Friday, April 4, 2025
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रामानुजन: वह वह व्यक्ति जो अनंत को जानता था

श्रीनिवास रामानुजन (1887-1920), वह व्यक्ति जिन्होंने गणितीय विश्लेषण, अनंत श्रृंखला, निरंतर भिन्न, संख्या सिद्धांत और खेल सिद्धांत सहित कई गणितीय क्षेत्रों में अपने विभिन्न योगदानों से बीसवीं सदी के गणित को नया रूप दिया, उन्हें इतिहास के सबसे महान गणितज्ञों में से एक माना जाता है। 32 वर्ष की युवावस्था में इस दुनिया को छोड़ने वाले रामानुजन ने गणित में महत्वपूर्ण योगदान दिया, जिसकी बराबरी केवल कुछ ही लोग अपने जीवनकाल में कर सकते हैं। हैरानी की बात है कि उन्हें कभी भी कोई औपचारिक गणित प्रशिक्षण नहीं मिला। उनकी अधिकांश गणितीय खोजें केवल अंतर्ज्ञान पर आधारित थीं और अंततः सही साबित हुईं। अपनी विनम्र और कभी-कभी कठिन शुरुआत के साथ, उनकी जीवन कहानी उनके अविश्वसनीय काम की तरह ही आकर्षक है। हर साल 22 दिसंबर को रामानुजन की जयंती को राष्ट्रीय गणित दिवस के रूप में मनाया जाता है।

भारत के तमिलनाडु के इरोड में जन्मे रामानुजन ने छोटी उम्र में ही गणित पर असाधारण सहज ज्ञान का प्रदर्शन किया। गणित के प्रति विलक्षण प्रतिभा होने के बावजूद, रामानुजन का करियर अच्छी तरह से शुरू नहीं हुआ। उन्हें 1904 में कॉलेज की छात्रवृत्ति मिली, लेकिन उन्होंने गैर-गणितीय विषयों में असफल होने के कारण इसे जल्दी ही खो दिया। मद्रास (अब चेन्नई) में कॉलेज में उनका एक और प्रयास विफल हो गया, जब वे अपनी प्रथम कला परीक्षा में असफल हो गए। इसी समय के आसपास उन्होंने अपनी प्रसिद्ध नोटबुक शुरू की। 1910 तक वे गरीबी में रहे, जब उनका साक्षात्कार भारतीय गणितीय सोसायटी के सचिव आर. रामचंद्र राव ने लिया। राव को शुरू में रामानुजन पर संदेह था, लेकिन अंततः उन्होंने उनकी क्षमताओं को पहचाना और उन्हें आर्थिक रूप से सहायता की।

श्रीनिवास रामानुजन ने गणित में अपने सिद्धांतों को विकसित करना शुरू किया और 1911 में अपना पहला पेपर प्रकाशित किया। कैम्ब्रिज में उन्हें जीएच हार्डी नामक एक प्रसिद्ध ब्रिटिश गणितज्ञ द्वारा मार्गदर्शन दिया गया, जिन्होंने उन्हें अपने निष्कर्षों को कई पेपरों में प्रकाशित करने के लिए प्रोत्साहित किया। 1918 में, रामानुजन रॉयल सोसाइटी के फेलो के रूप में शामिल होने वाले दूसरे भारतीय बन गए।

गणित में रामानुजन का प्रमुख योगदान:

रामानुजन का योगदान गणितीय क्षेत्रों जैसे जटिल विश्लेषण, संख्या सिद्धांत, अनंत श्रृंखला और सतत भिन्नों तक फैला हुआ है।

पाई के लिए अनंत श्रृंखला: 1914 में, रामानुजन ने पाई के लिए अनंत श्रृंखला का सूत्र खोजा , जो आज इस्तेमाल किए जाने वाले कई एल्गोरिदम का आधार बनता है। π (पाई) का सटीक अनुमान लगाना गणित के इतिहास में सबसे महत्वपूर्ण चुनौतियों में से एक रहा है।

खेल सिद्धांत: रामानुजन ने कई चुनौतीपूर्ण गणितीय समस्याओं को हल करने के लिए नए विचारों की एक लंबी सूची खोजी जिसने खेल सिद्धांत के विकास को बहुत बढ़ावा दिया है। खेल सिद्धांत में उनका योगदान पूरी तरह से अंतर्ज्ञान और प्राकृतिक प्रतिभा पर आधारित है और आज भी बेजोड़ है।

मॉक थीटा फंक्शन: उन्होंने मॉक थीटा फंक्शन पर विस्तार से प्रकाश डाला, जो गणित के मॉड्यूलर रूपों के क्षेत्र में एक अवधारणा है।

रामानुजन संख्या: 1729 को रामानुजन संख्या के रूप में जाना जाता है जो दो संख्याओं 10 और 9 के घनों का योग है।

वृत्त विधि: रामानुजन ने जी.एच. हार्डी के साथ मिलकर वृत्त विधि का आविष्कार किया, जिसने 200 से आगे की संख्याओं के विभाजन का पहला सन्निकटन दिया। इस विधि ने 20वीं शताब्दी की कुख्यात जटिल समस्याओं, जैसे वारिंग की परिकल्पना और अन्य अतिरिक्त प्रश्नों को सुलझाने में महत्वपूर्ण योगदान दिया।

थीटा फ़ंक्शन: थीटा फ़ंक्शन कई जटिल चरों का एक विशेष फ़ंक्शन है। जर्मन गणितज्ञ कार्ल गुस्ताव जैकब जैकोबी ने कई निकट से संबंधित थीटा फ़ंक्शन का आविष्कार किया, जिन्हें जैकोबी थीटा फ़ंक्शन के रूप में जाना जाता है। थीटा फ़ंक्शन का व्यापक रूप से रामानुजन द्वारा अध्ययन किया गया था, जिन्होंने रामानुजन थीटा फ़ंक्शन बनाया, जो जैकोबी थीटा फ़ंक्शन के रूप को सामान्यीकृत करता है और सामान्य गुणों को भी कैप्चर करता है। रामानुजन थीटा फ़ंक्शन का उपयोग बोसॉनिक स्ट्रिंग थ्योरी, सुपरस्ट्रिंग थ्योरी और एम-थ्योरी में महत्वपूर्ण आयामों को निर्धारित करने के लिए किया जाता है।

रामानुजन के अन्य उल्लेखनीय योगदानों में हाइपरजियोमेट्रिक श्रृंखला, रीमैन श्रृंखला, दीर्घवृत्तीय समाकलन, अपसारी श्रृंखला का सिद्धांत और ज़ीटा फ़ंक्शन के कार्यात्मक समीकरण शामिल हैं।

रामानुजन की उपलब्धियाँ सुंदरता, गहराई और आश्चर्य से भरी हुई थीं। दुर्भाग्य से, 1918 में इंग्लैंड में रामानुजन को एक घातक बीमारी हो गई। वे वहाँ एक साल से ज़्यादा समय तक स्वस्थ रहे और 1919 में भारत लौट आए। उसके बाद उनकी हालत बिगड़ती चली गई और 26 अप्रैल 1920 को उनकी मृत्यु हो गई। कोई उम्मीद कर सकता है कि एक मरता हुआ आदमी काम करना बंद कर देगा और अपने भाग्य का इंतज़ार करेगा। हालाँकि, रामानुजन ने अपना आखिरी साल अपने सबसे गहन गणित के कुछ कामों में बिताया।

एक सदी से भी ज़्यादा समय बीत चुका है, लेकिन उनकी गणितीय खोजें अभी भी जीवित हैं और फल-फूल रही हैं। “रामानुजन सिर्फ़ एक गणितज्ञ के तौर पर ही महत्वपूर्ण नहीं हैं, बल्कि इसलिए भी महत्वपूर्ण हैं क्योंकि उन्होंने हमें बताया है कि मानव मस्तिष्क क्या कर सकता है।” “उनकी तरह की क्षमता वाला कोई व्यक्ति इतना दुर्लभ और इतना कीमती है कि हम उन्हें खोना बर्दाश्त नहीं कर सकते। दुनिया में कहीं भी कोई प्रतिभाशाली व्यक्ति पैदा हो सकता है। यह हमारा सौभाग्य है कि वह हममें से एक था। यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि रामानुजन के जीवन और कार्य के बारे में बहुत कम जानकारी है, हालाँकि यह गूढ़ है, लेकिन हममें से ज़्यादातर लोगों को इसकी जानकारी है।

क्या भारत वर्ष 2047 तक विकसित राष्ट्र बन जाएगा

आज भारत के संदर्भ में यह सपना देखा जा रहा है कि पिछले कुछ वर्षों में केंद्र सरकार द्वारा किए गए विभिन्न सुधार कार्यक्रमों के बल पर वर्ष 2047 तक भारत एक विकसित राष्ट्र बन जाएगा। परंतु, सकल घरेलू उत्पाद में औसतन लगभग 7 प्रतिशत की वार्षिक वृद्धि दर के साथ क्या भारत वास्तव में वर्ष 2047 तक एक विकसित राष्ट्र बन पाएगा अथवा भारत को अभी भी कई प्रकार के सुधार कार्यक्रमों को लागू करने की आवश्यकता है। किसी भी देश को अपनी आर्थिक विकास दर को तेज करने के लिए कई प्रकार के सुधार कार्यक्रम लागू करने होते हैं। भारत ने वर्ष 1947 में राजनैतिक स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात, एक लम्बे अंतराल के पश्चात देश में आर्थिक सुधार कार्यक्रमों को वर्ष 1991 में प्रारम्भ किया। जबकि इस समय तक अमेरिका एवं कई यूरोपीय देश विकसित राष्ट्र बन चुके थे एवं चीन ने तो आर्थिक सुधार कार्यक्रमों को वर्ष 1980 में ही लागू कर दिया था तथा अपनी वार्षिक आर्थिक विकास दर को दहाई के आंकड़े के भी पार ले गया था। भारत इस मामले में बहुत पिछड़ चुका था।

श्री राजीव गांधी सरकार ने वर्ष 1985-86 में भारतीय संसद में एक सुधारवादी बजट पेश जरूर किया था परंतु वे इन कार्यक्रमों को बहुत आगे नहीं बढ़ा पाए। परंतु, वर्ष 1991 में श्री नरसिम्हा राव सरकार ने देश में लाइसेन्स राज को समाप्त कर सुधारवादी कार्यक्रमों को आगे बढ़ाया था। इसके पूर्व निजी क्षेत्र को भारतीय अर्थव्यवस्था में उचित स्थान प्राप्त नहीं था और केवल पब्लिक सेक्टर के दम पर ही भारत विकास की राह पर आगे बढ़ रहा था। तात्कालीन केंद्र सरकार द्वारा समाजवादी नीतियों को अपनाए जाने के चलते भारत में सुधारवादी कार्यक्रमों को लागू करने में बहुत अधिक देर कर दी गई थी। वर्ष 1947 में भारत के राजनैतिक स्वतंत्रता प्राप्त करने के पश्चात बड़े उद्योगों पर विशेष ध्यान दिया जाता रहा और सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्योग पर उचित ध्यान नहीं दिया गया। पेट्रोलियम रिफाइनरी, मशीनरी एवं तकनीकी उद्योगों पर भी विशेष ध्यान नहीं दिया गया जबकि आज यह समस्त उद्योग देश में अत्यधिक सफल होकर देश के आर्थिक विकास को गति देने में सहायक हो रहे हैं।

वर्तमान में केंद्र सरकार 2047 में भारत को विकसित राष्ट्र की श्रेणी में लाने के लिए अथक प्रयास कर रही है। हाल ही के वर्षों में लागू किए गए सुधार कार्यक्रमों में शामिल हैं – वस्तु एवं सेवा कर बिल, ऋणशोधनाक्षमता बिल, दिवालियापन बिल, आदि। श्रम कोड को भारतीय संसद ने पास कर दिया है परंतु देश में लागू किया जाना शेष है, कुछ राज्यों जैसे महाराष्ट्र में जमीन अधिग्रहण बिल पर कार्य चालू है। ईज आफ डूइंग बिजनेस के क्षेत्र में काफी अच्छा काम हुआ है और आज विभिन्न प्राजेक्ट्स को समय पर स्वीकृती मिल जाती है। भारत में डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर भी विकसित अवस्था में आ चुका है। भारत को विश्व की सबसे कमजोर 5 अर्थव्यवस्थाओं की सूची में से निकालकर विश्व की 5वीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था की श्रेणी में ले आया गया है। फिर भी, भारत को एक विकसित राष्ट्र  बनाने के लिए केवल 7 प्रतिशत की वार्षिक विकास दर काफी नहीं है।

वर्ष 2023-24 में भारत की आर्थिक विकास दर 8.2 प्रतिशत की रही है और प्रति व्यक्ति आय लगभग 2,300 अमेरिकी डॉलर प्रतिवर्ष है। किसी भी देश को विकसित राष्ट्र की श्रेणी में तभी शामिल किया जाता है जब उस देश के नागरिकों की प्रति व्यक्ति आय 13,000 अमेरिकी डॉलर प्रतिवर्ष के आस पास हो। इस दृष्टि से भारत को विकसित राष्ट्र बनाने के लिए भारतीय नागरिकों की औसत आय लगभग 8 प्रतिशत प्रतिवर्ष की दर से बढ़नी चाहिए। इस प्रकार, भारत का सकल घरेलू उत्पाद भी यदि 8 प्रतिशत के आसपास प्रतिवर्ष बढ़ता है तो वर्ष 2047 तक भारत एक विकसित राष्ट्र निश्चित ही बन सकता है। परंतु इसके लिए भारत में आर्थिक सुधार कार्यक्रमों को और अधिक गति देनी होगी।

आर्थिक एवं वित्तीय क्षेत्र में सुधार कार्यक्रम लम्बे समय तक चलने वाली सतत प्रक्रिया है। कई बार तो सुधार कार्यक्रम सम्बंधी कानून बनाने के बाद उन्हें लागू करने में भी लम्बा समय लग जाता है। जैसे भारत में 4 श्रम कोड वर्ष 2019-2020 के बीच में संसद द्वारा पास किए गए थे परंतु इन कोड को अभी भी लागू नहीं किया जा सका है। हालांकि वर्तमान प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी के कार्यकाल में आर्थिक एवं वित्तीय क्षेत्र में कई सुधार कार्यक्रम लागू किए गए हैं परंतु अभी भी कई क्षेत्रों में काम किया जाना शेष है। जैसे, भारत में पूंजी आज भी बहुत अधिक ब्याज दर पर उपलब्ध हो पाती है, हालांकि ऋण प्रदान करने सम्बंधी नियमों को शिथिल बनाया गया है, परंतु पूंजी की लागत बहुत अधिक है। भारत में युवा जनसंख्या अच्छी तादाद में है, आज भारत के नागरिकों की औसत आयु केवल 29 वर्ष है जो विश्व की 10 सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में सबसे कम है। यह भारत के लिए यह लाभदायक स्थिति है परंतु भारत आज भी इस स्थिति का लाभ नहीं उठा पा रहा है। इस प्रकार के कई ऐसे क्षेत्र हैं, जिन पर भारत में अभी भी बहुत काम किए जाने की आवश्यकता है।

भारत को अभी भी आर्थिक एवं वित्तीय क्षेत्र में संरचनात्मक बदलाव की बहुत अधिक आवश्यकता है। हमारे देश की मजबूती किन क्षेत्रों में हैं इन क्षेत्रों को चिन्हित कर हमें उन क्षेत्रों पर अधिक ध्यान देने की आवश्यकता है। जैसे उत्पादकता के मामले में अन्य देशों, विशेष रूप से पश्चिमी देशों, की तुलना में हम अभी भी बहुत पिछड़े हुए हैं। उत्पादकता कम होने के चलते भारत में निर्मित उत्पादों की लागत अधिक रहती है। देश में करों की दर (प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष) अन्य देशों की तुलना में बहुत अधिक है, इसे कम करने के सम्बंध में गम्भीरता से विचार करने की आज महती आवश्यकता है। साथ ही, बैकों द्वारा प्रदान किए जा रहे ऋण पर ब्याज की दर भी बहुत अधिक है, इससे भी उत्पादन लागत में वृद्धि होती है और भारत में निर्मित उत्पाद अंतरराष्ट्रीय बाजार में अधिक लागत के चलते टिक नहीं पाते हैं। अतः अब समय आ गया है कि ब्याज दरों को कम करने के बारे में भी गम्भीरता से विचार हो।

देश में हर समय कहीं न कहीं चुनाव हो रहे होते हैं और कई बार तो देश के बहुत बड़े भू भाग पर चुनाव आचार संहिता के लागू होने के चलते केंद्र एवं राज्य सरकारों को अपने पूंजीगत खर्चे रोकने होते हैं, इससे देश की अर्थव्यवस्था पर विपरीत प्रभाव पड़ता है। अतः देश में वन नेशन वन इलेक्शन को भी लागू करने की महती आवश्यकता है। साथ ही, आजकल कुछ राज्य सरकारों के बीच नागरिकों को मुफ्त सुविधाएं उपलब्ध कराने की जैसे होड़ ही लग गई है। मुफ्त सुविधाएं उपलब्ध कराने से इन प्रदेशों के बजट पर अत्यधिक दबाव उत्पन्न होता है। अतः इस प्रकार के खर्चों पर रोक लगाए जाने की भी आज आवश्यकता है।

भारत की आर्थिक विकास दर को 10 प्रतिशत से भी ऊपर ले जाया जा सकता है यदि हिंदू सनातन संस्कृति की अर्थव्यवस्था को भारत में बढ़ावा दिया जाय। इसके लिए देश के ब्यूरोक्रेसी के सोच में परिवर्तन लाना भी आवश्यक है। भारत में भव्य मंदिरों का निर्माण कर एवं इन स्थानों पर अधिकतम सुविधाएं उपलब्ध कराते हुए धार्मिक पर्यटन को जबरदस्त बढ़ावा दिया जा सकता है। इससे होटल उद्योग, परिवहन उद्योग, सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्योग को बहुत लाभ होगा एवं रोजगार के करोड़ों नए अवसर भी निर्मित होंगे। देश में शादियों के मौसम में लाखों करोड़ रुपए का खर्च होता है तथा विभिन्न त्यौहारों पर भी भारतीय नागरिकों के खर्च में अत्यधिक वृद्धि हो जाती है। इस सबका प्रभाव अर्थव्यवस्था पर सकारात्मक रहता है, अतः शादियों के मौसम एवं विभिन्न त्यौहारों पर नागरिकों को सरकार द्वारा विशेष सुविधाएं प्रदान करने से विभिन्न उत्पादों की खपत में वृद्धि की जा सकती है। और, अंततः यह देश के सकल घरेलू उत्पाद में वृद्धि करने में सहायक होगा। अतः हिंदू सनातन संस्कृति के संस्कारों को देश में लागू करने के संदर्भ में अब देश के ब्यूरोक्रेसी को गम्भीरता से विचार करने की आवश्यकता है। आज अतीत के बोझ को छोड़कर भविष्य की तरफ देखने की भी आवश्यकता है और देश के आर्थिक विकास के लिए नित नए क्षेत्रों की तलाश भी जारी रखनी होगी।

हाल ही के समय में देश में बचत एवं निवेश दर में कमी देखी जा रही है। प्रत्यक्ष विदेशी निवेश में भी कमी दृष्टिगोचर हुई है और विदेशी व्यापार घाटा भी लगातार बढ़ रहा है क्योंकि देश में स्वर्ण एवं कच्चे तेल का आयात अत्यधिक मात्रा में हो रहा है और विभिन्न उत्पादों का निर्यात उस गति से नहीं बढ़ पा रहा है। स्वर्ण के आयात को तो नियंत्रित करना आवश्यक है क्योंकि यह किसी भी प्रकार की उत्पादकता अथवा लाभ अर्जन में भागीदारी नहीं करता है बल्कि यह निवेश निष्क्रिय निवेश की श्रेणी में गिना जाता है। स्वर्ण में निवेश की जा रही विदेशी मुद्रा को यदि विनिर्माण इकाईयों की स्थापना पर खर्च किया जाय तो यह देश के सकल घरेलू उत्पाद में वृद्धि करने में सहायक होगा।

किसी भी विनिर्माण इकाई की स्थापना के लिए विशेष रूप से 6 घटकों की आवश्यकता होती है यथा – भूमि, पूंजी, श्रम, नई तकनीकी, संगठन एवं साहस। भारतीय सनातन संस्कृति के अनुसार नौकरी को निकृष्ट कार्य की श्रेणी में गिना जाता रहा है एवं अपना उद्यम चलाना उच्च कार्य माना जाता है। अतः संगठन क्षमता एवं साहस भारत के मूल नागरिकों के डीएनए में है। नई तकनीकी को विकसित करने में भारत के युवा इंजीनीयरों ने पूरे विश्व को राह दिखाई है। अतः भारत में केवल भूमि, पूंजी एवं श्रम की लागत को कम करने में यदि सफलता हासिल की जा सके तो भारत की आर्थिक विकास दर को 10 प्रतिशत से भी ऊपर ले जाया जा सकता है। भूमि, पूंजी एवं श्रम जहां भी आसानी से एवं उचित दामों पर उपलब्ध होंगे वहां उद्योग धंधे आसानी से फलेंगे एवं फूलेंगे।

प्रहलाद सबनानी
सेवा निवृत्त उप महाप्रबंधक,
भारतीय स्टेट बैंक
के-8, चेतकपुरी कालोनी,
झांसी रोड, लश्कर,
ग्वालियर – 474 009
मोबाइल क्रमांक – 9987949940
ई-मेल – prahlad.sabnani@gmail.com

रामचरितमानस में शृंगार

आनंद मानव जीवन का प्रमुख ध्येय माना गया है। आनंद शब्दों से परे एक ऐसी अद्भुत, अकथनीय महानुभूति है जिसे मात्र आत्मसात ही किया जा सकता है ।आनंद का आस्वाद इतना अपूर्व है कि इसका आज तक कोई विलोम शब्द तक नहीं मिल पाया है। सच पूछा जाये तो आनंद अर्थात रस ही जीवन है । जीवन के साथ  – साथ काव्य में भी रस भी भूमिका सर्वोपरि है, निर्विवाद है। सर्व प्रथम आचार्य भरत मुनि ने रस को काव्य की आत्मा कहा है । उनके पश्चात् कई दार्शनिकों, मनीषियों ने रस सिद्धांत के संदर्भ में अपने- अपने तर्क प्रस्तुत किये, सारांशत:, काव्य में नौ रसों का निरूपण किया गया है, जिन में शृंगार रस को रसराज की उपाधि से सुशोभित किया गया है।
शृंगार के दो पक्ष हैं, संयोग और  वियोग या विप्रलम्भ । इस  रस का  स्थाई भाव  है रति । नायक और नायक के प्यार, अनुराग, प्रीति, प्रणय के वर्णन  में शृंगार रस की निष्पत्ति  होती है। दोनों के मिलन को संयोग एवं बिछुड़ने पर वियोग रस कहा गया है | आदि काल से अध्यतन प्राय: सभी काव्य मनीषियों ने अपने महाकाव्यों, खंड काव्यों या अन्य रचनाओं में शृंगार रस का निरूपण  कमोबेश किया है । हम तुलसीकृत महाकाव्य रामचरितमानस के संदर्भ में दृष्टिपात करें तो इस में सभी रसों का विवरण  मिलता है, जो कि  महाकाव्य के लिए अनिवार्य तत्त्वों में शामिल है।
 अन्य रसों के साथ मानस में शृंगार रस की बहुत सरस, अभिराम, मर्यादित धारा प्रवाहित हुई है।
तुलसी ने काव्य के नायक श्रीराम को मर्यादा पुरुषोत्तम के स्वरुप में दर्शाया है | राम विष्णु के अवतार हैं, जो मानव के रूप में पृथ्वी पर अवतरित हुए हैं, अत: साधारण  मनुष्य की तरह लीला करते  है। मानस में तुलसी ने शृंगार रस को बहुत सौम्यता, मर्यादा, अलौकिकता और माधुर्यता के साथ चित्रित किया है । महाकाव्य के नायक श्रीराम और  नायिका सीता का प्रथम संयोग मिथिला की पुष्प वाटिका में होता है, जहाँ राम गुरु – आज्ञा से वाटिका का अवलोकन करने जाते हैं, उसी समय गौरी- पूजन के लिए  सीता का प्रवेश होता है। उस समय सीता की एक चंचल सखि वाटिका को देखने के लिए इधर -उधर भ्रमण करती है , तभी उसकी दृष्टि राम एवं लक्ष्मण राजकुमारों पर पड़ती है और  उनके अलौकिक , अनुपम सौन्दर्य  के देख कर भाव विभोर होकर चकित रह जाती है । बेसुध सी होकर सीता के पास आकर  कहती है कि मैंने दो राजकुमारों को देखा है, जिनके सौन्दर्य का बखान असंभव है क्योंकि –
स्याम गौर किमि कहौं बखानी । गिरा अनयन नयन बिनु बानी।।- अयोध्याकांड
सखि की बात सिया को बहुत सुहाती है और उसके नैत्र भी राजकुमारों के दर्शन हेतु अकुलाने लगते हैं-
तासु वचन अति सियहि सोहाने |दरस लागि लोचन अकुलाने ।। -बालकाण्ड
नारद जी के वचन याद करके सीता के मन में पवित्र प्रीति के अंकुर प्रस्फुटित होने लगते हैं । दरस की उत्कंठा में सीता डरी हुई मृगछौनी की भाति इधर- उधर देख रही है-
 सुमिरि सिय नारद बचन । उपजी प्रीति पुनीत ।।
चकित बिलोकत सकल दिसि। सिसु मृगी सभीत ।।बालकाण्ड
उधर कंगन, करधनी, पाजेब की मधुर ध्वनि सुनकर श्रीराम, लक्ष्मण से कहते हैं कि ऐसी ध्वनि आ रही मानो कामदेव ने  विश्व को जीतने के लिए डंके पर चोट मारी हो । ऐसा कह कर  राम ने फिर उस ओर देखा , सीता के मुख रूपी चंद्रमा को निहारने के लिए उनके नैत्र चकोर बन गये। सिया की रम्य, चारू  छवि देख कर राम को बहुत सुख मिला , जिसकी सराहना के लिए राम स्वयं निशब्द हो गये ।
अस कहि फिरि चितए तेहि ओरा |सिय मुख ससि भए नयन चकोरा ।।
देखि सीय सोभा सुख पावा| ह्रदय सराहत  बचनू न आवा ।।- बालकांड
उधर सीता राम की अभिराम के  दर्शन के लिए बहुत व्याकुल है- तब सखियों ने  लता की ओट से में सुंदर और गौर कुमारों को दिखलाया ।उनके रूप को देख जनकनंदिनी के नैत्र ललचा उठे , ऐसे प्रसन्न हुए कि मानो उन्होंने अपने खजाना को पहचान लिया ।
 थके नयन रघुपति छबि देखें | पलकन्हिहूँ परिहरीं निमेषें  ।।
अधिक सनेहं  देह भै मोरी |सरद ससिहि जनुचितव चकोरी ।।- बालकाण्ड
रघुनाथ की आभा को  देख कर सिया के नैत्र थकित हो गये । पलकों ने गिरना छोड़ दिया । अधिक स्नेह के कारण तन विव्हल हो गया । मानों शरदऋतु के चंद्रमा को चकोरी (बेसुध हुई) देख रही हो।
कुछ देर बाद जब दोनों भाई लतामंडप में से प्रकट हुए और सखियों ने सीता से कहा कि गिरिजा का ध्यान बाद में करना, अभी राजकुमारों को देख लो। तब सीता ने सकुचा कर नैत्र खोले और  रघुकुल के दोनों सिंहों को सामने खड़े देखा –
सकुचि सीयँ तब नयन उघारे | सन्मुख दोउ रघुसिन्धु निहारे ।।
इस प्रकार राम और सीता के ह्रदय में प्रथम बार परस्पर प्रणय की निर्मल , दिव्य धारा प्रवाहित हुई। वे एक दूजे को  प्रथम बार निहारते हैं , परस्पर आकर्षित होते हैं| मन ही मन राम और सिया का चित्त एक दूसरे की ओर सहज आकृष्ट हो उठता है । तुलसीदास जी ने यहाँ शृंगार रस का  पूरी तन्मयता , पवित्रता , समर्पण के साथ उद्रेक किया है जो अतुलनीय है।
जब श्रीराम को वनवास की खबर सुनते ही सीता के हृदय में दु:सह संताप छा गया,वह अकुला उठी, विलाप करने लगी । अंतत:,  तब सीता राजभवन के सारे सुखों को त्यागकर राम के साथ वनवास को जाती है, सीता ने पलंग के ऊपर, गोद और हिंडोले  को छोड़ कर कठोर पृथ्वी पर कभी पैर नहीं रखा,  वो सीता कंटकों से भरे जंगल में अपने परम स्नेहिल  श्रीराम के साथ जाने को तत्पर हो जाती है, उसी में परम आनंद मानती है।  –
पलंग पीठ तजि गोद हिंडोरा  । सिय न दीन्ह  पगु  अवनि कठोरा ।।- अयोध्याकाण्ड
दशानन द्वारा सीताहरण के प्रसंग में जब श्रीराम सीता के बारम्बार अनुनय, विनय, निवेदन  करने पर स्वर्ण-  मृग के आखेट के लिए जाते हैं और राम के पुकारने की आवाज़ (मायावी) सुनकर सीता लक्ष्मण को भी राम के पीछे जाने को विवश करती हैं। जब लक्ष्मण  सहित राम गोदावरी तट पर आते हैं और सीता विहीन आश्रम देख कर साधारण मनुष्य की भाति दीन और व्याकुल होकर विलाप करने लगते हैं । लक्ष्मण अपने अग्रज श्रीराम को बार -बार समझाने के प्रयास भी करते हैं किन्तु राम का विचलित होना स्वाभाविक है ।
आश्रम देखि जानकी हीना ।भय विकल जस प्राकृत दीना ।
हा गुन खानि जानकी सीता । रूप सील ब्रत नेम पुनीता ।।
लछिमन समुझाए बहु भांती| पूछत चले लता तरु पांती ।।-  अरण्यकांड
सिया के वियोग में राम इतने विकल हो जाते हैं कि पशु – पक्षियों , वृक्षों, लताओं, भौरों  अर्थात वन के प्रत्येक जर्रे – जर्रे से,  सब से सीता के लिए पूछते  हैं कि तुमने कहीं जानकी को देखा है । खंजन, तोता, कबूतर , हिरन , मछली, भौरों का समूह, कोयल आदि पशु – पक्षी आज अपनी प्रशंसा  सुन रहे हैं। यहाँ  तुलसी के .गरिमापूर्ण, अद्वितीय ,विलक्षण विप्रलंभ शृंगार का कोई सानी नहीं| अत्यंत , सजीव ,अद्भुत , रुचिर, अतुल्य वर्णन संत तुलसी ने किया है| ऐसा शृंगार रस हिंदी साहित्य में दुर्लभ ही है-
हे खग मृग हे मधुकर श्रेनी । तुम्ह देखि सीता मृगनैनी ।।
खंजन सुक  कपोत मृग मीना । मधुप निकर कोकिला प्रबीना ।। अरण्य कांड
वर्षा ऋतु मनभावन , अभिराम, सौन्दर्य , माधुर्य , प्रेम से भरपूर , रमणीय  होती है|अखिल चराचर प्रकृति खिल उठती है । बालि और सुग्रीव की कथा के पश्चात वर्षा ऋतु का आगमन होने वाला देख कर राम प्रवर्षण पर्वत पर निवास करते हैं  जहाँ सुंदर वन फूला हुआ है । भौंरें गुंजार कर रहे हैं, इस मनोरम एवं सुंदर पर्वत पर सारे देवगण  भौंरे, पशु , पक्षी बन कर प्रभु की सेवा करते हैं|l । सारा वन मंगलमय हो उठा, राम एक स्पटिकमणिकी उज्ज्वल शिला पर लक्ष्मण के साथ सुखपूर्वक विराजमान हैं । पावस का सुहाना दृश्य उपस्थित है।  श्रीराम लक्षण से कहते हैं, देखो भौंरों के झुँड बादलों को देख कर नाच रहे हैं| आकाश में बादल उमड़ -घुमड़  कर घोर गर्जना कर रहे हैं। ऐसे में प्रिया जनकसुता के बिना मेरा मन  बहुत डर रहा है, अधीर हो रहा है । बिजली की चमक बादलों में ठहरती नहीं , जैसे दुष्ट की प्रीति स्थिर नहीं रहती। तात्पर्य है कि  राम जैसे मर्यादा पुरुषोत्तम भी सीता का विरह  सह नहीं पाते-
 घन घमंड नभ गरजत घोरा ।प्रिया हीन डरपत मन मोरा ।।
दामिनी दमक रह न घन माहीं । खल कै प्रीति जथा थिर नाहीं ।। किष्किन्धा कांड
 यहाँ  तुलसी ने ‘घन – घमंड’ शब्द का बादलों के लिए प्रयोग किया है, जो हिंदी साहित्य में अभी तक संभवत: नहीं हुआ है, यह पंक्ति लोक में मिथक बन चुकी है, जुबान पर चढ़ चुकी है, अद्भुत, अद्वितीय , अकल्पनीय कल्पना ….!
वर्षा बीत जाने पर राम, लक्षमण के कहते हैं कि – बरसात बीत गई, निर्मल शरद ऋतु आ गयी । परन्तु हे तात! सीता की कोई खबर नहीं मिली |एक बार कैसे भी पता पाऊँ तो काल को भी जीत कर जानकी को ले आऊँ ।
बरषा गत निर्मल ऋतु आई ।सुधि न तात सीता कै पाई।।
एक बार कैसेहुं सुधी जानौं । कालहु जीति निमिष महुं आनौं ।। -किष्किन्धाकांड
अहा, कितना मनोरम वियोग शृंगार रस की छटा तुलसी ने यहाँ उकेरी है, जो अतीव श्लाघनीय है|
सीता का हरण करके दशानन उसे लंका की अशोक वाटिका में ले जाता है जहाँ सीता राम के विरह में बहुत विकल है, जिसे तुलसी ने यूँ उदृत किया है। जनकनंदिनी अपने प्रिय श्रीराम का निमिष-  निमिष स्मरण करती रही , जब तक लंका में रही । इधर दशानन सीता को अपनी पटरानी बनने के लिए बार – बार विवश करता है,भय दिखता है । एक बार तो रावण  के मजबूर करने जनकतनया त्रिजटा से कहती  है कि रावण की शूल के सामान दुःख देने वाली वाणी नहीं सुनी जाती । वह इतनी विचलित हो जाती है कि शरीर छोड़ने को तक को तैयार हो जाती है, कितुं यह भी संभव नहीं हो पाता क्योंकि –
कह सीता विधि भा प्रतिकूला ।मिलिहि न पावक मिटीहि न सूला ।।
देखिअत प्रकट गगन अंगारा । अवनि न आवत एकऊ तारा ।। -सुन्दरकांड
सीता मन ही मन कहने लगीं कि क्या करूं विधाता ही विपरीत हो गया। न अग्नि मिलेगी न पीड़ा मिटेगी । आकाश में अंगारे प्रकट दिखाई दे रहे हैं, पर पृथ्वी पर एक भी तारा नहीं आता। तब त्रिजटा राक्षसी अपने स्वप्न को सुनाते  देते हुए सीता को बहुत प्रकार से धीरज बंधाती है, आश्वस्त करती है।
जब पवनसुत सिया की खोज करके आते हैं और  श्री राम को सीता की विरह -विधग्ध हालत का बखान करते हुए कहते हैं –
विरह अगिनि तनु तूल समीरा ।स्वास जरइ छन माहिं सरीरा ।।
नयन स्त्रवहिं जलु निज हित लागी । जरैं न पाव देह बिरहागी ।। -सुन्दरकांड
विरह अग्नि है, शरीर रुई है और श्वास पवन , इस प्रकार यह शरीर क्षण मात्र में जल सकता है। किन्तु नैत्र अपने हित के लिए , प्रभु का स्वरुप देख कर सुखी होने के लिए जल (आँसू )बरसाते हैं, जिस से विरह की अग्नि से देह जलने नहीं पाती।
सीता का दुःख एवं दीन दशा को सुनकर सुख के धाम श्रीराम के कमल नेत्रों में जल भर आया ।
सुनि सीता दुःख प्रभु सुख अयना ।भरि आऐ जल राजीव नयना ।।- सुंदरकांड
उधर श्रीलंका में राम के वियोग में अशोक वाटिका में सीता का एक -एक निमिष  युगों सम व्यतीत होता है। सीता के हर श्वास में  राम का नाम ही समाया  होता है । एक क्षण भी वह अपने परम प्रिय श्रीराम को विस्मृत नहीं कर पाती| जब -जब भी रावण सीता के निकट आने की कोशिश करता है , उसे  धमकाता है ,हर बार सीता एक तिनके की ओट लेकर रावण के बात करती है अर्थात तिनका एक आवरण का प्रतीक बन जाता है ।
 तृण धरी ओट कहती वैदेही , सुमिरि अवधपति  परम सनेही ।
सठ सूनें हरि आनेहि मोही। अधम निलज्ज लाज नहिं तोही ।। सुन्दरकांड
 जनकसुता रावण से कहती है कि रे पापी ! तू मुझे सूने में हर लाया है, । रे अधम !रे निलज्ज ! तुझे लज्जा नहीं आती ?
रामचरितमानस महाकाव्य  में नायक श्रीराम और नायिका  सीता के संयोग और वियोग दोनों रसों उद्रेक अन्यान्य कई  प्रसंगों और  स्थलों में पूरी सजीवता, तन्मयता,रोचकता के साथ अभिव्यक्त हुआ है । इस के  अतिरिक्त लक्ष्मण एवं उर्मिला के संदर्भ में विप्रलम्भ शृंगार का समुचित निरूपण तुलसीदास जी ने किया है। इस प्रकार रामचरितमानस में रसराज शृंगार रस की निष्पत्ति पूरी दिव्यता, आस्था, पवित्रता, अलौकिकता, उत्कृष्टता  एवं भव्यता के साथ हुई  है।
डॉ. कृष्णा कुमारी
 सी- 368, तलवंडी
 कोटा (राज.)

भारत के देसी खेल: जिन्हें फिट इंडिया के तहत भारत सरकार दे रही बढ़ावा

फिट इंडिया कैंपेन में भारत के 19 स्वदेशी खेलों को शामिल किया गया है, जिसमें कबड्डी, कुश्ती अखाड़ा, खो-खो और कई अन्य खेल शामिल हैं। अपने देश की मिट्टी से जुड़े इन देसी खेलों के बारे में जानिए।

भारत विविधताओं का देश है, जहां जितने समुदाय के लोग हैं उतनी ही बोलियां बोली जाती हैं और उतने ही खेल भी खेले जाते हैं। भारत का इतिहास बेहद समृद्ध रहा है, जिसमें ज्ञान, विज्ञान, राजनीति, खेल और संस्कृति का विकसित रूप भी शामिल है।

भारत सरकार लोगों को फिट रहने के लिए पूरे देश में फिट इंडिया अभियान चला रही है। जिससे लोग फिटनेस के प्रति जागरूक हो सकें।

भारत में कई ऐसे देसी खेल खेले जाते हैं, जिनकी उत्पत्ति भारत में ही हुई है। भारत सरकार के फिट इंडिया कैंपेन में ऐसे 19 स्वदेशी खेलों को शामिल किया गया है, जो भारत के देसी या स्वदेशी खेल हैं। इस खास लेख में आज हम आपको ऐसे ही 19 देसी खेलों के बारे में बताने जा रहे हैं।

कुश्ती अखाड़ा
कुश्ती या पहलवानी के बारे में आप सभी ने सुना होगा। इस खेल को मिट्टी के अखाड़े में खेला जाता है। ऐसा अनुमान लगाया जाता है कि स्वदेशी खेल 4000बीसी पुराने इस कुश्ती अखाड़ा का जिक्र भारत के महान ग्रंथ महाभारत में भी मिलता है।

अखाड़ा कुश्ती में जबतक एक पहलवान हार नहीं जाता है तब तक मुकाबला चलता रहता है। ये खेल फ्रीस्टाइल कुश्ती से बिल्कुल अलग होता है।

थांग-ता
भारत के मणिपुर राज्य का देसी मार्शल आर्ट थांग-ता के नाम से मशहूर है। थांग का मतलब तलवार होता है, जबकि ता का अर्थ भाला होता है। थांग-ता में तलवार, ढाल और भाले का उपयोग किया जाता है। साल 1891 में मीतेई रेस के लोग जो कंगलीपैक नामक स्थान पर रहते थे। ऐसा माना जाता है कि वहीं से इस युद्धकला की शुरुआत हुई।

यह ह्यूएन लैंगलॉन मार्शल आर्ट का हिस्सा है, जिसमें थांग-ता यानी सशस्त्र युद्ध और दूसरा हिस्सा सरित सरक यानी निहत्था मुकाबला है।

कलरीपायट्टु
15,000 बीसी पुराना खेल कलारीपयट्टू या कलरीपायट्टु भारत के दक्षिणी राज्य में पारंपारिक रूप से खेला जाता है। इसमें शस्त्र के अलावा हाथ और पैर का अनोखा प्रयोग किया जाता है। यह मल्लयुद्ध की शैली पर ही आधारित है। केरल और तमिलनाडु के कई स्कूल में इसकी ट्रेनिंग दी जाती है।

कलरीपायट्टु का ताल्लुक केरल और तमिलनाडु से है, जो आत्मरक्षा, युद्ध एवं व्यायाम का साधन है। इसके अलावा इस खेल का नाता नृत्यकला से भी है। प्राचीन धर्मग्रंथों के मुताबिक भगवान शिव, मुनि अगस्त्य और भगवान परशुराम को इस खेल का जनक माना जाता है।

खो-खो
बच्चों के टैग खेल की तरह ही खो-खो एक पारंपरिक भारतीय खेल है जो हजारों सालों से किसी न किसी रूप में अस्तित्व में रहा है। हालांकि खो-खो खेल की शुरुआत कब हुई इसे बता पाना कठिन है। ऐसा माना जाता है इस खेल के कुछ पहलुओं का उल्लेख प्राचीन भारतीय महाकाव्य महाभारत में वर्णित चक्रव्यूह में रहा है।

खो-खो टीम गेम है, जिसमें एक टीम के खिलाड़ी विपक्षी टीम के खिलाड़ी को टैग करते हैं और अंक अर्जित करने की कोशिश करते हैं। दो पारियों में खेले जाने वाले इस गेम की प्रति पारी 9 मिनट की होती है। फिलहाल महाराष्ट्र और भारत के कई अन्य प्रदेशों में खो-खो काफी लोकप्रिय खेल है।

रस्साकशी
ओलंपिक में सन् 1900 से 1920 तक हिस्सा लेना वाला खेल रस्साकशी भारत का प्राचीनतम खेल है। इसमें रस्सी को बीच से दो टीमें अपने-अपने सिरे की ओर खींचती हैं। जो टीम रस्सी को अपनी ओर खींचने में सफल हो जाती है, वह विजेता बन जाती है।

वैसे तो कहना मुश्किल है कि इस खेल की शुरुआत किस देश में पहली बार हुई। लेकिन ऐसा माना जाता है कि ये खेल कंबोडिया, पुराने इजिप्ट, ग्रीस, भारत और चीन में खेला जाता था। काफी समय पहले इस खेल की मदद से योद्धाओं को ट्रेनिंग दी जाती थी।

मलखंब
मलखंब एक प्राचीन भारतीय पारंपरिक खेल है जो योग, व्यायामशाला और मार्शल आर्ट को जोड़ता है। इसे प्राचीन भारतीय खेलों की जननी माना जाता है। ‘मल’ का अर्थ है जिम्नास्ट और ‘खंब’ का अर्थ पोल है। ऐसे में ‘मलखंब’ का अर्थ ‘जिमनास्ट पोल’ हुआ। माना जाता है कि इस खेल की उत्पत्ति 12वीं शताब्दी में हुई।

1936 के बर्लिन ओलंपिक में शामिल रहे इस खेल को दुनिया ने जाना था। मलखंब का जिक्र प्राचीन भारतीय महाकाव्य रामायण में मिलता है, जबकि चंद्रकेतुगढ़ की मिट्टी के बर्तनों में पाया गया था। जो एक शताब्दी ईसा पूर्व के हैं। इसके अलावा भारत में बौद्ध चीनी तीर्थ यात्रियों की किताबों में भी इसका उल्लेख है।

हेक्को
नागालैंड के मोकोचंग जिले के चांग्की गांव में हेक्को खेल खेला जाता है। जिसका मतलब होता है बाघ का मुकाबला करना। इस खेल से गांव के सबसे शक्तिशाली युवा की पहचान भी होती है। दो टीमों के बीच होने वाले इस खेल में खिलाड़ियों की ताकत, स्टेमिना और तेजी का प्रदर्शन करना होता है। इस खेल के पीछे भी कहानी है, जब इंसान और जानवर एकसाथ रहा करते थे। लेकिन अक्सर इन दोनों प्राणियों में जंग छिड़ जाया करती थी।

जंगल का राजा शेर सबसे ताकतवर होता था, इसलिए वह हर चीज पर पहला हक अपना जताता था। लेकिन इंसानों ने बाघों को चुनौती दी और ये चुनौती ही हेक्को कहलाई। इंसानों ने बाघों को जंगल में खदेड़ दिया, लेकिन नागालैंड के आदिवासियों और बाघों की लड़ाई अभी जारी है। इस लड़ाई से प्रेरित होकर चांग्की गांव के लोगों ने हेक्को को एक खेल का रूप दे दिया।

मैदान में एक बड़ा गोला बनाकर इस खेल को खेला जाता है, जिसमें आमी यानी इंसानों की टीम और आखो यानी शेर की टीम होती है। दोनों टीमों में 11-11 खिलाड़ी होते हैं। कौन सी टीम आमी होगी और कौन सी आखो होगी, इसका फैसला टॉस से होता है।

आमी टीम घेरा बनाकर गोले में खड़ी होती है, जबकि आखो टीम गोले के बाहर से हमला करती है। आखो की ओर से एक खिलाड़ी आमी टीम पर हमला बोलता है, जिसका काम होता है आमी से किसी को भी गोले से बाहर करना होता है, जबकि आमी टीम उसे सर्किल में ही दबोच लेना चाहती है।

स्काय
कश्मीर को धरती का स्वर्ग कहा जाता है। कश्मीर की अपनी प्राचीन सांस्कृतिक पृष्ठभूमि है और यह अपनी सांस्कृतिक सुंदरता, पहाड़ों, झीलों, उद्यानों और शिल्प के लिए प्रसिद्ध है। स्काय मार्शल आर्ट कश्मीर के इतिहास की तरह ही बहुत ही पुराना है। शुरु में इस मार्शल आर्ट से मनुष्य ने खुद को या अपने कुटुम्ब को जंगली जानवरों से बचाने के लिए सीखा था।

4012 ईसा पूर्व से पहले कश्मीरियों ने खुद को बचाने के लिए स्काय मार्शल आर्ट का उपयोग किया था और इस कला का उपयोग उन्होंने जानवरों का शिकार करने के लिए किया था। लेकिन 3905 ईसा पूर्व के बाद राजा ‘दीया देव’ ने दुश्मनों से कश्मीर की रक्षा के लिए सैनिकों को इस कला का प्रशिक्षण दिया और सैनिकों को इन नियमों का पालन करने का सख्त आदेश दिया।

छऊ और पाइका अखाड़ा
छऊ और पाइका अखाड़ा मार्शल आर्ट और सेमी क्लासिकल का अपना वर्जन है। छऊ नृत्य या खेल भारत के राज्यों जैसे पश्चिम बंगाल, झारखंड और ओडिशा में पारंपरिक रूप से खेला या परफॉर्म किया जाता है। रामायण, महाभारत, भारतीय साहित्य और पुराणों में भी इसका जिक्र मिलता है।

वहीं मार्शल आर्ट का एक और रूप पाइका अखाड़ा का मतलब योद्धाओं का स्कूल होता है। ओडिशा में खानदायत जाति के लोग और चरवाहे इस मार्शल आर्ट को परफॉर्म करते हैं। ये शारीरिक व्यायाम करने का बेहद पुराना तरीका भी है।

कबड्डी
कबड्डी काफी रोमांचक खेल है। ऐसा माना जाता है कि यह खेल तकरीबन 4000 वर्ष पुराना है। आधुनिक भारत में कबड्डी कुछ प्रसिद्ध खेलों में से एक है। छोटे शहरों और यहां तक कि गांवों में भी लोग इसे खेलना पसंद करते हैं। इस खेल में कौशल के साथ-साथ शारीरिक ताकत की भी आवश्यकता होती है।

कबड्डी मैच आमतौर पर 40 मिनट (प्रत्येक 20 मिनट के दो भाग) तक चलता है। प्रत्येक टीम में सात खिलाड़ी होते हैं। आज पूरे भारत में लोगों को इस खेल के लिए प्यार मिल रहा है।

शूटिंग बॉल
ऐसा माना जाता है कि शूटिंग बॉल का इतिहास भारत में आजादी से पहले का है। ये खेल जितना भारत में लोकप्रिय है, उतना ही पाकिस्तान में भी है। शुरू में ये खेल लोगों की फिटनेस के लिए खेला जाता था, दो टीमें होती थीं और मैदान पर एक रस्सी बांधकर कपड़े की गेंद से शूटिंग बॉल का खेल खेला जाता था।

खेल में खिलाड़ियों का मुख्य उद्देश्य गेंद को विपक्षी के पाले में मारना होता है। बाद में इस खेल में लेदर गेंद को शामिल कर लिया गया और रस्सी की जगह नेट ने ले ली। ये खेल वॉलीबॉल से मिलता-जुलता है, लेकिन इसके नियम-कानून और खेलने का तरीका अलग है। इसमें 12-12 खिलाड़ियों की टीम होती है, जिसमें कोर्ट में 7 खिलाड़ी होते हैं।

लागोरी और लंगडी
लागोरी बेहद ही पुराना खेल है और इसका जिक्र श्रीमद भागवत गीता में भी है। तकरीबन 5000 वर्ष पुराने इस खेल को भगवान कृष्ण अपने दोस्तों के साथ खेला करते थे। ऐसा माना जाता है कि ये खेल दक्षिण भारत में साल 1990 से खेला जा रहा है। लगोरी खेल भारत के कई राज्यों में खेला जाता है। अलग-अलग राज्यों में इसके अलग-अलग नाम भी हैं।

इस खेल में 7 पत्थरों की लगोरी बनाई जाती है और 5-7 लोगों की दो टीम के बीच ये खेला जाता है। लगोरी गिराने वाली टीम को सीकर और दूसरी टीम को हीटर कहते हैं। फेंकने वाले खिलाड़ी का पैर लाइन नहीं पार करना चाहिए, नहीं तो उसे फाउल करार दिया जाता है। हर टीम के खिलाडी को 3 मौके मिलते हैं, और अगर लगोरी नहीं गिरी तो उसे आउट दे दिया जाता है।

गतका
सिक्खों का अपना मार्शल आर्ट यानी गतका पंजाब में बहुत ही मशहूर है। गतका सिक्खों का पारंपरिक युद्ध कौशल का तरीका है। मौजूदा समय में भी सिक्खों के धार्मिक उत्सवों में इस कला का प्रदर्शन किया जाता है। पंजाब सरकार ने इस भारतीय मार्शल आर्ट ‘गतका’ को खेल की मान्यता दी हुई है।

साल 1982 में अंतरराष्ट्रीय गतका फेडरेशन की स्थापना भी हुई थी। गतका खेल या तलवारबाजी प्रदर्शन कला के रूप में काफी लोकप्रिय है। इस खेल का प्रदर्शन पारंपारिक परिधान में किया जाता है।

रोल बॉल
रोल बॉल दो टीमों के बीच खेला जाने वाला खेल है और रोलर स्केट्स, बास्केटबॉल, हैंडबॉल और थ्रोबॉल का एक अनूठा संयोजन है। यह ‘रोलर शूज’ पर खेला जाता है, जिसमें प्रत्येक टीम में बारह खिलाड़ी होते हैं, छह मैदान पर और छह रिजर्व में होते हैं।

खेल का मुख्य उद्देश्य निर्धारित समय के भीतर अधिकतम गोल करना होता है। रोल बॉल की मुख्य विशेषता यह है कि गेंद एक या दोनों हाथों में पकड़ी जाती है, अन्य खिलाड़ियों के पास जाने पर गेंद बार-बार जमीन पर उछलती है।

इस खेल का आविष्कार भारत के पुणे के रहने वाले राजू दाभाडे ने किया था, वह अंग्रेजी माध्यम के स्कूल एमईएस बाल शिक्षण मंदिर में खेल शिक्षक थे। दाभाडे इंटरनेशनल रोल बॉल फेडरेशन (आईआरबीएफ) के सचिव भी हैं।

धूप और कौड़ी खेल
धूप खेल असम का पारंपारिक खेल है, जो बसंत के आगमन पर और अक्सर बीहू उत्सव के दौरान खेला जाता है। एक समय में इस खेल का आयोजन अहोम राज घरानों के मनोरंजन के लिए किया जाता था। ये खेल दो टीमों के बीच खेला जाता है, जिसमें 11-11 खिलाड़ी होते हैं। खेल का मैदान 125 मीटर लंबा और 80 मीटर का चौड़ा होता है, जिसके हर कोने में एक झंडा होता है।

इस खेल में टीमें गेंद को एक दूसरे की ओर फेंकती है, जिन्हें कैच करना होता है। अगर कैच छूटा तो उस टीम से गेंद फेंकने का चांस छीन लिया जाता है। जो टीम जल्दी ऑलआउट हो जाती है, वो मुकाबला हार जाती है।

सिलंबम
सिलंबम भारतीय मार्शल आर्ट है, जिसमें हथियार के रूप में छड़ी का उपयोग होता है। इस खेल की उत्पत्ति तमिलनाडु राज्य से हुई। यह काफी पुरानी मार्शल आर्ट है। माना जाता है कि यह करीब 5,000 साल से अधिक पुरानी है। इसका इस्तेमाल अधिकांश दक्षिण भारतीय शासकों द्वारा युद्ध में किया जाता था।

सिलंबम का थोड़ा संबंध केरल की मार्शल आर्ट से है, जो कलरिपायट्टु के नाम से जाना जाता है। ऐसा माना जाता है कि मार्शल आर्ट की प्रसिद्ध शाओलिन शैली भारतीय स्टिक फाइटिंग से ली गई है। सिलंबम का जिक्र सिलाप्पडिक्करम और संगम साहित्य में भी है।

सिक्किम तीरंदाजी
सिक्किम आपको अपने साहसिक खेल – तीरंदाजी का आनंद लेने के लिए प्रेरित करता है। यह एक दिलचस्प खेल है, जिसमें बांस से बने धनुष और बाण का उपयोग किया जाता है। सिक्किम की तीरंदाजी अंतरराष्ट्रीय स्तर की तीरंदाजी से अलग है, क्योंकि इसमें बांस का ही धनुष और उसी का बाण इस्तेमाल होता है।

दरअसल सिक्किम के लोग पहले जंगली जानवरों से बचाव के लिए तीरंदाजी का उपयोग करते थे। बाद में धीरे-धीरे ये वहां का खेल बन गया और अब इसे भारत सरकार ने बड़ा मंच प्रदान किया है।

गिल्ली डंडा
एक होल में गिल्ली को रखा जाता है। दो टीमें बनती हैं और वे बारी-बारी से गिल्ली को मारकर अंक बनाती हैं। खिलाड़ी डंडे से गिल्ली को दो बार मारने की कोशिश करता है – एक बार इसे जमीन से उठाने के लिए और दूसरी बार जहां तक संभव हो इसे मारने के लिए डंडा चलाता है। वहीं क्षेत्ररक्षण करने वाली टीम गिल्ली को जमीन पर छूने से पहले कैच करने की कोशिश करती है।

गिल्ली डंडा भारत का एक प्राचीन खेल है। ऐसा माना जाता है कि इसकी उत्पत्ति संभवत: 2500 साल पहले हुई थी।

मिजोरम का देसी खेल
बांस या लकड़ी के रॉड को धक्का देकर खेला जाने वाला गेम इंसुकनवर मिजोरम का सबसे पुराना खेल है। इस खेल में दो खिलाड़ी होते हैं, जो काठ की रॉड के सहारे एक दूसरे को रिंग से बाहर करने की कोशिश करते हैं। ये खेल खासकर युवाओं के बीच होता है, जो पुराने दिनों में गांवों की सुरक्षा के लिए इस खेल का इस्तेमाल करते थे।

हालांकि राज्य सरकार अब इस खेल को राष्ट्रीय स्तर पर स्थापित करने की कोशिश में है।

पण्डित राम सुमिरन पाण्डेय ‘सुमन’

पण्डित राम सुमिरन पाण्डेय ‘सुमन’ जी का जन्म अश्विन शुक्ल त्रयोदशी सम्बत 1983 विक्रमी को ग्राम गढ़ा तहसील हर्रैया जिला बस्ती में हुआ था। इनके पिता का नाम पण्डित काशी प्रसाद पाण्डेय और माता का नाम श्रीमती सीतापति देवी था। साहित्यरत्न की परीक्षा उत्तीर्ण करने के बाद वे 1946 में जिला परिषद बस्ती के विभिन्न प्राथमिक स्कूलों मे सहायक अध्यापक के पद पर कार्यरत रहे हैं । ‘सुमन’ जी गीतकार और कवि के रूप में बस्ती के कवि मंडली में अपना उच्च स्थान रखते हैं। ये चतुर्थ चरण के विकस में नवोदित छन्दकार के रूप में अपना प्रयास कर रहे हैं। इनके अधिकांशत: छन्द अव्यवस्थित रूप से इनकी डायरियो में देखे गये। इनके छंदों में ब्रजभाषा और बड़ी बोली का मिश्रण अधिक पाया जा रहा है।अधिकांश छन्द केवल तुकबन्दी तक ही सीमित है। दो छन्द यहाँ प्रस्तुत हैं-

उक्त लीलार लाल उषा सी बनी ठनी सी, 

मोहिनी यो सोहनी ललित लाल सारी है।

कांति के किरन को बिखेरती बिखेरती सी 

चली ताप दाप लै तिमिर तपहारी है।।

कोक लोक शोक से विशोक ओक से भरे 

ग्रीष्म दुपहरी त्रिषा मृगवारी है।

यौवन आगार भार बनी है उदार हार 

सुमन सी चेतना विराट रूपधारी है।।

मनहरन के अतिरिक्त सुमन ली ने दर्जनो सवैया छन्द लिखे हैं किन्तु भावो की आकुलता होते हुए भी शिल्प की शिथिलता से ये छन्द अत्यन्त शिथिल हो गये हैं। एक छन्द और प्रस्तुत है

रुप अमन्द चसै मकरन्द 

वे घूंघट के पट ओट लुकाई।

नैनन की अरुनी बरुनी 

झपै कपै नवलेह ढीठाई। 

चाह पराग विराग लिये 

अनुराग़ के राग में राग़ बसाई।

नेह निराश कबहूं करें 

ललना पलना मधुमास जो छाई।।

सुमन जी आधुनिक चरण के बहु चर्चित छंदकार हैं। अपने छन्दों से काव्य सृजन में भी हुए ये बड़े उल्लासी व्यक्ति हैं। भविष्य में इनके छन्दो में अच्छा निखार आयेगा और ये सहृदय समाज द्वारा अपने कृतित्व के अनुसार बहु प्रशंसित होंगे।

(लेखक भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण, में सहायक पुस्तकालय एवं सूचनाधिकारी पद से सेवामुक्त हुए हैं। वर्तमान समय में उत्तर प्रदेश के बस्ती नगर में निवास करते हुए सम सामयिक विषयों,साहित्य, इतिहास, पुरातत्व, संस्कृति और अध्यात्म पर अपना विचार व्यक्त करते रहते हैं। (मोबाइल नंबर +91 8630778321;)

(वॉर्ड्सऐप नम्बर+919412300183)

मध्यप्रदेश के चंदेरी में हुए जौहर की रोंगटे खड़े कर देने वाली दास्तान

29 जनवरी 1528: चंदेरी में बाबर का विध्वंस : 1500 क्षत्राणियों का जौहर

भारतीय इतिहास के कुछ पन्ने रक्त से ऐसी रंजित घटनाओं से भरे हैं जिनका विवरण आज भी रोंगटे खड़े देता है । ऐसा ही एक विवरण चंदेरी का है जहाँ लाशों के ढेर लगाकर आक्रांताओं ने अट्टास किया ।

मध्यप्रदेश में ग्वालियर संभाग के अंतर्गत अशोक नगर जिले में स्थित है। यह वही चंदेरी है जो पूरे संसार में अपनी साड़ियों की शिल्पकला के लिये प्रसिद्ध है । उन दिनों भी यह वस्त्र कला निर्माण ही नहीं व्यवसाय का भी एक बड़ा केन्द्र था । चंदेरी में यह विध्वंश मुगल हमलावर बाबर ने किया था । बाबर ने चंदेरी में केवल विध्वंस ही नहीं किया था बल्कि जिन सैनिकों और नागरिकों को जान बख्शी का आश्वासन देकर समर्पण कराया था उन सब बंदियों के शीश काटकर ऊँचा पहाड़ बनाया था। फिर कटे हुये असंख्य शीश के उस पहाड़ पर अपनी जीत का झंडा फहराया था ।  निर्दोष स्त्री बच्चों को पकड़ कर गुलाम बनाया था, अत्याचार किये थे और कुछ को गुलामों के बाजार में बेचने के लिये खुरासान भेज दिया था और इसी विध्वंस के बीच अपने स्वत्व की रक्षा केलिये महरानी मणिमाला ने 1500 क्षत्राणियों तथा अन्य स्त्रियों के साथ जौहर किया था। इस जौहर की स्मृति को एक स्मारक के रूप में चंदेरी किले में सहेज लिया गया है । इस स्मारक पर पहुँचते ही रोंगटे खड़े हो जाते हैं, शरीर में सिरहन भी पैदा होती हैं ।

यह युद्ध वर्ष 1528 जनवरी के अंतिम सप्ताह में हुआ था । किसी विश्वासघाती द्वारा चंदेरी दरबाजा खोलने की तिथि 28 और 29 जनवरी के बीच की रात है । रात भर वीरों का खून बहा, स्त्रियों की चिता जली,  इसलिये कुछ इतिहासकारों ने विध्वंस की तिथि 28 जनवरी मानी और कुछ ने 29 जनवरी 1528 माना ।

उन दिनों चंदेरी पर प्रतिहार वंशीय शासक मेदनीराय का शासन था । अंतराष्ट्रीय रेशम के व्यापार का बड़ा केन्द्र के रूप में भी चंदेरी की ख्याति रही है । मेदिनीराय अपनी सेना लेकर चितौड़ के शासक राणा साँगा की कमान में बाबर से युद्ध करने के लिये खानवा के मैदान में गये थे। चित्तौड से कुछ रिश्तेदारियाँ भी थीं। राणा साँगा मेदनीराय को पुत्रवत् मानते थे । दुर्योग से खानवा के युद्ध में राणाजी की पराजय हुई । इस युद्ध में राणा जी की हार के दो कारण रहे एक तो उनकी सेना में विश्वासघात और दूसरा बाबर ने अपने तोपखाने के आगे गायों को बाँध कर खड़ा कर दिया था । गायों को सामने देखकर राणाजी का तोपखाना रुक गया । बाबर की रणनीति काम आई । बाबर का तोपखाना गरज उठा और युद्ध का नक्शा ही बदल गया । राणा जी के घायल होकर निकल जाने के बाद बाबर ने अपनी जीत का जश्न मनाया । बाबर ने उन सभी राजपूत राजाओं के दमन का अभियान चलाया जो राणा साँगा की कमान में बाबर से युद्ध करने खानवा पहुँचे थे । इनमें मेदिनीराय का नाम प्रमुख था । खानवा युद्ध के बाद मेदिनी राय चंदेरी लौट आये और राणा जी के स्वस्थ होने की प्रतीक्षा करने लगे ।

चंदेरी अभियान के लिये बाबर 9 दिसम्बर 1527 को सीकरी से रवाना हुआ । इसकी खबर मेदिनी राय को लग लग गयी थी उन्होंने सहायता के लिये मालवा के अन्य राजाओं को संदेश भेजे और आवश्यक सामग्री एकत्र करके स्वयं को किले में सुरक्षित कर लिया था। चंदेरी का यह किला पहाड़ी पर बना है । इसकी गणना देश के अति सुरक्षित किलों में की जाती है । बाबर और उसकी फौज रास्ते भर लूट हत्याएँ और  बलात्कार करती हुई आगे बढ़ी और 20 जनवरी 1528 को चंदेरी पहुँची । बाबर ने रामनगर तालाब के पास अपना कैंप लगाया और दो संदेश वाहक शेख गुरेन और अरयास पठान को राजा मेदिनी राय के पास भेजा ।

संदेश वाहकों ने तीन संदेश दिये एक मुगलों की आधीनता स्वीकार करो और मुगलों के सूबेदार बनों दूसरा चंदेरी का किला खाली करदो इसके बदले कोई दूसरा किला ले लो और तीसरा रनिवास एवं मालखाने का पूर्ण समर्पण । स्वाभिमानी मेदनी राय ने शर्तों को अस्वीकार कर दिया । मेदिनी राय को लगता था कि बाबर की फौज पहाड़ी न चढ़ पायेगी । लेकिन बाबर के पास तोपखाना और बारूद का पर्याप्त भंडार था । उसने पहाड़ी काटकर रास्ता बना लिया था और किले के दरबाजे तक आ गया । दूसरी तरफ राजपूतों के पास न बारूद था न तोपखाना । उनके पास तीर कमान, तलवार, भाला या आग के गोलों के अतिरिक्त कुछ नहीं था । वह 26 जनवरी 1528 की तिथि थी जब समर्पण के लिये बाबर का अंतिम संदेश राजा मेदिनीराय को मिला ।

संदेश पाकर राजा ने रणभेरी बजाने का आदेश दिया । 27 जनवरी से युद्ध आरंभ हुआ पर मुगलों के तोपखाने के सामने राजपूत सेना कमजोर पड़ी । बाहर घेराबंदी भी तगड़ी थी ।  राजा घायल हो गये उन्हे किले के भीतर लाकर पुनः किले के द्वार बंद कर दिये गये । 28 जनवरी को दिन भर  बाबर का तोपखाना चंदेरी किले दीवार पर गरजता रहा । दीवार बुरी तरह क्षतिग्रस्त हो गयी थी । महारानी मणिमाला को भविष्य का अंदाजा हो गया । उन्होंने जौहर करने का निर्णय लिया । वे किले के भीतर विराजे महाशिव के मंदिर में चली गई । उनके साथ राज परिवार और किले एवं नगर की अन्य स्त्रियाँ भी थीं। जिनकी संख्या 1500 से अधिक लिखी है ।

सभी स्वाभिमानी स्त्रियों ने पहले शिव पूजन किया फिर स्वयं को अग्नि को समर्पित कर दिया । यह जौहर 28 और 29 जनवरी की मध्य रात्रि से आरंभ हुआ । जिस समय ये देवियाँ जौहर कर रहीं थी तभी किसी विश्वासघाती ने किले का दरबाजा खोल दिया । मुगलों की फौज भीतर आ गयी । किले के भीतर यूँ भी मातम जैसा माहौल था । जिसके हाथ में जो आया उससे मुकाबला करने लगा । पर यह  युद्ध नाममात्र का रहा । रातभर मारकाट हुई । हमलावरों ने किले के भीतर किसी पुरूष को जीवित न छोड़ा । जो स्त्रियाँ जीवित मिलीं उन्हें और बच्चों बंदी बना लिया गया । 29 जनवरी की सुबह बाबर ने किले में प्रवेश किया । जौहर की लपटें तेज थीं। चारों ओर लाशें बिखरी पड़ीं थीं । सारी लाशे एकत्र की गयीं । उनके के शीश काटे गये, सिरों का ढेर लगाया गया और उस पर मुगलों का ध्वज फहराया गया । बाबर चंदेरी में पन्द्रह दिन रुका । किले में खजाना खोजा गया । आसपास जहाँ तक बन पड़ा लूटपाट की गयी । लाशों के ढेर किले और नगर में ही नहीं गांवो में भी लगे । मकानों को ध्वस्त किया गया । यातनायें देकर छुपा हुआ धन वसूला गया । अपने एक जमादार अय्यूब खान को चंदेरी का सूबेदार बनाकर बाबर लौट गया

(इस युद्ध और जौहर का वर्णन लेखक देवी सिंह  ने “प्रतिहारों का इतिहास” पुस्तक में विस्तार से है । जबकि युद्ध वर्णन ग्वालियर और गुना जिले के गजट में भी है । चंदेरी में जौहर स्थल भी बना है वहां महिलाएं पूजन करने भी जातीं हैं)

राज्य स्तरीय शृंगार निबंध एवं कविता प्रतियोगिता के परिणाम घोषित

कोटा  / संस्कृति ,साहित्य,मीडिया फोरम, कोटा की ओर से आयोजित राज्य स्तरीय साहित्य, चित्रकला और मूर्तिकला में शृंगार विषय पर आयोजित निबंध एवं कविता प्रतियोगिता के परिणाम घोषित किए गए है। संयोजक डॉ. प्रभात कुमार सिंघल ने बताया कि इस प्रतियोगिता में 36 प्रतिभागियों ने भाग लिया।
 शृंगार निबंध  प्रतियोगिता में  झालावाड़ के इतिहासविद ललित शर्मा और रूपजी रूप घाटोली संयुक्त रूप से प्रथम  कोटा की नेहा प्रधान और अर्चना शर्मा संयुक्त रूप से द्वितीय तथा जयपुर की अक्षय लता शर्मा, कोटा की रीता गुप्ता एवं अल्पना गर्ग संयुक्त रूप से तृतीय रहे। शृंगार में कविता प्रतियोगिता में कोटा की डॉ. वैदेही गौतम एवं डॉ. कृष्णा कुमारी संयुक्त रूप से प्रथम, डॉ. अपर्णा पांडेय एवं जयपुर की अक्षयलता शर्मा  संयुक्त रूप से द्वितीय तथा हनुमानगढ़ के दीनदयाल शर्मा, हनुमानगढ एवं पिड़ावा झालावाड़ की तितिक्षा गुप्ता संयुक्त रूप से तृतीय रहे ।

नराकास दक्षिण दिल्ली-03 के ‘राजभाषा सम्मेलन’ का आयोजन 14 फरवरी को

नई दिल्ली नगर राजभाषा कार्यान्वयन समिति (नराकास) दक्षिण दिल्ली-03 द्वारा 14 फरवरी, 2025 को पांचवें राजभाषा सम्मेलन का आयोजन किया जाएगा। प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी की प्रेरणा और गृह एवं सहकारिता मंत्री श्री अमित शाह जी के कुशल मार्गदर्शन में गृह मंत्रालय के राजभाषा विभाग के अंतर्गत आने वाली नगर राजभाषा कार्यान्वयन समिति दक्षिण दिल्ली-03 द्वारा 2021 से हर वर्ष राजभाषा सम्मेलन का आयोजन किया जा रहा है।

भारतीय जन संचार संस्थान, नगर राजभाषा कार्यान्वयन समिति (नराकास) दक्षिण दिल्ली-03 का अध्यक्ष कार्यालय है, जिसके अंतर्गत जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू), भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी, दिल्ली), राष्ट्रीय फैशन प्रौद्योगिकी संस्थान (निफ्ट), भारतीय विदेश व्यापार संस्थान (आईआईएफटी), राष्ट्रीय आपदा मोचन बल (एनडीआरएफ), केंद्रीय विद्यालय संगठन, सेबी आदि जैसे 90 सदस्य कार्यालय आते हैं। नराकास दक्षिण दिल्ली-03 और उसके सदस्य कार्यालय समय-समय पर राजभाषा सम्मेलन, संगोष्ठियों और प्रतियोगिताओं के माध्यम से सरकारी कामकाज में राजभाषा हिंदी के प्रति जागरुकता पैदा करने और उसके प्रयोग में गति लाने हेतु प्रति‍बद्ध हैं।

नराकास दक्षिण दिल्ली-03 के सदस्य सचिव श्री अंकुर विजयवर्गीय ने राजभाषा सम्मेलन के बारे में जानकारी देते हुए बताया कि इस वर्ष नराकास अध्यक्ष कार्यालय भारतीय जन संचार संस्थान और छह सदस्य कार्यालय 1) केंद्रीय होम्योपैथी अनुसंधान परिषद 2) कार्यालय मुख्य अभियंता सह कार्यकारी निदेशक, केंद्रीय लोक निर्माण विभाग, आई.आई.टी. दिल्ली 3) भारतीय राष्ट्रीय उपभोक्ता सहकारी संघ मर्यादित 4) केंद्रीय यूनानी चिकित्सा अनुसंधान परिषद 5) राष्ट्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण संस्थान एवं 6) कृषि और प्रसंस्कृत खाद्य उत्पाद निर्यात विकास प्राधिकरण द्वारा संयुक्त रुप से राजभाषा सम्मेलन का आयोजन किया जा रहा है। सम्मेलन में 90 सदस्य कार्यालयों के लगभग 200 अधिकारी शामिल होंगे।

श्री विजयवर्गीय ने बताया कि सम्मेलन चार सत्रों में होगा। शुभारंभ सत्र में केंद्रीय हिंदी निदेशालय के निदेशक प्रो. सुनील बाबुराव कुलकर्णी, नराकास अध्यक्ष एवं भारतीय जन संचार संस्थान की कुलपति डॉ. अनुपमा भटनागर, भारतीय राष्ट्रीय उपभोक्ता सहकारी संघ मर्यादित की प्रबंध निदेशक श्रीमती एनिस जोसेफ चंद्रा, कृषि और प्रसंस्कृत खाद्य उत्पाद निर्यात विकास प्राधिकरण के सचिव डॉ. सुधांशु एवं राष्ट्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण संस्थान के निदेशक प्रो. धीरज शाह अतिथि के रूप में हिस्सा लेंगे। ‘राजभाषा हिंदी के कार्यान्वयन में नराकास का योगदान’ विषय पर आयोजित सत्र को केंद्रीय होम्योपैथी अनुसंधान परिषद के महानिदेशक डॉ. सुभाष कौशिक, केंद्रीय यूनानी चिकित्सा अनुसंधान परिषद के महानिदेशक डॉ. एन जहीर अहमद, आई.आई.टी. दिल्ली परियोजना अंचल, केंद्रीय लोक निर्माण विभाग के कार्यकारी निदेशक श्री राजेश कुमार और भारतीय जन संचार संस्थान सह आचार्य डॉ. पवन कौंडल संबोधित करेंगे।

सम्मेलन में ‘मीडिया, सिनेमा और हिंदी’ पर भी एक विशेष सत्र का आयोजन किया जाएगा, जिसमें राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय के निदेशक श्री चितरंजन त्रिपाठी, एबीपी न्यूज के कार्यकारी संपादक श्री श्रीवर्धन त्रिवेदी एवं राष्ट्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण संस्थान में आचार्य प्रो. अंकुर यादव अतिथि के रूप में हिस्सा लेंगे। कार्यक्रम का समापन कवि सम्मेलन से होगा, जहां प्रो. जितेंद्र श्रीवास्तव, डॉ कीर्ति काले, श्री ओम प्रकाश कल्याणे, श्री अरविंद पथिक और डॉ. गणेश शंकर श्रीवास्तव अपनी कविताएं प्रस्तुत करेंगे।

श्री विजयवर्गीय ने कहा कि पांचवें राजभाषा सम्मेलन का आयोजन इस मायने में भी विशेष है, क्योंकि यह आयोजन हिंदी के राजभाषा बनने के 75 वर्ष पूरे होने के उपलक्ष्य में हीरक जयंती के रूप में आयोजित किया जा रहा है। हिंदी के राजभाषा बनने की 75 वर्ष की यात्रा ने न केवल कई महत्वपूर्ण पड़ाव पार किए हैं, बल्कि तकनीक के क्षेत्र में उत्तरोत्तर प्रगति भी की है।

गणतंत्र दिवस परेड की झाँकियों में किसने बाजी मारी

गणतंत्र दिवस परेड 2025 के सर्वश्रेष्ठ मार्चिंग दस्तों और झांकियों के परिणाम घोषित कर दिए गए हैं। सेवाओं और केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बलों (सीएपीएफ)/अन्य सहायक बलों के मार्चिंग दस्तों और विभिन्न राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों (यूटी) और केंद्र सरकार के मंत्रालयों/विभागों की झांकियों के प्रदर्शन का आकलन करने के लिए जजों के तीन पैनल गठित किए गए थे। पैनल ने निम्नलिखित परिणाम घोषित किए हैं:

  • सेवाओं में सर्वश्रेष्ठ मार्चिंग टुकड़ी – जम्मू और कश्मीर राइफल्स दल
  • सीएपीएफ/अन्य सहायक बलों में सर्वश्रेष्ठ मार्चिंग दस्ता – दिल्ली पुलिस मार्चिंग दल

शीर्ष तीन झांकियां (राज्य/संघ राज्य क्षेत्र)

  • प्रथम – उत्तर प्रदेश (महाकुंभ2025 – स्वर्णिम भारत: विरासत और विकास)
  • दूसरा –  त्रिपुरा (शाश्वत श्रद्धा: त्रिपुरा में 14 देवताओं की पूजा-खर्ची पूजा)
  • तीसरा – आंध्र प्रदेश (एटिकोप्पका बोम्मलु-पर्यावरण-अनुकूल लकड़ी के खिलौने)
  • केंद्रीय मंत्रालयों/विभागों की सर्वश्रेष्ठ झांकी
  • जनजातीय कार्य मंत्रालय (जनजातीय गौरव वर्ष)
  • विशेष पुरस्कार :
    1.  केंद्रीय लोक निर्माण विभाग (भारतीय संविधान के 75 वर्ष)
    2. ‘जयति जय ममः भारतम्’ डांस ग्रुप

 

इसके अलावा, 26 से 28 जनवरी, 2025 तक माई गोव पोर्टल पर नागरिकों से उनकी पसंदीदा झांकी और मार्चिंग टुकड़ियों को ‘लोकप्रिय पसंद श्रेणी’ के रूप में वोट देने के लिए एक ऑनलाइन पोल आयोजित किया गया था। परिणाम इस प्रकार हैं:

  • सेवाओं में सर्वश्रेष्ठ मार्चिंग टुकड़ी – सिग्नल टुकड़ी
  • सीएपीएफ/अन्य सहायक बलों में सर्वश्रेष्ठ मार्चिंग दस्ता – सीआरपीएफ मार्चिंग दल
  • शीर्ष तीन झांकियां (राज्य/संघ राज्य क्षेत्र)
  • प्रथम – गुजरात (स्वर्णिम भारतविरासत और विकास)
  • दूसरा – उत्तर प्रदेश (महाकुंभ 2025 – स्वर्णिम भारत: विरासत और विकास)
  • तीसरा – उत्तराखंड (उत्तराखंड: सांस्कृतिक विरासत और साहसिक खेल)

 

इतिहास का छिपा सच-इन पुस्तकों में है

लखनऊ का चर्चित छोटा और बड़ा इमामबाड़ा वक्फ बोर्ड की संपत्ति नहीं है। ये दावा लखनऊ में मंगलवार को जेपीसी की बैठक में राज्य सरकार ने किया है.

उत्तर प्रदेश सरकार ने प्रदेश के सभी जिलों में वक्फ बोर्ड के दावे वाली संपत्तियों का जो सर्वे कराया है, उसमें चौंकाने वाली जानकारी सामने आई हैं. इसमें लखनऊ का छोटा और बड़ा इमामबाड़ा भी है. इन संपत्तियों की कीमत भी सैकड़ों करोड़ रुपये में है. सर्वे में सरकार ने इन दोनों संपत्तियों पर अपना बताकर वक्फ बोर्ड का दावा खारिज कर दिया है.

वक्फ के नाम पर सम्पत्ति पर अनावश्यक अधिकार जताया जा रहा है। ऐतिहासिक भवनो में एक बात सामान्य है। ये सभी पहले बने हुए थे। इन्हें अपवित्र करके इन्हें मस्जिद बना दिया गया। इतिहास विश्लेषक श्री पुरुषोत्तम नागेश ओक जी ने आज से लगभग 60 साल पहले इस पर लिखा था। उस समय उनकी बातों पर ध्यान नहीं दिया गया। सीमित संसाधनों में भी उन्होंने उच्च कोटि का कार्य किया।

उनकी पुस्तके आज भी अप्रतिम है।

1- आगरे का लाल किला हिन्दू भवन है। ₹125
2- ताजमहल तेजोमहालय है। ₹50
3- ताजमहल मन्दिर भवन है।
₹200
4- दिल्ली का लाल किला लाल कोट है। ₹95
5- लखनऊ के इमामबाड़े। ₹ 80
6- फतेहपुर सीकरी एक हिन्दू नगर। ₹125
7- क्या भारत का इतिहास भारत के शत्रुओं ने लिखा है? ₹50

सभी 7 पुस्तकें। ₹750 (डाक खर्च सहित)। मंगवाने के लिए 7015591564 पर वट्सएप द्वारा सम्पर्क करें।