अब तो हद हो रही है। एक ओर देश के प्रधान मंत्री इस और उनके करोड़ों प्रशंसक इस बात पर फूले नहीं समा रहे हैं कि प्रधान मंत्री जी पूरी दुनिया में बर मंच पर हिन्दी बोलकर देश की भाषा का सम्मान और गौरव बढ़ा रहे हैं दूसरी ओर प्रधान मंत्री के अधीन चलने वाला केंद्र का हर सरकारी विभाग जी खोलकर हिन्दी की धज्जियाँ उड़ा रहा है।
अन्य विभागों की बात तो जाने दें क्योंकि उनको देश के लोगों से कोई लेना देना नहीं है सब विभागों का पाला कार्पोरेट के दलालों से पड़ता है और उनका काम अंग्रेजी से चल जाता है, लेकिन आकाशवाणी जैसा माध्यम जिसमें प्रधान मंत्री श्री मोदी जान फूँकने में लगे हैं वह उसी तेजी से हिन्दी की हत्या करने पर आमादा है।
आकाशवाणी के एफएम चैनल 107.1 पर आज, सोमवार, 30 मार्च को दोपहर 12 बजे कोई सुश्री, श्रीमती या सुकन्या जयशंकर प्रसाद की जीवनी अधकचरी हिन्दी और अंग्रेजी में पेश कर रही थी उसे सुनकर तो ऐसा लगा कि या तो किसी अंधे कुए में कूदकर आत्म हत्या कर लेना चाहिए या परमात्मा से ऐसा कोई वरदान माँग लेना चाहिए कि इस देश के हिन्दी भाषियों को जितनी भी थोड़ी बहुत हिन्दी आती है उन्हें ऐसा श्राप मिले कि वो कालिदास के अमर नाटक शकुंतला की तरह हिन्दी ऐसे ही भूल जाए जैसे महर्षि कण्व के श्राप से राजा दुष्यंत शकुंतला को भूल गया था।
अब जरा आकाशवाणी के रेडिओ एफएम 107.1 पर हिन्दी की महान विद्वान सुश्री, श्रीमती या सुकन्या के शब्दों पर गौर फरमाएँ। जयशंकर प्रसाद हिन्दी के उच कोटि के विद्वान थे, उन्होंने कमाईनी लिखी, (मुझे आश्चर्य हुआ कि उस मोहतरमा ने कामायनी को कमीयनी क्यों नहीं बोला) और भारत के वेद शास्त्रों की खूब स्टडी की वो बहोत बड़े विद्वान थे……
आगे सुनने की हिम्मत नहीं हुई इसलिए तत्काल चैनल बदल दिया, लेकिन मेरी इच्छा है कि जन हित में इस मोहतरमा की ये शानदार प्रस्तुति देश के सभी आकाशवाणी केंद्रों पर, दूरदर्शन पर बार बार प्रसारित की जाए ताकि जिन लोगों को हिन्दी का थोड़ा बहुत ज्ञान है वे अपने हिन्दी ज्ञान पर शर्मिंदा होकर आत्महत्या कर लें, जब इस देश का किसान आत्म हत्या कर सकता है तो हिन्दी वाले कौनसी अमर जड़ी खाकर आए हैं।
इस देश में आप किसी को घूरकर देखें तो आप पर अपराधिक मुकदमा चल सकता है मगर आप खुले आम देश की संस्कृति, साहित्य, परंपरा, मूल्यों और राष्ट्रीयता को जीवित रखने वाली देश की भाषा से हर मंच पर खुलकर बलात्कार करें आपका कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकता है। इस देश के मीडिया को, अंग्रेजी के लेखकों को, पत्रकारों को और हिन्दी के नाम से सरकारी टुकड़े तोड़ने वाले हर शख्स को ये छूट मिली हुई है कि वह हिन्दी को इतने घटिया तरीके से पेश करे कि सुनने वाला आत्म हत्या कर ले।
आश्चर्य और शर्म की बात ये है कि जो लोग हिन्दी में अंग्रेजी का ज़हर घोलने को सही बताते हैं वही ये कबी नहीं कहते कि अंग्रेजी अखबारों में या टीवी चैनलों में कौन माई का लाल हिन्दी के शब्द प्रयोग में लाता है। अगर अंग्रेजी चैनलों पर या अंग्रेजी अखबारों में हिन्दी का प्रयोग नहीं होता है तो फिर हिन्दी चैनल और अखबार वालों ने अपनी हिन्दी में अंग्रेजी का ज़हर क्यों घोल रखा है।
हिन्दी आती है तो कान में सीसा घोलकर सरकारी रेडिओ सुनें
अपने मकसद में कितना कामयाब रहा फिक्की फ्रैम का सालाना जलसा
फिक्की फ्रेम्स फेडरेशन आफ चैम्बर्स आफ कामर्स एंड इंडस्ट्रीज और भारतीय फिल्म जगत की साझा वार्षिक पहल है, यह एक ऐसा प्लेटफार्म है जिस पर फिल्म और मनोरंजन जगत के प्रतिनिधि, फेडरेशन के दिग्गज और सरकार के विभिन्न मंत्रालयों के प्रमुख एकत्रित हो कर समस्याओं पर चर्चा करते हैं और सरकार को अपनी रीति नीति की दिशा तय करने में मदद मिलती है। बहुत लोगों को शायद यह सुन कर हैरानी होगी कि धीरे धीरे करके भारतीय मनोरंजन उद्योग का अर्जन डॉलर 17 बिलियन यू एस डॉलर तक पहुँच गया है, इसी के साथ अब यह व्यवसाय कोई 19 लाख रोजगार अवसर प्रदान कर रहा है। यही वजह है पिछले दस वर्षों में यह इवेंट देखा जाय तो एशिया की इस प्रकार की सबसे बड़ी इवेंट बन गयी है जिसमें हालीवूड से लेकर ब्रिटिश, कनाडा , ऑस्ट्रेलिया मनोरंजन के नामचीन लोग अपने लिए संभावना तलाशने के लिये शामिल होते हैं।
इस बार ऐसा लगा कि दुनिया भर के लोगों को तो बालिवुड और भारतीय मनोरंजन व्यवसाय वेहद महत्वपूर्ण लगता है लेकिन अपनी ही सरकार को विशेष चिंता नहीं है, गौर तालाब बात यह है कि अरुण जेटली, केंद्रीय सूचना एवं प्रसारण मंत्री, जर्नल वी के सिंह , विदेश राज्यमंत्री डा राहुल खुल्लर अध्यक्ष ट्राई , बिमल जुल्का, सचिव केंद्रीय सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय, देवेन्द्र फड़नवीस, मुख्य मंत्री महाराष्ट्र जैसे महत्वपूर्ण सरकारी लोग आमंत्रित किये जाने के वावजूद परिदृश्य पर नहीं दिखाई दिए. सुचना मंत्रालय के एक अवर सचिव को भेज कर सरकारी कर्तव्य की इतिश्री समझ ली गयी. शायद यही वजह है कि मनोरंजन जगत के महत्वपूर्ण लोगों के चेहरे पर सरकारी पहल को ले कर हताशा साफ़ दिखाई दी. इन दिनों दुनिया भर में सरकारें अपने देश की आमदनी बढ़ने के लिए पर्यटन पर फोकस कर रही हैं , इस के लिए अपने यहाँ शूटिंग के लिए फिल्म निर्माताओं को सब्सिडी, निर्बाध शूटिंग अनुमति , आवश्यक मूल बहुत ढांचा प्रदान करने की होड़ में दिखती हैं , अपने यहाँ हाल यह है कि बाहर के देशों की फिल्मों की बात कौन करे , अपने ही निर्माताओं को विवश हो कर शूटिंग के लिए बाहर जाना पड़ता है। मुझे इस प्रसंग में राकेश रोशन, ऋतिक रोशन की कृश श्रंखला की पहली फिल्म की याद आ गयी , वे लोग कहानी की डिमांड के अनुसार नैनीताल में शूटिंग के लिए गए, वहां स्थानीय प्रशासन और स्थानीय जनता ने क्रू को इतना सताया कि शूटिंग बीच में ही छोड़ कर आना पड़ा , बाकी शूटिंग कनाडा जा कर बिना किसी परेशानी के पूरी की और जहाँ तक मेरा ख्याल है इस के लिए वहां की सरकार ने सब्सिडी भी दी।
फिल्म टूरिज्म की क्षमता के दोहन विषय पर आयोजित सत्र में माइक एलिस, अध्यक्ष , एशिया पैसिफिक मोशन पिक्चर एसोशिएशन , कालीन बॉरोज , प्रमुख स्पेशल ट्रीट प्रोडक्शंस , रिचर्ड बेले , कनाडा के मुंबई स्थित काउंसिल जनरल , थॉमस एल वाजदा, अमेरिका के मुंबई स्थित काउंसिल जनरल शामिल थे, वहीं फिल्म जगत की और से फिल्म और टीवी प्रोडूसर्स गिल्ड के अध्यक्ष मुकेश भट्ट शामिल थे. चर्चा में वालसा नैयर सिंह मुख्य सचिव पर्यटन एवं संस्कृति , महाराष्ट्र शासन आमंत्रित किये जाने के वावजूद शरीक नहीं हुए. जहाँ माइक एलिस और रिचर्ड बेले ने हॉलीवुड की अनेक फिल्मों के कनाडा और विशेषकर वहां के ब्रिटिश कोलंबिया राज्य में शूटिंग किये जाने से इस क्षेत्र में पर्यटन की आय में वृद्धि के बारे में बताया.यही नहीं केन्द्रीय यूरोप के चेक गणराज्य , हंगरी , बुल्गारिया , क्रोशिअ और खूबसूरत माल्टा भी फिल्मों को शूटिंग के लिए सब्सिडी और अन्य सुविधा प्रदान कर रहे हैं। जब मुकेश भट्ट की बारी आयी तो उन्होंने सीधे सीधे भारत सरकार को आइना दिखा दिया। उनका कहना है की फिल्म को शूटिंग की अनुमति देने के मामले में सरकार के विभिन्न विभाग जिस तरह से फिल्म वालों को परेशान करते हैं और जिस तरह का भ्रष्ट आचरण करते हैं वह बहुत ही उबाऊ, थका देने वाला है, नतीजन फिल्म बनाने की कीमत बढ़ जाती है और समय भी ज्यादा लगता है।
उन्होंने स्पष्ट कहा कि याही कारण है कि देश में बेहतरीन लोकेशन होने के वावजूद ज्यादातर निर्माता विदेशों में शूटिंग करना पसंद करते हैं , अपना उदाहरण देते हुए बताया कि वे स्वयं पिछले बीस वर्षों में 35 देशों में शूटिंग कर चुके है जहाँ उन्हें अपने शेडूल के अनुसार बिना किसी परेशानी के काम करने का मौक़ा मिला। मुकेश का कहना है कि यदि सरकार स्थिति को लेकर ज़रा भी गंभीर है तो फिर फिल्म कमीशन का गठन करे जिसमें राजनैतिक लोग न रखें जाएँ। राज्य सरकारें ऐसे ही राज्य स्तर पर कमीशन गठित करें , कमीशन आवयशक परमिशन प्रदान करने के लिए सिंगल विंडो के रूप में काम करें। विदेशी फिंकारों को भी अनुमति देने के मामले में त्वरित निर्णय लिए जाए. इस पर श्रोताओं में से हेमंत संगानी ने उनसे पूछा कि जहाँ एक और भारतीय फिल्म निर्माता विदेश में शूट करने जाते हैं तो वहां के वेहतऱीन दृश्यों को कैद करते हैं वहीं विदेशी निर्माता भारत आ कर यहाँ की केवल गंदगी ही शूट करने आते हैं ऐसा क्यों ? इसका उत्तर भी सब्सिडी में छुपा हुआ है।
लेखक वरिष्ठ फिल्म व संगीत समीक्षक हैं -ये लेख उनके चर्चित ब्लॉग http://desireflections.blogspot.in/ से साभार लिया गया है
युवा संसद में भूमि अधिग्रहण बिल पर हंगामा
माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय में युवा संसद प्रतियोगिता का आयोजन
भोपाल। भूमि अधिग्रहण बिल पर बहस के दौरान युवा संसद में जमकर हंगामा हुआ। बिना बहस के बिल को पास करने पर विपक्ष सदन से वाक आउट कर गया। विपक्ष ने बिल को किसान विरोधी और कॉर्पोरेट घरानों को लाभ पहुँचाने वाला बताया। जबकि सरकार की ओर से प्रधानमंत्री ने बिल को विकास के लिए जरूरी बताया। आखिर में भूमि अधिग्रहण बिल पर सरकार की ओर से लाए गए विधेयक को ध्वनि मत से पारित कर दिया गया। सदन में रक्षा, शिक्षा और स्वास्थ्य से जुड़े मसलों पर भी जमकर हंगामा हुआ। यह नजारा था माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय (एमसीयू) के सभाकक्ष का, जहां युवा संसद का आयोजन किया गया। इसमें विश्वविद्यालय के छात्र-छात्राओं ने भाग लिया।
पं. कुंजीलाल दुबे राष्ट्रीय संसदीय विद्यापीठ की ओर से एमसीयू में आयोजित युवा संसद में छात्रों ने सरकार और विपक्ष की भूमिका निभाई। मॉक संसद के प्रश्नकाल में शिक्षा, कुपोषण, भारत पाकिस्तान सीमा पर बढ़ रहे तनाव और मछुआरों की गिरफ़्तारी के साथ ही कई राष्ट्रीय मुद्दों पर बहस की। इससे पहले प्रधानमंत्री की भूमिका में छात्र अविनाश त्रिपाठी ने सदन के सामने पूर्व प्रधानमंत्री और संसद के सदस्य रहे अटल बिहारी वाजपयी को भारत रत्न मिलने पर ख़ुशी जाहिर करते हुए पटल पर धन्यवाद प्रस्ताव रखा।
कृषि एवं ग्रामीण विकास मंत्री राहुल रंजन ने भूमि अधिग्रहण बिल को सदन में पेश किया। जब बिल पर वोटिंग की बात आई तो विपक्ष बहस की मांग करने लगा। विपक्षी सांसद हंगामा करते हुए अध्यक्षीय आसंदी तक पहुँच गए। बहस की मांग पूरी नहीं होने पर नारेबाज़ी करते हुए विपक्ष सदन से वाक आउट कर गया। अध्यक्ष और संसदीय कार्यमंत्री के हस्तक्षेप के बाद विपक्षी सांसद शांत हुए। बाद में, अध्यक्ष महोदय छात्र अभिषेक मिश्र ने बिल पर बहस की अनुमति दी। बहस के दौरान नेता प्रतिपक्ष शशांक शेखर ने कहा कि बिल को पढने के बाद यह ही लग रहा है कि सरकार किसानों की ज़मीन हड़पकर धन्नासेठों को सौंपना चाहती है। अंग्रेजों के रोलेट एक्ट की तरह इस बिल में भी किसानों को दलील, वकील और अपील की आज़ादी नहीं है। उन्होंने कहा कि विपक्ष किसानों के हित में सड़कों पर इस बिल का विरोध करेगा।
ध्वनि मत से भूमि अधिग्रहण बिल लोकसभा में पारित :
भूमि अधिग्रहण बिल पर सरकार का पक्ष रखते हुए प्रधानमंत्री अविनाश त्रिपाठी ने कहा कि बिल को लेकर विपक्ष देश में भ्रम का वातावरण बना रहा है। बिल किसान विरोधी नहीं है बल्कि किसान हितैषी है। जो काम पिछली सरकारें नहीं कर सकीं वह हम कर रहे हैं। देश का सारा बोझ खेती पर नहीं डाला जा सकता। उद्योग बढ़ने होंगे, इसके लिए ज़मीन चाहिए। लेकिन, उद्योंगों के लिए उपजाऊ ज़मीन नहीं ली जाएगी। जिन किसानों की ज़मीन लेंगे उन्हें उचित मुआवजा और एक सदस्य को रोजगार देंगे की गारंटी बिल में है। प्रधानमंत्री ने अपने भाषण में विपक्ष से विकास के मुद्दे पर साथ आने की अपील की। प्रधानमंत्री के भाषण के बाद बिल को बहुमत से पास कर दिया गया।
राजनीति बुरी नहीं हैं, युवाओं को वहां जाना चाहिए :
युवा संसद की कार्रवाई को देखने के लिए एम.वी.एम. कॉलेज की प्राध्यापक श्रीमती संध्या त्रिवेदी, संसदीय कार्य विभाग के अवर सचिव श्री एम.के. राजौरिया, पं. कुंजीलाल दुबे राष्ट्रीय संसदीय विद्यापीठ के उप संचालक बीआर शर्मा और श्रीमती सरोज दुबे मौजूद थे। विश्वविद्यालय की ओर से जनसंचार विभाग के अध्यक्ष संजय द्विवेदी और प्रबंधन विभाग के अध्यक्ष डॉ. अविनाश वाजपयी भी इस दौरान मौजूद थे। इस मौके पर श्रीमती संध्या त्रिवेदी ने कहा कि तीन गोले हमेशा याद रखने चाहिए। बाहर वाला गोला शरीर, बीच वाला मन और आखिरी गोला अन्तःकारण है। हमें अपने अन्तःकारण को ठीक करना चाहिए। उन्होंने कहा कि कीड़ों की उत्पत्ति को रोकना है तो कीचड़ को साफ़ करना पड़ेगा। उन्होंने कहा कि राजनीती बुरी नहीं है बल्कि बुरे लोगों ने उसे बुरा बना दिया है। आप जैसे युवा जाकर राजनीती को अच्छा भी बना सकते हैं।
इन्होंने निभाई युवा संसद में भूमिका :
कविता भदौरिया (लोकसभा अध्यक्ष), अभिषेक मिश्रा (उपसभापति) अमित गुप्ता (महासचिव लोकसभा), सिद्धार्थ तिवारी (मार्शल), दीपिका शर्मा (रिपोर्टर), अविनाश त्रिपाठी (प्रधानमंत्री), अमरेन्द्र कुमार (गृहमंत्री), राहुल रंजन (कृषि मंत्री), रितिका चौहान (महिला एवं बाल विकास मंत्री), शिवानी जैन (रक्षा मंत्री), श्रीतिका मिश्र (मानव संसाधन विकास मंत्री ), कमल नयन पटेल (संसदीय कार्यमंत्री ), अजय कुमार (सदस्य ), शुभम दिवेदी (सद्स्य), विजय भानू प्रताप सिंह (सद्स्य), शिवांगी चौहान (सदस्य) अक्षय दीक्षित (सदस्य),शशांक शेखर (नेता प्रतिपक्ष), धीरेन्द्र गर्ग (उप नेता प्रतिपक्ष) आरजू स्निग्धा (सांसद), अश्विनी कुमार मिश्र (सांसद), कोमल बडोदेकर (सांसद), देवेश प्रताप सिंह (सांसद), मोहम्मद अनस (सांसद), सुशांत कनिष्का तिवारी (सांसद) ।
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भवदीय
लोकेन्द्र सिंह
Contact :
Department Of Mass Communication
Makhanlal Chaturvedi National University Of
Journalism And Communication
B-38, Press Complex, Zone-1, M.P. Nagar,
Bhopal-462011 (M.P.)
Mobile : 09893072930
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सुशांत सिंह राजपूत व अजय बिजली ने की पी.वी.आर. संगम सिनेमा की शुरूआत
नई दिल्ली। आर.के. पुरम दिल्ली के जाने-माने सिनेमा संगम, जो कि एक समय पर किफायती सिंगल स्क्रीन के रूप में जाना जाता था। एक बार फिर दिल्लीवासियों को लुभाने व उनका मनोरंजन करने को तैयार है अपने नये अंदाज, नये अवतार व नये नाम के साथ। संगम से पी.वी.आर. संगम के रूप में पुर्नःनिर्मित इस मल्टीप्लेक्स की शुरूआत हाल ही में अपनी नयी फिल्म ‘डिटेक्टिव व्योमकेश बक्शी’ के प्रचार के सिलसिले में दिल्ली आये अभिनेता सुशांत सिंह राजपूत व पी.वी.आर. लिमिटेड के चेयरमैन व प्रबंध निदेशक अजय बिजली ने की।
दक्षिणी दिल्ली के अन्तर्गत आर.के. पुरम स्थित पी.वी.आर. संगम की शुरूआत के साथ ही पी.वीआर. की दिल्ली/एन.सी.आर. के अन्तर्गत लगभग 140 सिनेमाघर हो गये हैं। औपचारिक लोकार्पण के साथ मल्टीप्लेक्स को शुक्रवार को सिनेप्रेमियों के लिए खोल दिया गया।
पुनर्निमित पी.वी.आर. संगम में अब दो स्क्रीन उपलब्ध होंगी जिनके माध्यम से दो आॅडी में लगभग 392 सीट (300 व 92) हैं। लगभग 13000 स्क्वेयर फुट क्षेत्र में फैले इस सिनेमा में 2के डिजीटल प्रोजेक्शन, 7.1 चैनल साउंड सहित 3डी के लिए तैयार बड़ी स्क्रीन मौजूद हैं और उम्मीद है कि हमेशा की तरह इस क्षेत्र के लोग यहां अपनी पसन्दीदा फिल्मों का लुत्फ उठा सकेंगे।
सिनेमा के विषय में बताते हुए अजय बिजली ने कहा कि, संगम सिनेमा के मालिकों ने इसे मिनी-माॅल / फिल्म-फूड हब में तब्दील करने की योजना बनायी जहां दर्शक फूड के साथ-साथ खान-पान का भी आनन्द दे सकें। हमें यह जगह मिली और हमने इसे अच्छी गुणवत्ता वाली स्क्रीन व साउण्ड के साथ आधुनिक मल्टीप्लेक्स के रूप में तैयार करने की अवधारणा तैयार की और हमें उम्मीद है कि दर्शक इस नये अनुभव को पसन्द करेंगे।
शुक्रवार को आम जनता हेतु शुरू किये गये इस सिनेमा की शुरूआत दम लगा के हईशा, ड्रैगन ब्लेड और एन.एच. 10 के शो के साथ हुई। ‘डिटेक्टिव ब्योमकेश बक्शी’ व ‘फास्ट एंड फ्युरियस 7’ के साथ नयी फिल्मों का दौर 3 अप्रैल से शुरू होगा।
दो देशों के बीच मधुर सम्बन्ध बनाता है मीडिया
भोपाल। लास एंजेल्स टाइम्स के दक्षिण एशिया के संवाददाता शशांक बंगाली ने छात्रों और पत्रकारों से बातचीत करते हुए पारंपरिक मीडिया और नविन मीडिया पर जानकारी साझा की l उन्होंने कहा न्यू मीडिया पर गुणवत्ता युक्त पत्रकरिता करने से अपनी पहचान बने जा सकती है l सोशल मीडिया का उपयोग कर रहे युवाओं को व्यक्तिगत फोटो और कंटेंट की जगह अर्थपूर्ण सामग्री पोस्ट करनी चाहिए l श्री बंगाली माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय में आयोजित विशेष व्याख्यान में मौजूद थे l इस मौके पर अमेरिकी व दक्षिण एशिया के लिए संवाददाता की एक विशेष व्याख्यान, लॉस एंजिल्स टाइम्स ने गुरुवार को भोपाल में माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय द्वारा आयोजित किया गया था। मुंबई से आये अमेरिका महावाणिज्य दूतावास के प्रेस अधिकारी जेफरी एलिस और सहायक मीडिया सलाहकार कार्तिक बी चव्हाण ने भी इस मौके पर अपने विचार व्यक्त किये l
श्री बंगाली ने बताया की संकटपूर्ण स्थितियों में परम्परागत मीडिया और सोशल मीडिया पर किस तरह महतवपूर्ण मुद्दों को कवर किया जाता है l उन्होंने किसी भी स्टोरी को रचनात्मक और पठनीय बनाने वाले तत्वों पर भी प्रकाश डाला l सूचनाओं के स्रोत और स्टोरी आईडिया को विकसित करने के तरीके भी मीडिया के छात्रों को बताये l इसके अलावा प्रेस अधिकारी जेफरी एलिस ने बताया कि दो देशों के बीच रिश्तों को मजबूत करने में पारंपरिक और सोशल मीडिया की अहम् भूमिका रहती है l राजनयिकों और नागरिकों को एक दुसरे के साथ जोड़ने के लिए सोशल मीडिया एक सशक्त मंच उपलब्ध करता है l अंतर्राष्ट्रीय और विदेश रिपोर्टिंग पर भी दोनों विद्वानों ने मीडिया छात्रों की जिज्ञासाओं का समाधान भी किया l इसके साथ ही भारत और अमेरिका की पत्रकारिता पर अपने अनुभव साझा किये l इस मौके पर प्रदेश के वरिष्ठ पत्रकारों सहित विश्वविद्यालय के प्रोडक्शन निदेशक श्री आशीष जोशी, न्यू मीडिया विभाग की अध्यक्ष डॉ पी. शशिकला, जनसंपर्क निदेशक डॉ पवित्र श्रीवास्तव एवं अन्य अधिकारी एवं कर्मचारी मौजूद थे l
डॉ पवित्र श्रीवास्तव
(निदेशक, जनसंपर्क)
बैंक ने लोन नहीं दिया तो आदिवासी महिलाओं ने बनाया खुद का बैंक
बड़वानी. महिलाओं का सहकारी बैंक। यथा नाम तथा गुण ‘समृद्धि ’। पहले अपने गांव की जरूरतमंद महिलाओं को सशक्त बनाया। 70 लाख रुपए का लोन भी बांटा। अब दूसरे गांव की महिलाओं को सबल करने निकल पड़ी हैं। ये वे ही महिलाएं हैं जिन्हें कुछ साल पहले बैंक ने लोन देने से मना कर दिया था। तब इन्होंने खुद का बैंक खोलने का न सिर्फ निश्चय किया बल्कि सफलता से कर भी दिखाया।
कामयाबी और महिला सशक्तिकरण की यह मिसाल कायम की है मध्यप्रदेश के बड़वानी जिले के गंधावल की आदिवासी महिलाओं ने। खुद में गांव में महिलाओं को अपने पैरों पर खड़ा करने के बाद इन्होंने पाटी में बैंक की एक शाखा खोल दी। इस बैंक में भी अध्यक्ष से लेकर तमाम स्टाफ महिलाओं का ही है। ब्रांच खोलने से पहले इसी बैंक की महिलाओं ने पाटी में ट्रेनिंग सेंटर भी खोला।
जिद करके ऐसे निकलीं दुनिया बदलने
करीब चार साल पहले गंधावल की इन महिलाओं ने खेती के लिए एक राष्ट्रीयकृत बैंक से ऋण मांगा था, लेकिन उन्हें मना कर दिया। महिलाएं तो जिद्दी थीं। दुनिया बदलना चाहती थीं। गंधावल बैंक की अध्यक्ष रेवाबाई ने बताया कि उन्होंने खुद की बैंक खोली। मप्र राज्य ग्रामीण आजीविका मिशन के सहयोग से 2011 में समृद्धि स्वायत्त साख सहकारी संस्था मर्यादित बैंक का पंजीयन कराया।
बैंक खोलने का मकसद था महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाना। उसे िजले के दो बैंक, नर्मदा झाबुआ व बैंक ऑफ इंडिया ने साख के आधार पर एक साल में िलमिट 11 लाख रुपए बढ़ा दी। 2013 में बैंक ने 13 लाख रुपए लिमिट तय की थी। 2014 में इसे बढ़ाकर 24 लाख कर दिया है। बैंक अब तक करीब 98 लाख रुपए का लोन बांट चुकी है। बचत है 30 लाख रुपए और 2800 लोग अब बैंक से लोन लेकर तरक्की कर रहे हैं।
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साभार- दैनिक भास्कर से
‘सरल’ मन से रचे गए ‘अटल’व्यक्तित्व का अलोक
पूर्व प्रधानमंत्री श्री अटल बिहारी वाजपेयी को भारत रत्न से अलंकृत किया गया।
प्रसंगवश आज उनकी कविताओं के प्रेरक संसार से एक बार फिर गुजरने का मन किया।
कहते हैं कि कवि, रचयिता और दृष्टा भी अगर हो तो उसकी रचना प्रक्रिया में वह खुद भी रचा जाता है। कहना न होगा कि देश में राजनेता तो अनेक हुए और हैं, आगे भी होंगे किन्तु कौन नहीं मानेगा कि अटल जी की ओजस्वी वक्तृता और कवि रूप में उनकी संवेदनशीलता ने उन्हें औरों से अलग पहचान दी है।
मैं यह मानता हूँ कि अटल जी की कविताओं में उनकी गहन अनुभूति के अलावा जीवन संघर्ष को हर्ष में बदलने के अचूक सूत्र छुपे हुए हैं। यही कारण है कि महज़ राजनीति के लिए राजनीति उन्हें कभी रास नहीं आई। अक्सर वे कभी बेचैन तो कभी बदलाव के लिए बेबस दिखाई पड़ते रहते रहे तो कभी हालात को न समझने की लोगों घोर की लापरवाही से खिन्न भी हुए।
बहरहाल, आइये, अदम्य जीवट,ज़ज़्बे और जीवंतता को समर्पित अटल जी के सरल और निर्मल मन के साथ-साथ उनके निश्चल मस्तिष्क से निकली काव्यधारा की कुछ तरंगों में उनकी अपराजेय जिजीविषा को हम एकबारगी फिर जी कर देखें। मन की गांठें खोलें। दूरियों के दर्द से दूर करें। मन-मुटाव के भटकाव को अलविदा कहें। अंध प्रतिस्पर्धा और प्रतिद्वंद्विता के द्वंद्व से किनारा करके देखें। ज़िंदगी के लिए कोई नया नज़रिया तलाश करें।
तो ये रहे भारत रत्न अटल जी के सफल जीवन के प्रमाण बने कुछ अनमोल काव्य मोती –
सत्ता
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मासूम बच्चों,
बूढ़ी औरतों,
जवान मर्दों की लाशों के ढेर पर चढ़कर
जो सत्ता के सिंहासन तक पहुंचना चाहते हैं
उनसे मेरा एक सवाल है :
क्या मरने वालों के साथ
उनका कोई रिश्ता न था?
न सही धर्म का नाता,
क्या धरती का भी संबंध नहीं था?
पृथिवी मां और हम उसके पुत्र हैं।
अथर्ववेद का यह मंत्र
क्या सिर्फ जपने के लिए है,
जीने के लिए नहीं?
आग में जले बच्चे,
वासना की शिकार औरतें,
राख में बदले घर
न सभ्यता का प्रमाण पत्र हैं,
न देश-भक्ति का तमगा,
वे यदि घोषणा-पत्र हैं तो पशुता का,
प्रमाश हैं तो पतितावस्था का,
ऐसे कपूतों से
मां का निपूती रहना ही अच्छा था,
निर्दोष रक्त से सनी राजगद्दी,
श्मशान की धूल से गिरी है,
सत्ता की अनियंत्रित भूख
रक्त-पिपासा से भी बुरी है।
पांच हजार साल की संस्कृति :
गर्व करें या रोएं?
स्वार्थ की दौड़ में
कहीं आजादी फिर से न खोएं।
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मरेंगे तो इसके लिए
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भारत जमीन का टुकड़ा नहीं,
जीता जागता राष्ट्रपुरुष है।
हिमालय मस्तक है, कश्मीर किरीट है,
पंजाब और बंगाल दो विशाल कंधे हैं।
पूर्वी और पश्चिमी घाट दो विशाल जंघायें हैं।
कन्याकुमारी इसके चरण हैं, सागर इसके पग पखारता है।
यह चन्दन की भूमि है, अभिनन्दन की भूमि है,
यह तर्पण की भूमि है, यह अर्पण की भूमि है।
इसका कंकर-कंकर शंकर है,
इसका बिन्दु-बिन्दु गंगाजल है।
हम जियेंगे तो इसके लिये
मरेंगे तो इसके लिये।
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आओ फिर से दिया जलाएँ
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आओ फिर से दिया जलाएँ
भरी दुपहरी में अंधियारा
सूरज परछाई से हारा
अंतरतम का नेह निचोड़ें-
बुझी हुई बाती सुलगाएँ।
आओ फिर से दिया जलाएँ
हम पड़ाव को समझे मंज़िल
लक्ष्य हुआ आंखों से ओझल
वतर्मान के मोहजाल में-
आने वाला कल न भुलाएँ।
आओ फिर से दिया जलाएँ।
आहुति बाकी यज्ञ अधूरा
अपनों के विघ्नों ने घेरा
अंतिम जय का वज़्र बनाने-
नव दधीचि हड्डियां गलाएँ।
आओ फिर से दिया जलाएँ
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ऊँचाई
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ऊँचे पहाड़ पर,
पेड़ नहीं लगते,
पौधे नहीं उगते,
न घास ही जमती है।
जमती है सिर्फ बर्फ,
जो, कफ़न की तरह सफ़ेद और,
मौत की तरह ठंडी होती है।
खेलती, खिलखिलाती नदी,
जिसका रूप धारण कर,
अपने भाग्य पर बूंद-बूंद रोती है।
ऐसी ऊँचाई,
जिसका परस
पानी को पत्थर कर दे,
ऐसी ऊँचाई
जिसका दरस हीन भाव भर दे,
अभिनंदन की अधिकारी है,
आरोहियों के लिये आमंत्रण है,
उस पर झंडे गाड़े जा सकते हैं,
किन्तु कोई गौरैया,
वहाँ नीड़ नहीं बना सकती,
ना कोई थका-मांदा बटोही,
उसकी छाँव में पलभर पलक ही झपका सकता है।
सच्चाई यह है कि
केवल ऊँचाई ही काफ़ी नहीं होती,
सबसे अलग-थलग,
परिवेश से पृथक,
अपनों से कटा-बँटा,
शून्य में अकेला खड़ा होना,
पहाड़ की महानता नहीं,
मजबूरी है।
ऊँचाई और गहराई में
आकाश-पाताल की दूरी है।
जो जितना ऊँचा,
उतना एकाकी होता है,
हर भार को स्वयं ढोता है,
चेहरे पर मुस्कानें चिपका,
मन ही मन रोता है।
ज़रूरी यह है कि
ऊँचाई के साथ विस्तार भी हो,
जिससे मनुष्य,
ठूँठ सा खड़ा न रहे,
औरों से घुले-मिले,
किसी को साथ ले,
किसी के संग चले।
भीड़ में खो जाना,
यादों में डूब जाना,
स्वयं को भूल जाना,
अस्तित्व को अर्थ,
जीवन को सुगंध देता है।
धरती को बौनों की नहीं,
ऊँचे कद के इंसानों की जरूरत है।
इतने ऊँचे कि आसमान छू लें,
नये नक्षत्रों में प्रतिभा की बीज बो लें,
किन्तु इतने ऊँचे भी नहीं,
कि पाँव तले दूब ही न जमे,
कोई काँटा न चुभे,
कोई कली न खिले।
न वसंत हो, न पतझड़,
हो सिर्फ ऊँचाई का अंधड़,
मात्र अकेलेपन का सन्नाटा।
मेरे प्रभु!
मुझे इतनी ऊँचाई कभी मत देना,
ग़ैरों को गले न लगा सकूँ,
इतनी रुखाई कभी मत देना।
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प्राध्यापक,हिन्दी विभाग, शासकीय दिग्विजय
स्वशासी स्नातकोत्तर महाविद्यालय,
राजनांदगांव। मो.09301054300
अनुसंधान से संवारें सुखद भविष्य के सुनहरे सपने
प्रकृति ने संसार को अनेक चमत्कारों से नवाजा हैं। कुछ चमत्कारों की खोज भी एक लंबे अंतराल के शोध के बाद ही संभव हो सकी थी। यही कारण है कि किसी भी सत्य की खोज और उसकी पुष्टी के लिए शोध का होना अनिवार्य होता है। मानव की जिज्ञासु प्रवृत्ति ने ही शोध प्रक्रिया को जन्म दिया । किसी भी सत्य को निकटता से जानने के लिए शोध एक महत्वपूर्ण प्रक्रिया होती है। समय- समय पर विभिन्न विषयों की खोज और उनके अध्ययन और निष्कर्षो की विश्वसनीयता और प्रमाणिकता भी शोध की मदद से ही संभव हो पाती है।
जैसे-जैसे समय बीत रहा हैं वैसे वैसे मानव की समस्या भी विकट होती जा रही है। हर दिन एक नई समस्या से उसे दो चार होना पड़ता है। ऐसे में शोध की महत्ता स्वतः ही पैदा हो जाती है। हालांकि मानव की सोच विविधता वाली होती है और उसकी रूचि, प्रकृति, व्यवहार, स्वभाव और योग्यता भिन्न – भिन्न होती है। इस लिहाज से अनेक जटिलताएं भी पैदा हो जाती है। इस लिहाज से मानवीय व्यवहारों की अनिश्चित प्रकृति के कारण जब हम उसका व्यवस्थित ढंग से अध्ययन कर किसी निष्कर्ष पर आना चाहते हैं तो वहां पर हमें शोध का प्रयोग करना होगा। इस तरह सरल शब्दों में कहें तो सत्य की खोज के लिए व्यवस्थित प्रयत्न करना या प्राप्त ज्ञान की परीक्षा के लिए व्यवस्थित प्रयत्न भी शोध कहलाता है। तथ्यों कर अवलोकन करके कार्य- कारण संबंध ज्ञात करना अनुसंधान की प्रमुख प्रक्रिया है।
किसी भी विषय पर अच्छा काम कर उसे उपयोगी और महत्वपूर्ण बनाया जा सकता है। वैसे इन दिनों मानविकी और समाज विज्ञानों में दलित, आदिवासी, स्त्री, भूमंडलीकरण, गरीबी, निजीकरण, उदारीकरण, बाजारवाद, किसान आदि से जुड़े विषयों का चलन है। प्राकृतिक विज्ञानों में कोई भी नई खोज या प्रयोग महत्वपूर्ण होता है जिसमें नए और उत्तेजक निष्कर्ष निकल रहे हों। चिकित्सा के क्षेत्र में नित-नई खोजें इसी प्रक्रिया का परिणाम हैं। माइक्रोबायोलॉजी और नैनो टैक्नोलॉजी इन दिनों प्राकृतिक विज्ञानों संबंधी शोधकार्यो में लोकप्रिय विषय हैं।
शोध का प्रमुख लक्ष्य वैज्ञानिक पद्वति के प्रयोग द्वारा प्रश्नों के उत्तर खोजना है इसका उद्देश्य अध्ययनरत समस्या के अंदर छुपी हुई यर्थाथता का पता लगाना या उस सबकी खोज करना है जिसकी जानकारी समस्या के बारे में नहीं है। वैसे प्रत्येक शोध के अपने विशेष लक्ष्य होते है फिर भी सामाजिक शोध को निम्नलिखित प्रकारों में विभाजित किया हैं-
1 किसी घटना के बारे में जानकारी प्राप्त करना या इसके बारे में नवीन ज्ञान प्राप्त करना- इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए की जाने वाली शोध को अन्वेषणात्मक अथवा निरूपणात्मक शोध कहते है।
2 किसी व्यक्ति परिस्थिति या समूह की विशेषता का सही चित्रण करने के लिए की जाने वाली शोध को वर्णनात्मक शोध कहते है।
3 किसी वस्तु या घटना के घटित होने की आवृत्ति निर्धारित करना या किसी अन्य वस्तु या घटना के साथ संबंध स्थापित करने के लिए निदानात्मक शोध उपयोग में लाई जाती है।
4 विभिन्न चरो में कार्य कारण संबंधों वाली उपकल्पनाओं का परीक्षण करने के लिए उपकल्पना परीक्षण अनुसंधान या प्रायोगिक शोध उपयोग में लाई जाती है।
आज अध्यापन के अलावा दूसरे क्षेत्रों में विशेषज्ञों की बढ़ती मांग ने शोध के प्रति रुझान बढ़ाया है। आज विश्वविद्यालयी शोध के गिरते स्तर और शोधार्थियों को पेश आ रही मुश्किलों को ध्यान में रखते हुए शोध के बारे में एक बुनियादी समझ बनाना जरूरी हो गया है।
बढ़ता रुझान
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नामी शोध संस्थानों से मिली जानकारी के मुताबिक पिछले वर्षो में शोध उपाधियों में प्रवेश लेने के इच्छुक अभ्यर्थियों की संख्या में भारी इजाफा हुआ है। जवाहरलाल नेहरू विश्व-विद्यालय में जहां पांच साल पहले सामान्यत: एम.फिल़ और डायरेक्ट पीएच़ डी. में प्रवेश के लिए आवेदन करने वालों की संख्या क्रमश: 100-150 और 10-15 हुआ करती थी, वहीं अब यह संख्या 500-1000 और 50-100 तक पहुंच गई है।
शोध उपाधियों हेतु बढ़ते रुझान के दो प्रमुख कारण हैं- रोजगार के लिए शोध की बढ़ती अनिवार्यता और पिछले वर्षो में शुरू हुई विभिन्न शोधवृत्तियां। अच्छे उच्च शिक्षण संस्थानों में अध्यापन के लिए तो शोध अनिवार्य हो गया है।
इसके साथ ही निजी एवं बहुराष्ट्रीय कंपनियों, गैर सरकारी संगठनों आदि में भी शोध उपाधि धारकों को वरीयता दी जाती है। सभी बड़े संस्थानों में रिसर्च एण्ड डवलपमेंट (आरएंडडी) विभाग होता है, इसके अलावा निजी संस्थानों और कंपनियों में ‘कॉपरेरेट सोशल रेसपॉन्सबिलिटी’ विभाग होता है, जहां पीएचडी धारकों को वरीयता दी जाती है। गैर सरकारी संगठनों में भी इनकी जरूरत होती है।
विषय चयन
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– विषय आपकी रुचि का हो, न कि किसी का थोपा हुआ क्योंकि थोपे हुए विषय पर आप न तो अच्छा शोध कर सकते हैं और न ही बाद में साक्षात्कार में अपेक्षित जवाब दे सकते हैं।
– विषय समयसामयिक महत्व का होना चाहिए। ऐसे विषय का चुनाव करें जिसकी आप साक्षात्कार में प्रासंगिकता स्पष्ट कर सकें।
– विषय में अधिक फैलाव से बचना चाहिए। विषय सीधे समस्या पर केंद्रित हो, इसलिए विषय चुनने से पहले समस्या की पड़ताल करें। उदाहरण के लिए अगर आपको भूमंडलीकरण से संबंधित विषय लेना है तो ‘दुनिया पर भूमंडलीकरण का प्रभाव’ की जगह किसी छोटे क्षेत्र पर भूमंडलीकरण के खास प्रभाव का अध्ययन ज्यादा अच्छा विषय होगा।
निदेशक का चुनाव
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जेएनयू जैसे कुछ विश्वविद्यालय गाइड (शोध निर्देशक) के चयन का अधिकार शोधार्थी को देते हैं। कई विश्वविद्यालयों में सीटों की उपलब्धता के आधार पर गाइड शोधार्थी का चयन करते हैं। अगर शोधार्थी के पास चयन की छूट हो तो गाइड के रूप में ऐसे व्यक्ति का चुनाव करना चाहिए जिसका विशेषज्ञता क्षेत्र आपके शोध विषय से संबंधित हो।
सारांश निर्माण
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सिनॉप्सिस या शोध प्रारूप शोध का पहला चरण है। कुछ विश्वविद्यालयों में प्रवेश के वक्त ही शोध प्रारूप ले लिया जाता है। सिनॉप्सिस आपके भावी शोध की रूपरेखा प्रस्तुत करती है, इसलिए इसे बहुत सावधानी से बनाएं। विषय की बुनियादी जानकारी जरूरी है। अपने क्षेत्र से जुड़ी महत्वपूर्ण किताबें पढ़ने के बाद ही सिनॉप्सिस बनाएं।
अध्याय विभाजन
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क्षेत्र, उद्देश्य और संभावनाएं : इसमें शोधार्थी अपने विषय को स्पष्ट करता है और संबंधित विषय में शोध की उपादेयता सिद्ध करता है। एक हाइपोथीसिस (शोध परिकल्पना) प्रस्तुत करता है कि शोध के संभावित परिणाम कितने महत्वपूर्ण हो सकते हैं।
शोध की वर्तमान स्थिति : इसमें शोधार्थी को अपने विषय से संबंधित अब तक हुए शोध कार्यो का ब्यौरा देना पड़ता है। नई दिल्ली स्थित भारतीय विश्वविद्यालय संघ (एसोशिएशन ऑफ इंडियन यूनिवर्सिटीज) ने भारतीय विवि. में हुए तमाम शोध कार्यो के विषयों का एक वृहद कैटलॉग बनाया है। इससे शोधार्थी यह जान पाता है कि अपने शोध विषय जुड़े क्षेत्र में कहां कहां शोध कार्य हो चुका है। विषय के संबंध में सीनियर्स से बात करना भी अच्छा रहेगा।
शोध विषय में नवीनता : शोधार्थी का विषय और भावी शोध कार्य कैसे अलग और नया है, यह शोधार्थी को सिनॉप्सिस के इस हिस्से में स्पष्ट करना चाहिए। कई बार शोध का विषय पुराने विषय से बहुत मेल खाता है, ऐसी स्थिति में शोधार्थी को अपने कार्य की भिन्नता को विस्तृत रूप से बताना अनिवार्य होगा।
शोध विधि : यह शोध में अपनाई जाने वाली पद्धति है। यह हमारे विषय और अनुशासन पर निर्भर करता है कि हमें कौन सी शोध पद्धति ज्यादा उपयोगी लगेगी। तुलनात्मक, समाजशास्त्रीय, ऐतिहासिक, मनोवैज्ञानिक आदि पद्धतियां मानविकी संबंधी शोधकार्यों में प्रचलित हैं।
अध्याय योजना : इसे आप अपने भावी शोध प्रबंध का मूलाधार कह सकते हैं। यह उन रेखाओं का नाम है जिनमें रंग भरकर हम मुकम्मल तस्वीर बनाते हैं। अच्छी अध्याय योजना बनाने के लिए विषय की समुचित जानकारी होना जरूरी है। सामान्यत: एम.फिल़ में दो या तीन अध्याय होते हैं और पीएच़डी़ में पांच से सात अध्याय होते हैं। शुरुआती अध्याय विषय से जुड़े सैद्धांतिक प्रश्नों से टकराते हैं और बाद के मूल विषय और समस्या से। अंत में निष्कर्ष या उपसंहार लिखने की परंपरा है।
संदर्भ ग्रंथ सूची : शोध कार्य के दौरान उपयोग में लाई गई किताबों की सूची को संदर्भ ग्रंथ सूची या बिबलियोग्राफी कहते हैं। कुछ शोध विषयों में हम कुछ पाठ (टेक्स्ट) का अध्ययन करते हैं। ऐसे शोध प्रबंध में हम संदर्भ ग्रंथ सूची को दो भागों में बाँटते हैं- प्राथमिक ग्रंथ (प्राइमरी सोर्स) और सहायक ग्रंथ (सैकेंडरी सोर्स)। इनमें किताबों के अलावा उपयोग में लाई गई पत्र-पत्रिकाएं, विश्वकोश, जर्नल, वेबसाइट आदि का भी ब्यौरा देना चाहिए।
शोधार्थी को अपने विषय का नयापन और महत्ता साबित करते हुए संभावित शोध का एक खाका पेश करना होता है। सिनॉप्सिस बनाने में शोधार्थी अपने गाइड की मदद ले सकते हैं। गाइड की सहमति के बाद विभाग के रास्ते विश्वविद्यालय की शोध समिति तक आपकी सिनॉप्सिस जाती है।
ऐसे होगी राह आसान
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पिछले वर्षों में शोध के प्रति रुझान बढ़ने का एक कारण यह भी है कि इस बीच भारत सरकार द्वारा नई-नई शोधवृत्तियां (फैलोशिप) शुरू की गईं हैं तथा यूजीसी की जूनियर रिसर्च फैलोशिप और सीनियर रिसर्च फैलोशिप को भी बढ़ाया गया है।
पहले विद्यार्थियों की समझ थी कि बेरोजगारी में शोध के लिए व्यर्थ समय और धन क्यों खर्च करें, लेकिन बढ़ती फैलोशिपों ने इस सोच को बदला है। वैसे भी सरकारी शोध संस्थानों में मानविकी आदि के क्षेत्रों में शोध में ज्यादा खर्चा नहीं आता है। विज्ञान संबंधी शोधों के लिए अतिरिक्त फैलोशिपों और कंटीजेंसी की व्यवस्था की गई है। इसलिए अब शोध करना आर्थिक दृष्टि से आसान हुआ है।
प्रमुख संस्थान
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मानविकी और समाज विज्ञानों के क्षेत्र में-
– जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, नई दिल्ली विश्वविद्यालय, नई दिल्ली
– हैदराबाद विश्वविद्यालय, हैदराबाद
-टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंसेज, मुंबई इलाहाबाद विश्वविद्यालय, इलाहाबाद
-कलकत्ता विश्वविद्यालय, कोलकाता
प्राकृतिक विज्ञान और तकनीक के क्षेत्र में
– इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ साइंसेज, बंगलूरू
– आईआईटी, दिल्ली, मुंबई, चैन्नई, कानपुर, रुड़की आदि।
– भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान, दिल्ली (पूसा)
– स्नातकोत्तर चिकित्सा शिक्षा एवं अनुसंधान संस्थान, चंडीगढ़, (चिकित्सा)
– एम्स, नई दिल्ली।
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लेखक छत्तीसगढ़ राज्य अलंकरण से सम्मानित
शासकीय दिग्विजय स्वशासी स्नातकोत्तर
महाविद्यालय, राजनांदगांव के प्रोफ़ेसर हैं।
मो.09301054300
नरेंद्र मोदीः देश ने मान लिया दिल्ली कब मानेगी
जमीन की जंग में नरेंद्र मोदी उलझ से गए लगते हैं। इसने पूरे विपक्ष को एकजुट तो किया ही है, साथ ही यह छवि भी प्रक्षेपित कर दी है कि सरकार को किसानों की चिंता नहीं है। अध्यादेशी आतुरता ने सरकार को दर्द के उस चौराहे पर खड़ा कर दिया है, जहां से आगे जाने और पीछे जाने दोनों में खतरा है। सरकार चलाना इसीलिए संख्या बल से ज्यादा सावधानी का खेल है। जमीन को लेकर कौन क्या कहता रहा है, इसे छोड़कर वे सब सरकार के खिलाफ एकजुट हैं, जिन्होंने यूपीए के भूमिअधिग्रहण कानून पर ही सवाल उठाए थे। यह बात बताती है कि सारा कुछ इतना सरल और साधारण नहीं है, जैसा समझा जा रहा है।
दिल्ली में पराए हैं वेः
साधारण सी राजनीतिक समझ रखने वाला भी जान रहा है कि गुजरात से दिल्ली की यात्रा नरेंद्र मोदी ने, जनता के अपार प्रेम के चलते पूरी जरूर कर ली है पर लुटियंस की दिल्ली में अभी वे पराए ही हैं। टीवी चैनलों के बहसबाजों, अखबारों के विमर्शकारों, दिल्ली में बसने वाले बुद्धिवादियों के लिए नरेंद्र मोदी आज भी स्वीकार्य कहां हैं? मोदी आज भी इस कथित बौद्धिक समाज द्वारा स्वीकारे नहीं जा सके हैं। इस छोटे से वर्ग का विमर्श सीमित, आत्मकेंद्रित, दिल्लीकेंद्रित और भारतविरोधी है। इसे न तो वे छिपाते हैं, न ही उन्हें एक बड़े राजनीतिक परिवर्तन के बाद अपने विमर्शों में संशोधन की जरूरत लगती है। नरेंद्र मोदी जिस विचार परिवार के नायक हैं, वह विचार परिवार ही इस वर्ग के लिए स्वीकार्य नहीं है बल्कि उसकी निंदा के आधार पर ही इन सबकी राजनीति बल पाती है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और उसके विचार परिवार की यात्रा ने जो लोकस्वीकृति प्राप्त की है वह चौंकाती जरूर है, किंतु हमारे बुद्धिजीवी उस संदेश को पढ़कर खुद में बदलाव लाने के बजाए मोदी की सरकार को नाहक सवालों पर घेरने में लगे हैं। शायद इसीलिए सरकार बनते ही मोदी पर जो हमले शुरू हुए तो मोदी ने इस खेल को समझकर ही कहा था-“ जिन्होंने साठ साल तक कुछ नहीं किया वे हमसे पांच महीने का हिसाब मांग रहे हैं।“
भारतद्वेषी बुद्धिजीवियों के निशाने परः
मोदी का संकट लुटियंस की दिल्ली में बसने वाले भारतद्वेषी बुद्धिजीवी तो हैं ही, उनके अपने परिवार में भी संकट कम नहीं हैं। दिल्ली में आए मोदी की स्वीकार्यता स्वयं दिल्ली के भाजपाई दिग्गजों में भी नहीं थी। परिवार की एक लंबी महाभारत के बाद वे दिल्ली की गद्दी पर आसीन तो हो गए पर परिणाम देने की चुनौती अभी भी शेष है। आज भी दिल्ली के टीवी चैनलों का विमर्श क्या है, वही निरंजन ज्योति या हिंदू महासभा के कुछ नेताओं के बयान। यह आश्चर्यजनक है कि एक ऐसा संगठन हिंदू महासभा, जिसकी कोई आवाज नहीं है। उसका कोई आधार शेष हो, इसकी जानकारी नहीं। किंतु किस आधार पर हिंदू महासभा को बीजेपी से जोड़कर मोदी से जवाब मांगे जाते हैं, यह समझना मुश्किल है। इतिहास में भी हिंदू महासभा और आरएसएस के रास्ते अलग-अलग रहे हैं। साध्वी निरंजन ज्योति के बारे में अशोक सिंहल कह चुके हैं वे विश्व हिंदू परिषद से संबंधित नहीं हैं। आखिर क्यों देश के प्रधानमंत्री को इन सबके बयानों के कठघरे में खड़ा किया जाता है? अपने चुनाव अभियान से आज तक नरेंद्र मोदी ने कोई कटु बात किसी भी समुदाय के बारे में नहीं कही है। वे आरएसएस से जुड़े हैं, इसे उन्होंने नहीं छिपाया है। स्वयं संघ के नेतृत्व ने ज्यादा बच्चों के बयान पर आगे आकर यह कहा कि “हमारी माताएं बच्चा पैदा करने की मशीन नहीं हैं। वे बच्चों के बारे में स्वयं निर्णय करेंगीं।“
संघ परिवार का राजनीतिक विवेक है कसौटी परः
जाहिर तौर पर नरेंद्र मोदी को विफल करने के लिए एक बड़ा कुनबा लगा हुआ है। जिसमें राजनीतिक दलों के अलावा, प्रशासन के आला अफसर, वैचारिक दिवालिएपन के शिकार बुद्धिजीवी, मीडिया के लोग भी शामिल हैं। यह एक सरकार का बदलना मात्र नहीं है। एक राजनीतिक संस्कृति का बदलाव भी है। देश की बेलगाम नौकरशाही यह स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं है। वे मोदी को सफल होने देंगे इसमें संदेह है। सरकार की प्रशासनिक मिशनरी पर किस मन और मिजाज के लोग हैं, कहने की आवश्यक्ता नहीं है। मोदी उन्हें कस रहे हैं किंतु वे चपल-चालाक लोग हैं, जिन्होंने मनमोहन सिंह जैसे पढ़े-लिखे आदमी का सत्यानाश कर दिया। 10-जनपथ और प्रधानमंत्री निवास की जंग में देश ने अपने इतिहास के सबसे बुरे दिन देखे, किंतु नौकरशाही मस्त रही।
आज वही नौकरशाही नरेंद्र मोदी के रास्ते में इतिहास का सबसे बेहतर प्रधानमंत्री हो सकने की संभावना में बाधक है। मोदी के आलोचक सड़कों पर उतर आए हैं और उनके समर्थक बिना किसी गलती के खुद को अपराधी समझने की मनोभूमिका में आ गए हैं। इस अवसाद को हटाना भाजपा संगठन की जिम्मेदारी है। राजनीतिक क्षेत्र में बदलाव के लिए लोग बैचेन हैं। बहुत उम्मीदों से वे नरेंद्र मोदी को एक असंभव सी दिखने वाली जीत दिला चुके हैं, किंतु अब डिलेवरी का वक्त है। इतिहास नरेंद्र मोदी, भाजपा, आरएसएस सबसे हिसाब मांगेगा। यह नहीं चलेगा कि कड़वा-कड़वा थू और मीठा-मीठा गप। इसलिए संघ परिवार का राजनीतिक विवेक भी कसौटी पर है। उन सबकी पहली जिम्मेदारी सरकार को हमलों से बचाने की है। छवि को बनाए रखने की है और अपनी ओर से ऐसा कोई काम न करने की है, जिससे सरकार की गरिमा को ठेस लगे। संघ परिवार और भाजपा में बेहतर समन्वय के लिए अभी और प्रयासों की जरूरत है। प्रधानमंत्री और उनकी सरकार पर भरोसा करते हुए उसकी निगहबानी की जरूरत है। भारत जैसे देश में जहां पिछले तीन दशकों से मिलीजुली सरकारों के प्रयोग हो रहे हैं, वहां पूरे बहुमत के साथ सत्ता में आना एक उपलब्धि से ज्यादा जिम्मेदारी है।
नरेंद्र मोदी इतिहास के इस क्षण में अपनी जिम्मेदारियों से भाग नहीं सकते। वे संवाद कुशल हैं। संवाद के माध्यम से उन्होंने एक गांव बड़नगर से दिल्ली तक की यात्रा तय की है। अब उनके सामने कुछ कर दिखाने का समय है। उन्हें बताना होगा कि जनता ने अगर उन पर भरोसा किया है तो यह गलत नहीं है। उन्हें अपने विरोधियों, आलोचकों को गलत साबित करना होगा। क्योंकि अगर उनके आलोचक गलत साबित होते हैं, तो देश जीतता हुआ दिखता है। उनके आलोचकों की पराजय दरअसल भारत की जीत होगी। भारत ने भारत की तरह देखना और सोचना शुरू कर दिया है। पर ये अभी पहला मुबारक कदम है नरेंद्र मोदी को अभी इस देश के सपनों में रंग भरने हैं। उम्मीदों से खाली देश में फिर से उम्मीदों का ज्वार भरना है। चुनावों के बाद नए चुनाव आते हैं, इनमें हार या जीत होती है। किंतु देश का नेता उम्मीदों और सपनों की तरफ जनप्रवाह प्रेरित करता है। मोदी में वह शक्ति है कि वे यह कर सकते हैं। नीतियों के तल पर, डिलेवरी के मोर्चे पर अभी बहुत कुछ होना शेष है। एक बड़ा हिंदुस्तान अभी भी अभावों से घिरा है। असुरक्षा से घिरा है। रोजाना रोटी के संघर्षों में लगा है। उसकी उम्मीदें हर नई सरकार के साथ उगती हैं और फिर कुम्हला जाती हैं। सत्ता के आतंक और सत्ता के दंभ के किस्से इस देश ने साठ सालों में बहुत देखे-सुने हैं। गुस्से में आकर सरकारें बदली हैं। मोदी ने भी इस गुस्से का लाभ लेकर अच्छे दिनों का वादा कर राजसत्ता पाई है। उन्हें हर पल यह सोचना होगा कि वे दिल्ली में आकर दिल्ली वालों सरीखे तो नहीं हो जाएंगे। उनके विरोध में आ रहे तर्क बताते हैं कि नरेंद्र मोदी बदले नहीं हैं। वे कुछ करेंगे यह भरोसा भी है। किंतु सबसे जरूरी यह है कि उनके अपने तो उन पर भरोसा रखें और थोड़ा धीरज भी धरें।
(लेखक राजनीतिक विश्लेषक हैं)
लोग अब बरखा, अर्णव और इनके जैसे लोगों से उब चुके हैं
मुंबई में फिक्की फ्रेम्स 2015 के पहले दिन के पहले सत्र की शुरुआत टाटा स्काई के सीईओ और एमडी हरित नागपाल ने अपने इस धुँआधार वक्तव्य से चर्चा की शुरुआत की। चर्चा का विषय था- भारत किस तरह मीडिया और मनोरंजन की विश्वव्यापी महाशक्ति बन सकता है (‘How can India be the global Media and Entertainment superpower)। उन्होंने सकारात्मक प्रतिक्रिया देते हुए कहा, मेरे लिए यह बहुत सामान्य बात है क्योंकि इस समय भारत विश्व की 50 सबसे बड़ी मीडिया और मनोरंजन अर्थव्यवस्थाओं में से है। सबसे अच्छी बात यह है कि हमारी वृद्धि दो-अंकीय है। पिछले पांच सालों से यह उसी स्तर पर है। इसलिए हमारे लिए सबसे जरूरी यह है कि हम इससे आगे बढ़ें ताकि महाशक्ति बन सकें। हमें इस चरण पर खुद से दो सवाल करने चाहिए- क्या हम कुछ अलग करने वाले हैं और जो कर रहे हैं, उसमें ही थोड़ा सा अलग करेंगे?
उन्होंने कुछ भारतीय ब्रैंड्स के उदाहरण दिए जैसे निरमा, लिज्जत पापड़, घड़ी डिटर्जेंट और चिक जिन्होंने मीडिया की बदौलत इस प्रतिस्पर्धात्मक बाजार में बड़ी बहुराष्ट्रीय कंपनियों को चुनौती दी। मीडिया ने न सिर्फ उपभोग को बढ़ाया, बल्कि वह आम लोगों तक निर्माण और वितरण को भी लेकर गया।
हरित ने मीडिया और मनोरंजन उद्योग की मुख्य समस्याओं में से एक पर चर्चा की। उन्होंने कहा, हमारे यहां नए विचारों और रचनात्मकता का अभाव है। अगर किसी को एक सफल प्रारूप मिल गया, तो उसके पीछे 20 लोग आंखें मूंदकर कूद पड़ते हैं। लोग यह नहीं समझ पाते कि किसी और स्टार प्लस या जीटीवी की हमें जरूरत नहीं, और अरनब गोस्वामी भी सिर्फ एक हैं और बरखा दत्त भी एक ही हैं। इसलिए जैसे ही कोई नया मनोरंजन चैनल शुरू होता है और वह वही सब दिखाता है तो उसकी दर्शक संख्या और राजस्व गिरने लगता है। फिर वे 20 से 22 मिनट के विज्ञापनों पर दांव लगाना शुरू करते हैं। नियामक उनसे सवाल करते हैं और उन्हें अदालतों के चक्कर लगाने पड़ते हैं। दूसरी बात यह है कि हमें निर्माण को बड़े शहरों से छोटे शहरों की ओर ले जाना चाहिए क्योंकि असली प्रतिभा हमारे देश के सुदूर इलाकों में बसती है।
इसके बाद हरित ने उन क्षेत्रों के बारे में चर्चा की जहां सरकार को तेजी दिखानी चाहिए जिससे मीडिया और मनोरंजन उद्योग को लाभ हो। उनके अनुसार, उद्योग पर ग्लैमर, प्रचार, रचनात्मकता और सशक्तीकरण जैसे शब्दों का ठप्पा लगा हुआ है जिसके लिए खुद उद्योग और सरकार दोनों जिम्मेदार हैं। यह उद्योग किसी भी दूसरे उद्योग जैसा है जो लोगों को लाभ पहुंचाता है, रोजगार का सृजन करता है और अर्थव्यवस्था को आगे बढ़ाता है। इसने पिछले कई सालों में ऐसा किया भी है। जहां तक टाटा स्काई की बात है तो पिछले तीन-चार सालों में अगर 50 लाख लोग इसके डिजिटल ग्राहक बने हैं तो इसने सरकार को टैक्स भी ज्यादा दिया है और इसके कंटेंट प्रोवाइडर भी बढ़े हैं। अपनी ग्रामीण उद्यमिता दक्षता योजना के जरिए हम गांवों में 80 हजार नए उद्यमी तैयार करना चाहते हैं और उन्हें पूर्णकालिक रोजगार देना चाहते हैं। एक साल से भी कम समय में, हमने 20 हजार उद्यमियों को रोजगार दिया है। इसलिए यहां सिर्फ ग्लैमर नहीं है। यह कहा जाता है कि इस उद्योग ने 60 लाख लोगों को रोजगार दिया है। और मेरा मानना है कि यह संख्या बढ़ने वाली है।
उन्होंने कहा कि हमारे यहां कारोबार शुरू करना थका देनेवाली प्रक्रिया है क्योंकि किसी कारोबारी को सरकार की तरफ से कई तरह की अनुमतियां और स्वीकृतियां लेनी पड़ती हैं। हम 250 करोड़ रुपए के लिए सूचना और प्रसारण मंत्रालय से अनुमति का इंतजार कर रहे हैं। परियोजना के लिए पैसा आ गया है। लेकिन अगर 48 घंटे में अनुमति नहीं मिली तो हमें विदेशी निवेशकों को पैसा लौटाना होगा।
अगले सत्र में सूचना और प्रसारण मंत्रालय के अतिरिक्त सचिव जे.एस.माथुर ने इस पर खुलासा किया और कहा कि हमने एक महीने पहले ही अनुमति दे दी थी लेकिन फिर टाटा स्काई को लगा कि निवेश के लिए जो रास्ता वह अपनाना चाहती है, उसके लिए दोबारा आवेदन करने की जरूरत है। इसलिए समय लग रहा है।
हालांकि नई सरकार के कामकाज में तेजी है, फिर भी बड़ा सवाल यह है कि उद्योग में वृद्धि कैसे होगी। हरित के अनुसार, यह आत्म नियंत्रण के जरिए संभव हो सकता है। हम यहां सूचना देने के लिए हैं, अनुमति मांगने के लिए नहीं। अगर हम नियम तोड़ते हैं तो हमारे लाइसेंस रद्द कर दीजिए और सजा दीजिए। वरना, हर दिन लंबित अनुमतियों से कामकाज में व्यवधान पड़ता है। उद्योग पर भी असर होता है।
डिजिटलीकरण पर हरित ने कहा, घरों के डिजिटलीकृत होने से अधिक से अधिक निर्माता अपने निर्माण पर अधिक पैसा लगा पाते हैं। इसकी शुरुआत हो चुकी है, कितनी फिल्में सिर्फ केबल और सेटेलाइट चैनलों को अपने अधिकार बेचकर अच्छा कमा रही हैं। देश में 42 शहरों में डिजिटलीकरण हो चुका है। डिजिटलीकरण, ऑटोमेशन के बराबर है। लोकल केबल ऑपरेटर, मल्टी सिस्टम ऑपरेटर का सर्विस प्रोवाइडर बन गए हैं, पर वे उनके हिस्सेदार नहीं है। मेरे ख्याल से, इस पर भी विचार किया जाना चाहिए।
साभार- समाचार4मीडिया से