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तलवार दंपत्ति की सजा के बहाने हम अपने बच्चों के दिलों में भी झाँकें

देश की अब तक सबसे बहुचर्चित दोहरे कत्ल संबंधी 'मर्डर मिस्ट्रीÓ का अदालत की ओर से पटाक्षेप हो चुका है। लगभग साढ़े पांच वर्ष पूर्व 16 मई 2008 को नोएडा में हुए आरूषि तलवार व हेमराज के कत्ल पर गाजि़याबाद की सीबीआई अदालत ने अपना फैसला सुनाते हुए आरूषि के माता-पिता नुपुर तलवार व डॉक्टर राजेश तलवार को आजीवन कारावास की सज़ा सुनाई है।
 

अदालत ने भले ही बिना पर्याप्त सुबूत और गवाह के ही इन्हें आजीवन कारावास की सज़ा सुनाई है परंतु आपराधिक गतिविधियों पर नज़र रखने वाले विश£ेषक शुरु से ही इस बात पर संदेह कर रहे थे कि हो न हो यह दोहरा कत्ल आरूषि के माता-पिता द्वारा ही अंजाम दिया गया है तथा इस दोहरी हत्या का कारण तलवार दंपति द्वारा अपनी 14 वर्षीय पुत्री को 45 वर्षीय अपने घरेलू नौकर नेपाली मूल के हेमराज के साथ आपत्तिजनक हालत में देखा जाना है। लिहाज़ा इसे शुरु से ही ऑनर किलिंग माना जा रहा था। परंतु चूंकि तलवार दंपति इतने संभ्रांत व प्रतिष्ठित वर्ग से संबद्ध थे तथा इस दोहरे हत्याकांड के बाद उन्होंने लंबे समय तक बड़ी ही खूबसूरती और सफाई के साथ जांच अधिकारियों को गुमराह करने की कोशिश की। इससे थोड़ा-बहुत संदेह तो ज़रूर होने लगा था कि हो सकता है तलवार दंपति के अतिरिक्त इस परिवार से रंजिश रखने वाले किसी दूसरे व्यक्ति ने ही यह अपराध अंजाम दिया हो।

इस मर्डर मिस्ट्री को सुलझाने में किसी निष्कर्ष पर पहुंचने में नाकाम रहने वाली सीबीआई ने तो मामले में अपनी क्लोज़र रिपोर्ट भी अदालत में पेश कर दी थी। परंतु गाजि़याबाद की सीबीआई की विशेष अदालत ने इसी क्लोज़र रिपोर्ट को ही मुकद्दमे का आधार मानकर सुनवाई पूरी की और आखिरकार इस आधार पर तलवार दंपति को आजीवन कारावास की सज़ा सुना डाली कि चंूकि तलवार दंपति के घर में हत्या के समय केवल तलवार दंपति ही वहां मौजूद थे लिहाज़ा इस दोहरे हत्याकांड को उन्होंने ही अंजाम दिया है।

मुकद्दमे संबंधी इस पूरे प्रकरण में एक बात और भी विचारणीय है कि वर्तमान दौर में उपलब्ध तमाम आधुनिक वैज्ञानिक एवं तकनीकी साधनों व मशीनों के बावजूद सीबीआई अथवा दूसरी जांच एजेंसियां तलवार दंपति से न तो हत्या का सच उगलवा सकीं न ही झूठ पकडऩे वाली मशीन उनके 'झूठÓ को पकड़ सकी। बहरहाल साढ़े पांच वर्ष तक चले इस रहस्यमयी हत्याकांड के पेचीदा मुकद्दमे में सीबीआई अदालत द्वारा 204 पृष्ठों का अपना जो फैसला सुनाया गया है उसके बाद तलवार दंपति अब गाजि़याबाद की डासना जेल में अपनी नई भूमिका शुरु कर चुके हैं। डाक्टर राजेश तलवार को कैदी नंबर 9342 के रूप में नई पहचान दी गई है तथा उन्हें जेल के स्वास्थय विभाग संबंधी टीम में सेवा करने का काम सौंपा गया है। इसी प्रकार नुपुर तलवार डासना जेल में कैदी नंबर 9343 के रूप में चिन्हित की जाएंगी तथा उनका काम कैदियों को शिक्षित करना होगा। रविवार के अतिरिक्त प्रतिदिन सुबह दस बजे से सायं पांच बजे तक उन्हें अपनी ड्यूटी देनी होगी। इसके बदले इन्हें पारिश्रमिक भी प्रदान किया जाएगा।              

कानून के जानकारों के अनुसार इस बात की पूरी संभावना है कि तलवार दंपति को संभवत: उच्च न्यायालय से ही बरी कर दिया जाएगा। अन्यथा उच्चतम न्यायालय से तो उन्हें अवश्य बरी कर दिया जाएगा। परंतु हेमराज की विधवा निचली अदालत के फैसले से संतुष्ट तो ज़रूर है मगर वह अपने पति की हत्या के लिए तलवार दंपति को फांसी की सज़ा दिए जाने की मांग करती सुनाई दी। इसका मुख्य कारण यही था कि हत्या के फौरन बाद तलवार दंपति ने जांच को गुमराह करने के लिए सर्वप्रथम हेमराज पर ही कत्ल का इल्ज़ाम लगाया था। परंतु हेमराज की लाश उन्हीं के घर की छत पर  मिलने पर जांच की दिशा बदल गई।

हेमराज की विधवा को इसी बात पर अधिक गुस्सा है कि तलवार दंपति ने एक तो उसके पति की हत्या की दूसरे उसकी लाश को छिपाकर उसी को हत्यारा बताने का दु:स्साहस भी किया। इतना ही नहीं बल्कि तलवार दंपति ने जांच के दौरान कई मोड़ पर और कई बार जांच एजेंसियों को हत्या के संबंध में गुमराह करने की कोशिश की। अदालत ने तलवार दंपति को जो सज़ा सुनाई है उसमें आरूषि व हेमराज की उनके द्वारा हत्या किए जाने के अतिरिक्त हत्या संबंधी साक्ष्यों को नष्ट करने तथा इस संबंध में होने वाली जांच को गुमराह करने जैसे संगीन आरोप भी शामिल हैं।              

इस पूरे प्रकरण को लेकर कुछ ज्वलंत प्रश्न भी सामने आते हैं। जिनका जवाब अदालत तो नहीं परंतु समाज को ही तलाशना पड़ेगा। एक तो यह कि संभ्रांत एवं विशिष्ट परिवार की परिभाषा क्या है? क्या चंद पैसे पास आ जाने, गोल्फ खेलना शुरु कर देने, घर में अकेले या दोस्तों के साथ बैठकर व्हिस्की के जाम टकराने, लायंस क्लब या रोटरी क्लब के सदस्य बनने या जिमख़ानों में जाकर जुआ खेलने अथवा क्लब में डांस करने मात्र जैसी खोखली व ढोंगपूर्ण बातों से कोई व्यक्ति संभ्रांत अथवा विशिष्ट कहा जा सकता है?

 उपरोक्त परिस्थितियां ही ऐसी होती हैं जोकि तथाकथित संभ्रांत परिवार के बच्चों को गलत रास्ते पर चलने तथा गलत दिशा में अपना दिमाग दौड़ाने का मौका व समय उपलब्ध कराती हैं। ज़ाहिर है जब माता-पिता अपनी ऐशपरस्ती और मनोरंजन में मशगूल हैं तो माता-पिता की उपेक्षा का शिकार उनका बच्चा भी अपनी मनमर्जी के रास्ते पर आसानी से चल पड़ेगा। और आधुनिकता के इस दौर में जबकि घर बैठे कंप्यूटर,मोबाईल फोन, लैपटॉप तथा इनपर दिखाई जाने वाली तरह-तरह की अच्छी-बुरी वेबसाईटस मौजूद हैं फिर आखिर वह मां-बाप अपने बच्चों को किसी गलत राह पर जाने से कैसे रोक सकते हैं जिन्हें अपनी ऐशपरस्ती से ही फुर्सत नहीं? यदि तलवार दंपति ने पहले से ही इस बात पर निगरानी रखी होती कि जवानी की दहलीज़ पर कदम रखने जा रही उनकी इकलौती पुत्री घर में रहने वाले नौकर से इतना अधिक घुलने-मिलने न पाए तो शायद नौबत यहां तक न पहुंचती। परंतु ऐसा नहीं हो सका। और माता-पिता की निगरानी के अभाव में आरूषि-हेमराज प्रकरण यहां तक आ पहुंचा कि तलवार दंपति को इन दोनों को मौत के घाट उतारना पड़ा।              

आरूषि-हेमराज दोहरे कत्ल को लेकर एक और बात साफतौर पर उजागर होती है कि भले ही कोई भारतीय अपने धन व संपन्नता के बल पर कितना ही पाश्चात्य होने का अभिनय क्यों न करे परंतु हकीकत में उसके अंदर भारतीय संस्कृति व भारतीय परंपरा ही प्रवाहित होती रहती है। यदि इस प्रकार की घटना पश्चिमी देशों में हुई होती और कोई माता-पिता अपने नौकर को अपनी पुत्री के साथ आपत्तिजनक अवस्था में देख लेता तो संभवत: मामला दोहरे कत्ल तक तो कतई नहीं पहुंचता। क्योंकि पश्चिमी संस्कृति व स यता ऐसी बातों को इतना अधिक महत्व नहीं देती है। परंतु हमारे देश में तथा दक्षिण एशिया के और कई देशों में इस प्रकार के रिश्तों को अवैध व असहनीय माना जाता है।

परिणामस्वरूप तथाकथित ऑनर किलिंग के नाम से कहीं न कहीं किसी न किसी की हत्या होने की खबरें आती रहती हैं। निश्चित रूप से किसी की हत्या करना समाज व कानून की नज़र में बहुत बड़ा अपराध है और ऐसा हरगिज़ नहीं होना चाहिए। परंतु इस वास्तविकता से भी इंकार नहीं किया जा सकता कि हमारे देश में बेटी की इज़्ज़त को जिस प्रकार परिवार की इज़्ज़त व आबरू से जोड़कर देखा जाता है उस सोच के मद्देनज़र यह घटना यदि डाक्टर राजेश तलवार के अतिरिक्त किसी दूसरे परिवार में भी घटी होती तो भी संभवत: उसका अंजाम भी यही होना था। कोई भी भारतीय माता-पिता अपनी किशोरी को अपने घर के नौकर के साथ आपत्तिजनक स्थिति में देखना कतई सहन नहीं कर सकते।

इसमें तलवार दंपति का कोई अति विशेष दोष नहीं बल्कि इस प्रकार के मानसिक हालात के पैदा होने का कारण तलवार दंपति का भारतीय समाज में परवरिश पाना तथा यहां उनका संस्कारित होना ही शामिल है। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि भारत वर्ष ही वह देश है जहां लड़कियों को पैदा होते ही मार दिया जाता था ताकि परिवार के लोगों का सिर किसी के आगे झुकने न पाए। ऐसी संस्कृति व परंपरा वाले देश में कोई माता-पिता अपनी 14 वर्षीय बेटी को घर के नौकर के साथ आपत्तिजनक अवस्था में आखिर कैसे बर्दाश्त कर सकते हैं? आरूषि-हेमराज की हत्या व इसके बाद तलवार दंपति को सुनाई गई सज़ा से संबंधित उपरोक्त सुलगते सवालों के जवाब भारतीय समाज ज़रूर तलाश कर रहा है।

                                                                    

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निर्मल रानी                                                            

1618, महावीर नगर

अंबाला शहर,हरियाणा।

फोन-0171-2535628

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असाधारण तेरह कहानियों का संग्रह है फराज़ की नई पुस्तक ‘द अदर साइड’

अपनी पहली रोमांटिक पुस्तक ‘ट्रूली डिपली मेडली’ की जबरदस्त सफलता के उपरान्त युवा लेखक फराज़ काज़ी अपनी नई पुस्तक ‘द अदर साइड’ को लेकर फिर से चर्चा में हैं। हाल ही में पुस्तक का विमोचन समारोह नई दिल्ली में आयोजित किया गया, जहां लोकप्रिय गायिका शिबानी कश्यप, डिजाइनर संजना जाॅन और पैरानाॅर्मल एक्सपर्ट गौरव तिवारी ने फराज़ काज़ी व विवेक बनर्जी द्वारा लिखित इस नई पुस्तक का विमोचन किया।

‘द अदर साइड’ में जाने-माने लेखक विवेक बनर्जी ने फराज़ का साथ दिया है और यह फराज़ की पहली रोमांस पुस्तक जिसने फराज़ को ‘द निकोलस स्पाकर््स आॅफ इंडिया’ की ख्याति दिलायी से बिल्कुल अलग है। ‘ट्रूली डिपली मेडली’ के लिए पाठकों एवम् आलोचकों ने फराज़ को काफी सराहा और उन्हें नेशनल बुक ट्रस्ट आॅफ इंडिया द्वारा नेशनल डेबू यूथ फिक्शन अवार्ड से भी नवाजा गया है।

अपनी दूसरी पुस्तक और विवेज बनर्जी के साथ साझेदारी के विषय में फराज़ ने कहा कि ‘विवेक सर के साथ काम करके स्वयं को भाग्यशाली महसूस कर रहा हूँ, क्योंकि उनके योगदान के चलते विषय में असरदार बदलाव आया। हमने साथ मिलकर ‘द अदर साइड हेतु’ दूसरे पक्षों पर खासा ध्यान दिया है। हालांकि इस वर्ग की और भी पुस्तकें बाज़ार में मौजूद हो सकती हैं लेकिन हमने जिस अंदाज में इस किताब पर काम किया है वह एक विशिष्ट पहल है। विश्व में पहली ही बार एक ऐनिमेटेड कवर वाली किताब है ‘द अदर साइड’। जिसके कवर का अनावरण हाल ही में डिजीटल प्लेटफाॅर्म पर किया गया है। इसके अतिरिक्त यूट्यूब यूज़र्स हेतु हमने दो टीज़र भी जारी किये है और हमें उम्मीद है कि किताब के विषय के अनुकूल यह टीजर्स पाठकों को वास्तव में डराने में कामयाब रहेंगे।’’

रोमांस से रोमांच की तरफ रूख करने के विषय में फराज़ ने बताया कि ‘बतौर लेखक मैं किसी एक शैली में नहीं बंधना चाहता। मेरी रोमांस पुस्तक की सफलता ने मुझे काफी उत्साहित जरूर किया लेकिन मैं केवल रोमांस आधारित किताब ही नहीं लिखना चाहता। दूसरे विषय में काम करना काफी चुनौतिपूर्ण अनुभव रहा क्योंकि यह विषय ऐसा है जिसे बहुत ज्यादा लेखकों ने नहीं अपनाया है। एक अन्य कारण यह भी रहा कि वास्तविकता में भारत मिथकों और लोककथाओं का देश है और हमारी एक समृद्ध परंपरा है। हम सभी को जीवन के एक मोड़ पर किसी न किसी रूप में भूतिया कहानियों का से सामना होता है और मौज-मस्ती भरे युवा सफर में हम अक्सर डरावनी कहानियों एवम् घटनाओं पर चर्चा करते हैं। ऐसे में जरूरी था कि कोई इस विषय पर लिखने की पहल करे और उस डर की चर्चा करे जो हमने अनुभव किया है साथ ही एक अज्ञात डर के साथ जीना सीख पायें।’

‘द अदर साईड’ 13 असाधारण कहानियों का संग्रह है; एक ऐसी दुनिया जो हमारी आंखे देखना नहीं चाहती, हमारे कान जिसके बारे में सुनना नहीं चाहते, जिसे हम पूरी तरह से अनदेखा कर देना चाहते हैं। यह पुस्तक हर उस व्यक्ति के लिए है जो बहादुरी के साथ एक ऐसे सफर के आमंत्रण को स्वीकार कर सकता है जहां वास्तविकता कल्पना मात्र है, जहां मंजिल की तरफ बढ़ते कदम धुंधले हो जाते हैं, एक ऐसी राह जो विचित्र अनुभवों से प्रेरित है। इस सफर की हर कहानी एक अंजाने डर से रूबरू कराते हुए खौफनाक डर पैदा करती है।

इस मौके पर पैरानाॅर्मल एक्सपर्ट गौरव तिवारी ने कहा कि, ‘यह एक जबरदस्त पुस्तक है जो डर के प्रति आपकी सोच को बदल देगी।’
विमोचन के अवसर पर गायिका शिबानी कश्यप ने विशेष रूप से तैयार पंक्तियां गुनगनायी जो कि फराज़ काज़ी और उनकी पुस्तक को समर्पित था। लोगों की फरमाईश पर शिबानी ने गीत ‘सजना आ भी जा…’ भी प्रस्तुत किया।

डिजाइनर संजना जाॅन ने फराज़ की सराहना करते हुए कहा कि ‘जबरदस्त किताब है, मैने जब इसे पढ़ना शुरू किया तो इसे नीचे रखने को मन ही नहीं किया। बहुत अच्छा अनुभव रहा इस पुस्तक को पढ़ना।’

 सम्पर्क सूत्रः शैलेश कुमार नेवटिया – 9716549754

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उत्पादकता और गुणवत्ता में सुधार से आएगी देसी मसालों में बहार

राजस्थान और गुजरात के दूर-दूर तक फैले निर्जन इलाकों में मसालों के तौर पर इस्तेमाल होने वाली औषधियों, बीजों और फलों की खेती का खास महत्त्व है। आमतौर पर इन्हें बीज मसालों के नाम से जाना जाता है। ये बीज मसाले उन कम फसलों में शुमार है जो ऐसी विषम परिस्थितियों में भी उगाई जा सकती हैं जिनकी पैदावार के लिए कम लागत आती है, साथ ही बाजार में इन मसालों की अच्छी कीमत मिलती है। इसलिए राजस्थान और गुजरात को देशभर में 'बीज मसालों के कटोरे' के नाम से जाना जाता है, हालांकि देश के अन्य राज्यों में भी इस मसालों की पैदावार होती है।

राजस्थान धनिया, मेथी और अजवायन के उत्पादन में आगे है। इसके अलावा गुजरात जीरा, सुआ और सौंफ के उत्पादन में अहम हिस्सेदारी निभाता है। अन्य राज्यों में पंजाब अजमोद के उत्पादन के लिए प्रसिद्घ है तो उत्तर प्रदेश और बिहार कलौंजी के नाम से लोकप्रिय मसाले का उत्पादन करते हैं। भारत के दक्षिणी हिस्से में स्थित राज्यों में भी इन मसालों की पैदावार होती है। आंध्र प्रदेश में जीरे और मेथी का उत्पादन काफी मात्रा में होता है। अन्य दक्षिणी राज्यों में मुख्य रूप से काली मिर्च और इलायची का उत्पादन होता है जिन्हें फसल आधारित बीज मसालों की फेहरिस्त में शामिल नहीं किया जाता है। अन्य राज्यों में पैदा किए जाने वाले दूसरे बीज मसालों में शिया जीरा और विलायती सौंफ प्रमुख हैं।

दुनिया भर में सिर्फ भारत ही एक ऐसा देश है जहां व्यावसायिक रूप से मूल्यवान लगभग सभी बीज मसालों का उत्पादन देश के किसी न किसी हिस्से में जरूर होता है। इस तरह भारत दुनिया का सबसे बड़ा बीज मसाला उत्पादक और उपभोक्ता देश है। दुनिया की लगभग 60 फीसदी जरूरतें भारत के जरिये ही पूरी होती है। सबसे खास बात यह है कि मसालों का निर्यात पिछले पांच सालों के दौरान मूल्य की दृष्टिï से 15 फीसदी और आकार की दृष्टिï से 8.7 फीसदी की दर से वृद्घि कर रहा है। पिछले साल अकेले जीरा 1,093 करोड़ रुपये की ऊंची कीमत पर पर पहुंच गया जिसकी वजह से जीरा कृषि निर्यात के मामले में अग्रणी फसलों में शुमार हो गया। बाहरी कारोबार में दूसरे मसाले खासतौर पर सौंफ, अजमोद और मेथी की पैदावार में भी वर्ष 2011-12 के मुकाबले वर्ष 2012-13 करीब 55 फीसदी का इजाफा हुआ।

निर्यात के मामले में शानदार प्रदर्शन का मतलब कतई यह नहीं लगाया जा सकता कि घरेलू बीज मसालों के कारोबार में सबकुछ ठीक चल रहा है और यह कारोबार ऊंचाइयों को हासिल कर चुका है। निर्यात में आई इस बढ़ोतरी की प्रमुख वजह भारत के कारोबारी प्रतिद्वंद्वी सीरिया की ओर से होने वाली आपूर्ति की कमी है। सीरिया के घरेलू हालात ठीक नहीं होने के कारण वहां से आपूर्ति में गिरावट दर्ज की गई। लेकिन सिर्फ ऐसा नहीं है कि मुकाबला सिर्फ सीरिया से है। चीन, तुर्की और ईरान जैसे देश भी भारत को तगड़ी टक्कर दे रहे हैं।

हालांकि भारत का उत्साह बढ़ाने वाला तथ्य यह है कि हमारे पास उत्पादन में इजाफा करने और गुणवत्ता में सुधार करने की असीमित संभावना है। इससे वैश्विक मसाला बाजार में देश की हिस्सेदारी को आसानी से बढ़ाया जा सकता है। इसके अलावा अंतरराष्टï्रीय मसाला बाजार काफी तेजी से बढ़ रहा है। साफ है कि इन उत्पादों के भारतीय निर्माताओं और निर्यातकों के लिए भी उम्मीदें बढ़ रही हैं। दुनिया भर में इन मसालों की बढ़ती मांग की एक प्रमुख वजह भारतीय खाने की तेजी से बढ़ती लोकप्रियता भी है। मांग बढऩे की एक अन्य वजह दवा, प्रसाधन और सुगंधित द्रव्य बनाने वाले उद्योगों में इन चीजों का बढ़ता इस्तेमाल भी है।

अजमेर स्थित राष्ट्रीय बीजीय मसाला अनुसंधान केंद्र (एनआरसीएसएस) के निदेशक बलराज सिंह निर्यात में होने वाली बढ़ोतरी के कुछ अन्य कारणों पर प्रकाश डालते हैं। इनमें एनआरसीएसएस और अन्य शोध संस्थानों द्वारा प्रवर्तित तकनीकी और भारतीय मसाला बोर्ड सहित अन्य एजेंसियों की ओर से चलाए जा रहे प्रचार कार्यक्रम भी शामिल हैं। एनआरसीएसएस ने इन फसलों की कई अलग-अलग और पहले से बेहतर प्रजातियां विकसित कर ली हैं और खेती के नए तरीके भी ईजाद किए हैं। इसके अलावा संगठन इन फसलों को सूखे, रोगों और कीटों से बचाव के तरीके और इनकी गुणवत्ता सुधारने की ओर ध्यान दे रहा है।

देश में बीजीय मसाला क्षेत्र के लिए सबसे बड़ी मुश्किल पैदावार के बाद का बुरा प्रबंधन और मूल्य वर्धन की कमजोर प्रक्रिया है। इन मसालों का 80 फीसदी तक निर्यात कच्चे माल के तौर पर किया जाता है। उत्पादन के बाद बेहतर तकनीकी और प्रसंस्करण के जरिये उत्पादन की गुणवत्ता बढ़ाकर निर्यात से होने वाली आय में इजाफा किया जा सकता है। बेहतर गुणवत्ता के बीजों खासकर अधिक उत्पादन करने वाले बीजों की कमी भी उत्पादकता और उत्पादन बढ़ाने के मामले में एक बड़ी बाधा है। उत्पादन के बदले उचित कीमत न मिलने के कारण भी किसान इन फसलों का रकबा बढ़ाने से कतराते हैं। बीजीय मसालों के कारोबार में मौजूद क्षमता का इस्तेमाल करने के लिए इन सभी मसलों पर जल्दी से जल्दी गौर किया जाना चाहिए।

साभार- बिज़नेस स्टैंडर्ड से

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इन नेताओं पर धन कहाँ से बरसता है..

अंग्रेजी अखबार 'इंडियन एक्सप्रेस' ने सभी छह राष्ट्रीय पार्टियों के अध्यक्षों, दोनों सदनों के नेताओं, राज्य स्तर की 48 पार्टियों के मुखियाओं और मौजूदा पांचों चुनावी राज्यों के मुख्यमंत्रियों के हलफनामों का विश्लेषण किया तो पाया कि किसी ने भी अपनी संपत्ति की असल कीमत नहीं बताई है। कुछ ने बाजार मूल्य से बहुत कम कीमत बताई है, तो कुछ नेताओं ने मूल्य का जिक्र ही नहीं किया है। कई नेता तो लगातार चुनावों में संपत्ति की कीमत वही बता रहा हैं यानी उनकी संपत्ति की कीमत 5 साल बाद भी बढ़ नहीं रही है।

आइए डालते हैं नजर कुछ उदाहरणों पर…

सोनिया गांधी: 2004 और 2009 के चुनावों में दाखिल की संपत्ति के ब्योरे में सोनिया ने महरौली के पास स्थित डेरा मंडी में 3 बीघा और सुल्तानपुर में 12 बीघा 15 बिस्वा जमीन की कीमत 2.19 लाख रुपये बताई थी। सोनिया द्वारा बताई गई कीमत बाजार मूल्य से तो काफी कम है ही, इसी इलाके में संपत्ति रखने वाले दूसरे उम्मीदवार की ओर से दाखिल हलफनामे से भी काफी कम है। 2008 में इसी इलाके से विधानसभा चुनाव लड़ चुके बीएसपी के उम्मीदवार कंवर सिंह तंवर ने डेरा गांव में 12 बीघा 5 बिस्वा जमीन की कीमत 18.37 करोड़ रुपये बताई है।

राजनाथ सिंहः साल 2009 में दी गई जानकारी के अनुसार लखनऊ के गोमती नगर के विपुल खंड में अपने घर की कीमत उन्होंने 55 लाख बताई, लेकिन उन्होंने उस घर का एरिया नहीं बताया, जबकि सुप्रीम कोर्ट के आदेश और चुनाव आयोग के गाइडलाइन के अनुसार एरिया बताना जरूरी है।

मीरा कुमार: लोकसभा की अध्यक्ष मीरा कुमार ने 2009 में लोकसभा चुनाव लड़ते समय यह बताया था कि उनके पास दिल्ली के न्यू फ्रेंड्स कॉलोनी में 522 वर्ग गज का मकान है, जिसकी कीमत 2.4 करोड़ रुपये है। इसके अलावा उनके पास महारानी बाग में 1119 वर्ग गज का एक मकान है, जिसकी कीमत 4.95 करोड़ है। लेकिन उस समय के बाजार मूल्य के हिसाब से देखा जाए तो न्यू फ्रेंड्स कॉलोनी वाले उनके मकान की कीमत 12 करोड़ और महारानी बाग वाले घर की कीमत 26 करोड़ थी।

सुषमा स्वराजः लोकसभा में विपक्ष की नेता सुषमा स्वराज और उनके पति स्वराज कौशल के नाम दिल्ली के जंतर-मंतर में धवनदीप बिल्डिंग में एक-एक फ्लैट हैं। उन्होंने 2139 स्क्वेयर फीट वाले फ्लैट की कीमत 1.35 करोड़ रुपये और 2254 स्क्वेयर फीट वाले फ्लैट की कीमत 1.13 करोड़ रुपये बताई है। ये कीमतें जब फ्लैट्स खरीद गए थे तब के हैं, बाजार मूल्य नहीं हैं। इसके अलावा उन्होंने मुंबई के फ्लैट की कीमत बताई है, लेकिन एरिया नहीं बताया है।

मायावतीः बीएसपी सुप्रीमो ने 2012 में घोषणा की थी कि उनके पास दिल्ली के कनॉट प्लेस के बी ब्लॉक में दो दुकानें हैं। उन्होंने दोनों दुकानों की कीमत वर्तमान बाजार मूल्य से कम बताई हैं। इसके साथ ही चाणक्यपुरी स्थित अपने 42,907.87स्क्वेयर फीट के घर की ‌कीमत उन्होंने 61.86 करोड़ बताई है, जबकि जानकार बताते हैं कि इस एरिया में प्रति स्क्वेयर फुट की कीमत करीब 2 लाख रुपये है। अगर इस घर का वैल्यूशन एक लाख रुपये प्रति स्क्वेयर फुट के हिसाब से भी करें तो इसकी कीमत 429 करोड़ रुपये बैठेगी।

शीला दीक्षित: दिल्ली की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित का कहना है कि उनके पास निजामुद्दीन ईस्ट में 1570 वर्ग फुट का एक मकान है। शीला ने इसकी कीमत 98.39 लाख बताई है, लेकिन इस इलाके के रीयल एस्टेट एक्सपर्ट्स बताते हैं कि यहां 32 हजार रुपये प्रति वर्ग फुट के रेट से इस मकान की कीमत 5 करोड़ से ऊपर है।

सुशील कुमार शिंदे: देश के गृहमंत्री और लोकसभा में सत्ता पक्ष के नेता सुशील कुमार शिंदे ने 2009 लोकसभा चुनाव के समय घोषणा की थी कि उनके पास दिल्ली के मुनिरका विहार में 1200 वर्ग फीट का फ्लैट है। उन्होंने इसकी कीमत 1 करोड़ रुपये बताई थी। इसके अलावा शिंदे के पास मुंबई के बांद्रा के पाली हिल इलाके में 131.04 वर्ग मीटर का फ्लैट है, जिसकी कीमत 2009 में 1.29 करोड़ रुपये बताई गई थी। लेकिन रीयल एस्टेट के जानकार बताते हैं कि शिंदे के दिल्ली वाले फ्लैट की कीमत 2009 में 2 करोड़ और मुंबई वाले फ्लैट की कीमत 2.5 करोड़ रुपए थी।

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उच्च न्यायालय ने पूछा-सरकारी विज्ञापनों में सोनिया गाँधी के फोटो कैसे?

मध्य प्रदेश के जबलपुर उच्च न्यायालय ने सरकारी विज्ञापनों में कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी की तस्वीरें प्रकाशित व प्रसारित करने के खिलाफ दायर की गई याचिका पर को भारत के अतिरिक्त महाधिवक्ता को सरकार की सलाह पर जवाब पेश करने को कहा है। मामले की अगली सुनवाई 25 जनवरी को होगी।

याचिकाकर्ता जबलपुर निवासी अरूण शुक्ला की याचिका में कहा गया है कि केंद्र की यूपीए सरकार की नौ वर्ष की उपलब्धियों को लेकर विज्ञापन प्रकाशित किए गए हैं। इन विज्ञापनों में सोनिया गांधी की भी तस्वीर है। सोनिया केंद्र सरकार में मंत्री नहीं है, उसके बावजूद यूपीए सरकार के विज्ञापनों में उनकी तस्वीर प्रकाशित कर लोकधन का दुरूपयोग किया जा रहा है।

वहीं अतिरिक्त महाधिवक्ता राशिद सुहैल सिद्दिकी ने कोर्ट को बताया कि सोनिया गांधी यूपीए सरकार की कॉमन मिनिमम प्रोग्राम की राष्ट्रीय सलाहकार हैं और उन्हें केबिनेट मंत्री का दर्जा प्राप्त है। इसी आधार पर विज्ञापनों में उनकी तस्वीरों का प्रकाशन किया गया है। सिद्दिकी हालांकि, अपने पक्ष में जरूरी दस्तावेज पेश नहीं कर पाए। हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस अजय मानिकराव खानविलकर और के.के. लाहौटी की बेंच ने सोमवार को सिद्दिकी को 15 जनवरी तक केंद्र सरकार से निर्देश प्राप्त कर जवाब पेश करने को कहा है।

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क्यों मारा जा रहा है रेलवे के तत्काल कोटे में सीनियर सिटिज़न का हक़?

आज पूरे देश में केंद्र व राज्य की सरकारें वरिष्‍ठ नागरिकों को ज्यादा से ज्यादा सुविधाएं मुहैया करवाने की कोशिश कर रही हैं। रेलवे भी वरिष्‍ठ नागरिकों को अपने यहाँ यात्रा करने पर पुरुषों को ४0 प्रतिशत व महिलाओं को ५0 प्रतिशत की छूट देती है। पर यह छूट तत्काल टिकट पर न जाने क्यों नहीं लागू होती। हर गाड़ी में लगभग ३0 प्रतिशत टिकट तत्काल के लिए आरक्षित होती है। इन ३0 प्रतिशत टिकटों पर वरिष्‍ठ नागरिकों का हक़ नहीं होता। न जाने क्या सोच कर रेलवे वरिष्‍ठ नागरिकों को इस सुविधा से वंचित रख रही है, जबकि दुनियादारी, दुःख-सुख में वरिष्‍ठ नागरिक को ही सबसे ज्‍यादा आना-जाना पड़ता है। आशा है सरकार जल्द इस सुविधा के लिए अपने कानून में बदलाव लाएगी। यह छूट न केवल किराये-भाड़े पर अपितु  तत्काल के लिए लगाने वाले सरचार्ज पर भी लागू होना चाहिए।

अधिकतर देखा जाता है कि सीनियर सिटिज़न चाहे रूटीन में टिकट अरक्षित करवाए अथवा तत्काल में उसे अपर बर्थ ही अलाट होता है। इसका कारण रेलवे बताती है कि नीचे की टिकट पहले आया पहले पाया के आधार पर अलाट कर दी जाती है। रेल यात्रा के दौरान पाया जाता है कि नीचे के बर्थ पर नौजवान यात्री यात्रा कर रहे होते हैं, जबकि वे ऊपर के बर्थ पर आसानी से यात्रा कर सकते हैं। वे अनुरोध करने पर बाद में सीनियर सिटिज़न से बर्थ बदलना भी नहीं चाहते। ऐसे मौकों पर मौजूदा टीसी भी हेल्पलेस हो जाता है। सीनियर सिटिज़न द्वारा ऊपर के बर्थ पर चढ़ने-उतरने में साँस फूल जाती है व कभी भी कोई बड़ी दुर्घटना घट सकती है तथा उसकी जवाबदारी रेलवे पर आ सकती है। इसलिए रेलवे को नीचे की सभी स्लीपर सीनियर सिटिज़न के लिए आरक्षित रखनी चाहिए। इसके लिए रेलवे को अपने कम्प्यूटर सर्वर में हल्का सा फेर बदल करना पड़ेगा। सीनियर सिटिज़न द्वारा कम्प्यूटर में तत्काल टिकट बुक करते समय हड़बड़ी में कुछ गलती भी हो जाती है। जैसे गाड़ी या दिन की। जब वो भूल सुधर करना चाहता है उसका पैसा कटता है। हमारी मांग है कि सीनियर सिटिज़न का तत्काल टिकट यदि एक घंटे में कैंसल करावा दे तो उसे कोई चार्ज नहीं लगना चाहिए व पूरा पैसा वापस मिलना चाहिए।

 
ASHOK BHATIA
HON.SECRETARY
VASAI ROAD YATRI SANGH
A / 001 , VENTURE APARTMENT ,NEAR REGAL, SEC 6, LINK ROAD ,
VASANT NAGARI ,VASAI EAST -401208
DIST -THANE [MUMBAI] MOB. 09221232130

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संगीतकार श्रवण कुमार के खिलाफ चैक बाउंस मामले में फैसला 6 दिसंबर को

संगीतकार श्रवण कुमार के खिलाफ 15 लाख रूपए के चेक बाउंस का मामला जिला कोर्ट में चल रहा है। इस मामले का फैसला 6 दिसंबर को होगा। एडवोकेट प्रभात जैन के मुताबिक कोर्ट में समय पर पेशी पर नहीं आने से कोर्ट ने उन पर जुर्माना लगाया था।

उन्होंने जुर्माने पर आपत्ति लेते हुए आवेदन दिया था कि उनकी उपस्थिति में कोर्ट ने जुर्माना नहीं लगाया है इसलिए इस जुर्माना रद्द किया जाएं। कोर्ट ने आवेदन खारिज करते हुए कहा कि 6  दिसंबर को केस का फैसला सुनाया जाएगा।

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आफताब आलम को “बिरसा मुंडा पुरस्कार-2013”

लिम्का बुक ऑफ रिकॉर्ड में दर्ज भारत की प्रथम मीडिया डायरेक्टरी "पत्रकारिता कोश" के संपादक आफताब आलम को झारखंडी एकता संघ द्वारा "बिरसा मुंडा पुरस्कार-2013" प्रदान किया गया है। मुंबई के विलेपार्ले स्थित नवीन भाई ठक्कर हॉल में 24 नवंबर, 2013 को झारखंड स्थापना दिवस के अवसर पर आयोजित वार्षिक समारोह में आफताब आलम को यह पुरस्कार विधायक अबू आसिम आजमी के हाथों प्रदान किया गया।

इस अवसर पर एन.के.टी. ट्रस्ट के संस्थापक नानजी भाई ठक्कर, वरिष्ठ पत्रकार/स्तंभकार फिरोज अशरफ, समाजसेवक व आंदोलनकर्ता शंकर केजरीवाल, लॉफ्टर चैलेंजर व हास्य व्यंग्य कलाकार सुनील पाल, रेडियो जॉकी प्रेम, सहित अनेक क्षेत्र के गणमान्य लोग मौजूद थे। संघ के अध्यक्ष असलम अंसारी सहित मीडिया व साहित्य जगत के अनेक लोगों ने आफताब आलम को इस पुरस्कार के लिए शुभकामनाएं दी हैं।

गौरतलब है कि आफताब आलम भागलपुर(बिहार) के निवासी हैं और उन्होंने झारखंड के पृथक राज्य बनने से पहले देशभर के मीडिया कर्मियों व साहित्यकारों को एकसूत्र में पिरोने के लिए पत्रकारिता कोश का प्रकाशन प्रारंभ किया था।

संपर्क

AFTAB ALAM
Editor – Patrakarita Kosh
(India's Ist Media Directory)
Limca Book Record Holder

Mumbai, Maharashtra
Mob. 09224169416

Email: aaftaby2k@gmail.com

Email: aftaby2k@hotmail.com

Website : www.hindustanimedia.com

Blog :
www.aftabalamhindustani.blogspot.com
www.mumbaisamachartimes.blogspot.com

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तहलका के पत्रकारों ने तहलका से पल्ला छुड़ाया

तरुण तेजपाल पर यौन शोषण और बलात्कार के आरोप सामने आने के बाद रेवती लाल ने तहलका से इस्तीफा दिया है।  अब खबर आई है कि तहलका के फोटो एडिटर ईशान तन्खा और फीचर एडिटर शौगत ने भी इस्तीफा दे दिया है। उल्लेखनीय है कि  गोवा पुलिस ईशान और शौगत से पूछताछ भी कर चुकी है।  पीड़िता ने ईशान व शौगत को पूरी घटना की जानकारी घटना वाले दिन ही दे दी थी। इस मामले में ईशान, शौगत समेत तहलका के तीन लोग गवाह हैं।

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मोदी के मुरीद दिग्विजय सिंह

नरेंद्र मोदी के कटु आलोचक माने जाने वाले कांग्रेस के वरिष्ठ नेता दिग्विजय सिंह ने बृहस्पतिवार को एक अप्रत्याशित बयान देकर सबको चौका दिया है। उन्होंने कहा कि गुजरात के मुख्यमंत्री कट्टरपंथी विचारधारा को छोड़कर सांप्रदायिक सौहा‌र्द्र और भाइचारे की बात कर रहे हैं, यह अच्छा संकेत है..लोकतंत्र की यही खासियत है कि देश में एक चायवाला भी प्रधानमंत्री बन सकता है। दिग्विजय की इस टिप्पणी का भाजपा ने स्वागत किया है।

इंडिया टूडे ग्रुप के दो दिवसीय सम्मेलन एजेंडा आज तक 2013 में कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह ने इस बात का स्वागत करते हुए कहा कि मोदी धीरे-धीरे कट्टरपंथी विचारधारा से दूरी बनाकर अटल बिहारी वाजपेयी की विचारधारा की ओर बढ़ रहे हैं। उन्होंने कहा कि आरएसएस और संघ यदि कांग्रेस और नेहरू की विचारधारा के करीब आ रहे हैं तो इसका स्वागत किया जाना चाहिए। हालांकि उन्होंने यह जोड़ा कि मोदी भारत के लोगों को स्वीकार्य नहीं होंगे और भगवान न करें अगर भाजपा सत्ता में आती है तो उनकी पसंद सुषमा स्वराज होंगी।

कांग्रेस की इस बात को लेकर आलोचना पर कि इसकी बागडोर एक परिवार और कुछ लोगों के हाथ में है, जबकि भाजपा में एक सामान्य कार्यकर्ता भी पार्टी में शीर्ष स्थान पर बैठ सकता है, दिग्विजय ने कहा कि यह सच नहीं है। उन्होंने कहा कि लोकतंत्र में केरल से आने वाला चरवाहा राष्ट्रपति बन सकता है, तो एक चायवाला भी प्रधानमंत्री बन सकता है। मालूम हो कि सपा नेता नरेश अग्रवाल ने कुछ दिनों पहले कहा था कि एक चाय बेचने वाला देश का प्रधानमंत्री नहीं बन सकता है।

कार्यक्रम में शिरकत कर रही भाजपा नेत्री स्मृति ईरानी ने हमने नहीं सोचा था कि दिग्विजय सिंह भी ऐसा कहेंगे कि एक चायवाला भी देश का प्रधानमंत्री बन सकता है..मैं खुश हूं कि मोदी जी की प्रशंसा दिग्विजय सिंह भी कर रहे हैं। इस पर कांग्रेस नेता ने कहा कि चाहे कोई अमीर या गरीब के घर में पैदा हुआ हो, लोकतंत्र में कोई भी अछूत नहीं होता। इसके साथ ही उन्होंने कहा कि कांग्रेस के लिए मोदी कोई मुद्दा नहीं हैं। देश का बुनियादी स्वभाव सांप्रदायिक सद्भाव के पक्ष में है इसलिए लोग वाजपेयी और स्वराज तो स्वीकार कर सकते हैं, मोदी को नहीं। कांग्रेस महासचिव ने पांच राज्यों में हुए विधानसभा चुनाव को लेकर एजिग्ट पोल को खारिज करते हुए इसे अगले लोकसभा चुनाव का सेमीफाइनल मानने से भी इन्कार कर दिया।

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