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आरएसएस लोगों में छाएगा मोबाईल एप्स के जरिए

खाकी हाफ पैंट। हाथ में लाठी और सिर पर काली टोपी। यह सब अब तक राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के स्वयं सेवकों की पहचान रहा है। लेकिन परंपरागत पहचान से इतर आरएसएस तेजी से स्मार्ट होता जा रहा है।

शाखा में अब स्वयंसेवकों को शारीरिक कवायद के साथ-साथ मोबाइल एप्स की भी जानकारी दी जाती है। आरएसएस ने आधा दर्जन से अधिक मोबाइल एप्स लांच कर तेजी से लोगों तक पहुंच बनाने की कोशिश की है। इसमें आरएसएस मोबाइल, श्री गुरुजी, अमृत वचन, स्मरणीयम्‌, वंदना, प्रेरणा सुमन, अर्चना आदि प्रमुख हैं।

दरअसल, स्मार्ट फोन ने सूचना तकनीक के क्षेत्र में क्रांति ला दी है। इसको माध्यम बनाकर आरएसएस युवा वर्ग में मजबूत पकड़ बनाने और उन्हें राष्ट्रवाद की घुट्टी पिलाने के लिए मोबाइल एप्स का सहारा ले रहा है।

आरएसएस 2014 के लोकसभा चुनाव में देखा चुका है कि संचार तकनीक के जमाने में सोशल साइट की कितनी ताकत है? आरएसएस द्वारा लांच मोबाइल एप्स में शामिल प्रेरणा सुमन में देश के महान विभूतियों के जीवन का वर्णन हैं। इसमें आरएसएस के संस्थापक डॉ. केशवराव बलिराम हेडगेवार से लेकर संघ के तमाम सर संघ चालकों की बाबत पूरी जानकारी है।

इसके साथ-साथ देश के स्वतंत्रता सेनानियों और महापुरुषों की भी जीवनी दी गई है। श्री गुरुजी, संघ के द्वितीय सरसंघ चालक माधव सदाशिव राव गोलवलकर का जीवन प्रसंग है। इसी तरह आरएसएस मोबाइल, शाखाओं की लोकेशन बताता है। अमृत वचन हिंदुत्व की अवधारणा से भरा पड़ा है तो वंदना में मंत्र और उनका हिंदी अनुवाद है।

स्मरणीयम्‌ में दोहा, श्लोक आदि हैं, जबकि अर्चना में शाखा गीतों की श्रृखंला है। एप्स लांच होने के बाद युवाओं में काफी लोकप्रिय हुआ है। संघ के स्वयंसेवक एंड्रायड फोन पर डाउनलोड कर एप्स से लाभान्वित हो रहे हैं।

साभार- http://naidunia.jagran.com/ से 

रेल्वे को हर साल दस हजार करोड़ का चूना लगता है

सरकार की अँधी गलियों में ऐसे कई गलियारें हैं जहाँ करोड़ो के वारे न्यारे हो जाते हैं और किसी को कानों कान खबर तक नहीं होती, लेकिन अगर मंत्री ईमानदार हो तो ऐसे कई अंधेरे गलियारों की तह तक जाकर उसकी सच्चाई का पता लगाया जा सकता है।
 
दूरदृष्टा, ईमानदार, संकल्पवान और राजनीतिक शोशेबाजी से दूर रेल मंत्री सुरेश प्रभु ने देश की रेल को पटरी पर लाने के लिए जो प्रयोग शुरु किए उसके नतीजे सामने आने लगे हैं। श्री सुरेश प्रभु ने रेल मंत्री बनते ही लाखों-करोड़ों के टेंडर, खरीदी से अपने आपको दूर कर, मेट्रो मैन ई श्रीधरन के नेतृत्व में एक कमेटी बनाकर उन गुप्त तहखानों का पता लगाने का काम सौंपा, जिनके माध्यम से आम रेल यात्री के खून पसीने की कमाई का पैसा ऊपर तक बैठे अधिकारी हजम कर रहे थे।
 
इकानॉमिक टाईम्स में जोसी जोसफ की ये रिपोर्ट इसी सच्चाई का खुलासा करती है।
 
 
मेट्रो मैन के नाम से मशहूर ई श्रीधरन ने कहा है कि भारतीय रेलवे को सामानों की खरीदारी में हर साल कम से कम 10 हजार करोड़ रुपए का चूना लग रहा है । श्रीधरन की रिपोर्ट में कहा गया है कि खरीद अधिकारों को विकेंद्रित करने यानी निचले स्तर तक देने से इस लूट को रोका जा सकता है।
 
श्रीधरन ने रेलवे के जनरल मैनेजर्स को वित्तीय अधिकार देने और अधिकारों के विकेंद्रीकरण संबंधी अपनी फाइनल रिपोर्ट में कहा है कि इस समय खरीद अधिकार सीमित होने से रेलवे का बहुत ज्यादा पैसा महज कुछ हाथों में है। इससे भ्रष्टाचार को बढ़ावा मिलता है।
 
 
 
श्रीधरन की अध्यक्षता वाली इस कमिटी ने अपनी रिपोर्ट में रेलवे के कई वरिष्ठ अधिकारियों की भी राय ली है। मौजूदा खरीद प्रक्रिया का विश्लेषण कर कमिटी इस नतीजे पर पहुंची है कि जवाबदेही तय करने और अधिकारों को विकेंद्रित करने से रेलवे की सालाना आय में भारी अंतर आ जाएगा। इससे हर साल सामान की खरीद में करीब 5 हजार करोड़ रुपए और कामों के ठेके देने में भी इतने ही रुपयों की बचत होगी।
 
कमिटी ने अपनी फाइनल रिपोर्ट 15 मार्च को दाखिल की थी। इसमें कहा गया है कि बोर्ड को कोई भी वित्तीय फैसले नहीं लेने चाहिए। खुद अपनी जरूरत के सामान की खरीदारी भी उत्तरी रेलवे से करानी चाहिए। ये अधिकार जनरल मैनेजर और निचले स्तर के अधिकारियों को दिए जाने की भी सिफारिश की गई है।
 
आपको बता दें कि रेलवे देश में सबसे ज्यादा खरीदारी करने वाली दूसरी सबसे बड़ी एजेंसी है। इससे ज्यादा की खरीदारी सिर्फ डिफेंस के सामान की होती है। रेलवे हर साल खरीदारी पर करीब 1 लाख करोड़ रुपए खर्च करती है, जिसमें से करीब आधी रकम से रेलवे बोर्ड खरीदारी करता है।
 
पिछले साल नवंबर में श्रीधरन के प्रारंभिक रिपोर्ट देने के बाद से ही रेलवे ने अधिकारों के विकेंद्रीकरण का काम शुरू कर दिया है। अब श्रीधरन कमिटी ने कहा है कि रेलवे बोर्ड का गठन रेलवे की नीतियां, योजनाएं, नियम और सिद्धांतों को बनाने, इनकी जांच करने और रेलवे को दिशानिर्देश देने को हुआ था, लेकिन आज बोर्ड इनमें से कोई भी काम नहीं कर रहा है।
 
कमिटी ने विस्तार से विश्लेषण के लिए डीजल, कंक्रीट स्लीपर्स, 53-s सीमेंट जैसे सामनों की खरीद प्रक्रिया का भी अध्धयन किया। उनके मुताबिक, रेलवे देश में सबसे ज्यादा डीजल की खरीद करता है और पिछले 15 महीनों से इसका नया ठेका ही फाइनल नहीं हुआ है। कई चीजों के ठेके तो दशकों से फाइनल नहीं हुए हैं।
 
रिपोर्ट के मुताबिक, हालात इतने खराब हो गए हैं कि रेलवे के कामकाज की इस व्यवस्था को अच्छे से झकझोरने की जरूरत है, जिससे प्रभावी और बेहतर बिजनस के फैसले लिए जा सकें। इसमें कहा गया है कि बोर्ड को फील्ड में मौजूद अपने शीर्ष अधिकारियों यानी जनरल मैनेजर्स की बिजनस की क्षमता पर ही शक है।
 
इसके अलावा रिपोर्ट में रेलवे की ढुलाई और यात्रियों की संख्या (हवाई और सड़क के मुकाबले) कम होने पर भी चिंता जताई गई है। रिपोर्ट के मुताबिक 1960-61 के 82 फीसदी (टन के हिसाब से) के मुकाबले आज रेलवे से केवल 30 फीसदी ढुलाई होती है। श्रीधरन ने कहा है कि शायद ही रेलवे के मुकाबले किसी और भारतीय संस्था की इतनी ज्यादा समितियों ने समीक्षा की होगी, लेकिन विडंबना यह है कि सारी सिफारिशें आज भी धूल फांक रही हैं।
 
साभार- इकॉनामिक टाईम्स से 

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एप्पल के हीरो स्टीव जॉब की जीवनी को लेकर विवाद

मुझे स्टीव जॉब्स की नई जीवनी 'बिकमिंग स्टीव जॉब्स' पढऩे का अवसर नहीं मिल सका है लेकिन यह जरूर पता चल गया कि ऐपल कंपनी के शीर्ष नेतृत्व ने इस नई जीवनी की मदद से उनकी पहले आ चुकी अधिकृत जीवनी को खारिज करने का प्रयास किया है। ऐपल के मुख्य कार्याधिकारी टिम कुक पहले ही कह चुके हैं कि वाल्टर इसाकसन द्वारा लिखित स्टीव जॉब्स  की पुरानी जीवनी जो वर्ष 2011 में जॉब्स के निधन के कुछ अरसा बाद प्रकाशित की गई थी, में वह जॉब्स हैं ही नहीं जिन्हें वह जानते थे। उनके मुताबिक उक्त पुस्तक अवमाननापूर्ण थी। यहां तक कि ऐपल ने एक आधिकारिक वक्तव्य जारी करके कहा कि नई जीवनी स्टीव जॉब्स को बेहतर ढंग से हमारे समक्ष पेश करती है। नई पुस्तक कंपनी के पुराने बॉस की अपेक्षाकृत दयालु और उदार तस्वीर पेश करती है। 

इसाकसन की लिखी जीवनी की जिन बातों ने कुक और उनके साथियों को आहत किया होगा उनमें जॉब्स का अत्यधिक नियंत्रण चाहने वाले व्यक्ति के रूप में चित्रण शामिल है। उक्त पुस्तक में जॉब्स को एक ऐसा व्यक्ति बताया गया है जो हर जगह अपनी बात मनवाना चाहता है, तब भी जब मौत उसके दरवाजे पर दस्तक दे रही हो। वर्ष 2009 में यकृत प्रत्यारोपण के बाद जॉब्स ने परिचारिकाओं पर इस बात के लिए दबाव बनाने की कोशिश की कि वे उनके पास कई ऑक्सीजन मास्क लेकर आएं जिनमें से वह अपनी पसंदीदा डिजाइन वाले मास्क का चयन करना चाहते थे। परिचारिका तभी उनको मास्क पहना सकी जब वह दवाओं के असर से अचेतन हो गए। चूंकि ऐपल समेत किसी ने इसाकसन पर यह आरोप नहीं लगाया कि वह झूठ लिख रहे हैं, इसलिए यह माना जा सकता है कि यह सच्ची घटना है।

लेकिन टिम और उनके साथी यह भूल रहे हैं कि इसाकसन की पुस्तक जॉब्स द्वारा उन्हें दिए गए 40 से अधिक साक्षात्कारों तथा कुछ अन्य लोगों के साक्षात्कारों पर आधारित थी। ये वे लोग थे जिनसे जॉब्स ने कहा था कि वे पुस्तक लेखन में सहयोग करें। इसमें उनके परिजन शामिल थे। लेकिन इसके बावजूद यह पुस्तक जॉब्स को एक ऐसे व्यक्ति के रूप में दिखाती है जो अत्यधिक नियंत्रण रखना चाहते थे। लेकिन इसमें गलत क्या है? वास्तव में देखा जाए तो इसाकसन ने जॉब्स के व्यक्तित्व को पाठकों के समक्ष जस का तस रख दिया। पाठकों को जॉब्स के व्यक्तित्व की कहीं अधिक वास्तविक तस्वीर देखने को मिली। जॉब्स ने भी उनके साथ पूरा सहयोग किया। इस बात पर कोई नियंत्रण नहीं चाहा कि उनके बारे में क्या कुछ लिखा जा रहा है। उन्होंने अपने आसपास के लोगों को भी ईमानदारी से अपनी राय रखने को कहा।

निर्भय नेतृत्व ऐसा ही होता है। इसाकसन ने दिखाया है कि जहां जॉब्स रुखापन दिखाने में सक्षम थे वहीं उन्होंने यह सीख लिया था कि कैसे एक शानदार नीतिकार और प्रबंधक बनना है। वह जो अधीरता दिखाते थे वह दरअसल उनकी पेशेवर और दक्षता हासिल करने संबंधी कार्यशैली का हिस्सा था। सबसे अहम बात यह है कि वह वह उन लोगों के साथ बढिय़ा पेशेवर रिश्ते कायम करने में कामयाब रहे जिनकी वह इज्जत करते थे। वह संगीत बैंड बीटल्स की अवधारणा में यकीन करते थे जहां बैंड का हर सदस्य बेहद प्रतिभाशाली था और वे मिलकर एक दूसरे की कमी पूरी करते थे।

ऐपल कंपनी का शीर्ष नेतृत्व यह कहने में गलती कर बैठा कि इसाकसन जॉब्स के व्यक्तित्व के इस पहलू का उल्लेख नहीं कर सका। उदाहरण के लिए हार्वर्ड बिजनेस रिव्यू में प्रकाशित इसाकसन का साक्षात्कार देखते हैं- लोगों के साथ रुखाई से पेश आने की अपनी छवि में बारे में सवाल पूछने पर जॉब्स ने इससे इनकार नहीं किया बल्कि कहा, 'मैं जिनके साथ काम करता हूं वे सभी चतुर लोग हैं अगर उनमें से किसी को भी लगता है कि यहां उसके साथ गलत व्यवहार हो रहा है तो वह बहुत आसानी से दूसरी जगह पर शीर्ष काम पा सकता है। लेकिन वे ऐसा नहीं करते।' जब जॉब्स अपनी बीमारी से आखिरी बड़ी लड़ाई लड़ रहे थे तब उनके आसपास परिजनों के अलावा वफादार सहयोगियों की फौज थी। ये वे लोग थे जो उनसे वर्षों तक प्रभावित रहे।

यह सच है कि जॉब्स केवल बेहतरीन लोगों को ही बरदाश्त कर पाते थे। ऐसा इसलिए था क्योंकि उनकी इच्छा थी कि वह केवल सर्वश्रेष्ठï लोगों के साथ काम करें। उनका मानना था कि अगर प्रबंधक बहुत विनम्र हों तो औसत लोग भी सहज महसूस करते हैं और उनके इर्दगिर्द बने रहते हैं। यह बात सराहनीय है कि जॉब्स की रुखाई और सख्ती के बीच उनके अंदर प्रेरक क्षमता से भरा व्यक्तित्व था। उन्होंने ऐपल के कर्मचारियों में यह धारणा भर दी कि वे असंभव को भी संभव बना सकते हैं। जॉब्स के ये सारे गुण इसाकसन की पुस्तक में अच्छी तरह दर्ज हैं।

ऐपल कंपनी के नेतृत्व को नई पुस्तक को बढ़ावा देने का पूरा अधिकार है लेकिन अगर वह उनकी पहली जीवनी को खारिज करना बंद नहीं करते हैं तो यह जॉब्स की स्मृतियों के साथ खिलवाड़ के समान होगा। इसाकसन ने एक व्यक्ति के रूप में जॉब्स की जटिल और सूक्ष्म छवि पेश की जिसमें उनके व्यक्तित्व के तमाम अच्छे-बुरे पहलू शामिल थे। लेकिन उन्होंने यह तथ्य भी नहीं छिपाया कि आज ऐपल जो कुछ भी है वह जॉब्स की नीतियों, उनके करिश्मे और काम करने की उनकी क्षमता की वजह से है।

साभार- बिज़नेस स्टैंडर्ड से 

गुलाबी गैंग की तर्ज पर अब काली गैंग

भोपाल। यूपी की 'गुलाबी गैंग' और इस पर बनी फिल्म 'गुलाब गैंग' के बारे में तो आपने सुना ही होगा। इसी तर्ज पर अब मप्र में महिलाओं की एक 'काली गैंग' काम करने लगी है। यह गैंग भी शराब माफियाओं से लेकर शिक्षा, महिला अत्याचार जैसे सामाजिक मुद्दों पर आवाज उठा रही है। चैत्र नवरात्र पर इसका गठन हुआ।

काली गैंग की सदस्य मधु रायकवार बताती हैं, 'गैंग की ज्यादातर सदस्य पति की शराब की लत, भ्रष्टाचार या अन्य किसी तरह के अत्याचार से पीड़ित हैं। इसीलिए सभी ने इकट्ठे होकर अत्याचार के खिलाफ आवाज उठाने का फैसला लिया और यह गैंग तैयार की। हमने गुलाब गैंग के बारे में सुन रखा था, उसी से प्रेरित होकर काली गैंग बनाई। अब तक इस गैंग से 100 महिलाएं जुड़ चुकी हैं।'

काली माता के नाम पर रखा गैंग का नाम
मधु बताती हैं, 'इस गैंग का नाम काली माता से प्रेरित होकर रखा गया है। जैसे मां काली दुष्टों का संहार करती हैं, वैसे ही इस काली गैंग का काम भ्रष्टाचारियों और दुष्टों के खिलाफ कार्रवाई करना होगा। जब भी कोई अन्याय की सूचना मिलती है तो सदस्य महिलाओं को फोन कर इकट्ठा किया जाता है। '

सत्याग्रह से लेकर उग्र आंदोलन है हथियार
मधु रायकवार के मुताबिक, यह गैंग गुलाबी गैंग की तरह किसी को मारेगी-पीटेगी तो नहीं, लेकिन सत्याग्रह और उग्र आंदोलन इसके हथियार होंगे। पहले सत्याग्रह और धरना-प्रदर्शन के लिए जरिये वे अत्याचार के खिलाफ आवाज उठाएंगी। यदि फिर भी न्याय नहीं मिला तो उग्र प्रदर्शन करेंगी।
तीन बच्चियों को दिलवा चुकी हैं न्याय
पिछले दिनों एक निजी स्कूल ने तीन छात्राओं को फीस जमा नहीं करने के कारण उन्हें परीक्षा में नहीं बैठने दिया गया था। इसकी जानकारी मिलते ही काली गैंग की महिलाओं ने जिला शिक्षा अधिकारियों के दफ्तर में धरना दिया और आखिरकार छात्राओं को न्याय दिलाया। साल बर्बाद होने के कारण निजी स्कूल ने छात्राओं को अब नि:शुल्क पढ़ाई करवाने का वादा किया है। इसी तरह एक सिनेमा घर में लगे अश्लील पोस्टरों के खिलाफ प्रदर्शन कर उसे हटवाया।
 
साभार- दैनिक भास्कर से 

म.प्र. सरकार की शानदार पहल अब ईलाज के खर्च की जानकारी वेब साईट पर

अगर आप खुद का अथवा अपने किसी परिचित का इलाज कराने के लिए निजी अस्पताल जा रहे हैं, तो अब घर बैठे ही स्वास्थ्य विभाग की वेबसाइट पर संबंधित अस्पताल के इलाज खर्च की पूरी रेट-लिस्ट पता कर सकते हैं।

राज्य सरकार बुधवार से प्रदेश के सभी अस्पतालों के इलाज के पैकेज और वहां मौजूद चिकित्सा सेवाओं की जानकारी स्वास्थ्य विभाग के पोर्टल www.health.mp.gov.in पर अपलोड कर रही है।
इसी पोर्टल पर नर्सिंग होम और क्लीनिक्स के रजिस्ट्रेशन ऑनलाइन जारी किए जाएंगे। इससे एक ओर नर्सिंग होम और क्लीनिक संचालकों को रजिस्ट्रेशन सर्टिफिकेट एक महीने में मिल जाएंगे, वहीं मरीजों को पैथोलॉजी जांच, सर्जरी और हॉस्पिटल की फीस के बारे में जानकारी मिलने लगेगी।

स्वास्थ्य संचालक (अस्पताल प्रशासन) डॉ. केके ठस्सू ने बताया कि नई व्यवस्था के तहत नर्सिंग होम अौर क्लीनिक संचालकों को अपने यहां इलाज और जांच की पूरी रेट-लिस्ट नोटिस बोर्ड पर चस्पा करने के साथ ही अब पोर्टल पर भी अपलोड करना होगी।

विवाद की स्थिति से बचेंगे
नई व्यवस्था का सीधा फायदा निजी अस्पतालों में इलाज कराने वाले मरीजों को होगा। साथ ही नई व्यवस्था से इलाज के बिल को लेकर मरीजों के परिजन और डॉक्टरों के बीच होने वाले झगड़ों में कमी आएगी। इसके अलावा सरकार नर्सिंग होम्स के इलाज के पैकेज की निगरानी सीधे कर सकेगी।
डॉ. ठस्सू ने बताया कि रजिस्ट्रेशन साइट पर मरीजों को इलाज के पैकेज की जानकारी देने के लिए पेशेंट-अटेंडर काॅर्नर बनाया गया है, जिसमें सभी हॉस्पिटल्स की स्पेशिएलिटी के आधार पर प्रत्येक जांच का फीस चार्ट अपलोड किया गया है।
बिना रजिस्ट्रेशन चल रही क्लीनिक होंगी बंद 
डॉ. ठस्सू ने बताया कि ऑनलाइन रजिस्ट्रेशन व्यवस्था शुरू होने से सीएमएचओ औचक निरीक्षण के दौरान बिना रजिस्ट्रेशन चल रही क्लीनिक को सील कर सकेंगे। साथ ही नर्सिंग होम संचालक द्वारा रजिस्ट्रेशन सर्टिफिकेट के लिए आवेदन करने की जानकारी देने पर, उसका स्टेटस भी जांचा जा सकेगा।
ऑनलाइन रजिस्ट्रेशन सर्टिफिकेट 
नर्सिंग होम संचालकों को रजिस्ट्रेशन सर्टिफिकेट ऑनलाइन दिए जाएंगे। इसके लिए डॉक्टर्स को एमपी ऑनलाइन के पोर्टल से रजिस्ट्रेशन के लिए आवेदन करना होगा। इन आवेदनों की जांच कर सीएमएचओ नर्सिंग होम और क्लीनिक्स का निरीक्षण डॉक्टरों की कमेटी से कराएंगे। कमेटी की रिपोर्ट पर ही रजिस्ट्रेशन सर्टिफिकेट जारी होगा।

साभार – दैनिक भास्कर से 

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नाम बदलकर परदे पर छा गए फिल्मी सितारे, लोग असली नाम भूल गए

हमारे सिनेमा के संसार में तो क्या अं दर और क्या बाहर- शायद ही कोई जानता हो कि भारतीय सिनेमा के शिखर पर विराजमान देश के सबसे सम्मानित अभिनेता, अमिताभ बच्चन का असली नाम इंकलाब है। दरअसल, ‘बच्चन‘ न तो कोई नाम है और न ही कोई जाति-उपजाति। यह तो बस, हरिवं श राय श्रीवास्तव का साहित्यिक नाम ‘बच्चन‘ था, जिसे उन्होंने अपने परिवारजनों के नाम कर दिया। लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि हरिवंश राय श्रीवास्तव ने अपने ज्येष्ठ पुत्र का नाम ‘इंकलाब‘ रखा था, जिन्हें आज पूरी दुनिया अमिताभ बच्चन के नाम से जानती है। इंकलाब नाम हरिवंश राय श्रीवास्तव को उनके मित्र कवि सुमित्रानंदन पंत ने सुझाया था, जो रख भी लिया गया था। लेकिन बाद में जब स्कूल में भर्ती कराने की बारी आई, तो पिता हरिवंश राय श्रीवास्तव ने स्कूल प्रवेश के फार्म में इंकलाब का नाम बदल कर अमिताभ श्रीवास्तव लिखवाया। इसके बहुत बाद में अमिताभ ने अपना सरनेम श्रीवास्तव भी त्याग दिया और पिता के साहित्यिक नाम बच्चन को अपनाकर अपने बाबूजी हरिवंश राय श्रीवास्तव ‘बच्चन’ की साहित्यिक वंशावली को विकसित किया।

नाम की महिमा अपार खैर, वै से भले ही हमारी फिल्मों के गीतों की भाषा में कहें, तो ‘नाम-वाम में क्या रखा है..’, लेकिन वास्तव में नाम की महिमा अपरंपार है। अगर न होती तो हमारे सिनेमा के संसार के सारे सितारे ही नहीं दुनिया भर के लोग नाम के लिए ही हमेशा रोते-बिलखते रहते हैं। कोई किसी सिनेमा के पोस्टर में अपने नाम को कम महत्व दिए जाने का रोना रोता दिखता है, तो कोई हीरोइन के नाम के बाद अपने नाम को लिखे जाने की शिकायत करता है। लेकिन सबसे बड़ा सवाल यह है कि महिमा कुल मिलाकर जब नाम की ही है, तो फिर हमारे सिने मा के सितारे अपना नाम क्यों बदलते हैं। इसे जानने के लिए थोड़ा गहराई तक जाना पड़ेगा। मगर फिलहाल तो बात उन सितारों की है, जो सिनेमा के संसार में आने से पहले किसी और नाम से जाने जाते थे और बाद में किसी और नाम से मशहूर हो गए। किसी को अपने मुसलमान नाम होने से आ रही दिक्कत की वजह से नाम बदलना पड़ा, तो किसी को बहुत लंबा और अटपटा होने की वजह से किसी और नाम का सहारा लेना पड़ा। मगर, जब वह नाम चल निकला, तो फिर किसी को किसी से कोई शिकायत नहीं रही। वैसे भी सफलता जब हर किस्म के कलंकों की कठोर कालिख तक को धमाके के साथ धो डालती है, तो फिर नाम किस खेत की मूली है। वह तो व्यक्ति अपनी मर्जी से रखता है और मर्जी से छोड़ भी सकता है।

भूल गये असली नाम जाने माने हास्य अभिनेता जॉनी वाकर के बारे में तो यह घोषित सत्य है कि उनका असली नाम तो उनके रिश्तेदार भी भूल गए थे। सभी को यही पता था कि उनका असली नाम जॉनी वाकर ही है। लेकिन असल बात यह है कि जॉनी वाकर का असली नाम बहरुद्दीन जमालुद्दीन काजी था। भारतीय सिनेमा के अब तक के सर्वश्रेष्ठ खलनायक प्राण का वास्तविक नाम प्राण किशन सकिंद था। अपने जमाने के बेहतरीन कलाकार संजीव कुमार का असली नाम हरीभाई जरीवाला था। हम सारे लोग जिस सितारे को दिलीप कुमार के नाम से जानते हैं, वे असल में पाकिस्तान में जन्मे यूसुफ खान हैं। जब फिल्मों में आए, तो उन्होंने नाम बदलकर दिलीप कुमार रख लिया। बॉलीवुड फिल्मों में काम करने वाली हीरोइनें के लिए इमीटेशन जूलरी सप्लाई करने वाले एक खूबसूरत लड़के रवि कपूर को जब वी शांताराम ने अपनी फिल्म ‘गीत गाया पत्थरों ने’ हीरो के रूप में काम दिया, तो वह युवक रवि कपूर से जीतेंद्र बनकर दुनिया के दिलों पर छा गया। एक तमिल अयंगार परिवार में जन्मे सुपर स्टार कमल हासन का असली नाम पार्थसारथी है, लेकिन कोई नहीं जानता। मलयाली पिता और पारसी मां की संतान जॉन अब्राहम का वास्तविक नाम फरहान है। अब तो खैर, फाइट मास्टर वीरू देवगन भी अजय देवगन के बारे में इस तथ्य को भूल गए होंगे कि उन्होंने कभी अपने इस बेटे का नाम विशाल देवगन था। असल में अजय ‘फूल और कांटे‘

फिल्म की कास्टिंग होने तक विशाल ही थे, लेकिन इस फिल्म में काम करने से पहले जब उन्हें अजय देवगन का बिल्ला मिला, तो वे हिट हो गए, तब से वे इसी नाम से जाने जाते हैं।

संतानों को दिया हिट नाम बैंकॉक के एक होटल में नौकरी करते करते राजीव हरी ओम भाटिया की किस्मत ने जब पलटा खाई, तो वे हमारे सिनेमा में अक्षय कुमार के नाम से चमकने लगे। अपने जमाने के मशहूर स्टार शम्मी कपूर इतने हिट रहे कि देश में हजारों लोगों ने उनके नाम पर अपनी संतानों के नाम रख लिए। लेकिन किसी को पता तक नहीं था कि वे जिसके नाम पर अपने बच्चों के नाम रख रहे हैं, उस हीरो का असली नाम तो शमशेर राज कपूर है। दक्षिण के सुपरस्टार रजनीकांत का वास्तविक नाम शिवाजी राव गायकवाड़ है। दो दशक तक फिल्म अभिनेत्री अमृता सिंह के पति रहे विख्यात सितारे सैफ अली खान का नाम उनके पिता मंसूर अली खान पटौदी ने साजिद अली खान पटौदी रखा था, लेकिन वे फिल्मी दुनिया में सैफ अली खान के नाम से जाने जाते हैं। हालांकि उनके पासपोर्ट में आज भी उनका नाम साजिद अली खान पटौदी ही लिखा हुआ है और इन दिनों वे करीना कपूर के पति के रूप में भी इसी नाम से सरकारी कागजों में दर्ज हैं। सलमान खान का पूरा नाम अब्दुल रशीद सलीम सलमान खान है। गोविंदा का वास्तविक नाम गोविंद अरुण आहूजा है। धम्रेद्र के छोटे बेटे विजय सिंह देओल को कोई नहीं जानता। लेकिन अगर उसी बेटे को बॉबी के नाम से पुकारा जाए तो पूरी दुनिया दौड़ी चली आती है। विजय सिंह देओल ने जब फिल्मों में कदम रखा, तो उन्हें अपना घरेलू नाम ‘बॉबी‘ ही अच्छा लगा और ग्लैमर की दुनिया में वे ‘बरसात’ के जरिए बॉबी देओल के रूप में आए, और वही बनकर रह गए। कौन जानता था कि ज्ञान प्रकाश राव जमाला नाम का बस कंडक्टर एक दिन फिल्मों में नाम कमाने के बाद जॉनी लीवर के रूप में जाना जाएगा।

भारतीय सिनेमा में अब तक की सर्वाधिक सौन्दर्य शाली अभिनेत्री मधुबाला, मधुबाला न होकर मुमताज जहां बेगम देहलवी थी। हमारे सिनेमा की चिर युवा अभिनेत्री रेखा अपने छोटे से नाम के बावजूद बहुत बड़ी कलाकार बन गईं, जबकि उनका असली नाम भानुरेखा गणोशन है। हरियाणा से आकर अच्छे अच्छों के छक्के छुड़ानेवाली मल्लिका शेरावत के बारे में कौन जानता है कि उनका असली नाम रीमा लाम्बा है। लाम्बा मल्लिका के पिता का सरनेम है, लेकिन पिता के खिलाफ बगावती तेवर रखने वाली मल्लिका ने लाम्बा सरनेम से छुटकारा पाकर रीमा से मल्लिका बनकर अपनी मां का उपनाम लेकर शेरावत बन गईं हैं। इंटरनेट पर अपने अद्भुत आकर्षक अवतार और शाश्वत किस्म की काम मुद्राओं के जरिए दुनिया भर में अपने निहायत निजी जीवन के अंतरंग पलों को विस्तार देकर मशहूर हुई सनी लियोनी का नाम करनजीत कौर वोहरा है। इसी तरह प्रीति जिंटा का मूल नाम प्रीतम जिंटा सिंह है।

कैटरीना कैफ का जन्म हांगकांग के कैटरीना र्टकोट शहर में हुआ था। सो उनका नाम कैटरीना र्टकोट था, लेकिन जैकी श्रॉफ की पत्नी आएशा श्रॉफ के कहने पर उन्होंने अपना उपनाम र्टकोट छोड़कर कैफ रख लिया। अपनी पहली फिल्म ‘परदेस’ में काम करने से पहले महिमा चौधरी का नाम रितु चौधरी था। लेकिन उस वक्त में लोग मानते थे कि सुभाष घई की फिल्मों की सुपर हीरोइनों माधुरी दीक्षित और मनीषा कोइराला आदि के नाम का पहला अक्षर ‘म’ से है, सो उसे ही अपने लिए भी लकी मानते हुए रितु का नाम महिमा कर दिया था, और तब से ही वे इसी नाम से जानी जाती हैं। शिल्पा राज कुंद्रा का असली नाम अश्विनी शेट्टी है। इसी तरह अजीत सिनेमा में आने से पहले हमीद खान थे और अशोक कुमार का नाम काशी गांगुली। उनके भाई किशोर कुमार का असली नाम आभास कुमार गांगुली था। अन्नू कपूर को तो सारे जानते हैं, लेकिन उनके मूल नाम अनिल कपूर को कोई नहीं जानता। इसी तरह से गीतकार अनजान असल में लालजी पाण्डेय थे, भगवान का पूरा नाम भगवान आभाजी पालव और चित्रगुप्त का चित्रगुप्त श्रीवास्तव नाम था। हमारे सिनेमा के सबसे बड़े नाम दादा साहब फाल्के का यह नाम भी कोई असली नहीं है। वे असल में धुंडीराज गोविंद फाल्के थे और फिल्मकार गुलजार वास्तव में संपूर्ण सिंह हैं। पता नहीं कोई जानता भी है कि नहीं कि गुलशन बावरा असल में गुलशन कुमार मेहता और इंदीवर असल में श्याम लाल बाबू राय हुआ करते थे। इन नामों को बदलने के पीछे का कोई एक खास वजह नहीं है लेकिन जिस नाम ने पहचान दी बस वही नाम आगे जाकर कलाकारों की पहचान बन जाती है। कभी ये बदलाव अपनी पहचान को आसान बनाने के लिए किया गया तो कभी खुद को लकी बनाने के लिए। और एक बार नाम चल गया तो बस वही पहचान और वजूद की शक्ल ले लेता है।

धम्रेद्र के छोटे बेटे विजय सिंह देओ ल को कोई नहीं जानता। लेकिन अगर उसी बेटे को बॉबी के नाम से पुकारा जाए तो दुनिया दौड़ी चली आती है

(साभार: राष्ट्रीय सहारा)

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To-  customercare@fhp-ww.com

महोदय,
कल मैं दुकान पर ऐसा पौंछा खरीदने गया जिससे  बिना झुके सफाई की जा सके । दुकानदार ने आपकी कंपनी का स्पिनवाला पौंछा दिखाया। मैं डिब्बे पर पढ़ने लगा तो कुछ समझ नहीं आया क्योंकि सब कुछ अंग्रेजी में लिखा था। मैंने दुकानदार से पूछा तुम्हें अंग्रेजी आती है तो उसने कहा – थोड़ी बहुत । और जो ग्राहक आते हैं उन्हें ? ' पता नहीं साहब , अग्रेजी में तो कोई पूछता नहीं, ज्यादातर तो हिंदी में या कोई -कोई मराठी -गुजराती नें पूछते हैं ।  हम उन्हें हिंदी में और थोड़ा बहुत उनकी भाषा में बताते हैं । जब दुकानदार और ग्राहक कोई अंग्रेज नहीं , घर की महिलाएं और कामवाली भी अंग्रेजीवाली  नहीं तो इस पर सिर्फ अंग्रेजी में क्यों लिखा है? यह तो वैसे भी गांव में भेजने के लिए है।     'साहब इतनी अकल तो उन्हें खुद भी होनी चाहिए कि वे अपना माल विलायत में नहीं बेच रहे। कंपनीवाले  और उनके कर्मचारी भी तो हिंदुस्तानी ही होंगे।' 
            मेरा कंपनी से सवाल है कि  आप पौंछा और दूसरा सफाई का सामान बेच रहे हो या अंग्रेजी बेच रहे हो। जब आपको अपने ग्राहक तक की परवाह नहीं , अंग्रेजी में बता कर जानकारी छिपा रहे हो तो तुम्हारे माल का भी क्या भरोसा। ग्राहक की भाषा में जानकारी न देकर आप ग्राहक का भाी अपमान कर रहे हैं। क्या आप दूसरे जेशों की तरह अपने सामान पर देश की भाषा में जानकारी नहीं दे सकते।भारत में पौंछा लगाने के लिए भी अंग्रेजी क्यों आनी चाहिए.?
            उम्मीद  है आप ग्राहकों की जरूरत और भावना समझेंगे और अंग्रेजी से बहुत मुहब्बत है तब भी उसके साथ तो  हमारी भाषा में जानकारी  देंगे।  जवाब की उम्मीद है।

आपका ग्राहक

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कंपनी का उत्तर
<Prakash.Thakur@fhp-ww.com>:
Dear Consumer,
 
Thank you for your e-mail and for considering Gala products. We are glad you came back to us with your feedback on improving Gala's communication to consumers. We are always open for improvement and hope to get better continuously.
 
As part of our efforts to effectively communicate product benefits to consumers, we always try to use illustrations or pictures wherever possible to highlight to product use. We make these simple and clear so that our valued consumer all over India are able to understand without any language barrier since many do not understand Hindi / English. This is also the case with Spin Mop, the product you are referring to. However, we will re-evaluate this in light of your feedback.
 
In case of the spin mop, if you would like more information on the use, please visit the following youtube link  which has a Hindi language video explaining the product use clearly. 
https://www.youtube.com/watch?v=BEtftLo6NKQ 
Thank you.

संपर्क – vaishwikhindisammelan@gmail.com 
 hindimumbai@googlegroups.com

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गाय पशु ही नहीं किसानों और कृषि भूमि के लिए वरदान भी है

वर्ष 1990 से पहले तक नेपाल में गो-हत्या को मनुष्य की हत्या के समकक्ष माना जाता था। मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराजसिंह चौहान और हरियाणा के मुख्यमंत्री मनोहरलाल खट्टर ने भारत में भी ऐसी ही नियम-प्रणाली अपनाए जाने की बात कही है। गृह मंत्री राजनाथ सिंह ने भी वादा किया है कि जल्द ही संपूर्ण भारत में गोहत्या पर प्रतिबंध लगा दिया जाएगा, अलबत्ता तब उन्हें कांग्रेस नेता दिग्विजय सिंह का समर्थन करना पड़ सकता है, जिन्होंने वर्ष 2003 में ही इस तरह के प्रतिबंध की मांग कर दी थी।
 
गो-संरक्षण का मामला हमेशा से ही राजनीतिक रूप से संवेदनशील रहा है। अधिकतर राजनीतिक दल इस मामले में लिबरल्स का साथ देने से कतराते हैं, क्योंकि लिबरल्स सोचते हैं कि गोवध पर प्रतिबंध व्यक्तिगत स्वतंत्रता का हनन और लोगों की खानपान की आजादी को नियंत्रित करने का प्रयास है। गो-संरक्षण के मसले पर सबसे उल्लेखनीय राजनीतिक आंदोलन वर्ष 1966 में हुआ था। गोवध पर प्रतिबंध की मांग को लेकर आक्रोशित भीड़ द्वारा संसद का घेराव किया गया था, जिसके परिणामस्वरूप राजधानी में 48 घंटों का कर्फ्यू लगाने की नौबत आ गई थी। तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने तब तो गोवध प्रतिबंध की मांग को खारिज कर दिया, लेकिन वर्ष 1982 तक वे इसका समर्थन करने लग गई थीं।
 
देश में कई ऐसे शहरी मांसाहारी हैं, जो बड़े मजे से मांस भक्षण कर सकते हैं, लेकिन जहां बात बीफ (गोमांस) खाने की आती है तो भले ही गायों को उन्होंने केवल कचरे के ढेर पर मंडराते हुए ही देखा हो, वे इससे बिदकते हैं। नेपाल में आज भी गोहत्या पर 12 साल के कारावास की सजा दी जाती है, लेकिन भैंसों को वहां बिना किसी हिचक के हलाक किया जाता है। पिछले साल गढ़ीमाई उत्सव के दौरान ही कोई पांच हजार भैंसों की बलि दी गई थी। गैरभारतीय लोग कभी इस बात को समझ नहीं पाते कि अगर भैंस और बकरी का मांस खाने में कोई बुराई नहीं है तो फिर गोमांस से इतनी हिचक क्यों? उन्हें अंदाजा नहीं कि भारतीय संस्कृति में गोवंश का क्या स्थान रहा है। गोमाता की छवि हिंदुओं के अवचेतन में गहरे तक पैठी हुई है।
 
इतिहासकार इस पर कई और दशकों तक बहस कर सकते हैं कि आखिर भारत में गोपूजा की परंपरा कब से शुरू हुई। लेकिन इतना तो तय है कि गोहत्या पर एक किस्म के धार्मिक-सांस्कृतिक प्रतिबंध के कारण ही भारत की कृषि-अर्थव्यवस्था की दुर्गति नहीं हुई। पश्चिम में गायों को केवल दूध और मांस के लिए पाला जाता है, लेकिन भारत में गाय के गोबर का भी बड़ा महत्व रहा है। वह कृषि में उर्वरक का काम करता है, उससे उपले-कंडे बनाए जाते हैं, जो गांवों में ईंधन का बड़ा स्रोत है, ग्रामीण घरों की लिपाई-पुताई गोबर से की जाती है। भारत में गायें कभी भी महज एक मवेशी नहीं रहीं। यहां तक कि सूखे और भुखमरी की स्थिति में भी लोग कभी अपनी गायों को मारकर नहीं खाते थे। हजारों सालों से गायें और बैल भारत की कृषि-आर्थिकी का अभिन्न् अंग रहे हैं।
 
लिहाजा, अगर धार्मिक भावनाओं और राजनीतिक तकाजों की बात न भी करें, तो क्या कृषि-आर्थिकी के दृष्टिकोण से भी गोहत्या को बढ़ावा दिया जाना चाहिए? आज हमारी कृषि-अर्थव्यवस्था अनेक तरह की समस्याओं का सामना कर रही है, मृदा का क्षरण हो रहा है, उपज घट रही है, एक तरफ उर्वरकों पर भारी सबसिडी दी जा रही है और दूसरी तरफ किसान लगातार आत्महत्या कर रहे हैं। ऐसा लग रहा है कि जैसे-जैसे हमारी ग्राम-अर्थव्यवस्था में गायों की भूमिका कम होती जा रही है, वैसे-वैसे ये तमाम समस्याएं भी बढ़ती जा रही हैं।
 
आधुनिक कृषि की सोच यह है कि गोवंश-केंद्रित कृषि के बजाय मशीनों, सिंथेटिक उर्वरकों और कोयला-पेट्रोलियम संबंधी ईंधनों का उपयोग किया जाए। वर्ष 1906 में तमिलनाडु के रानीपेट में पहली उर्वरक फैक्टरी खुली थी। तब रबींद्रनाथ टैगोर जैसे अनेक प्रभावी व्यक्तित्व कृषि में आधुनिक प्रयोगों, आयातित बीजों, उर्वरकों के प्रयोग की हिमायत कर रहे थे। 1940 के दशक में भारत में पहली बार ट्रैक्टर्स आयात किए गए। इन तमाम प्रयासों की परिणति 1960 के दशक में हरित क्रांति के रूप में हुई।
 
कृषि-कार्यों में गोवंश की भूमिका घटी तो अब उनका उपयोग केवल दुग्ध-उत्पादन के लिए किया जाने लगा। लिहाजा, संकर नस्ल की गायों की मांग बढ़ गई, जो ज्यादा से ज्यादा दूध का उत्पादन कर सकती थीं। इससे यह धारणा बनी कि भारत में गायों की तादाद जरूरत से ज्यादा बढ़ गई है और उनके लिए चारे की भी किल्लत होने लगी है। देशी गायों की उपेक्षा शुरू हुई तो श्रेष्ठ नस्ल के गोवंश की भी कमी होने लगी। वास्तव में, जैसे भारत के लोग अमेरिका जाकर बेहतर प्रदर्शन करते हैं, वैसे ही भारत द्वारा अमेरिका को निर्यात की गई गायों ने भी वहां पर बेहतर उत्पादन किया है!
 
आश्चर्य की बात है कि कृषि-वैज्ञानिकों ने कभी इस पर विचार ही नहीं किया कि गोबर के स्थान पर सिंथेटिक उर्वरकों का उपयोग करने से खेतों की मिट्टी पर क्या असर पड़ सकता है। हजारों सालों से भारतीय किसान अपने खेतों में गाय के गोबर का ही इस्तेमाल उर्वरक की तरह करते आ रहे थे। क्यों? क्योंकि शायद वे इस बात को कृषि-वैज्ञानिकों से बेहतर तरीके से समझते थे कि भारत की जैसी ऊष्णकटिबंधीय जलवायु है, उसके मद्देनजर हमारी मृदा का पारिस्थितिकी-तंत्र अन्य देशों से भिन्न् है और हमारी मिट्टी बहुत जल्द अपनी उर्वरता गंवा बैठती है। उर्वर मिट्टी के लिए जो जैविक तत्व आवश्यक होते हैं, वे हमारे यहां बहुत तेजी से क्षीण होते हैं। गायों का गोबर हजारों सालों से हमारे खेतों की जमीन को जैविक तत्व और उर्वरता प्रदान करता आ रहा था।
 
लेकिन चंद ही दशकों में हमने उस उर्वरता को गंवा दिया। सिंथेटिक उर्वरक मिट्टी को तीन प्रमुख पोषक तत्व तो प्रदान करता है, लेकिन वह उसे जैविक-कॉर्बन और माइक्रो-न्यूट्रिएंट्स नहीं प्रदान कर सकता। समय के साथ हमारे खेतों की मिट्टी की नमी धारण करने की क्षमता कम हुई है, उनके सूक्ष्म जैविक-तंत्र को क्षति पहुंची है और हमारे खेतों की मिट्टी मरती जा रही है। अब जब फिर से इसके लिए गोवंश की जरूरत महसूस की जाने लगी है तो हम पाते हैं कि देश में पर्याप्त मात्रा में गोवंश ही नहीं है। इसके लिए सरकार की नीतियों को भी जिम्मेदार ठहराया जा सकता है, जिनके चलते किसानों को गोवंश के पालन के लिए हतोत्साहित किया गया। जबकि गायों-बैलों को पालने का खर्चा कभी भी बहुत ज्यादा नहीं था और चारे-भूसे पर उनकी गुजर हो जाती थी। लेकिन अब चरनोई भूमि भी घटती जा रही है और गोवंश के पोषण का सवाल खड़ा हो गया है।
 
हो सकता है गोमांस पर प्रस्तावित प्रतिबंध के बावजूद हमारी ग्राम-अर्थव्यवस्था में गायों का वह स्थान पुन: कायम नहीं किया जा सके, जो कभी हुआ करता था, बशर्ते सरकार इस दिशा में नीतिगत तत्परता दिखाए। कृषि पर बड़े पैमाने पर दी जाने वाली सबसिडी का कुछ हिस्सा अगर गोवंश-पालन पर भी दिया जाए तो इससे खासी मदद मिल सकती है। स्थानीय परिस्थितियों के मद्देनजर गायों के साथ ही भैंसों के मांस पर प्रतिबंध लगाना भी मददगार साबित हो सकता है। विभिन्न राज्यों की भिन्न् परिस्थितियों के मद्देनजर यह राज्य सरकारों का ही जिम्मा है कि वे अपने यहां गोवंश-संरक्षण संबंधी कानून लागू करें।
 
(लेखिका पत्रकार हैं। ये उनके निजी विचार हैं)
 
साभार- दैनिक नईदुनिया से 

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रेल के डिब्बे से झाँकती मुस्कान विश्व फोटोग्राफी प्रतियोगिता में छा गई

भारतीय मुस्कान ने दुनिया की सबसे बड़ी फोटोग्राफी प्रतियोगिता में स्थान पाया है। ‘सोनी वर्ल्ड फोटोग्राफी अवार्डस 2015’ के विजेताओं की घोषणा मंगलवार को कर दी गई। तीन श्रेणियों में घोषित पुरस्कारों में खुली प्रतियोगिता श्रेणी में 10 विजेता घोषित किए गए, जबकि तीन युवा और मोबाइल फोटो श्रेणी में दो उप विजेताओं सहित एक विजेता घोषित किया गया। इनकी तस्वीरों की प्रदर्शन लंदन के सोमरसेट हाउस में 24 अप्रैल से 10 मई के बीच किया जाएगा। अब खुली प्रतियोगिता और युवा प्रतियोगिता के बीच से ओपन फोटोग्राफर ऑफ द ईयर और यूथ फोटोग्राफर ऑफ द ईयर चुना जाएगा।

– 96 हजार प्रविष्ठियां दुनियाभर से प्रतियोगिता के लिए आईं
– 23 अप्रैल 2015 को लंदन में घोषित होगा सर्वश्रेष्ठ फोटोग्राफर का नाम
– 13 श्रेणियों के विजेताओं में से चुना जाएगा सर्वश्रेष्ठ फोटोग्राफर
– 05 हजार डॉलर बतौर पुरस्कार मिलेंगे विजेता को 
– 24 अप्रैल से लंदन में प्रदर्शित की जाएंगी विजेता तस्वीरें
– 14 साल की ब्रिटिश बच्ची स्टेफनी एन्यो की तस्वीर भी बनी विजेता

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जलवायु परिवर्तन के व्यापक प्रभावों पर दुनिया की नज़र

आईपीसीसी के दूसरे कार्यसमूह की ताजा रिपोर्ट में पाया गया है कि जलवायु परिवर्तन का प्रभाव व्यापक और परिणामी है। साथ ही इसका प्रभाव सभी महाद्वीपों और महासागरों पर पड़ने वाला है। सात साल पहले जारी की गई आईपीसीसी रिपोर्ट के लिहाज से इस रिपोर्ट पर बात की जाए तो यह बेहद अहम घटना है क्योंकि इसमें कहा गया है जलवायु परिवर्तन का प्रभाव स्पष्ट तौर पर सामने आ रहा है।

चिंताजनक बात यह है कि ताजा रिपोर्ट में इसकी पुष्टि की गई है कि जलवायु परिवर्तन केवल आने वाली पीढ़ी के लिए ही समस्या नहीं है बल्कि यह इस समय भी हम सभी को प्रभावित कर रही है। खासकर चीन में, जलवायु परिवर्तन के चलते खाद्य सुरक्षा और कृषि से संबंधित अनेक समस्याओं में इजाफा होगा। मसलन, मक्के की पैदावार में कमी आ सकती है। साथ ही, सूखे और पानी से संबंधित अनेक संकटों के चलते आम लोगों और कारोबार पर अहम आर्थिक प्रभाव पड़ेगा।

और प्रमुख शहर, जैसे गांघजू, शंघाई और तियानजिन तटीय इलाकों में आने वाले बाढ़ से बुरी तरह प्रभावित होंगे क्योंकि वैश्विक समुद्री स्तर में 0.5 फीसदी का इजाफा होगा। रिपोर्ट ने यह स्पष्ट कर दिया है कि अब भी हमारे पास अपने भविष्य को चुनने का अवसर है। इसमें कहा गया है कि तापमान में तेजी से बढ़ोतरी के चलते नुकसान बढ़ा है और इस संकट की स्थिति में सुधार के लिए अनुकूलन के साथ-साथ शमन रणनीति लागू करनी होगी जिससे वैश्विक उत्सर्जन में तत्काल और तेजी से कमी आएगी।

चीन के नेताओं ने भी स्वीकार किया है कि जलवायु परिवर्तन का खतरा बढ़ रहा है और उत्सर्जन में कमी लाने के लिए कदम उठाये जा रहे हैं। इसमें कार्बन-तीव्रता लक्ष्य तय करने, स्वच्छ ऊर्जा में भारी निवेश करने और उत्सर्जन-कारोबार संबंधी पायलट कार्यक्रम शुरू करना शामिल है।

साथ ही कई प्रमुख शहरों के चारों तरफ कोयले के उत्पादन को सीमित करना भी शामिल है। इस रिपोर्ट की एक अहम बात यह भी है कि इसमें कहा गया है कि जलवायु परिवर्तन की मुख्य वजह लोग खुद ही हैं। और आज हम जो भी फैसला लेते हैं, उस पर बहुत कुछ निर्भर है कि आने वाले वक्त में हम जलवायु के खतरनाक प्रभावों को रोक सकते हैं या नहीं। अच्छी खबर यह है कि हमारे पास अब भी इसके समाधान का मौका है।

वांग चुंगफेंग, क्लाइमेट चेंज ऑफिस, चीन स्टेट फॉरेस्ट्री एडमिनिस्ट्रेशन के मुताबिक़ इस रिपोर्ट ने एक बार फिर पुष्टि की है कि जलवायु परिवर्तन का असर बढ़ रहा है।अब सबसे बड़ी बहस इसके एक आरोप पर है- यह अब भी अनिश्चित है कि क्या कई घटनाओं को जलवायु परिवर्तन के लिए पूरी तरह से दोषी ठहराया जा सकता है। पर, कुल मिलाकर जो रुझान है, वह खतरनाक है और इसे गंभीरता से लेने की जरूरत है।ऐसे अनेक शोध हो चुके हैं जिनमें यह बात सामने आई है कि चीन में जलवायु परिवर्तन का प्रभाव बहुत गंभीर है। उदाहरण के लिए दक्षिण-पश्चिम औरउत्तर-पश्चिम चीन में खराब मौसम और कुदरती आपदाओं का सामना करना पड़ा है।

मूल्यांकन की प्रक्रिया के दौरान, चीनी विशेषज्ञ निम्नलिखित बातें सामने लाए। मसलन, जलवायु परिवर्तन का चीन की कृषि पर कई तरह से प्रभाव पड़ रहा है। वानिकी के क्षेत्र में यह प्रभाव मिश्रित है। जंगली इलाकों में इसका तेजी से विस्तार हो रहा है और यह उत्तर की ओर बढ़ रहा है। आपदा और बीमारियों में काफी तेजी आ रही है। ग्लेशियरों के पिघलने का मतलब है कि चीन के दो प्रमुख नदी बेसिन में कम अवधि के दौरान ज्यादा पानी आएगा लेकिन लंबी अवधि के हिसाब से इसे देखें तो पाएंगे कि उत्तर-पश्चिम में जल आपूर्ति के लिहाज से नकारात्मक स्थितियां बनेंगी। रिपोर्ट का संदेश यह है कि चीन को अपने अनुकूलन को हर हाल में मजबूत करना होगा जो कि अब तक कमजोर रही है।पहले ही,चीन ने जलवायु परिवर्तन के संकट से निपटने के लिए एक राष्ट्रीय रणनीति तैयार की थी लेकिन अब भी कई व्यावहारिक मुद्दों को हल करने की जरूरत है।विभिन्न क्षेत्रों में समन्वय की जरूरत है लेकिन चीन के मौजूदा प्रणाली और विभागीय बंटवारे की वजह से ऐसा नहीं हो पाया है। बड़े स्तर पर सुधार के हालिया प्रस्ताव और शक्तिशाली मंत्रालयों से उम्मीद है कि वे इस प्रक्रिया में मदद करेंगे।

शीन वे एन और लिज गालाघर के अनुसार इस रिपोर्ट ने चीन के नए शहरीकरण की प्रक्रिया के सामने भी चुनौतियां प्रस्तुत की हैं। चीन की सरकार का लक्ष्य 2020 तक शहरी निवासियों की संख्या को 10 करोड़ तक बढ़ाने की है। साथ ही 2030 तक इसमें 40 से 50 करोड़ तक इजाफा करने का लक्ष्य है।

शहरीकरण आर्थिक विकास का एक प्रमुख संवाहक है। लेकिन शहरों की क्षमताएं सीमित हैं और वे अपने अस्तित्व के लिए वैश्विक लोक जरूरतों (पानी, भोजन) और ऊर्जा पर निर्भर हैं। जलवायु संबंधी खतरों से निपटने के लिए शहरों की अपनी कोई योजना नहीं है, यह काम राष्ट्रीय सरकारों का है। इस तरह खुद को बदलने के अलावा शहरों के पास कोई विकल्प नहीं है।

जलवायु संबंधी खतरों से निपटने के लिहाज से अपने को तैयार करने के लिए शानदार योजना और उसे लागू करने की जरूरत है जिसमें अच्छे संसाधनों वाला निर्माण कार्य शामिल हैं। ये सब पूरे चीन में शहरीकरण की प्रक्रिया के लिए बेहद अहम हैं।शहरी इलाकों के विस्तार में चलताऊ, सस्ते और काल्पनिक दृष्टिकोण से वातावरण में कार्बन की मात्रा में इजाफा होगा और जलवायु परिवर्तन से जुड़े संकट बढ़ेंगे जो खुशहाल शहरों की नींव हिला देंगे।प्रत्येक देश की तरह एक सम्पन्न और सौहार्दपूर्ण समाज की आशा के लिए चीन महत्वाकांक्षी बहुपक्षीय कोशिशों पर निर्भर है। एक कठोर और महत्वाकांक्षी समझौते पर सहमत होने की जरूरत है जिससे उन सभी को स्पष्ट संकेत मिले जिनके पूंजी आवंटन से यह तय हो सके कि कार्बन में कटौती हमारे में बेहद अहम है। अन्यथा, वैकल्पिक रास्ता खतरनाक साबित होगा। अपर्याप्त प्रयासों की मामूली खुराक बदलाव की कोशिशों को असफल कर देगी। हमें जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को कम करते हुए खुशहाली के लिए एक बेहतर भविष्य को सुरक्षित करना है।

ली सू, ग्रीनपीस की मानें तो चीन खासतौर पर जलवायु परिवर्तन के लिहाज से बेहद संवेदनशील है। हाल के औद्योगिकीकरण की प्रक्रिया के दौरान अभी तक इस देश की वैश्विक कार्बन डाई ऑक्साइड के उत्सर्जन में भारी-भरकम हिस्सेदारी है।चीन में कोयले का उपभोग विश्व के भविष्य की जलवायु को निर्धारित करने में अकेला सबसे अहम कारक साबित होगा। 2002 से 2012 के बीच चीन में कोयले के जलने से होने वाले कार्बन डाई ऑक्साइड के उत्सर्जन में 4.5 अरब टन का इजाफा हुआ है जो इस अवधि में वैश्विक कार्बन डाई ऑक्साइड उत्सर्जन का आधा है।

गौरतलब है कि चीन में कोयले के उपभोग में कमी लाने की जरूरत है। निश्चित रूप से यह एक चुनौतीपूर्ण काम है, पर अभी चीन के लिए इसे करना अनिवार्य है। वजह यह है कि न केवल चीन के नागरिक वायु प्रदूषण से बुरी तरह प्रभावित हैं बल्कि यह वैश्विक समुदाय के लिए अति संवेदनशील है जो कि पानी की कमी, समुद्री जल-स्तर में इजाफे और मौसम संबंधी अनेक आपदाओं से जूझ रही है और ये सब जलवायु परिवर्तन से जुड़ी हुई हैं।

इधर केसिलिया तोरताजादा, थर्ड वल् र्ड सेंटर फॉर वाटर मैनेजमेंट, मैक्सिको का कहना है कि ताजे पानी को लेकर आईपीसीसी की रिपोर्ट का मूल्यांकन मूलरूप से एक डरावने और नकारात्मक स्थिति की ओर इशारा करता है। कहा गया है कि जलवायु परिवर्तन की वजह से लाखों लोगों की जिंदगी पर खतरा मंडरा रहा है। ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन के साथ ताजे पानी से संबंधित खतरों में इजाफा होने की आशंका बनी हुई है। दोबारा उत्पन्न करने योग्य सतही जल और भूजल संसाधनों के ज्यादातर सूखे उपोष्ण कटिबंधीय क्षेत्रों में और उच्च अक्षांश वाले क्षेत्रों में नीचे जाने की आशंका बनी हुई है। साथ ही वैश्विक स्तर पर बाढ़ और सूखे के बढ़ने की आंशका है।

अब आइये यह समझने की कोशिश करें कि इस तरह के डरावने परिदृश्य के मद्देनजर जल-संसाधन के संबंधित नीतियों के क्या मायने हैं? दुर्भाग्य से, जलवायु परिवर्तन के संभावित खतरों से निपटने के लिए बनाई गई नीतियों की तरह .जल-संसाधन से जुड़ी नीतियां उतनी प्रभावी नहीं हैं। साथ ही जलीय, आर्थिक, सामाजिक और पर्यावरण संबंधी परिस्थितियां इतनी जटिल हैं कि इससे संबंधित कोई अनुमान इस समय बेहद अनिश्चित है। हमें बेहतर जानकारी और सटीक मॉडल की जरूरत है। सबसे अहम बात यह है कि जलवायु परिवर्तन और जल प्रबंधन की राजनीति बेहद चुनौतीपूर्ण होगी जिसे इस रिपोर्ट में मामूली ध्यान दिया गया है।

इस सिलसिले में चकमेरीजे ओकेरके, यूनिवर्सिटी ऑफ रीडिंग का विचार भी काबिलेगौर है कि कई विकासशील देशों के लिए आईपीसीसी की इस नई रिपोर्ट का सबसे अहम प्रभाव यह है कि अंतरराष्ट्रीय समुदाय के ऊपर विशेष जोर दिया गया है कि जलवायु परिवर्तन के खतरे को कम करना काफी कठिन है।

अनुकूलन को नजरअंदाज करके या कम महत्व देकर, वे विकासशील देशों के आर्थिक विकास को रोक रहे हैं और वर्चस्व व अन्याय की ऐतिहासिक प्रणालियों को दोबारा लागू कर रहे हैं। समानता और न्याय से संबंधित प्रभावशाली अंतरराष्ट्रीय सहयोग विकसित करने के रास्ते में कुछ बड़ी चुनौतियां हैं।�

श्रीनिवास कृष्णास्वामी, भारतीय एनजीओ वसुधा फाउंडेशन का अभिमत है कि भारत एक ऐसा देश है जिसका एक बड़ा हिस्सा पहले से ही भयंकर जल संकट से जूझ रहा है। स्थायी सूखे जैसी स्थिति और बाढ़ व बादल फटने जैसी घटनाओं में बढ़ोतरी हो रही है। यह सब इसलिए भी डरावना है क्योंकि यहां की तकरीबन 22 फीसदी जनता गरीबी रेखा से नीचे जीवन यापन करती है और खेती-किसानी जीविका का मुख्य साधन है। इस रिपोर्ट में स्पष्ट तौर पर संकेत है कि यह एक अति संवेदनशील देश है और अगर जलवायु परिवर्तन के संकट का हल नहीं निकाला गया तो यह और ज्यादा अति संवेदनशील है।

कैमिला टॉलमिन, इंटरनेशनल इंस्टीट्यूट फॉर एनवायरमेंट एंड डेवलपमेंट के अनुसार आईपीसीसी की रिपोर्ट में कहा गया है कि जलवायु परिवर्तन लोगों की शांति और सम्पन्नता के लिए खतरा है। इसमें बताया गया है कि विभिन्न देशों, समुदायों और कंपनियों को इस दिशा में अपने प्रयासों में अवश्य तेजी लानी चाहिए। पर, इस रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि अनुकूलन की अपनी सीमाएं भी हैं और यही ग्रीन हाउस गैस उत्सर्जन को कम करने के वैश्विक प्रयास आगे बढ़ाता है। अब अभूतपूर्व वैश्विक एकजुटता और सहयोग का समय आ गया है। अब नए नेताओं के चमकने का मौका है। विश्व के कुछ कम विकसित देश पहले ही इस दिशा में आगे बढ़ चुके हैं। इथोपिया कार्बन उदासीन विकास के लिए प्रतिबद्ध है।

बांग्लादेश ने जलवायु संबंधी गंभीर घटनाओं से अनुकूलन के लिए खुद से 10 अरब डॉलर निवेश किया है। नेपाल पहला देश है जो अनुकूलन योजना सामुदायिक स्तर पर शुरू करने जा रहा है। यह वक्त है कि सम्पन्न देश इस दिशा में अपनी पूरी ताकत लगाएं। अपने यहां और विदेश में निवेश करें ताकि उत्सर्जन को कम किया जा सके और लोगों व संपत्ति के खतरे को बचाया जा सके।

जलवायु हमें यह बताती है कि हम सब एक साथ हैं और केवल एक एकजुट अंतरराष्ट्रीय समुदाय के रूप में ही इस समस्या को हल कर सकते हैं।
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लेखक लायंस डिस्ट्रिक्ट एजुकेशन चेयरमैन और
शासकीय दिग्विजय पीजी ऑटोनॉमस कालेज,
राजनांदगांव में प्रोफ़ेसर हैं। मो.9301054300