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मैं तब विनोद मेहता के पास नौकरी माँगने गया था

मुझे जुलाई 1995 में आउटलुक में काम करने का मौका मिला था। मैं एक कॉलेज ग्रेजुएट था और मेरे पास सिर्फ नौ महीने का प्रिंट एक्सपीरिएंस था। नौकरी कोलकाता संवाददाता की थी जिसके लिए पद्मानंद झा जिन्हें पैडी भी कहा जाता था, ने मेरा 10 मिनट का इंटरव्यू किया था।
 
‘इंटरव्यू का नेक्स्ट स्टेज कब होगा सर?’ मैंने पैडी से पूछा।
 
‘कौन सा नेक्स्ट स्टेज?’ पैडी ने मुझसे ही सवाल किया।
 
‘विनोद मेहता के साथ सर।’ मैंने लड़खड़ाते हुए कहा।
 
‘वह जरूरी नहीं, मैं विनोद से कह दूंगा कि मैं तुमसे मिल चुका हूं और तुम ओके हो।‘ पैडी ने सीधे सीधे जवाब दिया, जोकि उनका स्टाइल था।
 
‘तो ठीक है, शुक्रिया सर।’ मैंने जवाब दिया और सफदरजंग एनक्लेव के धूल भरे बाजार में आउटलुक के दफ्तर के बाहर पांच घंटों तक इंतजार करता रहा कि कब विनोद मेहता को देख सकूं। मैं चाहता था कि मैं उनसे कहूं कि पैडी ने मेरा इंटरव्यू लिया है और मैं जल्द ही आउटलुक जॉइन करने वाला हूं।
 
‘यह तो बहुत अच्छा हुआ।’ मैं चाहता था कि वह मुझसे कहें और फिर मुझे कॉफी पर बुलाएं। पत्रकारिता के क्षेत्र में वह एक लीजेंड थे और उनसे मिलना किसी सपने से कम नहीं था। 
 
दुर्भाग्य से मैं उस दिन विनोद मेहता से नहीं मिल पाया। चूंकि मुझे दिल्ली में काम करना था, इसलिए मैंने अगले दिन दूसरी कई जगहों पर इंटरव्यू दिए और टीवी रिपोर्टर के रूप में अपने कॅरियर की शुरुआत की।
 
करीब 15 साल बाद, मैंने विनोद को यह आपबीती बताई, जब हम मुंबई से दिल्ली आ रहे थे। Times Now घोटालों पर एक्सक्लूसिव स्टोरी कर रहा था। विनोद सारी डीटेल्स जानना चाहते थे और लगभग दो घंटों तक हम बातचीत करते रहे।
 
‘तो, विनोद, आप मुझे क्या सलाह देंगे?’ जब हम फ्लाइट से उतरे तो मैंने उनसे पूछा। मैंने पंद्रह साल पहले छूट गई बात को मानो उस दिन पूरा करने की कोशिश की।
 
‘अपनी रफ्तार धीमे मत करो। अगर तुम्हारी स्टोरी सही है तो तुम भी सही हो। बाकी की बातों के बारे में मत सोचो।‘ उन्होंने कहा।
 
हमने अपना सामान उठाया और मैं उनके साथ उनकी कार तक गया।
 
‘अगर मैं तुम्हारी उम्र का होता तो मैं भी वही कहता।’ उन्होंने बात खत्म की।
 
मैं सोचता हूं कि काश, मैं विनोद से यह सब कह पाता। लेकिन उस दिन से मुझे पक्का यकीन हो गया कि उन जैसा संपादक और कोई नहीं हो सकता।
 
विनोद मेहता का मार्गदर्शन मुझे हमेशा मिलता रहा। उनके शॉर्ट फोन कॉल्स और मेरे फोन की मेमोरी में उनके टेक्स्ट मैसेज, मुझे हमेशा याद रहेंगे- तुम सही ट्रैक पर हो या तुम्हारे चैनल पर हेडलाइन तो ठीक है लेकिन स्टोरी बहुत वीक है या तुमने डिबेट के लिए सही स्टोरी ली है- अगर दूसरों ने नहीं ली हो तो कोई फर्क नहीं पड़ता।
 
कई बार वह टीवी डिबेट में दिखने वाले गुस्से या तनाव से परेशान हो जाते। एक बार एक जबरदस्त बहस के बाद उन्होंने कहा, ‘अर्णब, मैं टीवी फन(Fun) के लिए करता हूं। पर सोचता हूं कि अगली बार स्किप(skip) कर लूं।’ उस बहस में कई पैनलिस्ट उन पर चढ़ गए थे। मैं उन्हें तुरंत फोन किया और कहा, ‘अगर आप ऐसा चाहते हैं तो ऐसा ही होगा। चलिए बताइए, क्या खबर है।’
 
विनोद ऐसे थे। कोई दुर्भावना नहीं, कोई बुरा खयाल नहीं। कोई राजनीति नहीं और छिपाने के लिए भी कुछ नहीं। बहुत ज्यादा ईमानदार और अच्छी स्टोरी के लिए भूख।
 
लेकिन विनोद की प्रशंसा करने के बाद क्या मैं उनसे सहमत भी होता था? बिल्कुल नहीं। हम तो Times Now के स्टूडियो में मिलने वाले सैंडविच की क्वॉलिटी पर भी एक मत नहीं रखते थे। हम कश्मीर, पाकिस्तान, नक्सलवाद, कांग्रेस, आम आदमी पार्टी और उनकी मैगजीन में छपने वाले लंबे लेखों- किसी भी बात पर सहमत नहीं होते थे। मुद्दों पर असहमतियों के चलते ही वह न्यूज़ ऑवर  की डिबेट्स से दूर रहना पसंद करते थे क्योंकि ज्यादातर मौकों पर हम बातचीत करते-करते झगड़ ही पड़ते थे। लेकिन हमारे बीच की ईमानदार असहमतियां-सीधे तौर पर होती थीं। बहुत से लोगों ने तो उनका बायकॉट करना शुरू कर दिया था, जब उन्होंने राडिया टेप्स वाले मामले को एक्सपोज किया था। विनोद उपदेश नहीं देते थे, न ही फैसले सुनाते थे और न ही बीच-बचाव की मुद्रा में आते थे- वह जैसे थे- वैसे थे।
 
‘क्या तुम मेरी नई किताब के लिए आओगे?’ उन्होंने मुझसे पिछले साल नवंबर में पूछा था। वह चाहते थे कि मैं उनसे उनकी नई किताब के बारे में बात करूं।
 
‘बेशक’, मैंने बिना हिचके उनसे कहा। इससे पहले उनकी किताब लखनऊ बॉय के लॉन्च पर भी मैंने उनसे बात की थी।
 
‘अर्णब मैं बहुत एक्साइटेड हूं। यह इवेंट मेरे लिए बहुत मायने रखता है। मैं इन दिनों ट्विटर पर भी हूं।‘ वह बच्चों की तरह उत्साहित थे। 
 
‘मैं आपके साथ वह इवेंट करूंगा और फिर हम न्यूज़ ऑवर  में मिलेंगे।‘ मैंने कहा।
 
‘अर्णब परेशान मत हो। तुम चाहोगे तो हम वहीं से न्यूज़ ऑवर  कर लेंगे।‘ उन्होंने हंसते हुए कहा।
 
वह उस दिन भी बहुत खुश थे। वह आखिरी दिन था, जब मैंने उनसे बात की थी। मैं उनकी बुक रिलीज का इंतजार कर रहा था। बातचीत के एक हफ्ते बाद उनके पब्लिशर ने मुझे किताब की एडवांस कॉपी भेज दी। मैंने उस किताब को दो बार पढ़ा। इतना कंप्लीट सीक्वेल मैंने कभी नहीं पढ़ा था। विनोद कलम के धनी थे। उन्होंने अपनी जिंदगी को दो फाड़ करके लिखा था। उनकी जिंदगी का पहला हिस्सा लखनऊ बॉय में था और दूसरा हिस्सा इस किताब में। ऐसा नहीं था कि इस किताब में वह जिंदगी को अलविदा कह रहे थे लेकिन पता चलता था कि वह शांत मुद्रा में चले गए हैं। जैसे खुद से मिलने के लिए।
 
इवेंट से पहले ही वह बीमार हो गए और हमारी बातचीत अधूरी रह गई। उनकी किताब लॉन्च हो गई- एडिटर्स अनप्लग्ड।
 
9 फरवरी को मैं उनसे एम्स में मिला। मैंने उनसे कहा कि दिल्ली में एक्जिट पोल्स का क्या पूर्वानुमान था,  इलेक्शन पैनल में मैंने उन्हें कितना मिस किया,  मुझे उनकी किताब कितनी पसंद आई। मैं उनसे लगातार बातें करता रहा।
 
उन्होंने मेरा हाथ थामा और मैंने उनसे कहा कि मैं उनकी ईमानदारी की कितनी कद्र करता हूं। मुझे इस बात की कितनी तकलीफ है कि मैंने कभी उनके साथ काम नहीं किया। विनोद आईसीयू में ज्यादा बात नहीं कर सकते थे लेकिन मैं जानता हूं कि वह सब सुन रहे थे। मैं उनसे बहुत सारी बातें करना चाहता था लेकिन डॉक्टर्स ने मुझसे कहा कि उन्हें आराम की जरूरत है। मैं जानता था कि हमारी बातचीत अधूरी रह गई है।
 
एम्स से लौटने के बाद भी मैं सुमित्रा से बात करता रहा- वह उनकी असली ताकत थीं। मैं उन्हें शांत करने की कोशिश कर रहा था लेकिन मैं भीतर से बहुत अशांत था। आप क्या कहेंगे जब आपका आदर्श, जिसकी तरह आप बनना चाहते हैं, एक ऐसा संपादक जो आपको कभी नहीं मिलेगा, एक मुश्किल संघर्ष कर रहा हो।
 
बहुत से लोग मुझसे पूछते हैं कि पत्रकारिता में मेरा आदर्श कौन है। आज मैं कहना चाहता हूं- विनोद मेहता हमेशा से मेरा आदर्श हैं और रहेंगे। अपने दौर के बेहतरीन इंसान और एक महान संपादक।
 
 (टाइम्स नाऊ के एडिटर-इन-चीफ अर्णब गोस्वामी का यह आलेख अंग्रेजी वेबसाइट 'द हाफिंगटन पोस्ट' में पोस्ट हुआ है। समाचार4मीडिया ने इस आलेख का हिंदी में अनुवाद किया है। आप इसका मूल लेख नीचे दी वेबसाइट के जरिए पढ़ सकते हैं )

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साभार- समाचार4मीडिया एवँ द हाफिंगटन पोस्ट से
लिंक  http://www.huffingtonpost.in/arnab-goswami/vinod-mehta-was-the-edito_b_6825998.html

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प्रो. कनेरिया कुमकुम मोहंती का चयन

भोपाल । राज्य शासन ने वर्ष 2012-13 के कालिदास सम्मान घोषित कर दिये हैं। रूपंकर कलाओं का कालिदास सम्मान प्रसिद्ध चित्रकार डॉ. राघव कनेरिया (बड़ौदा) एवं शास्त्रीय नृत्य का सम्मान ख्यात ओडिसी नृत्यांगना गुरु कुमकुम मोहन्ती (कटक) को प्रदान किया जायेगा।
 
प्रो. राघव कनेरिया देश के ख्यातिप्राप्त चित्रकार हैं। उन्होंने फाइन आर्टस में एम.ए. की शिक्षा रॉयल कॉलेज ऑफ आर्टस लंदन से प्राप्त की है। उनकी अनेक एकल चित्र प्रदर्शनियाँ देश ही नहीं, बल्कि विदेशों में भी प्रदर्शित हुई हैं। प्रो. राघव ललित कला अकादमी अवार्ड, कला-रत्न अवार्ड, बाम्बे आर्ट सोसायटी अवार्ड, सर राबर्ट सेन्सबरी अवार्ड से सम्मानित हुए हैं।
 
गुरु कुमकुम मोहन्ती ओडिसी की ख्यात नृत्यांगना हैं। उन्होंने श्री केलुचरण महापात्र के सान्निध्य में नृत्य की शिक्षा प्राप्त की है। उन्हें अनेक सम्मान प्राप्त हुए हैं, जिनमें भारत सरकार से प्राप्त पद्मश्री एवं नाट्य अकादमी अवार्ड शामिल हैं।

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श्री अविनाश कौल बने टीवी 18 के अध्यक्ष

एईटीएन 18  संचालक मंडल ने अविनाश कौल को ए+ई नेटवर्क टीवी 18 का अध्यक्ष नियुक्‍त किया है। कौल इस संयुक्त उपक्रम के रोजाना के कार्यकलापों,प्‍लानिंग और इसके वित्‍तीय प्रबंधन की जिम्‍मेदारी संभालेंगे। इसके अलावा वह  आईबीएन नेटवर्क  के मुख्य कार्यकारी अधिकारी की जिम्‍मेदारी भी संभालते रहेंगे।

इस मौके पर नेटवर्क 18 के समूह सीईओ एपी परिगि ने कहा, ‘ए+ई नेटवर्क टीवी 18 एक नई ऊंचाई को छू रहा है। मुझे पूरा विश्‍वास है कि अविनाश कौल के नेतृत्‍व में कंपनी काफी आगे बढ़ेगी। उन्‍होंने अपने अनुशासन व कर्मठता से अपनी काबिलियत को सिद्ध किया है और बेहतर परिणाम भी दिलाए हैं।’

ए+ई नेटवर्क के अंतर्राष्ट्रीय कार्यकारी उपाध्यक्ष  सी कोहन ने कहा, ‘अविनाश का मीडिया का अनुभव, दूरदर्शिता और भारतीय मार्केट की जानकारी इस वेंचर के लिए काफी फायदेमंद रहेगी। उनके नेतृत्‍व में हम काफी मजबूत स्थिति में होंगे और भारत में बेहतर ऐंटरटेनमेंट सर्विस उपलब्‍ध कराएंगे।’

वहीं अविनाश कौल ने कहा, ‘यह जिम्‍मेदारी मिलने पर मैं खुद को काफी सम्‍मनित महसूस कर रहा हूं और मैं भारत के बड़े ऐंटरटेनमेंट ग्रुप को तैयार करने के लिए बिजनेस और कंटेंट टीम के साथ मिलकर काम करूंगा।’ अपने 16 साल के कैरियर में कौल को न्‍यूज, ऐंटरटेनमेंट, मूवी और लाइफ स्‍टाइल के क्षेत्र में सेल्‍स,मार्केटिंग और जनरल मैनेजमेंट का काफी अनुभव है। इससे पहले कौल  बीसीसीएल  के टीवी विभाग के मुख्य कार्यकारि अधिकारी थे। 

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इंटरनेट की गंदगी से यू ट्यूब बचाएगा बच्चों को

गूगल की विडियो शेयरिंग वेबसाइट यू-ट्यूब बच्चों के लिए एक विशेष ऐप ‘यू-ट्यूब किड्स‘  लॉन्च कर दिया है। इस ऐप की मदद से पैरंट्स उस कन्टेंट पर लगाम लगा सकेंगे, जो बच्चों के लिए नुकसानदेह साबित हो सकता है। गूगल और अन्य सर्च इंजन पर आजकल फेवरेट विडियोज और गेम्स को डाउनलोड करना बेहद आसान हो गया है, लेकिन कई पर सर्च इंजन पर कोई खास शब्द टाइप करने से ही कई अश्लील कन्टेंट भी सामने आ जाते हैं।
 
एक्सपर्ट की मानें तो छोटी उम्र में अगर बच्चों के इंटरनेट सर्च पर सावधानी नहीं बरती गई तो आगे चलकर यह खतरनाक साबित हो सकता है। यू-ट्यूब किड्स इस नजरिए से पैरंट्स की मुश्किल आसान कर सकता है। इस ऐप के आने के बाद फेसबुक और ट्विटर जैसी साइट्स भी अडल्ट कॉन्टेंट को रोकने के लिए कई नए फीचर्स ला सकती हैं।
 
बता दें कि यह फ्री ऐप केवल गूगल के एंड्रॉएड डिवाइसेस में ही उपयोग किया जा सकेगा।
 
यूट्यूब प्रोडक्स मैनेजर शिमरिट बेन-येर ने बताया कि यूट्यूब के विडियो को देखने में हर साल 50 फीसदी से ज्यादा दर्शकों में वृद्धि हो रही है। बेन-येर ने कहा, ‘हमेशा अभिभावक उनसे कहते थे कि क्या यूट्यूब को आप हमारे बच्चों के लिए सुरक्षित कर सकते हैं।’
 
 ऐप की खासियत
 
यू-ट्यूब किड्स पर 4 साल का बच्चा भी मनपसंद कन्टेंट सर्च कर सकता है। जरूरी नहीं कि बच्चा उस कन्टेंट की स्पेलिंग जानता हो,वायस सर्च से भी कन्टेंट ढूंढा जा सकता है। अगर बच्चा गलती से सेक्स या पॉर्न कन्टेंट सर्च करता है तो यह ऐप उसे कुछ और ढूंढने के लिए कहेगा। इस ऐप में पैरंट्स आसानी से बच्चे का टाइम निर्धारित कर सकते हैं कि वह कितनी देर इस ऐप पर ऐक्टिव रह सकता है। 

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टीवी रेडिओ पर इलयाराजा के गाने नहीं बजा सकते

मशहूर संगीतकार इलयाराजा के गाने बजाने वाले रेडियो और टेलिविजन चैनलों को दूसरा विकल्‍प तलाशना पड़ सकता है। इलया राजा ने एक बयान जारी कर कहा  है कि अपने सभी गानों के अधिकार उनके पास सुरक्षित हैं और एफएम, टेलिविजन पर इन्‍हें बजाना व उनके संगीत को विडियो शेयरिंग साइट्स पर अपलोड करना गैरकानूनी है।
 
गौरतलब है कि इ‍लायराजा ने  1001 फिल्मों के लिए गाने कंपोज किए हैं। इ‍लयाराजा ने कहा, ‘मेरे गानों को बजाने से पहले FM चैनल और दूसरे माध्‍यमों को इसके अधिकार मुझसे खरीदने होंगे। जिन निर्माताओं ने गीतकारों व गायकों के साथ डील की है, मैं उनसे अपना शेयर लेने की योजना बना रहा हूं।’ उनका यह भी मानना है कि इससे बौद्धिक संपदा के अधिकारों को लेकर बहस छिड़ेगी।
 
इलयाराजा ने कहा, ‘अदालत ने इस संबंध में दायर वादी के तर्कों को खारिज कर दिया था। ये गाने मेरे हैं और मुझे इनकी फीस प्राप्‍त करने का पूरा अधिकार है।’ उन्‍होंने कहा कि जो लोग उनके गानों के अधिकार प्राप्‍त करना चाहते हैं, उन्‍हें उनके पास या प्रोड्यूसरों की काउंसिल के पास जाना चाहिए।

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मॉरीशस में मोदीजी ने रखी विश्व हिन्दी सचिवालय की आधारशिला

द्विपक्षीय रिश्तों को मजबूत बनाने के लिए मॉरीशस यात्रा पर गए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने आज वहां विश्‍व हिंदी सचिवालय की आधारशिला रखी। पीएम ने पोर्ट लुई में भाषण देते हुए कहा,'150 साल पहले हमारे पूर्वज मॉरीशस में हिंदी भाषा लेकर आए। इस तरह से भारत की संस्कृति को भी वे अपने साथ लाए थे। मॉरीशस ने हिंदी साहित्य की बहुत सेवा की है और यहां का अपना हिंदी साहित्य है।'
 
पीएम ने आगे कहा, भाषा की अपनी एक ताकत होती है। भाषा भाव की अभिव्यक्ति का बहुत बड़ा माध्यम है। मातृ भाषा सीधे दिल से निकलती है, जबकि अन्य भाषा को बोलने में दिमाग लगता है। यहां लघु भारत देखकर अपनेपन का एहसास हुआ है। यहां की हिंदी में मजदूरों के पसीने की महक है। उन्होंने कहा कि भारत की मदद से विश्व हिंदी सचिवालय भी बना।
 
इससे पूर्व उन्‍होंने वहां 'गंगा तलाव' जाकर पूजा-अर्चना की। यहां शिवलिंग की पूजा करने के बाद पीएम ने तलाव में गंगा जल भी प्रवाहित किया। गंगा तलाव पोर्टलुई से करीब 50 किलोमीटर दूर पहाड़ियों की गोद में स्थित है। थोड़ी देर बाद वे मॉरीशस की संसद को संबोधित करते हुए भारत से रिश्तों की मधुरता के लिए अपना विजन उनके सामने रखेंगे। पीएम मॉरीशस के राष्ट्रीेय दिवस समारोह के मुख्य अतिथि हैं। यह उनके दौरे का आज दूसरा और आखिरी दिन है।
 
इससे पहले प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने मॉरीशस के प्रधानमंत्री अनिरुद्ध जगनाथ के साथ दोनों देशों के बीच समुद्री अर्थव्यवस्था सहित पांच समझौतों पर हस्ताक्षर भी किए। समझौतों पर हस्ताक्षर करते हुए मोदी ने कहा कि वह मॉरीशस के असैन्य इ्फ्रास्ट्रक्चर परियोजनाओं के लिए 50 करोड़ डॉलर के रियायती कर्ज की पेशकश कर काफी खुश हैं। भारत की मंशा मॉरीशस में जल्द से जल्द पेट्रोलियम भंडारण हेतु गोदाम बनाने की भी है।
 
इसके अलावा भारत ने अहम इन्फ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स के लिए मॉरीशस को 50 करोड़ डॉलर का रियायती कर्ज देने की पेशकश भी की है। वहीं दोनों देश दोहरा कराधान समझौते की समीक्षा पर सहमत हुए हैं ताकि उसका दुरुपयोग रोका जा सके।

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प्रशांत भूषण और योगेन्द्र यादव का आम आदमी पार्टी के कार्यकर्ताओं को खुला पत्र

प्यारे दोस्तों,
हमें पता है कि पिछले कुछ दिनों की घटनाओं से देश और दुनिया भर के आप सभी कार्यकर्ताओं के दिल को बहुत ठेस पहुँची है. दिल्ली चुनाव की ऐतिहासिक विजय से पैदा हुआ उत्साह भी ठंडा सा पड़ता जा रहा है. आप ही की तरह हर वालंटियर के मन में यह सवाल उठ रहा है कि अभूतपूर्व लहर को समेटने और आगे बढ़ने की इस घड़ी में यह गतिरोध क्यों? कार्यकर्ता यही चाहते हैं कि शीर्ष पर फूट न हो, कोई टूट न हो. जब टीवी और अखबार पर पार्टी के शीर्ष नेताओं में मतभेद की खबरें आती हैं, आरोप-प्रत्यारोप चलते हैं, तो एक साधारण वालंटियर असहाय और अपमानित महसूस करता है. इस स्थिति से हम भी गहरी पीड़ा में हैं.

पार्टी-हित और आप सब कार्यकर्ताओं की भावनाओं को ध्यान में रखते हुए हम दोनों ने पिछले दस दिनों में अपनी तरफ से इस आरोप-प्रत्यारोप की कड़ी में कुछ भी नहीं जोड़ा. कुछ ज़रूरी सवालों के जवाब दिए, लेकिन अपनी तरफ से सवाल नहीं पूछे. हमने कार्यकर्ताओं और समर्थकों से बार-बार यही अपील की कि पार्टी में आस्था बनाये रखें. व्यक्तिगत रूप से हम सबकी सीमाएं होती हैं लेकिन संगठन में हम एक-दूसरे की कमी को पूरा कर लेते हैं. इसीलिए संगठन बड़ा है और हममें से किसी भी व्यक्ति से ज्यादा महत्वपूर्ण है. इसी सोच के साथ हमने आज तक पार्टी में काम किया है और आगे भी काम करते रहेंगे.

लेकिन कल चार साथियों (सर्वश्री मनीष सिसोदिया, संजय सिंह, गोपाल राय और पंकज गुप्ता) के सार्वजनिक बयान के बाद हम अपनी चुप्पी को बहुत ही भारी मन से तोड़ने पर मजबूर हैं. राष्ट्रीय कार्यकारिणी में बहुमत की राय मुखरित करने वाले इस बयान को पार्टी के मीडिया सेल की ओर से प्रसारित किया गया, और पार्टी के आधिकारिक फेसबुक, ट्विटर और वेबसाइट पर चलाया गया. ऐसे में यदि अब हम चुप रहते हैं तो इसका मतलब यही निकाला जायेगा कि इस बयान में लगाये गए आरोपों में कुछ न कुछ सच्चाई है. इसलिए हम आप के सामने पूरा सच रखना चाहते हैं.
आगे बढ़ने से पहले एक बात स्पष्ट कर दें. उपरोक्त बयान में हम दोनों के साथ शांति भूषण जी को भी जोड़ कर कुछ आरोप लगाये गए हैं. जैसा कि सर्वविदित है, दिल्ली चुनाव से पहले शांति भूषण जी ने कई बार ऐसे बयान दिए जिससे पार्टी की छवि और पार्टी की चुनावी तैयारी को नुकसान हो सकता था. उनके इन बयानों से पार्टी के कार्यकर्ताओं में निराशा और असंतोष पैदा हुआ. ऐसे मौकों पर हम दोनों ने शांति भूषण जी के बयानों से सार्वजनिक रूप से असहमति ज़ाहिर की थी. चूँकि इन मुद्दों पर हम दोनों की राय शांति भूषण जी से नहीं मिलती है, इसलिए बेहतर होगा कि उनसे जुड़े प्रश्नों के उत्तर उनसे ही पूछे जाये.
इससे जुड़ी एक और मिथ्या धारणा का खंडन शुरू में ही कर देना जरूरी है. पिछले दो हफ्ते में बार-बार यह प्रचार किया गया है कि यह सारा मतभेद राष्ट्रीय संयोजक के पद को लेकर है. यह कहा गया कि अरविंद भाई को हटाकर योगेन्द्र यादव को संयोजक बनाने का षड्यंत्र चल रहा था. सच ये है कि हम दोनों ने आज तक किसी भी औपचारिक या अनौपचारिक बैठक में ऐसा कोई जिक्र नहीं किया. जब 26 फरवरी की बैठक में अरविंद भाई के इस्तीफे का प्रस्ताव आया तब हम दोनों ने उनके इस्तीफे को नामंजूर करने का वोट दिया. और कुछ भी मुद्दा हो, राष्ट्रीय संयोजक का पद न तो मुद्दा था, न है.

यह सच जानने के बाद सभी वालंटियर पूछते हैं “अगर राष्ट्रीय संयोजक पद पर विवाद नहीं था तो आखिर विवाद किस बात का? इतना गहरा मतभेद शुरू कैसे हुआ?” हमने यथासंभव इस सवाल पर चुप्पी बनाये रखी, ताकि बात घर की चारदीवारी से बाहर ना जाए. लेकिन अब हमें महसूस होता है कि जब तक आपको यह पता नहीं लगेगा तब तक आपके मन में भी संदेह और अनिश्चय पैदा हो सकता है. इसलिए हम नीचे उन मुख्य बातों का ज़िक्र कर रहे हैं जिनके चलते पिछले दस महीनो में अरविन्द भाई और अन्य कुछ साथियों से हमारे मतभेद पैदा हुए. आप ही बताएं, क्या हमें यह मुद्दे उठाने चाहिए थे या नहीं?
1. लोक-सभा चुनाव के परिणाम आते ही अरविंद भाई ने प्रस्ताव रखा कि अब हम दुबारा कॉंग्रेस से समर्थन लेकर दिल्ली में फिर से सरकार बना लें. समझाने-बुझाने की तमाम कोशिशों के बावजूद वे और कुछ अन्य सहयोगी इस बात पर अड़े रहे. दिल्ली के अधिकाँश विधायकों ने उनका समर्थन किया. लेकिन दिल्ली और देश भर के जिस-जिस कार्यकर्ता और नेता को पता लगा, अधिकांश ने इसका विरोध किया, और पार्टी छोड़ने तक की धमकी दी. पार्टी ने हाई कोर्ट में विधानसभा भंग करने की मांग कर रखी थी. यूँ भी कॉंग्रेस पार्टी लोक सभा चुनाव में जनता द्वारा खारिज की जा चुकी थी. ऐसे में कॉंग्रेस के साथ गठबंधन पार्टी की साख को ख़त्म कर सकता था. हमने पार्टी के भीतर यह आवाज़ उठाई. यह आग्रह भी किया कि ऐसा कोई भी निर्णय पी.ए.सी और राष्ट्रीय कार्यकारिणी की राय के मुताबिक़ किया जाए. लेकिन लेफ्टिनेंट गवर्नर को चिट्ठी लिखी गयी और सरकार बनाने की कोशिश हुई. यह कोशिश विधान सभा के भंग होने से ठीक पहले नवंबर माह तक चलती रही. (यहाँ व इस चिठ्ठी में कई और जगह हम पार्टी हित में कुछ गोपनीय बातें सार्वजनिक नहीं कर रहे हैं) हम दोनों ने संगठन के भीतर हर मंच पर इसका विरोध किया. इसी प्रश्न पर सबसे गहरे मतभेद की बुनियाद पड़ी. यह फैसला हम आप पर छोड़ते हैं कि यह विरोध करना उचित था या नहीं. अगर उस समय पार्टी कॉंग्रेस के साथ मिलकर सरकार बना लेती तो क्या हम दिल्ली की जनता का विश्वास दोबारा जीत पाते?

2. लोक सभा चुनाव का परिणाम आते ही सर्वश्री मनीष सिसोदिया, संजय सिंह और आशुतोष ने एक अजीब मांग रखनी शुरू की. उन्होंने कहा कि हार की जिम्मेवारी लेते हुए पी.ए.सी के सभी सदस्य अपना इस्तीफा अरविन्द भाई को सौंपे, ताकि वे अपनी सुविधा से नयी पी.ए.सी का गठन कर सके. राष्ट्रीय कार्यकारिणी को भंग करने तक की मांग उठी. हम दोनों ने अन्य साथियों के साथ मिलकर इसका कड़ा विरोध किया. (योगेन्द्र द्वारा पी. ए. सी. से इस्तीफे की पेशकश इसी घटना से जुडी थी) अगर हम ऐसी असंवैधानिक चालों का विरोध न करते तो हमारी पार्टी और कांग्रेस या बसपा जैसी पार्टी में क्या फरक रह जाता ?

3. महाराष्ट्र, हरियाणा, झारखण्ड और जम्मू-कश्मीर में पार्टी के चुनाव लड़ने के सवाल पर पार्टी की जून माह की राष्ट्रीय कार्यकारिणी में पार्टी कार्यकर्ताओं का मत जानने का निर्देश दिया गया था. कार्यकर्ताओं का मत जानने के बाद हमारी और राष्ट्रीय कार्यकारिणी के बहुमत की यह राय थी कि राज्यों में चुनाव लड़ने का फैसला राज्य इकाई के विवेक पर छोड़ देना चाहिए. यह अरविन्द भाई को मंज़ूर ना था. उन्होंने कहा कि अगर कहीं पर भी पार्टी चुनाव लड़ी तो वे प्रचार करने नहीं जायेंगे. उनके आग्रह को स्वीकार करते हुए राष्ट्रीय कार्यकारिणी को अपना फैसला पलटना पड़ा, और राज्यों में चुनाव न लड़ने का फैसला हुआ. आज यह फैसला सही लगता है, उससे पार्टी को फायदा हुआ है. लेकिन सवाल यह है कि भविष्य में ऐसे किसी फैसले को कैसे लिया जाय? क्या स्वराज के सिद्धांत में निष्ठा रखने वाली हमारी पार्टी में राज्यों की स्वायतता का सवाल उठाना गलत है?

4. जुलाई महीने में जब कॉंग्रेस के कुछ मुस्लिम विधायकों के बीजेपी में जाने की अफवाह चली, तब दिल्ली में मुस्लिम इलाकों में एक गुमनाम साम्प्रदायिक और भड़काऊ पोस्टर लगा. पुलिस ने आरोप लगाया कि यह पोस्टर पार्टी ने लगवाया था. श्री दिलीप पांडे और दो अन्य वालंटियर को आरोपी बताकर इस मामले में गिरफ्तार भी किया. इस पोस्टर की जिम्मेदारी पार्टी के एक कार्यकर्ता श्री अमानतुल्लाह ने ली, और अरविन्द भाई ने उनकी गिरिफ़्तारी की मांग की (बाद में उन्हें ओखला का प्रभारी और फिर पार्टी का उम्मीदवार बनाया गया) योगेन्द्र ने सार्वजनिक बयान दिया कि ऐसे पोस्टर आम आदमी पार्टी की विचारधारा के खिलाफ हैं. साथ ही विश्वास जताया कि इस मामले में गिरफ्तार साथियों का इस घटना से कोई सम्बन्ध नहीं है. पार्टी ने एक ओर तो कहा कि इन पोस्टर्स से हमारा कोई लेना देना नहीं है, लेकिन दूसरी ओर योगेन्द्र के इस बयान को पार्टी विरोधी बताकर उनके खिलाफ कार्यकर्ताओं में काफी विष-वमन किया गया. आप ही बताइये, क्या ऐसे मुद्दे पर हमें चुप रहना चाहिए था?

5. अवाम नामक संगठन बनाने के आरोप में जब पार्टी के कार्यकर्ता करन सिंह को दिल्ली इकाई ने निष्काषित किया, तो करन सिंह ने इस निर्णय के विरुद्ध राष्ट्रीय अनुशासन समिति के सामने अपील की, जिसके अध्यक्ष प्रशांत भूषण हैं. करन सिंह के विरुद्ध पार्टी-विरोधी गतिविधियों का एक प्रमाण यह था कि उन्होंने पार्टी वालंटियरों को एक एस.एम.एस भेजकर बीजेपी के साथ जुड़ने का आह्वान किया था. करन सिंह की दलील थी कि यह एस.एम्.एस फर्जी है, जिसे कि पार्टी पदाधिकारियों ने उसे बदनाम करने के लिए भिजवाया था. अनुशासन समिति का अध्यक्ष होने के नाते प्रशांत भूषण ने इस मामले की कड़ी जांच पर ज़ोर दिया, लेकिन पार्टी के पदाधिकारी टाल-मटोल करते रहे. अंततः करन सिंह के अनुरोध पर पुलिस ने जाँच की और एस.एम.एस वाकई फर्ज़ी पाया गया. पता लगा की यह एस.एम.एस दीपक चौधरी नामक वालंटियर ने भिजवाई थी. जाँच को निष्पक्ष तरीके से करवाने की वजह से उल्टे प्रशांत भूषण पर आवाम की तरफदारी का आरोप लगाया गया. इसमे कोई शक नहीं कि बाद में अवाम पार्टी विरोधी कई गतिविधियों में शामिल रहा, लेकिन आप ही बताइए अगर कोई कार्यकर्ता अनुशासन समिति में अपील करे तो उसकी निष्पक्ष सुनवाई होनी चाहिए या नहीं?

6. जब दिल्ली चुनाव में उम्मीदवारों का चयन होने लगा तब हम दोनों के पास पार्टी कार्यकर्ता कुछ उम्मीदवारों की गंभीर शिकायत लेकर आने लगे. शिकायत यह थी कि चुनाव जीतने के दबाव में ऐसे लोगों को टिकट दिया जा रहा था जिनके विरुद्ध संगीन आरोप थे, जिनका चरित्र बाकी पार्टियों के नेताओं से अलग नहीं था. शिकायत यह भी थी की पुराने वालंटियर को दरकिनार किया जा रहा था और टिकट के बारे में स्थानीय कार्यकर्ताओं की बैठक में धांधली हो रही थी. ऐसे में हम दोनों ने यह आग्रह किया कि सभी उम्मीदवारों के बारे में पूरी जानकारी पहले पी.ए.सी और फिर जनता को दी जाये, ऐसे उम्मीदवारों की पूरी जाँच होनी चाहिए और अंतिम फैसला पी.ए.सी में विधिवत चर्चा के बाद लिया जाना चाहिए, जैसा कि हमारे संविधान में लिखा है. क्या ऐसा कहना हमारा फ़र्ज़ नहीं था? ऐसे में हमारे आग्रह का सम्मान करने की बजाय हमपर चुनाव में अड़ंगा डालने का आरोप लगाया गया. अंततः हमारे निरंतर आग्रह की वजह से उम्मीदवारों के बारे में शिकायतों की जांच कि समिति बनी. फिर बारह उम्मीदवारों की लोकपाल द्वारा जाँच हुई, दो के टिकट रद्द हुए, चार को निर्दोष पाया गया और बाकि छह को शर्त सहित नामांकन दाखिल करने दिया गया. आप ही बताइए, क्या आप इसे पार्टी की मर्यादा और प्रतिष्ठा बचाए रखने का प्रयास कहेंगे याकि पार्टी-विरोधी गतिविधि?

इन छह बड़े मुद्दों और अनेक छोटे-बड़े सवालों पर हम दोनों ने पारदर्शिता, लोकतंत्र और स्वराज के उन सिद्धांतों को बार-बार उठाया जिन्हें लेकर हमारी पार्टी बनी थी. हमने इन सवालों को पार्टी की चारदीवारी के भीतर और उपयुक्त मंच पर उठाया। इस सब में कहीं पार्टी को नुकसान न हो जाये, इसीलिए हमने दिल्ली चुनाव पूरा होने तक इंतज़ार किया और 26 फरवरी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी बैठक में एक नोट के जरिये कुछ प्रस्ताव रखे. हमारे मुख्य प्रस्ताव ये थे-

1. पार्टी में नैतिक मूल्यों की रक्षा के लिए एक समीति बने, जो दो करोड़ वाले चेक और हमारे उम्मीदवार द्वारा शराब रखने के आरोप जैसे मामलों की गहराई से जाँच करे ताकि ऐसे गंभीर आरोपों पर हमारी पार्टी का जवाब भी बाकी पार्टियों की तरह गोलमोल न दिखे.
2. राज्यों के राजनैतिक निर्णय, कम से कम स्थानीय निकाय के चुनाव के निर्णय, खुद राज्य इकाई लें. हर चीज़ दिल्ली से तय न हो.
3. पार्टी के संस्थागत ढाँचे, आतंरिक लोकतंत्र का सम्मान हो और पी.ए.सी एवं राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठकें नियमित और विधिवत हों.
4. पार्टी के निर्णयों में वालंटियर्स की आवाज़ सुनने और उसका सम्मान करने की पर्याप्त व्यवस्था हो.
हमने इन संस्थागत मुद्दों को उठाया और इसके बदले में हमें मिले मनगढंत आरोप. हमने पार्टी की एकता और उसकी आत्मा दोनों को बचाने का हर संभव प्रयास किया और हम ही पर पार्टी को नुकसान पंहुचाने का आरोप लगा. आरोप ये कि हम दोनों पार्टी को हरवाने का षड्यंत्र रच रहे थे, कि हम पार्टी के विरुद्ध दुष्प्रचार कर रहे थे, कि हम संयोजक पद हथियाने का षड्यंत्र कर रहे थे. आरोप इतने हास्यास्पद हैं कि इनका जवाब देने की इच्छा भी नहीं होती. यह भी लगता है कि कहीं इनका जवाब देने से इन्हें गरिमा तो नहीं मिल जायेगी. फिर भी, क्यूंकि इन्हें बार-बार दोहराया गया है इसलिए कुछ तथ्यों की सफाई कर देना उपयोगी रहेगा ताकि आपके के मन में संदेह की गुंजाइश ना बचे. (पत्र लम्बा न हो जाये इसलिए हम यहाँ प्रमाण नहीं दे रहे हैं. कुछ दस्तावेज योगेन्द्र की फेसबुक https://www.facebook.com/AapYogendra पर उपलब्ध हैं)

एक आरोप यह था की प्रशांत भूषण ने दिल्ली चुनाव में पार्टी को हरवाने की कोशिश की. दिल्ली चुनाव में उम्मीदवारों के चयन के बारे में जो सच्चाई ऊपर बताई जा चुकी है, इसे लेकर प्रशांत भूषण का मन बहुत खिन्न था. प्रशांत कतई नहीं चाहते थे की पार्टी अपने उसूलों के साथ समझौता करके चुनाव जीते. उनका कहना था कि गलत रास्ते पर चलकर चुनाव जीतना पार्टी को अंततः बर्बाद और ख़त्म कर देगा. उससे बेहतर ये होगा कि पार्टी अपने सिद्धांतों पर टिकी रहे, चाहे उसे अल्पमत में रहना पड़े. उन्हें यह भी डर था अगर पार्टी को बहुमत से दो-तीन सीटें नीचे या ऊपर आ गयी तो वह जोड़-तोड़ के खेल का शिकार हो सकती है, पार्टी के ही कुछ संदेहास्पद उम्मीदवार पार्टी को ब्लेकमेल करने की कोशिश कर सकते हैं. ऐसी भावनाएं व्यक्त करना और पार्टी को हराने की दुआ या कोशिश करना, ये दो बिलकुल अलग-अलग बातें हैं. योगेन्द्र ने पार्टी को कैसे नुक्सान पंहुचाया, इसका कोई खुलासा आरोप में नहीं किया गया है. जैसा कि हर कोई जानता है, इस चुनाव में योगेन्द्र ने 80 से 100 के बीच जनसभाएं कीं, हर रोज़ मीडिया को संबोधित किया, चुनावी सर्वे किये और भविष्यवाणी की और कार्यकर्ताओं को फोने और गूगल हैंगआउट किये.

एक दूसरा आरोप यह है कि प्रशांत भूषण ने पार्टी के खिलाफ प्रेस कौन्फेरेंस करने की धमकी दी. सच यह है कि उम्मीदवारों के चयन से खिन्न प्रशांत ने कहा था कि यदि पार्टी उम्मीदवारों के चरित्र के जाँच की संतोषजनक व्यवस्था नहीं करती है तो उन्हें मजबूरन इस मामले को सार्वजनिक करना पड़ेगा. ऐसे में, योगेन्द्र यादव सहित पार्टी के पंद्रह वरिष्ठ साथियों ने प्रशांत के घर तीन दिन की बैठक की. फैसला हुआ कि संदेह्ग्रस्त उम्मीदवारों की लोकपाल द्वारा जाँच की जायेगी और लोकपाल का निर्णय अंतिम होगा. यही हुआ और लोकपाल का निर्णय आने पर हम दोनों ने उसे पूर्णतः स्वीकार भी किया. पार्टी को तो फख्र होना चाहिए कि देश में पहली बार किसी पार्टी ने एक स्वतंत्र व्यवस्था बना कर अपने उम्मीदवारों की जाँच की.

एक और आरोप यह भी है कि योगेन्द्र ने चंडीगढ़ में पत्रकारों के साथ एक ब्रेकफास्ट मीटिंग में “द हिन्दू” अखबार को यह सूचना दी कि हरियाणा चुनाव का फैसला करते समय राष्ट्रीय कार्यकारिणी के निर्णय का सम्मान नहीं किया गया. यह आरोप एक महिला पत्रकार ने टेलीफोन वार्ता में लगाया, जिसे गुप्त रूप से रिकॉर्ड भी किया गया. लेकिन इस कथन के सार्वजनिक होने के बाद उसी बैठक में मौजूद एक और वरिष्ठ पत्रकार, श्री एस पी सिंह ने लेख लिखकर खुलासा किया कि उस बैठक में योगेन्द्र ने ऐसी कोई बात नहीं बतायी थी. उन्होंने पूछा है कि अगर ऐसी कोई भी बात बताई होती, तो बाकी के तीन पत्रकार जो उस नाश्ते पर मौजूद थे उन्होंने यह खबर क्यों नहीं छापी? उनके लेख का लिंक http://www.caravanmagazine.in/…/indian-express-yogendra-yad… है. आरोप यह भी है कि दिल्ली चुनाव के दौरान कुछ अन्य संपादकों को योगेन्द्र ने पार्टी-विरोधी बात बताई. यदि ऐसा है तो उन संपादकों के नाम सार्वजनिक क्यों नहीं किये जाते?

फिर एक आरोप यह भी है कि प्रशांत और योगेन्द्र ने आवाम ग्रुप को समर्थन दिया. ऊपर बताया जा चुका है कि प्रशांत ने अनुशासनसमिति के अध्यक्ष के नाते आवाम के करन सिंह के मामले में निष्पक्ष जाँच का आग्रह किया. एक जज के काम को अनुशासनहीनता कैसे कहा जा सकता है? योगेन्द्र के खिलाफ इस विषय में कोई प्रमाण पेश नहीं किया गया. उल्टे, आवाम के लोगों ने योगेन्द्र पर ईमेल लिख कर आरोप लगाए जिसका योगेन्द्र ने सार्वजनिक जवाब दिया था. जब आवाम ने चुनाव से एक हफ्ता पहले पार्टी पर झूठे आरोप लगाये तो इन आरोपों के खंडन में सबसे अहम् भूमिका योगेन्द्र ने निभायी.

फिर भी चूंकि यह आरोप लगाये गए हैं, तो उनकी जांच जरूर होनी चाहिए. पार्टी का विधान कहता है कि राष्ट्रीय कार्यकारिणी के सदस्यों के खिलाफ किसी भी आरोप की जाँच पार्टी के राष्ट्रीय लोकपाल कर सकते हैं. स्वयं लोकपाल ने चिट्ठी लिखकर कहा है कि वे ऐसी कोई भी जाँच करने के लिए तैयार हैं. हम दोनों लोकपाल से अनुरोध कर रहे हैं कि वे इन चारों साथियों के आरोपों की जांच करें. अगर लोकपाल हमें दोषी पाते हैं तो उनके द्वारा तय की गयी किसी भी सज़ा को हम स्वीकार करेंगे. लेकिन हमें यह समझ नहीं आता कि पार्टी विधान के तहत जांच करवाने की बजाय ये आरोप मीडिया में क्यों लगाये जा रहे हैं?
साथियों, यह घड़ी पार्टी के लिए एक संकट भी है और एक अवसर भी. इतनी बड़ी जीत के बाद यह अवसर है बड़े मन से कुछ बड़े काम करने का. यह छोटे छोटे विवादों और तू-तू मैं-मैं में उलझने का वक़्त नहीं है. पिछले कुछ दिनों के विवाद से कुछ निहित स्वार्थों को फायदा हुआ है और पार्टी को नुकसान. उससे उबरने का यही तरीका है कि सारे तथ्य सभी कार्यकर्ताओं के सामने रख दिए जाएँ. यह पार्टी कार्यकर्ताओं के खून-पसीने से बनी है. अंततः आप वालंटियर ही ये तय करेंगे कि क्या सच है क्या झूठ. हम सब राजनीति में सच्चाई और इमानदारी का सपना लेकर चले थे. आप ही फैसला कीजिये कि क्या हमने सच्चाई, सदाचार और स्वराज के आदर्शों के साथ कहीं समझौता किया? आपका फैसला हमारे सर-माथे पर होगा.

आप सब तक पहुँचाने के लिए हम यह चिठ्ठी मीडिया को दे रहे हैं. हमारी उम्मीद है कि पार्टी अल्पमत का सम्मान करते हुए इस चिठ्ठी को भी उसी तरह प्रसारित करेगी जैसे कल अन्य चार साथियों के बयान को प्रसारित किया था. लेकिन हम मीडिया में चल रहे इस विवाद को और आगे नहीं बढ़ाना चाहते. हम नहीं चाहते कि मीडिया में पार्टी की छीछालेदर हो. इसलिए इस चिठ्ठी को जारी करने के बाद हम फिलहाल मौन रहना चाहते हैं. हम अपील करते हैं कि पार्टी के सभी साथी अगले कुछ दिन इस मामले में मौन रखें ताकि जख्म भरने का मौका मिले, कुछ सार्थक सोचने का अवकाश मिले.

दोस्तों, अरविन्द भाई स्वस्थ्य लाभ के लिए बंगलूर में हैं. सबकी तरह हमें भी उनके स्वस्थ्य की चिंता है. आज अरविन्द भाई सिर्फ पार्टी के निर्विवाद नेता ही नहीं, देश में स्वच्छ राजनीती के प्रतीक है. पार्टी के सभी कार्यकर्ता चाहते हैं की वे पूरी तरह स्वस्थ होकर दिल्ली और देश के प्रति अपनी जिम्मेवारियों को निभा सकें. हमें विश्वास है कि वापिस आकर अरविन्द भाई पार्टी में बन गए इस गतिरोध का कोई समाधान निकालेंगे जिससे पार्टी की एकता और आत्मा दोनों बची रहें. हम दोनों आप सब को विश्वास दिलाना चाहते हैं कि हम सिद्धांतों से समझौता किये बिना पार्टी को बचने की किसी भी कोशिश में हर संभव सहयोग देंगे, हमने अब तक अपनी तरफ से बीच बचाव की हर कोशिश की है, और ऐसी हर कोशिश का स्वागत किया है. जो भी हो, हम अहम को आड़े नहीं आने देंगे. हम दोनों किसी पद पर रहे या ना रहे ये मुद्दा ही नहीं है. बस पार्टी अपने सिद्धांतों और लाखों कार्यकर्ताओ के सपनों से जुडी रहे, यही एकमात्र मुद्दा है. हम दोनों पार्टी अनुशासन के भीतर रहकर पार्टी के लिए काम करते रहेंगे.

आपके

प्रशांत भूषण , योगेन्द्र यादव
Prashantbhush@gmail.com
Yogendra.yadav@gmail.com

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हल हो सांस की आस का सवाल

शहरी लोगों के लिए गाड़ियों से निकलने वाला प्रदूषण, उद्योगों से निकलने वाला प्रदूषण, सिगरेट का धुंआ इत्यादि तो प्रभावित हो ही रहा है, साथ ही घर व कार्यालयों के अंदर वायु प्रदूषण से बच्चे और वयस्क तेजी से गिरफ्त में आ रहे हैं। दिल्ली विश्वविद्यालय से संबंद्ध डा. वल्लभ भाई पटेल चेस्ट इंस्टीट्यूट की हालिया रिपोर्ट चौंकाने वाली है। 

विश्व स्वास्थ्य संगठन की देखरेख में तैयार की गई रिपोर्ट के अनुसार घर एवं कार्यालयों के अंदर होने वाले वायु प्रदूषण से पांच लाख से ज्यादा लोगों की मृत्यु हो रही है जो कि दुनिया के किसी भी देश के लिए बहुत ज्यादा है। इस रिपोर्ट में ये भी कहा गया है कि बाहर से होने वाले प्रदूषण के मुकाबले घर में होने वाले प्रदूषण से 1000 गुना ज्यादा लोगों के फेफड़े खराब हो रहे हैं। पांच महागनरों में नवजात शिशुओं से लेकर 65 साल की आयु वर्ग के 22,234 लोगों पर कराए गए अध्ययन में पाया गया कि घर के वायु प्रदूषण से लोग अस्वस्थ तो होते ही है साथ ही मृत्युदर में भी बहुत ज्यादा इजाफा हो रहा है। 

पांच साल से कम उम्र के बच्चों में श्वसन क्रिया में संक्रमण (एक्यूट लॉअर रिस्परेटरी ट्रेक्ट इंफेक्शन) मृत्युदर का बहुत बड़ा कारण है। श्वसन की सभी बीमारियों में से अस्थमा हेल्थकेयर में बड़ी समस्या है। अमेरिका में वयस्क और बच्चों में ये तकरीबन 8.8 फीसद तक है तो भारत में इसका स्तर वयस्क और बच्चों में 4-5 प्रतिशत है। विश्व पर्यावरण दिवस की पूर्व संध्या पर रिपोर्ट के हवाले से पटेल चेस्ट इंस्टीट्यूट में श्वसन तंत्रिका एवं फेफड़ों मामलों के अध्यक्ष डा. राजकुमार ने कहा कि तेजी से बढ़ती आबादी संकरी गलियां, छोटे घरों में अधिक लोगों के रहने, रोशनदान की कमी से अन्य महानगरों की अपेक्षा यहां पर बच्चों में फेफड़े में संक्रमण के मामले बढ़ रहे हैं। 

कुल आबादी में से 5 साल से कम की आयु के शिशु 12 फीसद तक फेफड़े की बीमारी से ग्रस्त हैं, यह आंकड़ा कोलकाता, मुंबई मद्रास में 7 से 9 फीसद तक देखा गया है। एक अन्य सर्वेक्षण दिल्ली, एनसीआर में सांस फाउंडेशन 2002-2012 के दौरान 300 स्कूलों में किया। इसमें 10- 14 साल के उन बच्चों को शामिल किया गया जो अस्थमा से पीड़ित थे। 

करीब 15 फीसद बच्चे घर या स्कूल के भीतर होने वाली एलर्जियों के कारण अस्थमा से पीड़ित हैं। इसकी वजह अस्थमा और पैक फूड जैसे कि स्नैक्स और तरलपदार्थ का सीधा संबंध भी बताया गया है। फेफड़े पर अटैक-अस्थमा : मैक्स हेल्थकेयर के डा. विवेक कुमार के अनुसार अस्थमा में फेफड़ों में हवा के आने जाने वाले मार्ग में सूजन हो जाती है। ये सूजन काफी घातक होती है क्यों कि ये चेस्ट एक्सरे या किसी दूसरे टेस्ट से पता नहीं चलती। हालांकि सूजन से कोई दर्द नहीं होता और ये दिखाई भी नहीं देती है लेकिन रोगी को खांसी या सांस लेने में दिक्कत महसूस होती है।

वायुमण्डल में कार्बनडाईआक्साइड का होना भी प्रदूषण हो जाता है यदि वह धरती के पर्यावरण में अनुचित अन्तर पैदा करता है। 'ग्रीन हाउस' प्रभाव पैदा करने वाली गैसों में वृद्धि के कारण भू-मण्डल का तापमान निरन्तर बढ़ रहा है। जिससे हिमखण्डों के पिघलने की दर में वृद्धि होगी तथा समुद्री जलस्तर बढ़ने से तटवर्ती क्षेत्र, जलमग्न हो जायेंगे। हालाँकि इन शोधों को पश्चिमी देश विशेषकर अमेरिका स्वीकार नहीं कर रहा है। प्रदूषण् के मायने अलग-अलग सन्दर्भों से निर्धारित होते हैं।

परम्परागत रूप से प्रदूषण में वायु, जल, रेडियोधर्मिता आदि आते हैं। यदि इनका वैश्विक स्तर पर विश्लेषण किया जाये तो इसमें ध्वनि, प्रकाश आदि के प्रदूषण भी सम्मिलित हो जाते हैं। गम्भीर प्रदूषण उत्पन्न करने वाले मुख्य स्रोत हैं, रासायनिक उद्योग, तेल रिफायनरीज़, आणविक अपशिष्ट स्थल, कूड़ा घर, प्लास्टिक उद्योग, कार उद्योग, पशुगृह, दाहगृह आदि। आणविक संस्थान, तेल टैंक, दुर्घटना होने पर बहुत गम्भीर प्रदूषण पैदा करते हैं। कुछ प्रमुख प्रदूषक क्लोरीनेटेड, हाइड्रोकार्बन्स, भारी तत्व लैड, कैडमियम, क्रोमियम, जिंक, आर्सेनिक, बैनजीन आदि भी प्रमुख प्रदूषक तत्व हैं

प्राकृतिक आपदाओं के पश्चात् प्रदूषण उत्पन्न हो जाता है। बड़े-बड़े समुद्री तूफानों के पश्चात् जब लहरें वापिस लौटती हैं तो कचरे कूड़े, टूटी नाव-कारें, समुद्र तट सहित तेल कारखानों के अपशिष्ट म्यूनिसपैल्टी का कचरा आदि बहाकर ले जाती हैं। 'सुनामी' के पश्चात् के अध्ययन ने बताया कि तटवर्ती मछलियों में, भारी तत्वों का प्रतिषत बहुत बढ़ गया था। प्रदूषक विभिन्न प्रकार की बीमारियों को जन्म देते हैं। जैसे कैंसर, इलर्जी, अस्थमा, प्रतिरोधक बीमारियाँ आदि। जहाँ तक कि कुछ बीमारियों को उन्हें पैदा करने वाले प्रदूषक का ही नाम दे दिया गया है। जैसे मरकरी यौगिक से उत्पन्न बीमारी को 'मिनामटा' कहा जाता है।

शहरीकरण और औद्योगिकीकरण से भारत की वायु गुणता में अत्यधिक कमी आयी है। विश्वभर में 30 लाख मौतें, घर और बाहर के वायु प्रदूषण से प्रतिवर्ष होती हैं, इनमें से सबसे ज्यादा भारत में होती हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार भारत की राजधानी दिल्ली, विश्व के 10 सबसे अधिक प्रदूषित शहरों में से एक है। सर्वेक्षण बताते हैं कि वायु प्रदूषण से देश में, प्रतिवर्ष होने वाली मौतों के औसत से, दिल्ली में 12 प्रतिषत अधिक मृत्यु होती है।

एक अलग अध्ययन के अनुसार, भारत का सकल घरेलू उत्पाद पिछले दो दषकों में 2.5 प्रतिषत बढ़ा है, वाहनों से होने वाला प्रदूषण 8 प्रतिषत बढ़ा है जबकि उद्योगों से बढ़ने वाला प्रदूषण चौगुना हो गया है। भारत के प्रदूषणों में वायु प्रदूषण सबसे अधिक गम्भीर समस्या है। यह कई रूपों में हो रहा है जैसे- वाहनों से निकलने वाला धुऑं, उद्योगों से अषोधित औद्योगिक धुऑं, औद्योगिकीकरण के अतिरिक्त बढ़ते शहरीकरण से नये-नये औद्योगिक केन्द्र खुल गये हैं पर उनके लिए आवश्यक नागरिक सुविधाओं तथा प्रदूषण नियंत्रण के तरीकों का विस्तार नहीं हुआ है।

वायु प्रदूषण नियंत्रण के लिए आवश्यक प्रावधानों को दिल्ली जैसे शहर में पूर्णरूपेण लागू कर पाना काफी मुश्किल कार्य है। फिर भी इस दिशा में कार्य जारी है। विशेष रूप से सी.एन.जी. गैस के प्रयोग ने, इस दिशा में उल्लेखनीय कार्य किया है पर भविष्य में वाहनों की संख्या के लगातार बढ़ने की सम्भावना से, जुड़े हुए सरकारी प्रयासों की तथा प्रदूषण नियंत्रण प्रावधानों को कठोरता से लागू करने की आवश्यकता है।
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प्राध्यापक, शासकीय दिग्विजय पीजी 
स्वशासी महाविद्यालय,राजनांदगांव 

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काटजू बोले, अंग्रेजों के एजेंट थे गाँधीजी

प्रेस काउंसिल के पूर्व के चेयरमैन मार्कंडेय काटजू एक बार फिर विवादों में आ गए हैं। इस बार उन्होंने महात्मा गांधी को लेकर एक ब्लॉग लिखा है। जिसमें उन्होंने गांधी को अंग्रेजों का एजेंट करार दिया है।
 
'गांधी- ए ब्रिटिश एजेंट' में काटजू ने लिखा है कि गांधी अंग्रेजों की नीति पर काम करते थे। जिसके चलते भारत को काफी नुकसान पहुंचा है।
 
काटजू ने अपनी बात को साबित करने के लिए ब्लॉग में कई वजहें भी गिनाई हैं। उन्होंने लिखा है कि गांधी अंग्रेजों के ‘फूट डालो और राज करो’ की नीति पर काम करते थे।
 
मार्कंडेय काटजू ने अपने तर्क में कहा है कि महात्मा गांधी के वक्तव्यों और समाचार पत्रों में लिखे उनके लेख से ऐसा लगता है जैसे उनका झुकाव हिंदुओं के प्रति ज्यादा था।
 
गांधी के विचार पर गौर करें तो वे राम राज्य, गो रक्षा, ब्रह्मचर्य, वर्णाश्रण धर्म जैसे मुद्दे उठाते थे। गांधी की सभाओं में अक्सर हिंदू भजन रघुपति राघव राजा राम के बोल सुनाई देते थे। इससे मुस्लिमों की भावनाएं जरूर आहत होती थी।
 
काटजू ने गांधी के सत्याग्रह आंदोलन पर भी सवाल खड़े किए हैं। उन्होंने लिखा है कि गांधी ने जानबूझ कर ये आंदोलन छेड़ा जिससे क्रांतिकारी आंदोलन को पीछे छोड़ा जा सके। ऐसा करने के पीछे भी अंग्रेजों का फायदा छिपा हुआ था।

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बलिदानी योद्धाओं की याद

भारतीय सेना, प्रथम विश्‍व युद्ध में भाग लेने वाले 15 लाख भारतीय सिपाहियों और अपने प्राणों की आहूति देने वाले 74 हजार से भी अधिक सिपाहियों की स्‍मृ‍ति में 10 से 14 मार्च 2015 तक नई दिल्‍ली में शताब्‍दी समारोह का आयोजन कर रही है। ज़ाहिर है कि इस आयोजन के साथ शौर्य और साहस की दास्तानों की यादों का कारवाँ सा उमड़ पड़ा है। 

इतिहास गवाह है कि 1914 में भारतीय सेना दुनिया में सबसे बड़ी स्वयंसेवी सेना थी जिसकी कुल क्षमता 240,000 लोगों की थी। नवंबर 1918 तक इसमें 548,311 लोग शामिल हो गए थे जिसे इम्पीरियल स्ट्रेटजिक रिजर्व माना जाता था। इसे नियमित रूप से नॉर्थ ईस्ट फ्रंटियर पर घुसपैठ और छापों से निबटने और मिस्र, सिंगापुर तथा चीन में ब्रिटिश साम्राज्य के लिए सैन्य मोर्चाबंदी के लिए बुलाया जाता था। इस क्षेत्रीय सैन्य बल को दो सेनाओं में बांटा गया था: नॉर्दर्न आर्मी जो अपने कमांड के तहत पांच डिविजनों और तीन ब्रिगेडों के साथ नॉर्थ-वेस्ट फ्रंटियर से बंगाल तक फ़ैली हुई थी और सदर्न आर्मी जिसका विस्तार बलूचिस्तान से लेकर दक्षिण भारत तक था और इसमें कमांड के तहत चार डिवीजन तथा उपमहाद्वीप के बाहर दो संरचनाएं शामिल थीं। दोनों सेनाओं में 39 घुड़सवार रेजिमेंटों, 138 पैदल सेना के बटालियनों (20 गोरखा सहित), द कॉर्प्स ऑफ गाइड्स नामक एक संयुक्त घुड़सवार-पैदल सेना की यूनिट, तीन खंदक खोदने वाले सैनिकों (सैपर) के रेजिमेंट और 12 पहाड़ी तोपखाने की बैटरियां शामिल थीं।

इन सुधारों द्वारा गठित नौ डिवीजनों में प्रत्येक के पास एक घुड़सवार सेना और तीन पैदल सेना के ब्रिगेड शामिल थे। घुड़सवार सेना के ब्रिगेड में एक ब्रिटिश और दो भारतीय रेजिमेंट जबकि पैदल सेना के ब्रिगेडों में एक ब्रिटिश और तीन भारतीय बटालियन शामिल थे।  भारतीय सेना की बटालियनें ब्रिटिश बटालियनों से छोटी थीं जिसमें 30 अधिकारी और 723 अन्य रैंक के सैनिक शामिल थे जिसकी तुलना में ब्रिटिश बटालियनों में 29 अधिकारी और 977 अन्य रैंक के सैनिक मौजूद थे। भारतीय बटालियनों को अक्सर टुकड़ों में बाँट दिया जाता था जिनसे विभिन्न जनजातियों, जातियों या धर्मों की कंपनियां बना दी जाती थीं। प्रत्येक डिविजन के मुख्यालयों में संलग्न अतिरिक्त सैनिकों में एक घुड़सवार सेना की रेजिमेंट, एक अग्रणी बटालियन और ब्रिटिश रॉयल फील्ड आर्टिलरी द्वारा उपलब्ध कराये गए तोपखाने शामिल थे। प्रत्येक डिविजन की शक्ति लगभग 13,000 लोगों की थी जो आंशिक रूप से छोटी पैदल सेना की बटालियनों और छोटे तोपची सैनिकों के कारण ब्रिटिश डिविजन की तुलना में कुछ हद तक कमजोर थीं। भारतीय सेना उस समय भी कमजोर हो गयी थी जब देश में मौजूद 500 ब्रिटिश अधिकारी छोड़कर चले गए थे जो उन 38 भारतीय बटालियनों के लिए पर्याप्त थे जिन्हें किचनर की आर्मी के लिए बनाए जा रहे नए ब्रिटिश डिविजनों में तैनात किया गया था।

नियमित भारतीय सेना के अलावा रियासती प्रांतों की सेनाओं और सहायक सैन्य बलों (यूरोपीय स्वयंसेवकों) के रेजीमेंटों को भी आपात स्थिति में मदद के बुलाया जा सकता था। रियासती प्रांतों से इम्पीरियल सर्विस ब्रिगेड का गठन हुआ था और 1914 में इसमें 20 घुड़सवार सेना के रेजिमेंटों और पैदल सेना की 14 बटालियनों में 22,613 जवान शामिल थे।  युद्ध के अंत तक 26,000 जवानों ने इम्पीरियल सर्विस में विदेशों में अपनी सेवाएं दी थीं। सहायक सैन्य बल घुड़सवार सेना के 11 रेजिमेंटों और 42 स्वयंसेवक पैदल सेना के बटालियनों में 40,000 अतिरिक्त जवानों को तैनात करने में सक्षम था।  इसके अलावा फ्रंटियर मिलिशिया और मिलिटरी पुलिस भी उपलब्ध थे जो उनके बीच 34,000 जवानों को तैनात कर सकते थे। 

क्षेत्रीय सैन्य बल के मुख्यालय दिल्ली में स्थित थे और वरिष्ठ अधिकारी (भारत के कमांडर-इन-चीफ) को भारत के जनरल स्टाफ के प्रमुख द्वारा सहयोग प्रदान किया जाता था। भारतीय सेना के सभी वरिष्ठ कमान और स्टाफ पदों को ब्रिटिश और भारतीय सेनाओं के वरिष्ठ अधिकारियों के बीच वैकल्पिक रूप से इस्तेमाल किया जाता था। 1914 में जनरल सर ब्यूचैम्प डफ भारतीय सेना के कमांडर-इन-चीफ थे और ब्रिटिश सेना के लेफ्टिनेंट जनरल सर पर्सी लेक जनरल स्टाफ के प्रमुख थे। प्रत्येक भारतीय बटालियन में स्टाफ के रूप में भारत की ब्रिटिश सेना के 13 अधिकारियों और भारतीय सेना से 17 अधिकारियों को शामिल किया गया था। प्रवासी ब्रिटिश अधिकारी ब्रिटिश औपनिवेशिक भारतीय प्रशासन के तहत सेवारत थे। युद्ध तेज होने और अधिकारियों के हताहत होने से उनकी जगह ब्रिटिश मूल के अधिकारियों को कार्यभार सौंपने की क्षमता बेहद मुश्किल में पड़ गयी और कई मामलों में बटालियनों में अधिकारियों के आवंटन को तदनुसार कम कर दिया गया। केवल 1919 में जाकर भारतीय मूल के पहले ऑफिसर कैडेटों को रॉयल मिलिटरी कॉलेज में अधिकारी प्रशिक्षण के लिए चुने जाने की अनुमति दी गयी।

भारतीय सेना के लिए सामान्य वार्षिक भर्ती 15,000 जवानों की थी, युद्ध के दौरान 800,000 से अधिक लोगों ने सेना के लिए स्वेच्छा से योगदान दिया और 400,000 से अधिक लोगों ने गैर-युद्धक भूमिकाओं के लिए स्वैच्छिक रूप से कार्य किया। 1918 तक कुल मिलाकर लगभग 1.3 मिलियन लोगों ने स्वेच्छा से सेवा के लिए योगदान दिया था। युद्ध के दौरान एक मिलियन भारतीय जवानों ने विदेशों में अपनी सेवाएं दी जिनमें से 62,000 से अधिक मारे गए और 67,000 अन्य घायल हो गए थे। कुल मिलाकर 74,187 भारतीय सैनिक प्रथम विश्व युद्ध के दौरान मारे गए थे। इन्हें याग करने और श्रद्धांजलि अर्पित करने का सिलसिला जारी है। 
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प्राध्यापक,शासकीय दिग्विजय स्वशासी,पीजी
महाविद्यालय, राजनांदगांव ( छत्तीसगढ़ )
मो.09301054300 

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