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हिंदी भाषा, संस्कृति, परिवेश को संजोने के लिए एक जुट हो कर कार्य करना होगा

कोटा । आज हिंदी भाषा, हमारी संस्कृति और हमारे परिवेश को संजोने की महत्ती आवश्यकता है। इसके लिए हम समस्त भारतवासियों को एकजुट होकर कार्य करना पड़ेगा। यह विचार उत्तर प्रदेश सरकार के पूर्व राज्य मंत्री रविकांत गर्ग ने व्यक्त किए। वे नाथद्वारा में आयोजित भगवती प्रसाद देवपुरा स्मृति बाल साहित्य सम्मान समारोह के दूसरे दिन मुख्य अतिथि के रूप में संबोधित कर रहे थे। उन्होंने हिंदी भाषा के विकास के सेनानी श्री भगवती प्रसाद को स्मरण करते हुए कहा  कि आज यदि हमारी भाषा जीवित रही तो हमारी संस्कृति भी जीवित रह सकेगी अन्यथा हम अपने लक्ष्य से भटक जाएंगे। उन्होंने हिंदी भाषा सेवियों को सम्मानित करते हुए कहा  कि आज हिंदी भाषा के साहित्यकार एवं विद्वानों को हिंदी के प्रति पूर्ण समर्पण रखना चाहिए। उन्हें हिंदी के विकास के लिए साहित्यकारों को कुछ इस तरह की सृजन करना चाहिए कि जिससे हिंदी का पाठक वर्ग समृद्ध हो।
कार्यक्रम के अध्यक्ष पंजाब चंडीगढ़ के वरिष्ठ साहित्यकार डॉ. अमर सिंह बधान ने कहा  कि साहित्य मंडल का प्रयास स्तुत्य है। हिंदी भाषा एवं हिंदी भाषा विदों और साहित्य सेवियों के लिए साहित्य मंडल प्रारंभ से ही समर्पित रहा है एवं आगे भी समर्पित रहेगा। दिल्ली के साहित्यकार डॉ. राहुल, उदयपुर  डॉ. जयप्रकाश शाकद्वीपीय, श्रीमती संतोष रिचा, जबलपुर की रचनाकार डॉ. गीत गीत ने बाबूजी स्मृति प्रसंग से बाबूजी के हिंदी विकास के प्रयासों की चर्चा कर उनके अध्यात्म और दर्शन पर प्रकाश डालते हुए अपने आलेख पत्र प्रस्तुत किए। गुना के महेश बोर , कोटा के रामेश्वर प्रसाद रामू भैया और राया मथुरा के अंजीव अंजुम ने अपनी काव्यात्मक  श्रद्धांजलि अर्पित की।
इस अवसर पर पूर्व मंत्री  रविकांत गर्ग का अभिनंदन पत्र, शॉल, माला, उत्तरीय, श्रीफल, मेवाड़ी पगड़ी एवं श्रीनाथजी की छवि के साथ अभिनंदन किया गया। डॉ. फारुख आफरीदी जयपुर, राजेश भारती कैथल एवं डॉ . सुशीला जोशी कोटा को श्री पुरुषोत्तम पालीवाल स्मृति सम्मान, डॉ. भेरुलाल गर्ग भीलवाड़ा को श्रीमती पुष्पा देवी दुग्गड़ स्मृति सम्मान, श्रीमती वंदना यादव दिल्ली को श्री मोतीलाल प्रजापति स्मृति सम्मान, श्री अजय कुमार अनुरागी जयपुर को श्री श्याम सुंदर नागला स्मृति सम्मान, डॉ. दिनेश प्रसाद शाह दरभंगा को श्री बालकृष्ण अग्रवाल स्मृति सम्मान, डॉ गीता गीत को श्रीमती उर्मिला देवी अग्रवाल स्मृति सम्मान, डॉ अलका पांडे मुंबई को श्रीमती कमला देवी पुरोहित स्मृति सम्मान, श्री घनश्याम मैथिल अमित को श्री चमन लाल सिंघल स्मृति सम्मान, डॉ मंजू गुप्ता नवी मुंबई को श्रीमती सुमन लता सिंघल स्मृति सम्मान , डॉ. अजय शर्मा जालंधर को श्रीमती आशा शर्मा स्मृति सम्मान एवं श्री सत्येंद्र छब्बर जोधपुर, डॉ. ओमप्रकाश कादयान हिसार, डॉ. नीरू मित्तल नीर पंचकूला, श्रीमती इंदिरा त्रिवेदी भोपाल, श्रीमती नीता सोलंकी भोपाल, श्रीमती  योगिता जोशी जयपुर को  पुरुषोत्तम पालीवाल स्मृति सम्मान से सम्मानित किया गया।
समारोह में राया मथुरा की श्रीमती संतोष ऋचा ने बाल कहानियों में नैतिक मूल्य और भरतपुर के नरेंद्र निर्मल ने बाल कहानियां संस्कृति के संदर्भ में विषयों पर आलेख पत्रों का वाचन किया। समारोह में बीस साहित्यकारों की कृतियों का अतिथियों द्वारा लोकार्पण किया गया। कार्यक्रम की शुरुआत वरिष्ठ कवि एवं व्यंग्यकार श्री सुरेंद्र सार्थक ने सरस्वती वंदना से की है। श्रीनाथ वंदना मथुरा के साहित्यकार अंजीव अंजुम द्वारा की गई। कार्यक्रम का संचालन साहित्य मण्डल, प्रधानमंत्री श्री श्याम प्रकाश देवपुरा ने किया। कार्यक्रम में साहित्यकारों का गद्य एवं पद्य परिचय अंजीव अंजुम द्वारा किया गया।
इस अवसर पर आयोजित कवि सम्मेलन की अध्यक्षता कोटा के साहित्यकार रामेश्वर शर्मा रामू भैया ने की। कोटा के कवि महेश पंचोली ने अपनी आध्यात्मिक काव्य पाठ से कवि सम्मेलन की उत्साहवर्धक शुरुआत की। योगीराज योगी कोटा , मंजू गुप्ता ऋषिकेश, महेश पंवार गुनाडा.मनीषा गिरी दिल्ली, सुमन जी मथुरा,हेमराज हेम कोटा, वर्षा सिंह दिल्ली, देवकी दर्पण रोटेदा, पवन तिवारी मुम्बई, सुशीला जोशी कोटा, राजैन्द्र मोहन शर्मा जयपुर एवं डाॅ.आरती वर्मा कानपुर ने काव्य पाठ कर कवि सम्मेलन को ऊंचाइयाँ प्रदान की। संचालन डॉ. प्रभात कुमार सिंघल ने किया।

आधुनिक भवन निर्माण में वैदिक सिद्धांतों का प्रयोग

वर्तमान युग में भवन निर्माण केवल एक तकनीकी प्रक्रिया न होकर, मानवीय संवेदना, पर्यावरणीय संतुलन और आध्यात्मिक ऊर्जा का भी समन्वय बन चुका है। भारत की वैदिक परंपरा में स्थापत्य कला को दिव्य विज्ञान के रूप में स्वीकार किया गया है। इसमें दिशा, स्थान, ऊर्जा प्रवाह, पंचमहाभूत, सूर्य गति, जल निकास तथा मानवीय चेतना को ध्यान में रखकर निर्माण की संपूर्ण प्रणाली विकसित की गई थी। आज जब आधुनिक स्थापत्य (Modern Architecture) तकनीकी प्रगति, स्मार्ट कंस्ट्रक्शन (Smart Construction) और ऊर्जा दक्षता (Energy Efficiency) की दिशा में अग्रसर है, तब वैदिक स्थापत्य के सिद्धांत पुन: प्रासंगिक हो उठे हैं। यह लेख वैदिक स्थापत्य के दार्शनिक आधार, वैज्ञानिक तर्क, तथा आधुनिक भवन निर्माण में उनके प्रयोग का समग्र विश्लेषण प्रस्तुत करता है।

भवन केवल ईंट, पत्थर और कंक्रीट का ढांचा नहीं, बल्कि वह जीवंत ऊर्जा-क्षेत्र है, जहाँ मानव जीवन और प्रकृति का संवाद होता है। वैदिक ऋषियों ने ‘वास्तु’ को जीवित ब्रह्मांडीय योजना माना, जो पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश— इन पंचमहाभूतों के संतुलन पर आधारित है। “यत्र ब्रह्माण्डे तत् पिण्डे” — इस वैदिक वाक्य के अनुसार प्रत्येक भवन ब्रह्मांड का लघु रूप है। इसलिए स्थापत्य का उद्देश्य केवल निवास नहीं, बल्कि धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष—इन चार पुरुषार्थों का सामंजस्य स्थापित करना है। आधुनिक काल में भवन निर्माण मुख्यत: उपयोगिता, तकनीक और लागत-कुशलता पर केंद्रित हो गया है। किंतु ऊर्जा संकट, जलवायु परिवर्तन और मानसिक असंतुलन जैसी समस्याएँ यह संकेत देती हैं कि हमें पुन: अपने वैदिक स्थापत्य मूल्यों की ओर लौटने की आवश्यकता है।

वैदिक स्थापत्य के मूल सिद्धांत पंचमहाभूतों के संतुलन, दिशाओं की ऊर्जा और ब्रह्म स्थान की अवधारणा पर आधारित हैं। भवन निर्माण का आधार पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश — इन पाँच तत्वों के सामंजस्य में निहित है। पृथ्वी से स्थायित्व और स्थिरता प्राप्त होती है, जल से शीतलता और जीवन का प्रवाह, अग्नि से ऊर्जा और रूपांतरण की शक्ति, वायु से प्राणवायु और स्वास्थ्य तथा आकाश से विस्तार और चेतना का अनुभव होता है। वास्तु शास्त्र इन्हीं पंचतत्वों को दिशा और स्थान के अनुसार व्यवस्थित करने का विज्ञान है। दिशाओं के संदर्भ में वैदिक स्थापत्य यह मानता है कि प्रत्येक दिशा विशेष प्रकार की ऊर्जा वहन करती है — पूर्व दिशा सूर्य ऊर्जा और आध्यात्मिकता की प्रतीक है, उत्तर दिशा समृद्धि और जल प्रवाह का संकेत देती है, दक्षिण दिशा स्थायित्व और शक्ति की धुरी है, जबकि पश्चिम दिशा परिवर्तन और परिणाम की दिशा मानी जाती है। इन दिशाओं के अनुरूप भवन की योजना बनाने से ऊर्जा प्रवाह संतुलित रहता है। वैदिक स्थापत्य में भवन का केंद्र ब्रह्मस्थान कहलाता है, जो ऊर्जा-संचार का केंद्र होता है; इसे सदैव खुला, प्रकाशयुक्त और शांत रखना चाहिए। आधुनिक वास्तु-रूपांकन में भी केंद्रीय खुला आंगन या आत्रियम की अवधारणा इसी ब्रह्मस्थान सिद्धांत से प्रेरित है, जिससे भवन में प्राकृतिक प्रकाश, वायु प्रवाह और सकारात्मक ऊर्जा का संचार बना रहता है।

आधुनिक स्थापत्य या आधुनिक वास्तुकला 20वीं सदी के औद्योगिक और तकनीकी युग का परिणाम है, जिसमें निर्माण कला ने वैज्ञानिकता, गति और दक्षता का समन्वय किया। इसमें प्रबलित सीमेंट कंक्रीट संरचना, इस्पात ढांचा, बुद्धिमान निर्माण सामग्री, भवन सूचना नमूनीकरण प्रणाली तथा डिजिटल युग्म तकनीक जैसी उन्नत प्रणालियाँ प्रमुख भूमिका निभा रही हैं। इन तकनीकों का उद्देश्य निर्माण की तीव्रता, लागत में कुशलता और कार्य में सटीकता को बढ़ाना है। किंतु इन वैज्ञानिक नवाचारों के साथ-साथ हरित भवन आंदोलन और सतत स्थापत्य की अवधारणाओं ने यह सिद्ध किया है कि तकनीकी उन्नति तभी सार्थक है जब वह प्रकृति के साथ सामंजस्य स्थापित करे। इस दृष्टि से वैदिक स्थापत्य की अवधारणाएँ आधुनिक स्थापत्य को न केवल एक पर्यावरणीय और ऊर्जा-कुशल दिशा प्रदान करती हैं, बल्कि उसे आध्यात्मिक गहराई भी देती हैं, जिससे निर्माण कार्य मात्र भौतिक विकास न होकर जीवन और प्रकृति के संतुलन का प्रतीक बन जाता है।

आधुनिक स्थापत्य में वैदिक सिद्धांतों का समन्वय ऊर्जा, दिशा और तत्वों के संतुलन के माध्यम से स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है। आधुनिक वास्तुकार इमारतों को सौर अभिमुखता के अनुसार इस प्रकार रूपांकित करते हैं कि प्राकृतिक प्रकाश और वायु संचार अधिकतम हो सके, जो वैदिक वास्तु में ‘पूर्वाभिमुख भवन’ के सिद्धांत का ही आधुनिक रूप है। पंचमहाभूतों के संतुलन को ध्यान में रखते हुए जल तत्व के लिए वर्षा जल संचयन प्रणाली, वायु तत्व के लिए प्राकृतिक वायु संचार व्यवस्था, अग्नि तत्व के लिए सौर ऊर्जा प्रणाली, पृथ्वी तत्व के लिए हरित छत और प्रांगण उद्यान, तथा आकाश तत्व के लिए खुले आकाश द्वार और प्रकाश द्वार का समावेश किया जाता है। ये सभी तत्व वैदिक स्थापत्य के वैज्ञानिक रूप हैं, जिनमें प्रकृति और ऊर्जा का संतुलन साधा गया है। आधुनिक भवनों में केंद्रीय प्रांगण सिद्धांत अथवा केंद्रीय प्रकाश नलिका की व्यवस्था की जाती है, जिससे प्राकृतिक प्रकाश और वायु के प्रवाह में वृद्धि होती है; यह प्रत्यक्ष रूप से वैदिक स्थापत्य के ब्रह्मस्थान सिद्धांत का अनुप्रयोग है, जिसमें भवन के केंद्र को ऊर्जा-संचार का केंद्र माना गया है। वैदिक वास्तु में यह बल दिया गया है कि प्राकृतिक शक्तियों के प्रवाह में न्यूनतम अवरोध होना चाहिए, और यही विचार आज की निष्क्रिय शीतलन प्रणाली तथा ऊर्जा दक्ष रूपांकन की मूल प्रेरणा है। अनेक भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान तथा स्थापत्य संस्थान अब पुन: इन पारंपरिक तकनीकों जैसे मिट्टी की दीवारें, जल निकाय और प्राकृतिक वायु संचार के उपयोग को प्रोत्साहित कर रहे हैं, जिससे वैदिक स्थापत्य का वैज्ञानिक और पर्यावरणीय महत्व पुन: स्थापित हो रहा है।

वैदिक स्थापत्य केवल भवन निर्माण का विज्ञान नहीं, बल्कि सामाजिक चेतना और मानवीय संस्कृति के निर्माण की प्रक्रिया भी है। गृह, ग्राम, नगर और देवालय—इन चारों स्तरों के नियोजन में सामूहिकता और धर्माधारित जीवनशैली का दर्शन निहित था। आधुनिक नगर नियोजन में जब हम बुद्धिमान नगरों या स्मार्ट शहरों की बात करते हैं, तो उसमें भी वही भाव छिपा है— संतुलित यातायात व्यवस्था, हरित क्षेत्र और जन सुविधाओं का समुचित समन्वय। वास्तु शास्त्र का आदर्श वाक्य ”सर्वे भवन्तु सुखिन:” इसी विचार को मूर्त रूप देता है कि निर्माण केवल भौतिक संरचना न होकर ऐसा हो जो समाज के सामूहिक कल्याण, पर्यावरणीय संतुलन और आध्यात्मिक उन्नति का साधन बने।

भारत में अनेक आधुनिक भवन ऐसे हैं जहाँ वैदिक स्थापत्य के सिद्धांतों को व्यवहार में अपनाया गया है। भारतीय अंतरराष्ट्रीय केंद्र, नई दिल्ली में केंद्रीय प्रांगण और जलाशय का सुंदर संयोजन किया गया है, जो ऊर्जा और शीतलता संतुलन का प्रतीक है। भारतीय प्रबंध संस्थान, बेंगलुरु का वास्तु विन्यास दक्षिण भारतीय मंदिर स्थापत्य से प्रेरित खुले प्रांगणों पर आधारित है। भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन, अहमदाबाद का कार्यालय भवन सूर्य ऊर्जा आधारित वास्तु योजना का उत्कृष्ट उदाहरण प्रस्तुत करता है। वहीं टाटा परामर्श सेवा का हरित परिसर, हैदराबाद ऊर्जा दक्षता और दिशा-आधारित रूपांकन के सिद्धांतों का सजीव प्रमाण है। इन भवनों में प्राकृतिक प्रकाश, वायु प्रवाह और सौर ऊर्जा के उपयोग को वैदिक सिद्धांतों के अनुरूप व्यवस्थित किया गया है। इसके अतिरिक्त भारत के अनेक पर्यावरणीय ग्राम, ध्यान केंद्र और आयुर्वेदिक विश्रांति स्थल भी ऐसे हैं जहाँ वैदिक स्थापत्य को आधुनिक तकनीकों के साथ पुन: अपनाया जा रहा है, जिससे भारतीय स्थापत्य परंपरा और समकालीन तकनीक का सुंदर समन्वय स्थापित हो रहा है।

आधुनिक स्थापत्य यदि केवल तकनीकी दृष्टि से आगे बढ़ेगा तो वह अपनी जीवंतता खो देगा। वैदिक स्थापत्य हमें यह सिखाता है कि भवन निर्माण केवल निर्माण कार्य नहीं, बल्कि यह एक साधना है— मानव और प्रकृति के मध्य समरसता का सेतु। वैदिक सिद्धांत भवन को ऊर्जा-संतुलित, पर्यावरण-मित्र और मानव-केंद्रित बनाते हैं, जबकि आधुनिक तकनीक इन सिद्धांतों को वैज्ञानिक और स्थायी रूप में लागू करने में सहायक हैं। वास्तु शास्त्र, हरित स्थापत्य और बुद्धिमान निर्माण प्रणाली— ये तीनों मिलकर भविष्य की सतत सभ्यता का आधार बन सकते हैं। स्थापत्य शिक्षा में वैदिक वास्तु शास्त्र का समावेश किया जाना चाहिए, सरकारी भवनों में सौर-वास्तु आधारित रूपांकन को बढ़ावा देना चाहिए तथा ग्रामीण आवास में प्राकृतिक निर्माण सामग्री और स्थानीय वास्तु सिद्धांतों का पुनरुद्धार किया जाना चाहिए। साथ ही, ‘वैदिक बुद्धिमान स्थापत्य अभियान’ जैसी पहलों के माध्यम से भारत को पुन: स्थापत्य नेतृत्व प्रदान करना चाहिए। वस्तुत: वास्तु केवल ईंट-पत्थर का विज्ञान नहीं, यह जीवन की लय है। जब आधुनिक स्थापत्य और वैदिक स्थापत्य का संगम होता है, तब निर्माण ”भवन” नहीं बल्कि ”आलय” बन जाता है, जहाँ केवल मनुष्य नहीं, बल्कि प्रकृति, देवत्व और चेतना भी निवास करती है।

( लेखक  सम्राट अशोक अभियांत्रिकी संस्थान, विदिशा में वरिष्ठ प्राध्यापक एवं पूर्व निदेशक हैं)
साभार- https://www.bhartiyadharohar.com/ से

एक जमानत पर सुप्रीम कोर्ट का निर्णय और देश विरोधी गैंग सक्रिय

माननीय सुप्रीमकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण निर्णय में फरवरी  2020 में  उत्तर- पूर्वी दिल्ली में हुए दंगों के मुख्य आरोपी उमर खालिद और शरजील इमाम की जमानत याचिका खारिज कर दी। इन दंगों में 53 लोग मारे गए थे और 700 से अधिक घायल हुए थे। इसी केस में उमर और शरजील के 5 साथियों को 12 कड़ी शर्तो के साथ जमानत मिल गई है। सुप्रीम कोर्ट ने उमर और  शरजील इमाम पर कड़ी टिप्पणियां करी हैं । अब ये दोनों अभियुक्त आने वाले एक साल में  जमानत के लिए अपील भी नहीं कर पाएंगे।

फरवरी  2020 के दिल्ली दंगे अत्यंत वीभत्स दंगो में से एक थे। इस दंगे में मारे गए 53 निर्दोष लोगों में एक युवा आईबी अधिकारी अंकित शर्मा, पौढ़ी  गढ़वाल से पांच महीने पहले आया गरीब माता का बेटा दिलबर नेगी  और दो पुलिस कर्मी भी शामिल थे। ऐसे कुख्यात दंगों के अपराधियों को जमानत न मिलने पर सर्व साधारण में संतोष का भाव है किन्तु कुछ लोग इस पर भी तुष्टीकरण की रोटियां सेंकते हुए उमर खालिद और शरजील इमाम के लिए न केवल आंसू बहा रहे हैं वरन अनर्गल प्रलाप भी कर रहे हैं ।

शरजील इमाम केवल दिल्ली दंगों का ही अपराधी नहीं है वरन चिकन नेक तोड़कर पूर्वोत्तर भारत को देश से अलग करने कि बात करने वाला देशद्रोही है । शरजील इमाम भारत को खंड -खंड मे विभाजित देखना चाहता हैं। भारत के जो  विपक्षी दलो ने प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से उमर खालिद और शरजील इमाम को जमानत ण मिलने पर उसको सांप्रदायिक रंग दे रहे हैं क्या वे इन विचारों से सहमत हैं?

दरअसल उमर व शरजील के साथ खड़े लोग अपनी कुंठा और  हताशा को ही जगजाहिर कर रहे हैं। इस  कुंठित टोली मे कोई जमानत न मिलने को  कायरता पूर्ण कार्रवाई कह रहा है तो कोई इसे बेतुका बता रहा है जबकि कोई इसे अत्याचार बता रहा है । एक ने तो सारी लज्जा त्यागते हुए इसे लोकतंत्र के लिए काला दिन बता दिया। एक व्यक्ति ने कहा कि 5 साल से अधिक बिना किसी दोष साबित हुए जेल में रखना  बर्बरता बता दिया। यह बात भारतीय जनमानस के समझने योग्य है कि इन सेक्युलर नेताओं को सुप्रीम कोर्ट का फैसला बर्बर लग रहा है। अमेरिकी अब्राहम लिंकन ने एक बार कहा था कि जो अदालतों के अधिकार  व उनके फैसलों को नकारता है  वह राष्ट्र की नींव को नकारता है ।

इस तुष्टीकरण गैंग से पूछा जाना चाहिए कि आज देश में 4 लाख 34 हजार 302 विचाराधीन कैदी हैं जो सजा पाए बिना जेल में बंद हैं। करीब 26 हजार ऐसे कैदी हैं जो 3 से 5 साल तक जेल में बंद हैं और करीब साढ़े 11 हजार ऐसे कैदी हैं जो 5 वर्षों से अधिक समय से जेल  में बंद हैं ।  यह आंकड़े  केवल 2020 तक के ही हैं । इंडिया  जस्टिस रिपोर्ट- 2025 के अनुसार यह आंकड़ा और भी बढ़ सकता है। इसमें भी अधिकांश बंदी जन गरीब, दलित अल्पसंख्यक व महिला समाज के हैं । इन कैदियों के लिए टुकड़े टुकड़े गैंग के समर्थकों का   मन कभी नहीं छटपटाता है। यह लोग उन उमर खलिद और शरजील इमाम के लिए रो रहे हैं जिनकी जमानत के फैसले से पूर्व ही न्यूयार्क के मेयर ममदानी का एक आपत्तिजनक पत्र सार्वजनिक हो गया था। ममदानी के पत्र से पता चलता है कि भारत के खिलाफ कितनी गहरी साजिशें रची जा रही हैं। यूएपीए कानून के तहत गिरफ्तार किया गया शरजील इमाम राष्ट्र द्रोही  व घातक व्यक्ति है।

चिंता का विषय है कि उमर खालिद और  शरजील इमाम के बचाव में अदालत में जो लोग खड़े हुए हैं वह कोई सामान्य व्यक्ति नहीं अपितु देश के पूर्व केंद्रीय मंत्री, वरिष्ठ काग्रेंस नेता और प्रभावशाली व्यक्ति हैं। इनमें  कपिल सिब्बल, अभिषेक मनु सिंघवी, अश्विनी कुमार जैसे नाम शामिल हैं जिन्होंने कांग्रेस सरकार मेंं बडे मंत्रालय संभाले। इसके अतिरिकत सिद्धार्थ दवे, सिद्धार्थ लूथरा, त्रिदीप पैइस भी इनके वकील रहे।प्रश्न यह उठता है कि ”क्या यह केवल कानूनी सहायता है” या ”किसी विशेष मानसिकता का स्पष्ट संकेत ?”

यह सब चल ही रहा था तभी बीच में जेएनयू के ढपली वालों ने आकर ताल से ताल मिला दी। दिल्ली में जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय की जमीन से एक बार फिर देश के विरुद्ध आपतिजनक नारे लगे। दस साल पूर्व भारत तेरे टुकड़े होंगे, इंशा अल्लाह -इंशा अल्लाह के नारे लगाए गएा थे उसी जगह “मोदी तेरी कब्र खुदेगी , अमित शाह तेरी कब्र खुदेगी खुदेगी“ जैसे आपत्तिजनक नारे लगाए गए। इस गैंग की नारेबाजी की वजह थी दिल्ली दंगों के आरोपी उमर खालिद और शरजील इमाम  की जमानत की अर्जी का खारिज होना। कांग्रेस व उसके अन्य  विरोधी दलों  के नेताओं ने इस प्रदर्शन व नारेबाजी को गुस्से ,नाराजगी के प्रकटीकरण का तरीका बता दिया।

दिल्ली दंगो से सम्बंधित  एक महत्वपूर्ण बात यह है कि उस समय दिल्ली में आप मुखिया अरविंद केजरीवाल मुख्यमंत्री थे। दंगो की जांच में यह तथ्य भी सामने आया कि हिंसा अचानक नहीं हुई थी आप पार्षद ताहिर हुसैन और विधायक अमानतुल्लाह खान की इसमें बड़ी भूमिका थी, इनकी जांच प्रगति पर है और अभी कोई बरी नहीं हुआ है। केजरीवाल मुख्यमंत्री रहते सरकारी तौर पर इन  तत्वों को बचाने का पूरा प्रयास किया गया और उन्हीं की वजह से आज भी वह जमानत पर घूम रहे  हैं । जब तक दिल्ली में केजरीवाल मुख्यमंत्री रहे तब तक उनकी ओर से दिल्ली दंगो की जांच में कोई सहयोग नहीं किया जा रहा था। अब मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता के नेतृत्व में संभव है फरवरी 2020 के पीड़ितों को न्याय मिल जाए ।

प्रेषक – मृत्युंजय दीक्षित

फोन नं. – 9198571540

इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र भारत की लोकप्रिय आवाजों के दस्तावेजीकरण के लिए ‘आवाज़ों के जुगनू’ का शुभारंभ करेगा

संस्कृति मंत्रालय के अंतर्गत स्वायत्त संस्था, इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र (आई जी एन सी ए), भारत की चुनिंदा सबसे मशहूर आवाज़ों को रिकॉर्ड किए गए साक्षात्कारों और असली प्रकाशनों के माध्यम से डॉक्यूमेंट करने और उन्हें सहेजने के लिए एक विशेष पहल की शुरूआत करने जा रहा है। वर्षों से निरंतर चल रही तलाश और ऑडियो और वीडियो खंगालने की कोशिशों के बाद, इस पहल को 8 जनवरी 2026 को शाम 4.00 बजे ‘आवाज़ों के जुगनू’ टाइटल के अंतर्गत पुस्तक और स्वर दोनों प्रारूप में औपचारिक रूप से लॉन्च किया जाएगा। इसमें आकाशवाणी, एफ एम चैनलों, वॉइस-ओवर इंडस्ट्री, प्रसारण और काव्य पाठ मंचन की परंपरा से जुड़े 31 लोगों के सफर को समेटने का प्रयास किया गया है।

इस कार्यक्रम की अध्यक्षता इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र के सदस्य सचिव डॉ. सच्चिदानंद जोशी करेंगे। जाने-माने प्रसारक और वॉइस एक्टर श्री हरीश भिमानी मुख्य अतिथि के तौर पर इस अवसर की शोभा बढ़ाएंगे, जबकि जाने-माने प्रसारक और वॉइस एक्टर श्री शम्मी नारंग विशिष्ट अतिथि होंगे। आवाज की दुनिया से जुड़ी सुश्री सोनल कौशल विशेष अतिथि के तौर पर शामिल होंगी। इस मौके पर इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र के मीडिया सेंटर के कंट्रोलर श्री अनुराग पुनेठा स्वागत भाषण देंगे, और पुस्तक में संकलन कर्ता और संपादक डॉ. शेफाली चतुर्वेदी प्रकाशन का परिचय देंगी।

यह प्रकाशन रेडियो और आवाज़ पर आधारित कहानी कहने के लंबे समय से चले आ रहे सांस्कृतिक महत्व, एक ऐसी परंपरा जिसने दर्शकों के साथ गहरा भावनात्मक जुड़ाव बनाया है, को सामने लाने वाला है। अनेकों पीढ़ियों में आवाज़ों के ज़रिए कहानियों, किरदारों और भावनाओं को पहुँचाने से जुड़ी यह परियोजना सामूहिक संस्मरण, गर्मजोशी और भरोसे को आकार देने में आवाज़ की अनोखी शक्ति पर विचार करने का एक अवसर देने वाली है। यहाँ तक कि वर्तमान समय के डिजिटल युग में भी, वॉइस-ओवर की कला कहानी कहने के पुराने और नए तरीकों को जोड़ते हुए एक आवश्यक और प्रासंगिक सांस्कृतिक माध्यम बनी हुई है।

सुप्रसिद्ध स्वरों को लिपिबद्ध करने और एक स्वर युग्म का शुभारंभ करने का यह कार्यक्रम, दस्तावेजीकरण और संरक्षण के प्रति इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र की सांस्कृतिक की निरंतर प्रतिबद्धता में एक महत्वपूर्ण पल होगा। इस अवसर पर कला केंद्र विद्वजनों, कलाकारों और आम लोगों का स्वागत करने के लिए उत्सुक है, जो भारत की समृद्ध वाचन (स्वर) परंपराओं की विरासत और उनकी वर्तमान में प्रासंगिकता के साथ एक सार्थक जुड़ाव की प्रतिबद्धता का प्रतीक है।

राष्ट्र के समक्ष चुनौतियां और राजनीतिक दल।

राजनीतिक दल लोकतंत्र के ‘ प्राण वायु ‘ होते हैं। सुशासन, योग्य सहभागिता, संसदीय गरिमा, पारदर्शिता, जिम्मेदारी एवं जवाबदेही  राजनीतिक दलों द्वारा प्राप्त होता है। राजनीतिक दलों का  साध्य ‘ राष्ट्रीय लक्ष्यों की प्राप्ति एवं राष्ट्र  सर्वोपरि ‘  होता है तो इनका साधन ‘ संसद में सहयोग ,संसदीय गरिमा की प्राप्ति एवं राष्ट्रीयता की भावना का उन्नयन ‘ होता है। सामयिक  लोकतांत्रिक परिवेश में पड़ोसी देशों में राजनीतिक अस्थिरता ,हिंदू अल्पसंख्यकों पर जानलेवा हमले, पाकिस्तान में लोकतांत्रिक शासकीय संरचना के बजाय सेना को  सर्वोच्च शक्ति दिया जाना हालांकि, पाकिस्तान की शासकीय व्यवस्था में “3A” का प्रासंगिकता हमेशा रहा है। अर्थात, संयुक्त राज्य अमेरिका का वर्चस्व, आर्मी (सेना) के हाथों में शक्तियों का केंद्रीकरण एवं अल्लाह( धार्मिक राज्येतर कर्ताओं की भूमिकाएं), पाकिस्तान अपने  ‘ नकारात्मक साधनों ‘ जैसे छद्म युद्ध, सीमा पार घुसपैठ एवं चरमपंथी तत्वों को हमेशा बढ़ावा दिया है। ड्रैगन की हिंद महासागर एवं भारत के पूर्वोत्तर भाग पर अनाधिकृत नियंत्रण रेखा को बताना । इन सभी आक्रामक, अविश्वस्नीय  कर्ताओं की उपस्थिति एवं अपने मौलिक धर्म ‘ पड़ोसी प्रथम ‘ के पालन में राजनीतिक दलों को अपने विचारों में एकता ,भावनात्मक स्तर पर भारत के प्रति राष्ट्रीयता का भाव एवं रचनात्मक विपक्ष की भूमिका में होना आवश्यक है।
क्या भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) राष्ट्र के समक्ष चुनौतियों का मुकाबला करने में समर्थ है?
 क्या कांग्रेस सहित’ इंडिया’ गठबंधन राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय विषयों पर सरकार का सहयोग कर रहे हैं?
 क्या  वामदल अपने शताब्दी  वर्ष में अपने राजनीतिक अस्तित्व को सुरक्षित कर पाएंगे?
 क्या क्षेत्रीय दल अपने राजनीतिक  कार्यक्रमों में बदलाव के लिए तैयार हो रहे हैं ?
राष्ट्र के समक्ष चुनौतियों का समाधान ‘ स्थिर विचारधारा’ के प्रति स्तुति भावना रखने वाली सरकार कर सकती हैं ।विगत 11 वर्षों के कार्यक्रमों, तथ्यों एवं आंकड़ों का राजनीतिक शल्य करने से स्पष्ट होता है कि भारत के समक्ष आंतरिक एवं वाह्य चुनौतियों का निजात वर्तमान सरकार पूरी निष्ठा एवं समर्पण से कर रही है। आंतरिक स्तर पर ‘ लाल उग्रवाद ‘,  ‘ पत्थरबाजी की घटनाएं’, ‘ घुसपैठ की समस्याएं ‘ एवं ‘ जम्मू कश्मीर में अलगाववाद की समस्याएं’ सरकार को अस्थिर करने की सुनियोजित योजना पर सरकार ने कठोर प्रहार  किया है।नक्सलवाद अर्थात लाल उग्रवाद अपनी सिंचित भूमि से अंतिम  सांसें  भर रहा है। सरकार के मजबूत राजनीतिक इच्छा, प्रशासनिक स्तर पर जमीनी निर्णय क्रियान्वयन की प्रतिबद्धता एवं असैनिक  एवं सैनिक उत्साह से भारत ‘ शून्य नक्सलवाद’ की तरफ अग्रसर है। विकास एवं पुनर्वास की नीति के कारण नक्सलियों के परिवार शिक्षा ,रोजगार एवं भौतिक एकाग्रता की तरफ आकृषित है एवं सन् 2026 में विकास की नई रोशनी की ऊर्जा की ओर आकर्षित हो रहे हैं।
 निर्वाचन आयोग एक स्वतंत्र संवैधानिक निकाय है। अपने निर्णय को क्रियान्वित करने में सक्षम एवं स्वतंत्र निकाय है। लोकतांत्रिक संस्कृति में कार्यपालिका का अभिकरण है, जो अपने    ‘ सघन विशेष पुनरीक्षण ‘ (SIR) के द्वारा लगभग 4 करोड़ अवैध मतदाताओं को चिन्हित किया है, जो पहले लोकतंत्र के महापर्व के हिस्सा थे। इन अवैध मतदाताओं का राष्ट्र, राष्ट्रीयता एवं राष्ट्रवाद, राष्ट्रीय नेतृत्व एवं राष्ट्र के समक्ष चुनौतियों से किसी भी प्रकार से सरोकार न होना, बल्कि राज्य के योजनाओं का दोहन एवं क्षेत्रीय दलों के ‘ तय मतदाता’ (फिक्स वोटर्स) होना है।      SIR  की  उपादेयता रही है कि इनको ‘ सहभागिता एवं वोट’ देने से बाहर किया गया है। भारत के बिहार, बंगाल ,उत्तर प्रदेश एवं पड़ोसी राज्यों से सटे राज्यों में ‘ अवैध घुसपैठियों’ की तरह रह रहे हैं जो ” भारत में रहकर भारत को समय-समय पर अस्थिर”  के लिए  राज्येतर कर्ताओं (नॉन स्टेट एक्टर्स ) की भूमिका निभा रहे हैं ।
भारत की मजबूत’ निगरानी तंत्र’ एवं ‘ सामाजिक संगठनों की सक्रियता’ (RSS ) के कारण भूमिगत हो जाते हैं। इन लोगों के जाल इस्लामिक  देशों खासकर पाकिस्तान, बांग्लादेश एवं  खाड़ी के देशों(तेल के देशों) से जुड़ाव है जिसके वित्त पोषण से भारत में अवैध गतिविधियों में अपने धन का निवेश करना एवं राज्य के प्रशासकीय निकायों के लिए चुनौती  होना रहा है। इन चुनौतियों के समाधान में विपक्षी दलों का  रवैया नकारात्मक है। ‘ विशेष गहन  पुनरीक्षण ‘ को कांग्रेस, राजद एवं टीएमसी विरोध कर रहे हैं बल्कि निर्वाचन आयोग के कार्य प्रणाली पर भी प्रश्न चिन्ह उठा रहे हैं। यह दु:खद विषय है कि लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष निर्वाचन आयोग पर ‘ वोट चोरी’ का  तथ्यविहीन एवं प्रमाण विहीन  आरोप लगा रहे हैं।
 ‘ पत्थरबाजी की घटनाएं’ नागरिकों एवं व्यक्तियों द्वारा भीड़ द्वारा एवं संगठित अराजकतत्वों के द्वारा सुरक्षा कर्मियों ,पुलिस वालों, रेलगाड़ियों  पर पत्थर फेंकने और सरकारी अधिकारियों पर हमला करने से है। यह राज्य के विरुद्ध  अपराधिक कृत्य है जो  राज्येतर  व्यवहार से राज्य के कानून एवं व्यवस्था, सरकारी संपत्ति को नुकसान एवं राज्य में अराजकता उत्पन्न करने से है। यह सरकार के लिए आंतरिक स्तर पर गंभीर चुनौती था। आंकड़ों एवं पकड़े गए अभियुक्तों के बयान से स्पष्ट हुआ है कि इसमें अलगाववादी गुटों,चरमपंथी समूहों एवं क्षेत्रीय राजनीतिक दलों की भूमिका रही है। अनुच्छेद 370 एवं 35 ए के उन्मूलन के पश्चात इन हिंसक घटनाओं में कमी ही नहीं, बल्कि  ‘ नियंत्रण  ‘ में है। इसी अलगाववादी गुटों द्वारा अलगाववाद चुनौती रहा है। सरकार के मजबूत राजनीतिक इच्छा एवं  विवेकी सुझबुझ से इन  विषयों पर नियंत्रण किया जा चुका है।
2024 का जनादेश ” अप्रत्याशित” रहा था ,लेकिन राजनीतिक सुझबुझ एवं मातृ संगठन के सहयोग से राष्ट्रीय लोकतांत्रिक गठबंधन( एनडीए) ने इसको सुलझा लिया एवं लोकसभा में अपने बहुमत के आंकड़े को प्राप्त कर लिए। सरकार ने गठबंधन सरकार में गठबंधन धर्म को पूरा करते हुए आंध्र प्रदेश राज्य एवं बिहार राज्य के समीकरण को संतुलित किया है। आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री के लिए  ‘ आंध्र प्रदेश प्रथम’ एवं उनकी  राजनीतिक महत्वाकांक्षा द्वितीय स्तर पर रही है। बिहार राज्य में मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार श्री नीतीश कुमार जी को संतुलित करके बिहार के सियासी संकट का भी समाधान नेतृत्व कर दिया है।” विशेष गहन पुनरीक्षण” वोट चोरी का अनुनाद नहीं है। राजनीतिक दलों का मुद्दा बेरोजगारी, महंगाई  और विधि एवं व्यवस्था है। इन मुद्दों पर विपक्ष सरकार को” सड़क एवं संसद” तक दबाव बनाने में  असक्षम रहे हैं। कांग्रेस संगठन की राजनीतिक कमी है कि मल्लिकार्जुन खड़गे राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं लेकिन  श्रीमती सोनिया गांधी एवं श्रीमान राहुल गांधी तथ्यतः (Defacto) अध्यक्ष है। राहुल गांधी की छवि  राजनीति में अपरिपक्व राजनीतिक की  है क्योंकि वो  जमीनी मुद्दों के बजाय व्यक्तिगत व्यक्तित्व पर हमलावर होते हैं।
भारत सरकार ने “ऑपरेशन सिंदूर “के दौरान संयुक्त राज्य अमेरिका के राष्ट्रपति श्रीमान डोनाल्ड ट्रंप के ” नॉरेटिव”  को ‘ धैर्य,संयम एवं परहेज’ किया। भू – राजनीतिक दौर में संयुक्त राज्य अमेरिका के राष्ट्रपति द्वारा भारत पर आयात पर 25 % कटौती शुल्क ( टैरिफ ) लगाए ,उसके पश्चात रूस के साथ व्यापार के कारण 25 % का दंडात्मक कटौती शुल्क ( टैरिफ)  को क्रियान्वित किए, लेकिन भारत सरकार ने आर्थिक मोर्चे पर तकरार के बजाय ‘ कूटनीति ‘ के माध्यम से काम किया। भारत सरकार ने चीन और रूस के साथ संबंधों को मजबूत करके संयुक्त राज्य अमेरिका को  ‘ प्रति संतुलित’ किया।
 भारतीय जनता पार्टी ने नेतृत्व स्तर पर बदलाव किया है। एक युवा कार्यकर्ता ,जो पांच बार बिहार विधानसभा में विधायक रहा है एवं तीन बार लगातार बिहार सरकार में मंत्री परिषद के सदस्य रहे हैं एवं छत्तीसगढ़ विधानसभा के प्रभारी रह कर अपने  कार्य योग्यता, संगठनात्मक क्षमता एवं चुनावी प्रबंधन की राजनीति पर सफलता को सिद्ध किए हैं। दिल्ली के विज्ञान भवन में आयोजित  व्याख्यान माला में परम पूजनीय सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत जी ने बीजेपी में ‘ अध्यक्ष’ के विषय में स्पष्ट कर दिए थे कि राष्ट्रीय अध्यक्ष के चुनाव से पार्टी में अनुशासन एवं  नव्यता का संचरण होगा। उन्होंने स्पष्ट कहा कि यह बीजेपी का विषय है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) नाम नहीं देता है, बल्कि एक ‘ पैरामीटर ‘ का सुझाव दिया था कि राष्ट्रीय अध्यक्ष 50 वर्ष से कम का हो, राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र से ना हो, संसदीय लोकतंत्र के अनुरूप हो एवं वह जाति तटस्थ हों।  बिहार राज्य में कायस्थों की आबादी 1% से भी कम है। कार्यकारी राष्ट्रीय अध्यक्ष 45 वर्ष के हैं। वह संसदीय लोकतंत्र के सभी “मानकों “को पूरा करते हैं।
मौजूदा दौर की चुनावी राजनीति में  वाम दलों  का राजनीतिक सफल इंडेक्स अच्छा नहीं दिख रहा है। बंगाल, त्रिपुरा एवं बिहार (कुछ क्षेत्रों में)  सत्ता पर काबिज रहे वामदल अब इन राज्यों में “राजनीतिक वनवास” पर  है।एक समय के बिहार के राजनीति में ‘ प्रतिपक्ष के नेता ‘ थे,लेकिन इस बार के बिहार विधानसभा में ‘ शून्य परिणाम’ से जनाधार शून्यता की  ओर अग्रसर है। वर्तमान में लोकसभा एवं राज्यसभा में दो-दो सदस्य हैं। बदलते परिदृश्य में  वामदलों को बदलना होगा!
भारतीय राजनीति में क्षेत्रीय दलों के भूमिका राजनीतिक पर्यावरण से मांग  का रहा है। उनकी भूमिका ” संविद सरकारों” के दौर में बढ़ जाती है। सन् 2014 से संघीय स्तर पर प्रचंड बहुमत की सरकार बनने से क्षेत्रीय राजनीतिक दलों की भूमिका न्युन  हो रही है। मौजूदा दौर में क्षेत्रीय राजनीतिक दलों को बदलते जन आकांक्षाओं के अनुरूप अपने “कार्यक्रमों” को बदलना चाहिए। आंकड़ों एवं तथ्यों से साफ स्पष्ट हो रहा है कि अब सरकार निर्माण में क्षेत्रीय राजनीतिक दलों की भूमिका सिमट रहीहै।
मेरा  सुझाव है:-
1. राष्ट्र के समक्ष सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक, सांस्कृतिक एवं वैश्विक चुनौतियां हैं जिनको राजनीतिक दलों द्वारा ‘ राष्ट्रीयता’ के आधार पर मिलकर समाधान करना चाहिए।
2. संयुक्त राज्य अमेरिका के साथ कटौती शुल्क एवं दंडात्मक  कटौती शुल्क का विषय, रूस के साथ आयात करने पर संयुक्त राज्य अमेरिका का दबाव एवं बदलते परिदृश्य में चीन के साथ आर्थिक संबंधों को लेकर   ‘ सर्वदलीय एकता’ की आवश्यकता है।
3. किसानों की समस्याओं के लिए, वैश्विक स्तर पर शुद्ध घरेलू उत्पाद की वृद्धि ,प्रति व्यक्ति आय का विषय एवं हरित अर्थव्यवस्था के विकास के लिए राजनीतिक दलों को ‘ एक स्वर’ में खड़ा होना चाहिए।
4. सुरक्षा एवं सैन्य  कार्यवाही जैसे संवेदनशील मुद्दों पर सभी राजनीतिक दलों को ‘ सहमति  एवं समान स्वर’ में होना आवश्यक है।
( लेखक अखिल भारतीय इतिहास संकलन योजना, केशवकुंज झंडेवालान।  के राष्ट्रीय संगठन सचिव हैं) 

उस अनपढ़ बेगुनाह कैदी ने अमरीका की पूरी न्याय व्यवस्था को हिला दिया

1961 में, आठवीं कक्षा तक पढ़ा हुआ एक आदमी अपनी जेल की कोठरी में बैठा पेंसिल उठाता है—और अनजाने में अमेरिकी इतिहास बदल देता है।
क्लेरेंस अर्ल गिडियन कोई खास आदमी नहीं था। 51 साल की उम्र में वह एक भटका हुआ इंसान था—सफेद होते बाल, झुर्रीदार चेहरा और बदकिस्मती से भरी ज़िंदगी। वह शहर–दर–शहर भटकता रहा, छोटे–मोटे काम करता रहा, जैसे–तैसे गुज़ारा करता रहा और कभी–कभी मामूली अपराधों के लिए जेल भी जाता रहा। उसने कभी स्कूल पूरा नहीं किया। उसके पास कभी पैसा नहीं था।
4 अगस्त 1961 को, जब वह फ्लोरिडा की एक अदालत में खड़ा था—एक पूल हॉल में चोरी के आरोप में—उसके पास कोई वकील नहीं था।
उसके खिलाफ सबूत बेहद कमज़ोर थे। किसी ने दावा किया कि उसने सुबह लगभग 5:30 बजे बे हार्बर पूल रूम के पास उसे देखा था, उसकी जेब में सिक्के थे। इमारत से पाँच डॉलर के सिक्के, कुछ बीयर और सोडा गायब थे। बस इतना ही।
गिडियन ने कहा कि वह निर्दोष है—लेकिन एक गरीब, आपराधिक रिकॉर्ड वाले भटकते इंसान की बात कौन सुनता?
जब मुकदमा शुरू हुआ, गिडियन ने अदालत से एक सीधी–सी, संवैधानिक मांग की:
“महोदय, मैं निवेदन करता हूँ कि इस मुकदमे में मेरा प्रतिनिधित्व करने के लिए मुझे एक वकील दिया जाए।”
जज का जवाब शालीन था, लेकिन विनाशकारी:
“मिस्टर गिडियन, मुझे खेद है, लेकिन मैं आपको वकील नियुक्त नहीं कर सकता। फ्लोरिडा राज्य के कानून के अनुसार, अदालत केवल तभी वकील नियुक्त कर सकती है जब आरोपी पर मृत्युदंड योग्य अपराध हो।”
ज़रा सोचिए।  अमेरिकी न्याय व्यवस्था—जिसकी प्रक्रिया जटिल है, भाषा तकनीकी है—एक ऐसे इंसान से उम्मीद कर रही थी जिसने मिडिल स्कूल भी पूरा नहीं किया, कि वह खुद अपना बचाव करे। उससे सबूतों के नियम समझने, गवाहों से जिरह करने और अपने संवैधानिक अधिकारों की रक्षा करने की उम्मीद की जा रही थी।
गिडियन ने पूरी कोशिश की।उसने गवाहों से सवाल किए।  उसने अपनी बेगुनाही दोहराई।
लेकिन जब आपको कानून की भाषा ही न आती हो, तो आप खुद को कैसे बचाते हैं?
जूरी ने उसे दोषी ठहरा दिया। 25 अगस्त 1961 को जज रॉबर्ट एल. मैक्रेरी ने उसे अधिकतम सज़ा सुनाई—पाँच साल फ्लोरिडा स्टेट प्रिजन।
अधिकतर लोग यहीं हार मान लेते। लेकिन क्लेरेंस अर्ल गिडियन ऐसा आदमी नहीं था।
जेल की लाइब्रेरी में—ऐसी कानून की किताबों के बीच जिन्हें वह मुश्किल से समझ पाता था—गिडियन ने पढ़ना शुरू किया। धीरे–धीरे, मेहनत से, उसने संविधान को समझना शुरू किया।
उसने छठे संशोधन (Sixth Amendment) में “वकील की सहायता” का अधिकार पढ़ा।
उसने चौदहवें संशोधन (Fourteenth Amendment) में “न्यायिक प्रक्रिया” की गारंटी पढ़ी।
और उसके भीतर एक सच्चाई जलने लगी:
यह व्यवस्था टूटी हुई है। अगर अमीरों को वकील मिलते हैं और गरीबों को अकेले अभियोजकों का सामना करना पड़ता है—तो न्याय कैसे हो सकता है?
गिडियन ने फ्लोरिडा सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की। उन्होंने बिना कोई कारण बताए उसे खारिज कर दिया।
तो उसने फिर से पेंसिल उठाई। कांपते हाथों से, जेल के कागज़ पर, पाँच पन्नों में—गलत वर्तनी और टेढ़े अक्षरों के साथ—उसने संयुक्त राज्य सुप्रीम कोर्ट को याचिका लिखी।
उसने हस्ताक्षर किए। उसने कागज़ मोड़ा।
और 8 जनवरी 1962 को, एक गरीब कैदी की आवाज़ अमेरिका की सबसे ऊँची अदालत तक पहुँच गई। हर साल सुप्रीम कोर्ट को हज़ारों याचिकाएँ मिलती हैं।
ज़्यादातर बिना देखे खारिज हो जाती हैं।  लेकिन गिडियन के मामले में कुछ अलग था। 4 जून 1962 को, अदालत ने उसका मामला सुनने का फैसला किया।
और क्योंकि वह वकील नहीं रख सकता था, अदालत ने उसे देश के बेहतरीन वकीलों में से एक दिया—एब फोर्टास, जो आगे चलकर खुद सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस बने।
15 जनवरी 1963 को, फोर्टास ने एक बेहद सरल लेकिन घातक तर्क रखा:
अगर क्लेरेंस डैरो—अमेरिकी इतिहास के महानतम वकीलों में से एक—खुद पर आरोप लगने पर वकील रखता है,
तो आठवीं कक्षा तक पढ़ा आदमी खुद अपनी पैरवी कैसे कर सकता है?
जवाब साफ़ था। वह नहीं कर सकता। कोई भी नहीं कर सकता।
18 मार्च 1963 को, सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुनाया:
9–0। सर्वसम्मति से।
जस्टिस ह्यूगो ब्लैक—जो बीस सालों से इसी नतीजे के लिए लड़ रहे थे—ने फैसला लिखा।  अदालत ने कहा कि वकील का अधिकार “निष्पक्ष मुकदमे के लिए मौलिक और आवश्यक” है।
अब राज्यों को गरीब आरोपियों को वकील देना होगा। पुराना कानून पलट दिया गया। गिडियन का मामला नए मुकदमे के लिए फ्लोरिडा वापस भेजा गया।
इस बार, गिडियन के पास वकील था—फ्रेड टर्नर। और सब कुछ बदल गया। टर्नर ने अभियोजन के केस की कमज़ोरियाँ उजागर कीं। उसने दिखाया कि मुख्य गवाह खुद चोरी में शामिल हो सकता था। जहाँ पहले सिर्फ दोष दिखता था, वहाँ अब उचित संदेह था।
5 अगस्त 1963 को—उसी अदालत में, उसी जज के सामने—जूरी ने फैसला सुनाया:
निर्दोष।
दो साल से ज़्यादा जेल में बिताने के बाद, एक बेगुनाह आदमी आज़ाद हुआ। लेकिन उसकी विरासत उसके साथ बाहर आई। एक आदमी की हाथ से लिखी याचिका ने पूरी अमेरिकी न्याय व्यवस्था बदल दी। देश भर में पब्लिक डिफेंडर ऑफिस बने। हज़ारों कैदियों को नए मुकदमे मिले।
यह सिद्धांत कानून बना कि न्याय अमीरी पर निर्भर नहीं होना चाहिए।
गिडियन अपनी साधारण ज़िंदगी में लौट गया।  उसने पाँचवीं बार शादी की। बीमारियों से जूझता रहा।
18 जनवरी 1972 को, 61 साल की उम्र में, कैंसर से उसकी मौत हो गई। वह तब भी गरीब था।
शुरुआत में उसे मिसूरी में बिना नाम की कब्र में दफनाया गया। बाद में, ACLU ने उसकी कब्र पर ग्रेनाइट का पत्थर लगवाया।
उस पर वही शब्द खुदे थे जो गिडियन ने एब फोर्टास को लिखे थे:
“हर युग मानवता के लाभ के लिए कानून में सुधार लाता है।”
आज, जब भी आप ये शब्द सुनते हैं—
“आपको वकील रखने का अधिकार है, और यदि आप वकील नहीं रख सकते, तो आपको एक प्रदान किया जाएगा”—
तो याद रखिए:  ये शब्द इसलिए मौजूद हैं क्योंकि एक आदमी ने मानने से इनकार कर दिया कि गरीब लोग न्याय के सामने अकेले खड़े हों।
क्लेरेंस अर्ल गिडियन ने साबित किया कि बदलाव की सबसे बड़ी ताकत पैसा, रुतबा या शिक्षा नहीं होती।
कभी–कभी वह बस इतनी होती है कि कोई पेंसिल उठाकर लिख दे:
“यह सही नहीं है।”
और कभी–कभी—सभी उम्मीदों के खिलाफ—दुनिया उससे सहमत हो जाती है।

आधी रात को ट्रैन में डकैतों से भिड़ने वाला फौजी

कल्पना कीजिए 2 सितंबर 2010 की एक अंधेरी रात। मौर्य एक्सप्रेस ट्रेन पश्चिम बंगाल के घने जंगलों से गुजर रही थी। ट्रेन रांची से गोरखपुर की ओर बढ़ रही थी। इसी ट्रेन में सवार थे 35 वर्षीय रिटायर्ड गोरखा सैनिक बिष्णु प्रसाद श्रेष्ठ, जो भारतीय सेना की 8वीं गोरखा राइफल्स की 7वीं बटालियन में सेवा दे चुके थे और अपनी ड्यूटी पूरी कर घर लौट रहे थे। डिब्बे में सामान्य यात्री थे, किसी को अंदाजा नहीं था कि कुछ ही पलों में यह यात्रा मौत और साहस के बीच की लड़ाई बन जाएगी।
अचानक ट्रेन रुकती है। अंधेरे का फायदा उठाकर 30-40 के बीच हथियारबंद डाकू ट्रेन पर चढ़ आते हैं। उनके हाथों में चाकू, तलवारें, कुल्हाड़ी और कुछ के पास पिस्तौलें थीं। पूरे डिब्बे में चीख पुकार मच जाती है। यात्री डर से सिमट जाते हैं। डाकू मोबाइल, पैसे, गहने और कीमती सामान लूटने लगते हैं। बिष्णु स्थिति को समझते हुए चुप रहते हैं और अपना वॉलेट दे देते हैं, क्योंकि वे जानते थे कि अकेले होकर सीधे टकराना उस समय सही नहीं होगा।
लेकिन तभी हालात बदल जाते हैं। डाकू एक 18 साल की लड़की को पकड़ लेते हैं, जो अपने माता पिता के साथ यात्रा कर रही थी। वे उसे घसीटने लगते हैं और उसके कपड़े फाड़ने की कोशिश करते हैं। लड़की डर और बेबसी में चीख उठती है और बिष्णु की ओर देखकर कहती है, आप सैनिक हैं, मेरी रक्षा कीजिए, मुझे अपनी बहन समझिए। यह सुनते ही एक गोरखा सैनिक का खून खौल उठता है।
अगले ही पल बिष्णु अपनी कमर से पारंपरिक खुकरी निकालते हैं और अकेले ही डाकुओं पर टूट पड़ते हैं। उन्होंने एक डाकू को पकड़कर मानव ढाल बनाया और बिजली की रफ्तार से वार शुरू कर दिए। खुकरी की चमक और अचानक हुए हमले से डाकू घबरा जाते हैं। कुछ ही मिनटों में हालात पलट जाते हैं। रिपोर्ट्स के अनुसार तीन डाकू मारे गए और करीब आठ गंभीर रूप से घायल हुए। बाकी डाकू यह कहते हुए भाग खड़े हुए कि एक आदमी हम सब पर भारी पड़ रहा है।
इस भीषण संघर्ष में बिष्णु के बाएं हाथ पर गहरी चोट आती है और उन्हें करीब दो महीने अस्पताल में रहना पड़ता है। लड़की के गले पर हल्की खरोंच जरूर आती है, लेकिन उसकी इज्जत बच जाती है। यात्रियों का बड़ा नुकसान भी टल जाता है। बाद में पुलिस ने कई डाकुओं को पकड़ लिया और लूटा हुआ सामान बरामद किया।
इस असाधारण वीरता के लिए बिष्णु प्रसाद श्रेष्ठ को सेना मेडल और उत्तम जीवन रक्षा पदक से सम्मानित किया गया। लड़की के परिवार ने उन्हें इनाम देना चाहा, लेकिन उन्होंने विनम्रता से मना कर दिया और कहा, युद्ध में दुश्मन से लड़ना सैनिक का कर्तव्य है, लेकिन ट्रेन में डाकुओं से लड़ना एक इंसान का कर्तव्य था।
यह गोरखा सैनिकों की बहादुरी, साहस और मानवता की एक जीवित मिसाल है।

विश्व पटल पर बालिकाओं का नवयुगः बदली सोच, उभरी शक्ति

एक समय था जब दुनिया के बड़े हिस्से में बेटी का जन्म बोझ समझा जाता था। गर्भ में ही उसके जीवन का अंत कर दिया जाता, या जन्म के बाद भेदभाव, उपेक्षा और वंचना उसका भाग्य बनती। सदियों तक चली इस दकियानूसी एवं पुरानपंथी सोच ने समाज, सभ्यता और प्रकृति-तीनों को गहरे घाव दिए। किंतु आज उसी दुनिया में सोच के स्तर पर एक निर्णायक मोड़ दिखाई दे रहा है, एक नयी सोच का उदय हो रहा है। गैलप इंटरनेशनल जैसे वैश्विक सर्वे यह संकेत देते हैं कि 44 देशों में माता-पिता की बड़ी संख्या अब संतान के लिंग को लेकर उदासीन हो रही है, उन्हें फर्क नहीं पड़ता कि बच्चा लड़का है या लड़की। यह बदलाव केवल आंकड़ों का खेल नहीं, बल्कि मानव चेतना में घटित एक ऐतिहासिक परिवर्तन है। बालिकाओं को लेकर बदल रही यह सोच मानवीयता का दर्शन करा रही है। यह सच है कि तस्वीर का एक पक्ष उजला है तो दूसरा अब भी चिंताजनक। पिछले 25 वर्षों में दुनिया ने लगभग 70 लाख बच्चियों को बचाया है, यह मानवीय प्रगति का बड़ा प्रमाण है। परंतु यह भी उतना ही कड़वा सत्य है कि आज भी हर साल दस लाख से अधिक बच्चियां गर्भ में ही खत्म कर दी जाती हैं और बीते 45 वर्षों में यह संख्या पाँच करोड़ से अधिक रही है। यानी लड़का-लड़की के भेद का राक्षस अभी पूरी तरह पराजित नहीं हुआ है। इसके बावजूद, उम्मीद की किरण इसलिए प्रबल है क्योंकि अब यह भेद सामाजिक स्वीकृति खो रहा है, और यही किसी भी क्रांति की सबसे ठोस बुनियाद होती है।
भारत में यह संघर्ष और भी जटिल रहा है। कम शिक्षा, रूढ़िवादी पितृसत्तात्मक सोच, अंधविश्वास और सामाजिक भ्रांतियों ने लंबे समय तक बालिकाओं के अस्तित्व पर संकट बनाए रखा। लेकिन हाल के वर्षों में स्थिति में उल्लेखनीय सुधार दिखता है। नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे के अनुसार, भारत में बेटों की चाहत 1999 के 33 प्रतिशत से घटकर अब 15 प्रतिशत रह गई है। यह गिरावट केवल सांख्यिकीय नहीं, बल्कि मानसिकता में आए बदलाव का संकेत है। फिर भी, 15 प्रतिशत भी कम नहीं क्योंकि इसका सीधा असर लिंगानुपात पर पड़ता है। आज देश में लिंगानुपात 1000 लड़कों पर 943 लड़कियों का है। वैज्ञानिक अध्ययनों के अनुसार जन्म के समय लड़के-लड़कियों का प्राकृतिक अनुपात लगभग 105: 100 होता है, जो पाँच वर्ष की आयु तक बराबर हो जाना चाहिए। यदि पाँच साल के बाद भी 1000 लड़कों पर 57 लड़कियाँ कम हैं, तो स्पष्ट है कि प्रकृति नहीं, समाज हस्तक्षेप कर रहा है। 57 बड़ा अंतर है। सुधार की जो गति चल रही है, उस हिसाब से इस अंतर को पाटने में पच्चीस साल से ज्यादा लग जाएंगे। ये बच्चियां दुनिया में कदम रखें और अच्छी तरह से खुशगवार जिंदगी जिएं, इसके लिए उन्हें बचाने के उपाय, उनकी व्यापकता और गति सब बढ़ाने होंगे। सृष्टि के संतुलन के लिए भी यह जरूरी है। समाज की विडम्बनापूर्ण सोच ही वह “बाहरी शक्ति” है-भेदभाव, उपेक्षा, असमान पोषण, स्वास्थ्य और अवसर जो संतुलन को बिगाड़ रही है। मौजूदा सुधार की गति से इस अंतर को पाटने में पच्चीस वर्ष से अधिक लग सकते हैं। इसलिए उपायों की व्यापकता और गति दोनों को बढ़ाना अनिवार्य है।
इस बदलाव के पीछे शिक्षा सबसे बड़ा कारक बनकर उभरी है। जब-जब लड़कियों को शिक्षा के समान अवसर मिले, उन्होंने न केवल अपनी क्षमताएँ सिद्ध कीं, बल्कि समाज की दिशा भी बदली। भारत सहित कई देशों में बालिका शिक्षा, छात्रवृत्ति, डिजिटल साक्षरता, कौशल विकास और स्वास्थ्य सुरक्षा से जुड़ी योजनाओं ने लड़कियों के जीवन-पथ को नया आयाम दिया है। आज ग्रामीण क्षेत्रों तक स्कूल नामांकन में बालिकाओं की भागीदारी बढ़ी है, उच्च शिक्षा में उनकी उपस्थिति मजबूत हुई है और विज्ञान, तकनीक, खेल, प्रशासन तथा उद्यमिता-हर क्षेत्र में वे अपनी पहचान बना रही हैं। महत्वपूर्ण यह भी है कि अब नीतियाँ केवल संरक्षण तक सीमित नहीं रहीं, बल्कि सशक्तिकरण की ओर बढ़ी हैं। शिक्षा के साथ-साथ पोषण, मातृत्व स्वास्थ्य, सुरक्षित परिवहन, डिजिटल पहुँच और नेतृत्व प्रशिक्षण, इन सभी ने मिलकर बालिकाओं के आत्मविश्वास को पंख दिए हैं। यह समग्र दृष्टि ही भविष्य की महिलाओं को “सहायता पाने वाली” नहीं, बल्कि “निर्णय लेने वाली” बनाती है।
दुनिया के कई देशों में महिलाएँ अब राजनीति, प्रशासन और कॉरपोरेट नेतृत्व में अग्रिम पंक्ति में हैं। वे राष्ट्राध्यक्ष हैं, सेनाओं का नेतृत्व कर रही हैं, वैज्ञानिक खोजों की अगुआई कर रही हैं और वैश्विक संस्थानों में नीति-निर्धारण का हिस्सा हैं। यह परिवर्तन इस बात का प्रमाण है कि अवसर मिलने पर प्रतिभा लिंग नहीं देखती। गैलप इंटरनेशनल के सर्वे में उभरी उदासीनता कि संतान का लिंग मायने नहीं रखता, दरअसल इसी विश्वास का सामाजिक विस्तार है कि लड़कियाँ भी उतनी ही सक्षम हैं। पहली बार दुनिया के स्तर पर बालिकाओं को लेकर एक सकारात्मक परिदृश्य उभरा है, इन बालिकाओं को लेकर बदली सोच एवं उभरी शक्ति के परिदृश्यों के बीच यह समय बालिकाओं-महिलाओं पर हो रहेे अपराध, शोषण, बलात्कार, भेदभाव के त्रासद एवं क्रूर स्थितियों पर आत्म-मंथन करने का है, क्योंकि बालिकाओं एवं महिलाओं के समावेश, न्याय व सुरक्षा की स्थिति को बताने वाले वैश्विक शांति व सुरक्षा सूचकांक के 177 देशों में भारत का 128वां स्थान है। एनसीआरबी की रिपोर्ट के अनुसार, महिलाओं के विरूद्ध अपराध में राष्ट्रीय औसत 66.4 है। राजधानी दिल्ली का स्थान 144.4 अंकों के साथ सर्वाेच्च है।
माना जाता है कि 90 प्रतिशत यौन उत्पीड़न जान-पहचान के व्यक्ति ही करते हैं। यानी बालिकाएं अपने ही घर या परिचितों के बीच सबसे ज्यादा असुरक्षित है। कानून और योजनाएँ आवश्यक हैं, पर पर्याप्त नहीं। असली परिवर्तन संस्कृति में होता है-घर के भीतर, भाषा में, परंपराओं में। जब परिवार बेटी के जन्म को उत्सव मानता है, उसकी शिक्षा में निवेश करता है, उसे निर्णयों में भागीदार बनाता है-तभी लिंगानुपात के आँकड़े स्थायी रूप से सुधरते हैं। मीडिया, साहित्य और सिनेमा की भूमिका भी यहाँ निर्णायक है; वे या तो रूढ़ियों को पोषित करते हैं या नई दृष्टि गढ़ते हैं। आज सकारात्मक प्रस्तुतियाँ बढ़ रही हैं, जो लड़कियों को आत्मनिर्भर, साहसी और नेतृत्वकारी रूप में दिखाती हैं यह सांस्कृतिक परिवर्तन का संकेत है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी द्वारा बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ की शुरुआत का लक्ष्य भी बालिका लिंग अनुपात में गिरावट के मुद्दे पर ध्यान केंद्रित करना है।
भविष्य की दिशा स्पष्ट है-समानता केवल अधिकारों की सूची नहीं, बल्कि अवसरों की वास्तविक उपलब्धता है। बालिकाओं को बचाना पहला कदम था; अब उन्हें बढ़ने, उड़ने और नेतृत्व करने देना अगला चरण है। स्वास्थ्य, शिक्षा और सुरक्षा के साथ-साथ रोजगार, संपत्ति अधिकार, डिजिटल अवसर और निर्णय-निर्माण में हिस्सेदारी-ये सभी समानता के स्तंभ हैं। यदि इन पर निरंतर और समन्वित कार्य हुआ, तो आने वाले वर्षों में लिंगानुपात केवल सुधरेगा ही नहीं, बल्कि समाज अधिक संतुलित, संवेदनशील और उत्पादक बनेगा। एक समय था जब बालिका को कोख में ही समाप्त कर दिया जाता था; आज वही दुनिया उसके जन्म पर प्रसन्नता व्यक्त कर रही है। यह बदलाव अधूरा है, पर निर्णायक है। भारत में बेटों की चाहत का घटता ग्राफ, दुनिया भर में लिंग-उदासीनता की बढ़ती प्रवृत्ति और महिलाओं के लिए विस्तृत होती शिक्षा-सशक्तिकरण योजनाएँ-सब मिलकर संकेत देते हैं कि आने वाला समय वास्तव में महिलाओं का समय है। यदि यह गति बनी रही, तो देश की बालिकाएँ न केवल अपना परचम फहराएँगी, बल्कि मानव सभ्यता को अधिक न्यायपूर्ण और संतुलित दिशा भी देंगी। यही सृष्टि का स्वाभाविक और आवश्यक संतुलन है।
प्रेषकः
(ललित गर्ग)
लेखक, पत्रकार, स्तंभकार
ई-253, सरस्वती कंुज अपार्टमेंट
25 आई. पी. एक्सटेंशन, पटपड़गंज, दिल्ली-92
फोनः 22727486, 9811051133

कथा वल्लरी एवं उत्सव के रंग कृतियों का लोकार्पण

कोटा / डॉ. वैदेही गौतम और डॉ . प्रभात कुमार सिंघल की संयुक्त रूप से संपादित कृति  कथा वल्लरी एवं डॉ. प्रभात कुमार सिंघल द्वारा संपादित कृति उत्सव के रंग ( बाल काव्य कथा निकुंज )  का नाथद्वारा में आयोजित तीन दिवसीय समारोह में मुख्य अतिथि अमर सिंह बधान, अध्यक्ष रामेश्वर  शर्मा रामू भैया , विशिष्ट अतिथि जयप्रकाश शाकद्वीपीय एवं संस्था प्रधान श्याम प्रकाश देवपुरा एवं अन्य अतिथियों ने लोकार्पण किया।
  डॉ. वैदेही ने बताया कथा वल्लरी में हाड़ोती की 38 महिला रचनाकारों की प्रतिनिधि कहानियां शामिल हैं। उसव के रंग में देश के 22 बच्चों और युवाओं की बाल कहानियां एवं कविताएं शामिल हैं। इस अवसर पर देश भर से आए साहित्यकार उपस्थित रहें।

राष्ट्रीय बाल कहानी कविता के विजेता प्रतियोगियों को पुरस्कृत और सम्मानित किया गया

नाथद्वारा | नाथद्वारा के भगवती प्रसाद देवपुरा प्रेक्षागार में सोमवार से आयोजित स्मृति राष्ट्रीय बाल साहित्य सम्मान समारोह के प्रथम दिवस के प्रथम सत्र में भारतीय त्योहार राष्ट्रीय बाल कहानी एवं कविता प्रतियोगिता के विजेताओं को सम्मानित किया गया। बाल कविता और कहानी के विभिन्न वर्गों में प्रथम, द्वितीय और तृतीय स्थान प्राप्त प्रतिभाओं को सम्मान और प्रोत्साहन पुरस्कार प्रदान किए गए।
मुख्य अतिथि अमर सिंह बधान ने भगवती प्रसाद देवपुरा के साहित्यिक और सांस्कृतिक योगदान को याद करते हुए उन्हें हिंदी और भारतीय संस्कृति का सशक्त संवाहक बताया। अध्यक्षता रामेश्वर प्रसाद शर्मा ने की, जबकि विशिष्ट अतिथि जयप्रकाश शाकद्वीपीय रहे। संचालन करते हुए संस्था प्रधान श्याम प्रकाश देवपुरा ने बताया प्रतियोगिता में 10 राज्यों के 204 प्रतियोगियों ने भाग लिया। संयोजक डॉ. प्रभात कुमार सिंघल ने प्रतियोगियों को पुरस्कृत करवाया।
कार्यक्रम में पत्रकारिता में योगदान के लिए संदीप कुमार पुरोहित को मानद उपाधि दी गई। इस अवसर पर साहित्यकारों ने विचार रखे और कविता पाठ प्रस्तुत किया। समारोह में बड़ी संख्या में साहित्यकार एवं आमजन उपस्थित रहे, जिससे कार्यक्रम सफल और भव्य रूप से संपन्न हुआ।
पुरस्कृत होने वाले प्रतियोगी :
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कार्यक्रम में भारतीय त्योहार राष्ट्रीय बाल कहानी एवं कविता प्रतियोगिता के विभिन्न वर्गों में प्रथम स्थान स्थान प्राप्त करने वालों को 1100 रूपये, द्वितीय 800 रुपए, तृतीय 500 रुपए और प्रोत्साहन स्थान प्राप्त प्रतिभाओं को सम्मान और प्रोत्साहन पुरस्कार प्रदान किए गए। प्रतियोगियों को उपराना पहना कर, श्रीनाथ जी का प्रसाद, तस्वीर और प्रशस्ति पत्र प्रदान कर सम्मानित किया गया। इनमें काव्या सोमानी, श्रीनाथद्वारा, वसुश्रवा द्विवेदी, कोटा, आराध्य नारायण रावत, राया, रत्नेश दाधीच, उदयपुर, मुकुल चौहान, जयपुर, अदिती शर्मा ‘सलोनी’, झालावाड़, डॉ.राखी गोयल ‘आकांक्षा’, सूरतगढ़, यशपाल शर्मा ‘यशस्वी’, चित्तौड़गढ़, डॉ. महेश मधुकर, बरेली,  सपना जैन शाह, उदयपुर, अनिता गंगाधर शर्मा, अजमेर, सलीम स्वतंत्र, कोटा, रंजना माथुर, अजमेर, रेखा शर्मा, बूँदी, प्रेमलता साहू, देवरहा, योगीराज ‘योगी’, कोटा, गोविन्द भारद्वाज, अजमेर, टीकमचन्द्र ढोड़रिया, छबड़ा,. संतोषकुमार सिंह, मथुरा  डॉ. संगीता सिंह, कोटा, यतिका नेभनानी, उदयपुर, कामरान, नवाबगंज, बहराइच, माद्री सिंह,नाथद्वारा, पोशिता माली, मन कुमावत, श्रीनाथद्वारा,  भार्गव नारायण रावत, राया भव्यराज जोशी, श्रीनाथद्वारा, मयंक माली, श्रीनाथद्वारा, आरव उपाध्याय, हाथरस,  उत्कर्ष नारायण रावत, दौसा, अनन्या रावत, दौसा,  दुर्वा शर्मा, सोगरिया-कोटा, ऋतु भटनागर, बैंगलुरु, रुपजी रुप, घाटोली-झालावाड़, प्रियंका गुप्ता, जयपुर डॉ. सुलोचना शर्मा, बूँदी, सौम्या पाण्डेय ‘पूर्ति’, ग्रेटर नोएडा ,संतोष ‘ऋचा’, राया-मथुरा, डॉ. युगलसिंह, कोटा, महेश पंचोली, कोटा, शैलेन्द्र जैन ‘गुनगुना’,
झालावाड़, सुधीर सक्सेना ‘सुधि’,जयपुर,  विजय कुमार शर्मा, कोटा, कन्हैया साहू ‘अमित’, भाटापारा,  विजय भारती, झुंझुनूं ,  विमाल रस्तोगी ‘आयाम’, दिल्ली, लता अग्रवाल ‘तुलजा’,भोपाल, डॉ. शील कौशिक, सिरसा, शोभना श्याम, गाजियाबाद एवं अरनी रॉबर्ट, धमतरी को पुरस्कृत और सम्मानित किया गया।