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श्रीमती श्यामा शर्मा : बच्चों के मन में झांकने वाली गीतकार

बाल साहित्यकार श्रीमती श्यामा शर्मा कोटा का जन्म 10 जनवरी 1958  को कोटा जिले की पीपल्दा तहसील में कारवाड़ में स्व. राम प्रताप के परिवार में हुआ। इन्होंने हिंदी साहित्य में स्नातक तक शिक्षा प्राप्त की। किसी पारिवारिक वजह से स्नातकोत्तर की पढ़ाई बीच में ही छोड़नी पड़ी। अपने पति जितेंद्र ‘ निर्मोही ‘ की प्रेरणा से करीब 11 वर्ष पहले इन्होंने साहित्य के क्षेत्र में कदम रखा। पति की निरंतर प्रेरणा, रचनाएं साहित्यिक पत्र – पत्रिकाओं में प्रकाशित होने,आकाशवाणी केंद्र और टीवी चैनल्स पर प्रसारित होने, कृतियां प्रकाशित होने और समय-समय पर विभिन्न संस्थाओं द्वारा मिले राष्ट्रीय और आंचलिक पुरस्कारों और कृतियों की समीक्षा से निरंतर मिले प्रोत्साहन का ही प्रतिफल है कि आज बाल साहित्य के क्षेत्र में  इन्होंने महत्वपूर्ण स्थान बना लिया है। ये कई साहित्यिक संस्थाओं से जुड़ी हैं और काव्य गोष्ठियों में सक्रिय हैं।
वर्तमान में निरंतर लेखन में सक्रिय हैं। इन्होंने विस्मृत लोक साहित्य के साथ-साथ अभिजात्य साहित्य को सामने लाने के प्रयासों के साथ – साथ बच्चों के लिए बाल साहित्य का सृजन किया है। बाल सृजन मनोरंजन के साथ-साथ संदेश परक, उनके नैतिक और मानसिक विकास में भी सहायक हो यहीं इनके लेखन का मर्म है। बाल कविताओं में इन्होंने अनेक पहलुओं को छुआ हैं। कविताओं में बच्चों को सहज आकर्षित कर प्रकृति और पर्यावरण से जोड़ा है। बच्चों में संस्कार और मानवीय गुण विकसित करना बाल साहित्य लिखना उद्देश्य रहा है। विज्ञान का क्षेत्र भी इनकी कविताओं से अछूता नहीं है। आपने जैव विविधता,  कम्प्यूटर, ओजोन परत, जल संरक्षण, पृथ्वी दिवस, वन्य जीव सप्ताह, योगासन जैसी जानकारी देने वाली कविताओं का सृजन भी किया है।
  आप हिंदी और राजस्थानी भाषा में सृजन का सामान अधिकार रखती हैं। बच्चों को शिक्षाप्रद संदेश देती और चेतना जाग्रत करती अनेक कविताओं की रचनाकार हिंदी और राजस्थानी भाषाओं में समान रूप से गद्य-पद्य विधाओं में वर्णात्मक, विवरणात्मक, विवेचनात्मक, बालकाव्य में मनोवृतिपरक ,रसयोजना-गीतों में भावानुकूल, समकालीन काव्य विषय में समसामयिक के साथ  रचनाओं को आगे बढ़ाती हैं ।समकालीन कविता और गीत लिखने के साथ-साथ बालकाव्य, बाल कहानी, संस्मरण, कहानी लेखन विधाओं में सृजन करती हैं। बच्चों की कोमल मनोभावनाओं, उनके मनोविज्ञान, ग्रहण क्षमता , परिवेश सभी को ध्यान में रख कर सरल शब्दों का चयन और उनकी जुगलबंदी इनके लेखन की विशेषता है।
इनके गीत काव्य में लोक, लोक संवेदना और आंचलिकता है तो समकालीन काव्य में समसामयिकता देखी जा सकती है। साहित्य के मूल में मनुष्य और मनुष्यता है, संस्मरणों में हाड़ौती अंचल की सांस्कृतिक विरासत  खासकर ग्राम्य संस्कृति है। इनके आने वाले राजस्थानी उपन्यास “किट्टी पारटी” वर्तमान समय और भौतिकवादी दृष्टिकोण का दिखावा विषय पर है।  इन्होंने हाड़ोती अंचल की लोककथाओं का लेखन कर उनसे बच्चों का मनोरंजन और लोक कथाओं के संरक्षण का महत्वपूर्ण कार्य भी इन्होंने किया है।
बाल काव्य संग्रह ’’कोई गीत सुनाओ ना’’  ’चिड़िया रानी आओ ना’ , “पक्षियों को पहचाने” बाल साहित्य कृति का गद्य और पद्य विधा में सृजन,  बाल काव्य कृति “उड़ी रै खशबू च्यारू मेर” और राजस्थानी संस्मरण कृति “वै दन वै बातां” और ” हाड़ोती अंचल की रोचक लोक कथाएं ’  इनकी अन्य प्रमुख कृतियां हैं। लेखन के लिए उन्हें कई संस्थाओं द्वारा सम्मानित किया गया हैं ये कई संस्थाओं से संबद्ध हैं। अपने कई साहित्यिक प्रतियोगिताओं में भाग ले कर पुरस्कार भी प्राप्त किए हैं।
संपर्क : ठ 422,आर के पुरम,
कोटा ( राज.) मो. -9413734544
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डॉ.प्रभात कुमार सिंघल
लेखक एवं पत्रकार, कोटा

प्रसार भारती ने देशभर के डिजिटल रचनाकारों को सशक्त बनाने के लिए डीडी न्यूज़ पर ‘क्रिएटर्स कॉर्नर’ लॉन्च किया

वर्ष 2026 प्रसार भारती के लिए बड़े सुधारों का वर्ष होगा: केंद्रीय मंत्री अश्विनी वैष्णव

क्रिएटर्स कॉर्नर प्रधानमंत्री मोदी के ऑरेंज इकोनॉमी के विजन को दर्शाता है: डॉ. एल. मुरुगन

प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी के डिजिटल कंटेंट क्रिएटर्स को मान्यता देने और बढ़ावा देने के विजन के अनुरूप, प्रसार भारती ने आज डीडी न्यूज पर देश भर के डिजिटल क्रिएटर्स द्वारा बनाई गई सामग्री को प्रदर्शित करने के लिए एक समर्पित मंच “क्रिएटर्स कॉर्नर” लॉन्च किया है।

केंद्रीय मंत्री श्री अश्विनी वैष्णव ने इस अवसर पर कहा कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में भारत ने पिछले 11 वर्षों में हर क्षेत्र में सुधार देखे हैं और इसी तरह के सुधार अब प्रसार भारती में भी दिखाई दे रहे हैं।

उन्होंने कहा कि वर्ष 2026 प्रसार भारती के लिए बड़े सुधारों का वर्ष होगा, साथ ही सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय का भी पूर्ण पुनर्गठन किया जाएगा। इन सुधारों से दूरदर्शन और आकाशवाणी जैसी संस्थाओं को उद्योगो की भागीदारी, नई पीढ़ी के रचनाकारों और प्रौद्योगिकी-आधारित प्रक्रियाओं की ओर उन्मुख किया जाएगा। उन्होंने कहा कि क्रिएटर कॉर्नर का शुभारंभ इस सुधार यात्रा का पहला कदम है। पिछले वर्ष लॉन्च किए गए वेव्स प्लेटफॉर्म का जिक्र करते हुए उन्होंने बताया कि इसने रचनाकार अर्थव्यवस्था को बढ़ावा देने, एक करोड़ युवाओं को जोड़ने, नए रोजगार के अवसर पैदा करने और इकोसिस्टम में लगभग 5,000 करोड़ रुपये का योगदान देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।

डॉ. एल. मुरुगन ने कहा कि दूरदर्शन के क्रिएटर कॉर्नर का शुभारंभ देश के बढ़ते कंटेंट क्रिएटर्स समुदाय को सशक्त बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है, जो प्रधानमंत्री के ऑरेंज इकोनॉमी के विजन के अनुरूप है। उन्होंने कहा कि कैसे देश भर के छोटे शहरों और क्षेत्रों के क्रिएटर्स स्वतंत्र रूप से कंटेंट का निर्माण, संपादन और साझा कर रहे हैं और बड़े स्टूडियो के बिना अपनी आजीविका कमा रहे हैं। उन्होंने कहा कि दूरदर्शन अब इन क्रिएटर्स को एक सशक्त राष्ट्रीय और वैश्विक मंच प्रदान करेगा और इस पहल के लिए डीडी टीम को बधाई दी।

सूचना और प्रसारण मंत्रालय के सचिव श्री संजय जाजू ने इस बात पर जोर दिया कि यह पहल एक जीवंत, जिम्मेदार और समावेशी रचनाकार इकोसिस्टम के निर्माण में सहायक होगी, जो रचनाकारों को केवल कलाकार के रूप में नहीं बल्कि संपूर्ण कन्टेन्ट निर्माता के रूप में मान्यता देगी। उन्होंने बताया कि डीडी न्यूज़ पर शुरू होने वाला क्रिएटर कॉर्नर धीरे-धीरे सभी दूरदर्शन चैनलों पर विस्तारित होगा, जिससे विभिन्न भाषाओं, क्षेत्रों और शैलियों के रचनाकारों को एक राष्ट्रीय मंच मिलेगा। उन्होंने आगे कहा कि प्राइम टाइम का यह विशेष स्लॉट रचनाकारों को व्यापक दर्शकों तक पहुंचने में मदद करेगा और साथ ही सार्वजनिक प्रसारण को विविध दृष्टिकोणों से समृद्ध करेगा।

क्रिएटर्स कॉर्नर्स के बारे में

इस पहल का उद्देश्य प्रसार भारती और व्यक्तिगत कन्टेन्ट रचनाकारों के बीच साझेदारी के माध्यम से गुणवत्तापूर्ण सामग्री के निर्माण को प्रोत्साहित करके और इसकी पहुंच का विस्तार करके डिजिटल अर्थव्यवस्था को बढ़ावा देना है।

क्रिएटर्स कॉर्नर में समाचार और समसामयिक मामले, संस्कृति, यात्रा, खानपान, कला और साहित्य, संगीत और नृत्य, स्वास्थ्य और कल्याण, शिक्षा, विज्ञान और प्रौद्योगिकी, प्रेरक कहानियां, पर्यावरण और सतत विकास और मनोरंजन सहित विषयों की एक विस्तृत श्रृंखला पर सामग्री प्रस्तुत की जाएगी।

यह कार्यक्रम सोमवार से शुक्रवार तक शाम 7:00 बजे डीडी न्यूज़ पर प्रसारित होगा , और अगले दिन सुबह 9:30 बजे इसका पुन: प्रसारण होगा। प्रत्येक एपिसोड में विविध विषयों पर आधारित चार से छह रील या वीडियो दिखाए जाएंगे।

यह पहल एक पारस्परिक रूप से लाभकारी साझेदारी का प्रतिनिधित्व करती है, जो डिजिटल रचनाकारों को अपने काम को प्रदर्शित करने के लिए एक विश्वसनीय मंच और प्रसार भारती/डीडी न्यूज की व्यापक पहुंच प्रदान करती है, जबकि प्रसार भारती को युवा दर्शकों के साथ तालमेल बिठाने वाली नवीन और विविध सामग्री को तैयार करने में सक्षम बनाती है।

इच्छुक कंटेंट निर्माता ddnews.creatorscorner[at]gmail[dot]com पर अपना कंटेंट जमा कर सकते हैं या इस पहल का हिस्सा बनने के लिए +91-8130555806 पर संपर्क कर सकते हैं।

दुुनिया में मंदीः भारत में आर्थिक मजबूती की रोशनी

वैश्विक चुनौतियों, भू-राजनीतिक तनावों, युद्धों, महामारी के पश्चात् बनी अस्थिरताओं, ऊर्जा संकट, आपूर्ति श्रृंखला में व्यवधान और महँगाई के दबावों के बीच जब दुनिया की अनेक बड़ी अर्थव्यवस्थाएँ लड़खड़ा रही हैं, तब भारत की अर्थव्यवस्था से जुड़े आँकड़े आशा, भरोसे और आत्मविश्वास की एक सशक्त किरण बनकर उभरे हैं। सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) के नए आंकड़ों से स्पष्ट है लगभग 7.4 प्रतिशत की विकास दर पर कायम रहना केवल एक सांख्यिकीय उपलब्धि नहीं है, बल्कि यह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में अपनाई गई आर्थिक नीतियों की दृढ़ता, दूरदर्शिता, पारदर्शिता और संतुलन का प्रमाण है। जिसमें विनिर्माण, सेवाएं और सरकारी व्यय वृद्धि को गति मिलेगी। जाहिर है, इसका असर नौकरी, महंगाई, आमदनी, कर्ज, कर और सरकारी सुविधाओं पर पड़ेगा। ग्रामीण इलाकों में कृषि से जुड़े रोजगार में बढ़ोतरी हो सकती है, जो यह संकेत देता है कि भारत न केवल वैश्विक अस्थिरताओं से स्वयं को बचाने में सक्षम रहा है, बल्कि अवसरों को साधकर अपनी विकास-यात्रा को निरंतर गति भी दे रहा है।

आज की वैश्विक अर्थव्यवस्था एक ऐसे दौर से गुजर रही है, जहाँ अमेरिका और यूरोप की अर्थव्यवस्थाएँ मंदी और ऋण संकट से जूझ रही हैं, चीन की विकास गति में स्पष्ट सुस्ती दिखाई दे रही है, और अनेक विकासशील देशों पर ऋण, महंगाई तथा बेरोजगारी का बोझ बढ़ता जा रहा है। ऐसे वातावरण में भारत का अपेक्षाकृत मजबूत आर्थिक प्रदर्शन यह दर्शाता है कि बीते एक दशक में अपनाई गई नीतियां केवल तात्कालिक लाभ के लिए नहीं, बल्कि दीर्घकालिक स्थिरता और आत्मनिर्भरता को ध्यान में रखकर बनाई गई हैं। मोदी सरकार ने आर्थिक सुधारों को केवल कागजी घोषणाओं तक सीमित नहीं रखा, बल्कि उन्हें ज़मीनी स्तर पर लागू करने का प्रयास किया, चाहे वह कर प्रणाली में सुधार हो, बुनियादी ढाँचे में निवेश हो या डिजिटल अर्थव्यवस्था का विस्तार। जिससे कर संग्रह और राजकोषीय घाटे पर कोई प्रतिकूल प्रभाव पड़ने की संभावना नहीं है। व्यापक अर्थव्यवस्था और आगामी केंद्रीय बजट दोनों के दृष्टिकोण से यह अच्छी बात है। जीडीपी दर के समांतर महंगाई काबू में रहे तो केंद्रीय रिजर्व बैंक ब्याज दरें घटा सकता है, जिसका सीधा असर कर्ज की किस्त पर पड़ सकता है। साथ ही, सरकार को मिलने वाला कर राजस्व बढ़ सकता है, जिससे ढांचागत और समाज कल्याण की योजनाओं पर खर्च बढ़ाया जा सकता है। शेयर बाजार में तेजी से म्यूचुअल फंड, भविष्य निधि आदि पर सकारात्मक असर हो सकता है। जीडीपी की दर 2024-25 में 6.5 फीसद की तुलना में अधिक है और यह मुख्य रूप से विनिर्माण और सेवाओं में वृद्धि के सुधार का नतीजा है।प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की आर्थिक दृष्टि का मूल आधार ‘सुधार, प्रदर्शन और परिवर्तन’ रहा है। वस्तु एवं सेवा कर जैसे बड़े सुधारों ने भारतीय बाज़ार को एकीकृत किया, व्यापार को सुगम बनाया और कर-संग्रह की पारदर्शिता बढ़ाई। प्रारंभिक चुनौतियों के बावजूद, आज जीएसटी भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए एक स्थायी आधार बन चुका है। इसके साथ ही दिवालियापन एवं ऋणशोधन अक्षमता संहिता ने बैंकों और वित्तीय संस्थानों की स्थिति को मजबूत किया, जिससे फंसे हुए ऋणों की समस्या पर काफी हद तक अंकुश लगा। बैंकिंग प्रणाली की यह मजबूती ही है, जिसने निवेश और उद्यमिता को नई ऊर्जा दी है। मोदी सरकार की एक महत्वपूर्ण विशेषता यह रही है कि उसने घरेलू मांग को सशक्त बनाने पर विशेष ध्यान दिया। ग्रामीण अर्थव्यवस्था, कृषि क्षेत्र और मध्यम वर्ग को सहारा देने वाली योजनाओं ने उपभोग को बनाए रखा। बुनियादी ढाँचे में बड़े पैमाने पर निवेश ने न केवल रोज़गार के अवसर पैदा किए, बल्कि दीर्घकाल में उत्पादन और लॉजिस्टिक्स लागत को कम करने में भी मदद की। सड़कें, रेलवे, बंदरगाह, हवाई अड्डे और डिजिटल नेटवर्क-इन सभी क्षेत्रों में हुए विस्तार ने भारत को एक अधिक प्रतिस्पर्धी अर्थव्यवस्था के रूप में स्थापित किया है।

वैश्विक अनिश्चितताओं के बीच भारत की आर्थिक मजबूती का एक बड़ा कारण उसकी संतुलित विदेश नीति और पड़ोसी देशों के साथ व्यावहारिक संबंध भी हैं। जहां एक ओर भारत ने विकसित देशों के साथ व्यापार और निवेश संबंधों को सुदृढ़ किया, वहीं दूसरी ओर पड़ोसी देशों के साथ आर्थिक सहयोग और क्षेत्रीय स्थिरता बनाए रखने का प्रयास किया। यह संतुलन भारत को बाहरी झटकों से अपेक्षाकृत सुरक्षित रखता है। ऊर्जा, रक्षा, खाद्य सुरक्षा और आपूर्ति श्रृंखला जैसे संवेदनशील क्षेत्रों में आत्मनिर्भरता की दिशा में उठाए गए कदमों ने भी भारत की रणनीतिक और आर्थिक सुरक्षा को मजबूत किया है। डिजिटल इंडिया और स्टार्टअप इंडिया जैसी पहलों ने भारत की अर्थव्यवस्था में नवाचार और उद्यमिता की नई लहर पैदा की। आज भारत दुनिया के अग्रणी स्टार्टअप इकोसिस्टम में शामिल है। फिनटेक, हेल्थटेक, एग्रीटेक और ई-कॉमर्स जैसे क्षेत्रों में हुए नवाचार न केवल घरेलू बाज़ार को मजबूत कर रहे हैं, बल्कि वैश्विक स्तर पर भी भारत की पहचान बना रहे हैं। डिजिटल भुगतान प्रणाली ने वित्तीय समावेशन को बढ़ाया, जिससे आर्थिक गतिविधियों का दायरा विस्तृत हुआ और पारदर्शिता में सुधार आया।
महत्त्वपूर्ण यह भी है कि मोदी सरकार ने आर्थिक विकास को सामाजिक कल्याण से अलग नहीं किया। गरीबों, महिलाओं, युवाओं और वंचित वर्गों को सशक्त बनाने वाली योजनाओं ने सामाजिक स्थिरता को बनाए रखा, जो किसी भी अर्थव्यवस्था के लिए अनिवार्य होती है। सामाजिक सुरक्षा और बुनियादी आवश्यकताओं की पूर्ति ने एक ऐसी नींव तैयार की, जिस पर टिकाऊ विकास संभव हो सका। यही कारण है कि वैश्विक संकटों के बावजूद भारत की आंतरिक मांग और विश्वास कमजोर नहीं पड़ा। आज भारत दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने की दिशा में तेजी से अग्रसर है। यह स्थिति केवल वर्तमान उपलब्धि नहीं, बल्कि भविष्य की संभावनाओं का संकेत है। वर्ष 2047, जब भारत अपनी आज़ादी के सौ वर्ष पूरे करेगा, तब दुनिया की सर्वाेच्च अर्थव्यवस्था बनने का लक्ष्य अब केवल एक सपना नहीं, बल्कि एक सुनियोजित यात्रा का परिणाम प्रतीत होता है। जनसांख्यिकीय लाभ, युवा शक्ति, तकनीकी क्षमता और राजनीतिक स्थिरताकृये सभी तत्व भारत को इस लक्ष्य के करीब ले जा रहे हैं।
निस्संदेह चुनौतियां अभी भी मौजूद हैं। वैश्विक परिस्थितियां कभी भी अचानक बदल सकती हैं, जलवायु परिवर्तन, तकनीकी प्रतिस्पर्धा और भू-राजनीतिक तनाव नई कठिनाइयां पैदा कर सकते हैं। लेकिन जिस आत्मविश्वास, अनुशासन और दूरदर्शिता के साथ भारत ने अब तक इन चुनौतियों का सामना किया है, वह यह भरोसा देता है कि देश आगे भी संतुलन बनाए रखते हुए प्रगति करता रहेगा। 7.4 प्रतिशत की विकास दर केवल एक आँकड़ा नहीं, बल्कि उस विश्वास का प्रतीक है कि भारत सही दिशा में आगे बढ़ रहा है। इस उजली तस्वीर में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की आर्थिक नीतियों की स्पष्ट छाप दिखाई देती है। निर्णायक नेतृत्व, दीर्घकालिक सोच और सुधारों के प्रति प्रतिबद्धता ने भारत को एक ऐसे मोड़ पर खड़ा कर दिया है, जहां संभावनाएं अनंत हैं। वैश्विक असंतुलन और अनिश्चितताओं के बीच भारत की अर्थव्यवस्था का मजबूत बने रहना न केवल देशवासियों के लिए गर्व का विषय है, बल्कि दुनिया के लिए भी एक संदेश है कि स्थिरता, संतुलन और आत्मनिर्भरता के रास्ते पर चलकर कोई भी राष्ट्र वैश्विक चुनौतियों को अवसरों में बदल सकता है। यही भारत की आर्थिक यात्रा की सबसे बड़ी उपलब्धि और आने वाले दशकों की सबसे बड़ी आशा की किरण है। इन सब सकारात्मक स्थितियों के बावजूद जरूरत इस बात की भी है कि अर्थव्यवस्था की ठोस मजबूती के लिए उन पहलुओं पर भी गौर किया जाए, जिनकी अनदेखी हो रही है।

(ललित गर्ग)
लेखक, पत्रकार, स्तंभकार
ई-253, सरस्वती कंुज अपार्टमेंट
25 आई. पी. एक्सटेंशन, पटपड़गंज, दिल्ली-92
फोनः 22727486, 9811051133

युद्ध का अर्थशास्त्र आर्थिक संकट का जनक?

 पुस्तक के लेखक आर.के. श्रीवास्तव एक नई पृष्ठभूमि पर अपनी बात प्रतिपादित की है। या यूं कहे कि वह आर्थिक मंदी व आर्थिक संकट के प्रचलित सिद्वातोें के क्षेत्र में एक नवीन व अधिक गहरी हल रेखा खींचना चाहता है आर्थिक मंदी व आर्थिक संकट आज भी विश्व देशों में एक खतरा बना हुआ है, यद्यपि इसके निदान हेतु जान मेनार्ड कीन्स ने लगभग 100 वर्षो पूर्व ही एक सिद्धांत हमें दिया था। कींस का यह आर्थिक सिद्धान्त, जोकि 1930 के आर्थिक संकट के कारणों की खोज से सम्बधित है। हमें बताता है कि आर्थिक संकटों का मूल कारण सकल मांग में कमी होना है और यह सिद्धांत अभी भी उपयोगी है। हालांकि वर्तमान में सरकार इस सिद्धांत से भली भांति अवगत है और वे समय समय पर ऐसे कदम उठाती रहती है जिससे कि सकल मांग में गिरावट न आने पाए, फिर भी आर्थिक मंदी व आर्थिक संकट का खतरा अक्सर अपना सिर उठाता रहता है।

लेखक आर्थिक मंदी व आर्थिक संकटों और आधुनिक युद्वों व युद्व  की तैयारियों पर होने वाले खर्चों के मध्य एक सीधा सम्बन्ध स्थापित करना चाहता है। लेखक के अनुसार आधुनिक युद्ध अब बहुत महंगे व उच्चतम तकनीक युक्त हो गये है जब कि आज से 100 वर्ष पूर्व ऐसा नहीं था। जैसे-जैसे विज्ञान व तकनीकी का विकास व विस्तार होता गया, उसी के अनुरूप युद्ध मशीनें व हथियार भी विकसित होते गये। इसका सीधा परिणाम यह हुआ कि इन उच्च तकनीकी युद्ध मशीनें व हथियारों  का उत्पादन क्रय व रखरखाव पर खर्च आसमान छूने लगा। जहां एक ओर इससे सरकारी खजाने व कर दाता  जनता पर आर्थिक बोझ बहुत अधिक बढ़ता गया, वही दूसरी ओर इसमें मुद्रास्फीति को भी बढ़ाया, क्योंकि यह अनुत्पादक खर्च की श्रेणी में आता है। इस प्रकार से यह खर्च एक दुधारी तलवार साबित हुआ जो दोहरा धाव करता है एक तरफ युद्ध खर्च आम जनता पर करों का बोझ बढ़ता है, वहीं दूसरी ओर यह मुद्रास्फीति को प्रोत्साहित करता है। जिसके कारण मूल्यों में वृद्धि होती है और आम जनता की आम व क्रय शक्ति घटती है।पुस्तक में प्रस्तुत दिशा गुणक ;Negative Multiplier) तथ्य शून्य  (Zero Accelerator) की अवधारणा, भारतीय अर्थव्यवस्था के संदर्भ में एक अभिनव प्रस्तुतीकरण है और इसको और गहराई से जानने परखने की आवश्यकता है। भारतीय अर्थव्यवस्था में असंगठित वर्गों निरंतर गिरती वास्तविक आय तथा लगभग स्थिर औधोगिक क्षेत्र, विशेष रूप से विनिर्माण क्षेत्र, इस तथ्य को दर्शाता है कि लेखक की उक्त  अवधारणा सही है।

लेखक ने अपनी पुस्तक में एक स्वरूप व सम्पन्न भारतीय अर्थव्यवस्था हेतु तीन मानदंड निरूपित किये है जोइस प्रकार हैं।

1. भारत में एक आदर्श जनसंख्या को बनाये रखना जो कि हमारे देश के प्राकृतिक संसाधनों के अनुरूप हो लेखक ने यह संख्या 50.55 करोड़ लोगों को निधार्रित की हैै।

2. भारतीय अर्थव्यवस्था की वृद्धि को समावेशी होना।

3. अन उत्पाद खर्चाे की न्यूनतम स्तर पर रखना (युद्ध, युद्ध-तैयारी का खर्च अन उत्पादन खर्च की श्रेणी में  आता है)

यह एक अभिनव विचार है जिसकी प्रशंसा की जानी चाहिए। यह पुस्तक अर्थशास्त्रियों, शिक्षाविदों व विद्यार्थियों का ध्यान केवल भारत में ही नहीं वरन विश्व में आकर्षित करेगी, ऐसा आकलन है।

(पुस्तक मूल रूप से अंग्रेजी भाषा में लिखी गई है।)

पुस्तक:युद्ध अर्थशास्त्र
लेखक: आरके श्रीवास्तव
प्रकाशित: शतरंग प्रकाशन
एस-43, विकास दीप बिल्डिंग,
दूसरी मंजिल, स्टेशन रोड, लखनऊ-226001

ईमेल:Ltp284403@gmail.com

मूल्य:1421/-$17

समीक्षक
एन.एम.पी. वर्मा
अर्थशास्त्र विभाग
बाबासाहेब भीमराव अम्बेडकर विश्वविद्यालय,
लखनऊ

श्रीमद् विजयरत्न सुंदर सूरीश्वरजी महाराज की 500 रचनाएं एक ऐसा विशाल सागर हैः श्री नरेन्द्र मोदी

श्रीमद् विजयरत्न सुंदर सूरीश्वरजी महाराज की 500वीं पुस्तक के विमोचन के दौरान प्रधानमंत्री श्री मोदी का वक्तव्य

आज के इस पावन अवसर पर सर्वप्रथम मैं हम सभी के प्रेरणास्रोत पूज्य भुवनभानुसूरीश्वर जी महाराज साहब के चरणों में प्रणाम करता हूं। प्रसांतमूर्ति सुविशाल गच्छाधिपति पूज्य श्रीमद् विजय राजेंद्रसूरीश्वर जी महाराज साहब, पूज्य गच्छाधिपति श्री कल्पतरूसूरीश्वर जी महाराज साहब, सरस्वती कृपापात्र परम पूज्य आचार्य भगवंत श्रीमद् विजयरत्नसुंदरसूरीश्वर जी महाराज और इस समारोह में उपस्थित सभी साधु-साध्वी को मैं नमन करता हूं।

ऊर्जा महोत्सव इस समिति से जुड़े सभी सदस्यों भाई श्री कुमारपाल भाई, कल्पेश भाई, संजय भाई, कौशिक भाई, ऐसे सभी महानुभावों का भी मैं अभिनंदन करता हूं। पूज्य संतजन, आज हम सभी श्रीमद् विजयरत्न सुंदर सूरीश्वर जी महाराज साहब की 500वीं पुस्तक के विमोचन के पुण्य भागी बन रहे हैं। महाराज साहब ने ज्ञान को सिर्फ ग्रंथों तक सीमित नहीं रखा है, बल्कि जीवन में उतारकर दिखाया है, औरों को भी जीवन में उतारने के लिए प्रेरित किया है। उनका व्यक्तित्व संयम, सरलता और स्पष्टता का अद्भुत संगम है। जब वे लिखते हैं, तो शब्दों में अनुभव की गहराई होती है। जब वे बोलते हैं, तो वाणी में करुणा की शक्ति होती है। और जब वह मौन होते हैं, तो भी मार्गदर्शन मिलता है। महाराज साहब की 500वीं पुस्तक का विषय, ”प्रेमनु विश्व, विश्वनो प्रेम”, यह शीर्षक अपने आप में कितना कुछ कह देता है! मुझे विश्वास है कि, हमारा समाज, हमारे युवा और पूरी मानवता उनकी इस रचना का लाभ उठाएगी। इस विशेष अवसर पर ऊर्जा महोत्सव का यह आयोजन जन-जन में एक नई विचार ऊर्जा का संचार करेगा। मैं आप सभी को इस अवसर की बधाई देता हूं।

महाराज साहब की 500 रचनाएं एक ऐसा विशाल सागर है, जिसमें भांति-भांति के विचार रत्न समाहित हैं। इन पुस्तकों में मानवता की तमाम समस्याओं के सहज और आध्यात्मिक समाधान उपलब्ध हैं। समय और परिस्थितियों के अनुसार जब जिसे जैसा मार्गदर्शन चाहिए, यह अलग-अलग ग्रंथ उसके लिए प्रकाश पुंज का काम करेंगे। अहिंसा, अपरिग्रह और अनेकांत, प्रेम, सहिष्णुता और सद्भाव हमारे तीर्थंकरों ने हमें जो शिक्षाएं दी हैं, हमारे पूर्व के आचार्यों ने हमें जो पाठ पढ़ाए हैं, उन सबको आधुनिक और सामयिक स्वरूप में हम इन रचनाओं में देख सकते हैं। खासकर, आज जब दुनिया विभाजन और टकराव से जूझ रही है, तब ”प्रेमनु विश्व, विश्वनो प्रेम” यह एक ग्रंथ ही नहीं, यह एक मंत्र भी है। यह मंत्र हमें प्रेम की शक्ति का परिचय तो कराता ही है, जिस शांति और सद्भाव की तलाश में आज दुनिया परेशान है, यह मंत्र हमें उस तक पहुँचने का रास्ता दिखाता है।

हमारे जैन दर्शन का सूत्र है- ”परस्पर उपग्रहो जीवानाम्।” यानी, हर जीवन, दूसरे जीवन से जुड़ा है। जब हम इस सूत्र को समझते हैं, तो हमारी दृष्टि व्यष्टि से हटकर समष्टि से जुड़ जाती है। हम व्यक्तिगत आकांक्षा से ऊपर उठकर समाज, राष्ट्र और मानवता के लक्ष्यों की ओर सोचने लगते हैं। इसी भावना के साथ मैं आपके बीच, आप सबको याद होगा नवकार महामंत्र दिवस पर भी आया था। उस आयोजन में चारों फिरके एक साथ जुटे थे। उस ऐतिहासिक अवसर पर मैंने नौ आग्रह किए थे, नौ संकल्पों की बात की थी। आज का ये अवसर उन्हें फिर से दोहराने का भी है। पहला संकल्प- पानी बचाने का संकल्प। दूसरा संकल्प- एक पेड़ माँ के नाम। तीसरा- स्वच्छता का मिशन। चौथा- वोकल फॉर लोकल। पांचवा- देश दर्शन। छठा- नेचुरल फार्मिंग को अपनाना। सातवां- हेल्दी लाइफस्टाइल को अपनाना। आठवां- योग और खेल को जीवन में लाना। नौवां – गरीबों की सहायता का संकल्प।

आज हमारा भारत, विश्व के सबसे युवा देशों में से एक है। हमारी युवा शक्ति विकसित भारत का भी निर्माण कर रही है और अपनी सांस्कृतिक जड़ों को भी मजबूत बना रही है। इस बदलाव में, महाराज साहब जैसे संतों का मार्गदर्शन, उनका साहित्य और उनके शब्द और जो हमेशा-हमेशा साधना से पुरस्‍कृत है, इनकी बहुत बड़ी भूमिका है। मैं एक बार फिर, उनके प्रति कृतज्ञता व्यक्त करते हुए, उनकी 500वीं पुस्तक के लिए शुभकामनाएं देता हूं। मुझे विश्वास है, भारत की बौद्धिक, नैतिक और मानवीय यात्रा में उनके विचार निरंतर प्रकाश देते रहेंगे। मुझे आप सबसे क्षमा भी मांगनी है।

भद्रकाली मंदिर के शिलालेख पर सोमनाथ की ऐतिहासिक घटनाओं का वर्णन

प्रभास पाटन के पुरातात्विक प्रमाण और सोलंकी-युग की वास्तुकला एक मूल्यवान विरासत के रूप में खड़ी है
सोमनाथ के पत्थरों में वीरता की गूंज, शिलालेखों में सनातन संस्कृति की झलक
प्रभास पाटन संग्रहालय सोमनाथ के इतिहास को दर्शाने वाले शिलालेखों और अवशेषों को संरक्षित करता है

प्रभास पाटन तांबे की प्लेटों, शिलालेखों और स्मारक पत्थरों के साथ एक समृद्ध और पवित्र अतीत को संजोए हुए है, जिनमें इसकी समृद्धि, विरासत और वीरता की स्थायी भावना की झलक मिलती है।

प्रभास पाटन और सोमनाथ मंदिर के इतिहास को बताने वाले शिलालेख और असली अवशेष पूरे प्रभास क्षेत्र में मिलते हैं। शिलालेख, तांबे की प्लेटें और हमलों के दौरान नष्ट हुए मंदिर के अवशेष वीरता, शक्ति और भक्ति के प्रतीक के रूप में प्रभास पाटन म्यूज़ियम में रखे गए हैं। यह म्यूज़ियम अभी प्रभास पाटन के पुराने सूर्य मंदिर में चल रहा है।

ऐसा ही एक शिलालेख प्रभास पाटन में म्यूज़ियम के पास, भद्रकाली गली में पुराने राम मंदिर के बगल में स्थित है। सोमपुरा ब्राह्मण दीपकभाई दवे के घर पर संरक्षित, यह उनके आंगन में प्राचीन भद्रकाली मंदिर की दीवार में लगा हुआ है।

प्रभास पाटन म्यूज़ियम के क्यूरेटर (म्यूज़ियम हेड) श्री तेजल परमार ने जानकारी देते हुए बताया कि यह शिलालेख, जो 1169 ईस्वी (वल्लभी संवत 850 और विक्रम संवत 1255) में बनाया गया था और अभी राज्य पुरातत्व विभाग द्वारा संरक्षित है, अन्हिलवाड़ पाटन के महाराजाधिराज कुमारपाल के आध्यात्मिक गुरु परम पशुपत आचार्य श्रीमान भावबृहस्पति की प्रशंसा में लिखा गया शिलालेख है। यह शिलालेख सोमनाथ मंदिर के प्राचीन और मध्यकालीन इतिहास को दर्ज करता है। इसमें चारों युगों में सोमनाथ महादेव के निर्माण का उल्लेख है। इसके अनुसार, सत्य युग में चंद्र (सोम) ने इसे सोने का बनवाया था; त्रेता युग में रावण ने इसे चांदी का बनवाया था; द्वापर युग में श्री कृष्ण ने इसे लकड़ी का बनवाया था; और कलयुग में राजा भीमदेव सोलंकी ने एक सुंदर कलात्मक पत्थर का मंदिर बनवाया था।

इतिहास इस बात की पुष्टि करता है कि भीमदेव सोलंकी ने पूर्व के अवशेषों पर चौथा मंदिर बनवाया था, जिसके बाद 1169 ईस्वी में कुमारपाल ने उसी जगह पर पाँचवाँ मंदिर बनवाया। सोलंकी शासन के तहत, प्रभास पाटन धर्म, वास्तुकला और साहित्य का एक प्रमुख केन्‍द्र बन गया, जबकि सिद्धराज जयसिंह के न्याय और कुमारपाल की भक्ति ने सोमनाथ को गुजरात के स्वर्ण युग के गौरवशाली प्रतीक के रूप में स्थापित किया।

प्रभास पाटन की पवित्र भूमि में न केवल खंडहर हैं, बल्कि सनातन धर्म का आध्यात्मिक गौरव भी है। ऐतिहासिक भद्रकाली शिलालेख सोलंकी शासकों और भवबृहस्पति जैसे विद्वानों की भक्ति को दर्शाता है। कला, वास्तुकला और साहित्य की अपनी समृद्ध विरासत के माध्यम से, यह भूमि आने वाली पीढ़ियों को प्रेरित करती रहती है, जबकि प्रभास की विरासत और सोमनाथ का स्थायी शिखर इस बात की पुष्टि करते हैं कि भक्ति और आत्म-सम्मान कालातीत हैं।

क्षेत्रीय इतिहास और धरोहर की जानकारी से ही देश और प्रदेश के इतिहास का निर्माण संभव – डॉ. व्यास

झालावाड़ । हिन्द की सांस्कृतिक विरासत समूह द्वारा अजमेर की लोढ़ा धर्मशाला में रविवार को एक दिवसीय क्षेत्रीय पुरातत्त्व धरोहर पर राष्ट्रीय सेमिनार का आयोजन किया गया। इस अवसर पर अनेक इतिहासकारों, पुरातत्त्वविदों और शौधार्थियों ने अपने विचार और शोध पत्र प्रस्तुत किये।
सेमिनार के मुख्य अतिथि मध्यप्रदेश भोपाल के पुरातत्त्वविद् डॉ. नारायण व्यास ने कहा कि क्षेत्रीय इतिहास और धरोहर की जानकारी से ही देश और प्रदेश के इतिहास का निर्माण होता है। उन्होंने बताया कि अजमेर संभाग में पुष्कर ऐसा प्राचीन स्थान है जहाँ ईसा पूर्व दूसरी और पहली शताब्दी में रहने वाले बौद्ध भिक्षु और भिक्षुणियों ने मध्य प्रदेश के विश्व प्रसिद्ध सांची के बौद्ध स्तूपों के निर्माण में अपना महत्वपूर्ण योगदान दिया था। अध्यक्षता कर रही राजस्थान पुरातत्त्व विभाग जयपुर की तकनीकी अधीक्षक धर्मजीत कौर ने कहा कि अजमेर क्षेत्र में अनेक इतिहास महत्व की धरोहरें है जिनका इतिहास यहाँ की नई पीढ़ी को दिखाना चाहिये ताकि वे अपनी क्षेत्रीय इतिहास पर गर्व कर सकें। उन्होंने कहा कि पुरातत्त्व विभाग भी इस बारे में अनेक जानकारियाँ प्रकाशित करता है जिसका उपयोग विद्यालय के विद्यार्थी कर सकते है।विशिष्ट अतिथी डॉ शोभा सुमन मिश्रा अध्यक्ष सेंट्रल एकेडेमी एजुकेशन सोसाइटी अजमेर ने पुरातत्व एवं इतिहास को जानने एवं शोध कार्य के लिये इस सेमिनार को महत्त्वपूर्ण आयोजन बताया।
विशिष्ट अतिथि अश्विनी मुद्रा शोध संस्थान उज्जैन के निदेशक डॉ. आर.सी. ठाकुर ने कहा कि देश के प्रत्येक ग्रामों और स्थलों में अनेक प्राचीन सिक्के आज भी प्राप्त होते है और इन्हीं से क्षेत्रीय इतिहास की प्राचीनता और वहाँ के इतिहास की प्रमाणित जानकारी मिलती है। विशिष्ट अतिथि मध्यप्रदेश वाकणकर पुरातत्त्व शोध संस्थान भोपाल के शोध अधिकारी डॉ. ध्रुवेन्द्र सिंह जोधा ने कहा कि अब भारत के प्रत्येक जिलों और कस्बों का स्थानीय इतिहास लेखन होना चाहिये ताकि आने वाली पीढ़ी अपने क्षेत्रीय इतिहास की घटनाओं को जान सके।
सेमिनार में झालावाड़ के इतिहासकार ललित शर्मा ने अतिथियों का परिचय प्रस्तुत किया। संचालन अजमेर की लोकसंस्कृतिविद् डॉ. वर्षा नालमे ने और आभार अजमेर की इतिहासविद् डॉ. उर्मिला शर्मा ने ज्ञापित किया। इस अवसर पर प्राचीन मुद्राओं और दुर्लभ डाक टिकटों की प्रदर्शनी भी लगाई गई जिसे अनेक स्थानीय जनों ने देखा। सेमिनार में बीकानेर की डॉ. उमा दुबे, भोपाल के डॉ. ध्रुवेन्द्र सिंह जोधा, बांसवाड़ा के डॉ. घनश्याम सिंह भाटी, कोटा के राकेश सोनी, रतलाम के डॉ. नरेन्द्र सिंह पंवार, उज्जैन की डॉ. मंजू यादव, बारां के राकेश शर्मा, कोटा के डॉ. नरेन्द्र कुमार मीणा, डॉ. धर्मेन्द्र कुमार, बारां के हंसराज नागर, डॉ. हेमलता वैष्णव, झालावाड़ के संजू कुमार शर्मा, डॉ. प्रीति शर्मा, उज्जैन की डॉ. विनिता राजपुरोहित, डॉ. श्वेता पाठक, बांसवाड़ा की डॉ. अदिती गौड़, केकड़ी की पुष्पा शर्मा, अजमेर की डॉ. उर्मिला शर्मा व डॉ. वर्षा नालमे ने भी क्षेत्रीय इतिहास और पुरातत्त्व धरोहर तथा लोक संस्कृति पर अपने शोध पत्र प्रस्तुत किये तथा झालावाड़ के समाज सेवी ओम पाठक भी उक्त कार्यक्रम में सम्मिलित हुए। इस अवसर पर अतिथियों का सम्मान जयप्रकाश शर्मा व धर्मेन्द्र कुमार शर्मा ने किया। अन्त में अतिथियों ने सभी शोध पत्र प्रस्तुत करने वाले विद्वानों और शौधार्थियों को प्रमाण पत्र व प्रतीक चिह्न देकर सम्मानित किया।

जीवनमूल्यों की पुनर्स्थापना करती अक्षयलता शर्मा की रचनाएं

साहित्य की विभिन्न शैलियों में भावपूर्ण लेखन की शिल्पी श्रीमती अक्षयलता शर्मा का जन्म एक जनवरी 1959 को कोटा में माता स्व. रामसुखी बाई और पिता स्व. मदनमोहन शर्मा के परिवार में हुआ। इन्होंने संस्कृत और हिंदी विषयों में एमए, बीएड एवं आयुर्वेद रत्न की शिक्षा प्राप्त की। कई पत्र-पत्रिका में इनकी रचनाओं का नियमित प्रकाशन होता है।
वर्तमान सामाजिक परिवेश में गिरते हुए जीवन मूल्यों के मर्म को लेकर जीवन मूल्यों की पुनर्स्थापना, संरक्षण एवं संवर्धन के उद्देश्य के साथ पद्य विधा में कविताओं के साथ-साथ गीत, प्रहेलिका, चतुष्पदी और गद्य विधा में लेख, कहानी, कहानी का नाट्य रूपांतरण, समीक्षा का लेखन कर सभी को जीवन मूल्यों को बचाने के लिए के सतत सजग एवं प्रयत्नशील रहने के लिए प्रेरित कर रही हैं।
आपका हिंदी, राजस्थानी, हाड़ौती और संस्कृत भाषा पर  समान अधिकार है। व्यंग्य शैली, प्रश्न शैली, हास्य-व्यंग्य शैली, गीत शैली, समास शैली, चित्र शैली को अपनाते हुए भक्ति रस, शांत रस, वीर रस, हास्य रस, श्रृंगार रस, अद्भुत रस और करुण रस भावों से आप्लावित साहित्य का सृजन करती हैं। आपकी पुस्तकों की समीक्षा की अपनी अलग शैली है जिसमें साहित्य का पुट समीक्षा को औरों से अलग ला खड़ा करता है ।
 इनके काव्य सुजन में मानवीकरण, प्रतीकात्मकता, विविध शैलियों का प्रयोग, शब्द शक्तियों के सफल प्रयोग, विषय की गंभीरता, चिन्तन, विश्लेषण, दिशाबोध, प्रभावोत्पादकता, हास्य विनोद, भावोत्तेजक, विशद शब्दकोश अवसरानुकूल क्लिष्ट शब्दावली व सामासिक शब्दों का प्रयोग, अलंकृत एवं प्रवाहपूर्ण भाषा, मौलिक अभिव्यंजना, माधुर्य, ओज व प्रसाद गुण सम्पन्नता की विशेषताएँ हैं।
इनकी कहानियों में गिरते पारिवारिक मूल्य, विफल चरित्र का मनोवैज्ञानिक विश्लेषण, आवास की समस्या प्रमुख विषय हैं। परिजनों के प्रति तथा मनुष्य को मनुष्य के प्रति वेतना की साहित्यिक उड़ान सौहार्दपूर्ण व्यवहार करने, आवास की समस्या हल करने के लिए संवेदना जगाते हुए पीड़ितों की यथाशक्ति सहायता करने जैसे कथ्य इनकी कहानियों में मुखर हैं और संदेश है कि पाठक मर्मस्पर्शी घटनाओं से प्रभावित होकर समस्याग्रस्त परिवार व समाज के हित में प्रयास करने को प्रेरित होंगे।
 वे बताती हैं बचपन में कक्षा पांच से ही इनके मन में कविता लिखने के शौक ने जन्म लिया। क्या लिखें विषय कोई सूझ नहीं रहा था। इन्होंने  उस समय ‘करो परीक्षा की तैयारी’ प्रथम तुक बंदी कविता लिखी। परिजनों, सहपाठियों और शिक्षकों ने खूब सराहा। उत्साहित होने से उस समय ‘सुमन’, ‘यह स्वर्णमहल’ और ‘चल रही वह लकुटी टेक’ जैसी तुक बंदियों की झड़ी लग गई। फिर व्यस्तता के चलते यथा अवसर उद्वेलित करने वाली संवेदनाएँ इन्हें झकझोरती हुई इनकी लेखनी को क्रियाशील करती रहीं। समय के साथ-साथ आज साहित्य में इन्होंने जिस प्रकार मुकाम बनाया है उस पर प्रसिद्ध संपादक अशोक बत्रा ने लिखा “‘जिन कवियों ने छंदों का निपुणता पूर्वक निर्वाह किया है और अपने भाव को विशेष अभिव्यक्ति प्रवाह में निबद्ध किया है, उनमें से कई साहित्यकारों की तरह अक्षयलता शर्मा प्रभावित करती हैं।”
जीवनमूल्य, जीवनमूल्य द्वितीय सुमन और मानस की गूंज आपकी काव्य संग्रह कृतियां हैं। बाल काव्य निकुंज श्रृंखला में पल्लव और प्रसून बाल कृतियां हैं। कृतघ्न और अंधेरे में  कहानियां और समझ लघु कथा लोकप्रिय हुई हैं। आपको लेखन के लिए कोटा भारतेंदु समिति द्वारा साहित्य श्री अलंकरण सम्मान से सम्मानित किया गया है। आप वर्तमान में पिछले कई वर्षों से जयपुर में निवास कर रही हैं। ( संपर्क : अपना बेंगलो, बालाजी विहार,,मोहनपुरा बालाजी, बी-34, सांगानेर, जयपुर-302029 (राजस्थान) मोबाइल : 9461704390 )
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प्रस्तुति : डॉ. प्रभात कुमार सिंघल
लेखक एवं पत्रकार, कोटा

भारतीय नौसेना ने नई दिल्ली विश्व पुस्तक मेले 2026 में भारत की समुद्री विरासत का प्रदर्शन किया

नई दिल्ली। भारतीय नौसेना नई दिल्ली में आयोजित विश्व पुस्तक मेले 2026 में भाग ले रही है। यह साहित्य, ज्ञान और विरासत का उत्सव मनाने वाला एक प्रमुख सांस्कृतिक कार्यक्रम है।

भारत सरकार के शिक्षा मंत्रालय के अधीन एक स्वायत्त संगठन, राष्ट्रीय पुस्तक न्यास द्वारा आयोजित 9 दिवसीय मेगा मेले का उद्घाटन माननीय शिक्षा मंत्री श्री धर्मेंद्र प्रधान ने किया।

भारतीय नौसेना की भागीदारी भारत की समृद्ध समुद्री विरासत के संरक्षण और संवर्धन के प्रति उसकी प्रतिबद्धता की पुष्ट करती है। भारतीय नौसेना का प्रमुख अनुसंधान संस्थान, नौसेना इतिहास प्रभाग (एनएचडी), इस पहल का नेतृत्व कर रहा है। एनएचडी ने एनबीटी के सहयोग से भारतीय नौसेना के लिए विशेष स्टॉल लगाए गए हैं जिनमें भारतीय नौसेना के प्रामाणिक प्रकाशनों के साथ-साथ बारीकी से तैयार किए गए जहाजों के मॉडल प्रदर्शित किए गए हैं। ये स्टॉल आगंतुकों को नौसेना के विकास, परंपराओं और परिचालन उत्कृष्टता की जीवंत झलक प्रदान करते हैं।

हॉल नंबर 5 में स्थित नौसेना मंडप में, भारतीय नौसेना के आधिकारिक इतिहास (1945-2021) के सात खंड, भारतीय नौसेना के विभिन्न जहाजों, पनडुब्बियों, वायु स्क्वाड्रनों और प्रतिष्ठानों के इतिहास के साथ-साथ भारत के समुद्री इतिहास पर पुस्तकें प्रदर्शित की गई हैं ताकि आगंतुकों को देश की समृद्ध समुद्री और नौसैनिक विरासत की बेहतर समझ मिल सके।

ये प्रदर्शनियां भारत की समुद्री यात्रा का एक आकर्षक वृत्तांत प्रस्तुत करती हैं जिसमें विद्वत्ता और दृश्य आकर्षण का मिश्रण है।

अपने अकादमिक प्रयासों के अंतर्गत, एनएचडी ने 10 जनवरी 2026 को 1971 के युद्ध पर केंद्रित एक पैनल चर्चा का आयोजन किया जिसका संचालन कमांडर नीरज वशिष्ठ ने किया। पैनल में सेवानिवृत्त वीआरसी कमांडर विजय प्रकाश कपिल और प्रख्यात रक्षा पत्रकार संदीप उन्नीथन ने भाग लिया। उन्होंने भारत के नौसेना इतिहास के एक महत्वपूर्ण अध्याय पर गहन विचार प्रस्तुत किए।

‘नौसेना समुद्री अभियान: अतीत और वर्तमान’ विषय पर एक पैनल चर्चा 11 जनवरी 2026 को शाम 6:00 बजे से हॉल 5 के पवेलियन में आयोजित की जाएगी। सत्र का संचालन कमांडर कलेश मोहनन करेंगे; पैनल में कैप्टन प्रशांत सी मेनन और कमांडर नीरज वशिष्ठ शामिल होंगे। ‘नियम आधारित व्यवस्था का निर्माण: भारतीय नौसेना की भूमिका’ शीर्षक पर एक अन्य महत्वपूर्ण पैनल चर्चा 14 जनवरी 2026 को एसोसिएट प्रोफेसर अभिमन्यु सिंह अरहा के संचालन में आयोजित की जाएगी जिसमें लेफ्टिनेंट कमांडर अनुपमा थपलियाल और लेफ्टिनेंट जीवितेश सहारन हिंद महासागर क्षेत्र में नौसेना की महत्वपूर्ण भूमिका पर प्रकाश डालते हुए विषय पर अपने विचार प्रस्तुत करेंगे।

इस पुस्तक मेले का एक प्रमुख आकर्षण भारतीय नौसेना पर नौसेना इतिहास विभाग द्वारा तैयार की गई एक पुस्तक का विमोचन होगा जिसका अनावरण नौसेना प्रमुख द्वारा एक भव्य समारोह में किया जाएगा।

प्रदर्शनियों और चर्चाओं के अलावा, एनएचडी युवा आगंतुकों के साथ सक्रिय रूप से जुड़कर, लड़के-लड़कियों को भारतीय नौसेना में करियर बनाने के लिए प्रेरित कर रहा है। नौसेना से संबंधित प्रकाशनों और स्टालों ने पहले ही जनता का काफी ध्यान आकर्षित किया है।

भारतीय नौसेना नई दिल्ली विश्व पुस्तक मेले 2026 में आने वाले सभी आगंतुकों को अपनी गौरवशाली सेवा और भारत की चिरस्थायी समुद्री विरासत के बारे में अधिक जानने के लिए आमंत्रित करती है।

सोमनाथ स्वाभिमान पर्व: गहन विश्वास और सभ्यतागत गौरव के एक हजार वर्ष

सोमनाथ स्वाभिमान पर्व (8-11 जनवरी, 2026) सोमनाथ मंदिर पर 1026 में हुए पहले अभिलिखित आक्रमण के 1000 वर्ष पर स्मरणोत्सव के रूप में मनाया जा रहा है।
प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी इस अवसर पर मुख्य आध्यात्मिक और स्मरण कार्यक्रमों में भाग लेने के लिए 10-11 जनवरी, 2026 को सोमनाथ की यात्रा करेंगे।
प्रधानमंत्री श्री मोदी श्री सोमनाथ न्यास के प्रमुख हैं। इस मंदिर की विशेषता 150 फुट का शिखर, 1666 स्वर्ण मंडित कलश और 14200 ध्वज हैं।
प्रत्येक वर्ष 92-97 लाख श्रद्धालु सोमनाथ मंदिर के दर्शन करते हैं।
सोमनाथ में महिलाओं की केंद्रीय भूमिका है। मंदिर के 906 कर्मियों में से 262 महिलाएं हैं। वे बिल्व वन, प्रसाद वितरण और मंदिर भोज सेवाओं का प्रबंध देखती हैं।
सोमनाथ मंदिर न्यास में 363 महिलाएं कार्यरत हैं। वार्षिक 9 करोड़ रुपए की आय वाला यह न्यास महिला सशक्तीकरण को बढ़ावा दे रहा है।

सौराष्ट्रे सोमनाथं च श्रीशैले मल्लिकार्जुनम् ।
उज्जयिन्यां महाकालम्ॐकारममलेश्वरम्”

द्वादश ज्योतिर्लिंग स्तोत्रम के इस आरंभिक श्लोक में गुजरात के सोमनाथ को बारह पवित्र ज्योतिर्लिंगों में प्रथम स्थान पर रखा गया है जिससे भारतीय आध्यात्मिक परम्परा में उसके महत्व का पता चलता है। यह उस सभ्यतागत विश्वास को प्रतिबिंबित करता है कि सोमनाथ भारत के आध्यात्मिक भूगोल का आधार है। गुजरात में वेरावल के निकट प्रभास पाटन में स्थित, सोमनाथ केवल एक पूजा स्थल नहीं है, बल्कि भारत की सभ्यतागत निरंतरता का एक जीवंत प्रतीक है।

सदियों तक, सोमनाथ करोड़ों लोगों की श्रद्धा और उपासना का केंद्र रहा है। इसे बार-बार उन आक्रमणकारियों द्वारा निशाना बनाया गया जिनका उद्देश्य भक्ति नहीं, बल्कि विनाश था। इसके बावजूद, सोमनाथ की कथा सनातन धर्म को मानने वाले करोड़ों लोगों के अटूट साहस, विश्वास और संकल्प से जानी जाती है।

सोमनाथ स्वाभिमान पर्व का आयोजन 8 जनवरी से 11 जनवरी 2026 तक एक राष्ट्रीय उत्सव के रूप में किया गया।। यह आयोजन जनवरी 1026 में सोमनाथ मंदिर पर हुए पहले अभिलिखित आक्रमण के एक हजार वर्ष पूरे होने के उपलक्ष्य में स्मरणोत्सव के रूप में मनाया जा रहा है।

इस आयोजन की परिकल्पना विनाश के स्मरण के रूप में नहीं, बल्कि सहनशीलता, विश्वास और सभ्यतागत आत्म-सम्मान को श्रद्धांजलि के रूप में की गई है। सदियों से, सोमनाथ को बार-बार उन आक्रमणकारियों द्वारा निशाना बनाया गया जिनका उद्देश्य भक्ति के बजाय विनाश था। हालाँकि, हर बार देवी अहिल्या बाई होल्कर जैसे भक्तों के सामूहिक संकल्प के माध्यम से मंदिर का पुनर्निर्माण किया गया। पुनरुद्धार के इस अटूट चक्र ने सोमनाथ को भारत की सभ्यतागत निरंतरता का एक शक्तिशाली प्रतीक बना दिया।

2026 का वर्ष उस समय के भी 75 साल पूरे होने का अवसर है, जब स्वतंत्रता के बाद 11 मई, 1951 को मौजूदा सोमनाथ मंदिर को भक्तों के लिए फिर से खोला गया था। ये दोनों अहम पड़ाव सोमनाथ स्वाभिमान पर्व का आधार बने हैं।

चार दिवसीय पर्व के दौरान, सोमनाथ आध्यात्मिक गतिविधियों, सांस्कृतिक चिंतन और राष्ट्रीय स्मरण के केंद्र में परिवर्तित हो गया है। इस उत्सव की एक मुख्य विशेषता 72 घंटे का अखंड ओंकार जाप है, जो एकता और सामूहिक विश्वास का प्रतीक है। इसके साथ ही, पूरे मंदिर परिसर और नगर में भक्ति संगीत, आध्यात्मिक विमर्श और सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित किए जा रहे हैं।

सोमनाथ स्वाभिमान पर्व भारत की सनातन सभ्यता की यात्रा में गौरव, स्मरण और विश्वास की एक सामूहिक अभिव्यक्ति के रूप में खड़ा है।

सोमनाथ की ऐतिहासिक जड़ें प्राचीन भारतीय परंपरा में अत्यंत गहरी हैं। प्रभास तीर्थ, जहाँ सोमनाथ स्थित है, भगवान शिव की चंद्रदेव द्वारा की गई आराधना से जुड़ा हुआ है। परंपरा के अनुसार, चंद्रदेव ने यहाँ भगवान शिव की आराधना की थी और उन्हें उनके श्राप से मुक्ति मिली थी, जो इस स्थान को अपार आध्यात्मिक महत्व प्रदान करता है।

सदियों  से,  सोमनाथ मंदिर निर्माण के कई चरणों का साक्षी रहा, जिनमें से प्रत्येक उस समय की भक्ति, कलात्मकता और संसाधनों को दर्शाता है। प्राचीन वृत्तांत विभिन्न सामग्रियों का उपयोग करके बनाए गए क्रमिक मंदिरों का वर्णन करते हैं, जो नवीनीकरण और निरंतरता का प्रतीक हैं। सोमनाथ के इतिहास का सबसे उथल-पुथल भरा चरण ग्यारहवीं शताब्दी में शुरू हुआ।

जनवरी 1026 में, सोमनाथ को आक्रमणकारियों द्वारा अपने पहले अभिलिखित हमले का सामना करना पड़ा। इसने एक लंबी अवधि की शुरुआत की, जिसके दौरान सदियों तक मंदिर को बार-बार नष्ट किया गया और फिर से बनाया गया। इसके बावजूद, सोमनाथ लोगों की सामूहिक चेतना से कभी ओझल नहीं हुआ। मंदिर के विनाश और पुनरुद्धार का यह चक्र विश्व इतिहास में अद्वितीय है। यह दर्शाता है कि सोमनाथ कभी भी केवल पत्थर की एक संरचना मात्र नहीं था, बल्कि आस्था, पहचान और सभ्यतागत गौरव का एक जीवंत प्रतीक था।

1947 में, सरदार वल्लभभाई पटेल ने सोमनाथ के खंडहरों का दौरा किया और मंदिर के पुनर्निर्माण का अपना दृढ़ संकल्प व्यक्त किया। उनका दृष्टिकोण इस विश्वास पर आधारित था कि सोमनाथ का पुनरुद्धार भारत के सांस्कृतिक विश्वास को बहाल करने के लिए अनिवार्य है। यह पुनर्निर्माण जन-भागीदारी और राष्ट्रीय संकल्प के साथ शुरू किया गया था। कैलाश महामेरु प्रसाद स्थापत्य शैली में निर्मित वर्तमान मंदिर की प्राण-प्रतिष्ठा 11 मई, 1951 को की गई थी। यह समारोह केवल एक मंदिर के पुनः खुलने का प्रतीक नहीं था, बल्कि भारत के सभ्यतागत आत्म-सम्मान की पुष्टि थी।

श्री नरेन्द्र मोदी ने 31 अक्टूबर 2001 को आयोजित उस कार्यक्रम में भाग लिया था, जो 1951 में तत्कालीन राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद की उपस्थिति में पुनर्निर्मित सोमनाथ मंदिर के पुन: खुलने के 50 वर्ष पूरे होने के उपलक्ष्य में आयोजित किया गया था। इस अवसर पर मंदिर के पुनर्निर्माण में सरदार वल्लभभाई पटेल, के. एम. मुंशी और कई अन्य लोगों द्वारा निभाई गई महत्वपूर्ण भूमिका पर प्रकाश डाला गया था। यह कार्यक्रम सरदार वल्लभभाई पटेल की 125वीं जयंती के अवसर पर आयोजित हुआ था और इसमें तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी, तत्कालीन गृह मंत्री लालकृष्ण आडवाणी और अन्य गणमान्य व्यक्तियों ने भाग लिया था।

वर्ष 2026 में, राष्ट्र 1951 के उस ऐतिहासिक समारोह के 75 वर्ष पूरे होने का उत्सव मना रहा है, जो न केवल सोमनाथ मंदिर के पुन: खुलने का प्रतीक था, बल्कि भारत के सभ्यतागत स्वाभिमान की पुनर्स्थापना भी था। साढ़े सात दशक बाद, सोमनाथ आज एक नए कायाकल्प के साथ खड़ा है, जो उस सामूहिक राष्ट्रीय संकल्प की चिरस्थायी शक्ति को प्रतिबिंबित करता है।

सोमनाथ को भगवान शिव के 12 आदि ज्योतिर्लिंगों में प्रथम के रूप में पूजा जाता है। वर्तमान मंदिर परिसर में गर्भगृह, सभामंडप और नृत्यमंडप शामिल हैं, जो अरब सागर के तट पर भव्यता के साथ खड़े हैं। मंदिर के शिखर की ऊँचाई 150 फीट है, जिसके शीर्ष पर 10 टन भारी कलश स्थापित है। 27 फीट ऊँचा ध्वजदंड मंदिर की आध्यात्मिक उपस्थिति का प्रतीक है। पूरा परिसर 1,666 स्वर्ण-मंडित कलशों और 14,200 ध्वजाओं से सुसज्जित है, जो पीढ़ियों की भक्ति और उत्कृष्ट शिल्प कौशल का प्रतीक हैं।

सोमनाथ निरंतर जीवंत उपासना का केंद्र बना हुआ है। यहाँ आने वाले श्रद्धालुओं की संख्या हमेशा से अधिक रही है। यह संख्या एक वर्ष में 92 से 97 लाख भक्तों के बीच रहती है (2020 में लगभग 98 लाख तीर्थयात्रियों ने मंदिर के दर्शन किए)। बिल्व  पूजा जैसे अनुष्ठानों में 13.77 लाख से अधिक भक्त हिस्सा लेते हैं, जबकि 2025 में महाशिवरात्रि  के अवसर पर 3.56 लाख श्रद्धालु आये थे। भक्तों को सोमनाथ के इतिहास से जोड़ने में सांस्कृतिक पहलों ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। 2003 में शुरू किया गया प्रकाश एवं ध्वनि शो (लाइट एंड साउंड शो) को  2017 में कथा वृतांत और 3 डी  लेज़र तकनीक के साथ आधुनिक बनाया गया, पिछले तीन वर्षों में इस शो में 10 लाख से अधिक दर्शक देख चुके हैं। ‘वंदे सोमनाथ कला महोत्सव’ जैसे कार्यक्रमों ने लगभग 1,500 वर्ष पुरानी नृत्य परंपराओं को पुनर्जीवित किया है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी, जो श्री सोमनाथ ट्रस्ट के प्रमुख  के रूप में भी कार्यरत हैं, उनके नेतृत्व में सोमनाथ पुनरुद्धार के एक नए चरण में प्रवेश कर चुका है। शासकीय सुधारों, बुनियादी ढांचे के उन्नयन और विरासत संरक्षण के प्रयासों ने एक आध्यात्मिक और सांस्कृतिक केंद्र के रूप में मंदिर की भूमिका को और सुदृढ़ किया है।

सोमनाथ स्वाभिमान पर्व से पहले, सोमनाथ में एक अनूठा आध्यात्मिक उत्साह का वातावरण देखा गया। गिरनार तीर्थक्षेत्र और अन्य पवित्र केंद्रों के संतों ने शंख चौक से सोमनाथ मंदिर तक पदयात्रा की।  यह शोभायात्रा भगवान शिव के प्रिय डमरू, पारंपरिक वाद्ययंत्रों और भक्ति संगीत की ध्वनि से गुंजायमान थी। सिद्धिविनायक ढोल समूह के लगभग 75 ढोल वादकों ने इसमें भाग लिया, जिससे एक लयबद्ध और आध्यात्मिक रूप से ऊर्जामय वातावरण निर्मित हुआ। पूरे मंदिर परिसर में “हर हर महादेव” के जयकारा  गूंज उठा।

संतों और विशिष्ट प्रतिभागियों ने गहरी श्रद्धा के साथ आराधना की। इस पदयात्रा का स्वागत पुष्प वर्षा के साथ किया गया और मंदिर परिसर  दिव्य भव्यता में बदल गया। वहाँ उपस्थित श्रद्धालुओं ने आध्यात्मिक संतोष और पूर्णता की एक गहरी अनुभूति की।

2018 में “स्वच्छ आदर्श स्थल” घोषित होने के बाद, सोमनाथ ने संवहनीयता के क्षेत्र में कई नवीन प्रथाओं को अपनाया है। मंदिर में चढ़ने वाले फूलों को वर्मीकम्पोस्ट में बदला जा रहा है, जिससे परिसर के 1,700 बिल्व वृक्षों को पोषण मिलता है। ‘मिशन लाइफ’ के अंतर्गत, प्लास्टिक कचरे को सड़क बनाने के ब्लॉक में परिवर्तित किया जा रहा है, जिससे हर महीने लगभग 4,700 ब्लॉक्स तैयार होते हैं। इसके अतिरिक्त, वर्षा जल संचयन से प्रति माह लगभग 30 लाख लीटर गंदे जल का प्रशोधन किया जाता है।

72,000 वर्ग फुट में फैला 7,200 पेड़ों का एक मियावाकी वन प्रतिवर्ष लगभग 93,000 किलोग्राम कार्बन डाइऑक्साइड अवशोषित करता है। इसके अतिरिक्त, अभिषेक जल को शुद्ध करके ‘सोमगंगाजल’ के रूप में बोतलबंद किया जाता है, जिससे दिसंबर 2024 तक 1.13 लाख से अधिक परिवार लाभान्वित हो चुके हैं।

सोमनाथ महिला सशक्तिकरण के एक सशक्त केंद्र के रूप में भी उभरा है। सोमनाथ मंदिर ट्रस्ट के 906 कर्मचारियों में से 262 महिलाएँ हैं। विशेष रूप से, बिल्व वन का प्रबंधन पूरी तरह से महिलाओं द्वारा किया जाता है। इसके अतिरिक्त, 65 महिलाएँ प्रसाद वितरण के कार्य में और 30 महिलाएँ मंदिर की भोजन सेवाओं में जुटी हुई हैं। कुल मिलाकर, 363 महिलाओं को यहाँ प्रत्यक्ष रोजगार प्राप्त है, जो सामूहिक रूप से प्रतिवर्ष लगभग 9 करोड़ रुपये की आय अर्जित करती हैं। यह उनके आर्थिक स्वावलंबन और गरिमापूर्ण जीवन को दर्शाता है।

इन आयोजनों में प्रधानमंत्री की भागीदारी सोमनाथ स्वाभिमान पर्व के राष्ट्रीय महत्व को रेखांकित करती है और भारत की आध्यात्मिक और सांस्कृतिक विरासत को संरक्षित करने तथा उसका उत्सव मनाने की प्रतिबद्धता को सुदृढ़ करती है। यह यात्रा भारत की सभ्यतागत निरंतरता और सामूहिक विश्वास के एक जीवित और स्थायी प्रतीक के रूप में सोमनाथ की भूमिका पर भी प्रकाश डालती है।

सोमनाथ स्वाभिमान पर्व भारत के सभ्यतागत आत्मविश्वास की पुष्टि करता है। यह विनाश पर जीवंतता और भय पर अटूट आस्था की विजय का सम्मान है। सौराष्ट्र के तट पर अडिग खड़ा सोमनाथ मंदिर दुनिया भर में भारतीयों को प्रेरित करता है। यह हमें स्मरण कराता है कि जहाँ विनाशकारी शक्तियाँ इतिहास के पन्नों में ओझल हो जाती हैं, वहीँ  सच्चाई,  एकता और आत्म-सम्मान में निहित विश्वास सदैव अक्षुण रहता है।14

आदिनाथेन शर्वेण सर्वप्राणिहिताय वै।
आद्यतत्त्वान्यथानीयं क्षेत्रमेतन्महाप्रभम्।
प्रभासितं महादेवि यत्र सिद्ध्यन्ति मानवाः॥

अर्थ: सर्वशक्तिमान भगवान शिव ने, अपने आदिनाथ स्वरूप में, समस्त प्राणियों के कल्याण हेतु अपने शाश्वत सिद्धांत और संकल्प से इस अत्यंत शक्तिशाली और पवित्र क्षेत्र को प्रकट किया, जिसे प्रभास खंड के नाम से जाना जाता है। दिव्य आभा से आलोकित यह पुण्य भूमि वह स्थान है जहाँ मनुष्यों को आध्यात्मिक पूर्णता, पुण्य और मोक्ष की प्राप्ति होती है।