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होलिका दहन का अध्यात्मिक, प्राकृतिक, धार्मिक व सामाजिक निहितार्थ है

होलिका-प्रह्लाद की कथा का सर्वाधिक प्राचीन, सर्वाधिक भौतिक और सर्वाधिक उपेक्षित आयाम उसका कृषि-आयाम है। और इस आयाम की कुंजी स्वयं नामों में छिपी है।
संस्कृत में होलिका शब्द होला से आता है, जिसका अर्थ है अर्ध-पकी हुई फसल, विशेषकर गेहूँ की हरी बाली (green ear of grain) । कुछ शब्दकोशों में होलाका का अर्थ है वह फसल जो आग में भूनी जाए। प्रह्लाद शब्द का एक अर्थ है प्र + ह्लाद — वह जो आनंद से परिपूर्ण हो — किंतु कृषि-संदर्भ में यह उस जीवित बीज या दाने (kernel) का प्रतीक है जो बाली के भीतर संरक्षित रहता है, जो कि अग्नि में बाहरी छिलका जल जाने के बाद भी जीवित रहता है और अंकुरित होने की क्षमता धारण करता है।
यह कोई आकस्मिक भाषाई संयोग नहीं है। यह उस प्राचीन काल की स्मृति है जब कथा और कृषि-विज्ञान एक ही भाषा बोलते थे, जब किसान और ऋषि एक ही व्यक्ति थे।
होली फाल्गुन मास की पूर्णिमा को मनाई जाती है — फरवरी के अंत से मार्च के प्रारंभ के बीच। भारतीय उपमहाद्वीप में गेहूँ, जौ और चने की रबी फसल के पकने का ठीक यही समय है। इस ऋतु में खेतों में गेहूँ की बालियाँ सुनहरी होने लगती हैं, फसल कटाई के कगार पर होती है, और कृषक समाज में एक विशेष उत्साह और उल्लास का वातावरण होता है।
होलिका दहन की परंपरा में आज भी — विशेषकर उत्तर भारत, राजस्थान, मध्यप्रदेश और गुजरात के ग्रामीण क्षेत्रों में — नई फसल की हरी बालियाँ अग्नि में डाली जाती हैं। इसे होला या होलका कहते हैं। किसान अपने खेत से ताज़ी गेहूँ और जौ की बालियाँ तोड़कर लाता है, उन्हें होलिका की अग्नि में भूनता है, और फिर उन भुनी हुई बालियों का प्रसाद ग्रहण करता है। यह नई फसल का प्रथम भोग है — उसे देवता को अर्पित करने की परंपरा।
यह परंपरा इस विश्वास पर आधारित है कि जब तक फसल को अग्नि में अर्पित न किया जाए, तब तक उसे खाना शुभ नहीं। यह वैदिक अग्निहोत्र की परंपरा का ग्रामीण विस्तार था — अग्नि देवता को नई उपज का पहला भाग अर्पित करना।
कृषि-रूपक में होलिका वह सूखी, पकी हुई बाली है जो फसल के पकने के साथ अपना उद्देश्य पूरा कर चुकी है। बाली (straw, husk, chaff) का काम था — दाने को आकाश से प्रकाश दिलाना, वर्षा का जल संग्रह करना, हवा से सुरक्षा देना, और दाने को परिपक्व करना। किंतु जब दाना पक जाता है, तो बाली की आवश्यकता समाप्त हो जाती है। वह सूख जाती है, उसका हरापन चला जाता है, और वह अग्नि के लिए उचित बन जाती है।
होलिका का अग्निरोधक वस्त्र — वह वरदान जो उसे आग से बचाता था — प्रकृति की उस नियामक शक्ति का प्रतीक है जिसने बाली को तब तक सुरक्षित रखा जब तक दाने को उसकी आवश्यकता थी। किंतु जब दाना पूर्ण हो गया — जब प्रह्लाद (बीज) की परिपक्वता आ गई — तो वह सुरक्षा अपने-आप हट गई। प्रकृति का यह नियम है: आवरण तब तक जब तक सत्त्व को उसकी आवश्यकता हो, और तत्पश्चात उसका स्वयं विलय।
यह कृषि-सत्य अत्यंत सूक्ष्म है। किसान जानता है कि जब फसल पक जाए, तो उसे काटना होगा। जो काटता नहीं, जो पकी बाली को खेत में ही रहने देता है, वह अंततः फसल खो देता है — बाली सड़ जाती है, दाना गिर जाता है। होलिका का जलना उस पके आवरण का समय पर विसर्जन है जो जीवन-चक्र के लिए अनिवार्य है।
प्रह्लाद वह गेहूँ का दाना है जो बाली के भीतर छिपा होता है। अग्नि उसका क्या कर सकती है? यदि आप गेहूँ की बाली को हल्की आँच में भूनें — जैसा होलिका दहन की परंपरा में होता है — तो बाहरी तना और पत्तियाँ जल जाती हैं, किंतु भीतर का दाना न केवल सुरक्षित रहता है बल्कि पकता है, सुगंधित होता है, और खाने योग्य बन जाता है। अग्नि यहाँ विनाशक नहीं है — वह परिष्कारक (refiner) है।
यह भौतिक वास्तविकता पौराणिक रूपक बन गई। जो प्रह्लाद (दाना) है, वह अग्नि में नष्ट नहीं होता, वरन् परिपक्व होता है। अग्नि उसकी परीक्षा है, उसका विनाश नहीं। प्रत्येक वर्ष किसान इस सत्य को होलिका दहन में पुनः अनुभव करता है जब वह भुनी हुई बाली का स्वाद लेता है और पाता है कि दाना मीठा, सुगंधित और जीवनदायी है।
इससे एक गहरा कृषि-दर्शन उभरता है: जो वास्तविक है — जो जीवन का सार है — वह अग्नि में नहीं जलता। जो जलता है वह केवल आवरण है, छाल है, वह अनावश्यक परत है जो सत्त्व को ढके हुए थी।
आज भी उत्तर भारत के गाँवों में होलिका दहन की रात एक विशेष दृश्य होता है। किसान परिवार अपने खेत की नई गेहूँ और जौ की बालियाँ लेकर होलिका की अग्नि के पास आते हैं। वे उन बालियों को अग्नि के इर्द-गिर्द घुमाते हैं — परिक्रमा करते हैं — और फिर उन्हें आँच के पास रखकर भूनते हैं। भुनी हुई बालियों को होला कहते हैं।
इस अनुष्ठान का गहरा अर्थ है। किसान कह रहा है: “हे अग्निदेव, यह नई फसल पहले तुम्हारी है। तुम्हें अर्पित करने के बाद ही हम इसे ग्रहण करेंगे।” यह कृतज्ञता का भाव है — प्रकृति को उसकी देन लौटाने का प्रतीकात्मक कार्य।
इस परंपरा को नवान्न (नया अन्न) की परंपरा से जोड़कर देखें। भारत के अनेक प्रदेशों में नई फसल का पहला अन्न सीधे नहीं खाया जाता — पहले उसे अग्नि, देवता या पितरों को अर्पित किया जाता है। यह कृषि-अग्नि उत्सव की परंपरा केवल भारत तक सीमित नहीं है। विश्व के लगभग हर कृषि-समाज में ऐसे उत्सव रहे हैं जिनमें नई फसल के अवसर पर अग्नि जलाई जाती है, पुराना नष्ट किया जाता है, और नए का स्वागत किया जाता है।
यूरोप का बेल्टेन (Beltane) स्कॉटलैंड और आयरलैंड में बेल्टेन उत्सव ठीक उसी समय होता था जब होली — वसंत के आगमन पर, मई-दिन के आसपास। उसमें भी विशाल अलाव जलाए जाते थे, पशुओं को उनके बीच से निकाला जाता था, और नई फसल की बालियाँ अग्नि में डाली जाती थीं। बेल का अर्थ है उज्ज्वल अग्नि या सूर्य; यह उत्सव सूर्य की पुनर्विजय और कृषि-वर्ष की नई शुरुआत का प्रतीक था।
रूस और पूर्वी यूरोप में मास्लेनित्सा वसंत से पहले का उत्सव है जिसमें शीत ऋतु की पुतली जलाई जाती है — यह होलिका के समान ही है। पुरानी फसल के अवशेष जलाए जाते हैं और नई फसल का स्वागत किया जाता है।
ईरान का नौरोज़ (Nowruz) फारसी नव वर्ष है जो वसंत विषुव पर होता है, उसमें चहारशंबे सूरी की परंपरा है — अलाव जलाकर उनके ऊपर से छलाँग लगाना। यह भी शीत और पुराने वर्ष के विसर्जन और नई ऊर्जा के स्वागत का प्रतीक है।
मेसोपोटामिया और मिस्र प्राचीन सुमेरियन और मिस्री सभ्यताओं में वसंत में फसल की पहली कटाई से पहले अग्नि-अनुष्ठान किए जाते थे। तम्मूज़ देवता का उत्सव — जो
मरता है और पुनर्जीवित होता है — गेहूँ के दाने के जीवन-मृत्यु-पुनर्जीवन के चक्र का प्रतीक था।
यहूदी परंपरा का बिकूरीम (Bikkurim) भी यही है। तोरा में बिकूरीम की आज्ञा है — पहली फसल का पहला फल मंदिर में अर्पित करना। यह होला की परंपरा का हिब्रू समकक्ष है।
इन सभी परंपराओं में एक सार्वभौमिक कृषि-दर्शन है: पुराने को अग्नि में देना ताकि नया जन्म ले सके।
गेहूँ का दाना — जो ज़मीन में गाड़ा जाता है, “मरता” है, और तब अंकुरित होकर नई फसल बनता है — मृत्यु और पुनर्जन्म का सर्वाधिक प्राचीन और सार्वभौमिक प्रतीक रहा है।
न्यू टेस्टामेंट में स्वयं यीशु ने यह रूपक प्रयोग किया: “जब तक गेहूँ का दाना भूमि में गिरकर मरे नहीं, वह अकेला रहता है; परन्तु यदि मरे, तो बहुत फल लाता है।” And Jesus answered them, saying, The hour is come, that the Son of man should be glorified. Verily, verily, I say unto you, except a corn of wheat fall into the ground and die, it abideth alone: but if it die, it bringeth forth much fruit. He that loveth his life shall lose it; and he that hateth his life in this world shall keep it unto life eternal. यह वाक्य प्रह्लाद के कृषि-रूपक का लगभग शाब्दिक अनुवाद है। प्रह्लाद वह दाना है जो अग्नि (जो मृत्यु के समान है) में जाता है और जीवित निकलता है — और उसके जीवित निकलने से ही नई फसल का, नए युग का जन्म होता है।
एलेउसिनियन रहस्य (Eleusinian Mysteries) याद करना चाहिए। प्राचीन यूनान की इस सर्वाधिक पवित्र धार्मिक परंपरा का केंद्र भी यही था: डेमेटर (Demeter, अन्न-देवी) और उनकी पुत्री पर्सेफोन का मिथक, जो भूमि के नीचे (मृत्यु-लोक में) जाती है और वापस आती है। उनकी वापसी वसंत है, उनका प्रस्थान शीत है। रहस्य-दीक्षा में शिष्यों को गेहूँ की एक बाली दिखाई जाती थी — और यही उनकी परम दीक्षा थी। मृत्यु में से जीवन का उगना।
प्रह्लाद का वह दाना इसी ब्रह्मांडीय सत्य का हिंदू रूप है।
भारत की प्राचीन दृष्टि में कृषि-चक्र और ब्रह्मांडीय चक्र में कोई भेद नहीं था। जो ब्रह्मांड में होता है वही खेत में होता है; जो खेत में होता है वही मनुष्य की आत्मा में होता है। यही यथा पिंडे तथा ब्रह्मांडे का सिद्धांत है।
गेहूँ का बीज ज़मीन में जाता है → शीत में सोता है → वसंत में अंकुरित होता है → ग्रीष्म में पकता है → काटा जाता है → अग्नि में भूना जाता है → खाया जाता है → पुनः बीज बनता है। यह चक्र अनंत है। होली इस चक्र का उत्सव-बिंदु है — वह क्षण जब बीज ने अपनी यात्रा पूरी की, पकी बाली बनी, और अग्नि में अर्पित होकर अगले चक्र को आमंत्रित किया।
इसी ब्रह्मांडीय चक्र को रूपककथा में रखा गया: हिरण्यकशिपु (पुराना, शुष्क, विनाशकारी शीत का शासन), होलिका (वह बाली जो पक गई और जिसे जाना ही है), प्रह्लाद (वह जीवंत दाना जो अगले चक्र का वाहक है), और विष्णु (वह ब्रह्मांडीय व्यवस्था जो यह सुनिश्चित करती है कि जीवन का चक्र न रुके)।
होलिका दहन का अनुष्ठान, जब हम उसे कृषि-दृष्टि से देखते हैं, तो एक परिपूर्ण कृषि-विज्ञान के रूप में उभरता है: अग्नि से भूमि की शुद्धि होती है। होलिका दहन के पश्चात उस स्थान की राख (होली की राख) को शुभ माना जाता है। किसान उसे अपने खेत में मिलाते हैं। राख एक प्राकृतिक खाद है — पोटाश और अन्य खनिजों से
भरपूर। यह अनुष्ठान भूमि को उर्वर बनाने का प्राचीन वैज्ञानिक तरीका था। मूल होली के रंग प्राकृतिक थे — टेसू (पलाश) के फूलों का केसरिया, हल्दी का पीला, नील का
नीला। ये सभी वसंत में खिलने वाले पौधों से थे। रंग खेलना वास्तव में उस ऋतु के रंगों का उत्सव था — प्रकृति के स्वयं के रंगों से खेलना।होली के भोजन—गुजिया, ठंडाई, चना — होली के पारंपरिक व्यंजन हैं जो नई फसल के उत्पादों से बने हैं। गेहूँ का मैदा, गुड़ (गन्ने की नई फसल), छोले (नई चने की फसल) — यह नई फसल का प्रथम भोज है।
यों कृषि-रूपक और आत्मिक रूपक एक ही सत्य की ओर संकेत करते हैं।
कृषि में: बाली जलती है → दाना बचता है → नई फसल उगती है।वेदांत में: अहंकार (होलिका) जलता है → आत्मा (प्रह्लाद) बचती है → मुक्ति होती है। राजनीति में: अत्याचार जलता है → चेतना बचती है → नया युग आता है।
यह समानांतर संरचना आकस्मिक नहीं है। भारत के प्राचीन ऋषियों ने खेत में वही पढ़ा जो उन्होंने आत्मा में पढ़ा था। किसान जब अपनी फसल की बाली को आग में डालता था, तो वह अनजाने में उसी ब्रह्मांडीय सत्य को दोहरा रहा था जिसे योगी अपनी समाधि में अनुभव करता था।
यही भारतीय मिथक की महानता है: वह खेत को मंदिर बना देता है और मंदिर को खेत। वह किसान को योगी बना देता है और योगी को किसान। जब एक निरक्षर किसान होलिका दहन में अपनी गेहूँ की बाली जलाता है और भुने हुए दाने को प्रसाद के रूप में ग्रहण करता है — वह उतनी ही गहरी सच्चाई को जी रहा होता है जितनी शंकराचार्य अपने ब्रह्मसूत्र भाष्य में कह रहे थे।
इस कथा का सर्वाधिक दार्शनिक और तात्कालिक पाठ वेदांत की दृष्टि से है। अद्वैत वेदांत परंपरा में अस्तित्व की मूलभूत समस्या यह है कि आत्मा — जो ब्रह्म से अभिन्न है, सत्ता का सार्वभौमिक आधार — की अहंकार के साथ भ्रांत पहचान हो जाती है। यह निर्मित, सीमाबद्ध “मैं” की भावना है जो पृथकता, सत्ता और स्थायित्व का दावा करती है।
हिरण्यकशिपु का नाम ही शिक्षाप्रद है। “हिरण्य” का अर्थ है स्वर्ण; “कशिपु” का अर्थ है कोमल बिछौने या विलासी वस्त्र। वह, शाब्दिक अर्थ में, वह है जो सोने और रेशम पर विश्राम करता है — वह चेतना जो भौतिक पहचान में इस कदर विलीन हो गई है कि उसने अपने दिव्य मूल को भूल दिया है। वह अहंकार का सर्वाधिक फूला हुआ रूप है: एक वरदान प्राप्त करके जो उसे स्थायी बनाता है, उसने स्वयं को अमर, आत्मनिर्भर और वास्तविकता का सर्वोच्च सिद्धांत मान लिया है।
उसकी यह घोषणा कि वह, न कि विष्णु, सब कुछ का स्वामी है — अहंकार-चेतना का उद् घोष है। सीमित अनंत होने का दावा करता है, सशर्त नि:शर्त होने का दावा करता है। यही वेदांत में अहंकार है अपने सर्वाधिक विराट रूप में।
प्रह्लाद, इसके विपरीत, उस आत्मा का प्रतिनिधित्व करता है जो अपनी वास्तविक प्रकृति को जानती है। वह प्रह्लाद है — “जो आनंद देता है” या “जो आनंद से भरा है” — क्योंकि आत्मा, जब अपनी सच्ची प्रकृति में पहचानी जाती है, आनंद-स्वरूप होती है। वह अपने पिता का बल या तर्क से विरोध नहीं करता; वह बस वही है जो वह है। उसके होठों पर विष्णु का नाम केवल एक भक्तिपूर्ण कार्य नहीं है, बल्कि एक अद्वैत दार्शनिक कथन है: चेतना सदा अपने स्रोत की ओर संकेत करती रहती है।
यातना के प्रसंग — विष, हाथी, सर्प, चट्टानें — अहंकार के द्वारा साक्षी-चेतना को नष्ट या दबाने के बढ़ते प्रयासों का प्रतिनिधित्व करते हैं। अहंकार आत्मा की उपस्थिति को सहन नहीं कर सकता क्योंकि आत्मा का अस्तित्व ही अहंकार की सर्वोच्चता के दावे को झुठला देता है। और फिर भी, चूँकि प्रह्लाद आत्मा है, कुछ भी उसे अंततः हानि नहीं पहुँचा सकता। वेदांत की भाषा में, आत्मा नित्य (शाश्वत), चेतन (सचेतन) और निर्विकार (अपरिवर्तनशील) है। वह भौतिक जगत के विकारों से स्पर्शित नहीं हो सकती।
होलिका का अग्निरोधक वस्त्र गुप्त ज्ञान या तकनीक की शक्ति का प्रतीक है — यह विचार कि कोई अनुष्ठान, वरदान, या चतुर रणनीति द्वारा चेतना को स्थायी रूप से पराजित किया जा सकता है। किंतु जिस क्षण वह शक्ति शुद्ध भक्ति के विरुद्ध — अनंत की ओर उन्मुख आत्मा के विरुद्ध — लगाई जाती है, वह पलट जाती है। अग्नि, जो विश्व-शोधक है, अशुद्ध को (अहंकार-अस्त्र को) जलाती है और शुद्ध को (अनंत की ओर उन्मुख चेतना को) बचाती है।
यों दर्शन और पारिस्थितिकी एक ही सत्य की ओर संकेत करते हैं: चेतना को स्थायी रूप से कभी नष्ट नहीं किया जा सकता। वसंत हमेशा आता है; आत्मा हमेशा स्वयं को पुनः स्थापित करती है।
हिरण्यकशिपु की समस्या यह नहीं है कि वह बुरा था, वो तो था ही।उसकी त्रासदी यह है कि उसने अपना पूरा अस्तित्व इस दाँव पर लगाया कि शक्ति चेतना को पराजित कर सकती है, कि संप्रभुता प्रेम से अधिक टिकाऊ हो सकती है, कि अर्जित सुरक्षा वास्तविक अस्तित्व का विकल्प हो सकती है। उसका वरदान, उसकी सेनाएँ, उसका शाही अधिकार, उसकी पितृशक्ति — कोई भी उस बालक को नहीं छू सका जिसकी चेतना अविनाशी की ओर उन्मुख थी। वह उसे नहीं मार सका जिसे वह पहुँच नहीं सका। और वह प्रह्लाद तक नहीं पहुँच सका क्योंकि प्रह्लाद वहाँ नहीं था जहाँ अस्त्र संधान किए गए थे — वह पहले से ही कहीं ऐसी जगह था जो अस्त्रों की पहुँच से परे थी, उस अवकाश में जहाँ चेतना अपनी स्वयं की प्रकृति में विश्राम करती है।
प्रह्लाद की कथा हर उस मानवीय चेतना की कथा है जिसने कभी यह खोजा कि उसकी गहनतम प्रकृति नष्ट नहीं की जा सकती — भय से नहीं, बल से नहीं, सामाजिक दबाव से नहीं, परंपरा के भार से नहीं, अपने साहस की विफलता से नहीं। प्रत्येक व्यक्ति जो अपने स्वयं के परीक्षण की अग्नि में बैठा और जिसने पाया कि उनमें कुछ ऐसा था जो नहीं टूटा — उसने प्रह्लाद की कथा का कुछ संस्करण जिया है।

 (लेखक मध्य प्रदेश के सेवा निवृत्त आईएएएस अधिकारी हैं,  वर्तमान में मध्य प्रदेश के निर्वाचन आयुक्त हैं। आप अध्यात्मिक , धार्मिक व  ऐतिहासिक विषयों पर शोध पूर्ण लेखन करते हैं) 

 

संघ द्वारा चलाए जा रहे पंच परिवर्तन कार्यक्रम से समाज परिवर्तन सम्भव है

आज राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने अपनी स्थापना के 100 वर्ष पूर्ण कर लिए हैं और यदि हम संघ की 100 वर्षों की यात्रा पर दृष्टि डालें, तो ध्यान में आता है कि संघ के स्वयसेवकों ने जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में विचार और क्रियाशीलता के स्तर पर सक्रिय योगदान दिया है। वे अनेक क्षेत्रों में परिवर्तन के वाहक भी बने हैं। प्रारम्भ का सीमित संघ कार्य, समय के साथ व्यापक होता गया है। समाज की विभिन्न आवश्यकताओं को समझते हुए स्वयंसेवक विविध आयामों में अपने सहयोगियों के साथ क्रियाशील बने हैं। परिणामतः संघ के उद्देश्य के अनुरूप, देश में हिंदुत्व का जागरण करने की दिशा में विशेष प्रगति हुई है। हिंदुत्व के जागरण से, समाज में जाति, वर्ग, भाषा इत्यादि के आधार पर होने वाले अनेक प्रकार के भेदभाव, धीरे धीरे कम होने लगे हैं। श्रीराम जन्मभूमि मुक्ति आंदोलन, अयोध्या मंदिर में श्रीरामलला की प्राण प्रतिष्ठा, कुम्भ जैसे विराट आयोजन इत्यादि अनेक ऐसे अवसर आए हैं – जहां हिंदू समाज का एक संगठित, भव्य और उच्च आदर्शों से युक्त स्वरूप सामने आया है। यह दृश्य समाज में आत्मविश्वास जगाने वाला बन रहा है। हम सब मिलकर देश के भविष्य को उज्जवल एवं सुदृढ़ बना सकते हैं और आने वाली पीढ़ियों के लिए एक सकारात्मक वातावरण निर्मित कर सकते हैं। इसलिए ये हमारी राष्ट्रीय एकात्मता को सुदृढ़ करने वाले आयोजन सिद्ध हुए हैं। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के 100 वर्ष केवल इतिहास की उपलब्धियां नहीं है, बल्कि भविष्य की दिशा का संकल्प हैं।

आज, जब हम राष्ट्रीयस्वयं संघ की 100 वर्षों की इस यात्रा को देखते हैं, तो यह भी स्पष्ट होता है कि समाज में जिस परिवर्तन के लिए संघ के स्वयंसेवक सक्रिय रहे हैं वह अब दिखाई देने लगा है। हिंदुत्व और इसकी परम्पराओं पर लोगों का विश्वास बढ़ा है। समाज के अनेक लोग इस तथ्य को स्वीकार कर रहे हैं और इसका अनुभव भी कर रहे हैं। हिंदुत्व की इस जागृति के कारण लोग अब हिंदू होने में गर्व का अनुभव कर रहे हैं। एक समय था जब सार्वजनिक जीवन में हिंदू समाज की कमियों को ही उजागर किया जाता था, जिससे अनेक लोग हिंदुत्व की अच्छाईयों को पहचान नहीं पाए, किंतु अब स्थिति बदल रही है। लोग अपने पूर्वजों के धर्म और परम्पराओं को महत्व देने लगे हैं। वे अपने बच्चों के नामकरण से लेकर विवाह पद्धति तक में हिंदू संस्कारों का समावेश कर रहे हैं। घर की परम्पराओं को आदरपूर्वक अपनाया जा रहा है।

उक्त वर्णित सम्पूर्ण प्रक्रिया का उद्देश्य है – एक सच्चरित्र, प्रामाणिक और संस्कारवान पीढ़ी का निर्माण करना। ऐसी पीढ़ी समाज का वातावरण सुधार कर घर और समाज में सुख शांति स्थापित कर सकती है। इसलिए, इन मूल्यों और संस्कारों को महत्व देने और उन्हें अपने जीवन में उतारने के प्रयास आज घर घर में होने लगा हैं। लोग अब ऐसे सभी मंचों और माध्यमों से जुड़ने के लिए प्रयत्नशील हैं जो इस दिशा में मार्गदर्शन प्रदान करते हैं। संघ को भी लोग इस दृष्टि से एक महत्वपूर्ण माध्यम मानने लगे हैं और विश्वासपूर्वक संघ से जुड़ने का उत्साह दिखा रहे हैं। जैसे जैसे हिंदुत्व पर विश्वास बढ़ रहा है, वैसे वैसे भारत के प्रति श्रद्धा और विश्वास, व्यापक और गहरा हो रहा है।

संघ का मानना है कि “वसुधैव कुटुंबकम्” के आदर्श पर चलकर भारत न केवल अपने समाज को सशक्त करेगा, बल्कि पूरी दुनिया को शांति, सद्भाव और सहयोग का संदेश देकर विश्वगुरु की भूमिका निभाएगा। यह सब भारतीय समाज में परिवर्तन लाकर ही फलिभूत हो सकता है। संघ द्वारा अपनी स्थापना के समय लिए गए संकल्पों को शीघ्र ही पूर्ण करने के उद्देश्य से अपने इस शताब्दी वर्ष में कुछ विशेष कार्यक्रमों के माध्यम से भारतीय समाज को (1) अपने नागरिक कर्तव्यों के प्रति सजग करने, (2) पर्यावरण के प्रति सचेत करने, (3) नागरिकों में स्व के भाव को जगाने एवं स्वदेशी उत्पादों के उपयोग को बढ़ावा देने, (4) कुटुम्ब प्रबोधन के माध्यम से पारिवारिक भावना जागृत करने एवं (5) समाज में समरसता के भाव को सुदृद्ध करने के लिए गम्भीर प्रयास किए जा रहे हैं। इस कार्यक्रम को “पंच परिवर्तन” का नाम दिया गया है और इसका आह्वान परम पूजनीय सर संघचालक श्री मोहन जी भागवत द्वारा किया गया है ताकि अनुशासन एवं देशभक्ति से ओतप्रोत युवा वर्ग अनुशासित होकर अपने देश को आगे बढ़ाने की दिशा में कार्य करे। इस पंच परिवर्तन कार्यक्रम को सुचारू रूप से लागू कर समाज में बड़ा परिवर्तन लाया जा सकता है।

व्यवहार में पंच परिवर्तन को समाज में किस प्रकार लागू करना है इस हेतु हम समस्त भारतीय नागरिकों को मिलकर प्रयास करने होंगे, क्योंकि पंच परिवर्तन केवल चिंतन, मनन अथवा बहस का विषय नहीं है बल्कि इस हमें अपने व्यवहार में उतारने की आवश्यकता है। उक्त पांचों आचरणात्मक बातों का समाज में होना सभी चाहते हैं, अतः छोटी-छोटी बातों से प्रारंभ कर उनके अभ्यास के द्वारा इस आचरण को अपने स्वभाव में लाने का सतत प्रयास अवश्य करना होगा। जैसे, समाज के आचरण में, उच्चारण में संपूर्ण समाज और देश के प्रति अपनत्व की भावना प्रकट हो, प्रत्येक घर में सप्ताह में कम से कम एक बार पूजा या धार्मिक आयोजन हो एवं अपने परिवार के बच्चों के साथ बैठकर महापुरुषों के सम्बंध में सप्ताह में कम से कम एक घंटे चर्चा हो, परिवार के सभी सदस्यों में नित्य मंगल संवाद, संस्कारित व्यवहार व संवेदनशीलता बनी रहे, बढ़ती रहे व उनके द्वारा समाज की सेवा होती रहे, आदि बातों का ध्यान रखकर कुटुंब प्रबोधन जैसे विषय को आगे बढ़ाया जा सकता है।

मंदिर, पानी, श्मशान के सम्बंध में कहीं भेदभाव बाकी है, तो वह शीघ्र ही समाप्त होना चाहिए। हम लोग अपने परिवार सहित त्यौहारों के समय अनुसूचित जाति के बंधुओं के घर जाएं और उनके साथ चाय पान करें। साथ ही, हम अनुसूचित जाति के बंधुओं को सपरिवार अपने परिवार में बुलाकर सम्मान प्रदान करें। कुल मिलाकर समस्त समाज एक दूसरे के त्यौहारों में शामिल हों ताकि आपस में भाई चारा बढ़े एवं देश में सामाजिक  समरसता स्थापित हो सके।

सृष्टि के साथ संबंधों का आचरण अपने घर से पानी बचाकर, प्लास्टिक हटाकर व घर आंगन में तथा आसपास हरियाली बढ़ाकर हो सकता है। अपने घरों में जल का कोई अपव्यय नहीं हो रहा है एवं अपने परिवार में हरियाली की चिंता की जा रही है। अपने घर में, रिश्तेदारी में, मित्रों के यहां सिंगल यूज प्लास्टिक का उपयोग न करने का आग्रह किया जा रहा है आदि बातों पर ध्यान देकर देश में पर्यावरण को सुधारा जा सकता है।

स्वदेशी के आचरण से स्व-निर्भरता व स्वावलंबन बढ़ता है। फिजूलखर्ची बंद होनी चाहिए, देश का रोजगार बढ़े व देश का पैसा देश में ही काम आए, इस बात का ध्यान देश के समस्त नागरिकों को रखना चाहिए। इसीलिए कहा जा रहा है कि स्वदेशी का आचरण भी घर से ही प्रारंभ होना चाहिए। समस्त नागरिकों के घर में स्वदेशी उत्पाद ही उपयोग होने चाहिए।

देश में कानून व्यवस्था व नागरिकता के नियमों का भरपूर पालन होना चाहिए तथा समाज में परस्पर सद्भाव और सहयोग की प्रवृत्ति सर्वत्र व्याप्त होनी चाहिए। इन्हें हमारे नागरिक कर्तव्यों के रूप में देखा जाना चाहिए। समाज में व्याप्त कुरीतियों के उन्मूलन हेतु हम सबको मिलकर प्रयास करने होंगे। विशेष रूप से युवाओं में नशाबंदी समाप्त करने के लिए, मृत्यु भोज रोकने के लिए तथा विभिन्न समाजों में व्याप्त दहेज की कुप्रथा समाप्त करने के गम्भीर प्रयास हम समस्त नागरिकों को मिलकर ही करने होंगे।

समाज की एकता, सजगता व सभी दिशा में निस्वार्थ उद्यम, जनहितकारी शासन व जनोन्मुख प्रशासन स्व के अधिष्ठान पर खड़े होकर परस्पर सहयोगपूर्वक प्रयासरत रहते है, तभी राष्ट्रबल वैभव सम्पन्न बनता है। बल और वैभव से सम्पन्न राष्ट्र के पास जब हमारी सनातन संस्कृति जैसी सबको अपना कुटुंब माननेवाली, तमस से प्रकाश की ओर ले जानेवाली, असत् से सत् की ओर बढ़ानेवाली तथा मृत्यु जीवन से सार्थकता के अमृत जीवन की ओर ले जानेवाली संस्कृति होती है, तब वह राष्ट्र, विश्व का खोया हुआ संतुलन वापस लाते हुए विश्व को सुखशांतिमय नवजीवन का वरदान प्रदान करता है।

संघ की दृष्टि बहुत स्पष्ट है कि सम्पूर्ण भारत की पहचान जिससे है, उस आध्यात्म आधारित एकात्म और सर्वांगीण जीवन दृष्टि को दुनिया हिंदुत्व अथवा हिंदू जीवन दृष्टि के नाते जानती है, उस हिंदुत्व को जगाकर सम्पूर्ण समाज को एक सूत्र में जोड़कर निर्दोष और गुणवान हिंदू समाज के संगठन का यह कार्य जो वर्ष 1925 में प्रारम्भ हुआ वह आज भी निरन्तर जारी है और आगे भी जारी रहेगा।

प्रहलाद सबनानी

प्रहलाद सबनानी

सेवानिवृत्त उपमहाप्रबंधक,

भारतीय स्टेट बैंक

के-8, चेतकपुरी कालोनी,

झांसी रोड, लश्कर,

ग्वालियर – 474 009

मोबाइल क्रमांक – 9987949940

ई-मेल – prahlad.sabnani@gmail.com

सरकार टैक्स देने वालों को जलील करती है और मुफ्तखोरों का सम्मान करती है

दुनिया में शायद ही कोई सरकार होगी जो हर रोज अपने ही नागरिकों, सैनिकों और बुजुर्गों को इस तरह ज़लील करती होगी ……
जब भी आप यात्रा करने के लिए रेलवे का कोई टिकट खरीदते हैं तो टिकट पर लिखा हुआ आता है – IR recovers only 57% of cost of travel on an average.
इसका मतलब शुद्ध रूप से यह होता है कि (सालो, हरामखोरो), भारतीय रेल इस यात्रा के खर्चे की लागत का केवल 57 प्रतिशत ही वसूल कर पाता है।
सवाल यह है कि फिर यह बचा हुआ 43 % क्या वडनगर वाले मामा चुकाते हैं या रेल मंत्री जी के ससुराल से आता है? जाहिर है वह कमाई माल भाड़े से होती है? माल भाड़ा किससे वसूला जाता है, किसकी जेब से आता है? बताना ज़रा?
– क्या रेल मंत्री की रेल यात्रा के विशेष डिब्बे यानी सैलून पर लिखा है कि रेल मंत्री की इस यात्रा का 100 प्रतिशत खर्च भारत की जनता वहन करती है?
– क्या 8500 करोड़ के उस विशेष हवाई जहाज पर लिखा है कि इस विमान का 100 प्रतिशत खर्च भारत की जनता वहन करती है?
– इसी हिसाब से क्या मंत्रियों के बंगलों की दीवार पर नहीं लिखा जाना चाहिए कि यह बंगला, इसमें सुख सुविधा और विलासिता का सारा का सारा खर्च भारत की जनता वहन करती है?
-क्या माननीयों की कारों पर भी ऐसा नहीं लिखना चाहिए?
मंत्रियों, सांसदों, विधायकों को टोल टैक्स नहीं देना पड़ता, लेकिन सेना के अफसरों और जवानों के वाहन केवल तभी टोल से छूट पाते हैं, जब वे सरकारी ड्यूटी पर हों। नेताओं को यह विशेष राहत क्यों? क्या उनका आना जाना सैनिकों से ज्यादा महत्वपूर्ण है?
सड़क परिवहन मंत्री कहते हैं कि टोल टैक्स सभी को देना चाहिए। आप और आपकी जमात क्यों नहीं देते श्रीमान?
दुनियाभर के सभ्य देशों में बुजुर्गों को विमान और रेल यात्रा में छूट मिलती है, कई देशों में तो उनसे पार्किंग और टोल टैक्स भी नहीं लिया जाता।
यहां सरकार कहती है कि बुड्ढे हो गए तो क्या एहसान कर रहे हो? पैसे नहीं हैं तो घर बैठो!
कभी किसी पैसेंजर ट्रेन में साधारण सेकण्ड क्लास के डिब्बे में चढ़कर तो देखिए, किसी कस्बे के अस्पताल में इलाज के बहाने घूमकर आइये, फेरी लगाकर सामान बेचनेवाले किसी आदमी या औरत से बात करके तो देखिये, किसी कम्पोजिट दुकान पर पव्वा खरीदने वाले से बात तो कीजिए , आम आदमी की बेइज्जती, उत्पीड़न, और कुंठा की फाइलें खुलती जाएंगी।
बाकी तो सब कुछ चंगा है जी !

(डॉ. प्रकाश हिंदुस्तानी एक वरिष्ठ  पत्रकार हैं, वेब पत्रकारिता के अग्रणी रहे हैं, लेखक और फिल्म समीक्षक हैं, जिन्हें हिंदी इंटरनेट पत्रकारिता में पीएचडी करने वाले पहले पत्रकार के रूप में जाना जाता है। उन्होंने 40 वर्षों तक नईदुनिया, नवभारत टाइम्स (8 वर्ष संपादक) और सहारा टीवी जैसे प्रमुख मीडिया संस्थानों में कार्य किया और वे webdunia.com के संस्थापक संपादक भी रहे हैं। इन दिनों स्वतंत्र लेखन कर रहे हैं)

आभासी दुनिया से बचपन को सुरक्षित रखने की पहल

डिजिटल युग में मानव जीवन की गति और स्वरूप तेजी से बदल रहा है। संचार, शिक्षा, मनोरंजन और सामाजिक संबंधों का बड़ा हिस्सा अब आभासी माध्यमों के सहारे संचालित होने लगा है। इस परिवर्तन ने जहां अनेक सुविधाएं प्रदान की हैं, वहीं विशेष रूप से बच्चों और किशोरों के मानसिक, शैक्षणिक, सामाजिक और भावनात्मक विकास के सामने नई चुनौतियां भी खड़ी कर दी हैं। इसी संदर्भ में भारत के तकनीकी रूप से अग्रणी राज्य कर्नाटक ने एक महत्वपूर्ण और अनुकरणीय पहल करते हुए सोलह वर्ष से कम आयु के बच्चों को सामाजिक माध्यमों के उपयोग से दूर रखने का निर्णय लिया है। राज्य सरकार ने 2026-27 के बजट सत्र में यह घोषणा की कि किशोर आयु वर्ग के बच्चों द्वारा सामाजिक माध्यमों के उपयोग पर रोक लगाने के लिए कठोर नियम बनाए जाएंगे। यह निर्णय अभिभावकों की उस चिंता को कम करता है जो अनियंत्रित डिजिटल गतिविधियों से उत्पन्न होने वाले जोखिम से परेशान थे। जिसमें साइबर बुलिंग व साइबर धोखाधड़ी भी शामिल है। इस पहल का उद्देश्य बच्चों को आभासी दुनिया के दुष्प्रभावों से बचाना और उनके स्वस्थ मानसिक विकास को सुनिश्चित करना है। एक अनुकरणीय पहल है, जिससे प्रेरणा लेते हुए अन्य प्रांतों को भी बचपन को सोशल मीडिया के खतरों से बचाने की दिशा में सार्थक उपक्रम करने चाहिए।

कर्नाटक की इस पहल के तुरंत बाद आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री एन. चंद्रबाबू नायडू ने भी विधानसभा में घोषणा की कि राज्य में तेरह वर्ष से कम आयु के बच्चों द्वारा सामाजिक माध्यमों के उपयोग पर रोक लगाने के लिए आगामी नब्बे दिनों के भीतर कानून बनाया जाएगा। इस प्रकार आंध्र प्रदेश कर्नाटक के बाद ऐसा निर्णय लेने वाला दूसरा राज्य बनने जा रहा है। इन दोनों राज्यों की पहल केवल प्रशासनिक निर्णय भर नहीं है, बल्कि यह तेजी से आभासी होती दुनिया में बच्चों की सुरक्षा को लेकर चल रही वैश्विक बहस का हिस्सा भी है। विश्व के अनेक देशों में इस विषय पर गंभीर चिंतन हो रहा है। उदाहरण के लिए ऑस्ट्रेलिया में पहले ही सोलह वर्ष से कम आयु के बच्चों के लिए सामाजिक माध्यमों के उपयोग पर प्रतिबंध लागू किया जा चुका है, वहीं फ्रांस जैसे देशों में भी बच्चों की डिजिटल सुरक्षा को लेकर कठोर नियम बनाए जा रहे हैं। वास्तव में पिछले कुछ वर्षों में अनेक मनोवैज्ञानिकों और बाल स्वास्थ्य विशेषज्ञों ने लगातार चेतावनी दी है कि सामाजिक माध्यमों का अनियंत्रित उपयोग किशोरों के मानसिक और भावनात्मक विकास पर गंभीर प्रभाव डाल सकता है। बच्चों में आत्मविश्वास की कमी, अकेलापन, चिंता, अवसाद, ध्यान भंग होने की प्रवृत्ति तथा आक्रामक व्यवहार जैसी समस्याएं तेजी से बढ़ रही हैं। आभासी मंचों पर लगातार तुलना और प्रदर्शन की प्रवृत्ति के कारण बच्चों के मन में हीनता और असंतोष की भावना भी जन्म लेने लगती है। यही कारण है कि भारत सरकार के 2025-26 के आर्थिक सर्वेक्षण में भी इस विषय को गंभीर चिंता के रूप में रेखांकित किया गया था।

विभिन्न अंतरराष्ट्रीय अध्ययनों के अनुसार किशोरों का औसत दैनिक स्क्रीन समय लगातार बढ़ रहा है। अनेक सर्वेक्षण बताते हैं कि कई देशों में तेरह से अठारह वर्ष आयु वर्ग के बच्चे प्रतिदिन तीन से छह घंटे तक आभासी माध्यमों पर समय बिताते हैं। इसका प्रत्यक्ष प्रभाव उनकी पढ़ाई, नींद, पारिवारिक संवाद और शारीरिक गतिविधियों पर पड़ता है। ध्यान और एकाग्रता की क्षमता में कमी आने से अध्ययन की गुणवत्ता प्रभावित होती है। बच्चों का स्वाभाविक बचपन, जो खेलकूद, मित्रता और प्रकृति के साथ जुड़ाव से समृद्ध होता है, वह धीरे-धीरे कृत्रिम आभासी संसार में सिमटता जा रहा है। इसके अतिरिक्त आभासी माध्यमों के माध्यम से साइबर उत्पीड़न और साइबर धोखाधड़ी जैसी समस्याएं भी तेजी से बढ़ रही हैं। कई बार बच्चे अनजाने में ऐसे जाल में फंस जाते हैं जिससे उनका मानसिक संतुलन और सुरक्षा दोनों प्रभावित होते हैं। इंटरनेट पर उपलब्ध अनुचित सामग्री भी बच्चों के मनोविज्ञान पर नकारात्मक प्रभाव डाल सकती है। इन सभी परिस्थितियों को देखते हुए यह स्पष्ट हो गया है कि बच्चों की सुरक्षा के लिए आभासी दुनिया के बढ़ते प्रचलन पर केवल जागरूकता पर्याप्त नहीं है, बल्कि ठोस नीतिगत कदम उठाने की आवश्यकता है।

हालांकि कर्नाटक और आंध्र प्रदेश की पहल सराहनीय है, किंतु इसके प्रभावी क्रियान्वयन को लेकर अनेक व्यावहारिक प्रश्न भी सामने आते हैं। आज के समय में स्मार्टफोन और विभिन्न अनुप्रयोग शिक्षा और दैनिक जीवन का अभिन्न हिस्सा बन चुके हैं। अनेक विद्यालय असाइनमेंट, सूचना और संवाद के लिए डिजिटल माध्यमों का उपयोग करते हैं। ऐसे में यह निर्धारित करना कठिन हो सकता है कि किसी बच्चे द्वारा किया गया उपयोग शैक्षिक उद्देश्य से है या सामाजिक उद्देश्य से। दूसरा महत्वपूर्ण प्रश्न आयु सत्यापन की प्रक्रिया से जुड़ा हुआ है।

यह सुनिश्चित करना कि कोई बच्चा वास्तव में तेरह या सोलह वर्ष से कम आयु का है, तकनीकी दृष्टि से एक जटिल कार्य है। यदि तकनीकी कंपनियां इस दिशा में सहयोग नहीं करती हैं तो नियमों को प्रभावी ढंग से लागू करना कठिन हो सकता है। अनेक परिवारों में एक ही मोबाइल फोन का उपयोग परिवार के कई सदस्य करते हैं, ऐसे में बच्चों द्वारा सामाजिक माध्यमों तक पहुंच को पूरी तरह रोकना भी चुनौतीपूर्ण हो सकता है। फिर भी इन कठिनाइयों के बावजूद यह पहल अत्यंत महत्वपूर्ण है क्योंकि यह समाज को एक गंभीर समस्या की ओर ध्यान दिलाती है। वास्तव में बच्चों को आभासी माध्यमों के दुष्प्रभावों से बचाने के लिए केवल प्रतिबंध पर्याप्त नहीं होगा, बल्कि एक संतुलित और व्यापक दृष्टिकोण एवं जागरूकता अभियान अपनाना आवश्यक होगा। इसमें सरकारों, विद्यालयों, तकनीकी मंचों और अभिभावकों की समान रूप से महत्वपूर्ण भूमिका होगी।

सरकारों को चाहिए कि वे बच्चों की डिजिटल सुरक्षा के लिए स्पष्ट नीतियां बनाएं और तकनीकी कंपनियों के साथ मिलकर ऐसी व्यवस्था विकसित करें जिसमें बच्चों की आयु का सत्यापन प्रभावी ढंग से किया जा सके। विद्यालयों को भी छात्रों को डिजिटल अनुशासन और जिम्मेदार उपयोग के बारे में शिक्षित करना चाहिए। अभिभावकों की भूमिका तो सबसे महत्वपूर्ण है क्योंकि बच्चों के व्यवहार और आदतों का निर्माण परिवार में ही होता है। यदि माता-पिता स्वयं डिजिटल संयम का उदाहरण प्रस्तुत करें और बच्चों के साथ संवाद बनाए रखें, तो आभासी माध्यमों के दुष्प्रभावों को काफी हद तक कम किया जा सकता है। इसके साथ ही बच्चों को रचनात्मक और सृजनात्मक वातावरण प्रदान करना भी आवश्यक है। खेलकूद, पठन-पाठन, संगीत, कला और प्रकृति के साथ जुड़ाव जैसी गतिविधियां बच्चों के व्यक्तित्व को संतुलित और समृद्ध बनाती हैं। यदि बचपन में ही इन सकारात्मक आदतों का विकास किया जाए तो बच्चे स्वाभाविक रूप से आभासी माध्यमों पर निर्भरता से दूर रह सकते हैं। समाज को भी इस दिशा में सकारात्मक पहल करनी चाहिए ताकि बच्चों के लिए स्वस्थ और प्रेरणादायक वातावरण तैयार किया जा सके।

आज यह स्पष्ट हो चुका है कि डिजिटल क्रांति के साथ-साथ डिजिटल अनुशासन की भी आवश्यकता है। तकनीक का उद्देश्य मानव जीवन को समृद्ध बनाना होना चाहिए, न कि उसे मानसिक और सामाजिक संकटों की ओर धकेलना। कर्नाटक और आंध्र प्रदेश की पहल इस दिशा में एक महत्वपूर्ण चेतावनी और प्रेरणा दोनों है। यदि अन्य राज्य भी इससे प्रेरणा लेकर बच्चों की सुरक्षा के लिए ठोस कदम उठाएं और केंद्र सरकार इस विषय पर राष्ट्रीय स्तर का कानून बनाने पर विचार करे, तो यह भविष्य की पीढ़ियों के लिए अत्यंत लाभकारी सिद्ध हो सकता है।

लगातार बिगड़ती स्थितियों के बीच निश्चित तौर पर केंद्र सरकार को भी देश में एक केंद्रीय कानून लाने को बाध्य होना पड़ सकता है। वहीं केंद्र सरकार को इस मुद्दे पर विषय विशेषज्ञों और समाज के विभिन्न वर्गों से भी राय लेनी चाहिए। ऐसे वक्त में जब बच्चों का स्क्रीन टाइम एक लत के रूप में लगातार बढ़ा है तथा उनकी एकाग्रता कम होने से पढ़ाई बाधित हो रही है, तो इस संकट का समाधान केंद्र व राज्यों की प्राथमिकता होनी चाहिए। वास्तव में बच्चों का बचपन केवल आभासी दुनिया में खो जाने के लिए नहीं है। उनका बचपन कल्पनाओं, खेल, सीखने और सृजन की संभावनाओं से भरा हुआ होना चाहिए। यदि समाज और शासन मिलकर यह सुनिश्चित कर सकें कि बच्चों का बचपन सुरक्षित, संतुलित और सृजनात्मक वातावरण में विकसित हो, तभी हम एक स्वस्थ, संवेदनशील और सशक्त भविष्य की कल्पना कर सकते हैं।

 

(ललित गर्ग)
लेखक, पत्रकार, स्तंभकार
ई-253, सरस्वती कंुज अपार्टमेंट
25 आई॰ पी॰ एक्सटेंशन, पटपड़गंज, दिल्ली-110092
मो. 9811051133

इस गाँव में धातु को चमकाकर दर्पण बनाए जाते हैं

क्या आप जानते हैं कि केरल की पम्बा नदी के तट पर स्थित अरनमुला गाँव, देश के इतिहास व इसकी विरासत का एक शानदार नमूना है! यहाँ की सबसे प्रमुख पहचान है अरनमुला कन्नाड़ी यानी अरनमुला के विशेष आइने। सबसे खास बात यह है कि ये कन्नाड़ी(आइने) शीशे की बजाय धातु(मेटल) से बनाए जाते हैं और उन्हें बनाने की प्रक्रिया पीढ़ियों से चली आ रही पारिवारिक परंपरा का हिस्सा है, जिसका #इतिहास हजारों साल पुराना है।
मूल रूप से इन शिल्पकारों को देवताओं की उत्कृष्ट कांस्य मूर्तियों को बनाने के लिए जाना जाता था। लेकिन लगभग 2000 साल पहले इन्होंने अरनमुला कन्नाड़ी के रूप में जाना जाने वाला यह विशेष आइना बनाया जो इनकी मूर्ति बनाने की कला से ज्यादा प्रचलित हुआ।
तो क्या है जो अरनमुला कन्नाड़ी को बाकी आइनों से अलग बनाता है? आई जानते हैं-
दरअसल ये आइने टिन और कॉपर को गलाकर विशेष तरह से बनाए जाते हैं और यह कला सिर्फ अरनमुला के 22 परिवारों को ही आती है। ये शीशे केरल के ऑफिशियल गिफ्ट के तौर पर जाने जाते हैं। अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति बराक ओबामा, प्रिंस चार्ल्स से लेकर भारत के राष्ट्रपति व प्रधानमंत्री तक को ये आइने बतौर गिफ्ट भेंट किए जा चुके हैं।
इस दर्पण की विशेषता का एक कारण यह भी है कि जहाँ शीशे के दर्पण में प्रतिबिंब उसकी भीतरी सतह पर किए गए पारे के लेप के कारण बनते हैं, तो वही इसमें छवि मुख्य सतह पर ही बनती है।
अरनमुला के इन शीशों के पास यूनेस्को का जीआई (जिऑग्रफिकल इंडिकेशन) टैग है। इसका अर्थ हुआ कि इन आइनों पर किसी और जगह के लोगों का दावा नहीं हो सकता।

साभार- https://www.facebook.com/share/1DgwtkU7rd/ से 

तब रेडियो से लेकर हर जुबान पर गूंजता था विको का नाम

हो सकता आपमें से कईयों ने कभी वीको लैबोरेटरीज़ का कोई प्रोडक्ट इस्तेमाल भी ना किया हो। लेकिन किसी ज़माने में टीवी पर वीको टरमरिक क्रीम या वीको वज्रदंती पाउडर के विज्ञापन आपने खूब देखे होंगे। और जिन लोगों ने देखे होंगे उनमें से अधिकतर के कानो में वो पुरानी आवाज़ इस वक्त गूंजने भी लगी होगी। वीको टरमरिक। नहीं कॉस्मैटिक। वीको टरमरिक आयुर्वेदिक क्रीम।
वीको टरमरिक क्रीम का ये जिंगल कभी लोगों की ज़ुबान पर चढ़ा हुआ था। हमारा बजाज, वॉशिंग पाउडर निरमा और फेना ही लेना की ही तरह वीको टरमरिक क्रीम के जिंगल भी ने भी इस ब्रांड को देश-विदेश में मशहूर कर दिया था। उस ज़माने में भी कई लोग थे जिन्होंने कभी वीको का कोई प्रोडक्ट इस्तेमाल नहीं किया था।
लेकिन इसका अनोखा सा जिंगल उन लोगों ने भी गुनगुनाया होगा। मुमकिन ही नहीं है कि ना गुनगुनाया हो। वीको लैबोरेटरीज़ के मुताबिकस एक चीज़ जिसने वीको को खास बनाया था वो था इसका आयुर्वेदिक फॉर्मुला। वीको उस वक्त डाबर व हिमालयाज़ जैसी आयुर्वेदीक प्रोडक्ट्स बेचने वाली कंपनियों की तगडी कॉम्पिटीटर बन गई थी।
फेयरनेस क्रीम में हल्दी का इस्तेमाल करके वीको ने खूब लोकप्रियता बटोरी। हल्दी तो वैसे भी भारत के हर घर की रसोई का अभिन्न इन्ग्रीडिएंट है। इसलिए जनता में इस क्रीम के प्रति बहुत उस्तुकता थी। वीको उन शुरुआती ब्रांड्स में से एक है जिसने ‘ये जो है ज़िंदगी’ व कई और दूरदर्शन के शोज़ स्पॉन्सर किए थे।
वो दौर जब टीवी भी हर घर में नहीं हुआ करते थे। स्मार्टफोन्स और इंटरनेट की कल्पना भी किसी ने नहीं की थी, उस दौर में वीको ने अपने जिंगल के सहारे शोहरत बटोरी थी। वीको की लोकप्रियता का अंदाज़ा ऐसे भी लगाया जा सकता है कि इसे कई अवॉर्ड्स मिले थे। 2017 में भी वीको को मार्केटिंग कैटेगरी में एबीपी ब्रांड एक्सलेंस अवॉर्ड मिला था। तो चलिए, जानते हैं कि वीको की शुरुआत कैसे हुई थी।
इस कंपनी की स्थापना की थी केशव विष्णू पेंढारकर ने साल 1952 में। उस वक्त कंपनी का नाम विष्णू इंडस्ट्रियल कैमिकल कंपनी था। बाद में वो वीको लैबोरेटरीज़ हो गया। कहा जाता है कि एक दिन केशव विष्णू पेंढारकर नागपुर की एक राशन की दुकान पर बैठे थे। तभी उनके ज़ेहन में ख्याल आया कि क्यों ना दांत साफ करने वाला एक ऐसा पाउडर बनाया जाए जो पूरी तरह से कैमिकल फ्री हो।
बस, लग गए केशव विष्णू पेेंढारकर मेहनत करने। और कुछ दिन बाद उन्होंने एक हर्बल टीथ क्लीनिंग पाउडर तैयार भी कर लिया। अपने उस हर्बल टीथ क्लीनिंग पाउडर को केशव जी घर-घर बेचने जाने लगे। उनके बेटे भी उनके साथ रहते थे। उनकी मेहनत रंग लाई। पाउडर की डिमांड बढ़ने लगी। और कुछ ही सालों में केशव जी ने नागपुर, गोवा व डोंबीवली में प्रोडक्शन यूनिट्स भी इस्टैब्लिश कर ली।
शुरुआत में तो वीको के प्रोडक्ट्स सस्ते दामों पर मिला करते थे। लेकिन डिमांड बढ़ने पर कीमत भी अच्छी-खासी बढ़ा दी गई। दूसरे ब्रांड्स की तुलना में 40 प्रतिशत तक वीको के प्रोडक्ट्स महंगे हो गए। आज भी महंगे ही हैं वैसे। लेकिन महंगे उत्पादों के बावजूद वीको लैबोरेटरीज़ ने खूब तरक्की की।
हालांकि तरक्की यूं ही नहीं मिल गई। वीको लैबोरेटरीज़ को भी कई चुनौतियों का सामना करना पड़ा था। जब वीको टरमरिक क्रीम लॉन्च हुई थी तब अनेकों कस्टमर्स ने शिकायत की थी कि क्रीम का इस्तेमाल करने के बाद चेहरे पर पीले निशान रह जाते हैं। कस्टमर्स की उन शिकायतों की वजह से वीको टरमरिक क्रीम का मार्केट बुरी तरह प्रभावित हुआ।
इस चुनौती से निपटने के लिए कंपनी की तरफ से डोर टू डोर सेल्समैन भेजे जाने लगे। वो सेल्समैन लोगों के सामने अपने चेहरे पर क्रीम रगड़ते थे। ये दिखाने के लिए कि वीको टरमरिक क्रीम लगाने से चेहरे पर पीले निशान नहीं रहते हैं। साल 1978 में भी वीको लैबोरेटरीज़ को एक तगड़ी चुनौती का सामना करना पड़ा था।
तत्कालीन केंद्र सरकार की इस कंपनी पर टेढ़ी नज़र थी। तब सेंट्रल एक्साइज़ डिपार्टमेंट ने वीको वज्रदंती पाउडर और वीको टरमरिक क्रीम को कॉस्मैटिक प्रोडक्ट्स की कैटेगरी में डाल दिया था। जबकी वीको हमेशा से दावा करती है कि उसके प्रोडक्ट्स पूरी तरह से हर्बल हैं।
लेकिन सेंट्रल एक्साइज़ डिपार्टमेंट के उस फैसले की वजह से अब कंपनी पर कॉस्मैटिक टैक्स भरने का दबाव पड़ने लगा था। 1985 में सेंट्रल एक्साइज़ डिपार्टमेंट ने कंपनी पर एक मुकदमा भी दर्ज कराया था। उस मुकदमे का फैसला आया था साल 2007 में। वीको लैबोरेटरीज़ मुकदमा जीत गई। और उसे कोई कॉस्मैटिक टैक्स नहीं भरना पड़ा।
साल 1971 में केशव विष्णू पेंढारकर के पुत्र गजानन पेंढारकर वीको लैबोरेटरीज़ के चेयरमैन बने। उस वक्त कंपनी का टर्नओवर सालाना 1 लाख करोड़ रुपए था। और जब 2015 में गजानन पेंढारकर की मृत्यु हुई थी तब कंपनी का टर्नओवर 350 करोड़ सालाना था। और आज ये टर्नओवर 500 करोड़ रुपए सालाना है। वीको लैबोरेटरीज़ आज देश की अग्रणी आयुर्वेदिक उत्पादों की कंपनी है। तीस से अधिक देशों में वीको का बिजनेस फैला हुआ है।
बदलते वक्त के साथ वीको ने अपनी मार्केटिंग स्ट्रैटेज़ीस में भी तमाम बदलाव किए। नए ज़माने के विज्ञापन तैयार कराए गए। टीम इंडिया के पूर्व कप्तान सौरव गांगुली को ब्रांंड एंबेसडर बनाया गया। जब सौरव गांगुली को कंपनी का ब्रांड एंबेसडर चुना गया था तब उन्होंने कहा था कि ये उनके लिए एक फैन मोमेंट है। क्योंकि एक वक्त था जब वो खुद टीवी पर वीको के जिंगल्स देखते थे और गुनगुनाते भी थे। वै
से, गांगुली को एक रणनीति के तहत ब्रांड एंबेसडर बनाया गया था। कंपनी की प्लानिंग थी कि उन लोगों तक पहुंच बनाई जाए जो गांगुली को क्रिकेट खेलते देख बड़े हुए हैं। आलिया भट्ट भी एक वक्त पर वीको की ब्रांड एंबेसडर रह चुकी हैं। जबकी 90s में हमने और आपने एक्ट्रेस मृणाल कुलकर्णी को वीको के विज्ञापनों में देखा था।
बदलते दौर में वीको ने अपना जिंगल भी बदल दिया। जैसे ‘ये है वोही वज्रतंदी।’ और सोशल मीडिया के दौर में अपनी प्रज़ेंस बनाए रखने के लिए कुछ साल पहले वीको ने 20 लाख रुपए इन्फ्लूएंसर मार्केट पर खर्च किए थे। वीको के नए फेशवॉस को इंट्रोड्यूज़ करने के लिए इंस्टाग्राम का सहारा लिया गया। कुछ इन्फ्लुएंसर्स से फेशवॉश के बारे में वीडियो बनवाए गए। साथ ही हैशटैग्स भी चलाए गए।

कीट-कीस-कीम्स ने मनाया अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस

भुवनेश्वर। कीट-कीस-कीम्स ने 8 मार्च को अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस हर्षोल्लास के साथ मनाया। अवसर पर आयोजित संगोष्ठी का थीम था-देने से मिलनेवाली खुशी।अवसर पर कीट-कीस-कीम्स के प्राणप्रतिष्ठाता महान् शिक्षाविद् प्रोफेसर अच्युत सामंत ने निर्धारित थीम देने से मिलनेवाली खुशी को स्पष्ट करते हुए यह जानकारी दी कि कीट-कीस-कीम्स में लगभग 50 प्रतिशत महिलाएं कार्यरत हैं और वे ही अपनी शक्तिबोध और सौंदर्यबोध से कीट-कीस-कीस की वास्तविक पहचान हैं।वे ही वास्तविक शक्तिबोध और सौंदर्यबोध हैं।उनके अनुसार उनकी तीनों ही संस्थाओं में महिलाओं की भूमिका अहम् है।गौरतलब है कि प्रोफेसर अच्युत सामंत की अपनी स्वर्गीया मां नीलिमारानी सामंत ही उनके कामयाब जीवन की वास्तविक प्रेरणा हैं और उनकी मां के समस्त संदेशःअनुशासन,वफादारी,जिम्मेदारी ,ईमानदारी और कर्तव्यपरायणता को अपनाकर पिछले लगभग 30 सालों से कीट-कीस-कीम्स को दुनिया की श्रेष्ठतम संस्थाएं बनाने हेतु संकल्पित भाव से कार्यरत हैं।

आज अन्तर्राष्ट्रीय महिला दिवस है। ऐसे में,कीट-कीस-कीम्स परिवार की सभी महिलाओं के लिए यही संदेश है कि वे अपने घर-परिवार,घर के माता-पिता,बड़े-बुजुर्गों के साथ आत्मीयता के साथ आनंदमय जीवन व्यतीत करें।उनकी देखभाल अच्छे तरीके से करें।साथ ही उनके साथ कुछ समय अवश्य बिताएं।

इस अवसर पर कीट डीम्ड विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो.सरनजीत सिंह,कुलसचिव प्रो.ज्ञानरंजन महंती, प्रो.पद्मकली बनर्जी,डीजी कीट तथा तथा अधिक संख्या में कीट-कीस-कीम्स की महिला कर्मचारी आदि उपस्थित थीं।

(लेखक राष्ट्रपति पुरस्कार प्राप्त हैं और ओड़िशा के साहित्यिक, सांस्कृतिक, सामाजिक मुद्दों पर नियमित लेखन करते हैं )

उपाध्याय एक श्रेष्ठ ब्रह्मवेत्ता

उपाध्याय का अर्थ

उपाध्याय विश्व की प्राचीनतम भाषा देववाणी संस्कृत का एक लोकप्रचलित उपाधि नाम है जो गुरुकुल के उन आचार्यों के लिए इस्तेमाल में लिया जाता है, जो भारतवर्ष में अनादिकाल से लेकर उन्नीसवीं शताब्दी के मध्य तक गुरु-शिष्य परम्परा के तहत गुरुकुल में अपने विद्यार्थियों को पढ़ाया करते थे। स्नातक, परास्नातक और उच्च शोध शिक्षा प्रणाली को इजाद करने वाले भारत के उपाध्यायों की गुरुकुल शिक्षा प्रणाली विश्वभर में सबसे ज्यादा चर्चित रही हैं। भारत के गुरुकुल और उसके उपाध्यायों का इतिहास बेहद ही प्राचीनतम और ब्यापक है, जिसे महज किसी भी लेख और ऐतिहासिक ग्रँथ में समेटना पूरी तरह असंभव है। भारत का सम्पूर्ण इतिहास,समयचक्र के हिसाब से प्रचलित प्रत्येक कालखंड (सतयुग, द्वापर, त्रेता, कलयुग) चारों वेद,छह शास्त्र, अठारह पुराण, उपनिषद समेत सभी महान ग्रन्थों में गुरुकुल और उनके उपाध्यायों का विशेष और विस्तृत वर्णन है।

 

“उपाध्याय” Upadhyay- (संस्कृत – उप + अधि + इण घं‌) इस शब्द की व्युत्पत्ति इस प्रकार की गई है- ‘उपेत्य अधीयते अस्मात्‌’ जिसके पास जाकर अध्ययन किया जाए,वह उपाध्याय कहलाता है।

 

 

वैदिक काल से ही गुरुकुल के शिक्षकों को उपाध्याय कहा जाता था। सरल शब्दों में यदि कहा जाय तो गुरुकुलों में विद्यार्थियों को पढ़ाने वाला गुरु जिसे वर्तमान में शिक्षक,आचार्य या अध्यापक कहा जाता है। इस प्रकार वर्तमान समय तक आते आते गुरु और ब्राह्मणों की एक उपजाति की उपाधि भी बन गई है।

 

ज्ञान-विज्ञान सम्पूर्ण ब्रह्मण्ड का ज्ञाता

रामायण और महाभारत में स्पष्ट उल्लेख किया है कि ज्ञान-विज्ञान की समस्त शाखाओं, उप शाखाओं, वेद-ग्रँथ, शास्त्र के साथ शस्त्र अर्थात युद्ध विद्या समेत सम्पूर्ण ब्रह्मण्ड की ज्ञात और अदृश्य विद्याओं को गुरुकुल में विद्यार्थियों को सहज पढ़ाने की योग्यता रखने वाले गुरु या शिक्षक को उपाध्याय,कुलपति या आचार्य की संज्ञा दी गई।

 

यदि भारत देश का प्राचीनकाल से लेकर वर्तमान काल तक का इतिहास उठाकर देखा जाये तो भारतवर्ष में जब भी विदेशी आक्रांताओं ने हमला किया और देश गुलामी की जंजीरों में जकड़ा,तब-तब उसकी सबसे बड़ी कीमत भारत के गुरुकुलों और उनके उपाध्यायों को चुकानी पड़ी। चूंकि सनातन सभ्यता को जीवंत रखने वाले गुरुकुल के उपाध्यायों के द्वारा देश के युवाओं को श्रेष्ठतम स्तर की शिक्षा- दिक्षा और उन्नत परवरिश देकर आदर्श नागरिकों का निर्माण किया जाता था।

 

कालखंड-युगों में उपाध्याय शब्द प्रचलित

कालखंड के हिसाब से सभी युगों में गुरुकुल के अध्यापकों के लिये देवभाषा सँस्कृत में उपाध्याय शब्द का इस्तेमाल किया गया है। विश्व के सबसे प्राचीनतम महाग्रन्थ वेदों में इसका विस्तार से वर्णन है। त्रेता युग में त्रिकालदर्शी आदि कवि महर्षि बाल्मीकि द्वारा रचित महाग्रंथ रामायण के बालकाण्ड में सीता स्वयंवर के समय जब भगवान राम ने शिवजी का धनुष भंग कर स्वयंवर जीता, तब राजा जनक के राजकुल पुरोहित,आचार्य सदानन्द अपने राजा जनक और मुनि विश्वामित्र से प्रार्थना करते हैं कि अयोध्या के राजा दशरथ एवं उनके गुरुकुल उपाध्याय को स्वयंवर का सन्देश पत्र प्रेक्षित किया जाना चाहिए। तब राजा जनक अपनी ओर से लिखे पत्र में राजा दशरथ को अपने गुरुकुल उपाध्याय महर्षि वशिष्ठ समेत सभी आचार्यों को अपने साथ लेकर राम सीता विवाह का निमंत्रण भेजते हैं। द्वापर युग में भी भगवान कृष्ण के बेहद अल्प समय में गुरूकुल उपाध्याय मुनि संदीपनी से शिक्षा गृहण करने का वर्णन है। कुलमिलाकर वैदिक कालीन इतिहास,वेद-पुराण, शास्त्र, उपनिषद, रामायण, महाभारत, मध्यकालीन भारत का इतिहास,आधुनिक भारत का इतिहास सभी जगह गुरुकुल के आचार्यों, अध्यापकों के लिए देववाणी संस्कृत में उपाध्याय शब्द का प्रयोग किया गया है।

 

उपाध्याय ब्राह्मण परंपरागत रूप से पुरोहिती, अध्यापन (शिक्षण), और विद्या के प्रति समर्पित रहे हैं, जिन्हें प्राचीन समाज में विद्या और वेदों के ज्ञानी के रूप में सम्मान प्राप्त था।

 

उपाध्याय जिझौतिया ब्राह्मणों का उपनाम

उपाध्याय जिझौतिया ब्राह्मणों का एक उपनाम है। जिझौतिया ब्राह्मणों में उपाध्याय उपनाम अंतर्गत चार गोत्र – शांडिल्य, सांकृत, भरद्वाज एवं वत्स हैं। उपाध्याय उपनाम एवं भरद्वाज गोत्र का आदिग्राम महजौली (माजौली) है जो बुन्देलखण्ड क्षेत्र में उत्तर प्रदेश राज्य के हमीरपुर जिला में राठ तहसील अंतर्गत गोहाण्ड के निकट स्थित है। महजौली में “कालीमाई” का मंदिर है जो “महामाई” के नाम से प्रसिद्द है। भरद्वाज गोत्र में तीन प्रवर – भरद्वाज,अंगिरा और वार्हस्पत्य हैं। जिझौतिया ब्राह्मण अंतर्गत उपाध्याय उपनाम व भरद्वाज गोत्र के वेद – यजुर्वेद , उपवेद – धनुर्वेद , शाखा – माध्यन्दिन , सूत्र – कात्यायन, छन्द – अनुष्टुप , शिखा – दक्षिण , पाद – दक्षिण , देवता – शिव एवं कुलदेवता – गुसाईं बाबू हैं। इनमें कुल पूजा का समय भाद्र शुक्ल दोज है।

 

उल्लेखनीय चर्चित लोग

अमर उपाध्याय, भारतीय मॉडल, फिल्म और टेलीविजन अभिनेता का नाम था। आमोद प्रसाद उपाध्याय (जन्म 1936), नेपाली सामाजिक कार्यकर्ता और राजनीतिज्ञ हैं।अयोध्या प्रसाद उपाध्याय ‘हरिऔध’ हिंदी साहित्य के लेखक रहे हैं।

 

ब्रह्मबंधव उपाध्याय बंगाली ब्राह्मण, भारतीय स्वतंत्रता सेनानी कालीचरण बनर्जी के भतीजे रहे।छबीलाल उपाध्याय नेपाली ब्राह्मण (बहुन), असम प्रदेश कांग्रेस कमेटी के पहले अध्यक्ष (चयनित) चिंतन उपाध्याय भारतीय समकालीन कलाकार, दोहरे हत्याकांड के सिलसिले में गिरफ्तार हुए थे। चंद्रिका प्रसाद उपाध्याय, भारतीय राजनीतिज्ञ रहे। दीनदयाल उपाध्याय – आरएसएस के विचारक और राजनीतिक दल भारतीय जनसंघ के सह-संस्थापक रहे। दर्शन उपाध्याय, पेशेवर स्पोर्ट्स खिलाड़ी रहे। हरिलाल उपाध्याय गुजराती लेखक रहे। हेमा उपाध्याय भारतीय कलाकार जो 1998 से मुंबई में रहते और काम करते थे। केदार नाथ उपाध्याय, नेपाल के मुख्य न्यायाधीश रहे।

 

किशोर उपाध्याय,भारतीय राजनीतिज्ञ; कृष्णकांत उपाध्याय उत्तर प्रदेश के क्रिकेटर; ललित उपाध्याय, भारतीय फील्ड हॉकी खिलाड़ी।मुनीश्वर दत्त उपाध्याय, भारतीय राजनेता, भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में नेता रहे। राम किंकर उपाध्याय, भारतीय शास्त्रों के विख्यात विद्वान और भारत के तीसरे सर्वोच्च नागरिक पुरस्कार पद्म भूषण के प्राप्तकर्ता सम्राट उपाध्याय, नेपाली लेखक जो अंग्रेजी में लिखते हैं।सतीश उपाध्याय (जन्म 1962), भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की दिल्ली इकाई के अध्यक्ष रहे। राम बीर उपाध्याय बसपा के नेता और मायावती सरकार के मंत्री रहे। सीमा उपाध्याय (जन्म 1965), भारतीय राजनीतिज्ञ, बहुजन समाज पार्टी से संबंधित रहीं। शैलेंद्र कुमार उपाध्याय, नेपाली राजनयिक और राजनीतिज्ञ हैं।श्रीकृष्ण उपाध्याय नेपाली अर्थशास्त्री; उमेश उपाध्याय, अनुभवी भारतीय टेलीविजन पत्रकार और मीडिया कार्यकारी, प्रेसिडेंट न्यूज नेटवर्क18 से सम्बद्ध हैं तथा विकास उपाध्याय, अखिल भारतीय युवा कांग्रेस के महासचिव रहे। डा. मुनि लाल उपाध्याय “सरस”- 40 साल तक जनता उच्चतर माध्यमिक विद्यालय नगरबाजार बस्ती केप्रधानाचार्य, विद्वान, कवि,राष्ट्रपति शिक्षक सम्मान से सम्मानित, दर्जनों प्रकाशित पुस्तकों के रचयिता ।

लेखक परिचय:-

(लेखक भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण, में सहायक पुस्तकालय एवं सूचनाधिकारी पद से सेवामुक्त हुए हैं। वर्तमान समय में उत्तर प्रदेश के बस्ती नगर में निवास करते हुए सम सामयिक विषयों,साहित्य, इतिहास, पुरातत्व, संस्कृति और अध्यात्म पर अपना विचार व्यक्त करते रहते हैं। वॉट्सप नं.+919412300183)

‘मिस इंडिया अर्थ 2019’ की विजेता रहीं सायली सुर्वे ने कहा, आतिफ और उसके घर वालों ने मेरा जीना हराम कर दिया था

महाराष्ट्र के पुणे के पिंपरी-चिंचवाड की रहने वाली और ‘मिस इंडिया अर्थ 2019’ की विजेता रहीं सायली सुर्वे ने इस्लाम से हिंदू धर्म में घर वापसी की है। सायली ने बताया है कि 10 साल पहले उन्होंने आतिफ के प्यार में सब कुछ छोड़ा, मगर आतिफ ने सिर्फ उनके साथ ज्यादती की।

उन्होंनें शौहर आतिफ तासे पर मारपीट और धर्मांतरण के गंभीर आरोप लगाए हैं। सुर्वे का कहना है कि आतिफ से शादी के बाद उनका जबरन धर्मांतरण कराया गया और उन्हें लगातार मानसिक व शारीरिक रूप से प्रताड़ित किया गया। अब उन्हें हिंदू धर्म में वापस लौटते हुए बेहद खुशी हो रही है। उन्होंने अपना नाम बदलकर ‘आद्या सुर्वे’ रख लिया है।

सायली के अनुसार, उन्होंने परिवार के विरोध के बावजूद मीरा-भायंदर के उद्योगपति आतिफ तासे से 10 साल पहले लव मैरिज की थी। कुछ समय तक सब ठीक था, लेकिन फिर उनके साथ बुरा व्यवहार किया जाने लगा। उनसे मारपीट की गई, जबरन इस्लाम कबूल करवाकर उनका नाम ‘अतेज़ा तासे’ कर दिया गया।

बाद में दोनों के चार बच्चे हुए। मॉडल होने के बावजूद सायली अपने बच्चों की खातिर सब-कुछ सहती रहीं। उन्होंने आरोप लगाया कि उन्होंने कई बार पुलिस से मदद माँगी, लेकिन समय पर उन्हें कोई सहायता नहीं मिली।

सायली ने मीडिया को बताया, “आतिफ तासे से शादी करना मेरी जिंदगी की सबसे बड़ी भूल थी। शादी के बाद मैंने काफी कुछ झेला। मैंने कई बार पुलिस से मदद की गुहार लगाई, लेकिन मुझे वहाँ से कोई न्याय नहीं मिला।”

उन्होंने आगे बताया कि अंत में उन्होंने हिंदुत्ववादी संगठनों से संपर्क किया, जिनकी मदद से उनकी ‘घर वापसी’ संभव हो पाई। पिंपरी-चिंचवड में वैदिक मंत्रोच्चार और होम-हवन के जरिए शुद्धिकरण की प्रक्रिया पूरी की गई।

विश्व महिला दिवस पर वरिष्ठतम महिला साहित्यकारों का सम्मान

कोटा/ हाड़ोती की वरिष्ठतम कवयित्री -लेखिका एवं साहित्यकार प्रेमलता जैन, डॉ. क्षमा चतुर्वेदी, डॉ. इंदु रामबाबू एवं डॉ. वीणा अग्रवाल का रविवार को महावीर नगर में आयोजित अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस समारोह में माल्यार्पण , उपरना, शॉल ओढ़ा कर सम्मान पत्र एवं प्रतीक चिन्ह प्रदान कर सम्मानित किया गया। समरस संस्थान साहित्य सृजन भारत, गांधीनगर की ओर से महावीर नगर में आयोजित समारोह में संस्थान की राष्ट्रीय अध्यक्ष डॉ.शशि जैन ने सभी का स्वागत किया। डॉ. इंदु रामबाबू का उनके घर पर जा कर सम्मान किया गया।

साहित्यकार विजय जोशी ने सम्मानित होने वाली कवयित्रियों का परिचय देते हुए कहा कि कविता का पथ लोक से आरम्भ होकर लोक की ही यात्रा करता है। आज सम्मानित रचनाकारों ने सतत् रूप से इस पथ पर अपनी भाव संवेदनाओं के लौकिक पक्ष को उजागर करते हुए अपने समय के स्पन्दन को शब्द एवं स्वर देकर सामाजिक सरोकारों से समर्पित किया है। इन सभी का साहित्यिक योगदान दिशाबोधक है।

डॉ. नरेंद्र नाथ चतुर्वेदी, रामेश्वर शर्मा रामू भैया, जितेंद्र निर्मोही, अतुल कनक , भगवती प्रसाद गौतम, डॉ. अतुल चतुर्वेदी, डॉ. इंदु बाला शर्मा , श्यामा शर्मा ने विचार व्यक्त कर महिला साहित्यकारों को साहित्य जगत की अमूल्य निधि बताते हुए नई पीढ़ी के रचनाकारों के लिए प्रेरणा श्रोत बताया। संचालन डॉ. वैदेही गौतम ने करते हुए सरस्वती वंदना प्रस्तुत की। संदीप द्विवेदी ने
कार्यक्रम का संयोजन किया।

संस्कृति, साहित्य, मीडिया फोरम की पहल पर आयोजित कार्यक्रम में संयोजक डॉ. प्रभात कुमार सिंघल ने सभी का आभार व्यक्त किया।

प्रेषकः डॉ. प्रभात कुमार सिंघल, कोटा से