Home Blog Page 1934

गोवा के मंत्री श्री धावलीकर की पत्नी ने क्या गलत कहा?

गोवा के मंत्री दीपक धावलीकर की पत्नी लता ने अभिभावकों से कहा है कि वे अपने बच्चों को कान्वेंट स्कूलों में नहीं भेजें और इसके साथ ही उन्होंने महिलाओं से पश्चिमी संस्कृति नहीं अपनाने की अपील करते हुए कहा है कि इससे बलात्कार की घटनाएं बढ़ती हैं। लता अपने इस बयान के कारण विवादों में घिर गई हैं।
 
 
सनातन संस्था की पदाधिकारी श्रीमती लता धावलीकर ने मडगांव में कल आयोजित एक सम्मेलन में यह बात कही। उन्होंने कहा, ‘ हिंदू पुरषों को घर से जाते समय तिलक और महिलाओं को कुमकुम लगाना चाहिए। हिंदू एक जनवरी को नहीं, बल्कि गुडी पडवा को नववर्ष के रूप में मनाएं । अपने बच्चों को कान्वेंट स्कूल नहीं भेजें।. फोन कॉल का उत्तर देते समय ‘हेलो’ की जगह ‘नमस्कार’ कहकर अभिवादन करें।’ लता ने कहा, ‘ अब समय आ गया है कि हम अपनी समृद्ध प्राचीन भारतीय संस्कृति पर गर्व करें। माथे पर ‘कुमकुम’ नहीं लगाना, तंग और अंग प्रदर्शन करने वाले कपड़े पहनना, बाल कटवाना और अजीब तरीके से हेयरस्टाइल बनाना महिलाओं के लिए अब फैशन बन गया है।’’ उन्होंने कहा, ‘ बलात्कार के मामले बढ़ रहे हैं, इसका सबसे बड़ा कारण यह है कि महिलाओं ने पश्चिमी संस्कृति को अपना लिया है।’

दिग्विजय कालेज में प्रतियोगी परीक्षाओं और रोजगार के अवसरों पर विशेषज्ञों ने दिया प्रभावशाली मार्गदर्शन

राजनांदगांव। "युवा वर्ग में रोजगार मार्गदर्शन की ललक और जरूरत निरंतर बढ़ती जा रही है। सही समय और जीवन के सही मोड़ पर उन्हें कॅरियर की सही दिशा मिल जाने से उनकी शक्ति, क्षमता और संभावना को बल मिलता है। इससे उनमें आत्मविश्वास बढ़ता हैं और वे अपनी मंज़िल हासिल करने की हरसंभव कोशिश में जुट जाते हैं।  समय,श्रम और साधनों का सदुपयोग कर वे सफलता के अधिकारी बनते हैं।"

शासकीय दिग्विजय स्नातकोत्तर स्वशासी महाविद्यालय के रोजगार मार्गदर्शन कार्यक्रम में प्राचार्य डॉ.आर.एन.सिंह ने उक्ताशय के उदगार व्यक्त किए। महाविद्यालय में तीन दिन तक सभी संकायों के विभिन्न विभागों में, रोजगार आधारित व्याख्यान और मार्गदर्शन का क्रम चला जिसमें स्नातकोत्तर स्तर के ऐसे छात्र-छात्राओं को लाभ मिला जिन्हें अपनी पढ़ाई और परीक्षा के बाद अब आगे की राह तय करनी है। प्राचार्य डॉ.सिंह ने विद्यार्थियों को सलाह दी कि वे आमंत्रित विशेषज्ञों के साथ-साथ अनुभवी प्राध्यापकों, योग्य मित्रों, सफल छात्रों और अभिभावकों के तज़ुर्बे का भी लाभ उठायें। ख़ास तौर पर उन्होंने कहा कि विद्यार्थी इस मार्गदर्शन कार्यक्रम के निष्कर्षों को अपने विवेक के साथ अपनाएंगे तो उन्हें कामयाबी ज़रूर मिलेगी। 

उक्त जानकारी देते हुए महाविद्यालय के प्राध्यापक डॉ.चन्द्रकुमार जैन बताया कि अध्ययन के बाद व्यावहारिक जीवन में अपनी पहचान और स्थान बनाने के मद्देनज़र,आमंत्रित विषय विशेषज्ञ भिलाई के डॉ.संतोष राय, श्रीमती निहारिका राय,श्री पी.के.तिवारी, श्री राहुल गेडाम, श्री विनोद पटेल और महानदी कैरियर अकादमी के प्रमुख श्री संजय जैन ने अत्यंत उपयोगी और प्रायोगिक जानकारी दी। लोक सेवा आयोग और संघ लोक सेवा आयोग की परियोगी परीक्षाओं को ख़ास तौर पर ध्यान में रखते हुए प्रतियोगी परीक्षाओं के अलावा कॅरियर के अनेक नए क्षेत्रों और विकल्पों पर भी चर्चा की गई। यह आयोजन विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के विशेष सौजन्य से किया गया। इसमें उच्च शिक्षा के क्षेत्र में अधिक से अधिक रोजगारमूलक दिशा निर्देशन की मूल की भावना का समावेश भी किया गया। 

डॉ.जैन ने आगे बताया कि अतिथि वक्ताओं और मार्गदर्शकों ने कला, वाणिज्य और विज्ञान के पीजी विद्यार्थियों को परीक्षा के स्वरूप, कोर्स, प्रश्न पत्र, निर्धारित समय, विषयवार उपयोगी स्तरीय किताब, नेट और अन्य स्रोतों पर उपलब्ध कारगर जानकारी, प्रभावी कोचिंग सहित तैयारी के सटीक तौर तरीके को सुलझे हुए अंदाज़ में समझाया। विशेषज्ञों ने गत वर्षों के प्रश्न पत्रों को हल करते समय कोर्स को लेकर अपडेट और अलर्ट रहने पर भी जोर दिया ताकि प्रतियोगी को कोई नुक्सान न हो। विद्यार्थियों को परीक्षा के दौरान हल किये जाने वाले विवरणात्मक पर्चों के अलावा माइनस मार्किन वाले प्रश्न पत्रों और ओएमआर शीट पर उत्तर दर्ज़ करने या ऑनलाइन पर्चे हल करने के गुर भी बारीकी से समझाए गए ताकि उनकी मेहनत व्यर्थ न जाए। 

रोजगार मार्गदर्शन का यह तीन दिवसीय आयोजन विभागाध्यक्षों और प्राध्यापकों के सहयोग से स्मरणीय बन गया। विद्यार्थियों ने विशेषज्ञों से खुलकर प्रश्न किये। शंकाओं का समाधान हासिल किया और माना कि इससे उनमें नई उमंग के साथ कुछ नया और बेहतर कर दिखाने का उत्साह संचरित हुआ है। 
———————————————-
———————————————

शोभा डे को सामना का जवाब

मुंबई। महाराष्ट्र के मल्टीप्लेक्सों में प्राइम टाइम में मराठी फिल्मों को दिखाए जाने का विरोध करने वाली शोभा डे अब शिवसेना के निशाने पर है। शोभा डे को शिव सेना ने आंटी बताया है। वहीं शिवसेना के मुखपत्र सामना के संपादकीय में लिखा है कि अगर शिवाजी और उसके बाद बाल ठाकरे ने दादागीरी नहीं कि होती तो शोभा डे और उनके पूर्वजों को पेज थ्री पार्टियां बुर्के में करनी पड़तीं।
 
गौरतलब है कि महाराष्ट्र में बीजेपी-शिवसेना की सरकार ने एक आदेश में कहा था कि प्राइम टाइम यानी 6 से 9 के बीच सभी मल्टीप्लक्सों को मराठी सिनेमा दिखाना होगा। इसी फैसले का शोभा डे ने विरोध किया था।
 
इस पर शोभा डे ने ट्वीट किया कि, क्या मुंबई के सिनेमाघरों में अब पॉपकोर्न नहीं मिलेगा। प्राइम टाइम में मराठी फिल्मों के साथ तो दही मिसल और वडा पाव ही सही रहेगा। मुझे मराठी फिल्म पसंद है, लेकिन मुख्यमंत्री जी मुझे ये तय करने दीजिए कि मैं मराठी फिल्म कब और कहां देखूंगी, ये फरमान दादागिरी है। देवेंद्र डेक्टेटवाला फडणवीस एक बार फिर सामने है, गोमांस से सिनेमा तक, ये वह महाराष्ट्र नहीं है, जिसे हम प्यार करते हैं। नको…नको ये सब रोको।

मन की कर,सबकी सुन : दूर होगी मानसिक उधेड़बुन

आजकल दिमागी द्वंद्व या मानसिक संघर्ष आम बात है। यह आदमी को भीतर से तोड़ देता है। उसकी ज़िंदगी की राहों को अनचाही दिशाओं में मोड़ देता है। जीवन की भागदौड़, परेशानी, धार्मिक, सामाजिक व पारिवारिक दबाव आदि के चलते अक्सर व्यक्ति द्वंद्व का शिकार हो जाता है। द्वंद्व है तो यह शरीर और मन पर गहरा असर डालता है। द्वंद्व से खासकर हमारी आँखें, आँते, फेंफड़े, नींद तथा दिल ज्यादा प्रभावित होते हैं। मन में निर्णय लेने की क्षमता खतम हो जाती है। योग से दिमाग के इस द्वंद्व की स्थिति से निजात पाई जा सकती है।

याद रहे कि बहस बहुत से मानसिक रोगों का कारण भी है। निर्द्वंद्व में जीना ही असल में शांति और शक्तिपूर्ण महसूस करना है। निर्द्वंद्व अर्थात बगैर मा‍नसिक बहस के जीने से शरीर में किसी भी प्रकार का रोग उत्प‍न्न नहीं होता। वैसे द्वंद्व के बुनियादी कारण हैं –  कारण- समस्या, संघर्ष, बहस, संस्कार और अति विचार। हर घटना का हद से ज्यादा विश्लेषण करना भी तनाव पैदा करता है। बेहतर यही है कि उससे सीख लेकर उसे जो बीत गई वो बात गई की तर्ज़ पर भुला दें। 

लेखक स्टीफन मनालैक की हालिया पुस्तक ‘सॉफ्ट स्किल्स फॉर ए फ्लैट वर्ल्ड’ में सॉफ्ट स्किल्स के दायरे को बातचीत और सामाजिक आचार-व्यवहार से अधिक बढ़ाने पर जोर दिया गया है। वैश्विक स्तर पर विस्तार ले रही भारतीय कंपनियों पर फोकस करते हुए मनालैक का मानना है कि उनकी सफलता संप्रेषण, आध्यात्मिकता, सोच-परख की क्षमता और लीडरशिप की ‘सॉफ्ट स्किल्स’ पर निर्भर करती है। मनालैक ऑस्ट्रेलिया और भारत में क्रॉस-कल्चरल ट्रेनिंग उपलब्ध कराते हैं। वह ऑस्ट्रेलिया-इंडिया बिजनेस काउंसिल के पूर्व सचिव रह चुके हैं, जो दोनों देशों के बीच द्विपक्षीय व्यवसाय का समर्थन करने वाली एक संस्था है। वह मेलबर्न यूनिवर्सिटी में एशिया लिंक के लीडरशिप मार्गदर्शक भी हैं। यह संस्था ऑस्ट्रेलिया-एशिया के बीच जन संपर्क, व्यवसाय और सांस्कृतिक सहयोग को बढ़ाने की दिशा में काम करती है। 

स्मरण रहे कि मनालैक ने वर्ष 2002 में ‘यू कैन कम्युनिकेट’ पुस्तक लिखी थी और 2010 में ‘राइडिंग द एलिफेंट – डूइंग बिजनेस एंड मेकिंग प्रॉफिट्स इन मॉडर्न इंडिया’ का सह-लेखन किया था। आपात परिस्थिति पर लिखे एक अध्याय में मनालैक विमर्श करते हैं कि किस तरह कंपनियां आपात परिस्थितियों की बजाय उन पर अपनी प्रतिक्रिया से अधिक नुकसान में रहती हैं। उन्होंने बताया है कि क्या विधियां अपना कर टकराव या द्वंद्व की परिस्थितियों को संकटावस्था में पहुंचने से पहले रोका जा सकता है। इसके कुछ दृष्टांत यहां दिए जा रहे हैं:

संकट का सामना
—————————
जब अच्छे संस्थानों के सामने कोई संकटकाल या समस्या आती है तो वह दिए गए छह उपायों को अपनाते हैं। इनमें से प्रत्येक बिंदु को परखा जाना ठीक रहता है:
1. तथ्य सामने रखें (किसी भी संकटकाल का पहला शिकार सत्य ही बनता है, और यह तब तो      जरूर ओझल हो जाता है, जब हम नाराज या संकट में होते हैं)।
2. सक्रियता का प्रदर्शन (लोग आपकी तभी इज्जत करते हैं, जब आप सकारात्मक तरीके से पेश    आते हैं, फिर चाहे पहली बार आप गलत ही क्यों न हों)।
3.अपने बारे में सोचें, क्या आपको भी बदलने की जरूरत है?)
4. मार्केट के हालात की परख (अन्य लोगों की प्रतिक्रिया भी मांगें)।
5. व्यवहार और अभ्यास में बदलाव (यदि आप प्रयास करेंगे तो सुधार जरूर आएगा)।
6. संदेश आगे बढ़ाएं (सकारात्मक संप्रेषण की कला सीखें)।

ध्यान दें कि कैसे कमतर संस्थान जल्दी करते हुए आगे बढ़ जाते हैं, जबकि बेहतर संस्थान परिस्थितियों का आकलन ही करते रह जाते हैं; यह बताता है कि धैर्य अपने आप में बहुत बड़ी शक्ति होता है। इसके विपरीत, कई बार हम संकट की बजाय द्वंद्व जैसी परिस्थिति का सामना करते हैं। यही द्वंद्व बाद में संकट बन सकते हैं, इसलिए बेहतर होता है कि द्वंद्व को निजी स्तर पर सुलझा लिया जाए। कार्य जीवन में अधिकतर विवाद और द्वंद्व उठते रहते हैं, जो कई बार संकटपूर्ण परिस्थिति में बदल जाते हैं। इसलिए आप द्वंद्व की किसी परिस्थिति में क्या करेंगे?

भीतरी हालात को समझें
——————————–
पहला जरूरी कदम यह रहेगा कि आप जानें कि कार्यस्थल पर कुछ गंभीर समस्याएं हैं। इस बारे में पता लगाने की ईमानदार पहल से आप खुद को एक नई रोशनी में पाएंगे। किसी पर चिल्लाना आपस में टकराहट को बढ़ावा देता है। उसी तरह जैसे कि किसी की पीठ के पीछे उसके बारे में बात करना, या अपनी कुर्सी का फायदा उठाते हुए किसी कनिष्ठ को तंग करना, जबकि बेहतर कम्युनिकेशन के जरिए कार्य के कहीं बेहतर नतीजे प्राप्त किए जा सकते हैं।

मशविरा से काम लें 
—————————–
इससे कुछ समय तो काम चलेगा, परंतु कार्य समूह में उठे द्वंद्व के दीर्घकालिक निपटारे के लिए समूह को स्वयं ही उस पर काम करने दें। दरअसल इस प्रक्रिया को घर में भी लागू किया जा सकता है, विशेषकर किशोरों के बीच। अभिभावक अक्सर निर्देश जारी करने की वही गलती दोहराते हैं, जबकि उन्हें किशोरों व बच्चों के बीच मशविरा पर जोर देने का काम करना चाहिए।

मैत्रीपूर्ण व्यवहार करें 
————————–
कॉर्पोरेट जगत में किसी समस्या को सुलझाते समय और निर्णय संबंधी कठोरता बरतते हुए अन्य लोगों या पूरे समूह की आंखों में आंखें डाल कर दोस्ताना व्यवहार के साथ बात करें। सीनियर एग्जीक्यूटिव के लगभग प्रत्येक प्रशिक्षण प्रोग्राम में ‘आई कॉन्टेक्ट’ को बहुत महत्व दिया जाता है। यदि आप बात करते हुए ऊपर की ओर देखते हैं, अपने मुंह पर हाथ रखते हैं, आगे-पीछे देखते हैं तो आपको अक्सर गलत समझा जाता है और फिर याद रखिए कि अगली समस्या दूर नहीं।

दबाव से रहें दूर 
—————————–
यदि किसी कर्मचारी की कोई समस्या है तो उसके वरिष्ठ को समझना चाहिए कि उसकी समस्या को जबरन दबाने से उसका बुरा व्यवहार आज तो समाप्त हो सकता है, लेकिन इसके बाद वह व्यक्ति या तो कार्यसमूह छोड़ देगा या उसका योगदान आंशिक रह जाएगा। यह पूरी तरह नुकसान ही होता है। इसलिए किसी भी द्वंद्व की भारी आलोचना करने से पूर्व कुछ सोचें और रुक जाएं। कार्यस्थल पर किसी गंभीर मुद्दे का शांतिपूर्वक निपटारा कराने का यह मतलब नहीं होता कि आप कमजोर हैं या लोग आपसे मनमाना काम करा सकते हैं।

खुद के बारे में आकलन करते समय हमें अक्सर घर, स्कूल या कार्यस्थल पर विपरीत भावनात्मक परिस्थितियों का सामना करना पड़ता है। जब आप किसी काम को ‘ना’ कहते हैं तो इसका मतलब यह होता है कि आपने अपनी मजबूती दिखाने का प्रयास पहले ही शुरू कर दिया है। खुद को परखने का सर्वश्रेष्ठ तरीका सीधा व्यवहार रखने का ही होता है। उदाहरण के लिए, यदि आपको लगता है कि दफ्तर में कोई समस्या उठ रही है तो सभी को एकत्र कीजिए और मुद्दे पर बात कीजिए, इसमें झिझकिए नहीं। द्वंद्व से मुक्ति का उपाय- नियमित प्राणायाम और ध्यान करने से द्वंद्व से मुक्त हुआ जा सकता है। दिन में एक घंटा मौन रहें। और यह भी कि –

वक्त से होड़ क्यों नहीं लेते 
रास्ता मोड़ क्यों नहीं लेते 
रास्ता ताकना सुयोगों का 
व्यर्थ है, छोड़ क्यों नहीं देते 
पेड़ घर आ के फल नहीं देते 
हाथ है, तोड़ क्यों नहीं लेते 
===============================
प्राध्यापक, शासकीय दिग्विजय पीजी 
ऑटोनॉमस कालेज, राजनांदगांव। 
मो.9301054300 

हरियाणा में न्यायिक कार्य अब हिन्दी में होगा

हरियाणा के मुख्यमंत्री श्री मनोहर लाल खट्‌ट‌र ने कहा है कि ऊपरी अदालतों में होने वाली न्यायिक कार्यवाहियों का वेबकास्टिंग के जरिये सीधा प्रसारण किया जाना चाहिए। ताकि न्यायपालिका के काम में पारदर्शिता को लेकर लोगों में ज्यादा विश्वास कायम हो। उन्होंने कहा कि अदालतों की ज्यादातर कार्यवाहियां खुले में होती हैं, इसलिए कार्यवाही का प्रसारण करने में कोई झिझक नहीं होनी चाहिए।
 
नई दिल्ली में हुए उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश  और मुख्यमंत्रियों के सम्मेलन में यह मुद्दा उठाया। खट्‌ट‌र ने सुझाव दिया कि फैसले और सभी अदालती कार्यवाही जहां तक संभव हो हिंदी में और गैर हिंदीभाषी राज्यों में क्षेत्रीय भाषा में अंकित होनी चाहिए। वैकल्पिक व्यवस्था होने तक अंग्रेजी में फैसले लिखे जा सकते हैं।

मोदीजी के राज में राजभाषा कानून का खुला उल्लंघन और अंग्रेजी को बढ़ावा

प्रति,

1.    श्री ए.के. सिन्हा 
     निदेशक 
     मुद्रण निदेशालय 
     भारत सरकार 
     शहरी विकास मंत्रालय 
     बी विंग, निर्माण भवन 
     मौलाना आजाद रोड, नई दिल्ली 
     फोन: 011-23061413, फैक्स: 011-23063394 ई मेल: aksinha03@nic.in

2.     श्री आर.एस. मीणा 
         संयुक्त सचिव 
        प्रकाशन विभाग
     भारत सरकार 
     शहरी विकास मंत्रालय 
        सिविल लाइंस, दिल्ली 110054 
महोदय,
कृपया 8  जनवरी 2014, 20  मार्च 2014  एवं 22 अप्रैल 2014  के मेरे अधोलिखित ईमेल संज्ञान  लेते हुए की गई कार्यवाही की जानकारी देने का कष्ट करें।

इसके साथ मैं  उक्त पत्रों पर पूरे एक साल कोई कार्यवाही ना करने एवं जवाब ना देने के लिए एक आर टी आई आवेदन rtionline.gov.in एवं लोक शिकायत पोर्टल pgportal.gov.in/ पर शिकायत दर्ज करवा रहा हूँ.

आशा है आप शीघ्र उत्तर देने का कष्ट करेंगे।

दिनांक: ८ जनवरी २०१४ को मेरे द्वारा लिखा गया पत्र, जिसका कोई जवाब आपने नहीं दिया है

 

कृपया बताने का कष्ट करें  कि आपकी वेबसाइट http://www.egazette.nic.in हिंदी को आगे रखते हुए अथवा हिंदी-अंग्रेजी को एक साथ (बाएं -दायें) प्रदर्शित करते हुए द्विभाषी कब बनेगी?

और अंग्रेजी को प्राथमिकता देना कब बंद करेंगे? 

आपने केवल अंग्रेजी वेबसाइट बनाकर नागरिकों के अधिकारों की खिल्ली तो उड़ाई ही है साथ ही राजभाषा कानून का भी खुला उल्लंघन किया. बात भारत के नागरिकों की पर भाषा अंग्रेजी. 

क्या आप लोगों को इतनी सी बात भी समझ नहीं आती कि जनभाषा को प्रयोग ना करके आप भारत के संविधान को ठेंगा दिखा रहे हैं, अंग्रेजी में जानकारी देना, जानकारी ना देने के समान है. आपकी वेबसाइट भारत के सत्तानवे प्रतिशत आम नागरिकों के किसी भी काम की नहीं है. आपके प्रयास भी व्यर्थ जा रहे हैं. क्या आपने कभी ये सोचा है कि हमारी मेहनत जनता के काम नहीं आ रही है तो वह व्यर्थ जा रही है? क्या ऐसा करके आप अपने कर्तव्यों का पालन कर रहे हैं?

जिन अधिकारियों की यह जिम्मेदारी है उन्हें सोते से जगाया जाए. इस पत्र को संचार जगत (मीडिया) में भी भेजा जा रहा है अतः कृत कार्रवाई की सूचना व परिणामों की अपेक्षा करते हैं । आशा है आप नागरिक चार्टर में निर्धारित समय में मेरी शिकायत पर कार्यवाही करेंगे और पत्र का उत्तर देंगे.
 
भवदीय
प्रवीण जैन 
103 ए, आदीश्वर सोसाइटी 
सेक्टर 9 ए, वाशी, नवी मुम्बई 
पिन: 400703 

प्रतिलिपि: राजभाषा विभाग 

रेिबेरो साहब चर्च नहीं, गरीब और आदिवासी है चर्च के निशाने पर

मुम्बई के पुलिस आयुक्त रहे जूलियो रिबेरो ने हाल ही में एक लेख में लिखा कि एक भारतीय ईसाई के रूप में उन्हें लगता है वे हिटलिस्ट में हैं। मैं श्री रिबेरो की भावनाओं का आदर करता हूं, हालांकि जैसा कि विश्लेषणों से पता चलता है, उनकी ये भावनाएं तथ्यों पर आधारित नहीं हैं। इस बात के पक्ष में कोई प्रमाण नहीं है कि भारत में ईसाई होने के कारण कोई हिटलिस्ट में हो।

लेकिन, एक हिटलिस्ट जरूर है, पर उसमें रिबेरो का नाम नहीं है, दुर्भाग्यवश मेरा नाम उसमें है। उसी तरह जिस तरह भारत और दुनिया के सभी गैर ईसाइयों के नाम इसमें हैं। यह हिटलिस्ट बहुत सुनियोजित तरीके से बनाई गई है और उसमें बड़े पैमाने पर पैसा और राज्य के संसाधन लगे हुए हैं। इस वर्णन पर गौर कीजिए। आप जानते हैं महाराष्ट्र के सुनार लोगों को, भारत में सोने-चांदी की हिन्दू देवी-देवताओं की मूर्तियां बनाने वाले? ये मूर्तियां भारत और विश्व के हिन्दू श्रद्धालुओं पर 'शैतान के प्रभाव' का सबसे बड़ा केंद्र हैं। ये 'सुनार ईसा मसीह के गोस्पेल को अपनाएंगे तो उसका विश्वभर के हिन्दुओं पर असर पड़ेगा'। जैसा कि एक ईसाई कार्यकर्ता ने कहा कि जब हम सुनारों के पास गोस्पेल लेकर पहुंचेंगे तो हम पाएंगे कि हिन्दू धर्म ढह रहा है। प्रार्थना कीजिए गोस्पेल सुनार संस्कृति में बहे, वैसे ही जैसे पिघली हुई चांदी सांचों में बहती है।

तो उद्देश्य स्पष्ट है और वह है हिन्दू धर्म का ढहना। और हिन्दू निशाने पर हैं। यह उद्धरण किसी अतिवादी समूह से नहीं लिया गया है वरन् इंटरनेशनल मिशन बोर्ड के अधिकृत पन्नों से लिया गया है, जो सदर्न बैप्टिस्ट कंवेंशन की इवेंजेलिज्म शाखा है।

आप पूछेंगे, सदर्न बैप्टिस्ट कंवेंशन क्या है? सदर्न बैप्टिस्ट कंवेंशन 1845 में अमरीका में मिशन बोर्ड बनाने के लिए बना था । वह दावा करता है कि उसके 1 करोड़ 60 लाख सदस्य हैं और वह 48 बैप्टिस्ट कालेज और विश्वविद्यालय चलाता है। अमरीका के कई राष्ट्रपति उसके सदस्य रहे हैं। सदस्यों से उसे प्रतिवर्ष 9 अरब का आर्थिक अनुदान मिलता है। जार्ज बुश पिछले चार वषार्ें से उसकी वार्षिक बैठकों को संबोधित करते आ रहे हैं। लेकिन यह केवल रिपब्लिकनों का संगठन नहीं है। जिम्मी कार्टर और बिल क्लिंटन जैसे डैमोक्रेट भी बैप्टिस्ट हैं।

आप इससे भी संतुष्ट नहीं हुए हों तो मैं आपका परिचय जोशुआ प्रोजेक्ट से करा देता हूं। वहां पूरी की पूरी हिटलिस्ट है। इसका एक ध्येय मानचित्र है, जिसमें लाल रंग उन लोगों या स्थानों के लिए है जिन तक अभी पहुंचा नहीं गया है। वे सबसे बड़ी हिटलिस्ट में शामिल हैं। इसमें भारत का रंग सबसे गहरा लाल है।

इस प्रोजेक्ट पर काफी समय से काम हो रहा है। इसमें बड़े पैमाने पर संसाधन झोंके गए हैं। विश्व ईसाई मिशनरी की पूरी राजस्व मशीनरी है; इसके अलावा बड़ी तादाद में सरकारी और गैर सरकारी लोगों का पैसा शामिल है। वैश्विक कन्वर्जन की हिटलिस्ट के लिए प्रतिवर्ष 50 अरब डालर खर्च हो रहे हैं। यह सुपारी देने की तरह है। चर्च ने हजारों समूहों को अपना निशाना बनाया हुआ है। उनके लिए चर्च की टीम, मिशनरी, संसाधन, धन, मीडिया सहायता, उनकी भाषा में बाइबिल, 877 भाषाओं में उपलब्ध जीसस फिल्म का अनुदित संस्करण है। इतना लंबा-चौड़ा इंतजाम है कि कोई कॉर्पोरेट  बहुराष्ट्रीय निगम भी इतने बड़े पैमाने पर अपना मार्केटिंग अभियान नहीं चला सकता।

 

@sankrant लेखक हैं और उनका ब्लॉग है sankrant.org

साभार- http://www.rediff.com/ से 

चर्च पर हमलों के संदर्भ में आम भारतीयों के विचार फेसबुक पर
चर्च पर जितने भी हमले हुए हैं उन सभी में षड्यंत्र की बू आती है। हमलों के पीछे मकसद मौजूदा केन्द्र सरकार की छवि को विश्व स्तर पर धूमिल करना है। -कमलेश कुमार 

जब से केन्द्र में मोदी सरकार बनी है तब से मिशनरियों को एक आघात सा लगा है। उनको लग गया है कि जिस प्रकार से वे पूर्ववर्ती कांग्रेस सरकार में अपनी गतिविधियां संचालित करते थे अब नहीं कर पाएंगे। इसलिए वे जानबूझकर ऐसी घटनाओं को अंजाम दिलवा रहे हैं जिनसे नरेन्द्र मोदी की छवि ईसाई विरोधी बन जाये। -अम्बा शंकर वाजपेयी

दिल्ली के चर्च में चोरी की घटना को हमला कहना, ऐसा रायता बिखेरना जैसे देश के ईसाई समाप्त होने की कगार पर हों। ऐसे षड्यंत्र करना मिशनरियों से सीखें। -प्रशान्त पाठक 

मीठा जहर बांटकर मिशनरियां देश को तोड़ रही हैं। देश में कुछ चर्चों  में हुईं छिटपुट चोरी जैसी घटनाओं पर रोने के नाटक किए जा रहे हैं। पर फंसना नहीं इनके चक्कर में। एक बार फंसे तो समझो गए…। -पंकज वर्मा 

जिन चर्च हमलों पर मिशनरियां रो रहे हैं वह तो नाटक है। ये इसलिए रो रहे हैं क्योंकि अब कन्वर्जन पर सरकार ने नजरें जो तिरछी कर ली हैं। पहले तो ये सरकार की गोद में ही खेला करते थे और अंधाधुंध कन्वर्जन करते थे, लेकिन अब इनको गोद से उतार फेंक दिया तो रोना स्वाभाविक ही है। -आनन्द

मोदीजी ने कहा, मेरी इन बातों का खूब मजाक उड़ेगा

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पर्यावरण मंत्रियों के सम्मेलन को संबोधित करते हुए कहा कि पर्यावरण संरक्षण भारत की परंपरा में रही है, लेकिन बावजूद इसके भारत पर्यावरण के मुद्दों पर विश्व का नेतृत्व करने में विफल रहा। मोदी ने इस दौरान जंगल और वनवासियों की जमीन को लेकर विपक्ष पर लैंड बिल के बारे में भ्रम फैलाने का आरोप भी लगाया।

विज्ञान भवन में आयोजित इस कार्यक्रम में मोदी ने 10 शहरों में प्रदूषण स्तर की निगरानी करने के लिए राष्ट्रीय वायु गुणवत्ता सूचकांक की शुरुआत की। मोदी ने इस मौके पर पर्यावरण संरक्षण और बिजली बचाने के कुछ टिप्स भी सुझाए।

ये बोले मोदीजी….
-प्रति व्यक्ति कार्बन उत्सर्जन में भारत का हिस्सा सबसे कम है। दुनिया में जब पर्यावरण सबसे पहले बहस शुरू हुई, तो भारत को इसका नेतृत्व करना चाहिए था। भारत की जीवन पद्धति पर्यावरण जुड़ी रही है।

रीसाइकलिंग भारत से सीखे दुनिया
भारत में रीसाइकलिंग की परंपरा सालों पुरानी है। दादी मां घर में पुराने कपड़ों से रात को बिछाने के लिए गद्दी बना देती थीं। उसके भी बेकार होने पर झाड़ू-पोछा के लिए उस कपड़े का इस्तेमाल होता है।

-गुजरात के लोग आम खाते हैं, लेकिन वे आम को भी इतना री-साइकल करते हैं कि कोई सोच भी नहीं सकता है।

चांदनी रात में बचाएं बिजली
मोदी ने सम्मेलन में चांदनी रात में बिजली बचाने का आह्वान भी किया। उन्होंने कहा, 'गांवों में परंपरा थी कि चांदनी रात में दादी बच्चों को सूई में धागा डालना सिखाती थी। इसके पीछे चांदनी के महत्व को समझाना होता था। आज नई पीढ़ी को चांदनी रात का अहसास नहीं है।'

उन्होंने कहा, 'अगर शहरी निकाय तय कर लें कि पूर्णिमा की रात को स्ट्रीट लाइट न जलाएं और पूरे मोहल्ले में सूई में धागा डालने का त्योहार मनाया जाए, तो इससे ऊर्जा बचाई जा सकती है।'

संडे ऑन साइकल हफ्ते में एक दिन ऊर्जा से चलने वाले वाहनों को न चलाने का संकल्प लें। इसके लिए संडे ऑन साइकल जैसा कार्यक्रम बनाया जा सकता है। मोदी ने चुटकी लेते हुए कहा, 'कोई कह सकता है कि मोदी साइकल कंपनियों के एजेंट बन गए हैं।'

पत्रकारिता ने देश की राजनीति को नई दिशा दी

पत्रकारिता विश्वविद्यालय द्वारा आयोजित गणेश शंकर विद्यार्थी सम्मान समारोह
भोपाल, 7 अप्रैल /पत्रकारिता लोकतंत्र के लिए अनिवार्य है। पत्रकारिता ने देश की राजनीति को नई दिशा दी है। यदि पत्रकारिता नहीं होती तो देश की राजनीति की दिशा और दशा कुछ और होती। दादा माखनलाल चतुर्वेदी हमें आज भी प्रेरणा देते हैं कि उनका जीवन हमारे लिए प्रकाश पुंज है। यह विचार पत्रकारिता विश्वविद्यालय द्वारा आयोजित माखनलाल चतुर्वेदी स्मृति व्याख्यान एवं गणेश शंकर विद्यार्थी सम्मान समारोह में बोलते हुए मुख्यमंत्री श्री शिवराज सिंह चैहान ने व्यक्त किए।

      विश्वविद्यालय द्वारा वर्ष 2012 का गणेश शंकर विद्यार्थी सम्मान वरिष्ठ पत्रकार श्री मदन मोहन जोशी को एवं वर्ष 2013 का सम्मान युवा पत्रकार श्री श्यामलाल यादव को प्रदान किया गया। इस अवसर पर बोलते हुए मुख्यमंत्री ने कहा कि मदन मोहन जोशी जी केवल पत्रकार नहीं है बल्कि सामाजिक सरोकारों को साथ लेकर चलने वाले व्यक्ति हैं। उन्होंने कहा कि श्यामलाल यादव जी ने कम उम्र में पत्रकारिता में बड़ी ऊंचाईयाँ हासिल की है जो युवाओं के लिए प्रेरणास्रोत हैं। उन्होंने विद्यार्थियों से आग्रह करते हुए कहा कि उन्हें परिश्रम से पीछे नहीं हटना चाहिए और हमेशा अपना लक्ष्य बड़ा रखना चाहिए। दूसरों की भलाई करने से बड़ा कोई पुण्य नहीं है और बुराई करने से बड़ा कोई पाप नहीं है। युवाओं को पत्रकारिता के क्षेत्र में ऐसे आगे बढ़ना चाहिए कि वे एक नक्षत्र की तरह चमकें। उन्होंने विद्यार्थियों को सफलता के चार सूत्र बताते हुए कहा कि उनके पाँव में चक्कर, मुंह में शक्कर, सीने में आग एवं माथे में बर्फ होना चाहिए। उन्होंने सामाजिक सरोकारों से युक्त सकारात्मक पत्रकारिता करने का आग्रह किया।

      इस अवसर पर बोलते हुए श्री मदन मोहन जोशी ने कहा कि ऐसी पत्रकारिता का संकल्प लेना चाहिए जिससे व्यक्ति, समाज एवं राष्ट्र का भला हो सके। श्री श्यामलाल यादव ने कहा कि मेहनत करके पत्रकारिता में कुछ भी हासिल किया जा सकता है। युवा पीढ़ी को मेहनत से पीछे नहीं हटना चाहिए। हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय, शिमला के कुलपति प्रो. ए.डी.एन. वाजपेयी ने पत्रकारिता के समक्ष आज सबसे बड़ी चुनौती मूल्यों के संरक्षण की है। सनसनीपूर्ण पत्रकारिता का बोलबाला है। पत्रकारिता में ऐसे प्रयासों को बढ़ाने की आवश्यकता है जिससे मूल्यों एवं संवेदनाओं का संरक्षण हो सके। इस अवसर पर विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. बृज किशोर कुठियाला ने विश्वविद्यालय की आगामी योजनाओं के बारे में चर्चा करते हुए अतिथियों का आभार व्यक्त किया। सम्पूर्ण कार्यक्रम का संचालन जनसंचार विभाग के विभागाध्यक्ष श्री संजय द्विवेदी ने किया।
समार्थ्य को बढ़ाकर दुखों से लड़ा जा सकता है- स्वामी धर्मबंधु
माखनलाल चतुर्वेदी स्मृति व्याख्यान में श्री वैदिक मिशन ट्रस्ट स्वामी धर्मबंधु का उद्बोधन
     मनुष्य के जीवन का सबसे बड़ा लक्षण इंसानियत है। यदि मनुष्यों में सामथ्र्य कम होगा तो ईष्र्या अधिक पैदा होगी। आज लोग अपने अभाव से दुखी नहीं होते, बल्कि दूसरों के प्रभाव से दुखी होते हैं। अपने दुखों को कम करने के लिए मनुष्य को सामथ्र्यवान बनना चाहिए। आज के समय में अन्तःकरण की पवित्रता पर जोर दिए जाने की आवश्यकता है। हमें अपने शरीर, मन, बुद्धि एवं चित्त की पवित्रता पर जोर देना चाहिए। ज्ञान का सृजन कर अपनी ताकत को बढ़ाया जा सकता है। यह विचार माखनलाल चतुर्वेदी स्मृति व्याख्यान के अंतर्गत श्री वैदिक मिशन ट्रस्ट के व्यवस्थापक स्वामी धर्मबंधु ने व्यक्त किए।
      उन्होंने कहा कि आधुनिक समय में मनुष्य के सामने अनेक समस्याएँ 2005 में दुनिया के राष्ट्राध्यक्षों ने तय किया था कि दुनिया को युद्ध से निकलकर बेहतर प्रबंधन को सामने लाना चाहिए। आज मनुष्य के सामने सबसे बड़ा संकट चरित्र का संकट है। आज ताकत के दम पर दुनिया पर हुकूमत करने वाले देश भी अंतरराष्ट्रीय मंचों पर इस बात से सहमत होते दिख रहे हैं कि शांति के बिना विकास सम्भव नहीं है। उन्होंने कहा कि देश के प्रख्यात शिक्षाविद् बी.एस.कोठारी ने ऐसी शिक्षा की वकालत की थी जो इंसानियत को बढ़ाने का जज्बा पैदा कर सके।  उन्होंने महान दार्शनिक रूसो के कथन का हवाला देते हुए कहा कि जो भी चीज प्रकृति के हाथों से आती है वह पवित्र होती है, परन्तु मनुष्य के हाथों आते-आते वह दूषित होने लगती है। ज्ञान यदि दुश्मन के पास भी है तो उससे जाकर सीखना चाहिए। ज्ञान का दान सबसे बड़ा दान है। आज जी-8 में बैठे विकसित राष्ट्रों की आबादी पूरी दुनिया की आबादी का 19 प्रतिशत है, परंतु वे दुनिया के 75 प्रतिशत प्राकृतिक संसाधनों पर अपना कब्जा जमाए हुए हैं।
      स्वामी धर्मबंधु ने अपने उद्बोधन में कहा कि विद्यार्थियों को पांच संकल्प लेने चाहिए। प्रथम, वे प्राचीन साहित्य का अध्ययन करेंगे, द्वितीय, अपनी संस्कृति का सम्मान करेंगे, तृतीय, अपने राष्ट्र के प्रति प्रेम का भाव रखेंगे, चतुर्थ, आदर्श स्थापित करने का प्रयास करेंगे एवं पंचम, अन्याय एवं अत्याचार के खिलाफ आवाज उठाएँगे। उन्होंने विद्यार्थियों से परिश्रमपूर्ण जीवन जीने का आग्रह किया। उन्होंने कहा कि जो परिश्रम नहीं करता उसे ईश्वर की प्रार्थना करने का अधिकार नहीं है। इसी तरह जो लोग श्रम कर पसीना नहीं बहाते उन्हें आराम करने का अधिकार नहीं है। उन्होंने कहा कि व्यक्ति की कीमत उसके विचारों से होती है। जीवन में आदर्श स्थापित करने के लिए जरूरी है कि व्यक्ति धैर्यवान हो, लालच से दूर रहे एवं अपने मन एवं स्वभाव में मधुरता लाए। उन्होंने विश्वविख्यात लेखकों द्वारा लिखी गई पुस्तकों का हवाला देते हुए विद्यार्थियों से आग्रह किया कि वे इन पुस्ताकों को अवश्य पढ़ें।
रंगारंग प्रस्तुतियाँ और पुरस्कार पाकर झूम उठे विद्यार्थी
विश्वविद्यालय के सांस्कृतिक एवं खेलकूद आयोजन प्रतिभा-2015 का पुरस्कार वितरण
     कार्यक्रम के दौरान विश्वविद्यालय के शैक्षणिक विभागों के सांस्कृतिक एवं खेलकूद आयोजन प्रतिभा-2015 का पुरस्कार वितरण समारोह भी आयोजित किया गया। इस दौरान विद्यार्थियों ने रंगारंग सांस्कृतिक प्रस्तुतियाँ दी। विद्यार्थियों के दल ने सामान्य व्याप्त बुराईयों पर केन्द्रित लघु नाटिका: पागलों की दुनिया प्रस्तुत की। छात्राओं के दल द्वारा की गई कालबेलिया नृत्य की प्रस्तुति से सभागार में बैठे लोग झूम उठे। विश्वविद्यालय बैण्ड ने सुन्दर वाद्य प्रस्तुति से दर्शकों का मन मोहन लिया। इस दौरान प्रतिभा-2015 के दौरान सम्पन्न निबंध प्रतियोगिता, फीचर लेखन प्रतियोगिता, वाद-विवाद प्रतियोगिता, तात्कालिक भाषण प्रतियोगिता, एनीमेशन, पोस्टर, कार्टून, पावर पाइंट निर्माण प्रतियोगिता, नाट्य प्रतियोगिता, नृत्य प्रतियोगिता तथा क्विज़ प्रतियोगिताओं के पुरस्कार वितरीत किए गए। विद्यार्थियों को पुरस्कार देने के लिए विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. बृज किशोर कुठियाला के अलावा हिमालच प्रदेश विश्वविद्यालय, शिमला के कुलपति प्रो. ए.डी.एन. वाजपेयी, वरिष्ठ पत्रकार श्री राधेश्याम शर्मा, रमेश शर्मा एवं वरिष्ठ साहित्यकार श्री कैलाशचन्द्र पंत उपस्थित थे।
पुस्तकों का विमोचन
      कार्यक्रम के दौरान विश्वविद्यालय के प्रकाशन विभाग द्वारा प्रकाशित दो पुस्तकों का विमोचन माननीन मुख्यमंत्री श्री शिवराज सिंह चैहान एवं मंचासीन अतिथियों द्वारा किया गया। कार्यक्रम में श्री साकेत दुबे द्वारा लिखित पुस्तक ‘‘"डॉ.धर्मवीर भारती: पत्रकारिता के सिद्धान्त" एवं श्री मनोज चतुर्वेदी द्वारा लिखित पुस्तक "महात्मा गांधी और संवाद कला" का विमोचन किया गया।
 
       
        (डॉ. पवित्र श्रीवास्तव)
निदेशक, जनसंपर्क प्रकोष्ठ

गाँधीजी ने वकालात की थी घर वापसी कीः राकेश सिन्हा

आरएसएस के 'घर वापसी' अभियान को लेकर भले ही बातें की जाती हों लेकिन घर वापसी की वकालत सबसे पहले महात्मा गांधी ने की थी। उन्होंने अपने बड़े बेटे हरिलाल द्वारा मुस्लिम धर्म स्वीकार करने पर उसे पत्र लिखकर कहा था कि घर वापस आ जाओ। बापू ने आरएसएस के बारे में कभी नकारात्मक बात नहीं की। संघ के वर्धा कार्यक्रम में तो वह बिना बुलाए पहुंच गए थे और सेवा कार्यों की प्रशंसा भी की।

यह विचार आरएसएस के विचारक राकेश सिन्हा ने भोपाल में समन्वय भवन में आयोजित संघ के एक कार्यक्रम व्यक्त किए। उन्होंने अनेक प्रसंगों का जिक्र करते हुए संघ के प्रति गांधीजी के सकारात्मक विचारों पर जोर दिया। सिन्हा ने यह रहस्य भी उद्घाटित किया कि गांधीजी ने अपने अखबार'हरिजन" में खबरों को लेकर बेहद निष्पक्षता का भाव रखते थे।

बेटे की गलती पर हरिजन में दो बार उसके खिलाफ खबर प्रकाशित कर दी। लेकिन कभी संघ को लेकर उन्होंने एक लाइन भी विरोध में नहीं लिखी। घर वापसी को लेकर आज भले बातें बनाई जा रही हों लेकिन सबसे पहले घर वापसी के लिए गांधीजी ने अपने बेटे को प्रेरित किया था।

सिन्हा ने संघ एवं उसके संस्थापक केशव बलिराम हेडगेवार का जमकर महिमामंडन किया। हेडगेवार की जीवनी का जिक्र करते हुए बताया कि अन्याय को लेकर व्यवस्था का विरोध करना उन्होंने स्कूली जीवन में ही सीख लिया था।

उन्होंने अपने संबोधन के दौरान कामरेड सीताराम येचुरी का चार-पांच बार जिक्र किया, साथ ही बताया कि संघ को लेकर प्राय: उनके पेट में दर्द होने लगता है। समन्वय भवन के खचाखच भरे हाल में सिन्हा का संबोधन करीब पौने दो घंटे चला। कार्यक्रम का आयोजन उत्तम चंद इसराणी ट्रस्ट की ओर से किया गया था।

जैसे समधी हों ओबामाजी …

संघ के विचारक सिन्हा ने पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह के नाम का जिक्र न करते हुए उनके ओबामा को लेकर की गई टिप्पणी की आलोचना की। वह बोले कि वह ओबामा को इस तरह ओबामाजी कहते हैं जैसे उनके समधी हों।

साभार-: http://naidunia.jagran.com/ से