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अमृत भारत एक्सप्रेस: किफायती लंबी दूरी की रेल यात्रा में क्रांतिकारी बदलाव

अमृत भारत एक्सप्रेस समावेशिता और व्यापकता पर स्पष्ट ध्यान केंद्रित करते हुए भारत के लंबी दूरी के रेल नेटवर्क को मजबूत करने की दिशा में एक निर्णायक कदम है। किफायती किराया, व्यापक भौगोलिक पहुंच और यात्री-केंद्रित डिजाइन के संयोजन से यह आर्थिक एकीकरण और सामाजिक सामंजस्य के लिए महत्वपूर्ण क्षेत्रों में आवागमन की जरूरतों को पूरा करती है। जैसे-जैसे नेटवर्क का विस्तार जारी रहेगा, अमृत भारत एक्सप्रेस देश भर में लोगों, क्षेत्रों और अवसरों को जोड़ने में एक स्थायी भूमिका निभाने के लिए तैयार है।

दिसंबर 2023 से 30 अमृत भारत एक्सप्रेस ट्रेनें चल रही हैं, जिनमें 9 नई सेवाएं जोड़ी गई हैं, जिससे देशभर में इनका विस्तार हुआ है। नॉन-एसी स्लीपर में लगभग 500 प्रति 1,000 किमी की दर से यात्रा की सुविधा उपलब्ध है, जिसमें कोई डायनामिक प्राइसिंग नहीं है, जिससे आम यात्री भी आसानी से यात्रा कर सकते हैं। नए रूट पूर्वोत्तर, पूर्वी, मध्य, पश्चिमी और दक्षिणी भारत को जोड़ते हैं, जिससे सीमावर्ती क्षेत्र, प्रमुख शहर और तीर्थस्थल आपस में जुड़ जाते हैं। रेल कनेक्टिविटी में सुधार से कई क्षेत्रों में रोजगार, पर्यटन, व्यापार और शिक्षा एवं स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुंच को बढ़ावा मिलता है।

भारत की सामाजिक और आर्थिक संरचना में रेल का लंबा और गहरा योगदान रहा है। इसने पीढ़ियों से यात्रियों को विशाल दूरियों और विविध भूभागों में यात्रा कराई है। किफायती जन परिवहन की जीवनरेखा के रूप में, भारतीय रेलवे ने लोगों, बाजारों और अवसरों को जोड़ने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। यह विशेष रूप से उन लोगों के लिए सच है, जिनके लिए ट्रेन यात्रा कोई विकल्प नहीं बल्कि दैनिक आवश्यकता है। भारत की पहली रेल यात्रा के लगभग दो शताब्दियों बाद, भारतीय रेलवे लाखों लोगों के लिए आवागमन को बेहतर बना रहा है। आराम, सुविधा और विश्वसनीयता का विस्तार करते हुए, जो कभी मुख्य रूप से प्रीमियम सेवाओं से जुड़ी थीं, भारतीय रेलवे ने लगातार एक अधिक समावेशी परिवहन प्रणाली का निर्माण किया है। सुरक्षा और यात्री-केंद्रित दृष्टिकोण पर विशेष ध्यान दिया जाता है। इसी सोच के अनुरूप, अमृत भारत एक्सप्रेस रोज़ाना यात्रा करने वाले यात्रियों के लिए एक महत्वपूर्ण उपलब्धि बनकर उभरी है। इसे अमृत काल की एक प्रमुख पहल के रूप में शुरू किया गया था। दिसंबर 2023 में इसके शुभारंभ के बाद से अब तक 30 अमृत भारत एक्सप्रेस ट्रेनें परिचालन में आ चुकी हैं और 9 अतिरिक्त सशुरू की जाने वाली हैं। ये मार्ग पूर्वी और उप-हिमालयी क्षेत्रों को दक्षिण, पश्चिम और मध्य भारत के प्रमुख गंतव्यों से जोड़कर संपर्क को मजबूत करेंगे। यह सभी के लिए किफायती, आरामदायक और विश्वसनीय यात्रा के प्रति राष्ट्र की प्रतिबद्धता को सुदृढ़ करता है।

अमृत भारत एक्सप्रेस भारतीय रेलवे द्वारा शुरू की गई एक आधुनिक, नॉन-एसी लंबी दूरी की स्लीपर श्रेणी की ट्रेन सेवा है, जिसका उद्देश्य विश्वसनीय, किफायती और आरामदायक यात्रा प्रदान करना है। इसे विशेष रूप से त्योहारों के मौसम और प्रवास के चरम समय के दौरान भारी यात्री संख्या को संभालने के लिए डिज़ाइन किया गया है। लगभग 500 प्रति 1,000 किलोमीटर के किराए और छोटी और मध्यम दूरी की यात्राओं के लिए आनुपातिक रूप से कम किराए के साथ, यह सेवा एक सरल और पारदर्शी किराया संरचना का पालन करती है, जिसमें कोई गतिशील मूल्य निर्धारण नहीं है। दूरी और अवसरों से अक्सर अलग-थलग पड़े क्षेत्रों को जोड़ने के लिए, अमृत भारत एक्सप्रेस रोजगार, शिक्षा और पारिवारिक आवश्यकताओं के लिए यात्रा को बढ़ावा देती है। यह पूरे देश में किफायती लंबी दूरी की कनेक्टिविटी का विस्तार करने के भारत के निरंतर प्रयासों का एक हिस्सा है।

अमृत भारत ट्रेनें पूरी तरह से नॉन-एसी हैं, जिनमें 11 जनरल क्लास कोच, 8 स्लीपर क्लास कोच, 1 पैंट्री कार और 2 सेकंड क्लास-कम-लगेज-कम-गार्ड वैन हैं, जिनमें दिव्यांगजनों के लिए विशेष डिब्बे भी हैं। आम जनता की जरूरतों को पूरा करने के लिए डिज़ाइन और निर्मित इन ट्रेनों का उद्देश्य नॉन-एसी श्रेणी के यात्रियों को आधुनिक, आरामदायक और उच्च गुणवत्ता वाला यात्रा अनुभव प्रदान करना है।

नौ नई अमृत भारत एक्सप्रेस ट्रेनों की शुरुआत से नेटवर्क का महत्वपूर्ण विस्तार हुआ है। इन नई सेवाओं का उद्देश्य लंबी दूरी की कनेक्टिविटी को मजबूत करना और देश के प्रमुख क्षेत्रों में बढ़ती यात्री मांग को पूरा करना है। भारत के उत्तर-पूर्व की अष्टलक्ष्मी: कामाख्या-रोहतक अमृत भारत एक्सप्रेस द्वारा संचालित असम के एक प्रमुख आध्यात्मिक केंद्र कामाख्या को हरियाणा के रोहतक से जोड़ने वाली यह अमृत भारत एक्सप्रेस उत्तर-पूर्व और उत्तरी भारत के बीच लंबी दूरी की कनेक्टिविटी को मजबूत करती है।

यह सेवा असम, पश्चिम बंगाल, बिहार, उत्तर प्रदेश, दिल्ली और हरियाणा में साप्ताहिक रूप से संचालित होती है, जो किफायती और आरामदायक यात्रा प्रदान करती है।
ट्रेन का समय:
.यह ट्रेन शुक्रवार को रात 10:00 बजे कामाख्या से प्रस्थान करती है और रविवार को दोपहर 2:45 बजे रोहतक पहुंचती है।
वापसी यात्रा रविवार को रात 10:10 बजे रोहतक से प्रस्थान करती है और मंगलवार को दोपहर 12:15 बजे कामाख्या पहुंचती है।
यह छह राज्यों के कई जिलों को सेवा प्रदान करती है और कामाख्या मंदिर और वाराणसी के गंगा घाटों जैसे स्थलों के पास से गुज़रती है, जिससे पहुंच, पर्यटन और क्षेत्रीय संबंधों को बढ़ावा मिलता है।
डिब्रूगढ़-लखनऊ अमृत भारत एक्सप्रेस: पूर्वोदय से भारत उदय की परिकल्पना को सशक्त बनाना
डिब्रूगढ़-लखनऊ अमृत भारत एक्सप्रेस उत्तर-पूर्वी क्षेत्र और उत्तरी भारत के बीच एक महत्वपूर्ण रेल संपर्क स्थापित करती है।

यह असम के डिब्रूगढ़ से शुरू होती है और नागालैंड के दीमापुर से होकर गुजरती है, जो सीमावर्ती क्षेत्रों को उत्तर प्रदेश से जोड़ती है।
यह मार्ग काजीरंगा राष्ट्रीय उद्यान (यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल), कामाख्या मंदिर, विक्रमशिला महाविहार, अयोध्या और लखनऊ सहित प्रमुख स्थलों के निकट से होकर गुजरता है।
तीर्थ केंद्रों और प्रमुख शहरों को जोड़ने से पर्यटन, स्थानीय व्यापार, छोटे व्यवसायों और रोजगार की गतिशीलता को बढ़ावा मिलने की उम्मीद है।
न्यू जलपाईगुड़ी-नागरकोइल अमृत भारत एक्सप्रेस: दुआर्स से नीलगिरी तक
पूर्वी हिमालय की तलहटी को देश के दक्षिणी छोर से जोड़ने वाली यह सेवा राष्ट्रीय एकता और लंबी दूरी की कनेक्टिविटी को मजबूत करती है।
यह भूटान और बांग्लादेश के निकट स्थित एक महत्वपूर्ण सीमावर्ती केंद्र न्यू जलपाईगुड़ी को कन्याकुमारी जिले के नागरकोइल से जोड़ती है।
यह सीमा से सटे क्षेत्रों, बंदरगाहों, औद्योगिक क्षेत्रों और भीतरी इलाकों को जोड़ने वाले एक रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण गलियारे पर साप्ताहिक सेवा के रूप में संचालित होती है।
यह दार्जिलिंग-दुआर्स, विशाखापत्तनम समुद्र तटों, मदुरै (मीनाक्षी मंदिर) और कोयंबटूर जैसे स्थलों के पास से गुजरती है, जिससे पर्यटन और क्षेत्रीय विकास को बढ़ावा मिलता है।
न्यू जलपाईगुड़ी-तिरुचिरापल्ली अमृत भारत एक्सप्रेस: दार्जिलिंग की तलहटी से शिक्षा केंद्र तक
यह सेवा पूर्वोत्तर के प्रवेश द्वार से तमिलनाडु के शिक्षा और मंदिर केंद्रों तक एक लंबी दूरी का रेल गलियारा बनाती है।
यह रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण सीमावर्ती स्टेशन न्यू जलपाईगुड़ी से शुरू होती है और इसे तिरुचिरापल्ली से जोड़ती है।
यह आगरा, प्रयागराज, भुवनेश्वर, कावेरी डेल्टा, तंजावुर और चेन्नई सहित कई स्थानों से होकर गुजरती है।
यह बाजारों, पर्यटन केंद्रों, शैक्षणिक संस्थानों और रोजगार केंद्रों तक पहुंच को मजबूत करती है, जिससे स्थानीय अर्थव्यवस्थाओं को बढ़ावा मिलता है।
अलीपुरद्वार-बेंगलुरु अमृत भारत एक्सप्रेस: सीमा-से-तकनीकी कनेक्टिविटी को बढ़ावा देना

एक रणनीतिक सीमावर्ती जिले और भारत की प्रौद्योगिकी राजधानी के बीच सीधा रेल संपर्क प्रदान करने वाली यह सेवा पूर्व-दक्षिण संपर्क को बढ़ाती है।

•      भूटान के पास अलीपुरद्वार को एसएमवीटी बेंगलुरु से जोड़ने वाली साप्ताहिक सेवा।

•      ट्रेन का समय:
सोमवार को रात 10:25 बजे अलीपुरदुआर से प्रस्थान करती है।
शनिवार को सुबह 8:50 बजे बेंगलुरु से वापसी करती है।
पश्चिम बंगाल, बिहार, ओडिशा, आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु और कर्नाटक के जिलों में सेवाएं प्रदान करती है, जिससे पर्यटन और आर्थिक एकीकरण को बढ़ावा मिलता है।

अलीपुरद्वार-मुंबई (पनवेल) अमृत भारत एक्सप्रेस: पूर्वोत्तर का मुंबई महानगर का प्रवेश द्वार

यह एक महत्वपूर्ण पूर्व-पश्चिम रेल गलियारा है जो उत्तरी बंगाल के सीमावर्ती क्षेत्र को मुंबई के उपनगरीय क्षेत्र से जोड़ता है।

पश्चिम बंगाल, बिहार, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र को पार करते हुए अलीपुरद्वार को पनवेल से जोड़ने वाली साप्ताहिक सेवा।

• ट्रेन का समय:
ट्रेन गुरुवार की सुबह अलीपुरद्वार से रवाना होती है और शनिवार शाम तक पनवेल पहुंचती है।
वापसी यात्रा सोमवार को पनवेल से शुरू होती है और बुधवार को अलीपुरद्वार पर समाप्त होती है।
• यह दार्जिलिंग, त्रिवेणी संगम, चित्रकूट धाम और त्र्यंबकेश्वर ज्योतिर्लिंग सहित प्रमुख स्थलों तक पहुंच प्रदान करती है, जिससे पर्यटन और व्यापार को बढ़ावा मिलता है।
संतरागाछी-तांबरम अमृत भारत एक्सप्रेस: पूर्व-दक्षिण रेल संपर्क को सुदृढ़ बनाना
पूर्व-दक्षिण रेल संपर्क को सुदृढ़ बनाते हुए, यह सेवा पूर्वी भारत को दक्षिणी महानगरों और उपनगरीय क्षेत्रों से जोड़ती है।
यह मार्ग कोलकाता के पास स्थित संतरागाछी को चेन्नई के उपनगरीय केंद्र तांबरम से जोड़ता है।
इससे पश्चिम बंगाल, ओडिशा, आंध्र प्रदेश और तमिलनाडु के जिलों को शिक्षा, स्वास्थ्य सेवा और बाज़ारों तक बेहतर पहुंच प्राप्त करने में लाभ होता है।

यह मार्ग जगन्नाथ मंदिर, कोणार्क सूर्य मंदिर (यूनेस्को स्थल) और शोर मंदिर (यूनेस्को स्थल) जैसे दर्शनीय स्थलों के पास से गुजरता है, जिससे पर्यटन और क्षेत्रीय व्यापार को बढ़ावा मिलता है।
पूर्वी भारत को राष्ट्रीय राजधानी से जोड़ना: हावड़ा – आनंद विहार अमृत भारत एक्सप्रेस
यह सेवा पूर्वी भारत और राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र के बीच एक तेज़ और भरोसेमंद रेल संपर्क प्रदान करती है।
·  हावड़ा और दिल्ली के आनंद विहार टर्मिनल के बीच साप्ताहिक सेवा।
·  ट्रेन का समय:
o  ट्रेन गुरुवार को रात 11:10 बजे हावड़ा से प्रस्थान करती है और शनिवार को सुबह 2:50 बजे आनंद विहार पहुंचती है।
वापसी यात्रा के लिए ट्रेन शनिवार को सुबह 5:15 बजे आनंद विहार से प्रस्थान करती है और रविवार को सुबह 10:50 बजे हावड़ा पहुंचती है।
यह पश्चिम बंगाल, बिहार, झारखंड और उत्तर प्रदेश के प्रमुख जिलों में सेवाएं प्रदान करता है, जिससे रोजगार और प्रशासनिक केंद्रों तक पहुंच में सुधार होता है।

कोलकाता (सियालदह)-बनारस अमृत भारत एक्सप्रेस: आस्था का संगम-ज्योतिर्लिंग से गुरुद्वारा घाट तक
पूर्वी भारत और देश के सबसे महत्वपूर्ण आध्यात्मिक केंद्रों में से एक के बीच संपर्क को मजबूत करना
कोलकाता के सियालदह को बनारस से जोड़ने वाली दैनिक सेवा।
ट्रेन का समय:
सियालदह से शाम 7:30 बजे प्रस्थान, अगले दिन सुबह 7:20 बजे बनारस आगमन।
वापसी यात्रा: बनारस से रात 10:10 बजे प्रस्थान, अगले दिन सुबह 9:55 बजे सियालदह आगमन।

यह ट्रेन बैद्यनाथ धाम ज्योतिर्लिंग, तख्त श्री पटना साहिब, काशी विश्वनाथ मंदिर और सारनाथ जैसे तीर्थ स्थलों के पास से गुजरती है, जिससे धार्मिक पर्यटन और क्षेत्रीय विकास को बढ़ावा मिलता है।

ललित गर्ग को ‘पत्रकार शिरोमणि’ सम्मान

नई दिल्ली। वरिष्ठ पत्रकार, साहित्यकार एवं सामाजिक चिंतक ललित गर्ग को उनके चार दशकों से अधिक समय से जारी सृजनात्मक, मूल्यनिष्ठ और जनसरोकारों से जुड़े पत्रकारिता योगदान के लिए ‘पत्रकार शिरोमणि’ सम्मान से सम्मानित किया जाएगा। यह सम्मान जैन दर्शन, साहित्य और सामाजिक चेतना को समर्पित एक प्रतिष्ठित संस्था ‘श्रुतसेवा निधि न्यास’ के द्वारा 8 फरवरी 2026 को उत्तर प्रदेश के फिरोजाबाद में फिरोजाबाद क्लब लिमिटेड के सुसज्जित ऑडिटोरियम में आयोजित अक्षराभिषेक उत्सव समारोह में प्रदान किया जाएगा।
न्यास के महामंत्री श्री अमित कुमार जैन ने बताया कि न्यास का श्रीमती शांतिदेवी गुप्त श्रुतसेवा अलंकरण के अंतर्गत ‘पत्रकार शिरोमणि’ के रूप में श्री गर्ग को 25000/- रुपये की नगद राशि, सम्मान पत्र, शाॅल, माला, प्रशस्ति पत्र एवं साहित्य प्रदत्त किया जाएगा। इस समारोह में देश के विभिन्न हिस्सों से पत्रकार, साहित्यकार, शिक्षाविद् एवं समाजसेवी कार्यकर्ता सहभागिता करेंगे। समारोह का उद्देश्य सहात्यि एवं पत्रकारिता के मूल्यों, सामाजिक उत्तरदायित्व और राष्ट्र निर्माण में मीडिया की भूमिका को रेखांकित करना है।
ललित गर्ग पिछले 40 वर्षों से पत्रकारिता, साहित्य एवं लेखन के क्षेत्र में निरंतर सक्रिय हैं और राजधानी दिल्ली के एक विशिष्ट एवं सम्मानित बौद्धिक व्यक्तित्व के रूप में प्रतिष्ठित रहे हैं। उन्होंने निर्भीक, विचारोत्तेजक और मूल्यपरक लेखन के माध्यम से सामाजिक, सांस्कृतिक एवं राष्ट्रीय मुद्दों पर जनचेतना को दिशा दी है। अब तक उन्होंने अनेक प्रतिष्ठित पत्रिकाओं का संपादन किया है तथा उनकी अनेक पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। श्री गर्ग विभिन्न सामाजिक और सांस्कृतिक संस्थाओं से सक्रिय रूप से जुड़े हुए हैं। वर्तमान में वे सूर्यनगर एजुकेशनल सोसाइटी के कार्यकारी अध्यक्ष तथा सुखी परिवार फाउंडेशन के अध्यक्ष हैं। सुखी परिवार फाउंडेशन के माध्यम से गुजरात सहित विभिन्न क्षेत्रों में आदिवासी कल्याण, सामाजिक सशक्तिकरण और पारिवारिक मूल्यों से जुड़ी अनेक योजनाएं संचालित की जा रही हैं। वे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से भी लंबे समय से जुड़े रहे हैं और राष्ट्रवादी विचारधारा, सांस्कृतिक चेतना एवं सामाजिक समरसता को अपने लेखन और जीवन-कार्य के माध्यम से अभिव्यक्त करते आए हैं।
आयोजक संस्था के पदाधिकारियों के अनुसार, ललित गर्ग को यह सम्मान उनकी सैद्धांतिक पत्रकारिता, साहित्यिक योगदान और सामाजिक प्रतिबद्धता के लिए प्रदान किया जा रहा है। समारोह को लेकर पत्रकारिता जगत एवं साहित्यिक क्षेत्र में विशेष उत्साह देखा जा रहा है।
प्रेषक
(बरुण कुमार सिंह)
ए-56/ए, प्रथम तल, लाजपत नगर-2
नई दिल्ली-110024,
मो. 9811051133, 9968126797

जिसे हम भूल गए उसे जापान ने सम्मान के साथ याद रखा

जिसे जापान अपना ‘भगवान’ मानता है, उसे भारत भूल गया! जापान के टोक्यो में एक भारतीय की मूर्ति लगी है और वहां के स्कूलों में उनके बारे में पढ़ाया जाता है? लेकिन दुख की बात है कि हमारे देश में 99% लोग उनका नाम तक नहीं जानते।
कहानी एक ऐसे “शेर” की, जिसने पूरी दुनिया के सामने दहाड़ कर न्याय किया था!
वह दिन था 12 नवंबर, 1948। टोक्यो के बाहरी इलाके में एक विशाल बगीचेवाले घर में टोक्यो ट्रायल चल रहा है। द्वितीय विश्वयुद्ध में हारने के बाद, जापान के तत्कालीन प्रधान मंत्री तोजो सहित 55 जापानी युद्धबन्दियों के मुकदमे की सुनवाई हो रही थी
इनमें से 28 लोगों की पहचान क्लास-ए (शांतिभंग का अपराध) युद्ध अपराधियों के रूप में की गई है। यदि सिद्ध ह़ो जाता है, तो एकमात्र सजा “मृत्युदण्ड” थी
दुनिया के 11 दिग्गज जज बैठे थे। जिनमें से एक जज भारतीय था। अमेरिका और ब्रिटेन का दबाव था। 10 जजों ने एक सुर में कहा— “जापान के कैदियों को फांसी दो!” दुनिया भर से चुने गए अंतर्राष्ट्रीय न्यायाधीश …… “दोषी” की घोषणा कर रहे हैं …. “दोषी” …… “दोषी” ………
लेकिन तभी एक गूँज उठी— “NOT GUILTY” (दोषी नहीं!) दालान में सन्नाटा छा गया। यह दहाड़ एक भारतीय की थी— जस्टिस राधा बिनोद पाल! ⚖️
1886 में पूर्वी बंगाल के कुंभ में उनका जन्म हुआ। उनकी माँ ने अपने घर और गाय की देखभाल करके जीवन यापन किया। बालक राधा बिनोद गांव के प्राथमिक विद्यालय के पास ही गाय को चराने ले जाता था।
जब शिक्षक स्कूल में पढ़ाते थे, तो राधा बाहर से सुनता था। एक दिन स्कूल इंस्पेक्टर शहर से स्कूल का दौरा करने आये। उन्होंने कक्षा में प्रवेश करने के बाद छात्रों से कुछ प्रश्न पूछे। सब बच्चे चुप थे। राधा ने कक्षा की खिड़की के बाहर से कहा …. “मुझे आपके सभी सवालों का जवाब पता है।” और उसने एक-एक कर सभी सवालों के जवाब दिए। इंस्पेक्टर ने कहा … “अद्भुत! .. आप किस कक्षा में पढ़ते हो ?”
जवाब आया, “… मैं नहीं पढ़ता … मैं यहां एक गाय को चराता हूं।”
जिसे सुनकर हर कोई हैरान रह गया। मुख्याध्यापक को बुलाकर, स्कूल निरीक्षक ने लड़के को स्कूल में प्रवेश लेने के साथ-साथ कुछ छात्रवृत्ति प्रदान करने का निर्देश दिया।
इस तरह राधा बिनोद पाल की शिक्षा शुरू हुई। फिर जिले में सबसे अधिक अंकों के साथ स्कूल फाइनल पास करने के बाद, उन्हें प्रेसीडेंसी कॉलेज में भर्ती कराया गया। M. Sc.गणित होने के बाद कोलकाता विश्वविद्यालय से, उन्होंने फिर से कानून का अध्ययन किया और डॉक्टरेट की उपाधि प्राप्त की। दो चीजों के विपरीत चुनने के संदर्भ में उन्होंने एक बार कहा था, “कानून और गणिता सब के बाद इतने अलग नहीं हैं।”
फिर से वापस आ रहा है… अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय टोक्यो।
बाकी न्यायाधीशों के प्रति अपने ठोस तर्क में उन्होंने संकेत दिया कि मित्र राष्ट्रों (द्वितीय विश्व युद्ध के विजेता) ने भी संयम और अंतरर्राष्ट्रीय कानून की तटस्थता के सिद्धांतों का उल्लंघन किया है। जापान के आत्मसमर्पण के संकेतों को अनदेखा करने के अलावा, उन्होंने परमाणु बमबारी का उपयोग कर लाखों निर्दोष लोगों को मार डाला।
राधा बिनोद पाल द्वारा बारह सौ बत्तीस पृष्ठों पर लिखे गए तर्क को देखकर न्यायाधीशों को क्लास-ए से बी तक के कई अभियुक्तों को छोड़ने के लिए मजबूर किया गया था। इन क्लास-बी युद्ध अपराधियों को एक निश्चित मौत की सजा से बचाया गया था। अंतर्राष्ट्रीय अदालत में उनके फैसले ने उन्हें और भारत को विश्व प्रसिद्ध प्रतिष्ठा दिलाई।
जापान इस महान व्यक्ति का सम्मान करता है। 1966 में सम्राट हिरोहितो ने उन्हें देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मान *’कोक्को कुनासाओ’* से सम्मानित किया। टोक्यो और क्योटो में दो व्यस्त सड़कों का नाम उनके नाम पर रखा गया है। उनके निर्णय को कानूनी पाठ्यक्रम में भी शामिल किया गया है। टोक्यो की सुप्रीम कोर्ट के सामने उनकी प्रतिमा लगाई गई है। 2007 में, प्रधान मंत्री शिंजो आबे ने दिल्ली में उनके परिवार के सदस्यों से मिलने की इच्छा व्यक्त की और वे उनके बेटे से मिले।
डॉ. राधा बिनोद पाल (27 जनवरी 1886 – 10 जनवरी 1967) का नाम जापान के इतिहास में याद किया जाता है। जापान के टोक्यो में, उनके नाम एक संग्रहालय और यासुकुनी मंदिर में एक मूर्ति है।
उनके नाम पर जापान विश्वविद्यालय का एक शोध केंद्र है। जापानी युद्ध अपराधियों पर उनके फैसले के कारण, चीनी लोग उनसे नफरत करते हैं।
वे कानून से संबंधित कई पुस्तकों के लेखक हैं। भारत में लगभग कोई भी उन्हें नहीं जानता है और शायद उनके पड़ोसी भी उन्हें नहीं जानते हैं! इरफान खान अभिनीत टोक्यो ट्रायल्स पर एक हिंदी फिल्म बनाई गई थी, लेकिन उस फिल्म ने कभी सुर्खियां नहीं बटोरीं।
बहुत सारे अंडररेटेड और अज्ञात भारतीयों में से एक। क्या आपको लगता है जस्टिस पाल को भारत रत्न मिलना चाहिए

पानीपत युध्द में मराठों का शौर्य और सक्रांति पर महिलाओं के काले कपड़े पहनने की परंपरा

पानीपत!
प्राचीन कुरुजांगल क्षेत्र का एक गांव ‘पाणिप्रस्थ'(महाभारत कालीन नाम)और वर्तमान में दिल्ली से नब्बे किलोमीटर दूर एक कस्बा है जिसको पानीपत कहते हैं ।
प्राचीनकाल से ही कुरुक्षेत्र से संबंधित  रणभूमि जो ऐतिहासिक रूप से भारतीयों के लिये अभिशापित रही  है। अगर कुरुक्षेत्र की भूमि ने दाशराज्ञ के उत्तरार्ध के रूप में समंतपंचक में हैहयों के रक्त से भरे कुंड से लेकर  महाभारत में अगणित योद्धाओं के लहू की नदी देखी तो पानीपत  ने भी अगणित योद्धाओं के मृत शरीर का असह्य भार अपनी भूमि पर  वहन किया।
इस भूमि ने तीन बार भारतीय इतिहास की दिशा को पलटा।
प्रथम युद्ध भले ही दो विदेशी लुटेरों इब्राहीम लोदी और बाबर के बीच हुआ हो लेकिन खानवा के मैदान में राजपूतों की पराजय की पूर्वभूमिका यहीं लिखी गयी क्योंकि अपनी खड्गसंचालन विद्या पर भरोसा रखने वाले ये गर्वीले योद्धा तोपों के रूप में तकनीक का महत्व समझ ही नहीं सके।
इसी मैदान में द्वितीय युद्ध एक बार फिर हिंदू स्वप्नसूर्य के लिये ग्रहण सिद्ध हुआ और इस युद्ध ने भारत को मुगलों की गुलामी की भट्टी में धकेल दिया।
भयानक संघर्ष की यह काली रात भी गुजरने लगी और महाराणा प्रताप, छ. शिवाजी और पेशवा बाजीराव के अथक प्रयासों से हिंदू मराठों के रूप में एक बार फिर सिर ऊंचा करके उत्तर की ओर इस रणभूमि की ओर चल पड़े।
जर्जर अर्थव्यवस्था से बेहाल हमारे इन मराठा योद्धाओं ने ‘हिंदू पद पादशाही’ का नारा तो अपना लिया था लेकिन उनमें बाजीराव ‘महान’ की उस समन्वयवादी प्रतिभा का पूर्ण अभाव था जिसने उदयपुर के सिसोदिया राणाओं के नेतृत्व, सतारा के छत्रपतियों उपनेतृत्व व पेशवाओं के कार्यकारी नेतृत्व में ‘महान हिंदू संघ’ का स्वप्न देखा था।
जी हाँ, ‘अटक से कटक’ का नारा देने वाले इस महान पेशवा ने उदयपुर के राणा से भेंट के दौरान  उस सिंहासन के सामने आसन ग्रहण करने से इनकार कर दिया था जिसपर कभी महाराणा प्रताप सिंहासनासीन हुये थे। उस भावनापूर्ण वातावरण में इस महान संघ की योजना बनी जो अगर कार्यरूप में परिणित हो जाती तो आज ‘हिंदू भारत’ की सीमायें कहाँ तक होतीं कल्पना करना मुश्किल है।
पर हिंदुओं का दुर्भाग्य! पुणे के कट्टर ब्राह्मणों व परिवार के सदस्यों की क्षुद्र सोच ने उनकी शक्ति, उनके प्रेम ‘मस्तानी’ को उनसे विलग कर दिया और उसके साथ उनकी साँसें भी उनसे विलग हो गईं।
उत्तराधिकारी बालाजी उपनाम  ‘नाना’ में वह योग्यता व शक्ति नहीं थी जिसका परिणाम था होलकर व सिंधियाओं जैसे सरदारों का उदय जिन्होंने राजपूतों को ही नहीं जाटों को भी अपना शत्रु बना लिया था ।
इसी बीच उत्तर पश्चिम से नादिरशाह के आक्रमण ने उसके साथ आये अफगानों की दाढ़ में खून लगा दिया था। अब वे  घाव से सड़ी और कीड़े बिजबिजाती नाक वाले अपने खूँख्वार नेता अहमदशाह अब्दाली के नेतृत्व में भारत भूमि पर गिद्धों की तरह मंडराने लगे।
सिख अभी पूर्णतः संगठित नहीं थे। ऐसे में मराठों ने इस चुनौती को स्वीकार किया और राघोबा ने लाहौर को जीतकर अटक तक पहुंचने का अपने पिता का स्वप्न साकार कर दिया। परंतु मराठों ने यहां भी एक भीषण भूल कर दी और लाहौर को किसी सिख नेता को सौंपने के स्थान पर अदीना बेग को सौंप दिया जो सिखों का शत्रु था। इस तरह राजपूतों व जाटों के बाद सिखों का भी विश्वास मराठों ने खो दिया।
मराठों के लौटते ही अब्दाली पुनः पंजाब पर चढ़ आया और इस बार उसके हमले का निशाना थी दिल्ली और उद्देश्य था पंजाब को सदैव के लिये अफगान साम्राज्य में मिलाना।
मराठों ने देश और आन की पुकार सुनी और सदाशिवराव भाऊ के नेतृत्व में चल दिये उत्तर की ओर लेकिन उत्तर में दो घटनायें हुईं जिनमें पानीपत की पराजय का रहस्य भी छुपा है और वर्तमान के लिये सीख भी।
एक ओर तो शियासंहारक कट्टर सुन्नी विदेशी अब्दाली और भारत की जमीन का अन्न खाने वाला व गंगा जमनी तहजीब की बात करने वाला लखनऊ का शिया नवाब शुजाउद्दौला इस्लाम के नाम पर आपस में मिल जाना ।  दूसरी ओर पिछला सबकुछ भुला कर हिंदुत्व के नाम पर मराठों का साथ देने आये महान कूटनीतिज्ञ व जाट शिरोमणि महाराज सूरजमल का भाऊ द्वारा जातिगत अपमान व  विश्वासघात की आशंका में उनका मराठा शिविर से पलायन।
इस्लामिक चरित्र के अनुसार प्रथम घटना तो सहज ही थी।  मराठे देशद्रोही नवाब व अब्दाली की संयुक्त सेना को अभी भी हरा सकते थे बशर्ते दूसरी घटना ना हुई होती क्योंकि उन दुर्भाग्यपूर्ण क्षणों में मराठों ने ना केवल तीस हजार प्रचंड जाट योद्धाओं को खो दिया बल्कि सूरजमल जैसे महान कूटनीतिज्ञ की सलाहों को भी गंवा दिया।
पर फिर भी मराठों के रूप में  हिंदू योद्धा इस मैदान में दूसरी बार ‘हिंदू राष्ट्रवाद’ की इबारत अपने लहू से लिखने के लिये एकत्रित हुये हैं।
14 जनवरी 1761
यह वह दिन है जिस दिन पूरा भारत सूर्यदेवता के मकर राशि में प्रवेश करने का उत्सव मना रहा था, ठीक उसी समय दक्षिण भारत से आये पैंतालीस हजार भूखे प्यासे योद्धा अपने रक्त से मातृभूमि का अभिषेक कर भारत की ‘राष्ट्रीयता’ को  सिद्ध करने आये थे कि,
 ‘हम एक राष्ट्र हैं।’
‘हम हिंदू एक राष्ट्र हैं और भारत के सुदूरतम उत्तरी खंड पर किया गया आक्रमण पूरे राष्ट्र पर आक्रमण है और उसे रोकने को दक्षिण भी उतना ही प्रतिबद्ध है जितना कि उत्तर।’
लेकिन दुर्भाग्य से अपने पूर्वर्ती व वर्तमान नेतृत्व की कूटनीतिक अकुशलता से ये योद्धा दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति में फंस गये।
भुखमरी से त्रस्त सैनिकों व सेनापतियों के दवाब में भाऊ ने आक्रमण करने का निश्चय किया और सेना को व्यूहबद्ध किया।
बाँयी ओर तोपखाना ,उनके दाँयी ओर विट्ठलराव विंचूरकर और दामाजी गायकवाड़ व उनके साथ दो हजार अफगान ।
इनके दाँयी ओर विश्वासराव  और फिर केंद्र में सदाशिव राव भाऊ तैनात थे। इनके साथ कुल चौदह हजार घुड़सवार व नामी मराठा योद्धा थे।
एन दाँयी ओर जानकोजी व महादजी सिंधिया व मल्हार राव होलकर व गंगोबातात्या तैनात थे।
इनके वाम भाग में स्वर्गीय पेशवा बाजीराव व मस्तानी का पुत्र कृष्णा अर्थात शमशेर बहादुर तैनात था।
सेना के पिछले भाग में असैनिक व्यक्तियों व महिलाओं को सात हजार सैनिकों के घेरे में रखा गया था।
मराठा सैन्य व्यूह पूरे  दो मील चौड़ाई और तीन मील लंबाई में फैला हुआ था।
खास बात यह थी कि यह व्यूह स्थिर नहीं बल्कि गतिमान था और अब्दाली को निगलने के लिये आगे बढ़ रहा था।
उधर अब्दाली ने भी कमोबेश वाम, दक्षिण व केंद्र वाला व्यूह ही रचा लेकिन दो विशिष्ट जमाव से  उसकी कुटिल रणनीति के दर्शन होते हैं।
एक तो उसने नजीब खान के  रुहेलों को वाम भाग में  इब्राहीम खां गारदी की तोपों के सामने लगा दिया और खुद नजीब खान को वाम पार्श्व में तैनात कर शुजाउद्दौला को उसके साथ चिपका दिया। इस तरह उसने न केवल नजीब के सैनिकों का नियंत्रण उससे छीनकर उनका इच्छित उपयोग किया बल्कि उसे व शुजा दोंनों को एक स्थान पर कीलित कर दिया।
दूसरे उसने 5000 सैनिकों की एक सुरक्षित  रिजर्व सेना भी रखी जिसमें उसके सबसे खूँख्वार योद्धा थे।
युद्ध प्रातः साढ़े नौ बजे शुरू हुआ।
युद्ध के प्रारंभ में ही इब्राहीम गार्दी के तोपखाने ने बढ़त कायम कर ली और उसने दांहिने भाग में तैनात अठारह हजार रुहिल्लो में से नौ दस हजार  जमीन पर बिछा दिये।
इसी बीच भाऊ दुश्मन के दक्षिण भाग की ओर मुड़कर अब्दाली के वजीर शाहवली के उन्नीस हजार घुड़सवारों पर टूट पड़े और मात्र डेढ़ घंटे के युद्ध में  मराठों ने भूखे प्यासे होते हुये भी लगभग सोलह सत्रह हजार घुड़सवारों का सफाया कर दिया।
अब्दाली का केंद्र तबाह होने लगा जो मराठों की विजय का सूचक था, इससे पूर्व ही दक्षिणी खंड इब्राहीम के नेतृत्व में मराठों के बाँये खंड द्वारा लगभग साफ किया जा चुका था।  घबराये अब्दाली ने अपने हरम के दारोगा को औरतों को दो कोस और पीछे ले जाने व पराजय होने पर कंदहार निकल जाने का आदेश दिया और स्वयं सुरक्षित सैन्य में से  डेढ़ हजार सैनिकों के साथ भागकर वापस आने वाले सैनिकों को काटने लगा।*
लेकिन उसी समय दो दुर्घटनायें घटीं।
गुस्से मे अपना नियंत्रण खोकर विंचूरकर व दामाजी घोर अनुशासनहीनता व उद्दंडता का प्रदर्शन करते हुये व्यूह तोड़कर रुहेलों पर लपक पड़े। इब्राहीम द्वारा गिड़गिड़ाकर रोकने के बाद भी वे नहीं रुके। परिणामस्वरूप ये अपने दस्तों का तो सफाया करवा ही बैठे साथ ही इनके कारण इब्राहीम गार्दी की पूरी पलटन निरीह वीरगति को प्राप्त हुई। नतीजा यह रहा कि अफगानों के दक्षिणी भाग पर काल बनकर मंडराते मराठा तोपखाने का दवाब खत्म हो गया।
इधर केंद्र में निरंतर विजयी हो रहे भाऊ के सैनिक स्वतः बेहोश होकर गिरने लगे क्योंकि उन्हें प्रयाण के बाद सुबह से पानी की एक बूंद नहीं मिली थी जबकि हर अफगान सैनिक पहले से ही शस्त्रों के साथ साथ छोटी मशक भर पानी व थोड़े भुने मांस से लैस था।
अब्दाली ने यह कमजोरी भांप ली और तुरंत अपनी सारी सुरक्षित सेना भाऊ पर झोंक दी और केंद्र की दरारें भर दीं। फिर भी भाऊ, विश्वासराव और शमशेर बहादुर पूरी शक्ति से अफगानों पर टूट पड़े। जंग का पलड़ा एक बार फिर मराठों की ओर झुकने लगा।
विश्व इतिहास में किसी भी सेना के योद्धाओं ने ऐसी अकल्पित वीरता नहीं दिखाई होगी जितनी भूख प्यास से जर्जरित हमारे इन मराठा वीरों ने। हर मराठे में जैसे छत्रपति व बाजीराव की आत्मा उतर आयी थी।
तभी युद्ध की तीसरी दुर्घटना घटी और केंद्र को चीरकर अलग थलग पड़े विश्वासराव का माथा एक जंबूरके(उंट पर लगी छोटी तोप) ने चूर कर दिया और उधर मराठों के साथ चल रहे अफगानों ने भगवी पट्टियां उतारकर मराठों पर ही आक्रमण कर दिया, ये वो अफगान सैनिक थे जो कुंजपुरा की जंग जीतकर मराठों ने अपनी सेना मे मिलाये थे, ओर इनकी पहचान के लिये इनके माथे पर भगवा पट्टी बांध दी थी।
फिर भी विजय की कुंजी मराठों में होलकर के हाथों में थी पर उन निर्णायक क्षणों में वृद्ध होलकर में जीवन का मोह उत्पन्न हुआ और वह भाऊ के आक्रमण के आदेश को ठुकराकर गंगोबातात्या के साथ युद्ध से कायरतापूर्वक पलायन कर गया।
निराश और हताश भाऊ मृत्यु को ढूंढते हुए अफगागान सेना से जा भिडे ।
इस तरह  ढाई बजे तक जीतने वाली मराठा सेना तीन बजे युद्ध हार गई और साथ ही हिंदू पद पादशाही का स्वप्न अगले 253 वर्षो के लिये धूमिल हो गया।
आगे की गाथा उन अभागी मराठा स्त्रियों की करुण गाथा है जिन्हें अपने स्वाभिमान की रक्षा के लिये कोई कुंआ भी न मिल सका क्योंकि कुँए पहले ही लाशों से भर चुके थे।
आगे की गाथा उन बचकर निकले हुये मराठा सैनिकों व अनाथ बच्चों भी है जिनके वंशज हरियाणा से बलूचिस्तान तक #रोड़  जाति के रूप में आज भी पानीपत की उस जंग की हार के दर्द को अपने ह्रदय में बसाये हुये हैं।
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दुर्भाग्य से आज भी यही घटनाएं हो रही हैं।
आज भी गंगा जमनी तहजीब के नाम पर हिंदुओं को मूर्ख बनाया जा रहा है और जातिगत श्रेष्ठता के अहंकार में हम अपने अपने ही भाइयों को स्वयं से दूर करते जा रहे हैं। अगर आप किन्हीं भी क्षणों में स्वयं को किसी से जातिगत रूप से श्रेष्ठ मानते हैं उस पल आप किसी पानीपत की हार की पटकथा लिख रहे होते हैं।

पुस्तक मेले में कुरान और वेद पर एक मजेदार चर्चा

आज पुस्तक मेला लगा हुआ था तो अर्चना दी का कल फ़ोन आया कि आयुषी कल पुस्तक मेले में चल रही है क्या तो हमने भी हां कर दी।
वहां एक विशेष मजहब वालों के स्टाल पे जाना हुआ जो वहां गए होंगे उन्होंने देखा होगा कि एक स्टाल पर लोग कुरान और वेदों की शिक्षा को एक बता रहे हैं और ईश्वर अल्लाह एक है ऐसा भी बता रहे हैं और आवाज दे देकर बुला रहे हैं कि आइये
सुनिए ….
सो हम दोनों भी उधर ही हो लिए की कम से कम देख तो लें हीं….
हुआ यूं कि दो-तीन छोरी मुंह पर कपड़ा ढके समझा रही थी तो उसने हमको बुलाया आइये आप भी तो हम भी खड़े हो गए कई बहनें पहले भी खड़ी थी, तो उसने शुरू किया इस्लाम और वेद तो एक हैं और ये राम,कृष्ण, पैगम्बर साहब सब ईश्वर ने भेजे थे और जेहाद का अर्थ बताया कि किसी भी उद्देश्य के लिए पुरूषार्थ करना औऱ मुस्लिम का अर्थ है जो ईश्वर के कार्य के लिए स्वयं को समर्पित कर दे और ये ईश्वर, अल्लाह सब एक हैं इनमें कोई भेद नहीं है जब वो स्वयं नहीं लड़ते तो हम क्यों लड़े और उसने बताया कि आज तो हिन्दू लोग संस्कृत नहीं पढ़ते…. वेद नहीं पढ़ते .गीता नहीं पढ़ते……और बोली गीता,बाइबिल सब एक हैं. वेद मनु ने बनाये, मनुस्मृति मनु ने बनाई….. जैसे आप लोग हिन्दू हो तो आप लोगों को भी संस्कृत नहीं आती…… आपने भी वेद के ब्रह्म सूत्र नहीं पढ़े होंगे……
फिर जब बहुत देर हो गई और सुना नहीं गया कुछ घणा ही हो गया तो मैंने कहा मान लीजिए आपकी इस बात से मैं सहमत हूँ कि कुरान और वेद एक है लेकिन एक बात बताओ पाकिस्तान में कुरान मानने वाले ज्यादा हैं या हिंदुस्तान में ? तो बोली पाकिस्तान में तो फिर मैंने पूछा आपके 57 देश हैं मतलब इस्लाम वालों के 57 देश हैं…. सब कुरान को मानते हैं या नहीं?  तो बोली कुरान मानते हैं तो मैंने कहा ये बताइये पाकिस्तान, अफगानिस्तान, इराक़,ईरान जितने भी मुस्लिम देश हैं एक में भी शांति है?  तो बोली वो कुरान पढ़ ही नहीं पाते….
फिर मैंने कहा कसाब ने क्या पढ़ा?
बुरहान वानी ने क्या पढ़ा?
लादेन ने क्या पढ़ा?
बगदादी ने क्या पढ़ा?
अलकायदा वालों ने क्या पढ़ा?
अफजल गुरु ने क्या पढ़ा?
लादेन ने क्या पढ़ा?
तो कह री उन सबने कुरान को समझा ही नहीं…… आपको उन्हें कुरान के बारे में बताना चाहिए मैंने कहा जब वो हमको मारने आएगा तो क्या हम कहेंगे रूक भाई पहले कुरान पढ़ 😂
कैसी बात करती हो?? वहां खड़े सब लोग हसने लगे……….फिर कहने लगी वो लोग अशिक्षित हैं पढ़ते नहीं हैं कुरान को….. उन्होंने कुरान की शिक्षा को माना ही नहीं है…..
रोजगार के लिए हथियार उठाते हैं फिर मैंने वहां खड़ी बहनों की औऱ इशारा करके कहा कि मैंने मान लिया कि इन बहनों ने संस्कृत नहीं पढ़ी,ये वेद और गीता को नहीं जानती लेकिन ये कसाब की तरह हथियार भी तो नहीं उठाती……..और अभी आप कह रही थी कि जो कुरान को पढ़ने वाला मुस्लिम है वो दूसरे के दर्द से आहत होता है तो ये बहनें जो यहां हैं और हिन्दू हैं ये कुरान नहीं जानती लेकिन जब पेशावर में कुरान के मानने वालों ने बम फोड़े तो पूछो इनकी आंखों में आंसू थे कि नहीं तो
उन सबने कहा हां हम भी दुखी थे….😂😂
तो मैंने उस मुस्लिम लड़की से कहा ये सब उदाहरण चीख चीखकर कहते हैं कि वेद शांति का संदेश देते हैं और कुरान जो देती है उसको तो सारी दुनिया जानती है…….
फिर मुझे कह रही कि आपने संस्कृत और वेद पढ़े होते तो आप
कुरान को अलग ही नहीं मानती फिर आप स्वयं कहती कि वेद
औऱ कुरान एक है मैंने कहा सुन बहना तू पूछ वेदों के बारे में क्या पूछना है?
मैंने वेद पढ़े हैं और मुझे संस्कृत अच्छे से आती है……. इसलिये मुझे समझ में आता है की आपका मूल उद्देश्य क्या है.. और मैंने
कहा थोड़ा ज्ञान दुरुस्त कर बहिना मनु ने वेद नहीं मनुस्मृति लिखी है……. खूब लंबी बहस चली एक दो मुस्लिम भी sry करके बोलने आये फिर वो जितनी हिन्दू बहनें खड़ी थी वो सब समझ गई ये अब फंस गए तो हसते हुए चलने लगी फिर इतना अर्चना दी ने उन मुस्लिम लड़कियों से बात की इतना मैं उन हिन्दू बहनों के पीछे गई तो वो हंसने लगी मैंने कहा बावला बना रही थी बहुत तेज हैं ये अपनी बुराई न बताती……आपको फंसा रही थी…..फिर वो हंसते हुए कहने लगी आप लोगों ने बढिया कर दिया…. बेज्जती कर दी तगड़े से…..फिर एक और उन्हीं में से एक किताब लेके आई आप ये पढ़ो इसमें सब है…. फलाना ढिकाना….. लेकिन एक बात है एक बार को वें घूम तो गए ही थे😂😂😂
बात बहुत करनी थी लेकिन उनकी शक्ल देखकर
हंसी रोक नहीं पाई मैं और निकल ली😂😂😂😂
सब मुस्लिमों ने हाथ मिलाकर इज्जत के साथ विदा किया बात तो बहुत हुई लेकिन याद इतना सा ही रह गया…..
कहने का मतलब ये ही है अपने बच्चों को वेदों के बारे में बताओ हिंदुओं , संस्कृत कम से कम इतनी तो पढ़ाओ ही कि कोई चलता फिरता यूँ ही न फुसला ले वर्ना वो दिन दूर नहीं ki ये हमारे वालों को अपना बना लेंगे….. वो तो हम थोड़ा जानते थे तो अड़ गए वर्ना जितनी वहां हिंदू बहनें खड़ी थी वो तो पूर्ण प्रसन्न हो रही थी।
यही है इनका तरीका मीठा जहर बनकर अंदर घुस जाते हैं और
धर्मांतरण कराते हैं और हम केवल अपने परिवार को भी नहीं संभाल पा रहे कुछ भी हो लेकिन भयावह था। अगर यही रहा तो स्थिति अच्छी नहीं है। लव जेहाद कैसे कर जाते हैं उनके बीच जाओगे तो समझ पाओगे….. स्थिति जितना समझते हैं उससे ज्यादा भयावह है…….
एक पाठिका द्वारा भेजा गया संस्मरण
#ramayenge #aayushirana #draayu #ShriRamMandir #गुरुकुल_प्रणाली_चलती_रहे
#hinduism #भारतीय

भारतीय चिंतन से प्रेरित सृजनकार डॉ.अपर्णा पांडेय

संस्कृत, बांग्ला कृतियों का हिंदी में अनुवाद, ढाका में हिंदी की सेवा और बाल साहित्य के क्षेत्र में बच्चों को साहित्य से जोड़ने में उल्लेखनीय कार्य कर अलग पहचान बनाने वाली रचनाकार डॉ.अपर्णा पांडेय का जन्म साहित्यिक, सांस्कृतिक व आध्यात्मिक रूप से समृद्ध परिवार संस्कृत और ज्योतिष के प्रकांड विद्वान आचार्य राष्ट्रपति पुरस्कार प्राप्त पिता लाल बिहारी द्विवेदी एवं माता कृष्णा देवी द्विवेदी के परिवार में चौथी पुत्री के रूप में 1970 में मैनपुरी, उत्तर प्रदेश में हुआ। विवाह के पश्चात 1988 में यह कोटा आ गई।
आपने हिंदी और संस्कृत से स्नातकोत्तर की डिग्री और ‘पुराणों में शुकदेव-एक समालोचनात्मक अध्ययन’ विषय पर पीएच.डी. की उपाधि प्राप्त की।  आश्रम के वातावरण में पली-बढ़ी और संतों का सान्निध्य प्राप्त हुआ। इनके पिता उत्तर प्रदेश के सुप्रसिद्ध श्रीमद्भागवत कथा वाचक और ज्योतिष विद्या के प्रकांड विद्वान, प्रोफ़ेसर रहे हैं।  आप 2011 में राजस्थान लोक सेवा आयोग से चयनित होकर शिक्षा विभाग में आई और वर्तमान में सैकंडरी विद्यालय, सुल्तानपुर में सेवारत हैं। आपने भारतीय विदेश सेवा में चयनित होकर 2013 से 2017 तक प्रतिनियुक्ति पर भारतीय सांस्कृतिक संबंध परिषद, नई दिल्ली द्वारा सांस्कृतिक प्रतिनिधि और हिंदी शिक्षक के रूप में ढाका में हिंदी भाषा और संस्कृति को बढ़ावा देने का कार्य किया। जहाँ इंदिरा गांधी सांस्कृतिक केंद्र और आधुनिक भाषा इंस्टीट्यूट, ढाका विश्वविद्यालय में प्रथम हिंदी पीठ के रूप में भी कार्य किया और ढाका विश्वविद्यालय में (एकवर्षीय पाठ्यक्रम) शुरू किया।
     रचनाकार हिंदी, संस्कृत और बांग्ला भाषाओं पर समान अधिकार रहती हैं। इन्होंने हिंदी भाषा में गद्य और पद्य विधाओं में संस्मरण, गीत ग़ज़ल, उपन्यास, निबंध, समीक्षाएं आदि लेखन के साथ-साथ संस्कृत और बांग्ला पुस्तकों का हिंदी में अनुवाद किया। युवाओं को भारतीय भाषा, ज्ञान और संस्कृति से अवगत कराना और जिज्ञासा पैदा कर अपनी संस्कृति के प्रति श्रद्धा भाव पैदा करना इनके लेखन का मूल उद्देश्य है। आप कथेत्तर विधा में हिन्दी के प्रति प्रतिबद्ध और समर्पित हैं।
आपका लेखन इनके भ्राता श्री आचार्य इच्छाराम द्विवेदी ‘प्रणब’ जी और पिता श्री आचार्य लाल बिहारी द्विवेदी के साहित्य से प्रेरित है। गोपाल दास नीरज, कुंवर बेचैन, राजेंद्र मिश्र, बच्चू लाल अवस्थी, राधा वल्लभ त्रिपाठी, आचार्य रमाकांत शुक्ल जैसे विख्यात संस्कृत के प्रकांड विद्वानों का घर पर प्रतिवर्ष संस्कृत शोध संगोष्ठियों में, काव्य गोष्ठियों में, हिंदी गोष्ठियों में आना-जाना होता था। अतः आध्यात्मिक और साहित्यिक वातावरण होने के कारण बचपन से ही लेखन में रुचि जागृत हुई। आपने आई. एम. पुणे, हरिहर आश्रम, कनखल, हरिद्वार, सर्वभाषा साहित्यकार कुंभ, अजमेर, पॉन्डिचेरी विश्वविद्यालय, अंतरराष्ट्रीय विश्व हिंदी सम्मेलन मॉरीशस, विश्व हिंदी परिषद् नई दिल्ली, आनंद, (गुजरात) आदि अनेक मंचों से अपने शोध पत्रों का प्रस्तुतिकरण कर चुकी हैं। आपने 11वें विश्व हिंदी सम्मेलन मारीशस 2018 में राजस्थान का प्रतिनिधित्व कर वहाँ प्रसून जोशी अध्यक्ष- केंद्रिय फ़िल्म प्रमाणन बोर्ड, कुंवर बेचैन, अशोक चक्रधर जैसे ख्यातनाम साहित्यकारों से लेखन हेतु प्रेरणा प्राप्त की।
  इन्होंने हिंदी के साथ-साथ संस्कृत में भी उल्लेखनीय कार्य किया है। कॉलेज स्तर पर पाठ्यक्रमों में लगी हुई संस्कृत की पुस्तकों मेघदूतम , सांख्यकारिका, श्रीमद्भागवतगीता एवं योग दर्शन का हिंदी में अनुवाद कर छात्रों के लिए सुगम बनाया है। मेघदूतम गीतिकाव्य काव्यानुवाद पर आचार्य अग्निमित्र शास्त्री लिखते हैं कि अनुवाद में हिंदी के महाकवि जयशंकर प्रसाद, आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी की शास्त्रीय हिंदी के झलक प्रत्यक्ष रूप से दृष्टिगोचर होती है। निःसंदेह संस्कृत के प्राचीन ग्रंथों का हिंदी अनुवाद जैसा कठिन कार्य इनकी हिंदी की महत्वपूर्ण सेवा है।  उन्मेश, प्रवासी मन – काव्य संग्रह आध्यात्मिक, सांस्कृतिक, राष्ट्रीय भाव, पर्यावरण संरक्षण की मावनाओं से ओतप्रोत है।
ढाका प्रवास के दौरान लिखी गई यह ऐसी कृति है जिसमें महिलाओं के मन में रूढ़िवादी सोच के प्रति तीव्र आक्रोश, तो उससे मुक्त होने की छटपटाहट भी दिखाई देती है। साथ ही कविताएँ उदात्त प्रेम की पक्षधर हैं, जो कण-कण में ईश्वरीय रूप को दृष्टिगत करती हैं। कवि, समीक्षक स्व. वीरेंद्र विद्यार्थी लिखते हैं कि आत्मा के चिर संतति’ गीति-संस्कृति का प्रथम प्रस्फुटन जगत और जीवन का खूबसूरत दर्पण बन गया है। जिसके जूम लेंस में आलोकित अतीत रक्तरंजित इतिहास की कौन किरचें वर्तमान का भाष्य भविष्य की भव्यता सृष्टि का व्याकरण अपने को बार-बार निहारते, निखारते और पैनाते रहते हैं। बांग्ला भाषा के लेखक ‘बंदे अली मियां’ की पुस्तक ‘प्रिय गल्प’ कहानियों का हिंदी में अनुवाद किया। इन कहानियों का उद्देश्य बच्चों को प्राकृतिक परिवेश से जोड़ना उनकी बाल सुलभ कल्पनाओं को चित्रित करना है। युवावस्था के प्रेम पर आधारित दो उपन्यास ‘तड़प’ और ‘दो मित्रों की कथा’ लिखे हैं। विदेश प्रवास और हिंदी सेवा कृति में आपने अपने अनुभवों और संस्मरणों को खूबसूरती से लिपिबद्ध किया है। हाल ही में भीलवाड़ा की लेखिका श्रीमती शिखा अग्रवाल द्वारा इसका अंग्रेजी भाषा में अनुवाद प्रकाशित हुआ है। वैचारिक पुष्प गुच्छ एवं समीक्षाएं (शोधपरक और मौलिक निबंध)  भी इनका मुख्य सृजन है।
  आपको साहित्य के क्षेत्र में अनेक सम्मान और साहित्यिक प्रतियोगिताओं में पुरस्कार प्राप्त किए हैं। बांग्लादेश में भारत के राजदूत हर्षवर्धन श्रृंखला एवं डायरेक्टर जनरल (साउथ एशिया) द्वारा उत्कृष्ट कार्य हेतु प्रशस्ति पत्र से अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सम्मानित किया गया है। जवाहरलाल नेहरू बाल साहित्य अकादमी, जयपुर द्वारा बांग्ला भाषा की बाल कथाओं की कृति ‘प्रिय गल्प’ पर” रांगेय राघव पुरस्कार’ से सम्मानित किया। भारतेंदु समिति, कोटा द्वारा ‘साहित्य श्री’ सम्मान, राजमाता शिवरानी देवी, कोटा, स्व. सुनील दत्त राज्यसभा सांसद एवं पूर्व केंद्रीय मंत्री, सुश्री शबाना आजमी राज्यसभा सांसद, श्री एस. एन. थानवी, शिक्षा सचिव, राजस्थान आदि द्वारा उत्कृष्ट कार्य हेतु सम्मान प्राप्त किया। इन प्रमुख पुरस्कारों के साथ-साथ दो दर्जन से अधिक संस्थाओं द्वारा आपको पुरस्कृत और सम्मानित किया गया है।
( संपर्क : सी-44, गायत्री बिहार, पुलिस लाइन,कोटा ,राज. मो. 77348 33428 )
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डॉ. प्रभात कुमार सिंघल
लेखक एवं पत्रकार, कोटा

भारतीय डाक विभाग ने अहमदबाद में आयोजित किया ‘पतंग उत्सव

डाक विभाग द्वारा आयोजित ‘पतंग उत्सव’ में स्कूली बच्चों के साथ पोस्टमैन और ग्रामीण डाक सेवकों ने भी रंग-बिरंगी पतंगों को आसमान की बुलंदियों तक पहुँचाकर किया हर्षोल्लास

 अहमदाबाद।  गुजरात के अहमदाबाद में उत्तरायण पर्व पर आयोजित ‘अंतरराष्ट्रीय पतंग उत्सव’ (Ahmedabad International Kite Festival) देश-दुनिया में मशहूर है। इसमें देश-दुनिया से तमाम लोग रंग-बिरंगी पतंगें उड़ाने और देखने के लिए एकत्र होते हैं। इस बार भारतीय डाक विभाग ने भी पहल करते हुए अहमदाबाद में ‘पतंग उत्सव-2026’ का आयोजन किया, जिसमें तमाम अधिकारियों-कर्मचारियों ने सपरिवार बढ़-चढ़ कर भाग लिया। साइंस सिटी के पास वी. नाइन क्रिकेट ग्राउंड में आयोजित उत्सव में स्कूली बच्चों के साथ विभिन्न क्षेत्रों से आए पोस्टमैन और ग्रामीण डाक सेवकों ने लेटर बॉक्स, डाक टिकट, मेल वैन, स्पीड पोस्ट और पार्सल, डाकघर बचत बैंक, डाक जीवन बीमा, ग्रामीण डाक जीवन बीमा, इण्डिया पोस्ट पेमेंट्स बैंक इत्यादि के साथ-साथ डाक सेवाओं के विभिन्न आयामों को सहेजती रंग-बिरंगी पतंगों को आसमान की बुलंदियों तक पहुँचाकर हर्षोल्लास व्यक्त किया। कार्यक्रम का शुभारंभ उत्तर गुजरात परिक्षेत्र के पोस्टमास्टर जनरल श्री कृष्ण कुमार यादव ने अहमदाबाद सिटी मंडल के प्रवर अधीक्षक डाकघर श्री चिराग मेहता संग किया।

पोस्टमास्टर जनरल श्री कृष्ण कुमार यादव ने कहा कि जिस तरह उत्तरायण नई ऊर्जा और नई शुरुआत का प्रतीक है, उसी तरह भारतीय डाक हर घर तक भरोसे, सेवा और संवाद की रोशनी पहुँचाता है। ये लोकपर्व सूर्य के उत्तरायण होने के साथ जीवन में सकारात्मक परिवर्तन, परिश्रम के सम्मान और प्रकृति के प्रति कृतज्ञता का संदेश देते हैं। उन्होंने सभी को उत्तरायण, मकर संक्रांति, पोंगल एवं माघ बिहु के पावन पर्व की हार्दिक शुभकामनाएँ देते हुए कामना व्यक्त की कि ये पर्व सभी के जीवन में सुख, समृद्धि, स्वास्थ्य और नवऊर्जा का संचार करें तथा सामाजिक एकता और सांस्कृतिक सद्भाव को और सुदृढ़ करें

साहित्य अकादमी ने नई दिल्ली विश्व पुस्तक मेला-2026 में फेस-टू-फेस और कहानी पठन कार्यक्रमों का आयोजन किया

नई दिल्ली। साहित्य अकादमी ने 15 जनवरी 2026 को नई दिल्ली विश्व पुस्तक मेला 2026 के दौरान हॉल नंबर 2, भारत मंडपम, नई दिल्ली में भारत की बौद्धिक परंपराओं पर एक फेस-टू-फेस कार्यक्रम और एक पैनल चर्चा का आयोजन किया।

फेस-टू-फेस कार्यक्रम में प्रख्यात मलयालम लेखक और साहित्य अकादमी पुरस्कार विजेता श्री केपी रामानुन्नी ने भाग लिया और अपने साहित्यिक जीवन और कार्यों से जुड़े अनुभव साझा किए। उन्होंने बताया कि वे कोझिकोड शहर से हैं, जिसे यूनेस्को द्वारा भारत का पहला और एकमात्र साहित्य नगर घोषित किया गया है। सत्र के दौरान, उन्होंने अपनी मलयालम लघु कहानी ‘एमटीपी’ (गर्भाधान की चिकित्सा पद्धति) के कुछ अंश पढ़े, जिसका अंग्रेजी अनुवाद अबू बकर काबा ने किया है। नाटक के रूप में लिखी गई और सात भागों में विभाजित यह कहानी, लेखक के अपने जीवन के अनुभवों से प्रेरित होकर, गर्भपात की चिकित्सा प्रक्रिया से जुड़े गहन मानवीय नाटक का चित्रण करती है। अपने साहित्यिक सफर पर विचार करते हुए, श्री रामानुन्नी ने अपने प्रारंभिक वर्षों के बारे में बताया कि किशोरावस्था में वे एक साथ आध्यात्मिक और साम्यवादी साहित्य पढ़ रहे थे, जिससे उन्हें आंतरिक संघर्ष का सामना करना पड़ा और उन्होंने मनोचिकित्सक से परामर्श लिया। हालांकि यह उपचार निरथर्क साबित हुआ, लेकिन इस अनुभव ने उन्हें लेखन के माध्यम से सुकून और अभिव्यक्ति पाने के लिए प्रेरित किया।

फेस-टू-फेस कार्यक्रम के बाद भारत की बौद्धिक परंपराओं पर एक पैनल चर्चा हुई, जिसमें प्रो. रवैल सिंह, प्रो. हरेकृष्ण सतपथी और प्रो. बसवराज कालगुडी ने भाग लिया। श्री रवैल सिंह ने पंजाब की बौद्धिक विरासत पर चर्चा करते हुए तक्षशिला के प्राचीन शिक्षा केंद्र से लेकर नाथ योगी, सूफीवाद और सिख धर्म तक के इतिहास का वर्णन किया। प्रो. हरेकृष्ण सतपथी ने प्राचीन और समकालीन शिक्षा प्रणालियों की तुलना करते हुए ब्रह्मा, विष्णु और महेश को आदिगुरु बताया और वेदों का एक श्लोक सुनाया। प्रो. बसवराज कालगुडी ने परिधीय ज्ञान प्रणालियों पर बात करते हुए, उन्हें मौखिक और लिखित परंपराओं में वर्गीकृत किया और प्राचीन भारत में जनजातीय और कृषि संबंधी ज्ञान परंपराओं के महत्व पर प्रकाश डाला।

दोनों कार्यक्रमों को दर्शकों द्वारा खूब सराहा गया, जिनमें विद्यार्थी, शिक्षक, लेखक और साहित्य प्रेमी शामिल थे, और इनमें सार्थक संवाद और चर्चा देखने को मिली। साहित्य अकादमी की ओर से सहायक संपादक डॉ. संदीप कौर ने धन्यवाद प्रस्ताव दिया।

अज़ीम प्रेमजी विश्‍वविद्यालय का तीसरा कैंपस राँची में शुरु होगा

राँची। आज अज़ीम प्रेमजी विश्‍वविद्यालय ने राँची में अपने तीसरे कैंपस की शुरुआत करने की घोषणा की है। इस कैंपस की शुरुआत के साथ ही अज़ीम प्रेमजी फ़ाउण्डेशन ने पूर्वी भारत में समाज से जुड़ी हुई और संदर्भ के मुताबिक शिक्षा देने की प्रतिबद्धता को आगे बढ़ाया है। नया कैंपस विश्‍वविद्यालय के शिक्षा, विकास, सार्वजनिक स्वास्थ्य और प्रशासन के क्षेत्र में लंबे अनुभवों पर आधारित है। यह अकादमिक शिक्षा को समाज और क्षेत्र की ज़मीनी स्तर की सच्चाइयों को जोड़ने के नज़रिए को दिखाता है।

अज़ीम प्रेमजी विश्‍वविद्यालय, राँची कैंपस के नामित कुलपति, ज़ुल्फ़िकार हैदर ने कैंपस के उद्देश्यों के बारे में बताते हुए कहा, “हम चाहते हैं कि हमारा राँची कैंपस भी क्षेत्र की सामाजिक और विकास की ज़रूरतों से नज़दीकी से जुड़े। हम चाहते हैं कि हमारा कैंपस क्षेत्र में ज्ञान को बढ़ावा देकर मानवीय विकास की राहें और भी बेहतर बनाए। विश्वविद्यालय में विद्यार्थियों की सीखने की ज़रूरतों और अलग-अलग क्षेत्रों में काम करने वाले कामकाजी पेशेवरों को ध्यान में रखकर कई तरह के कोर्सेस व कार्यक्रम शुरु किए जाएँगे। झारखंड के विविध आदिवासी और दूसरे सभी समुदायों की परंपराओं, इतिहास, ज्ञान परंपराओं और दुनिया के देखने-समझने के नज़रिए से अच्‍छी तरह से जुड़ना अज़ीम प्रेमजी विश्वविद्यालय का मकसद है।”

अज़ीम प्रेमजी विश्वविद्यालय का 150 एकड़ का कैंपस इटकी में बन रहा है। इस कैंपस में अत्याधुनिक सुविधाओं से युक्त क्लासरूम, प्रयोगशालाएँ, खेल-कूद की सुविधाएँ और विद्यार्थियों के लिए छात्रावास व शिक्षकों के लिए आवास की सुविधाएँ बनाई जाएँगी। इस कैंपस में एक अस्पताल और मेडिकल कॉलेज भी बनाने की योजना है। पर्यावरण को ध्यान में रखते हुए इस कैंपस को ऊर्जा-कुशल सिस्टम से युक्त बनाया जाएगा और बारिश के पानी को इकट्ठा कर इस्तेमाल करने लायक बनाने सुविधा भी होगी।

अज़ीम प्रेमजी विश्वविद्यालय के राँची कैंपस में स्नातक, स्नातकोत्तर, डिप्लोमा, सर्टिफिकेट और सतत शिक्षा कार्यक्रम होंगे। इसमें एजुकेशन, विकास अध्ययन, अर्थशास्त्र, सार्वजनिक स्वास्थ्य, जलवायु परिवर्तन व सस्टेनेब्लिटी जैसे विषयों का अध्ययन होगा। ये कार्यक्रम झारखंड और पूर्वी भारत के विकास की ज़रूरतों को ध्यान में रखकर तैयार किए गए हैं। इन कार्यक्रमों को अकादमिक और जमीनी अनुभव रखने वाले शिक्षक पढ़ाएँगे।

इस अकादमिक वर्ष में दो मास्‍टर्स प्रोग्रैम शुरू किए जाएँगे – एम.ए. अप्लाइड इकोनॉमिक्स और एम.ए.डेवलपमेंट। इसके साथ ही लोकल डेवलपमेंट, प्रारंभिक बाल शिक्षा और शैक्षणिक मूल्यांकन विषयों में प्रोस्ट गैजुएशन डिप्लोमा भी शुरू किए जाएँगे। इस साल सार्वजनिक स्वास्थ्य, शिक्षा और विकास से जुड़े कई अल्प-कालिक सर्टिफिकेट प्रोग्रैम भी शुरु होंगे।

अज़ीम प्रेमजी विश्वविद्यालय के व्यापक उद्देश्यों को बताते हुए ज़ुल्फ़िकार हैदर ने कहा, “अज़ीम प्रेमजी फ़ाउण्डेशन के मार्गदर्शक मूल्यों के आधार पर सामाजिक भलाई के लिए अज़ीम प्रेमजी विश्‍वविद्यालय की स्थापना की जा रही है। शिक्षा, पढ़ाई-लिखाई, रिसर्च और ज़मीनी स्तर पर काम करते हुए हम न्यायपूर्ण, समानता पर आधारित, मानवीय और बेहतर-से-बेहतर स्वावलंबी समाज बनाने में अपना योगदान देना चाहते हैं। हमारा राँची कैंपस झारखण्ड और देश के पूर्वी हिस्से में नॉलेज क्रिएशन, समाज के हितों से जुड़े विचारों को बढ़ावा देने, यहाँ के लोगों के कौशल व क्षमताओं को बढ़ाने में अपनी अहम भूमिका निभाएगा।”

अज़ीम प्रेमजी विश्‍वविद्यालय के बारे में

अज़ीम प्रेमजी विश्वविद्यालय, बेंगलूरु की स्थापना कर्नाटक सरकार के ‘अज़ीम प्रेमजी यूनिवर्सिटी एक्ट 2010’ द्वारा की गई है। अज़ीम प्रेमजी विश्वविद्यालय, भोपाल की स्थापना ‘मध्य प्रदेश निजी विश्‍वविद्यालय (स्थापना एवं संचालन) द्वितीय संशोधन अधिनियम, 2022’ तहत की गई है। अज़ीम प्रेमजी विश्वविद्यालय, राँची की स्थापना झारखण्ड सरकार द्वारा अधिनियमित अज़ीम प्रेमजी विश्‍वविद्यालय अधिनियम, 2022 के तहत की जा रही है।

अज़ीम प्रेमजी फ़ाउण्डेशन इन तीनों विश्वविद्यालयों की प्रायोजक संस्‍था है। फ़ाउण्डेशन सामाजिक हित और न्यायपूर्ण, समानता, मानवता और सस्टेनेबल समाज बनाने के मकसद से विश्वविद्यालयों की स्थापना कर रहा है।

Deepika Guleria
Senior Executive – Media Relations
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भारत भवन में जहीरुद्दीन पर चर्चा का औचित्य

भारत भवन, भोपाल मध्यप्रदेश की एक श्रेष्ठ संस्था है। इसमें साहित्य, कला और रंगकर्म पर विमर्श और प्रस्तुतियां होती है। साहित्य प्रभाग का नाम है वागर्थ। रंगकर्म प्रभाग का नाम है रंगमण्डल। चित्रकला प्रभाग का नाम है, रूपंकर। संगीत प्रभाग का नाम है अनहद। ये चार विभाग प्रारंभ से हैं। बाद में पाँचवा प्रभाग सिनेमा का बना, जिसका नाम रखा गया छवि। परन्तु मूल संकल्पना में प्रारंभिक चार प्रभाग ही थे। इन प्रभागों के ही कार्यक्रम यहाँ होते रहे है। वागर्थ के अंतर्गत साहित्यिक विमर्श किया जाता रहा है, जिनमें समीक्षकों का अखिल भारतीय समागम ‘‘समवाय’’ के नाम से हुआ था, जिसमें अज्ञेय जी, विष्णुकांत शास्त्री, रमेशचन्द्र शाह, नामवरसिंह सहित भारत के सभी दिग्गज समीक्षक आये थे और मैं भी आमंत्रित था। कविता एशिया में एशिया के शीर्ष कवि शामिल हुए थे। इसके रंगमण्डल में बी.व्ही. कारंत ने महत्वपूर्ण कार्य किया और अनहद में देश के सभी महत्वपूर्ण संगीतज्ञ, गायक एवं नर्तक- नर्तकियाँ आते रहे, जिनकी संख्या 150 से अधिक है। रूपंकर में सैयद हैदर रजा सहित अनेक विश्वक विख्यात चित्रकारों का योगदान रहा है और उनके चित्र यहाँ है। वनवासी कला के क्षेत्र में जे. स्वामीनाथन ने इसे वैश्विक प्रतिष्ठा दिलायी थी।
भारत भवन, मध्यप्रदेश शासन द्वारा स्थापित है और इसे केन्द्रीय अनुदान भी मिलता है तथा इसके न्यासियों में केन्द्र के प्रतिनिधि अवश्य  होते है। समकालीन विमर्श ही यहाँ की विशेषता रही है। क्योंकि यह इतिहास या दर्शन का केन्द्र नहीं है। यह साहित्य, संगीत, नाट्य, नृत्य और चित्रकला सहित सभी रूपंकर कलाओं का केन्द्र है। इन विषयों पर समकालीन राष्ट्र जीवन के प्रमुख विमर्श यहाँ होते रहने की परम्परा है।
इन दिनों भारत का समकालीन विमर्श क्या है? श्रीराम जन्मभूमि में भव्य मंदिर का निर्माण और उससे उभरी विराट जनचेतना भारत का सर्वोपरि विमर्श है। ऑपरेशन सिन्दूर के बाद भारत के शौर्य को जाग्रत करने वाले नाट्य एवं साहित्य सर्वोपरि विमर्श है। सोमनाथ स्वाभिमान पर्व समकालीन विमर्श है। स्वामी विवेकानंद के चिंतन से युवा वर्ग को मिलने वाली प्रेरणा समकालीन विमर्श है।
जहीरुद्दीन बाबर भारत भवन के लिए कोई विमर्श का विषय नहीं है। आप जहीरुद्दीन के भक्त हो या उस पर आसक्त हो या उसके निंदक हो, इस पर किसी इतिहास शोध संस्था में जाकर आप अपना परचा पढ़ सकते है। उस पर बहस कर सकते हैं। भारत भवन उसकी जगह नहीं। क्योंकि जहीरुद्दीन किसी समकालीन विमर्श का विषय ही नहीं है। अपने प्रिय यार बाबरी पर फिदा और नशे में धुत जहीरुद्दीन ने चार साल में भारत में कहां-कहां ठोकरे खाई, और कैसे तकलीफ में जिन्दगी काटी, और किस दुर्दशा में मरा, यह समकालीन विमर्श का अंग नहीं है। भारत के लिए जलालुद्दीन (अकबर) का तो कोई अर्थ है हालांकि वह भी अपने समय के भारत के 16वें हिस्से में राजपूतों के साथ साझेदारी में ही राज्य कर सका था। अतः समकालीन विमर्श में उसका भी कोई महत्व नहीं है। फिर भी भारत के किसी इतिहास के संस्थान में उस पर चर्चा करने वाले कर सकते है। भारत भवन के लिए तो वह भी विषय नहीं है।
किसी पूर्व कम्युनिस्ट ने बाबर के विरुद्ध कौन सी नई खोज कर ली है, यह किसी भी स्थिति में भारत भवन या मध्यप्रदेश शासन के संस्कृति विभाग के लिए कोई विषय नहीं हो सकता। कम्युनिस्टों को और पूर्व कम्युनिस्टों सहित सबको अपनी नई-नई ऐतिहासिक खोजों का पूरा अधिकार है  और इतिहास के केन्द्रों में उन पर बहस भी होनी ही चाहिए। परन्तु भारत भवन की स्थापना के उद्देश्ये और यहां के अब तक के विमर्श की गौरवशाली परम्परा में जहीरुद्दीन भाई पर केन्द्रित किसी नई किताब पर चर्चा का कोई भी औचित्य नहीं है। जलालुद्दीन या सलीम पर भी चर्चा की जगह भारत भवन नहीं हो सकता। कोई और ठांव खोजनी चाहिए।
(लेखक ऐतिहासिक व राजनीतिक विषयों के जानकार हैं और कई पुस्तकें लिख चुके हैं)