक्ति कम हो जाती है और शरीर कमजोर हो जाता है। गर्म जल सिर पर डालने से आँखें कमजोर हो जाती हैं।
16- टाई बांधने से आँखों और मस्तिश्क हो हानि पहुँचती है।
17- खड़े होकर जल पीने से घुटनों(जोड़ों) में पीड़ा होती है।
18- खड़े होकर मूत्रत्याग करने से रीढ़ की हड्डी को हानि होती है।
19- भोजन पकाने के बाद उसमें नमक डालने से रक्तचाप (ब्लडप्रेशर) बढ़ता है।
20- जोर लगाकर छींकने से कानों को क्षति पहुँचती है।
21- मुँह से साँस लेने पर आयु कम होती है।
22- पुस्तक पर अधिक झुकने से फेफड़े खराब हो जाते हैं और क्षय(टीबी) होने का डर रहता है।
23- चैत्र माह में नीम के पत्ते खाने से रक्त शुद्ध हो जाता है मलेरिया नहीं होता है।
24- तुलसी के सेवन से मलेरिया नहीं होता है।
25- MUNG प्रतिदिन खाने से व्यक्ति अनेक रोगों से मुक्त रहता है।
26- अनार आंव, संग्रहणी, पुरानी खांसी व हृदय रोगों के लिए सर्वश्रेश्ठ है।
27- हृदयरोगी के लिए अर्जुनकी छाल, लौकी का रस, तुलसी, पुदीना, मौसमी, सेंधा नमक, गुड़, चोकरयुक्त आटा, छिलकेयुक्त अनाज औशधियां हैं।
28- भोजन के पश्चात् पान, गुड़ या सौंफ खाने से पाचन अच्छा होता है। अपच नहीं होता है।
29- अपक्व भोजन (जो आग पर न पकाया गया हो) से शरीर स्वस्थ रहता है और आयु दीर्घ होती है।
30- मुलहठी चूसने से कफ बाहर आता है और आवाज मधुर होती है।
31- जल सदैव ताजा (चापाकल, कुएं आदि का) पीना चाहिये, बोतलबंद (फ्रिज) पानी बासी और अनेक रोगों के कारण होते हैं।
32- नीबू गंदे पानी के रोग (यकृत, टाइफाइड, दस्त, पेट के रोग) तथा हैजा से बचाता है।
33- चोकर खाने से शरीर की प्रतिरोधक शक्ति बढ़ती है। इसलिए सदैव गेहूं मोटा ही पिसवाना चाहिए।
34- फल, मीठा और घी या तेल से बने पदार्थ खाकर तुरन्त जल नहीं पीना चाहिए।
35- भोजन पकने के 48 मिनट के अन्दर खा लेना चाहिए । उसके पश्चात् उसकी पोशकता कम होने लगती है। 12 घण्टे के बाद पशुओं के खाने लायक भी नहीं रहता है।। 
36- मिट्टी के बर्तन में भोजन पकाने से पोशकता 100% कांसे के बर्तन में 97% पीतल के बर्तन में 93% अल्युमिनियम के बर्तन और प्रेशर कुकर में 7-13% ही बचते हैं।
37- गेहूँ का आटा 15 दिनों पुराना और चना, ज्वार, बाजरा, मक्का का आटा 7 दिनों से अधिक पुराना नहीं प्रयोग करना चाहिए।
38- मनष्य को मैदे से बनीं वस्तुएं (बिस्कुट, ब्रेड, पीज़ा समोसा आदि)
कभी भी नहीं खाना चाहिए।
39- खाने के लिए सेंधा नमक सर्वश्रेष्ठ होता है उसके बाद काला नमक का स्थान आता है। सफेद नमक जहर के समान होता है।
40- जल जाने पर आलू का रस, हल्दी, शहद, घृतकुमारी में से कुछ भी लगाने पर जलन ठीक हो जाती है और फफोले नहीं पड़ते।
41- सरसों, तिल,मूंगफली या नारियल का तेल ही खाना चाहिए। देशी घी ही खाना चाहिए है। रिफाइंड तेल और
वनस्पति घी (डालडा) जहर होता है।
42- पैर के अंगूठे के नाखूनों को सरसों तेल से भिगोने से आँखों की खुजली लाली और जलन ठीक हो जाती है।
43- खाने का चूना 70 रोगों को ठीक करता है।
44- चोट, सूजन, दर्द, घाव, फोड़ा होने पर उस पर 5-20 मिनट तक चुम्बक रखने से जल्दी ठीक होता है।
हड्डी टूटने पर चुम्बक का प्रयोग करने से आधे से भी कम समय में ठीक होती है।
45- मीठे में मिश्री, गुड़, शहद, देशी (कच्ची) चीनी का प्रयोग करना चाहिए सफेद चीनी जहर होता है।
46- कुत्ता काटने पर हल्दी लगाना चाहिए।
47-बर्तन मिटटी के ही परयोग करन चाहिए।
48- टूथपेस्ट और ब्रश के स्थान पर दातून और मंजन करना चाहिए दाँत मजबूत रहेंगे ।
(आँखों के रोग में दातून नहीं करना)
49- यदि सम्भव हो तो सूर्यास्त के पश्चात् न तो पढ़े और लिखने का काम तो न ही करें तो अच्छा है ।
50- निरोग रहने के लिए अच्छी नींद और अच्छा(ताजा) भोजन अत्यन्त आवश्यक है।
51- देर रात तक जागने से शरीर की प्रतिरोधक शक्ति कमजोर हो जाती है। भोजन का पाचन भी ठीक से नहीं हो पाता है आँखों के रोग भी होते हैं।
52- प्रातः का भोजन राजकुमार के समान, दोपहर का राजा और देर रात्रि का भिखारी के 
समान ।

मूल्य आधारित शिक्षा ने ही सुपर-30 को सफल बनाया- आनंद कुमार

भोपाल। मानवीय मूल्यों ने अनेक जिंदगियां बदली हैं और इसका उदाहरण सुपर-30 है। मूल्य आधारित शिक्षा ने ही सुपर-30 को सफल बनाया है। आई.आई.टी. जैसे प्रतिष्ठित परीक्षा में अब तक 360 बच्चों में से 308 बच्चों ने आई.आई.टी. की परीक्षा में क्वालीफाई किया। इसका मुख्य कारण यह है कि हमारे संस्थान में जीवन मूल्यों को ध्यान में रखकर शिक्षा प्रदान की जाती है। शिक्षक किसी बड़े राजनेता से बड़ा परिवर्तन ला सकता है। यह विचार विधानसभा परिसर में चल रहे ‘‘मूल्य आधारित जीवनशैली’’ विषयक अंतरराष्ट्रीय संविमर्श में विश्वविख्यात शिक्षण संस्थान सुपर-30 के संचालक आनंद कुमार ने व्यक्त किए।      

परिसंवाद के दूसरे दिन आज विभिन्न विषयों में समानांतर सत्र हुए। ‘‘मूल्य आधारित उच्च एवं व्यावसायिक शिक्षा’’ विषयक सत्र में बोलते हुए श्री आनंद कुमार ने कहा कि गरीब एवं निर्धन वर्ग के बच्चे में गहरे मानवीय मूल्य एवं संस्कार देखने को मिलते हैं। इसका उदाहरण इस बात से मिलता है कि सुपर-30 से निकले समस्त विद्यार्थी आज उच्च संस्थानों में कार्यरत हैं। इनमें से अनेक लोगों ने विवाह किया, परंतु दहेज किसी ने भी नहीं लिया। आनंद कुमार ने सुपर-30 से निकले अनेक बच्चों की सफलता की कहानी सुनाते हुए उसमें समाहित मूल्यों की ओर इशारा किया।      सार्वजनिक जीवन में मूल्यनिष्ठता विषय पर बोलते हुए वरिष्ठ फिल्मकार श्री चंद्रप्रकाश द्विवेदी ने कहा कि लोग सार्वजनिक जीवन में जैसे होते हैं वैसे व्यक्तिगत जीवन में नहीं होते हैं। मूल्य आचरण का हिस्सा होना चाहिए, मूल्य परखता के लिए आवश्यकता है कि हम मूल्यों को अपने जीवन में उतारकर ही मूल्यों की बात कर सकते हैं। वरिष्ठ आई.पी.एस. अधिकारी पवन जैन ने कहा कि प्रगतिशील होने का अर्थ यह नहीं कि हम संवेदनहीन हो जाएं। अच्छे चरित्र से ही अच्छे घर, परिवार, समाज एवं राष्ट का निर्माण होता है।      

पारिवारिक एवं सामाजिक जीवन में मूल्य उन्मुक्तता विषय पर बोलते हुए वरिष्ठ साहित्यकार श्रीमती उर्मिला शिरीष ने कहा कि मूल्यों को सीखने की इच्छा होनी चाहिए। श्री सुब्रमण्यम भट्ट ने कहा कि मूल्यों का निर्माण घर, विद्यालय, मंदिर और समाज में होता है। जिस तरह किसी नदी का लक्ष्य समुद्र से मिलना होता है उसी तरह देवत्व को प्राप्त करना ही मनुष्य लक्ष्य होना चाहिए। मूल्यों की आधारभूत संकल्पना विषयक सत्र में बोलते हुए श्री दीनानाथ बत्रा जी ने कहा कि इस भौतिक जगत में मानवीय ऊँंचाईयों को प्राप्त करना मानव का लक्ष्य होना चाहिए। आध्यात्मिक जगत की गहराई में जाकर धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष प्राप्त किए जा सकते हैं। प्राणों में संतुलन, मन सतविचारी, आत्मदृष्टि संतुलित व प्राणी को विवेकशील होना चाहिए। महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय के कुलाधिपति प्रो. कपिल कपूर ने कहा कि जीवन नियमों के अनुरूप जीना चाहिए। नियम अपने आप नहीं बनते उनके लिए प्रयासरत होना पड़ता है, उन्हें ग्रहण करना पड़ता है। आदि शंकराचार्य ने अपनो सम्पूर्ण जीवन ज्ञान प्राप्ति के लिए लगाया है। शिक्षाविद् श्री अतुल कोठारी ने कहा कि देश को बदलने के लिए शिक्षा को बदलना जरूरी है। भारत की शिक्षा, भारत के लिए भारतीय मूल्यों पर आधारित होना चाहिए। हमें शिक्षा का उद्देश्य एवं जीवन का उद्देश्य एक ही रखना चाहिए। इस सत्र में अमेरिका से पधारे प्रो. लेन वेंगर ने भारतीय योग एवं आध्यात्म के महत्व को रेखांकित करते हुए कहा कि भारत ने दुनिया के सामने योग एवं आध्यात्म का ज्ञान प्रस्तुत किया है। मूल्यों की स्थापना में भी भारत एवं भारतीय ज्ञान को आगे लाना होगा।       

मेडिकल चिकित्सा में मूल्य परकता पर बोलते हुए पद्मश्री डॉ. ज्ञान चतुर्वेदी ने कहा कि कितने बुरे दिन आ गए हैं कि चिकित्सा में मूल्यों की बात करनी पड़ रही है। जबकि अवधारणा यह है कि चिकित्सा मूल्य पर ही आधारित होती है। उन्होंने कहा कि चिकित्सा के लिए संवेदनशील होना बहुत जरूरी है। इस विषय पर डॉ. बालकृष्ण जैन, डॉ. कांतिलाल सचैती, डॉ. वी.के. गोस्वामी, डॉ. उदयन वाजपेयी, डॉ. दिग्पाल धारकर, डॉ. मनोहर भण्डारी, डॉ. शैलेन्द्र भण्डारी, डॉ. सूर्यप्रकाश धनेरिया ने अपने-अपने व्याख्यान में बताया कि कि तरह से चिकित्सा सेवाओं में मूल्यनिष्ठा को बढ़ाया जा सकता है। विद्वानों ने अपने वक्तव्यों में कहा कि मेडिकल चिकित्सा शिक्षा में भी सुधार की आवश्यकता है। चिकित्सा के साथ-साथ नैतिक शिक्षा के पार्ट भी शामिल करने होंगे। मूल्य आधारित शासन एवं प्रशासन व्यवस्था विषयक सत्र में बोलते हुए श्री पवन सिन्हा ने कहा कि मूल्य साधन एवं साध्य दोनों है। राष्ट्र के प्रशासन में यदि सत्ता पर विराजमान व्यक्ति यदि मूल्य आधारित शैली को नहीं अपनाएंगे तो लोक भटक जाएगा। मूल्यों की स्थापना के लिए शिक्षाविद्, वैज्ञानिक व शास्त्री एक रोडमेप, एक सिद्धान्त दे सकते हैं परंतु इसे लागू करने की व्यवस्था कार्यपालिका और समाज को करनी होगी।      

जनसंचार माध्यमों एवं सूचना प्रौद्योगिकी में मूल्य उन्मुक्तता विषयक सत्र में बोलते हुए वरिष्ठ पत्रकार श्री राजेश बादल ने कहा कि बाजार आधारित अर्थव्यवस्था के दबावों के बीच पत्रकार बारह घण्टे से अधिक समय मीडिया संस्थानों में बिता रहा है। ऐसे समय में मूल्यों को कितना बचा पाएगा यह सोचने का विषय है। वर्तमान दौर में मूल्यों की नीव जनचेतना से ही बन सकती है। साधना के सम्पादक श्री मुकेश शाह ने कहा कि पत्रकार को मूल्यों की रक्षा करे हुए अपना पत्रकारिता धर्म निभाना चाहिए। मध्यप्रदेश के सूचना आयुक्त श्री आत्मदीप ने कहा कि अब समय आ गया है कि मीडिया आयोग देश में बनाया जाए। कोलकाता विश्वविद्यालय की प्रो. ताप्ती बसु ने मूल्य आधारित शिक्षा पर अपने विचार रखे। हैदराबाद विश्वविद्यालय की प्रोफेसर डॉ. कंचन मलिक ने सामुदायिक मीडिया के माध्यम से मूल्यों की स्थापना की वकालत की। हरियाणा से पधारे वरिष्ठ पत्रकार श्री अनिल आर्या ने कहा कि मीडिया संस्थानों में विज्ञापनों के दबाव के कारण मूल्यों में गिरावट आई है। मालिकों का हित देखना आज मीडिया की सबसे बड़ी समस्या है। प्रो. बृज किशोर कुठियाला ने कहा कि मीडिया एवं आई.टी. में मूल्यों को समग्रता से देखने की आवश्यकता होती है। समाचार लेखन से लेकर मुद्रण तक तथा इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में समाचार के निर्माण से लेकर उसके प्रसारण तक की प्रक्रिया में मूल्य निहित होते हैं। इन मूल्यों को आत्मसात करने एवं इन्हें लागू करने की आवश्यकता है। इस सत्र में दो पुस्तकों का विमोचन किया गया। पत्रकारिता विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित संगोष्ठी प्रतिवेदन ‘‘संचार एवं सूचना प्रौद्योगिकी में मूल्यनिष्ठता’’ तथा विश्वविद्यालय की त्रैमासिक गृह पत्रिका एम.सी.यू. समाचार का विमोचन किया गया।       

परिसंवाद में ‘‘मूल्यों की सार्वभौमिकता’’ विषयक सत्र में प्रो. त्रिभुवननाथ शुक्ल तथा श्री प्रियव्रत शुक्ल ने अपने विचार रखे। पारिवारिक एवं सामाजिक जीवन में मूल्योन्मुखता विषयक सत्र में वरिष्ठ साहित्यकार प्रो. विजयबहादुर सिंह तथा ‘‘न्याय एवं विधि क्षेत्र में मूल्य निष्ठता’’ विषय पर न्यायमूर्ति डी.एम.धर्माधिकारी ने अपने विचार रखे। परिसंवाद का समापन कल 19 अप्रैल 2015 को दोपहर 12.00 बजे सम्पन्न होगा। समापन सत्र के मुख्य अतिथि अखिल विश्व गायत्री परिवार के निदेशक एवं देव संस्कृति विश्वविद्यालय, हरिद्वार के कुलपति डॉ. प्रणव पण्ड्या होंगे। समापन सत्र की अध्यक्षता मध्यप्रदेश के माननीय मुख्यमंत्री श्री शिवराज सिंह चैहान करेंगे।  (डॉ. पवित्र श्रीवास्तव) निदेशक, जनसंपर्क

नेपाल में राहत कार्य में भारत ने चीन को पछाड़ा

नेपाल में आए भीषण भूकंप के कुछ ही घंटों के भीतर वहां बड़े पैमाने पर भारत की ओर से राहत और बचाव कार्य शुरू कर दिए गए थे । भारत वहां किसी भी दूसरे देश की तुलना में व्यापक पैमाने पर बचाव और राहत अभियान में जुटा है। चीन, जो नेपाल में निवेश के मामले में भारत को 2014 में ही पछाड़ चुका है, अब मानवीय सहयाता के इस काम में भारत से कदम मिलाने के लिए संघर्ष कर रहा है।
 
नेपाल त्रासदी में भारतीय मदद काफी व्यापक है और यह तत्काल सभी क्षेत्रों में मुहैया कराई गई। पिछले कुछ समय में कई बड़े राहत अभियान (एशियाई सूनामी, लीबिया, इराक और हाल ही में यमन) चलाने की वजह से भारत की छवि मुसीबत के समय दोस्ती निभाने वाले देश की बनी है। लीबिया संकट के समय 2011 में चीन ने जहाज भेजकर संघर्ष वाले क्षेत्रों से अपने नागरिकों को निकाल लिया था। कुछ सप्ताह पहले युद्धग्रस्त यमन में भारत ने अपने 4 हजार नागरिकों के अलावा 32 देशों के लोगों को वहां से निकालने में कामयाब रहा था। दूसरी तरफ चीन ने एक बार फिर विमान और जहाज भेजकर अपने नागरिकों को निकाल लिया।
 
नेपाल में भारत और चीन की मौजूदगी भू-राजनीतिक लिहाज से भी महत्वपूर्ण है। यही वजह है कि वहां की सरकार अपने बयानों में संतुलन बनाकर चल रही है और यहां तक कि जरूरत होने के बावजूद ताइवान की मदद को ठुकरा दिया है। चीन की सरकार नेपाल में भारत के साथ स्वाभाविक तुलना से बचना चाह रही है। पेइचिंग में एक सवाल के जवाब में चीनी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ने कहा, 'चीन और भारत नेपाल के पड़ोसी हैं। हम एक साथ वहां काम करना चाहेंगे और भारत के साथ सकारात्मक समन्वय बनाते हुए नेपाल को कठिनाइयों से निकलने और देश के पुनर्निमाण में मदद करेंगे।'
 
इसमें कोई आश्चर्यजन बात नहीं है कि भकूंप के बाद भारतीय राहत दल सबसे पहले नेपाल पहुंच गया था। भारत नेपाल के सिस्टम और वहां के लोगों से भलीभांति परिचित है। राजनीतिक कारणों से भी यह अपेक्षित था कि भारत मदद के साथ तेजी से पहुंचेगा खासकर तब जब वह यह चाहता हो कि चीन और माओवादियों को वहां जमने का मौका न दिया जाए। दरअसल, अगर भारत जो कुछ भी कर रहा है, वो नहीं करता तो आश्चर्य का विषय होता।
 
भारतीय सहायता का पूरे नेपाल में दिल खोलकर स्वागत किया जा रहा है, भारत भी अतीत के अनुभवों से बहुत कुछ सीखता हुआ दिख रहा है। हालांकि, भारत की इस दरियादिली का असर वहां लोगों के दिलो-दिमाग पर पड़ेगा या नहीं अभी इस बारे में कुछ भी पक्के तौर पर नहीं कहा जा सकता है। नेपाल में निवेश के मामले में चीन भारत को 2014 में ही पीछे छोड़ चुका है खासकर इंफ्रास्ट्रक्चर और पावर सेक्टर में। नेपाल-चीन का व्यापार भी पिछले कुछ समय भारत-नेपाल व्यापार से ज्यादा है।
 
तिब्बत के शरणार्थियों को लेकर नरम रुख की वजह से चीन काठमांडू की आलोचना करता रहा है, लेकिन मोटे तौर पर चीन की मौजूदगी का वहां स्वागत ही होता रहा है। संभावना यह भी है कि राहत कार्य खत्म होने के बाद पुनर्वास और पुनर्निमाण के काम में भारत से ज्यादा चीन की मौजूदगी दिखेगी। इस मामले में भारत का ट्रैक रिकॉर्ड कमजोर है और चीन का पलड़ा भारी है। तय समय में इंफ्रास्ट्रक्चर प्रॉजेक्ट्स को पूरा करने में चीन की प्रतिष्ठा भारत से ज्यादा है। भारत पारंपरिक रूप से यहां कमजोर रहा है और इस मामले में अब तक बहुत कुछ बदला नहीं है।
 
अब तक केवल एक पड़ोसी देश अफगानिस्तान में भारत जमीन पर कुछ करके दिखाने में सफल रहा है। यहां तक कि म्यांमार में भारत गड़बड़ा गया था। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या नेपाल में भारत दूसरी कहानी लिख पाएगा?

 
साभार- इकॉनामिक टाईम्स से

जानने के हक़ की ज़ंग के लिए ज़ज़्बे की ज़रुरत

जनता को सूचना का कानूनी अधिकार भले ही दे दिया है पर इससे इंकार किया जाना मुश्किल है कि अभी भी आम जनता तो क्या विभागों के लोक सूचना अधिकारियों तक में इस कानून की जानकारी और जागरूकता का अभाव है। मिसाल के तौर पर राजस्थान में कराए गए एक सर्वेक्षण के अनुसार वहाँ 18 प्रतिशत लोक सूचना अधिकारियों (पीआईओ) को इसके आवेदन फार्म तक की जानकारी नहीं है और तो और केवल 20 प्रतिशत पीआईओ को पता है कि इस नए कानून के तहत उन्हें पीआईओ के रूप में जनता और अपने विभाग के बीच सूचना के आदान-प्रदान का माध्यम बनाया गया है।

रपट के बारे में सूचना के अधिकार के अधिकार की जानकारी जिन लोगों को है उनमें से बहुत कम लोग इसका उपयोग कर रहे हैं। बाजार प्रतिस्पर्धा और उपभोक्ता मामलों पर अध्ययन एवं परामर्श सेवा देने वाले गैर सरकारी संगठन कट्स इंटरनेशनल ने महात्मा गाँधी रोजगार गारंटी योजना, स्वर्ण जयंती ग्राम स्वरोजगार योजना और इंदिरा आवास योजना में भ्रष्टाचार का पता लगाने और इसे रोकने के लिए आरटीआई के उपयोग और प्रभाव जानने के लिए एक सर्वेक्षण किया। यह सर्वेक्षण राजस्थान के शहरी और अर्धशहरी इलाकों में किया गया।

कट्स की इस रिपोर्ट को प्रस्तुत करने वाले मधुसूदन शर्मा ने कहा कि इन योजनाओं में 78 प्रतिशत पीआईओ ने कहा कि उन्हें इस कानून की जानकारी है, पर उनमें से ज्यादातर ने इस अधिनियम के तहत सूचना उपलब्ध कराने में उदासीनता दिखाई। कट्स की सर्वे रिपोर्ट की जानकारी देते हुए संस्था के निदेशक जॉर्ज चेरियन ने बताया कि जयपुर और टोंक जिलों में संस्था इस सर्वेक्षण में मात्र 37 प्रतिशत लोगों ने बताया कि उन्होंने सूचना के अधिकार (आरटीआई) के बारे में सुना है, जबकि इनमें से 5-6 प्रतिशत लोग ही इसका उपयोग कर रहे हैं।

राजस्थान में मात्र 26 प्रतिशत लोग जानते हैं कि आरटीआई के लिए कोई आवेदन फार्म भी होता है। जबकि सिर्फ सात आठ प्रतिशत लोग ही ऐसे हैं, जिन्हें आरटीआई के तहत 30 दिन में जवाब मिलने की समय सीमा अथवा सूचना न मिलने पर प्रथम अथवा द्वितीय अपीलीय अधिकारी की जानकारी है। रिपोर्ट के मुताबिक 43 लोगों ने कहा कि भ्रष्टाचार रोकने में आरटीआई एक सक्षम हथियार हो सकता है। 39 प्रतिशत ने कहा कि यह कानून लागू होने से सरकार की योजनाओं में पारदर्शिता आई है।

सर्वे में शामिल किए गए लोगों ने कहा कि निगरानी की कमी, बड़े अधिकारों के ध्यान न देने और जनभागीदारी के अभाव में नरेगा, इंदिरा आवास योजना और स्वण जयंती ग्राम स्वरोजगार योजना जैसे कार्यक्रमों में भ्रष्टाचार को जन्म मिलता है। श्री चेरियन ने कहा कि सूचना के अधिकार के साथ-साथ जबावदेही का अधिकार भी होना चाहिए, ताकि सरकार के हर स्तर पर सेवाओं की आपूर्ति सुनिश्चित कराई जा सके। राजस्थान सरकार के प्रशासनिक सुधार विभाग के उपसचिव श्री एसपी बस्वाला ने कहा कि नरेगा और इंदिरा आवास जैसी योजनाओं में जन-भागीदारी बहुत जरूरी है। कहा गया है कि आम लोगों को उनके अधिकारों की प्रति जागरूक किया जाएगा, तभी कल्याणकारी योजनाओं को कारगर तरीके से लागू किया जा सकता है। 

इधर सूचना के अधिकार पर केंद्रित योजना आयोग को विजन फाऊंडेशन द्वारा पूर्व में सौंपे गए दस्तावेज के अनुसार संविधान के अनुच्छेद १९ में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अधिकार की रक्षा में कहा गया है-भारत के सभी नागरिकों को अभिव्यक्ति और अभिभाषण की स्वतंत्रता का अधिकार प्राप्त है।साल १९८२ में भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि सरकार के कांमकाज से संबंधित सूचनाओं तक पहुंच अभिव्यक्ति और अभिभाषण की स्वतंत्रता के अधिकार का अनिवार्य अंग है। सर्वोच्च न्यायालय ने अपने फैसले में कहा-सरकारी कामकाज में खुलेपन का विचार सीधे सीधे सरकारी सूचनाओं को जानने के अधिकार से जुड़ा है और इसका संबंध अभिभाषण और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अधिकार से है जिसकी गारंटी संविधान के अनुच्छेद १९(ए) में दी गई है। इसलिए, सरकार को चाहिए कि वह अपने कामकाज से संबंधित सूचनाओं को सार्वजनिक करने की बात को एक मानक की तरह माने और इस मामले में गोपनीयता का बरताव अपवादस्वरुप वहीं औचित्यपूर्ण है जब जनहित में ऐसा करना हर हाल में जरुरी हो। अदालत मानती है कि सरकारी कामकाज से संबंधित सूचनाओं के बारे में गोपनीयता का बरताव कभी कभी जनहित के लिहाज से जरुरी होता है लेकिन यह भी ध्यान में रखा जाना चाहिए कि सूचनाओं को सार्वजनिक करना भी जनहित से ही जुड़ा हुआ है।

इडियन इविडेंस एक्ट,१८७२, की धारा ७६ में वे बातें कहीं गई हैं जिन्हें सूचना के अधिकार का बीज रुप माना जा सकता है। इस धारा के तहत प्रावधान किया गया है कि सरकारी अधिकारी को सरकारी कामकाज के कागजात मांगे जाने पर वैसे व्यक्ति को दिखाने होंगे जिसे इन कागजातों के निरीक्षण का अधिकार दिया गया है। परंपरागत तौर पर भारत में शासन-तंत्र अपने कामकाज में गोपनीयता का बरताव करता आ रहा है। इसके लिए अंग्रेजो के जमाने में बने ऑफिशियल सिक्रेसी एक्ट का इस्तेमाल किया गया। इस एक्ट को साल १९२३ में लागू किया गया था। आगे चलकर साल १९६७ में इसमें थोड़े संशोधन हुए । इस एक्ट की व्यापक आलोचना हुई है। द सेंट्रल सिविल सर्विस कंडक्ट रुल्स, १९६४ ने ऑफिशियल सिक्रेसी एक्ट को और मजबूती प्रदान की क्योंकि कंडक्ट रुल्स में सरकारी अधिकारियों को किसी आधिकारिक दस्तावेज की सूचना बिना अनुमति के किसी को को बताने या आधिकारिक दस्तावेज को बिना अनुमति के सौंपने की मनाही है।

इंडियन इविडेंस एक्ट, १८७२, की धारा १२३ में कहा गया है कि किसी अप्रकाशित दस्तावेज से कोई प्रमाण संबंधित विभाग के प्रधान की अनुमति के बिना हासिल नहीं किया जा सकता और संबंधित विभाग का प्रधान चाहे तो अपने विवेक से अनुमति दे सकता है और चाहे तो नहीं भी दे सकता है। सरकारी कामकाज के बारे में सूचनाओं की कमी को कुछ और बातों ने बढ़ावा दिया। इसमें एक है साक्षरता की कमी और दूसरी है सूचना के कारगर माध्यम और सूचना के लेन-देन की कारगर प्रक्रियाओं का अभाव। कई इलाकों में दस्तावेज को संजो कर रखने का चलन एक सिरे से गायब है या फिर दस्तावेजों को ऐसे संजोया गया है कि वे दस्तावेज कम और भानुमति का कुनबा ज्यादा लगते हैं। दस्तावेजों के अस्त-व्यस्त रहने पर अधिकारियों के लिए यह कहना आसान हो जाता है कि फाइल गुम हो जाने से सूचना नहीं दी जा सकती। 

साल १९९० के दशक के शुरुआती सालों में राजस्थान के ग्रामीण इलाके के लोगों की हक की लड़ाई लड़ते हुए मजदूर किसान शक्ति संगठन ने व्यक्ति के जीवन में सूचना के अधिकार को एक नये ढंग से रेखांकित किया। यह तरीका था-जनसुनवाई का। मजदूर किसान शक्ति संगठन ने अभियान चलाकर मांग की कि सरकारी रिकार्ड को सार्वजनिक किया जाना चाहिए, सरकारी खर्चे का सोशल ऑडिट(सामाजिक अंकेक्षण) होना चाहिए और जिन लोगों को उनका वाजिब हक नहीं मिला उनके शिकायतों की सुनवाई होनी चाहिए। इस अभियान को समाज के की तबके का समर्थन मिला। इसमें सामाजिक कार्यकर्ता, नौकरशाह और वकील तक शामिल हुए। 

प्रेस काउंसिल ऑव इंडिया ने साल १९९६ में सूचना का अधिकार का पहला कानूनी मसौदा तैयार किया। इस मसौदे में माना गया कि प्रत्येक नागरिक को किसी भी सार्वजनिक निकाय से सूचना मांगने का अधिकार है।ध्यान देने की बात यह है कि यहां सार्वजनिक निकाय शब्द का मतलब सिर्फ सरकारी संस्थान भर नहीं था बल्कि इसमें निजी क्षेत्र के सभी उपक्रम या फिर संविधानएतर प्राधिकरण, कंपनी आदि शामिल हैं। इसके बाद सूचना के अधिकार का एक मसौदा कंज्यूमर एजुकेशन रिसर्च काउंसिल(उपभोक्ता शिक्षा अनुसंधान परिषद) ने तैयार किया। यह सूचना पाने की स्वतंत्रता के संबंध में सबसे व्यापक कानूनी मसौदा है। इसमें अंतर्राष्ट्रीय मानको के अनुकूल कहा गया है कि बाहरी शत्रुओं के छोड़कर देश में हर किसी को हर सूचना पाने का अधिकार है। 

आखिरकार साल १९९७ में मुख्यमंत्रियों के एक सम्मेलन में संकल्प लिया गया कि केंद्र और प्रांत की सरकारें पारदर्शिता और सूचना के अधिकार को अमली जामा पहनाने के लिए काम करेंगी। इस सम्मेलन के बाद केंद्र सरकार ने इस दिशा में त्वरित कदम उठाने का फैसला किया और माना कि सूचना के अधिकार के बारे में राज्यों के परामर्श से एक विधेयक लाया जाएगा और साल १९९७ के अंत तक इंडियन इविडेंस एक्ट और ऑफिशियल सीक्रेसी एक्ट में संशोधन कर दिया जाएगा। सूचना की स्वतंत्रता से संबंधित केंद्रीय विधेयक के पारित होने से पहले ही कुछ राज्यों ने अपने तईं सूचना की स्वतंत्रता के संबंध में नियम बनाये। इस दिशा में पहला कदम उठाया तमिलनाडु ने(साल १९९७)। इसके बाद गोवा(साल १९९७), राजस्थान(२०००), दिल्ली(२००१)महाराष्ट्र(२००२), असम(२००२),मध्यप्रदेश(२००३) और जम्मू-कश्मीर(२००४) में नियम बने। 

सूचना की स्वतंत्रता से संबंधित अधिनियम(द फ्रीडम ऑफ इन्फारमेशन एक्ट) भारत सरकार ने साल २००२ के दिसंबर में पारित किया और इसे साल २००३ के जनवरी में राष्ट्रपति की मंजूरी मिली। सन २००५ से यह क़ानून पूरे देश पर लागू है लेकिन इस अधिनियम के प्रावधानों को नागरिक समाज ने अपर्याप्त मानकर आलोचना की है। वहीं सर्वेक्षणों में बार-बार् यह बात सामने आ रही है कि जानकारी,जागरूकता और प्रतिबद्धता के अभाव में इसनहीं का असर ज़मीन देखना मुमकिन नहीं हो पा रहा है। यह एक बड़ी चुनौती है। 

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लेखक आटीआई स्टेट रिसोर्स पर्सन 
और दिग्विजय कालेज, राजनांदगांव 
के राष्ट्रपति सम्मानित प्रोफ़ेसर हैं। 

पुरस्कारों के लिए प्रविष्टियाँ आमंत्रित

कमला गोइन्का फाउण्डेशन के प्रबंध न्यासी श्री श्यामसुन्दर गोइन्का ने बताया कि  2015 के लिए "बाबूलाल गोइन्का हिन्दी साहित्य पुरस्कार" एवं हिन्दीतर भाषी हिन्दी युवा लेखकों के लिए "प्रो. एन. नागप्पा युवा साहित्यकार पुरस्कार" (वय सीमा 35 वर्ष) तथा "रामनाथ गोइन्का पत्रकारिता शिरोमणि पुरस्कार" के साथ-साथ हिन्दी से तमिल व तमिल से हिन्दी एवं मलयालम से हिन्दी व हिन्दी से मलयालम अनुवाद के लिए घोषित "बालकृष्ण गोइऩ्का अनूदित साहित्य पुरस्कार" के लिए प्रविष्टियां मंगाने की अंतिम तिथि 30 अप्रैल से बढ़ाकर 31 मई 2015 तक कर दी गयी है।

श्री गोइन्का जी ने जानकारी दी है कि अहिन्दी भाषी साहित्यकार यानी जिनकी मातृभाषा दक्षिण भारतीय भाषाओं में जैसें कन्नड़, मलयालम, तेलुगु, तमिल, तुलु, उड़िया अथवा कोंकणी में जो हिन्दी में मूल रूप से लिख रहे हैं, इन प्रतियोगिताओं में भाग ले सकते हैं। जो हिन्दी भाषी साहित्यकार अहिन्दी भाषी क्षेत्रों में 10 वर्षों या अधिक से हिन्दी साहित्य की सेवा कर रहे हैं, वे भी इन पुरस्कारों के हकदार होंगे। ऐसे हिन्दी किंवा अहिन्दी भाषी दोनों इन पुरस्कारों के लिए अपनी प्रविष्टि भेज सकते हैं। प्रविष्टियां मिलने की अंतिम तिथि 30 अप्रैल 2015 है।

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