क्षेत्रीय इतिहास और धरोहर की जानकारी से ही देश और प्रदेश के इतिहास का निर्माण संभव – डॉ. व्यास
विजय त्रिवेदी की नई पुस्तक में अटल बिहारी वाजपेयी के विचार, व्यक्तित्व और राजनीतिक विरासत का जीवंत व प्रभावशाली चित्रण
नई दिल्ली। भारत रत्न, पूर्व प्रधानमंत्री स्वर्गीय अटल बिहारी वाजपेयी के बहुआयामी व्यक्तित्व, विचारधारा और राजनीतिक जीवन को केंद्र में रखकर वरिष्ठ पत्रकार एवं लेखक श्री विजय त्रिवेदी की नवीन पुस्तक का आज औपचारिक विमोचन किया गया।
इस अवसर पर वक्ताओं ने अटल बिहारी वाजपेयी के राष्ट्रनिर्माण में दिए गए योगदान को स्मरण करते हुए पुस्तक को उनके जीवन और कार्यों का एक प्रेरक दस्तावेज बताया। समारोह में लेखक विजय त्रिवेदी के लेखन की सराहना करते हुए कहा गया यह पुस्तक नई पीढ़ी को अटल जी के विचारों, मूल्यों और नेतृत्व से परिचित कराने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी।
पुस्तक में अटल बिहारी वाजपेयी के जीवन और कार्यों को 12 अध्यायों में रोचक, तथ्यपरक और संवेदनशील ढंग से प्रस्तुत किया गया है। इसमें उनके प्रारम्भिक जीवन से लेकर एक स्वयंसेवक से राष्ट्रीय नेता बनने की यात्रा, कारगिल युद्ध, परमाणु परीक्षण, आर्थिक उदारीकरण, नई टेलीकॉम नीति में उनकी भूमिका, आपातकाल का दौर, पाकिस्तान से मैत्री की पहल, भाषा-प्रेम और कवि-मन की अभिव्यक्ति, राजनीति से संन्यास तथा महाप्रयाण तक के सभी प्रमुख पड़ावों का विस्तृत वर्णन किया गया है।
लेखक ने अटल बिहारी वाजपेयी के व्यक्तित्व, विचारधारा और नेतृत्व क्षमता को सरल, सहज और प्रभावशाली शैली में प्रस्तुत किया है, जिससे पाठक राष्ट्रनिर्माण में उनके योगदान को गहराई से समझ सकें।
पत्रकारिता के लगभग चार दशकों के अनुभव के साथ श्री विजय त्रिवेदी टेलीविजन और साहित्य जगत का जाना-पहचाना नाम हैं। वे इससे पूर्व अटल बिहारी वाजपेयी पर आधारित ‘हार नहीं मानूँगा’, ‘यदा यदा ही योगी’, ‘बीजेपी: कल, आज और कल’ तथा राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सौ वर्षों की यात्रा पर केंद्रित ‘संघम् शरणं गच्छामि’ जैसी चर्चित पुस्तकों के लेखक रहे हैं।
कार्यक्रम के दौरान प्रकाशन विभाग की नई संस्कृत- हिन्दी द्विभाषी पत्रिका ‘संगमनीप्रभा’ के प्रथम अंक का भी लोकार्पण किया गया। दिल्ली विश्वविद्यालय के हिंदू अध्ययन केंद्र के निदेशक प्रो. ओम नाथ बिमली ने पत्रिका का लोकार्पण किया।
‘संगमनीप्रभा’ प्रकाशन विभाग की पहली त्रैमासिक द्विभाषी पत्रिका है। पत्रिका में प्रकाशित मूल सामग्री संस्कृत भाषा में होगी, जबकि हिन्दी भाषी पाठकों के लिए प्रत्येक पृष्ठ पर संस्कृत सामग्री का हिन्दी अनुवाद भी उपलब्ध कराया जाएगा। इस अनूठे प्रयास का उद्देश्य संस्कृत वाङ्मय की अमूल्य ज्ञान-परंपरा से नई पीढ़ी के पाठकों को परिचित कराना और उन्हें संस्कृत भाषा से जोड़ना है। पत्रिका का मूल्य 25 रुपये निर्धारित किया गया है, जबकि इसकी वार्षिक सदस्यता 100 रुपये में उपलब्ध होगी।
पत्रिका के प्रथम अंक की सराहना करते हुए प्रो. बिमली ने कहा कि विषय-वस्तु और डिज़ाइन के स्तर पर यह पत्रिका प्रकाशन विभाग के उत्कृष्ट प्रकाशनों की शृंखला में एक महत्वपूर्ण कड़ी है। उन्होंने कहा कि प्रकाशन विभाग विविध विषयों पर श्रेष्ठ पुस्तकों के साथ-साथ योजना, कुरुक्षेत्र, बाल भारती और आजकल जैसी प्रतिष्ठित मासिक पत्रिकाओं तथा इम्प्लॉयमेंट न्यूज़ के प्रकाशन के लिए जाना जाता है। अब त्रैमासिक ‘संगमनीप्रभा’ के प्रकाशन के साथ विभाग की पहचान और सशक्त होगी।
इस अवसर पर पुस्तक के लेखक श्री विजय त्रिवेदी, प्रकाशन विभाग के प्रधान महानिदेशक श्री भूपेन्द्र कैन्थोला सहित अनेक प्रतिष्ठित लेखक, साहित्यकार एवं विभाग के वरिष्ठ अधिकारी उपस्थित रहे।
‘आवाज़ों के जुगनू’ हमारे सांस्कृतिक डीएनए का दस्तावेज़ है: हरीश भिमानी
इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र में ‘आवाजों के जुगनू’ नामक पुस्तक का विमोचन और उस पर चर्चा
नई दिल्ली। इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र में ‘आवाज़ों के जुगनू’ पुस्तक का विमोचन और चर्चा कार्यक्रम आयोजित किया गया। इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र (आईजीएनसीए) के मीडिया केंद्र ने ‘आवाज़ों के जुगनू: वॉयस मास्टर्स ऑफ इंडिया’ नामक पुस्तक के विमोचन और चर्चा का सफल आयोजन किया। यह कार्यक्रम नई दिल्ली स्थित आईजीएनसीए, जनपथ में आयोजित किया गया। इस कार्यक्रम की अध्यक्षता आईजीएनसीए के सदस्य सचिव डॉ. सच्चिदानंद जोशी ने की। वरिष्ठ प्रसारक और वॉइस एक्टर हरीश भिमानी मुख्य अतिथि थे। विशेष अतिथि वरिष्ठ प्रसारक, पूर्व दूरदर्शन समाचार वाचक और वॉइस एक्टर शम्मी नारंग थे जबकि विशिष्ट अतिथि प्रसिद्ध वॉइस एक्टर सोनल कौशल थी जो डोरेमोन और छोटा भीम जैसे लोकप्रिय एनिमेटेड किरदारों को अपनी आवाज़ देने के लिए जानी जाती है। इस अवसर पर पुस्तक की संकलक और संपादक डॉ. शेफाली चतुर्वेदी भी उपस्थित थी। आईजीएनसीए के मीडिया केंद्र के नियंत्रक श्री अनुराग पुनेथा ने अतिथियों का स्वागत किया और कार्यक्रम का संक्षिप्त विवरण प्रस्तुत किया। इस अवसर पर एक क्यूआर कोड भी जारी किया गया जिसके माध्यम से श्रोता पुस्तक में शामिल सभी हस्तियों के साक्षात्कार देख सकते हैं।
अपने अध्यक्षीय भाषण में डॉ. सच्चिदानंद जोशी ने कहा कि कला का दायरा विशाल है। इसलिए, आईजीएनसीए ने ‘आवाज़ों के जुगनू’ नामक पुस्तक और ऑडियो प्रारूप के माध्यम से गैर-पारंपरिक कला विधा, यानी आवाज़ों की दुनिया से जुड़े कलाकारों की यात्राओं को दस्तावेज़ी करने की साहसिक पहल की है। उन्होंने घोषणा की कि पुस्तक का अंग्रेजी संस्करण भी प्रकाशित किया जाएगा और कहा कि यह तो केवल शुरुआत है, इस पहल को आगे और बढ़ाया जाएगा।
महाभारत में ‘समय’ को अपनी आवाज़ देने वाले श्री हरीश भिमानी ने कहा कि आवाज़ केवल संचार का माध्यम नहीं है बल्कि संस्कृति और संवेदनशीलता की वाहक है। उन्होंने मानव जीवन में आवाज़ के महत्ता बताते हुए और एक संस्कृत सुभाषित का उल्लेख किया और समझाया कि कोयल और कौआ दोनों काले रंग के होते हैं, फिर भी उनकी आवाज़ में अंतर होता है। उन्होंने ‘आवाज़ों के जुगनू’ को एक उल्लेखनीय पहल बताया और कहा कि यदि वे इसमें थोड़ा सा भी योगदान दे सके, तो वे इसे विनम्रतापूर्वक स्वीकार करते हैं। उन्होंने आगे कहा कि यह पुस्तक केवल पत्रों का संग्रह नहीं है बल्कि उस अदृश्य जीवन शक्ति को पकड़ने का प्रयास है जो सदियों से हमारी सामूहिक स्मृति का हिस्सा रही है। उन्होंने कहा कि ‘आवाज़ों के जुगनू’ हमारे सांस्कृतिक डीएनए का दस्तावेज है जो हमें याद दिलाता है कि भले ही शब्द मौन हो जाएं, उनकी गढ़ी हुई ध्वनि की गूंज सभ्यता की प्रतिध्वनि को जीवित रखती है।
दिल्ली मेट्रो की जानी-पहचानी आवाज, शम्मी नारंग ने भारतीय प्रसारण जगत में आवाज के कलाकारों की भूमिका के बारे में बात की और इस तरह के दस्तावेजीकरण प्रयासों के महत्व पर जोर दिया। अपने निजी अनुभव साझा करते हुए उन्होंने बताया कि इंजीनियरिंग की पढ़ाई पूरी करने के बाद उन्होंने आवाज की दुनिया में कैसे कदम रखा। सही उच्चारण और लहजे के महत्व पर बल देते हुए उन्होंने कहा कि अच्छी तरह बोलना जरूरी है, क्योंकि अच्छी तरह बोलने में कोई हर्ज नहीं है और अच्छी वाणी श्रोता पर सकारात्मक प्रभाव डालती है। सोनल कौशल ने युवा पीढ़ी के लिए आवाज उद्योग में मौजूद संभावनाओं और चुनौतियों के बारे में अपने अनुभव साझा किए। उन्होंने अपने सफर के बारे में विस्तार से बताया और सभागार में मौजूद बच्चों को डोरेमोन और छोटा भीम के संवाद सुनाकर मंत्रमुग्ध कर दिया, जिस पर उन्हें भरपूर तालियां मिली।
अपने स्वागत भाषण में श्री अनुराग पुनेथा ने कहा कि आवाज़ विश्वास पैदा करती है। एक उदाहरण देते हुए उन्होंने द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान संयुक्त राज्य अमेरिका में हुए एक प्रसारण का ज़िक्र किया, जब एक अभिनेता ने रेडियो नाटक के दौरान घोषणा की कि अमेरिका पर मंगल ग्रहवासी हमला कर रहे हैं। लोगों ने इस घोषणा पर विश्वास किया और सड़कों पर जमा हो गए। यह आवाज़ की शक्ति को दर्शाता है।
पुस्तक का परिचय देते हुए, इसकी संकलक और संपादक डॉ. शेफाली चतुर्वेदी ने बताया कि ‘आवाज़ों के जुगनू’ भारतीय गायन जगत की उन विशिष्ट और यादगार आवाज़ों का संग्रह है जिन्होंने रेडियो, दूरदर्शन, विज्ञापन, डबिंग, घोषणाओं और रंगमंच के माध्यम से भारतीय प्रसारण को समृद्ध किया है। यह पुस्तक इन कलाकारों के जीवन सफर, रचनात्मक संघर्षों और योगदानों को विस्तार से प्रस्तुत करती है।
समापन में, श्री अनुराग पुनेथा ने अतिथियों और उपस्थित लोगों के प्रति आभार व्यक्त किया और ‘आवाज़ों के जुगनू’ पहल को आगे बढ़ाने के बारे में बात की। कार्यक्रम में जाने-माने रेडियो जॉकी (आरजे) नितिन खुराफती, सिमरन, जसलीन भल्ला, साइमा रहमान, साथ ही प्रख्यात प्रसारक राजेंद्र चुघ, राजीव कुमार शुक्ला, रिनी खन्ना, रमा पांडे, श्रीवर्धन त्रिवेदी और नरेंद्र जोशी भी उपस्थित थे। सिमरन, राजेंद्र चुघ, राजीव कुमार शुक्ला और नरेंद्र जोशी ने भी इस अवसर पर अपने विचार साझा किए। इसके अलावा, कला, मीडिया और संस्कृति से जुड़े विद्वानों, कलाकारों, छात्रों और श्रोताओं की भी अच्छी खासी उपस्थिति देखी गई। अपनी तरह के इस अनूठे कार्यक्रम ने भारतीय आवाज उद्योग के प्रति समझ और संवेदनशीलता को और गहरा किया।
फिल्मी दुनिया ने हमारे पंडितों, महान चरित्रों और देवी-देवताओं का फूहड़ मजाक बनायाः डॉ. कुमार विश्वास
मुंबई। गोरेगाँव स्पोर्ट्स क्लब द्वारा आयोजित ड़ॉ. कुमार विश्वास के अपने अपने राम कार्यक्रम के दूसरे और तीसरे दिन पूरा कार्यक्रम स्थल खचाखच भरा रहा। कार्यक्रम में ऐसे ऐसे बुजुर्ग भी पहुँचे जो चल पाने में असमर्थ थे, और कई दिव्यांग जन भी पूरे उत्साह और श्रध्दा के साथ कार्यक्रम में पहुँचे। क्लब की ओर से इन सभी के लिए व्हील चेअर की व्यवस्था की गई थी। क्लब के चारों ओर अवयवस्थित और आयोजन स्थल पर उमड़ी भीड़ के बावजूद इन सबकी श्रध्दा देखने लायक थी। कार्यक्रम में फिल्मी दुनिया के निर्माता-निर्देशक, उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति सहित समाज के विभिन्न क्षेत्रों के कई प्रबुध्द लोग उपस्थित थे।
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कुमार विश्वास के ‘अपने अपने राम’ की ‘रस गंगा’ में भीगकर तृप्त होकर भी अतृप्त रह गए हजारों श्रोता
इस अवसर पर उन्होंने गोरेगाँव स्पोर्ट्स क्लब द्वारा प्रकाशित कॉफी टेबल बुक का भी विमोचन किया। इस पुस्तक में क्लब के 40 वर्षों के गौरवशाली इतिहास, इस क्लब के निर्माण में अपना योगदान देने वाले लोगों के बारे में विस्तार से जानकारी दी गई है।
कार्यक्रम के समापन पर प्रभु श्री रामचन्द्र जी का राजतिलक भी किया गया। कार्यक्रम के अंत में काशी से आए पंडितों द्वारा प्रस्तुत भव्य गंगा आरती ने उपस्थित दर्शकों को रोमांचित कर दिया।
अपने अपने राम पर व्याख्यान प्रारंभ करते हुए उन्होंने कहा कि फिल्मी दुनिया ने हमारे देवताओं से लेकर धर्मग्रंथों और महर्षि नारद जैसे विद्वान को उपहास का पात्र बना दि
या, इसका एक पूरी पीढ़ी पर घातक असर पड़ा।
डॉ. कुमार विश्वास ने रामकथा के विभिन्न प्रसंगों के माध्यम से राम के चरित्र के कई आयामों को एक नई अवधारणा, वैज्ञानिकता और आज के दौर की प्रासंगिकता के साथ इतने तर्कयुक्त और सारगर्भित ढंग से प्रस्तुत किया कि उपस्थित श्रोताओं को रामचरित मानस के अनसमझे और अनकहे प्रसंगों की जानकारी मिली।
उन्होंने कहा कि हमारी संस्कृति वसुधैव कुटुंबकम की संस्कृति है। हमने कभी किसी देश पर आक्रमण कर उसे जीतने का प्रयास नहीं किया। राम ने अहंकारी रावण को मारकर लंका का राज्य विभिषण को सौंप दिया। हम पिछले सैकड़ों वर्षों से हमारे बारे में लिखे गए झूठे इतिहास और काल्पनिक कथाओं के माध्यम से हमारे गौरवशाली इतिहास को, हमारे धर्मग्रंथों को निंदित किया गया। लेकिन, अब परा दौर बदल चुका है, आज की नई पीढ़ी सत्य जानना चाहती है और सत्य हर तरह से बाहर आ रहा है।
उन्होंने ऐतिहासिक साक्ष्यों की चर्चा करते हुए कहा कि पटना के चन्द्रगुप्त, मलयदेश (मलयदेश प्राचीन भारत में दक्षिण भारत और दक्षिण-पूर्व एशिया (आज का मलेशिया, इंडोनेशिया) के लिए प्रयुक्त सांस्कृतिक-भौगोलिक शब्द था) का सिंहरण, चीन व्हेनसांग जैसे लोगों को आचार्य शीलभद्र ने शिक्षा दी।
शंकराचार्य ने पूरे देश में पैदल भ्रमण कर हमारी संस्कृति को बचाया और अपने धर्म के प्रति लोगों में आत्मविश्वास पैदा किया।
उन्होंने कहा कि भारत के बाहर पढ़ने जाना गलत नहीं, लेकिन वहाँ जाकर अपने देश के बारे में गलत सोचना और बुरा कहना गलत है। ज्ञान की सीमाएँ पूरे विश्व को छूती है। इसे देश की भौगोलिक सीमा में नहीं बाँधा जा सकता।
राम का वन जाना ऋषि संस्कृति का प्रतीक है। उन्होंने कहा कि विद्वान व संस्कारवान व्यक्ति के साथ बैठने मात्र से ही सकारात्मक ऊर्जा मिलती है।
हमारे देश का नाम भारत बहुत गूढ़ अर्थ रखता है भा का अर्थ होता है प्रकाश और रत का मतलब जो उसमें निरंतर रत है या लगा हुआ है-इसी का नाम भारत है।
आज पूरा विश्व एआई के खतरे से जूझ रहा है और इस खतरे से भारत ही निपट सकता है क्योंकि हमारी संस्कृति में शक्ति में विकृति नहीं बल्कि सकारात्मकता का भाव होता है।
उन्होंने इस बात पर दुःख व्यक्त किया कि हम अपनी संस्कृति से दूर होते जा रहे हैं, पैर छूने जैसे कार्य को अब घुटना छूने तक सीमित कर दिया गया है।
डॉ. कुमार विश्वास ने कहा कि रामचरित मानस प्रबंधन, राजनीति, कूटनीति से लेकर समाज व्यवस्था को चलाने और समझने का अद्भुत ग्रंथ है।
राम ने रावण से चर्चा करने अपने दूत के रूप में दोबारा हनुमान को नहीं भेजा क्योंकि ने लंका दहन कर चुके थे। दूसरी बार उन्होंने बाली के पुत्र अंगद को भेजा, क्योंकि बाली ने रावण को पराजित कर उसे अपनी बगल में दबाकर पृथ्वी का चक्कर लगाया था। इसका कारण था कि रावण को ये अहसास हो जाए कि राम के पास कितने शूरवीर योध्दा हैं। इसी तरह मेघनाथ के मरने के बाद ही उन्होंने विभीषण को युध्द में अपने साथ लिया, अगर वो पहले ही युध्द में विभीषण को अपने साथ ले लेते तो हो सकता है रावण व विभिषण भावुक हो कर युध्दभूमि में गले मिल लेते। लेकिन रावण को यह पता लग गया था कि मेघनाथ की मृत्यु का कारण विभिषण है, इसलिए वह विभिषण के प्रति भी क्रोध व बदले से भरा रहा।
रावण विद्वान होकर भी अनियंत्रित ज्ञान का प्रतीक था, जबकि राम नियंत्रित ज्ञान के प्रतीक थे। कुमार विश्वास ने कहा अकि उत्तम कुल में जन्म लेना इस बात की गारंटी नहीं है कि व्यक्ति संस्कारवान होगा। रावण तो ब्रह्मा का नाती और ऋषि पुलत्स्य का पुत्र था फिर भी वह अपने अहंकार की वजह से दुष्टता का प्रतीक बना।
उन्होंने कहा कि सफल व्यक्ति की सफलता उसका गुण नहीं बल्कि सफल होकर विनम्र बने रहना उसकी सफलता का शीर्ष है।
राम की पदयात्रा -पद की यात्रा नहीं थी जैसे कि आजकल के नेता पदयात्रा करते हैं।
हमने अपने दुश्मन देश से तीन युध्द लड़े, हम विजयी रहे मगर हमने उस पर कब्जा नहीं किया, जबकि युध्द हमने नहीं किया हम पर थोपा गया था।
राम ने वनवास के माध्यम से देश केछ वनवासी लोगों से मिलने, उनकी समस्याओँ को जानने और अपनी वनवासी संस्कृति को समझने का प्रयास किया। अगर राम चाहते तो अयोध्या के बाहर जंगल में कुटी बनाकर 14 वर्ष वहीं बिता देते।
नीति लोगों की राय से ज्यादा महत्व रखती है, राम ने अयोध्या नगरी के लोगों की इच्छा के विपरीत नीति का पालन करते हुए वनयात्रा स्वीकार की, अगर वे भीड़ और लोगों की मांग का अनुसरण करते तो कोई उनका विरोध भी नहीं करता। इसी तरह राजा को नीति का पालन करना चाहिए, भीड़ या जनता की राय का नहीं। नीति राष्ट्र हित में होती है, जबकि लोगों की मांग एक तरह से स्वार्थ का प्रतीक होती है।
रामचरित मानस के विविध प्रसंगों का उल्लेख करते हुए कुमार विश्वास ने कहा कि शबरी के झूटे बेर राम को इसलिए स्वादिष्ट लगे कि उनकी माता कौशल्या स्वयं छत्तीसगढ की थी और वो बचपन में उन्हें वही बेर खिलाती थी। उन्होंने कहा कि हमारे परिवारों में यही समस्या है कि हर बेटे को माँ के हाथ का खाना ही अच्छा लगता है, पत्नी के हाथ का नहीं, क्योंकि पहली बार जो स्वाद मिलता है वह आजीवन याद रहता है।
शबरी की भक्ति को लेकर राम ने कहा कि शबरी ने विवाह करने से इसलिए इँकार कर दिया था क्योंकि विवाह के लिए हजारों भेड़ों और बकरियों की बलि दी जा रही थी। बाद में उसने युवावस्था में मतंग ऋछि के आश्रम को संवारने की सेवा देती रही। जब ऋषि का अंतिम समय आया तो शबरी ने उनसे कहा कि आपके शिष्यों ने तो ज्ञान पाया है, यज्ञ किये हैं उनको तो भगवान मिल जाएंगे लेकिन मुझे कैसे मिलेंगे, तो मतंग ऋषि ने उसे वरदान दिया कि तुझसे मिलने तो भगवान खुद आएँगे और तू भगवान को राह दिखाएगी।
शबरी की भक्ति पर उन्होंने कवि रामप्रकाश आकुल की इस कविता से उन्होंने श्रोताओं को भाव-विभोर कर दिया
पथरीली गीली आँखों में भावों की सरयू लहराई
जब शबरी की पर्णकुटी में अवधी में बोले रघुराई
हमका भूख लगी है माई !
छोटा सा पलाश का दाेना
दोने में अधखाये फल हैं
खाने और खिलाने वाले
दोनों के ही नयन सजल हैं
मेवे पकवानों ने बेरों के जैसी किस्मत कब पाई
जब शबरी की पर्णकुटी में अवधी में बोले रघुराई
हमका भूख लगी है माई !
आज ज़रा सी पर्णकुटी से
कंचन जड़े महल जलते हैं
जंगल के फूलों की माला
से सब नीलकमल जलते हैं
एक भीलनी की सेवा से भावविभोर हुयी ठकुराई
जब शबरी की पर्णकुटी में अवधी में बोले रघुराई
हमका भूख लगी है माई !
सत्य सनातन समानता का
वैसा नाम नहीं हो पाया
और राम के बाद धरा पर
कोई राम नहीं हो पाया
किसने इतनी मर्यादा से ऊँच नीच की रेख मिटाई
जब शबरी की पर्णकुटी में अवधी में बोले रघुराई
हमका भूख लगी है माई !
वाल्मिकी रामायण में राम के वनवास से आने के बाद पूरी कथा का विराम हो जाता है, लेकिन कुछ लोगों ने षड़यंत्र करके रामकथा में सीता के परित्याग की झूठी कहानी चलाई और हमने सच मान ली।
उन्होंने श्रोताओं द्वारा पूछे गए सवालों का स्वागत करते हुए कहा कि सवाल पूछना हमारी परंपरा का गौरव रहा है, जबकि दूसरे धर्म के लोग सवाल पूछने पर सिर तन से जुदा करने की बात करते हैं।
एक श्रोता के सवाल के जवाब में उन्होंने कहा कि बुराई पर नियंत्रण तभी हो सकता है जब आपको पता चल जाए कि आपके अंदर बुराई क्या है। बुराई को जान लेने के बाद भी उसके हिसाब से जीते रहे तो वही बुराई आपको नष्ट कर देगी, रावण इसका प्रत्.क्ष उदाहरण है।
उन्होंने रमेश सान के शेर की दो पंक्तियाँ प्रस्तुत की-
एक मुठ्टी राख में तब्दील होना है, किस करीने से चिता पर लाद दिया है।
उन्होंने कहा कि जो प्राप्त है, वही पर्याप्त है। आत्मा से हमेशा सच निकलता है और मन भटकाता है, जो आत्मा की सुनता है वह कभी कोई गलत काम नहीं कर सकता। मन की इच्छा अनंत है, लेकिन शरीर की सीमा निश्चित है।
अपने व्याख्यान के दौरान उन्होंने गीता और रामचरित मानस के कई रोचक प्रसंगों के माध्यम से इन ग्रंथों की आज के दौर में उपयोगिता पर चर्चा की और नई पीढ़ी को इसको समझने पर जेर दिया।
कुमार विश्वास के ‘अपने अपने राम’ की ‘रस गंगा’ में भीगकर तृप्त होकर भी अतृप्त रह गए हजारों श्रोता
मुंबई। मुंबई शहर में ऐसे तो हर दिन राष्ट्रीय व अतंरराष्ट्रीय स्तर के कई आयोजन होते हैं, लेकिन कुछ ही आयोजन ऐसे होते हैं जो इतिहास बना देते हैं। जाने माने कवि और रामकथा के मर्मज्ञ डॉ. कुमार विश्वास द्वारा मुंबई के प्रतिष्ठित गोरेगाँव स्पोर्ट्स क्लब में अपने अपने राम के माध्यम से जब रामकथा के विविध प्रसंगों का वर्णन किया गया तो उपस्थित हजारों श्रोताओं की भावदशा और रोमांच देखने लायक था। उनके एक एक वाक्य श्रोताओं ने करतल ध्वनि से अपना अहोभाव व्यक्त किया।
गोरेगाँव स्पोर्ट्स क्लब के विशाल परिसर में बने भव्य पांडाल में हजारों श्रोताओं में रामकथा की इस रसगंगा में डुबकी लगाई। इस आयोजन को सफल बनाने में क्लब के अध्यक्ष श्री विनय जैन व सचिव श्री संजय मालू के निर्देशन में श्री चन्द्रकांत अग्रवाल-बाबू भैया, श्री रमाकांत परसरामपुरिया, श्री सुनील काबरा, श्री प्रदीप जैन व श्री ललित जैन सहित क्लब की विभिन्न कमेटियों के सदस्यों ने अथक प्रयास किए।
डॉ. कुमार विश्वास के अपने अपने राम के आयोजन का यह पहला दिन था। कार्यक्रम प्रारंभ होने के एक घंटे पहले ही पूरा पंडाल रसिक श्रोताओं से भर चुका था। यह कार्यक्रम 10 व 11 जनवरी को भी होगा।
उन्होंने अपने व्याख्यान का प्रारंभ रामचरित मानस के बाल कांड के मंगलाचरण से किया।
वर्णानामर्थसंघानां रसानां छन्दसामपि।
मंगलानां च कर्त्तारौ वन्दे वाणीविनायकौ॥1॥
भवानीशंकरौ वन्दे श्रद्धाविश्वासरूपिणौ।
याभ्यां विना न पश्यन्ति सिद्धाः स्वान्तःस्थमीश्वरम्॥2॥
वन्दे बोधमयं नित्यं गुरुं शंकररूपिणम्।
यमाश्रितो हि वक्रोऽपि चन्द्रः सर्वत्र वन्द्यते॥3॥
सीतारामगुणग्रामपुण्यारण्यविहारिणौ।
वन्दे विशुद्धविज्ञानौ कवीश्वरकपीश्वरौ॥4॥
उद्भवस्थितिसंहारकारिणीं क्लेशहारिणीम्।
सर्वश्रेयस्करीं सीतां नतोऽहं रामवल्लभाम्॥5॥
यन्मायावशवर्ति विश्वमखिलं ब्रह्मादिदेवासुरा
यत्सत्त्वादमृषैव भाति सकलं रज्जौ यथाहेर्भ्रमः।
यत्पादप्लवमेकमेव हि भवाम्भोधेस्तितीर्षावतां
वन्देऽहं तमशेषकारणपरं रामाख्यमीशं हरिम्॥6॥
नानापुराणनिगमागमसम्मतं यद्
रामायणे निगदितं क्वचिदन्यतोऽपि।
स्वान्तःसुखाय तुलसी रघुनाथगाथा
भाषानिबन्धमतिमंजुलमातनोति॥7॥
अपने व्याख्यान का प्रारंभ करते हुए उन्होंने कहा कि राम मनुष्य के स्वाभिमान के प्रतीक हैं और इस प्रतीक को सार्थक किया महाराष्ट्र की धरती पर जन्मे वीर शिवाजी ने। उन्होंने शिवाजी के जीवन के कई प्रेरक प्रसंगों का उल्लेख किया और महाकवि भूषण द्वारा शिवाजी के चरित्र पर लिखी गई अमर कविता की व्याख्या कर उसका स्वसर पाठ किया। श्रोताओं के लिए इस कविता को लय में सुनना एक अद्भुत अनुभव था।
इन्द्र जिमि जंभ पर, बाडब सुअंभ पर,
रावन सदंभ पर, रघुकुल राज हैं।
पौन बारिबाह पर, संभु रतिनाह पर,
ज्यौं सहस्रबाह पर राम-द्विजराज हैं॥
दावा द्रुम दंड पर, चीता मृगझुंड पर,
‘भूषन वितुंड पर, जैसे मृगराज हैं।
तेज तम अंस पर, कान्ह जिमि कंस पर,
त्यौं मलिच्छ बंस पर, सेर शिवराज हैं॥
ऊंचे घोर मंदर के अंदर रहन वारी,
ऊंचे घोर मंदर के अंदर रहाती हैं।
कंद मूल भोग करैं, कंद मूल भोग करैं,
तीन बेर खातीं, ते वे तीन बेर खाती हैं॥
भूषन शिथिल अंग, भूषन शिथिल अंग,
बिजन डुलातीं ते वे बिजन डुलाती हैं।
‘भूषन भनत सिवराज बीर तेरे त्रास,
नगन जडातीं ते वे नगन जडाती हैं॥
छूटत कमान और तीर गोली बानन के,
मुसकिल होति मुरचान की ओट मैं।
ताही समय सिवराज हुकुम कै हल्ला कियो,
दावा बांधि परा हल्ला बीर भट जोट मैं॥
‘भूषन’ भनत तेरी हिम्मति कहां लौं कहौं
किम्मति इहां लगि है जाकी भट झोट मैं।
ताव दै दै मूंछन, कंगूरन पै पांव दै दै,
अरि मुख घाव दै-दै, कूदि परैं कोट मैं॥
बेद राखे बिदित, पुरान राखे सारयुत,
रामनाम राख्यो अति रसना सुघर मैं।
हिंदुन की चोटी, रोटी राखी हैं सिपाहिन की,
कांधे मैं जनेऊ राख्यो, माला राखी गर मैं॥
मीडि राखे मुगल, मरोडि राखे पातसाह,
बैरी पीसि राखे, बरदान राख्यो कर मैं।
राजन की हद्द राखी, तेग-बल सिवराज,
देव राखे देवल, स्वधर्म राख्यो घर मैं॥
उन्होंने कहा कि रामचरित मानस एक विश्व ग्रंथ है जो हमारी सांस्कृतिक, अध्यात्मिक व धार्मिक धरोहर है। आज दुनिया को ये तय करना होगा कि वो किस संस्कृति को अपनाना चाहती है। एक हमारी संस्कृति है जो लोगों को जोड़ने का काम करती है और पाश्चात्य संस्कृति है जो लोगों पर कब्जा करके लूटने का काम करती है।
उन्होंने विवेकानंद के जीवन के एक मार्मिक प्रसंग का उल्लेख करते हुए कहा कि जब विवेकानंद शिकागो की धर्म सभा से अपनान व्याख्यान देकर नीचे उतरे तो एक विदेशी महिला ने उनके सामने विवाह का प्रस्ताव रखते हुए कहा कि मेरा सौंदर्य और आपके अध्यात्मिक ज्ञान से हमें जो संतान मिलेगी वो विलक्षण होगी। इस पर विवेकानंद ने जो उत्तर दिया, वो हमारी संस्क़ति का प्रतिनिधित्व करता है, उन्होंने कहा कि मैं आज से ही अआपको अपनी माँ मान लेता हूँ और मुझे अपना बेटा समझें।
राम के चरित्र का उल्लेख करते हुए डॉ. कुमार विश्वास ने कहा कि शक्ति तभी सुरक्षित रहेगी जब तक सके साथ मर्यादा रहेगी। हमारा इतिहास गवाह है कि श्री राम से लेकर वीर शिवाजी तक जितने भी योद्धा हुए हैं उन्होंने शक्ति के साथ संस्कृति और मर्यादा का भी पालन किया।
उन्होंने कहा कि फिल्मी दुनिया ने हमारी संस्कृति को हर तरह से विकृत करने का कुत्सित प्रयास किया इसीका नतीजा है कि हमारी नई पीढ़ी अपनी संस्कृति से विमुख होती रही, लेकिन अब यह दौर बदल रहा है। हम देखते हैं कि 31 दिसंबर और 1 जनवरी जो कैलेंडर की एक तारीख मात्र है, इस मौके पर भी युवा पीढ़ी सहित लाखों लोग मंदिरों में दर्शन करने पहुँचते हैं। उन्होंने कहा कि हमारी संस्कृति की यही विशेषता है कि वह हर जगह अपनी राह बना लेती है।
वह एक दौर था जब हमें ऐसी फिल्में और गीत देखने सुनने को मिलते थे।
उन्होंने 1954 में बनी जागृति’ फिल्म का उल्लेख करते हुए कहा कि इसके निर्देशक और मुख्य कलाकार सत्येन बोस व अभि भट्टाचार्य बंगाल के थे मुख्य नायिका मुमताज़ बेग़म थी।
संगीतकार हेमंत कुमार थे. गीतकार थे कवि प्रदीप और इसके गीत के बोल थे।
ये है अपना राजपूताना नाज इसे तलवारों पे
इसने सारा जीवन काटा बरछी तीर कटारों पे
ये प्रताप का वतन पला है आज़ादी के नारों पे
देखो, मुल्क मराठों का ये यहाँ शिवाजी डोला था
मुगलों की ताक़त को जिसने तलवारों पे तोला था
हर पर्वत पे आग जली थी हर पत्थर एक शोला था
बोली हर-हर महादेव की बच्चा-बच्चा बोला था
शेर शिवाजी ने रखी थी लाज हमारी शान की
इस मिट्टी से तिलक करो ये धरती है बलिदान की
अब एक बार फिर वह दौर बदल रहा है, अब छावा और धुरंधर जैसी फिल्मों ने एक नया विमर्श पैदा किया है।
उन्होंने औरंगजेब का उल्लेख करते हुए कहा कि वो जिस संस्कृति का प्रतीक था उसमें उसने अपने पिता शाहजहाँ को कैद कर उसके खाने और पानी पीने तक पर पाबंदी लगा दी थी। इस पर शाहजहाँ ने औरंगजेब को लिखकर भेजा कि एक तरफ हिंदू हैं जो अपने पुरखों को भी श्राध्द पक्ष में पानी पिलाते हैं और दूसरी तरफ तू मेरा बेटा होकर भी मुझे खाना और पानी तक नहीं देता है।
ऐ पिसर तू अजब मुसलमानी,
ब पिदरे जिंदा आब तरसानी
आफरीन बाद हिंदवान सद बार,
मैं देहंद पिदरे मुर्दारावा दायम आब।
कुमार विश्वास ने कहा कि तुलसी दास जी ने लिखा है-
राम कथा सुंदर कर तारी।
संसय बिहग उडा़वनिहारी।।
राम की कथा हाथ की सुंदर ताली है, जो संदेहरूपी पक्षियों को उड़ा देती है।
कुमार विश्वास ने कहा कि राम मनुष्यों के ही नहीं देवताओं के भी पूज्य हैं। एक प्रसंग का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि देवताओं के राजा इन्द्र के पुत्र जयंत न् जब इन्द्र से पूछा कि सबसे पूज्यनीय कौन हैं तो इन्देर ने जवाब दिया कि राम सबसे पूज्यनीय हैं, तो जयंत ने पूछा कि राम कहाँ मिलेंगे तो इन्द्र ने जवाब दिया वे पृथ्वी पर मिलेंगे। इस पर जयंट कौए का रूप बनाकर वनवासी राम को देखने गया, राम उस समय सीता जी क पैरों में महराब लगा रहे थे. तो कौआ बने जयंत ने सीता माता के पैरों पर चोंच मारकर खून निकाल दिया, इस पर राम को क्रोध आया तो उन्होंने उसके पीछे लक्ष्यबेधी बाण चला दिया अब कौआ बना जयंत अपनी जान बचाने को अपने पिता इन्द्र, भगवान शंकर, ब्रह्मा जी से लेकर विष्णुजी के पास गया उसकी कोई सुनवाई नहीं हुई तो नारद जी ने उसे समझाया कि तुझे राम ही बचा सकते हैं।
जब रामजी नीची गर्दन किए थे तो जयंत ने उनसे चिंरजीव होने का आशीर्वाद ले लिया। फिर जयंत ने कहा कि आपने तो मुझ पर तीर छोड़ रखा है, इससे कैसे बचूँ। इस पर रामजी ने कहा कि तीर तो अपना काम करेगा ही। तुझे इससे बचना हो तो अपने शरीर का कोई एक अंग इसके आगे समर्पित करना होगा। तब कौए ने अपनी एक आँख को तीर से घायल कर लिया और तबसे कोए की एक ही आँख रह गई। आज विज्ञान भी ये मानता है कौए की एक ही आँख होती है और वह उसी आँख से गर्दन घुमाकर एक से दूसरी ओर देखता है।
रामकथा की व्याख्या करते हुए कुमार विश्वास ने कहा कि ये मात्र रामजी की जीवनी नहीं हमारे जीवन की संजीवनी है। जो इसे पिएगा वो जीवन के हर कष्ट का सामना कर लेगा।
उन्होंने कहा कि हमारे देश को वामपंथ पर ले जाने की साजिशें हो रही है, लेकिन अब देश रामपंथ पर चल पड़ा है।
हमारी संस्कृति शास्त्रार्थ और उत्तरों से निकली संस्कृति है।
गीता विषाद मुक्त करने का ग्रंथ है। कृष्ण ने अर्जुन का विषाद से मुक्त कर पूरी मनुष्यता को विषाद मुक्त होने की राह दिखाई है।
उन्होंने दुःख व्यक्त करते हुए कहा कि फिल्मी दुनिया के लोगों से कोई पूछता है कि कौनसी पुस्तक पढ़ी तो वो किसी विदेश पुस्तक का नाम बताकर गौरव महसूस करते हैं। लेकिन गीता रामाचरित मानस जैसे ग्रंथों का फिल्मों में मजाक उड़ाते हैं।
कुमार विश्वास ने कहा कि फिल्मी धुनों पर भगवान के भजन बजाना बंद कीजिये। जब आप किसी फिल्मी धुन पर भजन सुनते हैं तो आप भक्ति में नहीं डूबते बल्कि फिल्मी दृश्य से जुड़ जाते हैं।
उन्होंने कहा कि मैंने माँ वैष्णो देवी के दर्शन के लिए कई बार प्रयास किए मगर माँ का बुलावा ही नहीं आय। एक दिन ऐसा अवसर आया कि मुझे माँ के चरणों मैं बैठकर कविता सुनाने को कहा गया और मात्र 45 मिनट दिए गए, लेकिन मैने लगातार डेढ़ घंटे तक अपनी कविता माँ के चरणों में प्रस्तुत की।
मैं क्या गाऊं तेरा यश मैया यश,
यश रस शंकर गजानन ने शारदा ने गाया है।
सब सुख संपदा या विपदा हरण मात जानता हूं
सब तेरे इंगितों की छाया है।
आधी सदी इंतजार में बिताई मैंने मैया।
क्यों नहीं बुलाया तू ही जाने तेरी माया है
देर तक देर तक देर तक तेरे दर पे नवाऊंगा मैं सर
क्योंकि मैया तूने मुझे देर से बुलाया है
कुमार विश्वास ने अपने प्रवचन में कई प्रमुख अध्यात्मिक व धार्मिक उध्दरणों के साथ युवी पीढ़ी से आव्हान किया कि वो पैसा खूब कमाएँ मगर अपनी सांस्कृतिक जड़ों को कतई ना भूलें।
उन्होंने पंजाब के एक व्यापारी लाला का उदाहरण देते हुए कहा कि उन्होंने व्यापार कारोबार सब छोड़कर अपना पूरा जीवन धार्मिक कार्यों में लगा दिया और इसकी प्रेरणा उन्हें घर की सफाई करने वाली महिला से मिली।
उन्होंने कहा कि संसद से लेकर न्यायलय और सड़क पर जो लोग राम को काल्पनिक कहते थे वे आज खुद काल्पनिक होने के कगार पर हैं।
उन्होंने कहा कि बच्चों को हैरी पॉटर की नहीं अपने धर्म और अध्यात्म की कहानियाँ सुनाईये। हम उस पीढ़ी के प्रतिनिधि हैं जिनको बचपन में ध्रुव, प्रहलाद और छढि मुनियों की कहानियाँ सुनाई जाती थी।
कुमार विश्वास ने दुःख व्यक्त करते हुए कहा कि आज विवाह के आयोजन पर करोडों रुपये खर्च किए जाते हैं लेकिन जिस ब्राह्मण ने हजारों साल से वैदिक परंपरा को जीवित रखा उसे दक्षिणा के नाम पर नाममात्र की राशि दी जाती है और उसे कहा जाता है कि पंडितजी जल्दी कीजिए। इस जल्दी का नतीजा बहुत खतरनाक होता है। एक घटना का उल्लेख करते हुए उन्होंने बताया कि विवाह में करोडों रुपये खर्च करने के बाद भी एक पति -पत्नी का संबंध विच्छेद हो गया । मैं उनके विवाह में गया था। उनके पिता ने मुझसे पूछा कि ये कैसे हो गया तो मैने कहा कि आप विवाह की रस्म कराने वाले पंडितजी को जल्दी कीजिये ..जल्दी कीजिये कह रहे थे इसलिए ये भी जल्दी हो गया …
उन्होंने कहा कि मेरी बेटी के विवाह का मुहुर्त 5.16 बजे शाम का था मैने वर पक्ष से साफ कह दिया था कि अगर इस समय तक दुल्हा लग्न मंडप में नहीं पहुँचा तो मैं बलपूर्वक उसे मंगवा लूंगा।
उन्होंने कहा कि हमारी संस्कृति है पत्थर में भगवान को देख लेना और इसीलिए हम जब मूर्ति विराजित करते हैं तो उसमें प्राण प्रतिष्ठा करते हैं और वह मूर्ति विग्रह हो जाती है। दूसरी ओर ऐसी संस्कृति है जो इंसान को पत्थर समझती है।
अपने खास अंदाज में श्री राम की महिमा का बखान करते हुए कहा, “राम केवल एक राजा नहीं, बल्कि हर व्यक्ति की आस्था और विश्वास के केंद्र हैं।”
कुमार विश्वास ने कहा कि अगर कोई चीज इस समय प्रासंगिक है तो हमारे धर्म जगत की महत्वपूर्ण कहानियां हैं।
उन्होंने कहा, जीवन में अपने सभी कर्म ईमानदारी से पूरे करते हुए शरीर छूटता है तो समझिए मोक्ष मिल गया। शरीर छूटते समय कुछ चिंता रही व कुछ काम न करने का मलाल रहा तो नर्क मिलता है। इसलिए चाहे जैसी स्थित हो कर्म करते रहना चाहिए।
उन्होंने कहा कि आज परिवारों में संवाद खत्म हो रहे हैं। सात जन्मों तक साथ निभाने का वाद कर सात फेरे लेने वाली पत्नी कोर्ट में इसलिए तलाक मांगने लगती हैं कि पति खर्राटे भरता है। छोटे भाई पर मुकदमा कर कथा सुनना किस काम का, ऐसे लोग तर्क देते हैं कि वह लक्ष्मण की तरह नहीं है। कभी खुद के मन में झांका है कि तुम भी तो राम की तरह नहीं हो। राम धर्म हैं तो सीता शांति है। बिना शांति के धर्म नहीं बचेगा।
भगवान श्री राम को ‘धर्मराज’ कहा जाता है। वे आदर्श पुरुष हैं, जिन्होंने अपने जीवन में उच्चतम नैतिकता और सिद्धांतों का पालन किया। श्री राम का जीवन एक सामान्य मानव के रूप में दिखाया गया है। उनका जन्म इस भूमि पर एक उद्देश्य के साथ हुआ था—धर्म की स्थापना करना और अधर्म का नाश करना।
उनके चरित्र में ये गुण हमें यह सिखाते हैं कि एक सच्चा इंसान कैसे बनें और जीवन की चुनौतियों का सामना कैसे करें।
भगवान श्री कृष्ण न केवल एक महान योद्धा थे, बल्कि एक कुशल रणनीतिकार और प्रेम का अवतार भी थे।
कृष्ण का मार्गदर्शन हमें सिखाता है कि जीवन में हर परिस्थिति में हमें कैसे अपनी बुद्धि और चातुर्य का प्रयोग करना चाहिए।
उन्होंने कहा यौवनं धनसम्पत्ति प्रभुत्वमविवेकित।
एकैकमप्यनर्थाय किमु यत्र चतुष्टयम्॥
यौवन (जवानी), धन-संपत्ति और सत्ता/प्रभुत्व—यदि इनके साथ विवेक न हो—तो इनमें से एक-एक भी मनुष्य के लिए अनर्थ (विनाश) का कारण बन सकता है।
फिर जहाँ ये तीनों (या चारों गुण एक साथ) हों, वहाँ तो अनर्थ होना निश्चित ही है। इसलिए हमारी संस्कृति में शक्ति के साथ धर्म और विवेक को भी महत्तवपूर्ण माना गया है।
भूख लगने पर खाना प्रकृति है, जरूरत से ज्यादा खा लेना विकृति है और भूख लगने पर भी सामने आये हुए भूखे अतिथि को अपना खाना खिला देना संस्कृति है।
उन्होंने नई पीढ़ी द्वारा अपने माता-पिता और संस्कृति के प्रति उपेक्षा को इस शेर के साथ समझाया।
इस दौर-ए-तरक़्क़ी के अंदाज़ निराले हैं
ज़ेहनों में अँधेरे हैं सड़कों पे उजाले हैं।
आज के दौर के रिश्तों को परिभाषित करते हुए उन्होंने कहा-
“एक वक्त था सोचता था, मेहमान कोई आए तो खाना खाऊँ मैं।
लानत है इस दौर पर सोचता हूँ मैं, ये शख़्स चला जाए तो खाना खाऊँ मैं”
उन्होंने अपने प्रवचन का समापन कबीर के इस प्रसिध्द दोहों से किया-
घणा दिन सो लियो रे
घणा दिन सो लियो रे ,
अब जाग सके तो जाग।
पहलो सोयो मात गरभ में,
उल्टा पाव फ़सार। २
बोल वचन कर बहार आयो।
भूल गयो जगदीश।
जन्म थारो हो लियो रे।
अब जाग सके तो जाग।
घणा दिन सो लियो रे ,
अब जाग सके तो जाग।
दूजो सोयो माँत गोद में ,
हस हस दांत दिखाय। २
बहन भुआ सब लाड लड़ावे।
हो रयो मंगला चार।
लाड थारो होरयो रे।
अब जाग सके तो जाग।
घणा दिन सो लियो रे ,
अब जाग सके तो जाग।
तीजो सोयो स्त्रिया संग में ,
गले में बाहे डाल। २
किया भोग सब रोग से दुखिया।
तन हो गयो बेकार ,
विवाह थारो होरियो रे।
अब जाग सके तो जाग।
घणा दिन सो लियो रे ,
अब जाग सके तो जाग।
चोथो सोयो शमशाना में ,
लम्बे पाँव फसार।२
कहे कबीर सुणो रे भई संतों।
जीव अग्नि में जाय,
प्रण थारो हो रियो रे।
अब जाग सके तो जाग।
घणा दिन सो लियो रे ,
अब जाग सके तो जाग।
फिल्म जागृति का प्रसिध्द गीत जिसका उल्लेख कुमार विश्वास ने अपने व्याख्यान में किया
आओ बच्चो, तुम्हें दिखाएँ झाँकी हिंदुस्तान की
इस मिट्टी से तिलक करो ये धरती है बलिदान की
वंदे मातरम्! वंदे मातरम्!
उत्तर में रखवाली करता पर्वतराज विराट है
दक्षिण में चरणों को धोता सागर का सम्राट है
जमुना जी के तट को देखो गंगा का ये घाट है
बाट-बाट में हाट-हाट में यहाँ निराला ठाठ है देखो,
ये तस्वीरें अपने गौरव की अभिमान की
इस मिट्टी से तिलक करो ये धरती है बलिदान की
वंदे मातरम्! वंदे मातरम्!
ये है अपना राजपूताना नाज इसे तलवारों पे
इसने सारा जीवन काटा बरछी तीर कटारों पे
ये प्रताप का वतन पला है आज़ादी के नारों पे
कूद पड़ी थी यहाँ हज़ारों पद्मिनियाँ अँगारों पे
बोल रही है कण-कण से क़ुर्बानी राजस्थान की
इस मिट्टी से तिलक करो ये धरती है बलिदान की
वंदे मातरम्! वंदे मातरम्!
देखो, मुल्क मराठों का ये यहाँ शिवाजी डोला था
मुगलों की ताक़त को जिसने तलवारों पे तोला था
हर पर्वत पे आग जली थी हर पत्थर एक शोला था
बोली हर-हर महादेव की बच्चा-बच्चा बोला था
शेर शिवाजी ने रखी थी लाज हमारी शान की
इस मिट्टी से तिलक करो ये धरती है बलिदान की
वंदे मातरम्! वंदे मातरम्!
जलियाँवाला बाग़ ये देखो, यहीं चली थी गोलियाँ
ये मत पूछो किसने खेली यहाँ ख़ून की होलियाँ
एक तरफ़ बंदूक़ें दन-दन एक तरफ़ थी टोलियाँ
मरनेवाले बोल रहे थे इंक़लाब की बोलियाँ
यहाँ लगा दी बहनों ने भी बाज़ी अपनी जान की
इस मिट्टी से तिलक करो ये धरती है बलिदान की
वंदे मातरम्! वंदे मातरम्!
ये देखो बंगाल यहाँ का हर चप्पा हरियाला है
यहाँ का बच्चा-बच्चा अपने देश पे मरनेवाला है
ढाला है इसको बिजली ने भूचालों ने पाला है
मुट्ठी में तूफ़ान बँधा है और प्राण में ज्वाला है
जन्मभूमि है यही हमारे वीर सुभाष महान की
इस मिट्टी से तिलक करो ये धरती है बलिदान की
सप्तद्वीप का भौगोलिक और पुरातन आधार
हिंदू ब्रह्मांड विज्ञान में सप्त द्वीप या सात महाद्वीपों की अवधारणा नई नहीं है। पुराणों और महाभारत जैसे प्राचीन ग्रंथों में विश्व के सात महाद्वीपों का स्पष्ट उल्लेख है। सप्तद्वीप उन सात पौराणिक द्वीपों को कहा जाता है, जिनमें पृथ्वी बँटी हुई है। जो चारों ओर से क्रमशः खारे पानी, इक्षुरस, मदिरा, घृत, दधि, दुग्ध और मीठे जल के सात समुद्रों से घिरे हैं। ये सभी द्वीप एक के बाद एक दूसरे को घेरे हुए बने हैं और इन्हें घेरे हुए सातों समुद्र हैं।
भूगोल के निर्माताओं ने सात वर्ष, सात पर्वत, सात समुद्र और सात द्वीपों की कल्पना करते हुए पृथ्वी के भूगोल का नया मानचित्र फैलाया। आज के युग में पृथ्वी को 7 महाद्वीपों में बंटा गया है। ये विचारधारा आधुनिक नहीं है बल्कि हमारे हिन्दू धर्म में इसकी अवधारणा प्राचीन काल से चली आ रही है। विश्व का जो नक्शा आज हमारे पास है वह महर्षि वेदव्यास की ही देन है। वेदव्यास सप्तद्वीप पर पृथ्वी की एक पौराणिक और व्यवस्थित संरचना का वर्णन करते हैं, जो भारतीय दर्शन और ब्रह्मांड विज्ञान में गहराई से निहित है।पृथ्वी को 7 महाद्वीपों में बाँटने का कारण ये है कि हमारे पौराणिक ग्रंथों में भी पृथ्वी को 7 द्वीपों में ही बांटा गया है। रामायण में वर्णन है कि रावण ने इन सातों द्वीपों को जीत लिया था इसीलिए उसे”सप्तद्वीपाधिपति” कहा जाता था। इन सभी द्वीपों में अलग-अलग देश, पर्वत, नदियां और लोग निवास किया करते थे और ये सातों द्वीप सात पौराणिक समुद्रों से घिरे थे।
अगर हम केवल 50 वर्ष पीछे जाएं तो देखेंगे कि वैज्ञानिकों ने पहले 7 महासागरों की ही परिकल्पना की थी जिसे हाल के वर्षों में 5 तक सीमित कर दिया गया है।
सप्तद्वीप की रूपरेखा
सबके बीच में स्वर्णमय मेरु पर्वत है। मेरु को आजकल पामीर का बड़ा पठार कहा जाता है, जिसे प्राचीन परिभाषा में परम मेरु और महामेरु कहते थे। यहां भी मेरु को पृथ्वी का मध्य भाग माना गया। मेरु जिस भूभाग में था, उसकी संज्ञा इलावृत वर्ष या ऐरावत वर्ष कहते हैं।
मेरु के उत्तर में तीन वर्ष और तीन पर्वत एवं दक्षिण में भी तीन वर्ष और तीन पर्वत माने गये हैं । इस परिमंडल में कुल सात वर्ष और सात पर्वत हैं। इन सबको मिलाकर जम्बूद्वीप कहा गया। इस नाम की व्याख्या में यह कल्पना की गई की बीचों बीच में कोई जम्बू नाम का महावृक्ष है, जिस कारण द्वीप का नाम जम्बू द्वीप प्रसिद्ध हुआ। उसके फलों का रस जिस नदी में मिलता है, वह जम्बू नदी हुई और वहां की खानों से अर्थात मध्य एशिया में जो स्वर्ण उत्पन्न होता था, वह जाम्बूनद स्वर्ण कहलाया गया है।
मेरु के दक्षिण में सबसे पहले पूर्व से पश्चिम दिशा में निषध पर्वत फैला हुआ है। उसके बाद हरिवर्ष है, फिर हेमकूट पर्वत है, जिससे सटा हुआ प्रदेश किंपुरुषवर्ष है। किंपुरुष के दक्षिण में हिमवान पर्वत है, जिससे मिला हुआ भारतवर्ष है।
अब मेरु के उत्तर की ओर क्रमश: चलें तो पहले नील पर्वत और रमणक वर्ष मिलेगा। रमणक वर्ष को रम्यक वर्ष भी कहा गया है। उसके उत्तर में दूसरे स्थान पर श्वेत पर्वत है, जिसके वर्ष का नाम हिरण्यमय वर्ष है। हिरण्यमय को हैरण्यवत भी कहा है और वहां की नदी हैरण्यवती कही गई है। उसके और उत्तर तीसरे स्थान पर श्रृंगवान पर्वत पूर्व से पश्चिम तक फैला हुआ है, जिसके वर्ष का नाम उत्तरकुरु है। उत्तरकुरु के बाद समुद्र है। वहां समुद्रान्त प्रदेश में शांडिली देवी का निवास है, जिसे सदा प्रकाशित रहने के कारण स्वयंप्रभा भी कहा जाता था।
आज हम जिस आर्यावर्त में बैठे हैं वह जम्बूद्वीप के अंतर्गत आता था। विद्वान आज के एशिया महाद्वीप को ही प्राचीन जम्बूद्वीप मानते हैं। उसी प्रकार अन्य 7 द्वीप भी थे जिनमे अलग-अलग देश थे ,जहाँ विभिन्न राजा शासन करते थे। आज भी बिलकुल वही स्थिति है। हरेक महाद्वीप में कई देश हैं और वहाँ उनकी सरकार का शासन है। पौराणिक मेरु पर्वत को पृथ्वी का केंद्र माना जाता था। आइये अब उन सात पौराणिक द्वीपों के विषय में जानते हैं। ये सात द्वीप थे-
जंबू प्लक्षाह्वयौ द्वीपौ शाल्मलश्चापरो द्विज
कुश: क्रौंच्स्तथा शाक: पुष्करश्चैव सप्तम:।।
इस द्वीप में भी सात पर्वत और सात नदियाँ प्रसिद्ध हैं। सात पर्वत हैं – ईशान, उरुशृंग, बलभद्र, शतकेसर, सहस्रस्रोत, देवपाल और महानस। सात नदियाँ हैं – अनघा, आयुर्दा, उभयस्पृष्टि, अपराजिता, पंचपदी, सहस्रस्रुति और निजधृति। यहाँ के निवासी ऋतव्रत, सत्यव्रत, दानव्रत और अनुव्रत नामक चार वर्णों में विभाजित हैं। वे प्राणायाम के द्वारा अपने रजोगुण और तमोगुण को क्षीण कर, महान समाधि के द्वारा वायुरूप श्रीहरि की आराधना करते हैं।
सनातन कथा की थीम
सनातन कथा के अनुसार स्वयम्भुव मनु के दो पुत्र हुए – प्रियव्रत और उत्तानपाद। प्रियव्रत बड़े पुत्र थे। प्रियव्रत का विवाह विश्वकर्मा की पुत्री बर्हिष्मति से हुआ। इनसे दस पुत्र और एक कन्या का जन्म हुआ था प्रियव्रत की दूसरी पत्नी से तीन पुत्रों का जन्म हुआ था।
कहते हैं कि जब प्रियव्रत को पता चला कि सूर्य पृथ्वी के सिर्फ आधे भाग को ही प्रकाशित करता है, तो उन्होंने बाकी भूभाग को भी प्रकाशमान करने की मनोवृति लिए ज्योर्तिमय रथ पर बैठकर पृथ्वी की परिक्रमा की।
इस तरह रथ के पहियों से जो लीक बना वे सात समुद्र बने तथा उससे संलग्न भूभाग सप्तद्वीप कहलाये। सातो द्वीप जिनका नाम जम्बू, प्लक्ष, शाल्मलि, कुश, क्रौञ्च, शाक और पुष्कर था, क्रमशः क्षार, इक्षुरस, मदिरा, घी, दूध, दधि और मीठे जल के सात समुद्रों से घिरे थे ।
1.जम्बू द्वीप: ये चारो ओर से लवण (खारे पानी) के सागर से घिरा है। आज का एशिया महाद्वीप इसे कहा जा सकता है।
2. प्लक्ष द्वीप: ये चारो ओर से इक्षुरस (गन्ने के रस) के सागर से घिरा है।आज के दक्षिण अमेरिका का भूभाग इसे कहा जा सकता है।
3. शाल्मल द्वीप: ये चारो ओर से मदिरा (शराब) के सागर से घिरा है। वर्तमान का ऑस्ट्रेलिया महाद्वीप इसका प्रतिनिधित्व करता है।
4. कुश द्वीप: ये चारो ओर से घृत (घी) के सागर से घिरा है। यह प्रशांत महासागर के आस पास फैला हुआ भूखंड है जिसे हम ओशिआनिया के नाम से जानते हैं।
5. क्रौंच द्वीप: ये चारो ओर से दधि (दही) के सागर से घिरा है। आज का अफ्रीका महाद्वीप इसे माना जा सकता है।
6. शाक द्वीप: ये चारो ओर से दुग्ध (दूध) के सागर से घिरा है। इसे आज का यूरोप महाद्वीप कहते हैं ।
7.पुष्कर द्वीप: ये चारो ओर से मीठे जल के सागर से घिरा है। यह आज के उत्तरी अमेरिका का भूभाग।
पृथ्वी की इस संरचना का वर्णन महर्षि पराशर ने मैत्रेय ऋषि से किया था। इन सातों द्वीपों का सम्मलित फैलाव 50,00,00,000 (पचास करोड़) योजन माना गया है।
महर्षि व्यास की दूरदृष्टि की अवधारणा
श्रीमद्भागवत पुराण विश्व के भूगोल पर एक अनूठा दृष्टिकोण प्रस्तुत करता है। यह हमारे ग्रह, वसुमती, जो सात महाद्वीपों या “सप्त द्वीप” से बना है, का वर्णन करता है। यह प्राचीन भौगोलिक ज्ञान की एक आकर्षक झलक प्रदान करता है।
श्रीमद्भागवत महा पुराण- स्कन्ध: 5 अध्याय: 20 के अनुसार कथा इस प्रकार है श्री शुकदेवजी ने पहले ही परीक्षित को मनु पुत्र प्रियव्रत के द्वारा भूलोक को सात द्वीपों में बाँटने की अद्भुत कथा सुनाई थी। एक बार इन्होंने जब यह देखा कि भगवान सूर्य सुमेरु की परिक्रमा करते हुए लोका लोक पर्यन्त पृथ्वी के जितने भागको आलोकित करते हैं, उसमेंसे आधा ही प्रकाशमें रहता है और आधेमें अन्धकार छाया रहता है, तो उन्होंने इसे पसंद नहीं किया। तब उन्होंने यह संकल्प लेकर कि ‘मैं रात को भी दिन बना दूंगा;’ सूर्य के समान ही वेगवान् एक ज्योतिर्मय रथपर चढ़कर द्वितीय सूर्य की ही भाँति उनके पीछे-पीछे पृथ्वी की सात परिक्रमाएँ कर डालीं।भगवान् की उपासना से इनका अलौकिक प्रभाव बहुत बढ़ गया था । उस समय इनके रथ के पहियों से जो लीकें बनीं, वे ही सात समुद्र हुए; उनसे पृथ्वीमें सात द्वीप हो गये ।
सप्त विभाजन
हिंदू ब्रह्माण्ड विज्ञान में, विश्व को सात संकेंद्रित द्वीप- महाद्वीपों में विभाजित बताया गया है। इनका उल्लेख पुराणों और महाभारत जैसे ग्रंथों में मिलता है। हिंदू ब्रह्माण्ड विज्ञान के अनुसार, ये सप्तद्वीप मिलकर विश्व (भू-मंडल) बनाते हैं। इन द्वीपों के नाम क्रमशः जम्बू, प्लक्ष, शाल्मलि, कुश, क्रौंच, शाक और पुष्कर हैं। प्रत्येक द्वीप अपने से पूर्ववर्ती द्वीप की तुलना में आकार में दोगुना बड़ा होता है। ये सभी समुद्रों से घिरे हुए हैं। सात समुद्र क्रमशः खारे जल, ईख के रस, मदिरा, घी, दूध, मट्ठा और मीठे जल से परिपूर्ण हैं। ये समुद्र सातों द्वीपों की खाइयों के समान हैं और अपने भीतर स्थित द्वीप के बराबर विस्तार वाले हैं। प्रत्येक समुद्र एक-एक करके क्रमशः सातों द्वीपों को बाहर से घेरता है। इसके पश्चात महाराज प्रियव्रत भूलोक के सातों द्वीप अपने पुत्रों में विभाजित कर भगवान की भक्ति में लीन हो जाते हैं।
सप्तद्वीप की अवधारणा भागवत में
श्रीमद्भागवतम् के अनुसार- श्रीशुकदेवजी परीक्षित से आगे भूमंडल के सातों द्वीपों का विस्तार से वर्णन करते हैं।
1. जम्बू द्वीपः जम्बू वृक्षों की भूमि
जम्बूद्वीप, जिसका शाब्दिक अर्थ “जम्बू वृक्षों की भूमि” है, एशिया महाद्वीप माना जाता है। ग्रंथों में इसका वर्णन कमल के फूल के आकार का है जिसके केंद्र में सुमेरु पर्वत (संभवतः हिमालय का प्रतीक) स्थित है।जम्बूद्वीप वह स्थान है, जिसमें हम निवास करते हैं। यह भूमंडल रूप कमल के सात द्वीपों में सबसे भीतरी कोश स्थानीय द्वीप है, जो एक लाख योजन के क्षेत्र में फैला हुआ है। इसका आकार कमलपत्र के समान गोलाकार है। इसमें कुल नौ खंड (वर्ष) हैं, जिनका क्षेत्रफल समान रूप से नौ-नौ हजार योजन है। इन खंडों को आठ पर्वत अलग- अलग भागों में विभाजित करते हैं। इन नौ वर्षों में से इलावृत वर्ष सबसे प्रमुख और पवित्र है, क्योंकि इसके मध्य में दिव्य मेरु पर्वत स्थित है। मेरु पर्वत से प्रवाहित अनेक पवित्र नदियाँ पूरे जम्बूद्वीप को जीवनदायिनी जलधारा से सिंचित करती हैं।
इन वर्षों में भारतवर्ष को छोड़कर शेष सभी वर्षों को भूलोक के स्वर्ग के रूप में वर्णित किया गया है। वहाँ के निवासी त्रेतायुग समान दिव्य जीवन जीते हैं, जहाँ सौंदर्य, शक्ति और आनंद का अनवरत प्रवाह है। पर्वतों की सुरम्य घाटियाँ, आश्रम, वन-उपवन, और पुष्पों से लदे वृक्ष देवताओं के विहार के लिए सुसज्जित हैं। जलाशयों में खिले कमल और पक्षियों की मधुर चहचहाहट वातावरण को दिव्यता से भर देती है। इन वर्षों में भगवान नारायण अपनी विभिन्न मूर्तियों से निवास करते हुए वहाँ के निवासियों पर कृपा बरसाते हैं। जम्बूद्वीप के ये नौ वर्ष हैं— इलावृतवर्ष, भद्राश्ववर्ष, हरिवर्ष, केतुमालवर्ष, रम्यकवर्ष, हिरण्मयवर्ष, उत्तर कुरुवर्ष, किम्पुरुषवर्ष और भारतवर्ष हैं।
2. प्लाक्ष द्रीपः प्लक्ष वृक्ष की भूमि
यहीं जम्बू वृक्ष के परिमाण वाला एक प्लक्ष (पाकड़) वृक्ष है। इसी के ऊपर इस द्वीप का नाम पड़ा है।जिस प्रकार मेरु पर्वत जम्बूद्वीप से घिरा हुआ है, वैसे ही जम्बूद्वीप भी अपने समान आकार और विस्तार वाले खारे पानी के समुद्र से घिरा हुआ है। जैसे खाई के चारों ओर बगीचा होता है, वैसे ही यह क्षार समुद्र अपने से दोगुने बड़े प्लक्षद्वीप से घिरा हुआ है। जम्बूद्वीप में जितना विशाल जामुन का वृक्ष है, उतना ही बड़ा और स्वर्ण के समान चमकने वाला प्लक्ष (पाकर) का वृक्ष यहाँ स्थित है, इसी कारण इसका नाम प्लक्षद्वीप पड़ा। यहां के स्वामी मेधातिथि के सात पुत्र हुए हैं। ये थे – शान्तहय, शिशिर, सुखोदय, आनंद, शिव, क्षेमक और ध्रुव।यहां इस द्वीप के भी भारतवर्ष की भांति ही सात पुत्रों में सात भाग बांटे गये, जो उन्हीं के नामों पर शान्तहयवर्ष, इत्यादि नाम रखे गये थे।
इनके अलावा सहस्रों छोटे छोटे पर्वत और नदियां हैं। इन लोगों में ना तो वृद्धि ना ही ह्रास होता है। सदा त्रेतायुग समान रहता है। यहां चार जातियां आर्यक, कुरुर, विदिश्य और भावी क्रमशः ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र हैं। इस द्वीप में सात जिह्वाओं वाले अग्निदेव निवास करते हैं। इस द्वीप के राजा महाराज प्रियव्रत के पुत्र इध्मजिह्व थे, जिन्होंने इसे सात भागों में विभाजित कर अपने सात पुत्रों को सौंप दिया और स्वयं आध्यात्मिक साधना में लीन हो गए।
इन सात वर्षों (भागों) के नाम शिव, यवस, सुभद्र, शांत, क्षेम, अमृत और अभय हैं। प्रत्येक वर्ष में सात प्रसिद्ध पर्वत और सात नदियाँ प्रवाहित होती हैं। सात पर्वत हैं – मणिकूट, वज्रकूट, इन्द्रसेन, ज्योतिष्मान्, सुपर्ण, हिरण्यष्ठीव और मेघमाल। सात नदियाँ हैं – अरुणा, नृम्णा, आंगिरसी, सावित्री, सुप्रभाता, ऋतम्भरा और सत्यम्भरा।
यहाँ चार वर्ण होते हैं – हंस, पतंग, ऊर्ध्वायन और सत्यांग। इन नदियों के जल में स्नान करने से लोगों के रजोगुण और तमोगुण धीरे-धीरे नष्ट हो जाते हैं। यहाँ के लोगों की आयु एक हजार वर्ष होती है और इनके शरीर देवताओं की तरह थकान व पसीना रहित होते हैं। इनकी संतानोत्पत्ति भी देवताओं की भाँति होती है। ये सभी सूर्य भगवान की उपासना करते हैं और उनकी स्तुति करते हैं। प्लक्षद्वीप और अन्य पाँच द्वीपों में जन्म लेने वाले सभी मनुष्यों को समान आयु, इंद्रिय बल, मनोबल, शारीरिक शक्ति, बुद्धि और पराक्रम प्राप्त होता है।
3 .शाल्मली द्वीप: शाल्मली वृक्षों की भूमि
शाल्मली द्वीप उस महाद्वीप को संदर्भित करता है जिसे जम्बूद्वीप के दक्षिण में स्थित माना जाता है, जिसे अक्सर अफ्रीका भी कहा जाता है। शास्त्रों में इसे एक विशाल शाल्मली वृक्ष (रेशमी-कपास वृक्ष) के आकार का बताया गया है। प्लक्षद्वीप अपने ही समान विस्तार वाले इक्षुरस (गन्ने के रस) के समुद्र से घिरा हुआ है। इसके आगे इससे दोगुने आकार का शाल्मली द्वीप स्थित है, जो अपने ही समान विस्तार वाले मदिरा (शराब) के समुद्र से घिरा हुआ है। जैसे प्लक्षद्वीप में विशाल पाकर का वृक्ष है, वैसे ही शाल्मली द्वीप में उतना ही बड़ा शाल्मली (सेमर) का वृक्ष है। कहा जाता है कि यही वृक्ष अपने वेदमय पंखों से भगवान की स्तुति करने वाले पक्षिराज गरुड का निवास स्थान है, और इसी कारण इस द्वीप का नाम शाल्मली द्वीप पड़ा।
इस द्वीप के राजा महाराज प्रियव्रत के पुत्र यज्ञबाहु थे। उन्होंने इसे सात भागों में विभाजित कर अपने सात पुत्रों को सौंप दिया। इन भागों के नाम हैं – सुरोचन, सौमनस्य, रमणक, देववर्ष, पारिभद्र, आप्यायन और अविज्ञात। यहाँ भी सात पर्वत और सात नदियाँ प्रसिद्ध हैं। सात पर्वत हैं – स्वरस, शतशृंग, वामदेव, कुन्द, मुकुन्द, पुष्पवर्ष और सहस्र श्रुति। सात नदियाँ हैं – अनुमति, सिनीवाली, सरस्वती, कुहू, रजनी, नन्दा और राका। इस द्वीप में श्रुतधर, वीर्यधर, वसुन्धर और इषन्धर नाम के चार वर्ण निवास करते हैं। ये सभी वेदमंत्रों के द्वारा चन्द्रदेव की उपासना करते हैं और उनकी स्तुति में स्तोत्र गाते हैं।
4. कुशद्वीप : कुश घास की भूमि
कुशद्वीप, जिसका अर्थ है “कुश घास की भूमि”, जम्बूद्वीप के पश्चिम में स्थित माना जाता है, जो संभवतः यूरोप के अनुरूप है। ग्रंथों में इसे त्रिभुजाकार और इस पवित्र घास से आच्छादित बताया गया है। मदिरा (शराब) के समुद्र से आगे, उससे दोगुने आकार का कुशद्वीप स्थित है। यह भी पहले बताए गए द्वीपों की तरह अपने ही समान विस्तार वाले घृत (घी) के समुद्र से घिरा हुआ है। इस द्वीप में भगवान द्वारा रचा गया एक कुश घास का झाड़ है, और इसी के कारण इसका नाम कुशद्वीप पड़ा। इसकी कोमल शिखाएँ इतनी तेजस्वी हैं कि दूसरे अग्निदेव की तरह अपनी आभा से सभी दिशाओं को प्रकाशित करती रहती हैं।
इस द्वीप के राजा महाराज प्रियव्रत के पुत्र हिरण्यरेता थे। उन्होंने इस द्वीप को सात भागों में विभाजित कर अपने सात पुत्रों – वसु, वसुदान, दृढ़रुचि, नाभिगुप्त, स्तुत्यव्रत, विविक्त और वामदेव को सौंप दिया और स्वयं तपस्या में लीन हो गए। इस द्वीप की सीमाओं को निर्धारित करने वाले सात पर्वत और सात नदियाँ हैं। सात पर्वत हैं – चक्र, चतुःशृंग, कपिल, चित्रकूट, देवानीक, ऊर्ध्वरोमा और द्रविण। सात नदियाँ हैं – रसकुल्या, मधुकुल्या, मित्रविन्दा, श्रुतविन्दा, देवगर्भा, घृतच्युता और मन्त्रमाला। इन नदियों के जल में स्नान करके कुशद्वीप के निवासी – कुशल, कोविद, अभियुक्त और कुलक नाम के चार वर्ण, अग्निस्वरूप भगवान हरि की यज्ञ और अन्य धार्मिक कर्मकौशल के द्वारा उपासना करते हैं।
5.क्रौंचद्वीप
क्रौंच (सारस) पक्षी की भूमि क्रौंचद्वीप, या “क्रौंच पक्षी की भूमि”, जम्बूद्वीप के उत्तर में स्थित माना जाता है, जो संभवतः उत्तरी अमेरिका का प्रतिनिधित्व करता है। शास्त्रों में इसे सारस के आकार का और सुखद जलवायु वाला बताया गया है। घी के समुद्र से आगे, उससे दो गुने विस्तार वाला क्रौंचद्वीप स्थित है। जिस प्रकार कुशद्वीप घी के समुद्र से घिरा हुआ था, वैसे ही क्रौंचद्वीप अपने ही समान विस्तार वाले दूध के समुद्र से घिरा हुआ है। इस द्वीप में क्रौंच नाम का एक विशाल पर्वत स्थित है, और इसी के कारण इसका नाम क्रौंचद्वीप पड़ा। प्राचीन काल में श्री स्वामी कार्तिकेयजी के शस्त्र प्रहार से इस पर्वत का मध्य भाग तथा इसकी लताएँ, वन-उपवन क्षत-विक्षत हो गए थे। लेकिन बाद में, क्षीरसमुद्र (दूध के समुद्र) से सिंचित होकर और वरुणदेव की सुरक्षा से यह पुनः निर्भय हो गया।
इस द्वीप के राजा महाराज प्रियव्रत के पुत्र घृतपृष्ठ थे। उन्होंने इस द्वीप को सात भागों में विभाजित कर अपने सात पुत्रों— आम, मधुरुह, मेघपृष्ठ, सुधामा, भ्राजिष्ठ, लोहितार्ण और वनस्पति— को सौंप दिया और स्वयं सन्यास धारण कर लिया। इन सात क्षेत्रों में भी सात पर्वत और सात नदियाँ प्रसिद्ध हैं। सात पर्वत हैं – शुक्ल, वर्धमान, भोजन, उपबर्हिण, नन्द, नन्दन और सर्वतोभद्र। सात नदियाँ हैं – अभया, अमृतौघा, आर्यका, तीर्थवती, वृत्तिरूपवती, पवित्रवती और शुक्ला। इन नदियों के शुद्ध और पवित्र जल का सेवन करने वाले इस द्वीप के निवासी ऋषभ, द्रविण और देवक नाम के तीन वर्णों में विभाजित हैं। वे जल-देवता की उपासना करते हैं और उनके प्रति श्रद्धा भाव प्रकट करते हैं।
6. शाकद्वीप शक द्वीपः शकों की भूमि
शाकद्वीप का तात्पर्य जम्बूद्वीप के पूर्व में स्थित महाद्वीप से है, जो संभवतः दक्षिण-पूर्व एशिया और ओशिनिया से संबंधित है। ग्रंथों में इसका वर्णन शकों द्वारा निवासित बताया गया है, जिनका उल्लेख प्राचीन भारतीय ग्रंथों में मिलता है। क्षीरसमुद्र (दूध के समुद्र) के आगे, उससे भी दुगुने परिमाण वाला शाकद्वीप स्थित है। यह द्वीप अपने ही समान विस्तार वाले दही के समुद्र से घिरा हुआ है। इसमें शाक (सागौन) नामक एक विशाल वृक्ष है, जिसकी अत्यंत मनोहर सुगंध से संपूर्ण द्वीप महकता रहता है। यही वृक्ष इस द्वीप के नामकरण का कारण बना। इस द्वीप के अधिपति प्रियव्रत के पुत्र महाराज मेधातिथि थे। उन्होंने इसे सात वर्षों में विभक्त कर उन्हीं के समान नाम वाले अपने सात पुत्रों— पुरोजव, मनोजव, पवमान, धूम्रानीक, चित्ररेफ, बहुरूप और विश्वधार— को सौंप दिया। फिर वे स्वयं भगवान अनन्त (शेषनाग) में दत्तचित्त होकर तपोवन चले गए।
इस द्वीप में भी सात पर्वत और सात नदियाँ प्रसिद्ध हैं। सात पर्वत हैं – ईशान, उरुशृंग, बलभद्र, शतकेसर, सहस्रस्रोत, देवपाल और महानस। सात नदियाँ हैं – अनघा, आयुर्दा, उभयस्पृष्टि, अपराजिता, पंचपदी, सहस्रस्रुति और निजधृति। यहाँ के निवासी ऋतव्रत, सत्यव्रत, दानव्रत और अनुव्रत नामक चार वर्णों में विभाजित हैं। वे प्राणायाम के द्वारा अपने रजोगुण और तमोगुण को क्षीण कर, महान समाधि के द्वारा वायुरूप श्रीहरि की आराधना करते हैं।
7. पुष्करद्वीप
इस प्रकार पुष्करद्वीप सातों द्वीपों में सबसे बड़ा है, जो दही के समुद्र से भी आगे, चारों ओर मीठे जल के समुद्र से घिरा हुआ है। यहाँ एक विशाल स्वर्णमय कमल (पुष्कर) स्थित है, जिसकी लाखों चमकदार पंखुड़ियाँ अग्नि की लौ जैसी देदीप्यमान हैं। इसी कारण इसे ब्रह्माजी का आसन माना जाता है।
इस द्वीप के मध्य में मानसोत्तर नामक एक विशाल पर्वत है, जो इसके पूर्वी और पश्चिमी भागों को विभाजित करता है। यह पर्वत दस हजार योजन ऊँचा और उतना ही लंबा है। इसकी चारों दिशाओं में इन्द्र आदि लोक पालों की चार पुरियाँ स्थित हैं। इसी पर्वत के ऊपर मेरु पर्वत के चारों ओर परिक्रमा करने वाला सूर्य का रथ उत्तरायण और दक्षिणायन के क्रम में निरंतर गति करता है, जिससे देवताओं के दिन और रात बनते हैं। प्रियव्रत के पुत्र वीतिहोत्र इस द्वीप के राजा थे। उन्होंने अपने दो पुत्रों— रमणक और धातकि— को द्वीप के दो भागों का अधिपति बना दिया और स्वयं भगवान की भक्ति में लीन हो गए। यहाँ के निवासी ब्रह्मस्वरूप भगवान श्रीहरि की आराधना करते हैं, जिससे वे ब्रह्मलोक की प्राप्ति कर सकते हैं। मेरु पर्वत से लेकर मानसोत्तर पर्वत तक जितना अंतर है, उतनी ही भूमि शुद्ध जल के समुद्र के उस पार स्थित है। वहां सुवर्णमयी भूमि है, जो दर्पण जैसी स्वच्छ है। इस भूमि में गिरा हुआ कोई भी पदार्थ फिर से नहीं मिलता, इसलिए वहां देवताओं के अलावा और कोई प्राणी नहीं रहता।
लेखक परिचय:-

(लेखक भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण, में सहायक पुस्तकालय एवं सूचनाधिकारी पद से सेवामुक्त हुए हैं। वर्तमान समय में उत्तर प्रदेश के बस्ती नगर में निवास करते हुए सम सामयिक विषयों,साहित्य, इतिहास, पुरातत्व, संस्कृति और अध्यात्म पर अपना विचार व्यक्त करते रहते हैं। वॉट्सप नं.+919412300183)
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वेदांता के जनक अनिल अग्रवाल को बेटे की मौत से लगा गहरा सदमा, 75 प्रतिशत संपत्ति दान करेंगे
अग्निवेश का जन्म 3 जून, 1976 को पटना में अनिल और किरण अग्रवाल की बिहारी मिडिल क्लास फैमिली में हुआ था। अग्निवेश ने अजमेर के मशहूर मेयो कॉलेज में अपनी शुरुआती शिक्षा हासिल की और बाद में मुंबई आकर मुंबई विश्वविद्यालय से बिजनेस एडमिनिस्ट्रेशन में स्नातक की डिग्री हासिल की। इसके बाद उन्होंने एक सफल प्रोफेशनल करियर बनाया। ध्यान दें कि उन्हें सिर्फ विरासत ही नहीं मिली बल्कि उन्होंने खुद एक विरासत का निर्माण किया। कॉरपोरेट सेक्टर में उनके पास करीब दो दशकों का अनुभव था।
अनिल अग्रवाल और उनके परिवार की कुल संपत्ति करीब 4.2 अरब डॉलर यानी लगभग 35,000 करोड़ रुपये है.
अनिल अग्रवाल Vedanta Resources के फाउंडर और चेयरमैन हैं. उन्होंने 1976 में इस कंपनी की शुरुआत एक छोटी केबल कंपनी से की थी. बहुत कम उम्र में उन्होंने अपने पिता के साथ स्क्रैप के काम से बिजनेस की दुनिया में कदम रखा.कई बार असफल होने के बाद भी उन्होंने हार नहीं मानी और धीरे धीरे Vedanta को मेटल, माइनिंग, पावर और ऑयल जैसे बड़े सेक्टर में खड़ा किया.एक साधारण परिवार से निकलकर अरबों की कंपनी बनाने वाले अनिल अग्रवाल की कहानी आम लोगों के लिए भी प्रेरणा है.
अनिल अग्रवाल का परिवार हमेशा से सादगी और संस्कारों के लिए जाना जाता रहा है. परिवार में उनकी पत्नी किरण अग्रवाल हैं, जो लाइमलाइट से दूर रहकर परिवार की धुरी बनी रही हैं. उनके दो बच्चे थे. बेटे अग्निवेश अग्रवाल और बेटी प्रिया अग्रवाल. हाल ही में बेटे अग्निवेश का अमेरिका में इलाज के दौरान कार्डियक अरेस्ट से निधन हो गया, जिससे पूरा परिवार गहरे सदमे में है. बेटे के निधन के बाद अग्निवेश के बारे में बताते हुए अनिल अग्रवाल ने कहा कि वह सिर्फ एक बेटा नहीं, बल्कि उनका सबसे करीबी दोस्त और गर्व था।
अग्निवेश अग्रवाल ने बिजनेस दुनिया में अपनी अलग पहचान बनाई थी. उन्होंने ‘Fujairah Gold’ जैसी कंपनी खड़ी की थी और Hindustan Zinc के चेयरमैन भी रहे. वह Vedanta Group की कंपनी Talwandi Sabo Power Limited के बोर्ड में शामिल थे.
उनकी बेटी प्रिया अग्रवाल वर्तमान में Vedanta और Hindustan Zinc के बोर्ड में शामिल हैं और हिंदुस्तान जिंक की चेयरपर्सन के तौर पर बड़ी जिम्मेदारियां संभाल रही हैं. बिजनेस में उनकी मजबूत पकड़ मानी जाती है और आने वाले समय में Vedanta की जिम्मेदारी उन्हीं के कंधों पर रहने की उम्मीद है.
एक स्क्रैप यानी कबाड़ व्यापारी से अपना सफर शुरू करने वाले अनिल अग्रवाल आज भारत के सबसे अमीर व्यक्तियों में शुमार हैं. फोर्ब्स (Forbes) की ताजा रिपोर्ट के मुताबिक, अनिल अग्रवाल और उनके परिवार की कुल संपत्ति करीब 4.2 अरब डॉलर यानी लगभग 35,000 करोड़ रुपये है.
वेदांता साल 2003 में London Stock Exchange में लिस्ट होने वाली पहली भारतीय कंपनी बनी. बाद में 2019 में अनिल अग्रवाल ने कंपनी को फिर से प्राइवेट कर लिया. मेटल, माइनिंग, पावर और ऑयल एंड गैस जैसे बड़े सेक्टर में फैले वेदांता ग्रुप का कारोबार आज भारत ही नहीं बल्कि विदेशों तक फैला हुआ है.
75% दौलत दान करने का संकल्प
इतनी बड़ी संपत्ति के मालिक होने के बावजूद अनिल अग्रवाल अपनी सादगी और दानवीर स्वभाव के लिए जाने जाते हैं. उन्होंने ‘Giving Pledge’ के तहत अपनी 75 फीसदी संपत्ति समाज सेवा के लिए दान करने का वादा किया है. अनिल अग्रवाल ने पहले ही ऐलान कर रखा है कि वह अपनी कमाई का 75 फीसदी हिस्सा समाज के कामों में लगाएंगे.बेटे के निधन के बाद उन्होंने भावुक होते हुए कहा कि अब वह और भी सादगी से जीवन बिताएंगे और अग्निवेश के सपनों को पूरा करने के लिए समाज सेवा के कामों को और तेजी से आगे बढ़ाएंगे.
अग्निवेश अग्रवाल का 49 साल की उम्र में निधन परिवार के लिए सबसे बड़ा झटका है.अब जबकि वह इस दुनिया में नहीं हैं, अनिल अग्रवाल का पूरा ध्यान अपनी बेटी प्रिया अग्रवाल और उनके साथ मिलकर भारत को आत्मनिर्भर बनाने के मिशन होगा. आने वाले समय में वह ग्रुप की बड़ी जिम्मेदरी संभालती नजर आ सकती हैं.
अनिल अग्रवाल ने बताया कि अग्निवेश का सपना था कि देश में कोई बच्चा भूखा न सोए और हर युवा को काम मिले, इसी संकल्प को और हर युवा को काम मिले, इसी संकल्प को लेकर अब अग्रवाल परिवार आगे बढ़ने जा रहा है.
बेटे के निधन के बाद वेदांता चेयरमैन अनिल अग्रवाल दान करेंगे 75% संपत्ति, बोले- ‘सादगी से जिउंगा, पूरी जिंदगी’Forbes के मुताबिक, अनिल अग्रवाल की कुल नेटवर्थ 4.2 अरब डॉलर है, जो भारतीय रुपये में लगभग 35,000 करोड़ रुपये के आसपास है. वेदांता, माइनिंग, पावर और ऑयल जैसे बड़े सेक्टर में काम करती है और भारत के साथ विदेशों में भी कंपनी की मौजूदगी है.
वेदांता ग्रुप के चेयरमैन अनिल अग्रवाल इस वक्त अपनी जिंदगी के सबसे मुश्किल दौर से गुजर रहे हैं. बेटे अग्निवेश अग्रवाल के अचानक निधन ने उन्हें अंदर से तोड़ दिया है. इस गहरे दुख के बीच उन्होंने एक बड़ा फैसला दोहराया है, जिसने सबका ध्यान खींचा है. अनिल अग्रवाल ने कहा है कि वह अपनी कमाई का 75 फीसदी से ज्यादा हिस्सा दान करेंगे. इसे वह समाजिक कामों में लगाएंगे और आगे की जिंदगी और भी सादगी से जिएंगे.
अनिल अग्रवाल ने अपने भावुक पोस्ट में लिखा कि उन्होंने यह वादा अपने बेटे अग्निवेश से किया था. उन्होंने कहा कि जो भी कमाया है, उसका बड़ा हिस्सा समाज को लौटाया जाएगा. बेटे के जाने के बाद उन्होंने यह संकल्प और मजबूत किया है और कहा है कि अब उनकी बाकी जिंदगी इसी मकसद के लिए होगी.
आज मेरे जीवन का सबसे दर्दनाक दिन है।
मेरा अग्निवेश, मेरा 49 साल का बेटा, आज हमारे बीच नहीं रहा। एक बाप के कंधे पर बेटे की अर्थी जाये इससे बुरा और क्या हो सकता है। अग्निवेश अपने दोस्त के साथ अमेरिका में skiing करने गया था। वहां accident हो गया। वो Mount Sinai Hospital, New York में ठीक हो रहा था। हमें लगा सब ठीक हो जाएगा… लेकिन अचानक cardiac arrest हो गया। और हमारा बच्चा हमें छोड़कर चला गया।
तुम्हारे साथ बिताया गया हर एक पल आज बहुत याद आ रहा है बेटा।
मैं और किरन टूट से गए हैं। बस यही सोच रहे हैं कि हमारा बेटा तो चला गया। लेकिन जो लोग हमारे वेदांता में काम करते हैं, वो सब अग्निवेश ही तो हैं। वो सब हमारे बेटे-बेटियां हैं।
अग्नि और मेरा सपना था, हिंदुस्तान को आत्मनिर्भर बनाना। वो हमेशा कहता था – “पापा, हमारे देश में क्या नहीं है? फिर हम किसी से पीछे क्यों रहें?”
मैंने अग्निवेश से वादा किया था हमारे पास जितना भी धन आएगा, उसका 75% से ज्यादा समाज के काम में लगायेंगे। आज फिर वो वादा दोहराता हूँ। अब और भी सादगी से जीवन जीऊंगा। और अपनी बाकी जिंदगी इसी में लगा दूंगा।
भूख से मुक्ति का राष्ट्रीय संकल्प है अटल कैंटीन योजना

(ललित गर्ग)
लेखक, पत्रकार, स्तंभकार
ई-253, सरस्वती कंुज अपार्टमेंट
25 आई. पी. एक्सटेंशन, पटपड़गंज, दिल्ली-92
फोनः 22727486, 9811051133