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सुप्रीम कोर्ट ने यूजीसी के नए नियमों पर रोक लगाई, केंद्र सरकार की फजीहत

सुप्रीम कोर्ट में गुरुवार (29 जनवरी 2026) को UGC के नए नियमों के खिलाफ दायर याचिका पर सुनवाई हुई। इस दौरान सुप्रीम कोर्ट ने UGC के नए नियमों पर रोक लगा दी है। CJI सूर्यकांत ने कहा कि नए नियमों के गलत इस्तेमाल की आशंका है।

सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से इस मामले पर जवाब माँगा है और समिति का गठन करने को कहा है। साथ ही, UGC को भी सुप्रीम कोर्ट ने नोटिस भेजा है। SC ने 19 मार्च तक जवाब देने को कहा है।

मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्य बागची की बेंच इस मामले की सुनवाई कर रही थी। बार ऐंड बेंच की रिपोर्ट के मुताबिक, कोर्ट ने कहा, “अगर हम दखल नहीं देंगे तो इसके खतरनाक नतीजे होंगे, समाज बँट जाएगा और इसका गंभीर असर होगा।”

कोर्ट ने कहा कि इन रेगुलेशंस की जाँच एक एक्सपर्ट कमेटी द्वारा की जानी चाहिए। कोर्ट ने कहा, “पहली नजर में हम कहते हैं कि रेगुलेशन की भाषा अस्पष्ट है और एक्सपर्ट्स को इसकी भाषा को देखने की जरूरत है ताकि इसका गलत इस्तेमाल न हो।”

कोर्ट ने यूजीसी और केंद्र सरकार को नोटिस जारी किया और आदेश दिया कि रेगुलेशंस को रोक दिया जाए।

माननीय न्यायालय ने कहा, “इस मामले में नोटिस जारी किया जाता है, जिसकी अगली सुनवाई 19 मार्च को होगी। सॉलिसिटर जनरल (SG) ने नोटिस स्वीकार कर लिया है। क्योंकि 2019 में दाखिल याचिका में उठाए गए मुद्दे भी इस मामले में संविधानिक वैधता की जाँच पर असर डालेंगे, इसलिए इन याचिकाओं को उसी मामले के साथ जोड़ा जाए। फिलहाल, यूजीसी नियम 2026 को अस्थाई रूप से लागू नहीं किया जाएगा।”

यूजीसी के नए नियमों को चुनौती देने वाली याचिकाकर्ताओं ने दलील दी कि नए नियम कुछ समूहों को अलग-थलग करने वाले हैं. थोड़ी देर चली सुनवाई के बाद अदालत ने कहा कि इस मुद्दे से जुड़े कुछ संवैधानिक और क़ानूनी सवालों की जांच की जानी बाकी है.

मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत ने कहा कि नए नियमों में “अस्पष्टता” है और उनका दुरुपयोग हो सकता है.

उन्होंने भारत के सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता से कहा कि वह अदालत को एक विशेषज्ञों की समिति का सुझाव दें, जो इस मुद्दे की जांच कर सके. प्रधान न्यायाधीश ने यह भी कहा कि यूजीसी को इन याचिकाओं पर अपना जवाब दाख़िल करना चाहिए.

राष्ट्रीय विज्ञान संग्रहालय परिषद ने विज्ञान प्रदर्शनी के माध्यम से दर्शकों को मंत्रमुग्ध किया

राष्ट्रीय विज्ञान संग्रहालय परिषद (एनसीएसएम) की इकाई, दिल्ली स्थित राष्ट्रीय विज्ञान केंद्र, पर्यटन मंत्रालय द्वारा 26 से 31 जनवरी, 2026 तक आयोजित गणतंत्र दिवस समारोह के हिस्से के रूप में लाल किले के मैदान में आयोजित भारत पर्व 2026 में संवादात्‍मक विज्ञान प्रदर्शनी के माध्‍यम से दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर रहा है।
केंद्रीय मंत्रालयों के स्टॉल संख्या 9 पर आयोजित एनएससीएम प्रदर्शनी का उद्देश्य रोचक और व्यावहारिक अनुभवों के माध्यम से आम जनता के बीच विज्ञान को लोकप्रिय बनाना और वैज्ञानिक सोच को बढ़ावा देना है। आगंतुक विभिन्न प्रकार के पोर्टेबल प्रदर्शनों का अवलोकन कर रहे हैं जो आकर्षक वैज्ञानिक सिद्धांतों जैसे द्रव गतिकी, भंवर निर्माण, गुरुत्वाकर्षण केंद्र की घटनाएँ और पाइथागोरस प्रमेय का दृश्य प्रमाण प्रदर्शित करते हैं, जिससे जटिल अवधारणाएं सुलभ और मनोरंजक बन जाती हैं।

इस प्रदर्शनी में विज्ञान और आधुनिक तकनीक के मेल को दर्शाते हुए, वर्चुअल साइकिलिंग, ज़ूम टेबल और एक डिजिटल ऑर्केस्ट्रा शामिल हैं, जहाँ मोशन सेंसर की मदद से प्रतिभागी बिना किसी वाद्य यंत्र के संगीत का संचालन कर सकते हैं। इस प्रदर्शनी का प्रमुख आकर्षण एआई-संचालित डिजिटल मॉर्फिंग बूथ है, जो दर्शकों को लोकप्रिय फिल्मी किरदारों या प्रतिष्ठित वेशभूषा में बदल देता है, जिससे रोमांच और यादगार तस्वीरें लेने के अवसर मिलते हैं।

इसके अतिरिक्त, विशेषज्ञों द्वारा आयोजित लाइव विज्ञान प्रदर्शन व्याख्यान बर्नौली के सिद्धांत, जड़त्व आघूर्ण, कोणीय संवेग के संरक्षण और द्रव यांत्रिकी सहित मुख्य वैज्ञानिक अवधारणाओं को सरल बनाते हैं, जिससे आगंतुकों को अमूर्त सिद्धांतों को वास्तविक दुनिया के अनुप्रयोगों के साथ जोड़ने में मदद मिलती है।

संस्कृति मंत्रालय के अधीन कार्यरत, एनसीएसएम, देशभर में अपने 25 विज्ञान केंद्रों के नेटवर्क के साथ, इस तरह की पहुंच पहलों के माध्यम से दर्शकों के बीच जिज्ञासा, नवाचार और वैज्ञानिक जागरूकता को बढ़ावा देने की अपनी प्रतिबद्धता की पुष्टि करता है।

कवि नीरज : स्मृतियों में बसा एक उजला व्यक्तित्व

मुम्बई की सांस्कृतिक संस्था ‘बतरस’ ने हिंदी काव्य मंच के सबसे लोकप्रिय कवियों में एक गोपालदास सक्सेना नीरज पर शनिवार 10 जनवरी, 2026 को ‘शताब्दी स्मरण’ कार्यक्रम का आयोजन किया। नीरज की रचनात्मकता को जानने-समझने और फिल्म गीतकार के रूप में उनकी उपलब्धियों के आकलन के लिहाज से यह अंतस को समृद्ध कर देने वाला एक महत्वपूर्ण आयोजन रहा॰॰॰। नीरज को याद करना केवल एक कवि को याद करना नहीं, बल्कि उस युग को स्मरण करना है, जिसमें कविता जीवन का उत्सव और संघर्ष का स्वर बन जाती है।

प्रमुख वक्ता के रूप में लेखक और व्यंग्यकार वागीश सारस्वत ने कहा कि कवि नीरज को पढ़ते हुए उनके शब्दों में स्मृतियों की गरमाहट उतर आती है। उनके लिए कविता एक साधना थी। कवि-सम्मेलनों से कई बार उनका मोह-भंग हुआ, क्योंकि वे तालियों के नहीं, चेतना के कवि थे। उनका व्यक्तित्व मंच की सीमाओं से कहीं बड़ा था। बहुत कम लोग जानते हैं कि वे एक स्वतंत्रता सेनानी भी थे और अंग्रेज़ों के विरुद्ध आंदोलन करते हुए कई बार जेल भी गये थे। नीरजजी ने आंदोलन पर केवल लिखा ही नहीं, बल्कि उन्हें जीया भी। नीरज की कविताओं में श्रृंगार की मधुरता के साथ विरह की गहरी छाया भी है। शायद इसी कारण जीवन भर उनका मन कहीं न कहीं अतृप्त रहा। वे प्रेम के कवि थे, पर उनका प्रेम केवल सौंदर्य नहीं, पीड़ा और प्रतीक्षा से भी भरा था। वागीशजी के अनुसार यह एक अजीब संयोग ही था कि अलीगढ़ में सिर्फ़ चार गलियों के फ़ासले पर घर होने के बावजूद उनसे कभी मेरी भेंट न हो सकी। उन्होंने ‘धर्म समाज कॉलेज में पढ़ाया’, जहां मेरा विद्यार्थी जीवन बीता है। नीरज जी उस पीढ़ी के शिखर पुरुष थे। सातवीं कक्षा में पढ़ते हुए मामाजी के माध्यम से ‘कुरुक्षेत्र’ में उनसे मेरी भेंट हुई, तो उन्होंने मुझे गले लगा लिया, जो मुझ बालक को किसी महापुरुष द्वारा हृदय से लगा लेना लगा था। वह क्षण आज भी मेरी स्मृति में जीवंत है। नीरज जी केवल कवि नहीं थे, अपने संघर्ष, स्वाभिमान व सादगी में वे सृजन के एक जीवित मूल्य थे। उनकी स्मृति शब्दों के माध्यम से हमारे बीच जीवित है और रहेगी।

शायरा दीप्ति मिश्र ने बताया कि उनके पिता लखीमपुर में एग्जीक्यूटिव ऑफिसर के पद पर कार्यरत थे। वहां प्रतिवर्ष दशहरे के अवसर पर लगने वाले भव्य मेले में कवि-सम्मेलन भी होता था, जिसकी पूरी जिम्मेदारी पिताजी पर ही होती थी। वीरेंद्र अवस्थी, काका हाथरसी, गोपालदास नीरज जैसे बड़े कवि वहाँ आते थे। उस समय बहुत छोटी होने पर भी उन कवियों की उपस्थिति और उनके गीत अनायास ही मन को आकर्षित कर लेते थे। विशेष रूप से नीरजजी की रचनाएँ स्मृति में बस गई हैं। 1965 में आई फ़िल्म ‘नई उमर की नई फसल’ का गीत ‘कारवाँ गुजर गया’ ने मन पर गहरा प्रभाव डाला। फिर बाद के वर्षों में कई कार्यक्रमों में नीरज जी के साथ मंच साझा करते हुए लगता – जैसे किताबों से निकलकर कवि साक्षात सामने आ खड़े हुए हों। मंच पर उन्हें देखकर पहली बार यह अनुभव हुआ कि कवियों का व्यक्तित्व और कृतित्व कितना विशाल होता है। लेकिन जब उन्हें और निकट से देखा, तो कुछ भ्रांतियाँ भी टूटीं, कुछ आदर्श चरमराए, कुछ धारणाएँ बिखरीं। नीरज जी के साथ मंच साझा करना उनके लिए गर्व की बात थी, किंतु जिस आत्मीयता की अपेक्षा थी, वह नहीं बन पाई। उनसे बहुत कुछ सीखना चाहती थी, पर इसके लिए पूरा अवसर न मिल सका। उन दिनों को याद करते हुए यह प्रश्न बार-बार मन में उठता है – क्या किसी रचनाकार का व्यक्तित्व और कृतित्व कैसा होना चाहिए? निष्कर्ष स्पष्ट नहीं। कवयित्री ने नीरज की प्रसिद्ध कविता ‘कारवाँ गुजर गया’ प्रस्तुत भी की।

वरिष्ठ शायर राकेश शर्मा ने बीती यादों को खंगालते हुए बताया कि अपने आरंभिक दिनों में मथुरा के अनेक कवि-सम्मेलनों में नीरज जी को सुना था। उनकी उपस्थिति ही आयोजन की गरिमा बढ़ा देती थी। राकेशजी को यह एक विचित्र संयोग और अपना दुर्भाग्य लगता है कि उनके मुंबई आने के ठीक पहले नीरज जी मुंबई छोड़ चुके थे, जिससे वे उन्हें निकट से सुनने और समझने का अवसर खो बैठे। नीरज की भाषा और काव्य-शैली ने उन्हें गहरे प्रभावित किया। उनके लेखे नीरजजी की भाषा में शुद्ध हिंदी और गंगा-जमुनी तहज़ीब जो अद्भुत समन्वय था, जो विरले ही देखने को मिलता है। तभी तो राकेशजी अपनी ग़ज़लों पर नीरजजी के गहरे प्रभाव को खुले मन से स्वीकारते हैं।

क़वि एवं प्रकाशक रमन मिश्र ने बताया कि बचपन में ही ‘घरेलू लाइब्रेरी योजना’ के सदस्य बन गये थे, जहां नीरज जी की लगभग सभी पुस्तकें उपलब्ध थीं। तभी तो वे दसवीं कक्षा में पढ़ने तक ही नीरज जी को लगभग पूरा पढ़ चुके थे। नीरजजी को पढ़ना उनके लिए असाधारण अनुभव रहा। उनकी कविताएँ रमनजी को भीतर तक झकझोर देती थीं – “मैं विद्रोही हूँ, जग में विद्रोह कराने आया हूँ, क्रांति, क्रांति का सरल सुनहरा राग सुनाने आया हूँ” जैसी पंक्तियाँ मन में बस गई थीं, जिन्हें सुनाकर उन्होंने काव्य-पाठ की प्रतियोगिताओं में कई पुरस्कार भी जीते। रमनजी के अनुसार नीरजजी की भाषा सरल है, लेकिन उसमें गहराई बहुत है। वह लोक से जुड़ी है, फिर भी बौद्धिक गरिमा से भरपूर है। उसमें वही हिंदुस्तानी गंगा-जमुनी तहज़ीब दिखाई देती है, जिसकी कल्पना महात्मा गांधी और जवाहरलाल नेहरू ने की थी। नीरजजी के फिल्मी गीत केवल प्रेम तक सीमित नहीं रहे, बल्कि उनमें जीवन-मृत्यु, समय-नियति और मनुष्य की विवशता का गहरा दर्शन मिलता है। यही कारण है कि उनके गीत आज भी केवल सुने नहीं जाते, बल्कि महसूस किये जाते हैं। इसी सब से नीरजजी को मिश्रजी केवल कवि नहीं, संवेदनशील विचारक मानते हैं, जो शब्दों के माध्यम से मनुष्य के भीतर उतर जाते हैं।

नीरजजी को याद करते हुए शायर एवं निर्देशक कमर हाजीपुरी ने कहा – मैं नीरज जी से मिला हूँ। यह वाक्य आज भी मन में एक गहरी भावुकता भर देता है। उस दिन मैंने केवल एक कवि को नहीं जाना, बल्कि गोपालदास ‘नीरज’ नाम के मनुष्य को भी समझा। वे बहुत कम बोलने वाले, दिखावे से कोसों दूर और आत्मसंयमी व्यक्ति थे। उनके व्यक्तित्व की सादगी मन को छू गई। नीरजजी के व्यक्तित्व को समझने के लिए उनकी ये पंक्तियाँ ही पर्याप्त हैं- “ज़िंदगी की आँख में आँसू देखता रहा, हमनवा था बेवफ़ा, वह प्यार देखता रहा॰॰॰इसीलिए खड़ा-खड़ा गुबार देखता रहा।” वे केवल कवि नहीं थे, एक युग थे, जो आज भी शब्दों के माध्यम से जीवित है।

‘बतरस’ के संस्थापक प्रो. सत्यदेव त्रिपाठी ने नीरज की पंक्ति ‘जहाँ प्यार का चर्चा होगा, मेरा नाम लिया जाएगा’ की जानिब से उन्हें प्यार का अनोखा गीतकार बताते हुए उनकी लोकप्रियता की बावत कहा कि उन्होंने जनता की रुचि की कविता नहीं लिखी, बल्कि जनता को अपनी रुचि में ढाल लिया। त्रिपाठी जी ने कवि के फ़िल्म में जाने को वरदान भी बताया और अभिशाप भी, जिसके चलते वे अच्छा कवि होते हुए भी बड़ा कवि नहीं बन पाये। प्यार के सिवा नीरज जी तीसरे विश्व युद्ध से सावधान होने के साथ ही गणतंत्र के विरोधाभासों पर गहरे तंज भी किये – ‘अद्भुत इस गणतंत्र के अद्भुत हैं षडयंत्र। संत पड़े हैं जेल में, डाकू फिरें स्वतंत्र’। वक्ता ने खेद व्यक्त करते हुए कहा कि फ़िल्मों में जाना जहाँ उनकी ख्याति का सबब बना, वहीं उसने उन्हें साहित्य की मुख्य धारा से किनारे भी कर दिया!! ११वीं-१२वीं में एक कविता रख देने के सिवा शिक्षा जगत ने भी उन्हें कोई तवज्जो न दी। कवि अनिल गौड़ का आलेख प्रस्तुत किया डॉ जया दयाल ने।

गौड़जी के अनुसार नीरज जी ‘कारवां गुज़र गया’ की स्वरलहरी के साथ सामने आये। बच्चन जी की वैविध्य पूर्ण गीत रचना का उनपर गहरा प्रभाव था। उदाहरण के तौर पर बच्चन की ‘जो बीत गयी सो बात गयी’ कविता की छाया में ‘छुप छुप अश्रु बहाने वालों, मोती व्यर्थ लुटाने वालों’ गीत की रासायनिक प्रक्रिया को विश्लेषित किया जा सकता है। उनके फिल्मी गीत सहज स्वाभाविक कवि अभिव्यक्ति की अपेक्षा पात्रों और चरित्रों की काल्पनिक और संभावित अभिव्यक्ति-कौशल के प्रदर्शन हैं। ऐसे में धनार्जन की भयंकर प्रतियोगिता से बचकर कुछ ही वर्षों में नीरज जी पुनः हिंदी मंचों पर एक वरिष्ठ गीतकार के रूप में प्रतिष्ठित हो गये। हिंदी में किशोर भावुक भावनाओं को मंच पर स्वरित किया। उनकी गायन शैली विशिष्ट थी। उस शैली की एकतानता पंजाब की हीर गायन शैली के शोक व गाम्भीर्य और महाराष्ट्र की तरंगित लावनी शैली से मेल खाती है। उनके समकालीन कवियों रमानाथ अवस्थी, भारतभूषण अग्रवाल और किशन सरोज आदि का गीत-वैभव अधिक प्रफुल्ल है, लेकिन गेयता के चलते जो सफलता नीरजजी को मिली, वह अन्य के हिस्से में नहीं आई। नीरज जी ने अनेक ग़ज़लें भी लिखी हैं, जो उतनी ही अच्छी साबित हुई जैसे उनके गीत। उन्होंने दोहे भी लिखे और उनका एक प्रसिद्ध दोहा कवियों के कुंठित अहम को मरहम लगाने के कारण बहुत चर्चित हुआ – ‘आत्मा के सौंदर्य का, शब्द रूप है काव्य। मानव जीवन भाग्य है, कवि होना सौभाग्य’।।

वरिष्ठ कवि एवं मंच संचालक देवमणि पाण्डेय ने कहा कि ‘ नीरज’ की आवाज़ में जादू था। अंदाज़ में आकर्षण था। गीतों में कशिश थी। व्यक्तित्व सुदर्शन था जिन सबसे वे मंच पर छा जाते। उनकी लोकप्रियता की ख़ुशबू बॉलीवुड तक पहुंच गई और नीरजजी को अपनी गीतों का हुनर दिखाने का आमंत्रण मिला, तो नीरज यहां भी छा गये। फ़िल्म ‘नई उमर की नई फ़सल’ में उनके गीत ‘कारवाँ गुज़र गया, ग़ुबार देखते रहे’ ने धूम मचा दी। फ़िल्म ‘चंदा और बिजली’ के गीत ‘काल का पहिया घूमे भैया’ के लिए गीतकार नीरज को ‘फ़िल्म फेयर’ सम्मान से विभूषित किया गया। ‘प्रेम पुजारी’ और ‘मेरा नाम जोकर’ जैसी फ़िल्मों में कालजयी गीत लिखने वाले नीरज ने सिर्फ़ बारह साल में सिने जगत को अलविदा कह दिया।

एक मुलाक़ात में मैंने उनसे घर वापसी के बारे में पूछा, तो बोले – ‘मुंबई की ज़िंदगी में जो भागदौड़ है, वह मुझे पसंद नहीं आई। मुझे अधिक पैसा कमाने की चाह भी नहीं है। मेरा मन यायावर प्रवृत्ति का है। मैं किसी एक जगह पर अधिक दिन तक टिक नहीं सकता”। नीरजजी ने स्वयं कहा है -‘मैं अपनी कविता द्वारा मनुष्य बनकर मनुष्य तक पहुँचना चाहता हूँ। रास्ते पर कहीं मेरी कविता भटक न जाये, इसलिए उसके हाथ में मैंने प्रेम का दीपक दे दिया है। प्रेम एक ऐसी हृदय-साधना है जो निरंतर हमारी विकृतियों का शमन करती हुई हमें मनुष्यता के निकट ले जाती है – ‘नीरज से बढ़के धनी और कौन है यहाँ, उसके हृदय में पीर है सारे जहान की’।

देवमणिजी ने कहा कि नीरज के काव्य में मिलन के मधुर क्षण कम हैं, विरह की टीस और जुदाई की तड़प ज्य़ादा है। दुख और उदासी की ऐसी मार्मिक स्थितियों की अभिव्यक्ति के लिए वह जो प्रतीक चुनते हैं, वे हमेशा लौकिक जगत के ख़ूबसूरत एहसास से ताल्लुक़ रखते हैं। बच्चन की परंपरा में नीरज एकमात्र ऐसे कवि हैं, जिसमें साहित्यिक गुणवत्ता और मंचीय कौशल एक साथ मौजूद हैं। लगातार सात दशकों तक हिंदी काव्य मंच पर कामयाब पारी खेलने का कीर्तिमान सिर्फ़ नीरज के पास है। उन्होंने कहा था – ‘नासमझ आदमी की ताली कविता को बरबाद कर देती है’ और हिंदी काव्य मंच के साथ भी यही हुआ। कवि सम्मेलन घटियापन के शिकार हो गये। लेकिन अपने चाहने वालों के लिए नीरज को घटिया मंचों पर भी जाना पड़ा। मगर कभी उन्होंने घटियापन का साथ नहीं दिया। उन्होंने हमेशा अपना स्तर बनाए रखा। यह सच है कि कवि सम्मेलनों का कवि प्रसाद और निराला नहीं बन सकता, क्योंकि कवि सम्मेलनों में ‘कामायनी’ नहीं; ‘मधुशाला’ सुनी जाती है।

जिस तरह साहिर और शैलेंद्र के योगदान को महज़ फ़िल्मी गीत कहकर नकारा नहीं जा सकता, उसी तरह मंचीयता के बावजूद नीरजजी के साहित्यिक अवदान को अनदेखा नहीं किया जा सकता। इनके साहित्य में मीरा का दर्द है, सूर की प्यास है, तुलसी की विन्रमता है और कबीर का फक्कड़न भी है। नीरज ने बौद्धिकता का मायाजाल न रचकर भावनाओं की उदात्त धारा प्रवाहित की, जिसने लोगों के मन को पवित्रता, शीतलता और ताज़गी से भर दिया। डॉ॰ मधुबाला शुक्ल ने – ‘लिखि लिखि भेजत पाती’ पुस्तक से कुछ चुनिंदा पत्र पढ़े। बहुत कम लोगों को मालूम है कि किसी अनजान महिला ने नीरज जी को बड़े भावपूर्ण पत्र लिखे थे, जिन्हें क़वि ने संकलन रूप में छपा दिया है।

गायक दीपक खेर ने ‘प्रेम पुजारी’ फ़िल्म का गीत – ‘फूलों के रंग से दिल की कलम से’ एवं जया दयाल ने भी इसी फ़िल्म से ‘रंगीला रे तेरे रंग में यूं रंगी मैं’ को उसी सलीके से गाया। कवि नीरज नीर ने सुनायी – नीरजजी की गज़ल – ‘जितना कम सामान रहेगा, उतना सफर आसान रहेगा’ प्रस्तुत की।

इस कार्यक्रम का आयोजन किया था – हिंदी के सुपरिचित कवि-गीतकार रासबिहारी पांडेय ने और उन्होंने ही नीरज से संबंधित अनेक रोचक प्रसंग सुनाते-सुनाते और कवि व उसकी कविताई की कई-कई विरल ख़ासियतें बताते-बताते कार्यक्रम का मानीखेज संचालन भी किया। इस अवसर पर विशेष रूप से डॉ राजेंद्र रावत; रंगकर्मी विजय कुमार, अभिनेता प्रमोद सचान, अंबिका झा व विजय पंडित आदि साहित्य-संस्कृति कर्मी उपस्थित थे। कार्यकम का समापन राष्ट्रगान के साथ हुआ।

(लेखिका हिंदी की प्राध्यापक हैं और मुंबई की साहित्यिक गतिविधियों पर निरंतर लेखन करती है)

माखनलाल जी ने देखा था पत्रकारिता विश्वविद्यालय का सपना

पुण्यतिथि (30 जनवरी) पर विशेष

जनसंचार और पत्रकारिता की शिक्षा आज एक विशिष्ट अनुशासन बन चुकी है। देश में पत्रकारिता और जनसंचार शिक्षा पर केंद्रित चार विश्वविद्यालय कार्यरत हैं, लेकिन हमें यह जानना चाहिए कि पं. माखनलाल चतुर्वेदी ने ही सबसे पहले पत्रकारिता विद्यापीठ (विश्वविद्यालय) का सपना देखा था। उन्होंने भरतपुर(राजस्थान) में 1927 में आयोजित संपादक सम्मेलन में कहा था-“हिंदी समाचार पत्रों में कार्यालय में योग्य व्यक्तियों के प्रवेश कराने के लिए, एक पाठशाला आजकल के नए नामों की बाढ़ में से कोई शब्द चुनिए तो कहिए कि एक संपादन कला के विद्यापीठ की आवश्यक्ता है। ऐसी विद्यापीठ किसी योग्य स्थान पर बुद्धिमान, परिश्रमी, अनुभवी, संपादक-शिक्षकों द्वारा संचालित होना चाहिए। उक्त पीठ में अन्यान्य विषयों का एक प्रकांड ग्रंथ संग्रहालय होना चाहिए।” यह संयोग ही है कि उनके इस स्वप्न को 1990 में मध्यप्रदेश सरकार ने साकार करते हुए उनके नाम पर ही भोपाल में पत्रकारिता विश्वविद्यालय की स्थापना की। बाद के दिनों में रायपुर में कुशाभाऊ ठाकरे पत्रकारिता एवं जनसंचार विश्वविद्यालय और जयपुर में हरिदेव जोशी पत्रकारिता विश्वविद्यालय की स्थापना हुई। इसके साथ ही दो साल पूर्व भारतीय जन संचार संस्थान (आईआईएमसी) को भी डीम्ड यूनिवर्सिटी का दर्जा मिल चुका है। यह बात बताती है कि हमारे पुरखे किस तरह अपनी विधा को अकादमिक रुप से स्थापित होते देखना चाहते थे।

माखनलाल जी का व्यक्तित्व बहुआयामी था। वे कवि, लेखक, पत्रकार, संपादक, स्वतंत्रता सेनानी अनेक भूमिकाओं में सामने आते हैं। वे अप्रतिम वक्ता भी थे। इसलिए राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने उनके बारे में कहा-“हम सब लोग तो बात करते हैं, बोलना (भाषण) तो माखनलाल जी ही जानते हैं।” इतना ही नहीं राष्ट्रपिता ने कहा- “मैं बाबई जैसे छोटे स्थान पर इसलिए जा रहा हूं क्योंकि वह माखनलालजी का जन्मस्थान है। जिस भूमि ने माखनलालजी को जन्म दिया, उसी भूमि को मैं सम्मान देना चाहता हूं।” यह संयोग ही है कि राष्ट्रपिता महात्मा गांधी और माखनलाल जी पुण्यतिथि एक ही दिन 30 जनवरी को मनाई जाती है। चर्चित शायर श्री फिराक गोरखपुरी भी माखनलाल जी कलम के प्रशंसक थे। उनका कहना था कि-“उनके लेखों को पढ़ने से ऐसा मालूम होता था कि आदि-शक्ति शब्दों के रूप में अवतरित हो रही है या गंगा स्वर्ग से उतर रही है। यह शैली हिंदी में ही नहीं, भारत की दूसरी भाषाओं में भी विरले ही लोगों को नसीब हुई है। मुझ जैसे हजारों लोंगो ने अपनी भाषा और लिखने की कला माखनलाल जी से ही सीखी।”

पं.माखनलाल चतुर्वेदी के संपादन में निकला ‘कर्मवीर’ एक ऐसा पत्र है, जिसकी धमक हम आज भी महसूस करते हैं। हिंदी पत्रकारिता के क्षेत्र में ‘कर्मवीर’ एक ऐसा नाम है, जिसे छोड़कर भारतीय पत्रकारिता का समग्र मूल्यांकन नहीं किया जा सकता। इसी तरह उसके संपादक पं. माखनलाल चतुर्वेदी और उनकी संपूर्ण जीवनयात्रा, आत्मसमर्पण के खिलाफ लड़ने वाले संपादक की यात्रा है। वस्तुतः वे एक साथ कई मोर्चों पर लड़ रहे थे और कोई मोर्चा ऐसा न था, जहां उन्होंने अपनी छाप न छोड़ी हो। सही मायने में ‘कर्मवीर’ के संपादक ने अपने पत्र के नाम को सार्थक किया और माखनलाल जी स्वयं कर्मवीर बन गए। 4 अप्रैल, 1889 को होशंगाबाद(मप्र) के बाबई जिले में जन्में माखनलालजी ने जब पत्रकारिता शुरू की तो सारे देश में राष्ट्रीय आंदोलन का प्रभाव देखा जा रहा था। राष्ट्रीयता एवं समाज सुधार की चर्चाएं और फिरंगियों को देश बदर करने की भावनाएं बलवती थीं। इसी के साथ महात्मा गांधी जैसी तेजस्वी विभूति के आगमन ने सारे आंदोलन को एक नई ऊर्जा से भर दिया। दादा माखनलाल जी भी उन्हीं गांधी भक्तों की टोली में शामिल हो गए। गांधी के जीवन दर्शन से अनुप्राणित दादा ने रचना और कर्म के स्तर पर जिस तेजी के साथ राष्ट्रीय आंदोलन को ऊर्जा एवं गति दी वह महत्व का विषय है।

इस दौर की पत्रकारिता भी कमोबेश गांधी के विचारों से खासी प्रभावित थी। हिंदी पत्रकारिता का वह जमाना ही अजीब था। आम कहावत थी – “जब तोप मुकाबिल हो तो अखबार निकालो।” और सच में अखबार की ताकत का अहसास आजादी के दीवानों को हो गया था। इसी के चलते स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़े नेताओं ने अपने पत्र निकाले। जिनके माध्यम से ऐसी जनचेतना पैदा की कि भारत आजादी की सांस ले सका। वस्तुतः इस दौर में अखबारों का इस्तेमाल एक अस्त्र के रूप में हो रहा था।

माखनलाल जी ने 1913 में ‘प्रभा’ नाम की एक उच्चकोटि की पत्रिका के माध्यम से साहित्यिक पत्रकारिता में भी सार्थक हस्तक्षेप किया। लोगों को झकझोरने एवं जगानेवाली रचनाओं के प्रकाशन के माध्यम से ‘प्रभा’ हिंदी जगत का एक जरूरी नाम बन गयी। दादा की 56 सालों की ओजपूर्ण पत्रकारिता की यात्रा में प्रताप, प्रभा व कर्मवीर उनके विभिन्न पड़ाव रहे। साथ ही उनकी राजनीतिक वरीयता भी बहुत उंची थी। वे बड़े कवि थे, पत्रकार थे पर उनके इन रूपों पर राजनीति कभी हावी न हो पायी। इतना ही नहीं जब प्राथमिकताओं की बात आयी तो मप्र कांग्रेस का वरिष्टतम नेता होने के बावजूद उन्होंने सत्ता में पद लेने के बजाए मां सरस्वती की साधना को ही प्राथमिकता दी। आजादी के बाद 30 अप्रैल, 1968 तक वे जीवित रहे पर सत्ता का लोभ उन्हें स्पर्श भी नहीं कर पाया। इतना ही नहीं 1967 में भारतीय संसद द्वारा राजभाषा विधेयक पारित होने के बाद उन्होंने राष्ट्रपति को वह पद्मभूषण का अलंकरण भी लौटा दिया जो उन्हें 1963 में दिया गया था। वे समझौतों के खिलाफ लोगों में चेतना जगाते रहे। उन्होंने लिखा है-
अमर राष्ट्र, उदंड राष्ट्र, उन्मुक्त राष्ट्र, यह मेरी बोली
यह सुधार-समझौतों वाली मुझको भाती नहीं ठिठोली।

‘कर्मवीर’ के संपादक कैसे संपादक थे, इसे बताने के लिए उन्होंने कहा कि – “हम फक्कड़ सपनों के स्वर्गों को लुटाने निकले हैं। किसी की फरमाइश पर जूते बनानेवाले चर्मकार नहीं हैं हम ।” यह निर्भीकता ही उनकी पत्रकारिता की भावभूमि का निर्माण करती थी। स्वाधीनता आंदोलन की आँच को तेज करने में उनका कर्मवीर अग्रणी बना। कम ही लोग जानते होंगें कि दादा को इसकी कितनी बड़ी कीमत चुकानी पड़ी। उनके संपादकीय कार्यालय यानी घर पर तिरसठ बार छापे पड़े, तलाशियां हुयीं। 12 बार वे जेल गए। कर्मवीर को अर्थाभाव में कई बार बंद होना पड़ा। लेखक से लेकर प्रूफ रीडर तक सबका कार्य वे स्वयं कर लेते थे। पत्रकारिता उनके लिए राष्ट्रसेवा और समाज के जागरण का ही एक माध्यम थी। भरतपुर के संपादक सम्मेलन में वे पत्रकारिता जगत का आह्वान करते हुए कहते हैं-“यदि समाचार पत्र संसार की एक बड़ी ताकत है तो उसके सिर जोखिम भी कम नहीं है। पर्वत की जो शिखरें हिम से चमकती हैं और राष्ट्रीय रक्षा की महान दीवार बनती हैं, उन्हें ऊंची होना पड़ता है। जगत में समाचार पत्र यदि बड़प्पन पाए हुए हैं, तो उनकी जिम्मेदारी भी भारी है।बिना जिम्मेदारी के बड़प्पन का मूल्य ही क्या है? ”

(लेखक माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, भोपाल में जनसंचार विभाग के अध्यक्ष हैं।)

उज्जैन के प्रख्यात आध्यात्मिक गुरु श्री प्रमोद कुमार शर्मा को डी.लिट प्रदान की

पुणे। पुणे के अजिंक्य डी. वाय. पाटिल विश्वविद्यालय के दसवें दीक्षांत समारोह के अवसर पर उज्जैन के प्रख्यात आध्यात्मिक मार्गदर्शक गुरुजी श्री प्रमोद कुमार शर्मा को प्रतिष्ठित डॉक्टरेट ऑफ लिटरेचर (डी.लिट.) – डी.लिट. (ऑनोरिस कॉज़ा) से सम्मानित किया गया। यह सम्मान उन्हें उनकी आध्यात्मिक साधना, मार्गदर्शन और निःस्वार्थ सेवाओं के लिए प्रदान किया गया, जो वे अपनी दृष्टि-शक्ति और दिव्य अंतर्दृष्टि के माध्यम से निरंतर देते आ रहे हैं। उनके मार्गदर्शन से अनेक वैज्ञानिकों, चिकित्सा विशेषज्ञों और शोधकर्ताओं को अपने-अपने क्षेत्रों में श्रेष्ठ मार्ग चुनने और बेहतर परिणाम प्राप्त करने में सहायता मिली है। वे जरूरतमंद और वंचित वर्गों की समय पर आर्थिक व अन्य प्रकार की सहायता के लिए भी व्यापक रूप से जाने जाते हैं।

दीक्षांत समारोह के दौरान जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में उत्कृष्ट योगदान, उपलब्धियों और समाजसेवा के लिए अन्य विशिष्ट व्यक्तित्वों को भी मानद उपाधियों से सम्मानित किया गया।

अन्य सम्मानित व्यक्तित्वों में शामिल थे: श्रीमती पंकजा गोपीनाथ मुंडे, प्रसिद्ध जननेता, भारत सरकार की पूर्व कैबिनेट मंत्री एवं महाराष्ट्र की पूर्व उपमुख्यमंत्री, जिन्हें कृषि एवं पशुपालन के क्षेत्र में उनके योगदान के लिए सम्मानित किया गया। अपने धन्यवाद भाषण में उन्होंने विद्यार्थियों को जोखिम लेने और असफलताओं से न डरने की प्रेरणा दी, यह कहते हुए कि सफलता और असफलता जीवन के अभिन्न अंग हैं और दोनों को समान भाव से स्वीकार करना चाहिए।

श्री रोहित शर्मा, विश्व कप विजेता भारतीय क्रिकेट टीम के कप्तान, जिन्हें क्रिकेट के क्षेत्र में उनके योगदान के लिए सम्मानित किया गया। उन्होंने विद्यार्थियों को अनुशासित और परिश्रमी बनने का संदेश दिया, यह बताते हुए कि ये दोनों सिद्धांत शिक्षा और खेल, दोनों में समान रूप से लागू होते हैं।

श्री मनोज पोचाट, गोल्डियम इंटरनेशनल लिमिटेड के एग्जीक्यूटिव चेयरमैन, जो देश में बड़े पैमाने पर रोजगार सृजन के मिशन पर कार्य कर रहे हैं।

श्री सुधेश अग्रवाल, गुरुग्राम में 5 अरब रुपये के निवेश से विकसित हो रहे सनातन धर्म सिटी के संस्थापक।

डॉ. निशिकांत ओझा, भारत सरकार के एकीकृत रक्षा स्टाफ के चीफ एडवाइज़र–स्ट्रैटेजिक अफेयर्स एवं स्टडी ग्रुप के चेयरमैन। अपने प्रभावशाली संबोधन में उन्होंने विद्यार्थियों को चेतावनी दी कि डिग्री को यात्रा का अंत न मानें, बल्कि इसे उस कठोर प्रतिस्पर्धात्मक दुनिया में प्रवेश का नया चरण समझें, जहां यदि आप चूक गए तो कोई और अवसर छीन लेगा।
श्री रशीस भंडारी, हीरा निर्यात के प्रतिष्ठित व्यवसायी और नवीन तकनीक से मानव-निर्मित हीरों की निर्माण इकाई स्थापित करने वाले अग्रणी उद्यमी।

समारोह के मुख्य अतिथि गुयाना सहकारी गणराज्य के उच्चायुक्त महामहिम धीरजकुमार सीरज थे। कार्यक्रम की अध्यक्षता विश्वविद्यालय के चांसलर डॉ. अजींक्य डी. वाय. पाटिल ने की तथा मंच पर श्रीमती पूजा ए. पाटिल की गरिमामयी उपस्थिति रही।

सभी सम्मानित अतिथियों ने चांसलर और अजिंक्य डी. वाय. पाटिल विश्वविद्यालय की टीम को ऐसी संस्था स्थापित करने के लिए धन्यवाद दिया, जिसका उद्देश्य छात्रों को प्रतिस्पर्धात्मक दुनिया का सामना करने योग्य बनाना है। उन्होंने विद्यार्थियों को नवोन्मेषी और परिश्रमी बनने के साथ-साथ मानवता की सेवा के लिए भी सदैव तत्पर रहने की प्रेरणा दी।

मुख्य अतिथि महामहिम श्री सीरज ने अपने संबोधन में अपने देश गुयाना की विशेषताओं पर प्रकाश डाला और भारतीयों को निवेश एवं पर्यटन दोनों उद्देश्यों से वहां आने का आमंत्रण दिया।
चांसलर डॉ. अजींक्य डी. वाय. पाटिल ने अपने वक्तव्य में विश्वविद्यालय की उस दूरदृष्टि को पुनः रेखांकित किया, जिसके अंतर्गत छात्रों को यह समझाया जाता है कि डिग्री प्राप्त करने के साथ-साथ उन्हें देश को एक वैश्विक शक्ति बनाने में भी योगदान देना है। उन्होंने बताया कि विश्वविद्यालय व्यावहारिक शिक्षा के लिए नवीनतम तकनीकों और उपकरणों को लाने की व्यापक योजना बना रहा है।

कुलपति डॉ. राकेश कुमार जैन ने कहा कि नवाचार विश्वविद्यालय की पहचान का अभिन्न हिस्सा है और यहां छात्रों को स्वतंत्र रूप से सोचने तथा नए विचार सृजित करने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है।

इस भव्य दीक्षांत समारोह का संचालन प्रसिद्ध अभिनेत्री सुश्री विद्या मालवड़े, जो फिल्म चक दे इंडिया में अपनी भूमिका के लिए जानी जाती हैं, द्वारा किया गया।

हाथ में सत्ता है राजन ! पूर्व को पश्चिम बताओ !

सूर्य पर चादर चढ़ाओ, जुगनुओं के गीत गाओ
हाथ में सत्ता है राजन ! पूर्व को पश्चिम बताओ !
मदमस्त हाथी अंकुशों से क्या कभी डरता मिला है ?
धृतराष्ट्र के चौपट महल में न्याय का पंखा झिला है ?
सागरों पर बाँध डालो, रेत के टीले बनाओ
हाथ में सत्ता है राजन ! पूर्व को पश्चिम बताओ !
प्रत्येक सुंदर पुष्प को अपराध का युगबोध देना
आरक्षितों की आड़ में संरक्षितो के प्राण लेना
नागफनी से घर सजाओ, तुलसियों को काट खाओ
हाथ में सत्ता है राजन ! पूर्व को पश्चिम बताओ !
न्यायसंगत है नहीं प्रस्ताव लेकिन क्या करें हम
आपके होकर जिए हैं, इसलिए पहले मरे हम ?
वोट इनके कम पड़े थे ? जाओ अब इनको रिझाओ!
हाथ में सत्ता है राजन ! पूर्व को पश्चिम बताओ !

साभार- https://www.facebook.com/share/18dKKriQWC/  से

सोनू त्यागी ने कहा, “सफलता कई बार लक बाय चांस होती है”

मुंबई: सोनू त्यागी हैश ब्राउन कन्वर्सेशन्स में पॉडकास्ट होस्ट निहारिका पांडे के साथ अपनी 56 मिनट की बेबाक बातचीत को लेकर चर्चा में हैं। यह पूरा एपिसोड अब लाइव हो चुका है और इसे वर्ष 2026 की अब तक की सबसे ईमानदार, निडर और सच्चाई सामने रखने वाली इंडस्ट्री बातचीत माना जा रहा है।

अवॉर्ड प्राप्त लेखक, निर्देशक, निर्माता और एप्रोच एंटरटेनमेंट ग्रुप तथा गो स्पिरिचुअल के संस्थापक सोनू त्यागी ने इस संवाद में बॉलीवुड, एंटरटेनमेंट कारोबार, विज्ञापन, जनसंपर्क, मीडिया, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और अध्यात्म जैसे विषयों पर खुलकर और साफ शब्दों में अपनी बात रखी है।

https://www.youtube.com/watch?v=V5-n1TmnEMc

 

बातचीत की शुरुआत में ही सोनू त्यागी एक कड़वी लेकिन सच्ची हकीकत सामने रखते हैं। वे कहते हैं,
“यह लक बाय चांस है। पूरी फिल्म इंडस्ट्री केवल टैलेंट पर नहीं चलती। ज़्यादातर मामलों में सफलता किस्मत और मौके पर निर्भर करती है। कई बार ऐसे लोग भी आगे बढ़ जाते हैं जिनमें खास प्रतिभा नहीं होती।”
उनका यह बयान फिल्म इंडस्ट्री में सफलता को लेकर बनी आम धारणाओं को चुनौती देता है।

इस बातचीत में सोनू त्यागी बताते हैं कि केवल मेहनत और प्रतिभा से ही हमेशा सफलता नहीं मिलती। उनके अनुसार इंडस्ट्री में सही समय, सही संपर्क और सही मौका कई बार टैलेंट से ज़्यादा अहम हो जाता है, जबकि सच्चे और मेहनती कलाकार वर्षों तक संघर्ष करते रहते हैं। वे मानते हैं कि इस सच्चाई को समझना नए कलाकारों के लिए ज़रूरी है, ताकि वे भ्रम में न रहें और मानसिक रूप से मजबूत बन सकें।

विज्ञापन, जनसंपर्क और मीडिया इंडस्ट्री पर बात करते हुए सोनू त्यागी मौजूदा व्यवस्था की खामियों पर भी रोशनी डालते हैं। वे कहते हैं कि पेड खबरें, फर्जी प्रचार और दिखावटी ब्रांडिंग ने मीडिया की विश्वसनीयता को गंभीर नुकसान पहुँचाया है। उनका मानना है कि ईमानदारी केवल एक नैतिक गुण नहीं, बल्कि लंबे समय तक टिके रहने की सबसे मजबूत नींव है।

सोनू त्यागी के शब्दों में,
“ईमानदारी जीवन में बहुत मूल्यवान है। अगर हम मानवता और अध्यात्म की बात करें और केवल पैसा कमाने के लिए कुछ भी करने लगें, तो वह सही नहीं है।”

वे एजेंसियों और ब्रांड्स को यह सलाह भी देते हैं कि दिखावे और शॉर्टकट की जगह सच्चे मीडिया संबंधों, भरोसेमंद पहचान और वास्तविक डिजिटल रणनीतियों पर ध्यान देना चाहिए, खासकर युवा पीढ़ी के लिए, जो सच्चाई और पारदर्शिता को ज्यादा महत्व देती है।

आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस पर चर्चा करते हुए सोनू त्यागी भविष्य की एक गंभीर तस्वीर पेश करते हैं। उनका मानना है कि आने वाले पाँच से दस वर्षों में यह तकनीक संगीत निर्माण, आवाज़ रिकॉर्डिंग, कलाकार चयन, पटकथा में सहायता, विज्ञापन की रचनात्मक प्रक्रिया और प्रोडक्शन के कई हिस्सों को अपने हाथ में ले लेगी। वे कहते हैं कि इससे रचनात्मक क्षेत्र में नौकरियां कम हो सकती हैं, हालांकि इंसानी संवेदनशीलता और सोच की भूमिका पूरी तरह खत्म नहीं होगी।

इस पूरी बातचीत का सबसे भावनात्मक और गहरा पहलू अध्यात्म है। सोनू त्यागी मानते हैं कि आज के अत्यधिक तनाव और प्रतिस्पर्धा वाले दौर में अध्यात्म ही इंसान को संतुलन और शांति देता है। वे कहते हैं,
“अगर आप आध्यात्मिक हैं, तो आप सच्चे इंसान हैं। अगर आपमें मानवता है, तो आप आध्यात्मिक हैं। अध्यात्म और मानवता एक ही सिक्के के दो पहलू हैं।”

वे बताते हैं कि धर्म, करुणा, अहिंसा और नैतिक जीवन जैसे मूल्य उनके निजी और पेशेवर जीवन की दिशा तय करते हैं।

सोनू त्यागी इस पॉडकास्ट में गो स्पिरिचुअल की शुरुआत की कहानी भी साझा करते हैं। वे बताते हैं कि वर्ष 2010 में इस विचार की नींव रखी गई थी और 2017 में इसे औपचारिक रूप से शुरू किया गया। गो स्पिरिचुअल का उद्देश्य भारतीय अध्यात्म और सार्वभौमिक मानवीय मूल्यों को केवल बातों तक सीमित न रखकर व्यवहार में उतारना है।

आने वाले समय में गो स्पिरिचुअल न्यूज़ मैगज़ीन और ऐप के माध्यम से सकारात्मक, सच्ची और मूल्य आधारित पत्रकारिता को बढ़ावा दिया जाएगा, जबकि गो स्पिरिचुअल वेब टीवी और ओटीटी मंच प्रेरणादायक और जीवन को बेहतर बनाने वाले कार्यक्रमों पर केंद्रित होगा।

कामकाज की बात करें तो सोनू त्यागी इस समय आध्यात्मिक वेब सीरीज़ ‘टू ग्रेट मास्टर्स’ के सह-निर्माता हैं, युवा पीढ़ी को ध्यान में रखकर बनी फिल्म ‘लिबरेशन’ से जुड़े हैं और व्यंग्यात्मक हास्य फिल्म ‘कैंप डिसेंट’ में रचनात्मक निर्माता की भूमिका निभा रहे हैं, जिसमें बृजेंद्र काला, राजपाल यादव, सारा खान और हेमंत पांडे जैसे कलाकार नजर आएंगे।

यह एपिसोड खास तौर पर फिल्म निर्माताओं, विज्ञापन और जनसंपर्क पेशेवरों, मीडिया और ब्रांड रणनीतिकारों, डिजिटल क्षेत्र से जुड़े लोगों और युवाओं के लिए बेहद महत्वपूर्ण है, जो आज के दौर में सफलता, नैतिकता, मानसिक स्वास्थ्य और जीवन के उद्देश्य के बीच संतुलन तलाश रहे हैं।

सोनू त्यागी ने मनोविज्ञान में स्नातक और पत्रकारिता, विज्ञापन प्रबंधन तथा फिल्म निर्माण में स्नातकोत्तर शिक्षा प्राप्त की है। उन्होंने प्रमुख विज्ञापन एजेंसियों और मीडिया संस्थानों में काम करने के बाद मात्र 24 वर्ष की उम्र में अपने उद्यमों की शुरुआत की। वे अब तक 40 से अधिक बॉलीवुड फिल्मों में निर्माण, प्रचार, लेखन, निर्देशन और रचनात्मक सलाहकार के रूप में जुड़े रहे हैं।

एप्रोच एंटरटेनमेंट ग्रुप को द बिज़ इंडिया अवॉर्ड, सेवा उत्कृष्टता पुरस्कार, वर्ष की सर्वश्रेष्ठ जनसंपर्क एजेंसी और युवा रत्न सम्मान जैसे कई प्रतिष्ठित पुरस्कार मिल चुके हैं।

एप्रोच एंटरटेनमेंट ग्रुप एक पुरस्कार प्राप्त पूर्ण सेवा एंटरटेनमेंट कंपनी है, जो सेलिब्रिटी प्रबंधन, फिल्म और वेब सीरीज़ निर्माण, विज्ञापन और कॉरपोरेट फिल्में, फिल्म प्रचार और आयोजनों के क्षेत्र में सक्रिय है। इसकी जनसंपर्क इकाई एप्रोच कम्युनिकेशंस एक प्रतिष्ठित इंटीग्रेटेड कम्युनिकेशन एजेंसी है, जबकि एप्रोच बॉलीवुड समूह का समर्पित बॉलीवुड और एंटरटेनमेंट समाचार पोर्टल और ऐप है।

गो स्पिरिचुअल एक आध्यात्मिक और वेलनेस संगठन है, जो आध्यात्मिक जागरूकता, मानसिक स्वास्थ्य, नैतिक जीवन, परोपकार, आध्यात्मिक पर्यटन, गो वेज अभियान, राहत कार्य और समाज में समग्र संतुलन को बढ़ावा देने के लिए लगातार कार्य कर रहा है।

भारत की चिकित्सा विरासत की पड़ताल

ताड़ के पत्तों से शोध ग्रंथ तक: सीसीआरएएस-सीएसयू की पहल से दुर्लभ आयुर्वेदिक पांडुलिपियों को अनुसंधान के लिए तैयार किया गया

भारत की शास्त्रीय चिकित्सा विरासत के संरक्षण और संवर्धन की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम उठाते हुए, भारत सरकार के आयुष मंत्रालय के तहत केंद्रीय आयुर्वेदिक विज्ञान अनुसंधान परिषद (सीसीआरएएस) ने नई दिल्ली स्थित केंद्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय (सीएसयू) के सहयोग से 12 से 25 जनवरी, 2026 तक केरल के त्रिशूर स्थित सीएसयू पुरनट्टुकरा (गुरुवायूर) परिसर में आयुर्वेदिक पांडुलिपियों पर 15 दिवसीय लिप्यंतरण क्षमता निर्माण कार्यशाला का सफलतापूर्वक आयोजन किया।

दो सप्ताह के आवासीय कार्यक्रम में आयुर्वेद के 18 और संस्कृत के 15 अध्‍येताओं सहित 33 अध्‍येता एक साथ आए, जिससे पांडुलिपि अध्ययन के लिए एक अंतःविषय दृष्टिकोण को बढ़ावा मिला।

सीसीआरएएस और सीएसयू के बीच हुए समझौता ज्ञापन के तहत आयोजित यह कार्यशाला, शास्त्रीय आयुर्वेदिक पांडुलिपियों के दस्तावेजीकरण, डिजिटलीकरण और शोध-आधारित इस्‍तेमाल के लिए सीसीआरएएस की राष्ट्रीय पहल का हिस्सा थी। दो सप्ताह के इस आवासीय कार्यक्रम में आयुर्वेद के 18 और संस्कृत के 15 अध्‍येताओं सहित 33 अध्‍येताओं ने भाग लिया, जिससे पांडुलिपि के अध्ययन के लिए एक अंतःविषयक दृष्टिकोण को बढ़ावा मिला।

इस प्रशिक्षण कार्यक्रम में पांडुलिपि विज्ञान, पुरालेख विज्ञान, आयुर्वेद की तकनीकी शब्दावली और लिपि ज्ञान जैसे प्रमुख क्षेत्रों को शामिल किया गया, साथ ही ग्रंथा और वट्टेझुथु लिपियों पर विशेष लिपि परिचय सत्र भी आयोजित किए गए। ग्रंथा, मध्यकालीन मलयालम और वट्टेझुथु लिपियों में व्यावहारिक लिप्यंतरण प्रशिक्षण पर विशेष बल दिया गया, जिससे प्रतिभागियों को मूल ताड़ के पत्तों की पांडुलिपियों पर सीधे काम करने और कम समय में सत्यापन योग्य विद्वतापूर्ण परिणाम तैयार करने में मदद मिली।

कार्यशाला के एक महत्वपूर्ण विद्वतापूर्ण परिणाम के रूप में, आयुर्वेद की पांच दुर्लभ और अप्रकाशित पांडुलिपियों का सफलतापूर्वक लिप्यंतरण किया गया है और अब ये उन्नत शोध के लिए उपलब्ध हैं। इनमें 146 ताड़ के पत्तों पर लिखी धन्वंतरि (वैद्य) चिंतामणि शामिल है, जिसका ग्रंथा से संस्कृत में लिप्यंतरण किया गया है; 110 पृष्ठों की ग्रंथा पांडुलिपि द्रव्यशुद्धि, जिसका संस्कृत में लिप्यंतरण किया गया है; 59 पृष्ठों की मध्यकालीन मलयालम पांडुलिपि वैद्यम, जिसका मलयालम में लिप्यंतरण किया गया है; 75 पृष्ठों की रोग निर्णय, भाग-I, जिसका मध्यकालीन मलयालम से मलयालम में लिप्यंतरण किया गया है; और 78 ताड़ के पत्तों पर लिखी वट्टेझुथु पांडुलिपि विविधारोगंगल, जिसका मलयालम और संस्कृत दोनों में लिप्यंतरण किया गया है।

कार्यशाला के समापन समारोह को संबोधित करते हुए, सीसीआरएएस के महानिदेशक प्रोफेसर वैद्य रबीनारायण आचार्य ने कहा कि यह कार्यशाला सीसीआरएएस की आयुर्वेद पांडुलिपि के शोध की पहल के अंतर्गत केंद्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय के साथ दूसरा सहयोगात्मक कार्यक्रम था। उन्होंने बताया कि ओडिशा के सीएसयू पुरी परिसर में आयोजित पहली कार्यशाला में 14 आयुर्वेदिक पांडुलिपियों का लिप्यंतरण किया गया था, जो इस राष्ट्रीय प्रयास की निरंतरता और विस्तार को दर्शाता है।

सीएसयू गुरुवायूर परिसर के निदेशक प्रोफेसर के.के. शाइन ने प्रोफेसर के. विश्वनाथन के साथ मिलकर सीसीआरएएस के साथ भविष्य में सहयोग करने की विश्वविद्यालय की प्रतिबद्धता को दोहराया, विशेष रूप से मलयालम आयुर्वेदिक पांडुलिपियों के व्यवस्थित संरक्षण, विद्वतापूर्ण प्रसंस्करण और पुनरुद्धार के लिए, जो भारत की क्षेत्रीय चिकित्सा विरासत का एक महत्वपूर्ण घटक हैं।

कार्यक्रम का समन्वय सीएसयू के प्रोफेसर के. विश्वनाथन और सीसीआरएएस की डॉ. पार्वती जी. नायर ने किया। समापन सत्र में सीसीआरएएस-राष्ट्रीय आयुर्वेद पंचकर्म अनुसंधान संस्थान (एनएआरआईपी) के प्रभारी डॉ. वी सी दीप, वरिष्ठ अधिकारियों, शिक्षाविदों और विषय विशेषज्ञों के साथ उपस्थित थे।

इस कार्यशाला की व्यापक रूप से सराहना की गई, क्योंकि इसमें आयुर्वेद और संस्कृत के विद्वानों को शामिल करते हुए एक एकीकृत दृष्टिकोण अपनाया गया था और सीमित समय में शोध के ठोस परिणाम प्राप्त हुए थे। सीसीआरएएस ने कहा कि इस तरह की पहल से साक्ष्य-आधारित आयुर्वेद को मजबूती मिलेगी, क्षेत्रीय चिकित्सा परंपराओं का संरक्षण होगा और भारत के शास्त्रीय चिकित्सा ज्ञान के दीर्घकालिक संरक्षण में सहायता मिलेगी।

20 लाख किताबों के संग्रहकर्ता अंके गौड़ा को पद्मश्री अलंकरण

कर्नाटक के हरलहल्ली जैसे छोटे से गाँव में एक ऐसा व्यक्तित्व निवास करता है, जिसने अपने जीवन का संकल्प सिद्ध कर दिखाया है। उम्र के 75वें पड़ाव पर खड़े अंके गौड़ा ने लगभग 20 लाख किताबों का एक विलक्षण पुस्तकालय स्थापित किया है। एक बस कंडक्टर के रूप में अपने करियर की शुरुआत करने वाले अंके गौड़ा को बचपन से ही पढ़ने का गहरा अनुराग था। सीमित आय के बावजूद, उन्होंने अपनी छोटी-छोटी बचतों से पुस्तकें खरीदने का नियम बनाया, और आज वही शौक एक ऐतिहासिक उपलब्धि का रूप ले चुका है।

उन्होंने यह संग्रह केवल निजी शौक के लिए नहीं किया, बल्कि इसके द्वार समाज के प्रत्येक व्यक्ति के लिए सदैव खुले रखे हैं। यहाँ न कोई प्रवेश शुल्क है और न ही सदस्यता की अनिवार्यता—बस ज्ञान की जिज्ञासा रखने वाला कोई भी व्यक्ति यहाँ आ सकता है। आज इस पुस्तकालय की ख्याति इतनी है कि शोधकर्ता, विद्यार्थी और प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करने वाले युवाओं के साथ-साथ विदेशी विद्वान भी संदर्भ (Reference) के लिए यहाँ पहुँचते हैं।

अंके गौड़ा ने अपने जीवन के तीन दशक एक चीनी मिल में कार्य करते हुए व्यतीत किए। अपनी कमाई के एक-एक अंश को उन्होंने पुस्तकों में निवेश किया और इसे ही अपनी असली पूँजी माना। इतना ही नहीं, पुस्तकालय के निर्माण हेतु उन्होंने मुख्य मार्ग (Main Road) पर स्थित अपनी निजी भूमि तक बेच दी। उनके इस महायज्ञ में उनकी पत्नी विजया लक्ष्मी और पुत्र सागर ने भी पूर्ण सहयोग दिया। बाधाओं के बीच साकार हुआ यह स्वप्न, वास्तव में उनके अडिग संकल्प का प्रमाण है।

यह पुस्तकालय किसी अजूबे से कम नहीं है। यहाँ विभिन्न विषयों की दुर्लभ पुस्तकें, प्राचीन ग्रंथ, जर्नल और 9 लाख से अधिक शब्दकोश उपलब्ध हैं। एक छोटे से गाँव में इतनी विशाल और विविध पुस्तक-संपदा का होना चकित कर देने वाला और गौरवपूर्ण है।

साभार- https://www.facebook.com/hindipatrikamanch से

छेड़छाड़ की साजिश रचने वाली शिमाजिता मुस्तफा के मोबाईल से कई वीडियो मिले

केरल सुसाइड केस में नया मोड़, शिमजिता मुस्तफा ने रिकॉर्ड किए थे 7 वीडियो: पहले ने ही ले ली दीपक की जान… केरल में यू दीपक के आत्महत्या मामले में पुलिस ने कुन्नमंगलम कोर्ट को बताया है कि वडकारा की रहने वाली शिमजिता मुस्तफा ने निजी बस यात्रा के दौरान गोविंदापुरम निवासी दीपक के 7 वीडियो रिकॉर्ड किए थे। पुलिस के अनुसार, बाद में यही वीडियो दीपक की मौत तक पहुँचने वाली घटनाओं में अहम वजह बने। आरोपित शिमजिता मुस्तफा मुस्लिम लीग से जुड़ी हुई है।

पुलिस द्वारा दाखिल रिमांड रिपोर्ट में कहा गया है कि शिमजिता मुस्तफा को आत्महत्या के लिए उकसाने के आरोप में बुधवार (21 जनवरी 2026) को गिरफ्तार किया गया था। रिपोर्ट के मुताबिक, सोशल मीडिया पर वीडियो वायरल होने के बाद दीपक भारी मानसिक दबाव में आ गया था। पुलिस ने बताया कि वीडियो के बार-बार शेयर होने से दीपक गहरे तनाव में चले गए क्योंकि उन्हें डर था कि लोग उन्हें अपराधी के रूप में देखने लगेंगे। इसी मानसिक पीड़ा के चलते उन्होंने आत्महत्या कर ली। दीपक की मौत से पहले शिमजिता ने एक वीडियो सोशल मीडिया पर पोस्ट किया था, जिसमें उसने दावा किया था कि बस में दीपक ने उसके साथ ‘गलत व्यवहार’ किया।

पुलिस ने उस निजी बस के सीसीटीवी फुटेज की भी जाँच की जिसमें वीडियो रिकॉर्ड किए गए थे। फुटेज में साफ दिखा कि दीपक और शिमजिता अलग-अलग बस में चढ़े और यात्रा के दौरान कोई असामान्य घटना नहीं हुई। वीडियो में यह भी देखा गया कि दोनों शांतिपूर्वक बस से उतर गए। बस के चालक और कंडक्टर ने भी बताया कि यात्रा के दौरान उन्होंने किसी तरह की यौन उत्पीड़न की घटना नहीं देखी और दोनों यात्रियों के उतरने के समय भी कोई समस्या नहीं हुई।

रिमांड रिपोर्ट में यह भी बताया गया कि बस में कथित रूप से परेशान करने वाले अनुभव का दावा करने के बावजूद शिमजिता ने न तो वडकारा और न ही पय्यन्नूर पुलिस स्टेशन में कोई शिकायत दर्ज कराई। पुलिस ने कहा कि उसके मोबाइल फोन की विस्तृत फॉरेंसिक जाँच की जानी है, जिससे उसके डिलीट किए गए इंस्टाग्राम और फेसबुक अकाउंट्स को रिकवर करने में मदद मिल सकती है। जाँच एजेंसियों ने अभी तक उस समय बस में मौजूद अन्य यात्रियों के बयान दर्ज नहीं किए हैं। बस का नाम ‘अल अमीन’ बताया गया है। पुलिस का कहना है कि इन यात्रियों के बयान जाँच के लिए बेहद अहम होंगे। अरीकोड पंचायत की सदस्य रह चुकी है

शिमजिता… रिपोर्ट में यह भी उल्लेख किया गया है कि शिमजिता मुस्तफा एजुकेटेड है, उसके पास पोस्टग्रेजुएट डिग्री है और वह पहले अरीकोड पंचायत की सदस्य भी रह चुकी है। पुलिस के अनुसार, वह पूरी तरह जानती थी कि इस तरह के वीडियो सार्वजनिक करने से किसी व्यक्ति को गंभीर मानसिक नुकसान हो सकता है और वह कोई बड़ा कदम उठा सकता है। सोशल मीडिया पर साझा किया गया वीडियो तेजी से वायरल हुआ और दो दिनों के भीतर ही उसे 20 लाख से ज्यादा व्यूज मिल गए। दीपक की मौत के बाद उसकी माँ के कन्याका ने जिला पुलिस प्रमुख से शिकायत दर्ज कराई, जिसमें कहा गया कि उनके बेटे की मौत उसके खिलाफ लगाए गए झूठे आरोपों से पैदा हुई मानसिक पीड़ा के कारण हुई। पुलिस ने बताया कि पूछताछ के लिए संपर्क करने पर शिमजिता छिप गई थी और बाद में उसे एक रिश्तेदार के घर से गिरफ्तार किया गया। मामले की जाँच अभी जारी है। हालांकि मेरा मानना ये है कि दीपक को आत्महत्या नहीं करनी चाहिए थी, बल्कि उन्हें भी पुलिस कंप्लेन करनी चाहिए थी। इस तरह हारना पुरुष हो या स्त्री गलत है, यदि आपके साथ गलत हुआ है तो आपको आवाज उठाना चाहिए। उत्पीड़न शारीरिक हो या मानसिक, पुरुष के साथ हो या स्त्री के साथ, इस तरह चुप बैठ कर आत्महत्या करना कोई सॉल्यूशन नहीं।

साभार- https://x.com/Vinay__pandit_/status/2015777177158234158 से