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देश के असली हीरो व अजेय योद्धा ‘नेताजी सुभाष बोस’

‘बिना कीमत चुकाए कुछ हासिल नहीं होता और आज़ादी की कीमत है शहादत’ आज़ाद हिंद फौज के सैनिकों को इस आह्वान के साथ ‘तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आज़ादी दूंगा’ नारे के द्वारा प्रेरित करने वाले व्यक्तित्व का नाम है सुभाष बोस. जय हिंद तथा दिल्ली चलो की प्रेरणा थे सुभाष। महात्मा गांधी को ‘राष्ट्रपिता’ का सर्वप्रथम संबोधन देने वाले व्यक्ति का नाम है सुभाष। बहादुरी -साहस-संकल्प- राष्ट्र भक्ति के जीते जागते आदर्श पुरुष थे नेताजी। राजनीति, कूटनीति व सैन्य शक्ति तीनों आज़ादी के लिए जरुरी है इस संकल्पना के प्रणेता थे बोस. अपने देश की आज़ादी के लिए पहली बार देश के बाहर जाकर फौज तैयार करने वाले शख्स थे सुभाष। भारत बोध की भावना को लाखों -लाखों युवाओं के दिलों की धड़कन बनाने वाले व आज़ादी के सबसे बड़े नायक का नाम है नेताजी सुभाष चंद्रबोस ।

अखंड व अविभाजित भारत के पहले प्रधानमंत्री: 21 अक्टूबर 1943 को सिंगापुर में बनाई गयी आज़ाद हिंद सरकार के सुभाष बोस प्रथम प्रधानमंत्री थे. यह भारत की अपनी सरकार थी, जिसे अन्य देशों जर्मनी, जापान, फिलीपींस, कोरिया, चीन मानचुको, आयरलैंड आदि देशों का भी समर्थन प्राप्त था. इस आज़ाद हिंद सरकार का अपना बैंक ‘आज़ाद हिंद बैंक’, अपना डाक टिकट, अपनी मुद्रा, अपना गुप्तचर तंत्र था. तिरंगा भारत का राष्ट्रीय झंडा, जन-गण-मन भारत का राष्ट्रीय गान होगा यह निर्णय भी सर्वप्रथम आज़ाद हिंद सरकार का ही था. इस सरकार का बर्मा की राजधानी रंगून में अपना मुख्यालय भी स्थापित था. यह वही आज़ाद हिन्द फौज थी जिसके सैनिकों ने भारत व भारत से बाहर भी अंग्रेजों की जड़ों को हिला कर रख दिया था. जिसके नाम से गोरे थरथर कांपते थे.

रेड फोर्ट ट्रायल: 1945 के बाद आज़ाद हिंद फौज के तीन ऑफिसर प्रेम सहगल, शाहनाज़ खान व गुरबक्श सिंह ढिल्लो पर अंग्रेजी हकूमत की बगावत व विद्रोह करने के खिलाफ लाल किले में नवंबर 1945 से जनवरी 1946 तक मुकदमा चला. आईएनए पर चलाए गए दस मुकदमों में से यह पहला मुकदमा था. यह मुकदमा पूरे देश में कौमी एकता की मिसाल बना. तीनों अफसरों की रिहाई के लिए देश भर में दुआएं की जाने लगी, धरने प्रदर्शन हुए, प्रार्थना सभाएं आयोजित हुई. मुकदमे के ट्रायल के दौरान देश के प्रत्येक व्यक्ति तक आज़ाद हिन्द फौज के संघर्ष की कहानियों ने देशभक्ति का माहौल निर्माण कर दिया। इस ट्रायल ने अपनी आज़ादी के लिए लड़ने वालों को अपने अधिकारों के प्रति जागरुक कर दिया था. आखिरकार इस ट्रायल से निर्मित वातावरण से अंग्रेज हवा का रुख पहचान गए थे और उन्होंने तीनों अफसरों को रिहा कर दिया।

सैनिक- सा जुझारूपन और राजनेता -सी व्यापक दृष्टि: भारत में चल रहे स्वतंत्रता आंदोलन को एक आर या पार के युद्ध का रूप देने वाले थे नेताजी। अहिंसा आंदोलन में भाग लेकर सुभाष को इस बात का स्पष्ट संकेत मिल गया था कि अंग्रेजों को आर – पार की भाषा ही समझ आएगी। इसलिए उन्होंने गांधी जी का साथ छोड़ दिया। मुसोलिनी और हिटलर से मिलकर अंग्रेजों के खिलाफ एकजुट होकर युद्ध करने का पक्ष रखना और जापान में ‘आज़ाद हिंद फौज’ की स्थापना कर दिल्ली कूच करना नेताजी के व्यक्तित्व के वे पहलू हैं, जो सिर्फ सुभाष में ही थे, उस समय के किसी अन्य राजनेता में नहीं थे. उस समय नेताजी द्वारा रेडियो पर दिया गया संदेश आज भी सार्थक है- ‘किसी अंग्रेज के सामने हमारे देशवासियों को सर झुकाने की जरुरत नहीं। यदि किसी का सर झुकेगा, तो फिरंगी हमारे देश के स्वाभिमान पर हंसेंगे। इसलिए आप लोग उन्हें हंसने का मौका न दें. हम कल भी सिर उठाकर जी रहे थे, आज भी सिर उठाकर जी रहे हैं और मरते डैम तक सिर उठाकर ही जीते रहेंगे’.

नेताजी और आज़ाद हिंद फौज के खौफ से मिली आज़ादी: सन 1956 में ब्रिटेन के तात्कालिक प्रधानमंत्री क्लीमेंट एटली भारत आए. ये वही एटली थे जिन्होंने भारत की आज़ादी के ड्राफ्ट पर 1947 में हस्ताक्षर किये थे. जब इनसे पूछा गया की 1942 भारत छोड़ो आंदोलन की विफलता एवं 1945 में द्वितीय विश्वयुद्ध जीतने के बावजूद भी आप भारत को इतनी जल्दी छोड़ने के लिए क्यों तैयार हो गए? एटली का उत्तर था, इसके पीछे का कारण थे सुभाष बोस व उनकी आज़ाद हिन्द फौज. जिसके कारण पूरे देश भर में भारत की आज़ादी को लेकर इस प्रकार का माहौल पैदा हो गया था कि हमें समझ आ गया था कि अब हम भारत में ज्यादा समय तक टिक नहीं सकते. इसी कारण हमें भारत को आज़ाद करने पर विवश होना पड़ा.

वास्तव में बोस अद्भुत नेतृत्व क्षमता व आज़ादी के संघर्ष में आउट ऑफ़ बॉक्स थिंकिंग रखने वाले दूरदृष्टा थे, जो युग से आगे की सोच रखते थे. कूटनीति चालें चलने व परिस्थिति अनुसार कूटनीति पूर्ण योजनाएं बनाने में उनका कोई सानी नहीं था. आज़ाद हिंद फौज, आज़ाद हिंद सरकार, आज़ाद हिंद रेडियो स्टेशन एवं रानी झांसी रेजीमेंट उनके जीवन की विशेष उपलब्धियां थी, जो उनकी दूरदर्शिता का परिचायक बनी. उनका मानना था कि भारत की आज़ादी की इच्छा अगर हर भारतीय के मन में उठे, तो भारत को आज़ाद होने से कोई नहीं रोक सकता। स्वतंत्र भारत की अमरता का जयघोष करने वाली राष्ट्रप्रेम की दिव्य ज्योति जलाकर सुभाष बोस अमर हो गए. लेकिन उनके विचार, उनका जीवन आज भी प्रत्येक भारतीय के लिए पथ प्रदर्शक है. आज भी नौजवानों में सुभाष बाबू न केवल लोकप्रिय है बल्कि उनके प्रेरणा पुरुष व आदर्श भी है. तो आइये, बोस की 129वीं जयंती के अवसर पर उनके जीवन से प्रेरणा लेते हुए, उनको व उनके जीवन को जन-जन तक पहुंचा कर इस राष्ट्र निर्माण के पुनीत कार्य में हम भी अपनी भूमिका को सुनिश्चित करें। जय हिंद, जय भारत।।

(लेखक मीडिया विभाग, जे. सी. बोस विश्वविद्यालय, फरीदाबाद में प्रोफेसर एवं विभागाध्यक्ष है)

कीस में 66वें अखिल भारतीय प्रौढ़ शिक्षा सम्मेलन का हुआ शुभारंभ

भुवनेश्वर। कलिंगा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंसेज़ (कीस) में बुधवार को 66वें अखिल भारतीय प्रौढ़ शिक्षा सम्मेलन का शानदार शुभारंभ हुआ। इस सम्मेलन में देशभर से शिक्षा विशेषज्ञों, नीति-निर्माताओं और प्रौढ़ शिक्षा से जुड़े कार्यकर्ताओं ने भाग लिया और समावेशी राष्ट्रीय विकास में प्रौढ़ शिक्षा की भूमिका पर विचार-विमर्श किया।

इस सम्मेलन का संयुक्त आयोजन इंडियन एडल्ट एजुकेशन एसोसिएशन (IAEA) और कीस द्वारा किया जा रहा है।

इस अवसर पर इंडियन एडल्ट एजुकेशन एसोसिएशन ने प्रौढ़ शिक्षा के क्षेत्र में उनके उत्कृष्ट योगदान के लिए कीट-कीस और कीम्स के संस्थापक डॉ. अच्युत सामंत को विशेष सम्मान से सम्मानित किया।

मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित डॉ. सामंत ने कहा कि वे पिछले तीन दशकों से शिक्षा के क्षेत्र में कार्य कर रहे हैं और उनका मुख्य उद्देश्य शिक्षा के माध्यम से सामाजिक परिवर्तन लाना है। उन्होंने कहा कि कीट-कीस जैसे संस्थान मुख्यधारा की शिक्षा के साथ-साथ प्रौढ़ शिक्षा में भी महत्वपूर्ण योगदान दे रहे हैं।

डॉ. सामंत ने कीस में अपनाए जा रहे विशिष्ट मॉडल पर प्रकाश डालते हुए कहा, “जब हमारे छात्र छुट्टियों में अपने गांव लौटते हैं, तो उन्हें कम से कम दस लोगों को साक्षर बनाने के लिए प्रेरित किया जाता है। शिक्षा तभी सार्थक होती है जब वह जमीनी स्तर तक पहुंचकर कई गुना बढ़े।”

उन्होंने जनजातीय शिक्षा, कौशल विकास, स्वास्थ्य सेवा और व्यावसायिक शिक्षा के क्षेत्र में कीट और कीस के व्यापक योगदान की चर्चा करते हुए प्रौढ़ शिक्षा को सामाजिक परिवर्तन का प्रमुख माध्यम बताया।

उद्घाटन समारोह में प्रो. एल. राजा, इंडियन एडल्ट एजुकेशन एसोसिएशन के अध्यक्ष; प्रो. राजेश, IAEA के निदेशक; प्रो. सरनजीत सिंह, कीट और कीस के कुलपति; तथा सुरेश खंडेलवाल, इंडियन एडल्ट एजुकेशन एसोसिएशन (IAEA) के महासचिव सहित कई गणमान्य व्यक्ति उपस्थित रहे।

इंडियन एडल्ट एजुकेशन एसोसिएशन का उद्देश्य लोगों के सर्वांगीण विकास को बढ़ावा देना, निरक्षरता और अज्ञानता के उन्मूलन के लिए कार्य करना, अंतर-राज्यीय सहयोग को प्रोत्साहित करना, आम जन के लिए साहित्य का निर्माण एवं वितरण करना तथा विश्वविद्यालयों और शैक्षणिक संस्थानों को प्रौढ़ शिक्षा से सक्रिय रूप से जोड़ना है।

वैश्विक स्तर पर युद्ध के बदलते स्वरूप

21वीं सदी में शक्ति संघर्ष का स्वरूप बहुत तेजी से बदल रहा है। अब विभिन्न देशों के बीच संघर्ष, तोप, मिसाईल एवं सेनाओं के माध्यम से नहीं लड़े जा रहे हैं बल्कि तकनीकि उपलब्धता, मुद्रा नियंत्रण, पूंजी प्रवाह, खाद्य सुरक्षा, आकड़ों (डेटा) का संग्रहण, नियम निर्माण को प्रभावित करने की क्षमता एवं वैश्विक आपूर्ति शृंखला को प्रभावित करना, आदि में माध्यम से लड़ा जा रहा है। यह एक ऐसा बहुपरत, निरंतर संस्थागत एवं सूक्ष्म युद्ध का स्वरूप है जो राष्ट्र की आर्थिक सामरिक स्वायत्तता को बिना पारम्परिक लड़ाई के नष्ट करने की क्षमता रखता है। यह युद्ध वैश्विक बाजारी शक्तियों अर्थात बहुराष्ट्रीय कम्पनियों, वॉल स्ट्रीट पर आधारित वित्तीय नेट्वर्क, डॉलर आधारित भुगतान प्रणाली, अंतरराष्ट्रीय संस्थानों (विश्व व्यापार संगठन, अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष, विश्व बैंक), रेटिंग संस्थानों, बड़े तकनीकि संस्थानों एवं निजी सैन्य परामर्श समूहों द्वारा मिलकर संचालित किया जा रहा है। यह युद्ध एक प्रणाली है एवं यह एक घटना नहीं है।

 

व्यवस्थित तरीके से लड़े जाने वाले उक्त वर्णित युद्ध में रणनीतिक तंत्र का उपयोग किया जाता है। इस तंत्र के माध्यम से वैश्विक बाजारवादी शक्तियां मिलकर किसी राष्ट्र की अर्थव्यवस्था, नीति संरचना, मुद्रा, पूंजी प्रवाह, तकनीकि, आपूर्ति शृंखला, खाद्य सुरक्षा एवं सामाजिक धारणा पर लम्बे समय तक अपना प्रभाव एवं नियंत्रण स्थापित कर लेती हैं। यह युद्ध अदृश्य रूप से चलता है एवं किसी को प्रत्यक्ष रूप से दिखाई नहीं देता है। यह युद्ध विभिन्न संस्थानों के माध्यम से लड़ा जाता है एवं इस युद्ध के माध्यम से किसी भी देश की शासन व्यवस्था को भी परिवर्तित किया जा सकता है। हाल ही के समय में उक्त वर्णित अदृश्य युद्ध के माध्यम से बांग्लादेश, नेपाल, श्रीलंका आदि देशों में सत्ता परिवर्तन किया गया है। भारत में भी इस तरह के प्रयोग अदृश्य रूप से किए जा रहे हैं परंतु भारतीय नागरिकों पर इस चाल को अभी तक कोई असर नहीं हुआ है क्योंकि भारत में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ जैसे सामाजिक संगठन नागरिकों के बीच अपनी प्रभावी भूमिका निभाते हुए दिखाई दे रहे हैं। ।

 

अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अमेरिकी डॉलर की तुलना में भारतीय रुपए की कीमत को कम करने के भरसक प्रयास हो रहे हैं। भारतीय शेयर बाजार से विदेशी निवेशकों द्वारा भारी मात्रा में अपना निवेश लगातार निकाला जा रहा है जिससे अमेरिकी डॉलर का भारत से बाहर प्रवाह भारी मात्रा में हो रहा है और भारतीय रुपए पर दबाव बन रहा है। भारत में विभिन्न उत्पादों के होने वाले आयात महंगे हो रहे हैं इससे अंतत: भारत में मुद्रा स्फीति की दर में वृद्धि हो सकती है और भारत के नागरिकों में वर्तमान सत्ता के विरुद्ध असंतोष का भाव जाग सकता है। परंतु केंद्र सरकार की नीतियों के चलते अभी तक मुद्रा स्फीति की वृद्धि दर पर नियंत्रण बनाए रखने में सफलता मिली है एवं भारतीय खुदरा निवेशकों, म्यूचूअल फण्ड एवं देशी संस्थागत निवेशकों ने भारतीय शेयर बाजार में पर्याप्त मात्रा में अपना निवेश बढ़ाया है इससे भारतीय शेयर बाजार में भारी गिरावट को सफलतापूर्वक रोका जा सका है। अमेरिकी केंद्रीय बैंक फेडरल रिजर्व द्वारा फेड रेट (अमेरिकी ब्याज दर) में वृद्धि करने से भी अमेरिकी डॉलर अंतरराष्ट्रीय बाजार में मजबूत होता है क्योंकि अमेरिका में ब्याज दरों में वृद्धि होने से वैश्विक स्तर पर आर्थिक क्षेत्र में उभर रही अर्थव्यवस्थाओं से अमेरिकी डॉलर का निवेश निकल कर अमेरिका की ओर आकर्षित होने लगता है। इससे भी इन देशों की मुद्राओं पर दबाव निर्मित होने लगता है। अतः ब्याज दरों में वृद्धि को भी एक हथियार के रूप में इस्तेमाल किया जाता है। तीसरे हथियार के रूप में किसी भी देश की मुद्रा को SWIFT जैसे भुगतान नेट्वर्क से अलग कर दिया जाना है। इस निर्णय से सम्बंधित देश की मुद्रा का अंतरराष्ट्रीय स्तर पर लेनदेन विपरीत रूप से प्रभावित होने लगता है। जैसे रूस की मुद्रा रूबल के साथ हाल ही के समय में हुआ था। उक्त समस्त निर्णयों से किसी भी देश की मुद्रा को अंतरराष्ट्रीय बाजार में कमजोर किया जा सकता है इससे उस देश में उत्पादों के आयात महंगे हो सकते हैं, उस देश पर विदेशी कर्ज का भार बढ़ सकता है एवं उस देश का आर्थिक विकास प्रतिबंधित हो सकता है। यह युद्ध संरचनात्मक अधीनता पैदा करता है।

 

इसी तरह का दबाव कुछ देशों पर तब डाला जाता है जब वे किसी अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संस्थान (विश्व बैंक, अंतराष्ट्रीय मुद्रा कोष, रेटिंग संस्थान) से ऋण लेने का प्रयास करते हैं। इन संस्थानों द्वारा इन देशों पर टैक्स की दरें बढ़ाने, अपने खर्चों पर नियंत्रण स्थापित करने, राजस्व सम्बंधी निर्णयों पर अपनी नीति थोपने, उस देश के ऊर्जा, बंदरगाह एवं खनन क्षेत्रों का निजीकरण करने के प्रयास करना एवं इसके मध्यम से उस देश में चुपचाप शासन परिवर्तन के प्रयास करना भी शामिल हैं। इन संस्थानों से कर्ज लेना आधुनिक गुलामी का सबसे व्यवस्थित मॉडल बन पड़ा है। इसके साथ ही, विभिन्न देशों के साथ व्यापार युद्ध भी छेड़ा जाता है। जैसे, अमेरिका द्वारा ब्रिक्स (भारत, चीन, रूस, ब्राजील) पर 500 प्रतिशत का टैरिफ लगाने के प्रयास करना भी इन देशों के विरुद्ध एक शद्म युद्ध छेड़ने जैसा ही निर्णय है। इन्हीं उपायों में कुछ देशों को निर्यात प्रतिबंधित करना भी इसी नीति का एक हिस्सा है।

 

 

जैसे, अमेरिका एवं चीन द्वारा अन्य देशों को सेमीकंडक्टर, चिप एवं 5G के उपकरण के निर्यात करने पर रोक लगाई गई थी ताकि प्रभावित किये जाने वाले देशों में इन तकनीकी का उपयोग असम्भव हो सके और इन देशों का विकास रुक जाए। इसी प्रकार के प्रयासों में किसी देश के कृषि क्षेत्र की नीतियों को प्रभावित कर उस देश में खाद्य पदार्थों की उपलब्धता को कम करना भी शामिल है ताकि उस देश के नागरिक अपने देश की सरकार के खिलाफ उठ खड़े हों। जैसे हाल ही में अमेरिका द्वारा भारत के साथ मुक्त व्यापार समझौते को सम्पन्न करने के लिए भारत पर दबाव बनाया जा रहा है कि भारत अपने कृषि एवं डेयरी क्षेत्र को अमेरिकी उत्पादों के लिए खोल दे। इससे अमेरिकी उत्पाद सस्ती दरों पर भारत में उपलब्ध हो जाएंगे एवं भारत के किसानों द्वारा उत्पादित खाद्य पदार्थ सस्ते अमेरिकी उत्पादों की स्पर्धा में टिक नहीं पाएंगे। इससे भारतीय कृषि एवं डेयरी क्षेत्र बर्बादी के कगार पर पहुंच जाएगा और भारतीय किसान, सरकार के विरुद्ध उठ खड़ा होगा। कुल मिलाकर इस तरह के प्रयास उभरती अर्थव्यवस्थाओं की उत्पादन क्षमता प्रभावित करने के लिए भी किए जाते हैं ताकि यह देश विभिन्न उत्पादों का उत्पादन अपने देश में नहीं कर सकें एवं इसके लिए अन्य देशों से आयात पर इनकी निर्भरता बढ़ जाए।

 

प्रौद्योगिकी क्षेत्र को प्रभावित करते हुए भी कुछ देश उभरती हुई अर्थव्यवस्थाओं को दबाव में लाने का प्रयास करते हुए दिखाई दे रहे हैं। दरअसल, तकनीकी आज का नया परमाणु हथियार है। आरटीफिशीयल इंटेलिजेन्स, क्वांटम, सेमीकंडक्टर, साइबर आदि भी आज, युद्ध के क्षेत्र बन चुके हैं। अमेरिका ने चीन को किए जाने वाले चिप के निर्यात पर प्रतिबंध लगा दिया था, इससे जिन उत्पादों के निर्माण में चिप का प्रयोग होता है उन उद्योगों को भारी परेशानी का सामना करना पड़ा था। इसी प्रकार, अमेरिका द्वारा भारत पर डाटा नियंत्रण हेतु दबाव बनाने का प्रयास किया जा रहा है। पैटेंट एवं लायसेंसिंग पर नियंत्रण एवं अंतरराष्ट्रीय स्तर की बड़ी कम्पनियों द्वारा नागरिक डाटा का दुरुपयोग किया जाना भी इसी युद्ध कला का एक हिस्सा है। पूरे विश्व में फैली कोविड महामारी के पश्चात वैश्विक आपूर्ति शृंखला एक भूराजनैतिक हथियार बन चुकी है। उदाहरण के लिए फार्मा क्षेत्र में उपयोग होने वाले कच्चे माल को चीन नियंत्रित करता है। इसी प्रकार, मूल्यवान खनिज पदार्थों के 90 प्रतिशत भाग के उत्पादन पर चीन का कब्जा है। खाद्य तेल की आपूर्ति पर बहुराष्ट्रीय कम्पनियों का नियंत्रण है। समुद्री मार्गों पर कुछ देशों का कब्जा है, जो कई बार इस सम्बंध में अंतरराष्ट्रीय कानूनों को मानने से इंकार कर देते हैं। इस तरह के व्यवहार से तेजी से विकास कर रही अर्थव्यवस्थाएं निर्भरता की कैद में धकेल दी जाती हैं।

 

आजकल झूठे विमर्श गढ़ने का कार्य भी बड़े जोरों पर किया जा रहा है। इसे बौद्धिक युद्ध की श्रेणी में रखा जा सकता है, जो प्रायः वैश्विक मीडिया द्वारा लड़ा जा रहा है। गैरसरकारी संस्थान (NGO) एवं थिंक टैंक, एक संगठित नरेटिव इको सिस्टम बनाते हैं। जैसे, भारत के संदर्भ में गढ़े जाने वाले कुछ झूठे विमर्शों में शामिल हैं – भारतीय किसान अक्षम हैं, भारत के स्थानीय बीज पोषणहीन हैं, भारत का देशी खाद्य मॉडल पिछड़ा है, ब्रिक्स राजनैतिक रूप से अस्थिर देशों का संगठन है, डीडोल्लराईजेशन एक असम्भव कार्य है।

 

कुल मिलाकर उक्त वर्णित शद्म युद्ध का प्रमुख उद्देश्य अन्य देशों का मानसिक एवं बौद्धिक उपनिवेशीकरण करना है। इसके अंतर्गत, इन देशों के नीति निर्धारण पर अपना आधिपत्य स्थापित करना है। इन देशों द्वारा किस प्रकार के उत्पादों का उत्पादन किया जाएगा (बीज से लेकर दवा तक) एवं इसके आपूर्ति बाजार पर अपना नियंत्रण स्थापित करना है। साथ ही, देश के मुद्रा बाजार पर नियंत्रण स्थापित करना है ताकि उस देश की मुद्रा अमेरिकी डॉलर पर निर्भर हो जाए।

 

 

प्रहलाद सबनानी

सेवानिवृत्त उपमहाप्रबंधक,

भारतीय स्टेट बैंक

के-8, चेतकपुरी कालोनी,

झांसी रोड, लश्कर,

ग्वालियर – 474 009

मोबाइल क्रमांक – 9987949940

ई-मेल – prahlad.sabnani@gmail.com

गीता प्रेस गोरखपुर ने हमारी धार्मिक, सांस्कृतिक व अध्यात्मिक धारा को नया जीवन दियाःश्री अमित शाह

केन्द्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री श्री अमित शाह ने आज उत्तराखंड के ऋषिकेश में गीता प्रेस द्वारा प्रकाशित मासिक पत्र ‘कल्याण’ के शताब्दी अंक विमोचन समारोह को संबोधित किया

केन्द्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री श्री अमित शाह ने उत्तराखंड के ऋषिकेश में गीता प्रेस द्वारा प्रकाशित मासिक पत्र ‘कल्याण’ के शताब्दी अंक के विमोचन समारोह को संबोधित किया। केन्द्रीय गृह मंत्री ने लक्ष्मीनारायण मंदिर एवं मां गंगा के दर्शन और पूजन भी किया। इस अवसर पर उत्तराखंड के मुख्यमंत्री श्री पुष्कर सिंह धामी सहित अनेक गणमान्य व्यक्ति उपस्थित थे।

केन्द्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री श्री अमित शाह ने कहा कि सनातन धर्म से आकांक्षा रखने वाला, दुनिया की समस्याओं के समाधान लिए भारतीय संस्कृति की ओर देख रहा है और इस भूमि से प्रेम करने वाला भारत और दुनिया का कोई भी व्यक्ति गीता प्रेस से अनजान नहीं हो सकता। उन्होंने कहा कि पूज्य भाई जी हनुमान प्रसाद पोद्दार जी ने गीता प्रेस के माध्यम से लगभग 103 वर्षो से सनातन धर्म की लौ को ताकत देने का काम किया है। उन्होंने करोडों लोगों को भक्ति के माध्यम से आध्यात्म की ओर प्रेरित किया और इस रास्ते पर चलते हुए मोक्ष तक का रास्ता प्रशस्त किया। श्री शाह ने कहा कि पोद्दार जी ने सब कुछ छोड़कर अपना पूरा जीवन गीता प्रेस को समर्पित किया। पोद्दार जी ने गीता प्रेस के माध्यम से हर व्यक्ति और परिवार के हृदय में भारतीय संस्कृति के प्रति अटूट श्रद्धा निर्मित करने का काम किया है।

श्री अमित शाह ने कहा कि गीता प्रेस मुनाफे के लिए नहीं बल्कि पीढ़ियों का निर्माण करने के लिए चलती है। स्वावलंबी तरीके से सद्साहित्य को करोड़ों लोगों तक पहुंचाने का काम गीता प्रेस ने किया है। उन्होंने कहा कि कल्याण एक प्रकार से ज्ञान की सनातन ज्योति को हर वाचक तक पहुंचाने का प्रयास कर रहा है। श्री शाह ने कहा कि आज सनातन चेतना का उत्सव देश में दिखाई दे रहा है और कल्याण ने हर संकट में भारतीय संस्कृति के दीप को जलाए रखने का काम किया है। उन्होंने कहा कि कल्याण एक पत्रिका मात्र नहीं है बल्कि भारतीयों के लिए आध्यात्मिक जगत का पथप्रदर्शक है। भारत की संस्कृति को अमर करने के लिए बहुत सारे महत्वपूर्ण प्रयासों में से सबसे मज़बूत प्रयास का नाम कल्याण पत्रिका है। उन्होंने कहा कि कल्याण ने अपने 100 साल में सनातन धर्म के अनुयायियों की सज्जनशक्ति को संगठित करने का काम किया है। उन्होंने कहा कि जो भारत को जानते हैं वो गीता प्रेस के अतुलनीय योगदान का मूल्यांकन नहीं कर सकते।

केन्द्रीय गृह मंत्री ने कहा कि कल्याण जैसी पत्रिका का 100 वर्ष पूरा करना एक बहुत बड़ी उपलब्धि है। अपनी शुरूआत से लेकर आज तक निरंतर कल्याण का एक एक शब्द, वाक्य और अंक, सनातन धर्म और भारतीय संस्कृति को समर्पित रहा है। उन्होंने कहा कि गीता प्रेस ने आदि शंकराचार्य जी के उपनिषदों की मीमांसा को लोगों तक पहुंचाकर एक बहुत बड़ा काम किया है। श्री शाह ने कहा कि गीता प्रेस ने चार पीढ़ियों से निरंतर हर पीढ़ी के लिए वही साहित्य बिना किसी प्रकार से डाइल्यूट किए लोकभोग्य बनाने का काम किया है।

श्री अमित शाह ने कहा कि कल्याण ने अब तक सनातन समर्पित 100 विशेषांक प्रकाशित किए हैं। उन्होंने कहा कि 1932 के अंक में श्री कृष्ण को श्रद्धा की दृष्टि से, राजनीतिज्ञ, तत्वज्ञानी और सभी दुष्टों का दमन करने वाले महापुरुष के रूप में एक ही अंक में कल्याण ने लोगों के सामने रखने का काम किया है। उन्होंने कहा कि कल्याण ने योग अंक 1936 में प्रकाशित किया था, जिसमें योग की व्याख्या, स्वरूप और प्रणालियों पर विस्तार से प्रकाश डालने का काम किया गया था। स्वतंत्रता के बाद कल्याण का पहला प्रकाशित होने वाला अंक नारी अंक था। उन्होंने कहा कि कल्याण का हिंदू संस्कृति अंक उस समय आया जब 1950 में पाश्चात्य असर से हमारे देश की नीतियां गढ़ी जा रही थीं। श्री शाह ने कहा कि इस अंक के पीछे विचार रहा होगा कि जब देश आज़ाद होकर अपनी नीतियां बना रहा है तब उनके मूल में हमारी भारतीय संस्कृति के विचार समाहित होने चाहिए न कि विदेशी विचार होने चाहिए। उन्होंने कहा कि आज कल्याण के शताब्दी वर्ष में प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी के नेतृत्व में सांस्कृतिक मूल्यों को नीतियों के मूल में समाहित कर, नीतियों को गढ़ा जा रहा है।

केन्द्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री ने कहा कि जब अंग्रेज़ों का शासन था उस वक्त धर्म को अंधविश्वास कहना एक प्रकार से फैशन बन चुका था, उस वक्त भाई जी ने किसी प्रकार की आक्रामक भाषा का उपयोग किए बिना, कल्याण नाम का ज्ञान का एक दीपक जलाने का काम किया। इसका उद्देश्य लोगों का मंगल और जगत का कल्याण ही था। उन्होंने कहा कि पूरे विश्व के कल्याण की भावना को कल्याण में समाहित किया गया है। श्री शाह ने कहा कि तर्क, शास्त्र और शांति के माध्यम से जितना विरोध हमारे मूल विचारों का होता था, पोद्दार जी ने उसका उत्तर दिया। उन्होंने कहा कि सनातन की रक्षा शोर से नहीं बल्कि शास्त्र और तर्क से ही हो सकती है। श्री शाह ने कहा कि गीता प्रेस ने कभी अपने प्रचार और धन एकत्रित करने के लिए कुछ नही किया क्योंकि इसका उद्देश्य व्यक्ति-केन्द्रित नहीं बल्कि विचार-केन्द्रित था। गृह मंत्री ने कहा कि कल्याण ने हमें बताया कि सभ्यताएं तलवार से नहीं बल्कि शब्दों और ज्ञान से ही खड़ी होती हैं और शब्द तभी प्रभावी होते हैं जब वो सत्य और सत्व के प्रकाश से चमकते हों।

श्री अमित शाह ने कहा कि जब कल्याण शुरू हुआ तब महात्मा गांधी ने कहा था कि कल्याण में कभी विज्ञापन मत छापना और आज तक कल्याण ने एक भी विज्ञापन नहीं छापा है। उन्होंने कहा कि आध्यात्मिक ग्रथों और पत्रिकाओं को बाज़ार के दबाव से मुक्त रहना चाहिए। श्री शाह ने कहा कि गीता प्रेस का उद्देश्य चरित्र और राष्ट्र निर्माण है। गीता प्रेस ने अनेक प्रकार के साहित्यों की रचना की है और जिससे राष्ट्र में एक चेतना की जागृति हुई है। गीता प्रेस ने करोड़ों संतों के अहर्निश प्रयास को रेखांकित कर लोगों को पढ़ने के लिए उपलब्ध कराया है। इसके कारण हम एक बार फिर से सनातन धर्म के प्रति आकर्षण, आशा और भारतीय संस्कृति में विश्वास दृढ़ होता देख रहे हैं।

केन्द्रीय गृह मंत्री ने कहा कि प्रधानमंत्री मोदी जी के 11 साल के कार्यकाल में हमारे युवाओं में एक बहुत बड़ा गुणात्मक परिवर्तन आया है। उन्होंने कहा कि 550 साल बाद रामलला का एक गगनचुंबी मंदिर अयोध्या में बन चुका है। औरंगजेब द्वारा तोड़ा गया काशी विश्वनाथ कॉरीडोर पूरी दुनिया को संदेश देता है कि तोड़ने वालों से श्रद्धा की ताकत बहुत बड़ी होती है। हाल ही में सोमनाथ मंदिर को तोड़े हुए 1000 साल हुए हैं औऱ भारत सरकार पूरा वर्ष सोमनाथ स्वाभिमान वर्ष के रूप में मनाने जा रही है। सोमनाथ को 16 बार तोड़ा गया और इसे 16 बार फिर से बनाया गया है और इसे तोड़ने वाले गज़नी, खिलजी आदि सब कहीं गुम हो गए लेकिन सोमनाथ की सनातन की ध्वजा आज भी लहरा रही है। श्री शाह ने कहा कि कश्मीर से धारा 370 हट गई, महाकालेश्वर का कॉरिडोर बना, केदारनाथ का पुनर्रूद्धार किया गया, बद्रीधाम का स्ट्रेच पूरा हो चुका है। देशभर में 35 से अधिक तीर्थों की पुनर्जागृति और महिमामंडन पर विचार हो रहा है। उन्होंने कहा कि मातृभाषा में शिक्षा का अब कोई विरोध नहीं हो रहा है। श्री शाह ने कहा कि प्रधानमंत्री मोदी जी विश्व में हर जगह हिंदी में बोलते हैं तो पूरे देश का सीना गर्व से चौड़ा हो जाता है। उन्होंने कहा कि भारत से चुराकर पूरी दुनिया में गई 642 से अधिक मूर्तियों को वापिस लाकर उनके पहले के स्थान पर पुनर्स्थापित करने का भी काम हुआ है। श्री शाह ने कहा कि करोड़ों संतों ने विकट समय में धर्म, सत्व और संस्कृति के संरक्षण, संवर्धन और गीता प्रेस और कल्याण जैसी पत्रिकाओं ने सनातन की लौ को हमेशा बचाकर रखा है।

वंदे मातरम के 150 वर्ष पूर्ण होने का उत्सव

भारत अपने राष्ट्रीय गीत ‘वंदे मातरम’ के 150 वर्ष पूर्ण होने का उत्‍सव देश भर के प्रमुख सार्वजनिक स्थलों पर सामूहिक गायन, सांस्कृतिक कार्यक्रमों और मिलिट्री बैंड प्रदर्शन के माध्यम से मना रहा है। इस उत्सव का उद्देश्य राष्ट्रीय गौरव और एकता को बढ़ावा देना है।

इन समारोहों के एक अंग के रूप में भारतीय वायु सेना (आईएएफ) के 31 संगीतकारों से युक्‍त बैंड ने 21 जनवरी 2026 को नई दिल्ली के राजीव चौक स्थित एम्फीथिएटर में प्रदर्शन किया। 45 मिनट की इस प्रस्तुति में ब्रास, बांसुरी, स्ट्रिंग और इलेक्ट्रॉनिक वाद्ययंत्रों से ग्यारह मनमोहक धुनें प्रस्तुत की गईं। इस प्रस्‍तुति में ‘वंदे मातरम’ और ‘सिंदूर’ गीत, जिन्‍हें ऑपरेशन सिंदूर के दौरान भारतीय सशस्त्र बलों की वीरता को याद करने के लिए तैयार किया गया था, प्रस्तुति के मुख्य आकर्षण रहे।

संगीत सदियों से भारतीय संस्कृति का एक अनमोल रत्न रहा है। यह भारत की समृद्ध सैन्य विरासत का भी अभिन्न अंग है, जो एकता को सुदृढ़ करता है और वीरता की प्रेरणा देता है। 1944 में अपनी स्थापना के बाद से भारतीय वायु सेना बैंड, भारतीय और पश्चिमी संगीत की विविधतापूर्ण प्रस्तुतियों के साथ, देश की सैन्य परंपरा का एक महत्वपूर्ण स्तंभ रहा है। भारतीय वायु सेना बैंड का उद्देश्य अपने मनमोहक प्रदर्शनों के माध्यम से देशभक्ति की भावना को प्रेरित करना और एकता का प्रसार करना है।

संस्कृति मंत्रालय 2026 के गणतंत्र दिवस पर ‘वंदे मातरम् के 150 वर्ष’ विषय पर झांकी प्रस्तुत करेगा

संस्कृति मंत्रालय 2026 की गणतंत्र दिवस परेड में ‘वंदे मातरम् के 150 वर्ष’ विषय पर एक झांकी प्रस्तुत करेगा, जिसमें राष्ट्रीय गीत को भारत की सभ्यतागत स्मृति, सामूहिक चेतना और सांस्कृतिक निरंतरता की एक जीवंत अभिव्यक्ति के रूप में दिखाया जाएगा।

इस विषय(थीम) की जानकारी देते हुए संस्कृति मंत्रालय के सचिव श्री विवेक अग्रवाल ने कहा कि भारत की गणतंत्र दिवस झांकियां सिर्फ औपचारिक प्रदर्शन नहीं होतीं, बल्कि वे राष्ट्र की सभ्यतागत स्मृति के चलते-फिरते अभिलेख होती हैं। हर वर्ष, ये झांकियां विचारों, मूल्यों और ऐतिहासिक अनुभवों को एक साझा दृश्य भाषा में रूपांतरित करती हैं और यह पुनः स्थापित करती हैं कि संस्कृति गणराज्य का सिर्फ एक अलंकरण मात्र नहीं है, बल्कि उसकी जीवंत आत्मा है। इसी निरंतर परंपरा में वंदे मातरम् का स्थान विशिष्ट और शाश्वत है।

उन्होंने कहा कि एक समय क्रांतिकारियों के ओठों पर गूंजने वाला और कारागारों, सभाओं तथा जुलूसों में गाया जाने वाला वंदे मातरम् सिर्फ एक गीत नहीं है। श्री अरबिंदो ने इसमें ऐसी आध्यात्मिक शक्ति देखी थी जो सामूहिक चेतना को जगाने में सक्षम थी—एक ऐसा विजन जिसे इतिहास ने सच साबित किया है। वर्ष 1875 में बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय द्वारा रचित इस गीत ने राष्ट्र को ‘माता’ के रूप में कल्पित किया गया—सुजलाम्, सुफलाम्—जो प्रकृति, पालन-पोषण और आंतरिक शक्ति से परिपूर्ण है। औपनिवेशिक काल में इसने आत्मसम्मान और आत्मविश्वास को पुनर्स्थापित किया, भक्ति को साहस में, कविता को संकल्प में बदला और भारतवासियों को क्षेत्र, भाषा और धर्म से परे एक साझा स्वतंत्रता की आकांक्षा में एकजुट किया।

संस्कृति मंत्रालय की 2026 की गणतंत्र दिवस झांकी इस लंबी और बहुआयामी यात्रा को एक सशक्त दृश्य रूप प्रदान करती है। झांकी में चलते हुए ट्रैक्टर पर वंदे मातरम् की मूल पांडुलिपि प्रदर्शित की गई है, जिसके पीछे भारत के चारों दिशाओं से आए लोक कलाकार हैं, जो देश की सांस्कृतिक विविधता को दिखा रहे हैं। झांकी के केंद्र में वर्तमान पीढ़ी को ‘जेन-जी’ के रूप में दर्शाया गया है, जो विष्णुपंत पगनिस की ऐतिहासिक प्रस्तुति से प्रेरित होकर वंदे मातरम् गा रही है। राग सारंग में उनके द्वारा रिकॉर्ड किया गया यह संस्करण, जिसमें औपनिवेशिक सेंसरशिप से बचने के लिए पदों के क्रम में परिवर्तन किया गया था, स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान कलात्मक प्रतिरोध का एक महत्वपूर्ण उदाहरण बन गया।

वर्ष 2021 से इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र(आईजीएनसीए) को संस्कृति मंत्रालय की गणतंत्र दिवस झांकी की परिकल्पना और क्रियान्वयन की जिम्मेदारी सौंपी गई है। इन वर्षों में आईजीएनसीए ने भारत की दार्शनिक, ऐतिहासिक और सांस्कृतिक नींव पर आधारित थीम तैयार किया है और उन्हें एक ऐसे दृश्य माध्यम से पेश किया है जो सभी पीढ़ियों को पसंद आते हैं और उनके बीच संवाद स्थापित करते हैं। वर्ष 2026 की झांकी भी इसी विजन को आगे बढ़ाती है और वंदे मातरम् को सिर्फ एक ऐतिहासिक रचना नहीं, बल्कि नैतिक, सांस्कृतिक और भावनात्मक प्रेरणा के सतत स्रोत के रूप में स्थापित करती है।

इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र(आईजीएनसीए) के सदस्य सचिव डॉ. सच्चिदानंद जोशी ने कहा कि संस्कृति मंत्रालय की झांकी किसी एक मंत्रालय या विभाग का प्रतिनिधित्व ही नहीं करती, बल्कि देश की सामूहिक भावनाओं, इतिहास और राष्ट्रीय चेतना को अभिव्यक्त करती है। उन्होंने बताया कि गणतंत्र दिवस परेड के लिए संस्कृति मंत्रालय की झांकी का विषय(थीम) ‘वंदे मातरम् के 150 वर्ष’ तय किया गया है, जो कलात्मक अभिव्यक्ति के जरिए राष्ट्रीय गीत की प्रेरणादायक ऐतिहासिक और सांस्कृतिक यात्रा को दिखाएगी।

डॉ. जोशी ने यह भी बताया कि पिछले छह वर्षों से आईजीएनसीए संस्कृति मंत्रालय की गणतंत्र दिवस झांकी को परिकल्पित करने और उसे बनाने की ज़िम्मेदारी संभाल रहा है। जबकि अधिकांश मंत्रालय और राज्य अपनी विशिष्ट उपलब्धियों या कार्यक्रमों को प्रदर्शित करते हैं, वहीं संस्कृति मंत्रालय एक अलग तरीका अपनाते हुए विविध सांस्कृतिक आयामों को एक साथ समाहित करता है—-और यही विजन वर्ष 2026 के लिए ‘वंदे मातरम् के 150 वर्ष’ विषय(थीम) में परिलक्षित होता है।

जब भारत गणतंत्र दिवस 2026 का उत्सव मनाएगा, तब वंदे मातरम् देश से सिर्फ आजादी को स्मरण करने का ही नहीं, बल्कि उसके योग्य बने रहने का भी आह्वान करेगा। इस प्रस्तुति के माध्यम से संस्कृति मंत्रालय राष्ट्रीय गीत को भारत की एकता, सांस्कृतिक गहराई और शाश्वत चेतना के प्रतीक के रूप में पुनः स्थापित करना चाहता है—जो स्वतंत्रता संग्राम की स्मृतियों को वर्तमान की जिम्मेदारियों और भविष्य की आकांक्षाओं से जोड़ता है।

भारतीय डाक विभाग करेगा 55वीं यूनिवर्सल पोस्टल यूनियन अंतरराष्ट्रीय पत्र लेखन प्रतियोगिता का आयोजन

पत्र लेखन की कला को बढ़ावा देने हेतु यूनिवर्सल पोस्टल यूनियन की वैश्विक पहल, ‘डिजिटल दुनिया में मानवीय जुड़ाव’ पर 9 से 15 साल तक के बच्चे लिखेंगे पत्र

 

भारतीय डाक विभाग द्वारा पत्र लेखन विधा को प्रोत्साहित करने के लिए प्रति वर्ष ‘यूनिवर्सल पोस्टल यूनियन अंतरराष्ट्रीय पत्र लेखन प्रतियोगिता’ का आयोजन 9 से 15 साल तक के बच्चों के लिए किया जाता है। इस संबंध में जानकारी देते हुए उत्तर गुजरात परिक्षेत्र, अहमदाबाद के पोस्टमास्टर जनरल श्री कृष्ण कुमार यादव ने बताया कि भारतीय डाक विभाग स्कूली छात्रों के बीच रचनात्मकता, आलोचनात्मक सोच और पत्र लेखन की कला को बढ़ावा देने के लिए यूनिवर्सल पोस्टल यूनियन (यूपीयू) की एक वार्षिक वैश्विक पहल के तहत युवाओं के लिए 55वीं यूपीयू अंतरराष्ट्रीय पत्र लेखन प्रतियोगिता-2026 का आयोजन करने जा रहा है। पत्र-लेखन का विषय है: “डिजिटल दुनिया में मानवीय जुड़ाव क्यों मायने रखता है, इस बारे में अपने किसी मित्र को पत्र लिखें।” पत्र हिंदी, अंग्रेजी या संविधान की आठवीं सूची में निर्दिष्ट किसी भी भाषा में 800 शब्दों की सीमा में लिखना होगा।

 

पोस्टमास्टर जनरल श्री कृष्ण कुमार यादव ने बताया कि प्रतियोगिता हेतु प्रविष्टियाँ भेजने की अन्तिम तिथि 13 मार्च, 2026 है। इच्छुक विद्यार्थी अपने विद्यालय के माध्यम से (जन्मतिथि सत्यापित करवाते हुए) निर्धारित आवेदन-पत्र (दो प्रतियों में) पासपोर्ट आकार की तीन नवीनतम फोटो साथ लगाकर संबंधित डाक अधीक्षक/प्रवर अधीक्षक को भेज सकते हैं। प्रतियोगिता हेतु आवेदन करने का प्रारूप सम्बन्धित प्रवर अधीक्षक/अधीक्षक कार्यालय से प्राप्त किया जा सकता है, हालांकि सभी मण्डलीय अधीक्षकों को व्यापक प्रचार व विभिन्न स्कूलों को प्रारूप उपलब्ध कराने के निर्देश दिये गये हैं। यदि विभिन्न स्कूलों-कालेजों के प्रधानाचार्य चाहें तो उक्त प्रतियोगिता डाक विभाग से मिलकर अपने स्तर पर भी स्वतंत्र रूप से करा सकते हैं। डाक विभाग प्रतियोगी प्रविष्टियों को उनसे एकत्र कर परिमंडलीय कार्यालय, गुजरात को भेजेगा।

 

पोस्टमास्टर जनरल श्री कृष्ण कुमार यादव ने बताया कि पत्र लेखन प्रतियोगिता का मूल्यांकन परिमण्डलीय स्तर पर गुजरात में किया जायेगा तथा श्रेष्ठ तीन पत्र लेखन को राष्ट्रीय स्तर पर सम्मिलित करने हेतु डाक निदेशालय, नई दिल्ली भेजा जायेगा। इसमें राज्य या परिमंडल स्तर पर चयनित शीर्ष तीन प्रतिभागियों को क्रमशः प्रथम, द्वितीय एवं तृतीय पुरस्कार के रूप में ₹25,000, ₹10,000 एवं ₹5,000 की पुरस्कार राशि प्रमाणपत्र सहित प्रदान की जाएगी। वहीं, राष्ट्रीय स्तर पर प्रथम, द्वितीय एवं तृतीय पुरस्कार के रूप में ₹50,000, ₹25,000 एवं ₹10,000 की पुरस्कार राशि प्रमाणपत्र सहित प्रदान की जाएगी। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर यूनिवर्सल पोस्टल यूनियन (यूपीयू) द्वारा प्रथम, द्वितीय एवं तृतीय पुरस्कार के रूप में स्वर्ण, रजत एवं कांस्य पदक, प्रमाणपत्र तथा अन्य आकर्षक पुरस्कार प्रदान किए जाएंगे। इसके अतिरिक्त, स्वर्ण पदक विजेता को यूपीयू मुख्यालय, बर्न (स्विट्ज़रलैंड) की यात्रा का अवसर अथवा यूपीयू द्वारा निर्धारित कोई अन्य विशेष पुरस्कार भी प्रदान किया जायेगा ।

 

पोस्टमास्टर जनरल श्री कृष्ण कुमार यादव ने बताया कि डिजिटल क्रांति के इस युग में, जहाँ संदेश क्षण भर में एक स्थान से दूसरे स्थान तक पहुँच जाते हैं, वहाँ पत्र लेखन का महत्व आज भी बना हुआ है। पत्र लिखना हमें ठहरकर सोचने और अपने विचारों को संयम एवं संवेदनशीलता के साथ व्यक्त करने का अवसर प्रदान करता है। हाथ से लिखा गया पत्र भावनाओं को संजोकर प्रस्तुत करने की एक सजीव कला है। इसमें केवल शब्द नहीं, बल्कि लेखक की अनुभूतियाँ और संवेदनाएँ भी समाहित होती हैं। यही कारण है कि हस्तलिखित पत्र शब्दों से कहीं अधिक, दिल की सच्ची आवाज़ होता है।

आधुनिक भारत के स्वप्नदृष्टा थे नेताजी सुभाष चंद्र बोस आजादी के लिए अपनी चिठ्ठी में पूछा-“मां, हम कब तक सोते रहेंगे?”

जयंती प्रसंग (23 जनवरी)

ये 1912 का साल था, उन्होंने अपनी मां को जो चिठ्ठी लिखी थी, वो चिट्ठी इस बात की गवाह है कि नेताजी सुभाष चंद्र बोस के मन में गुलाम भारत की स्थिति को लेकर कितनी वेदना थी। उस समय उनकी उम्र सिर्फ 15 साल थी। सैंकड़ों वर्षों की गुलामी ने देश का जो हाल कर दिया था, उसकी पीड़ा उन्‍होंने अपनी मां से पत्र के द्वारा साझा की थी। उन्‍होंने अपनी मां से पत्र में सवाल पूछा था कि, “मां, क्‍या हमारा देश दिनों-दिन और अधिक पतन में गिरता जाएगा? क्‍या ये दुखिया भारत माता का कोई एक भी पुत्र ऐसा नहीं है, जो पूरी तरह अपने स्‍वार्थ को तिलांजलि देकर, अपना संपूर्ण जीवन भारत मां की सेवा में समर्पित कर दे? बोलो मां, हम कब तक सोते रहेंगे?” इस पत्र में उन्‍होंने अपनी मां से पूछे गए सवालों का उत्तर भी दिया था। उन्‍होंने अपनी मां को स्‍पष्‍ट कर दिया था कि अब और प्रतीक्षा नहीं की जा सकती, अब और सोने का समय नहीं है, हमको अपनी जड़ता से जागना ही होगा, आलस्‍य त्‍यागना ही होगा और कर्म में जुट जाना होगा। अपने भीतर की इस तीव्र उत्‍कंठा ने उस किशोर सुभाष चंद्र को नेताजी सुभाष चंद्र बोस बनाया।

सफल जीवन के चार सूत्र कहे जाते हैं – जिज्ञासा, धैर्य, नेतृत्व की क्षमता और एकाग्रता। जिज्ञासा का मतलब है जानने की इच्छा। धैर्य का मतलब विषम परिस्थितियों में खुद को संभाले रखना। नेतृत्व की क्षमता यानी जनसमूह को अपने कार्यों से आकर्षित करना। और एकाग्रता का अर्थ है एक ही चीज पर ध्यान केंद्रित करना। अगर भारत के संदर्भ में हम देखें, तो किसी व्यक्ति के जीवन में ये चारों सूत्र चरितार्थ होते हैं, तो वो सिर्फ नेताजी सुभाष चंद्र बोस हैं। नेताजी ने एक ऐसी सरकार के विरुद्ध लोगों को एकजुट किया, जिसका सूरज कभी अस्‍त नहीं होता था। दुनिया के एक बड़े हिस्‍से में जिसका शासन था। अगर नेताजी की खुद की लेखनी पढ़ें, तो हमें पता चलता है कि वीरता के शीर्ष पर पहुंचने की नींव कैसे उनके बचपन में ही पड़ गई‍ थी।

नेताजी कहा करते थे कि, “सफलता हमेशा असफलता के स्तंभ पर खड़ी होती है। इसलिए किसी को असफलता से घबराना नहीं चाहिए।” इस छोटी सी पंक्ति के माध्यम से नेताजी ने असफल और निराश लोगों के लिए सफलता के नए द्वारा खोल दिए। यही सरलता और सहजता ही उनकी संचार कला का अभिन्न अंग थी। नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने स्वाधीनता संग्राम में भाग लेने के साथ-साथ पत्रकारिता भी की थी और उसके माध्यम से पूर्ण स्वराज के अपने स्वप्न और विचारों को शब्दबद्ध किया था।

नेताजी ने 5 अगस्त, 1939 को अंग्रेजी में राजनीतिक साप्ताहिक समाचार पत्र ‘फॉरवर्ड ब्लॉक’ निकाला और 1 जून, 1940 तक उसका संपादन किया। इस अखबार के एक अंक की कीमत थी, एक आना। नेताजी ने अपनी पत्रकारिता का उद्देश्य पूर्ण स्वाधीनता के लक्ष्य से जोड़ रखा था। नेताजी सुभाष चंद्र बोस की पत्रकारिता में यह विवेक था कि सही बात का अभिनंदन और गलत का विरोध करना चाहिए।

नेताजी अंग्रेजी शासन के धुर विरोधी थे, लेकिन ब्रिटेन के जिन अखबारों ने भारतीय स्वाधीनता संग्राम का समर्थन किया, उसकी प्रशंसा करते हुए उन अखबारों के मत को नेताजी ने अपने अखबार में पुनर्प्रस्तुत किया। नेताजी ने स्वाधीनता की लक्ष्यपूर्ति के लिए अखबार निकाला, तो रेडियो के माध्यम का भी उपयोग किया। 1941 में ‘रेडियो जर्मनी’ से नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने भारतीयों के नाम संदेश में कहा था, “तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आजादी दूंगा।” उसके बाद 1942 में ‘आजाद हिंद रेडियो’ की स्थापना हुई, जो पहले जर्मनी से और फिर सिंगापुर और रंगून से भारतीयों के लिए समाचार प्रसारित करता रहा। 6 जुलाई, 1944 को ‘आजाद हिंद रेडियो’ से नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने पहली बार महात्मा गांधी के लिए ‘राष्ट्रपिता’ संबोधन का प्रयोग किया था।

आजाद हिंद सरकार की स्थापना के समय नेताजी ने शपथ लेते हुए एक ऐसा भारत बनाने का वादा किया था, जहां सभी के पास समान अधिकार हों, सभी के पास समान अवसर हों। आज स्‍वतंत्रता के इतने वर्षों बाद भारत अनेक कदम आगे बढ़ा है, लेकिन अभी नई ऊंचाइयों पर पहुंचना बाकी है। इसी लक्ष्‍य को पाने के लिए आज भारत के सवा सौ करोड़ लोग नए भारत के संकल्‍प के साथ आगे बढ़ रहे हैं। एक ऐसा नया भारत, जिसकी कल्‍पना नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने की थी। समाज के प्रत्‍येक स्‍तर पर देश का संतुलित विकास, प्रत्‍येक व्‍यक्ति को राष्‍ट्र निर्माण का अवसर और राष्ट्र की प्रगति में उसकी भूमिका, नेताजी के विजन का एक अहम हिस्‍सा था। नेताजी ने कहा था, “हथियारों की ताकत और खून की कीमत से तुम्‍हें आजादी प्राप्‍त करनी है। फिर जब भारत आजाद होगा, तो देश के लिए तुम्‍हें स्‍थाई सेना बनानी होगी, जिसका काम होगा हमारी आजादी को हमेशा बनाए रखना।” आज भारत एक ऐसी सेना के निर्माण की तरफ बढ़ रहा है, जिसका सपना नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने देखा था। जोश, जुनून और जज्‍बा, हमारी सैन्‍य परम्‍परा का हिस्‍सा रहा है। अब तकनीक और आधुनिक हथियारी शक्ति भी उसके साथ जोड़ी जा रही है। सशस्‍त्र सेना में महिलाओं की बराबर की भागीदारी हो, इसकी नींव नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने ही रखी थी। देश की पहली सशस्‍त्र महिला रेजिमेंट, जिसे रानी झांसी रेजिमेंट के नाम से जाना जाता है, भारत की समृद्ध परम्‍पराओं के प्रति सुभाष बाबू के आगाध विश्‍वास का परिणाम था।

नेताजी जैसे महान व्यक्तित्वों के जीवन से हम सबको और खासकर युवाओं को बहुत कुछ सीखने को मिलता है। लेकिन एक और बात जो सबसे ज्यादा प्रभावित करती है, वो है अपने लक्ष्य के लिए अनवरत प्रयास। अपने संकल्पों को सिद्धि तक ले जाने की उनकी क्षमता अद्वितीय थी। अगर वो किसी काम के लिए एक बार आश्वस्त हो जाते थे, तो उसे पूरा करने के लिए किसी भी सीमा तक प्रयास करते थे। उन्होंने हमें ये बात सिखाई कि, अगर कोई विचार बहुत सरल नहीं है, साधारण नहीं है, अगर इसमें कठिनाइयां भी हैं, तो भी कुछ नया करने से डरना नहीं चाहिए। अगर हमें नेताजी को याद रखना है, तो संपूर्ण दुनिया में अपने प्रत्येक विचार, सिद्धांत, व्यवहार को किसी जन समूह के अंतिम व्यक्ति तक पहुंचाने वाले संचारक के रूप में याद रखना चाहिए। आज भारत में जनसंचार के विभिन्न माध्यम हैं। आजादी के पूर्व सीमित संचार के साधनों के बाद भी नेताजी लोकप्रिय हुए। वे तब लोकप्रिय हुए, जब जन संचार की कोई अधोसंरचना उपलब्ध नहीं थी। भारत जैसी विविधता वाले देश में एक राष्ट्र की अवधारणा को बढ़ावा देने का कार्य एक कुशल संचारक ही कर सकता था और यह कार्य नेताजी ने किया। नेताजी ने अपने व्यक्तित्व के प्रयास से स्त्री, पुरुष, शिक्षित, अशिक्षित, किसान, मजदूर, पूंजीपति, सभी को प्रभावित किया और देश की स्वतंत्रता के लिए सबको एक साथ पिरोने का कार्य किया।

आज जिस मॉर्डन इंडिया को हम देख पा रहे हैं, उसका सपना नेताजी ने बहुत पहले देखा था। भारत के लिए उनका जो विजन था, वो अपने समय से बहुत आगे का था। नेताजी कहा करते थे कि अगर हमें वाकई में भारत को सशक्त बनाना है, तो हमें सही दृष्टिकोण अपनाने की जरुरत है और इस कार्य में युवाओं की महत्वपूर्ण भूमिका है। एकता, अखंडता और आत्‍मविश्‍वास की हमारी ये यात्रा नेताजी सुभाष चंद्र बोस के आशीर्वाद से निरंतर आगे बढ़ रही है।

(लेखक भारतीय जन संचार संस्थान (आईआईएमसी), नई दिल्ली के पूर्व महानिदेशक हैं और संप्रति माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, भोपाल में जनसंचार विभाग के अध्यक्ष हैं।)

केरल में माघ महोत्सव के साथ जी उठी 270 वर्ष पुरानी परंपरा

हरिद्वार और प्रयागराज के कुंभ मेले की तरह केरल में भी एक भव्य धार्मिक आयोजन होता है, जिसे महामघ महोत्सवम कहा जाता है. इसे केरल कुंभ के नाम से भी जाना जाता है. साल 2026 में थिरुनावाया में पवित्र भरतपुझा नदी के तट पर इस ऐतिहासिक महोत्सव की शुरुआत ने एक बार फिर लोगों का ध्यान केरल की प्राचीन आध्यात्मिक परंपराओं और सांस्कृतिक विरासत की ओर खींच लिया है.
माघ महोत्सव (जिसे महामघ महोत्सव या Maha Magha Mahotsavam कहा जाता है) केरल के धार्मिक और सांस्कृतिक परंपरा से जुड़ा एक प्रमुख आयोजन है। यह त्योहार हिन्दू धर्म में माघ महीने के दौरान पुण्य स्नान, अनुष्ठानों और सांस्कृतिक मेलों के रूप में मनाया जाता है। इस आयोजन को अक्सर उत्तर भारत के कुंभ मेले के समान माना जाता है और केरल में यह दक्षिण का एक बड़ा धार्मिक संगम अनुभव प्रदान करता है।

केरल का माघ महोत्सव सिर्फ धार्मिक अनुष्ठानों का आयोजन नहीं है, बल्कि यह संस्कृति, परंपरा, आस्था और समाज के भीतर एकता का प्रतीक भी है। अपने पुराने इतिहास को पुनर्जीवित करते हुए यह महोत्सव आज के समय में भी लोगों को धर्म, आध्यात्म और सांस्कृतिक गौरव के साथ जोड़ता है।

मान्यता है कि भगवान परशुराम ने ब्रह्मा से केरल की खुशहाली के लिए यहां यज्ञ करने का अनुरोध किया था. ऐसा माना जाता है कि माघ महीने के दौरान ब्रह्मा, विष्णु और शिव की मौजूदगी और सात पवित्र नदियों का संगम नीला में डुबकी लगाने को बहुत पवित्र बनाता है।केरल के इस महोत्सव में स्नान की तिथि माह पारंपरिक पंचांग के अनुसार तय होती है, जिसमे स्नान को अधिक शुभ समय पर प्रातः किया जाता है।

ऐतिहासिक रूप से, थिरुनावाया में आखिरी बार बड़े पैमाने पर माघ महोत्सव वर्ष 1755 में मनाया गया था. जबकि 2016 से छोटे पैमाने पर रस्मी स्नान हुए हैं. 2026 का त्योहार एक बड़े दक्षिण भारतीय तीर्थयात्रा के रूप में इसकी वापसी का प्रतीक है।

ऐसा माना जाता है कि इसे बंद कराने के पीछे अंग्रेजों का यह डर था कि अगर इतनी भीड़ एक जगह एकत्र हो गई तो ये अंग्रेज सरकार के लिए खतरे की घंटी हो सकती है।

भरतपुझा के किनारे थिरुनावाया महा माघ महोत्सव का शुभारंभ राज्यपाल श्री राजेंद्र अर्लेकर ने सोमवार 19 जनवरी को नवमुकुंद मंदिर के पास हुए एक समारोह में किया। सोमवार से 3 फरवरी तक चलने वाले इस महोत्सव में हिस्सा लेने के लिए अलग-अलग जगहों से भक्त पहुंचने लगे हैं. महा माघ महोत्सव को केरल का कुंभ मेला भी कहा जाता है. लगभग 270 साल बाद बड़े जोश के साथ फिर से शुरू हो रहा है.

कार्यक्रम का उद्घाटन करते हुए, गवर्नर राजेंद्र अर्लेकर ने केरल में कुंभ मेले जैसा आयोजन देखकर खुशी जताई. उन्होंने कहा- “धर्म ध्वज सनातन धर्म का प्रतीक है. हमें अपनी परंपराओं और संस्कृति पर गर्व होना चाहिए. यह महोत्सव हमारी विरासत की रक्षा करने और भारत को विश्वगुरु बनाने में मदद करने के लिए एक सालाना परंपरा बन जाना चाहिए.” होर रोज लगभग 50,000 लोगों के आने की उम्मीद है. KSRTC ने लगभग 100 स्पेशल बसें चलाई हैं.

250 साल पुरानी परंपरा:
माघ महोत्सव की परंपरा लगभग 250 साल पुरानी है। यह आयोजन पहले महा मखन उत्सव के रूप में प्रचलित था और केरल की सांस्कृतिक पहचान का हिस्सा रहा करता था। धीरे-धीरे यह आयोजन लुप्त हो गया, लेकिन हाल ही में इसे पुनर्जीवित किया गया है।

कुंभ की तर्ज पर पुनरुद्धार:
2026 में थिरुनावया (Thirunavaya) के भरतपुझा नदी के तट पर इस महोत्सव को दक्षिण भारत का पहला कुंभ जैसा आयोजन बताते हुए पुनः शुरू किया गया। इसे उत्तर भारत के कुंभ मेले के समान धार्मिक महत्त्व और श्रद्धा के साथ मनाया जा रहा है।

धार्मिक और सांस्कृतिक धरोहर:
यह पर्व स्थानीय हिन्दू परंपरा और संस्कृति के पुनरुद्धार का प्रतीक है। परंपरागत रूप से यह आयोजन पवित्र नदी के किनारे श्रद्धालुओं के पुण्य स्नान, योग-ध्यान और धार्मिक अनुष्ठानों के लिए किया जाता रहा है।

आयोजन का समय और स्थान

तिथि:
महोत्सव का आयोजन आम तौर पर माघ माह में किया जाता है — जो भारतीय पंचांग के अनुसार जनवरी-फरवरी के बीच आता है।
2026 केरल महामघ महोत्सव 19 जनवरी से प्रारंभ होकर 3 फरवरी तक आयोजित होगा।
यह प्रमुख रूप से मलप्पुरम जिला के थिरुनावया (Thirunavaya) के भरतपुझा नदी के तट पर होता है। भरतपुझा को दक्षिण की गंगा भी कहा जाता है।

पवित्र स्नान (Magha Snan):
मुख्य आकर्षण है नदी में पुण्य स्नान करना। हिंदू धर्म में माघ मास में नदी में स्नान करने को अत्यंत पवित्र माना जाता है — ऐसा विश्वास है कि इससे पापों का नाश होता है और मोक्ष की प्राप्ति आसान होती है।विभिन्न राज्यों से संत, साधु और महात्मा इस आयोजन में शामिल होते हैं और धार्मिक संवाद, ध्यान और अनुष्ठान करते हैं। कई स्थानीय परंपराएँ, संगीत-नृत्य कार्यक्रम, भजन-कीर्तन और सांस्कृतिक आयोजन भी इस दौरान होते हैं, जो धर्म और संस्कृति को जोड़ते हैं।

आयोजन की मुख्य विशेषताएँ

ध्वजारोहण (Inauguration)
उद्घाटन समारोह आम तौर पर पवित्र झंडा फहराने और परंपरागत स्वागत कार्यक्रम के साथ होता है।
19 जनवरी 2026 को सुबह 11 बजे केरल के राज्यपाल द्वारा धर्म ध्वजा (सांस्कृतिक ध्वजा) फहराकर महोत्सव का औपचारिक उद्घाटन किया गया।
शरीर और मन की शुद्धि के लिए श्रद्धालु दिन-भर नदी में स्नान करते हैं। इसे जीवन के पापों से मुक्ति पाने वाला माना जाता है।
संतों, योगियों और महात्माओं का यह आयोजन ज्ञान-विचार, ध्यान और साधना के लिए भी एक मंच होता है।
संगीत, भजन-कीर्तन, और धार्मिक उपदेश का आयोजन लोगों को आध्यात्मिक ऊर्जा से जोड़ता है।
यह आयोजन केरल की सांस्कृतिक परंपरा को बचाने और उदात्त धार्मिक धरोहर को आगे बढ़ाने का कार्य करता है।

मंदिरों और प्रमुख स्थानों की जानकारी
नवकुंडा मंदिर थिरुनवया-यह मुख्य मंदिर है जहाँ से महोत्सव का आयोजन केंद्रित होता है। यह मंदिर मल्प्पुरम जिला भरतपूजा नदी के किनारे पर है। श्रद्धालु इसी नदी के पास स्नान और पूजा-पाठ के लिए आते हैं।

(पवित्र संगम) तिरुमति संगम घाटः नदी का वह घाट जहाँ से स्नान और मुख्य अनुष्ठान कार्यक्रम आयोजित होते हैं। यहां प्रतिदिन सुबह स्नान और वैदिक पूजा होती है।

इस महोत्सव के दौरान पास-पास स्थित कुछ स्थानीय मंदिरों में भी पूजा-संस्कार चलते हैं जैसे स्थानीय शिव, देवी या अन्य देवताओं के मंदिर, जिनमें श्रद्धालु स्नान के बाद दर्शन करते हैं।
(ये मुख्य रूप से स्थानीय परंपरा और आयोजकों के अनुसार तय होते हैं।)

ग़ज़ल विधा में शमा फिरोज़ ने बनाई पहचान

साहित्य की ग़ज़ल विधा में अपना स्थान बनाने वाली की सायरा और ग़ज़लकार श्रीमती शमा फ़िरोज़ का जन्म 13 जुलाई 1962 को कोटा, राजस्थान में हुआ। इन्होंने विवाह के उपरांत गृहस्थ संघर्ष के बीच हिंदी विषय में एमए, बीएड तथा उर्दू की शिक्षा प्राप्त की। अपने वर्ष 1978 से लेखन शुरू किया और ग़ज़ल लेखन को जीवन का ध्येय बना लिया है। इतिहासविद् और लेखक हमसफर फ़िरोज अहमद जो स्वयं भी बेहतरीन गजल लिखते हैं और इनकी प्रेरणा बन कर क्रदम-क़दम पर इनका साथ दे कर निरंतर प्रेरित करते है।

यह एक ऐसी ग़जलकार हैं जिन्होंने हिंदी और उर्दू भाषाओं में लिखकर साहित्य की इस विधा में तेजी से अपनी पहचान बनाई है और आज नामचीन ग़ज़लकारों में इनका नाम लिया जाता है। आपकी ग़ज़लें और अन्य रचनाएं राष्ट्रीय पत्र-पत्रिकाओं सहित सोशल मीडिया के राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय मंचों से नियमित प्रकाशित होती हैं। साझा संकलनों में भी नियमित प्रकाशन के लिए अपनी रचनाएं भेजती हैं। कोटा आकाशवाणी से भी वार्ताओं का प्रसारण हुआ है।

ग़ज़ल के साथ-साथ आप गीत और मुक्तक लिखने में प्रवीण हैं। प्रेम, विरह, श्रृंगार रस और वर्तमान परिदृश्य गजलों के प्रमुख विषय हैं। श्रृंगार रस की ग़ज़लों में नारी चित्रण और सौंदर्य बोध मुख्य रूप से मुखर है जो प्रेम भावनाओं को परिलक्षित करता है। वर्तमान परिवेश की ग़ज़लें राजनीतिक, सांस्कृतिक और सामाजिक समस्याओं और कुरीतियों पर प्रहार करते हुए जीवन का सही मार्गदर्शन करती हैं। कुछ गीत बाल मन के लिए भी लिखें हैं। हर रंग में रंगी इनकी ग़ज़लों में त्योहारों का वर्णन भी बड़ी खूबसूरती से देखने को मिलता है वहीं समाज और देश दुनिया पर भी निगाह रखते हुए सामाजिक विद्रूपताओं पर अपने शब्दों से प्रहार भी साफ दिखाई देता है और राष्ट्र प्रेम भी रचनाओं में साफ दिखाई देता है। समाज में अमीर और गरीब के असंतुलन पर भी अपनी कलम चला कर व्यंग्य किया है ।

इनकी ग़ज़लों में देश प्रेम और सौहार्द की भावनाएँ भी शिद्दत से रेखांकित हैं। आपकी लिखी गई करीब 350 ग़ज़लें और रचनाएं जहां भावनाओं को उद्वेलित करती हैं, कोई न कोई संदेश देती हैं वहीं मनोरंजन कर दिल को सुकून भी देती हैं।

इनका ग़ज़ल संग्रह ‘शम अ- ए- फ़रोज़ाँ’ गुफ्तगू प्रकाशन प्रयागराज (इलाहाबाद) से वर्ष 2023 में प्रकाशित हुआ है। इसमें लिखी 111 ग़ज़लें इन्हीं विषयों पर आधारित हैं। सदी के मशहूर ग़ज़लकार” नामक पुस्तक में भी 2021 में इनकी ग़ज़लें प्रकाशित हुई हैं।

आपको गुफ़्तगू द्वारा “अकबर इलाहाबादी” सम्मान और “फ़िराक़ गोरखपुरी” सम्मान से सम्मानित किया गया है। वर्तमान अंकुर नोएडा से महिला दिवस पर “वर्तमान अंकुर काव्य श्रेष्ठ महिला” सम्मान, प्रिन्स वेलफेयर ट्रस्ट द्वारा “प्रिंसेज़ शायरा 2023” से सम्मानित, “श्री कर्मयोगी साहित्य गौरव सम्मान” तथा अनेक पत्र-पत्रिकाओं तथा ऑन लाइन मंचों में ग़ज़लें प्रकाशित होने पर अनेक संस्थाओं द्वारा सम्मानित किया जा चुका है।

संपर्क : 88 अमन कॉलोनी विज्ञान नगर कोटा, राज. मो :9829746185

डॉ. प्रभात कुमार सिंघल

डॉ.प्रभात कुमार सिंघल
लेखक एवं पत्रकार, कोटा