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विश्व पटल पर बालिकाओं का नवयुगः बदली सोच, उभरी शक्ति

एक समय था जब दुनिया के बड़े हिस्से में बेटी का जन्म बोझ समझा जाता था। गर्भ में ही उसके जीवन का अंत कर दिया जाता, या जन्म के बाद भेदभाव, उपेक्षा और वंचना उसका भाग्य बनती। सदियों तक चली इस दकियानूसी एवं पुरानपंथी सोच ने समाज, सभ्यता और प्रकृति-तीनों को गहरे घाव दिए। किंतु आज उसी दुनिया में सोच के स्तर पर एक निर्णायक मोड़ दिखाई दे रहा है, एक नयी सोच का उदय हो रहा है। गैलप इंटरनेशनल जैसे वैश्विक सर्वे यह संकेत देते हैं कि 44 देशों में माता-पिता की बड़ी संख्या अब संतान के लिंग को लेकर उदासीन हो रही है, उन्हें फर्क नहीं पड़ता कि बच्चा लड़का है या लड़की। यह बदलाव केवल आंकड़ों का खेल नहीं, बल्कि मानव चेतना में घटित एक ऐतिहासिक परिवर्तन है। बालिकाओं को लेकर बदल रही यह सोच मानवीयता का दर्शन करा रही है। यह सच है कि तस्वीर का एक पक्ष उजला है तो दूसरा अब भी चिंताजनक। पिछले 25 वर्षों में दुनिया ने लगभग 70 लाख बच्चियों को बचाया है, यह मानवीय प्रगति का बड़ा प्रमाण है। परंतु यह भी उतना ही कड़वा सत्य है कि आज भी हर साल दस लाख से अधिक बच्चियां गर्भ में ही खत्म कर दी जाती हैं और बीते 45 वर्षों में यह संख्या पाँच करोड़ से अधिक रही है। यानी लड़का-लड़की के भेद का राक्षस अभी पूरी तरह पराजित नहीं हुआ है। इसके बावजूद, उम्मीद की किरण इसलिए प्रबल है क्योंकि अब यह भेद सामाजिक स्वीकृति खो रहा है, और यही किसी भी क्रांति की सबसे ठोस बुनियाद होती है।
भारत में यह संघर्ष और भी जटिल रहा है। कम शिक्षा, रूढ़िवादी पितृसत्तात्मक सोच, अंधविश्वास और सामाजिक भ्रांतियों ने लंबे समय तक बालिकाओं के अस्तित्व पर संकट बनाए रखा। लेकिन हाल के वर्षों में स्थिति में उल्लेखनीय सुधार दिखता है। नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे के अनुसार, भारत में बेटों की चाहत 1999 के 33 प्रतिशत से घटकर अब 15 प्रतिशत रह गई है। यह गिरावट केवल सांख्यिकीय नहीं, बल्कि मानसिकता में आए बदलाव का संकेत है। फिर भी, 15 प्रतिशत भी कम नहीं क्योंकि इसका सीधा असर लिंगानुपात पर पड़ता है। आज देश में लिंगानुपात 1000 लड़कों पर 943 लड़कियों का है। वैज्ञानिक अध्ययनों के अनुसार जन्म के समय लड़के-लड़कियों का प्राकृतिक अनुपात लगभग 105: 100 होता है, जो पाँच वर्ष की आयु तक बराबर हो जाना चाहिए। यदि पाँच साल के बाद भी 1000 लड़कों पर 57 लड़कियाँ कम हैं, तो स्पष्ट है कि प्रकृति नहीं, समाज हस्तक्षेप कर रहा है। 57 बड़ा अंतर है। सुधार की जो गति चल रही है, उस हिसाब से इस अंतर को पाटने में पच्चीस साल से ज्यादा लग जाएंगे। ये बच्चियां दुनिया में कदम रखें और अच्छी तरह से खुशगवार जिंदगी जिएं, इसके लिए उन्हें बचाने के उपाय, उनकी व्यापकता और गति सब बढ़ाने होंगे। सृष्टि के संतुलन के लिए भी यह जरूरी है। समाज की विडम्बनापूर्ण सोच ही वह “बाहरी शक्ति” है-भेदभाव, उपेक्षा, असमान पोषण, स्वास्थ्य और अवसर जो संतुलन को बिगाड़ रही है। मौजूदा सुधार की गति से इस अंतर को पाटने में पच्चीस वर्ष से अधिक लग सकते हैं। इसलिए उपायों की व्यापकता और गति दोनों को बढ़ाना अनिवार्य है।
इस बदलाव के पीछे शिक्षा सबसे बड़ा कारक बनकर उभरी है। जब-जब लड़कियों को शिक्षा के समान अवसर मिले, उन्होंने न केवल अपनी क्षमताएँ सिद्ध कीं, बल्कि समाज की दिशा भी बदली। भारत सहित कई देशों में बालिका शिक्षा, छात्रवृत्ति, डिजिटल साक्षरता, कौशल विकास और स्वास्थ्य सुरक्षा से जुड़ी योजनाओं ने लड़कियों के जीवन-पथ को नया आयाम दिया है। आज ग्रामीण क्षेत्रों तक स्कूल नामांकन में बालिकाओं की भागीदारी बढ़ी है, उच्च शिक्षा में उनकी उपस्थिति मजबूत हुई है और विज्ञान, तकनीक, खेल, प्रशासन तथा उद्यमिता-हर क्षेत्र में वे अपनी पहचान बना रही हैं। महत्वपूर्ण यह भी है कि अब नीतियाँ केवल संरक्षण तक सीमित नहीं रहीं, बल्कि सशक्तिकरण की ओर बढ़ी हैं। शिक्षा के साथ-साथ पोषण, मातृत्व स्वास्थ्य, सुरक्षित परिवहन, डिजिटल पहुँच और नेतृत्व प्रशिक्षण, इन सभी ने मिलकर बालिकाओं के आत्मविश्वास को पंख दिए हैं। यह समग्र दृष्टि ही भविष्य की महिलाओं को “सहायता पाने वाली” नहीं, बल्कि “निर्णय लेने वाली” बनाती है।
दुनिया के कई देशों में महिलाएँ अब राजनीति, प्रशासन और कॉरपोरेट नेतृत्व में अग्रिम पंक्ति में हैं। वे राष्ट्राध्यक्ष हैं, सेनाओं का नेतृत्व कर रही हैं, वैज्ञानिक खोजों की अगुआई कर रही हैं और वैश्विक संस्थानों में नीति-निर्धारण का हिस्सा हैं। यह परिवर्तन इस बात का प्रमाण है कि अवसर मिलने पर प्रतिभा लिंग नहीं देखती। गैलप इंटरनेशनल के सर्वे में उभरी उदासीनता कि संतान का लिंग मायने नहीं रखता, दरअसल इसी विश्वास का सामाजिक विस्तार है कि लड़कियाँ भी उतनी ही सक्षम हैं। पहली बार दुनिया के स्तर पर बालिकाओं को लेकर एक सकारात्मक परिदृश्य उभरा है, इन बालिकाओं को लेकर बदली सोच एवं उभरी शक्ति के परिदृश्यों के बीच यह समय बालिकाओं-महिलाओं पर हो रहेे अपराध, शोषण, बलात्कार, भेदभाव के त्रासद एवं क्रूर स्थितियों पर आत्म-मंथन करने का है, क्योंकि बालिकाओं एवं महिलाओं के समावेश, न्याय व सुरक्षा की स्थिति को बताने वाले वैश्विक शांति व सुरक्षा सूचकांक के 177 देशों में भारत का 128वां स्थान है। एनसीआरबी की रिपोर्ट के अनुसार, महिलाओं के विरूद्ध अपराध में राष्ट्रीय औसत 66.4 है। राजधानी दिल्ली का स्थान 144.4 अंकों के साथ सर्वाेच्च है।
माना जाता है कि 90 प्रतिशत यौन उत्पीड़न जान-पहचान के व्यक्ति ही करते हैं। यानी बालिकाएं अपने ही घर या परिचितों के बीच सबसे ज्यादा असुरक्षित है। कानून और योजनाएँ आवश्यक हैं, पर पर्याप्त नहीं। असली परिवर्तन संस्कृति में होता है-घर के भीतर, भाषा में, परंपराओं में। जब परिवार बेटी के जन्म को उत्सव मानता है, उसकी शिक्षा में निवेश करता है, उसे निर्णयों में भागीदार बनाता है-तभी लिंगानुपात के आँकड़े स्थायी रूप से सुधरते हैं। मीडिया, साहित्य और सिनेमा की भूमिका भी यहाँ निर्णायक है; वे या तो रूढ़ियों को पोषित करते हैं या नई दृष्टि गढ़ते हैं। आज सकारात्मक प्रस्तुतियाँ बढ़ रही हैं, जो लड़कियों को आत्मनिर्भर, साहसी और नेतृत्वकारी रूप में दिखाती हैं यह सांस्कृतिक परिवर्तन का संकेत है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी द्वारा बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ की शुरुआत का लक्ष्य भी बालिका लिंग अनुपात में गिरावट के मुद्दे पर ध्यान केंद्रित करना है।
भविष्य की दिशा स्पष्ट है-समानता केवल अधिकारों की सूची नहीं, बल्कि अवसरों की वास्तविक उपलब्धता है। बालिकाओं को बचाना पहला कदम था; अब उन्हें बढ़ने, उड़ने और नेतृत्व करने देना अगला चरण है। स्वास्थ्य, शिक्षा और सुरक्षा के साथ-साथ रोजगार, संपत्ति अधिकार, डिजिटल अवसर और निर्णय-निर्माण में हिस्सेदारी-ये सभी समानता के स्तंभ हैं। यदि इन पर निरंतर और समन्वित कार्य हुआ, तो आने वाले वर्षों में लिंगानुपात केवल सुधरेगा ही नहीं, बल्कि समाज अधिक संतुलित, संवेदनशील और उत्पादक बनेगा। एक समय था जब बालिका को कोख में ही समाप्त कर दिया जाता था; आज वही दुनिया उसके जन्म पर प्रसन्नता व्यक्त कर रही है। यह बदलाव अधूरा है, पर निर्णायक है। भारत में बेटों की चाहत का घटता ग्राफ, दुनिया भर में लिंग-उदासीनता की बढ़ती प्रवृत्ति और महिलाओं के लिए विस्तृत होती शिक्षा-सशक्तिकरण योजनाएँ-सब मिलकर संकेत देते हैं कि आने वाला समय वास्तव में महिलाओं का समय है। यदि यह गति बनी रही, तो देश की बालिकाएँ न केवल अपना परचम फहराएँगी, बल्कि मानव सभ्यता को अधिक न्यायपूर्ण और संतुलित दिशा भी देंगी। यही सृष्टि का स्वाभाविक और आवश्यक संतुलन है।
प्रेषकः
(ललित गर्ग)
लेखक, पत्रकार, स्तंभकार
ई-253, सरस्वती कंुज अपार्टमेंट
25 आई. पी. एक्सटेंशन, पटपड़गंज, दिल्ली-92
फोनः 22727486, 9811051133

कथा वल्लरी एवं उत्सव के रंग कृतियों का लोकार्पण

कोटा / डॉ. वैदेही गौतम और डॉ . प्रभात कुमार सिंघल की संयुक्त रूप से संपादित कृति  कथा वल्लरी एवं डॉ. प्रभात कुमार सिंघल द्वारा संपादित कृति उत्सव के रंग ( बाल काव्य कथा निकुंज )  का नाथद्वारा में आयोजित तीन दिवसीय समारोह में मुख्य अतिथि अमर सिंह बधान, अध्यक्ष रामेश्वर  शर्मा रामू भैया , विशिष्ट अतिथि जयप्रकाश शाकद्वीपीय एवं संस्था प्रधान श्याम प्रकाश देवपुरा एवं अन्य अतिथियों ने लोकार्पण किया।
  डॉ. वैदेही ने बताया कथा वल्लरी में हाड़ोती की 38 महिला रचनाकारों की प्रतिनिधि कहानियां शामिल हैं। उसव के रंग में देश के 22 बच्चों और युवाओं की बाल कहानियां एवं कविताएं शामिल हैं। इस अवसर पर देश भर से आए साहित्यकार उपस्थित रहें।

राष्ट्रीय बाल कहानी कविता के विजेता प्रतियोगियों को पुरस्कृत और सम्मानित किया गया

नाथद्वारा | नाथद्वारा के भगवती प्रसाद देवपुरा प्रेक्षागार में सोमवार से आयोजित स्मृति राष्ट्रीय बाल साहित्य सम्मान समारोह के प्रथम दिवस के प्रथम सत्र में भारतीय त्योहार राष्ट्रीय बाल कहानी एवं कविता प्रतियोगिता के विजेताओं को सम्मानित किया गया। बाल कविता और कहानी के विभिन्न वर्गों में प्रथम, द्वितीय और तृतीय स्थान प्राप्त प्रतिभाओं को सम्मान और प्रोत्साहन पुरस्कार प्रदान किए गए।
मुख्य अतिथि अमर सिंह बधान ने भगवती प्रसाद देवपुरा के साहित्यिक और सांस्कृतिक योगदान को याद करते हुए उन्हें हिंदी और भारतीय संस्कृति का सशक्त संवाहक बताया। अध्यक्षता रामेश्वर प्रसाद शर्मा ने की, जबकि विशिष्ट अतिथि जयप्रकाश शाकद्वीपीय रहे। संचालन करते हुए संस्था प्रधान श्याम प्रकाश देवपुरा ने बताया प्रतियोगिता में 10 राज्यों के 204 प्रतियोगियों ने भाग लिया। संयोजक डॉ. प्रभात कुमार सिंघल ने प्रतियोगियों को पुरस्कृत करवाया।
कार्यक्रम में पत्रकारिता में योगदान के लिए संदीप कुमार पुरोहित को मानद उपाधि दी गई। इस अवसर पर साहित्यकारों ने विचार रखे और कविता पाठ प्रस्तुत किया। समारोह में बड़ी संख्या में साहित्यकार एवं आमजन उपस्थित रहे, जिससे कार्यक्रम सफल और भव्य रूप से संपन्न हुआ।
पुरस्कृत होने वाले प्रतियोगी :
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कार्यक्रम में भारतीय त्योहार राष्ट्रीय बाल कहानी एवं कविता प्रतियोगिता के विभिन्न वर्गों में प्रथम स्थान स्थान प्राप्त करने वालों को 1100 रूपये, द्वितीय 800 रुपए, तृतीय 500 रुपए और प्रोत्साहन स्थान प्राप्त प्रतिभाओं को सम्मान और प्रोत्साहन पुरस्कार प्रदान किए गए। प्रतियोगियों को उपराना पहना कर, श्रीनाथ जी का प्रसाद, तस्वीर और प्रशस्ति पत्र प्रदान कर सम्मानित किया गया। इनमें काव्या सोमानी, श्रीनाथद्वारा, वसुश्रवा द्विवेदी, कोटा, आराध्य नारायण रावत, राया, रत्नेश दाधीच, उदयपुर, मुकुल चौहान, जयपुर, अदिती शर्मा ‘सलोनी’, झालावाड़, डॉ.राखी गोयल ‘आकांक्षा’, सूरतगढ़, यशपाल शर्मा ‘यशस्वी’, चित्तौड़गढ़, डॉ. महेश मधुकर, बरेली,  सपना जैन शाह, उदयपुर, अनिता गंगाधर शर्मा, अजमेर, सलीम स्वतंत्र, कोटा, रंजना माथुर, अजमेर, रेखा शर्मा, बूँदी, प्रेमलता साहू, देवरहा, योगीराज ‘योगी’, कोटा, गोविन्द भारद्वाज, अजमेर, टीकमचन्द्र ढोड़रिया, छबड़ा,. संतोषकुमार सिंह, मथुरा  डॉ. संगीता सिंह, कोटा, यतिका नेभनानी, उदयपुर, कामरान, नवाबगंज, बहराइच, माद्री सिंह,नाथद्वारा, पोशिता माली, मन कुमावत, श्रीनाथद्वारा,  भार्गव नारायण रावत, राया भव्यराज जोशी, श्रीनाथद्वारा, मयंक माली, श्रीनाथद्वारा, आरव उपाध्याय, हाथरस,  उत्कर्ष नारायण रावत, दौसा, अनन्या रावत, दौसा,  दुर्वा शर्मा, सोगरिया-कोटा, ऋतु भटनागर, बैंगलुरु, रुपजी रुप, घाटोली-झालावाड़, प्रियंका गुप्ता, जयपुर डॉ. सुलोचना शर्मा, बूँदी, सौम्या पाण्डेय ‘पूर्ति’, ग्रेटर नोएडा ,संतोष ‘ऋचा’, राया-मथुरा, डॉ. युगलसिंह, कोटा, महेश पंचोली, कोटा, शैलेन्द्र जैन ‘गुनगुना’,
झालावाड़, सुधीर सक्सेना ‘सुधि’,जयपुर,  विजय कुमार शर्मा, कोटा, कन्हैया साहू ‘अमित’, भाटापारा,  विजय भारती, झुंझुनूं ,  विमाल रस्तोगी ‘आयाम’, दिल्ली, लता अग्रवाल ‘तुलजा’,भोपाल, डॉ. शील कौशिक, सिरसा, शोभना श्याम, गाजियाबाद एवं अरनी रॉबर्ट, धमतरी को पुरस्कृत और सम्मानित किया गया।

पांडिच्चेरी विश्वविद्यालय में ‘भाषा प्रौद्योगिकी के लिए AI, जेन-AI और बिहेवियरल-AI’ पर ऑनलाइन अंतरराष्ट्रीय कार्यशाला

भारत सरकार के शिक्षा मंत्रालय के ‘स्वयम्’ पोर्टल पर आयोजित ‘भाषा-प्रौद्योगिकी का परिचय’ निःशुल्क ऑनलाइन पाठ्यक्रम के अंतर्गत समावेशी शिक्षा, युवा सशक्तिकरण, सामाजिक न्याय, स्टार्टअप एवं नवाचार पारिस्थितिकी तंत्र तथा डिजिटल युग में भारतीय भाषाओं का सुदृढ़ीकरण के उद्देश्य से दिनांक: 3 जनवरी 2026 (सावित्रीबाई फुले जयंती) से 16 जनवरी 2026 (राष्ट्रीय स्टार्टअप दिवस) तक भाषा प्रौद्योगिकी पखवाड़ा मनाया जा रहा है। इसी पखवाड़े के अंतर्गत बुधवारीय साप्ताहिक कार्यशाला शृंखला में 58वीं अंतरराष्ट्रीय कार्यशाला दिनांक 7 जनवरी 2026 को शाम 6 बजे (भारतीय समयानुसार) सी-डैक, दिल्ली की वैज्ञानिक ‘एफ’ और प्रमुख न्यूरो-कॉग्निटिव AI ग्रुप डॉ. प्रियंका जैन ‘भाषा प्रौद्योगिकी के लिए AI, जेन-AI और बिहेवियरल-AI’ विषय पर प्रतिभागियों को प्रशिक्षित करेंगी ।  पांडिच्चेरी विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग के विभागाध्यक्ष एवं पाठ्यक्रम समन्वयक डॉ. सी. जय शंकर बाबु करेंगे और कार्यक्रम का संचालन श्री उमेश कुमार प्रजापति ‘अलख’ करेंगे ।

सी-डैक दिल्ली, भारत सरकार के इलेक्ट्रॉनिकी और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय (MeitY) के तहत एक अग्रणी अनुसंधान संगठन और वैज्ञानिक संस्था है। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) के क्षेत्र में 25 वर्षों का व्यापक अनुभव रखने वाली डॉ. जैन विज्ञान लेखन और अनुसंधान के क्षेत्र में विशिष्ट योगदान के लिए भारत के राष्ट्रपति के करकमलों से ‘AWSAR-2019’ पुरस्कार से सम्मानित हो चुकी हैं । वर्तमान समय पर डॉ. प्रियंका जैन सी-डैक दिल्ली के ‘न्यूरो-कॉग्निटिव एआई और एक्सआर’ (Neuro-Cognitive AI & XR) समूह का नेतृत्व कर रही हैं। कई अनुसंधान परियोजनाओं के क्रियान्वयन सक्रिय डॉ. जैन ब्रेन कंप्यूटर इंटरफेस (BCI), बिहेवियरल कंप्यूटिंग, डिजिटल फॉरेंसिक और क्वांटम कंप्यूटिंग के तकनीकी प्रदर्शन में विशेषज्ञता रखती है।

भाषा-प्रौद्योगिकी निःशुल्क ऑनलाइन पाठ्यक्रम के जनवरी, 2026 सत्र की कक्षाएँ भारत सरकार के स्वयं पोर्टल पर 13 जनवरी 2026 से आरंभ होने वाली हैं ।  पाठ्यक्रम में जुड़ने के लिए स्वयं पोर्टल पर पंजीकरण कर सकते हैं । भारतीय भाषाओं की सांस्कृतिक, सामाजिक और तकनीकी पुनर्स्थापना के आत्मीय अनुष्ठान के रूप में भाषा प्रौद्योगिकी संबंधी साप्ताहिक कार्यशालाओं का नियमित आयोजन किया जा रहा है। भारत की विविधता को शक्ति में बदलने, कृत्रिम बुद्धिमत्ता सहित भाषा प्रौद्योगिकी के बहुआयामी समावेश भारत को ‘डिजिटल लोकतंत्र’ में विकसित करने तथा चेतना जागृति की पहल है। ई-शिक्षा की ओर से भाषा प्रौद्योगिकी पखवाड़ा के तहत भी कई गतिविधियों का आयोजन हो रहा है ।

पांडिच्चेरी केंद्रीय विश्वविद्यालय, पुदुच्चेरी के हिंदी विभाग द्वारा आयोजित कार्यशालाओं में इच्छुक प्रतिभागी https://meet.google.com/art-tauu-pmo लिंक के माध्यम से जुड़ सकते हैं ।

डाकघरों में नये आधार नामांकन एवं बच्चों के लिए अनिवार्य बायोमेट्रिक अपडेट पूर्णतः निःशुल्क

अहमदाबाद। नागरिकों को अपने नजदीकी क्षेत्र में ही आधार सेवा उपलब्ध कराने के उद्देश्य से पूरे देश में डाकघरों में आधार केंद्र स्थापित किए गए हैं। इन डाकघर आधार केंद्रों के माध्यम से नागरिकों को नए आधार नामांकन तथा किसी भी प्रकार के संशोधन या विसंगति की स्थिति में आधार अपडेट कराने में अत्यंत सुविधा प्राप्त हो रही है। इसी कड़ी में आधार सेवाओं की निरंतर बढ़ती मांग एवं नागरिकों की सुविधा को ध्यान में रखते हुए गांधीनगर में सेक्टर-17 डाकघर में आधार सेवा केंद्र का शुभारंभ 7 जनवरी2026 को उत्तर गुजरात परिक्षेत्र के पोस्टमास्टर जनरल श्री कृष्ण कुमार यादव द्वारा किया गया।  प्रातः 08:00 बजे से सायं 06:00 बजे तक कार्यरत इन दो नए आधार काउंटर  के साथ गांधीनगर में कुल 38 डाकघर आधारसेवा केंद्र कार्यरत हो गए। गांधीनगर प्रधान डाकघर में भी लोगों को समयबद्ध एवं सुगम सेवा उपलब्ध कराने के उद्देश्य से  प्रातः 08:00 बजे से सायं 06:00 बजे तक अब दो आधार काउंटर कार्यरत कर दिए गए हैं। उत्तर गुजरात परिक्षेत्र में 257 डाकघर आधारसेवा केंद्र के माध्यम से सेवाएं उपलब्ध हैं। डाकघरों में आधार नामांकन एवं बच्चों के लिए अनिवार्य बायोमेट्रिक अपडेट (5–7 वर्ष एवं 15–17 वर्ष की आयु वर्ग में) पूर्णतः निःशुल्क प्रदान किया जाता है। वहीं डेमोग्राफिक अपडेटजैसे नामपताजन्मतिथि अथवा मोबाइल नंबर में संशोधन के लिए ₹75 शुल्क निर्धारित किया गया है। फिंगरप्रिंट एवं फोटो अपडेट जैसे बायोमेट्रिक अपडेट हेतु ₹125 शुल्क देय है।

पोस्टमास्टर जनरल श्री कृष्ण कुमार यादव ने कहा कि  वर्तमान में आधार सभी नागरिकों के लिए अपरिहार्य है। ऐसे में नए आधार सेवा केंद्र प्रारंभ करने की यह पहल नागरिक-केंद्रित सेवाओं को और अधिक सुदृढ़ करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। इसी कड़ी में  भारतीय डाक विभाग द्वारा सभी स्कूलों में बच्चों के अनिवार्य बायोमेट्रिक अपडेट के लिए भी विशेष अभियान चलाया जा रहा है। विभिन्न स्कूल अपने यहाँ आवश्यकतानुसार विशेष कैंप के लिए डाक विभाग को आग्रह भी कर सकते हैं। सुदूरतम क्षेत्रों में आम लोगों तक पहुंचने के लिए डाकघरों में लैपटॉप आधार किटों के माध्यम से शिविर मोड में आधार नामांकन व अद्यतन की सुविधा प्रदान की जा रही हैजिससे अंतिम छोर तक सेवाओं की प्रभावी पहुँच सुनिश्चित हो रही है। यह पहल डिजिटल इंडियाजनसेवा और अंतिम छोर तक सेवाओं की पहुँच सुनिश्चित करने की दिशा में डाक विभाग की प्रतिबद्धता को दर्शाती है।

गांधीनगर मंडल के प्रवर अधीक्षक डाकघर श्री शिशिर कुमार ने बताया कि यूआईडीएआई द्वारा जारी निर्देशों के तहत प्रत्येक व्यक्ति को आधार नामांकन/ अपडेट केंद्र पर कम से कम तीन बार जाना अनिवार्य है। पहली बार 05 वर्ष की आयु तक नया आधार नंबर बनवाने के लिएदूसरी बार 05 वर्ष की आयु पूरी होने के बाद बच्चे के स्वयं के बायोमेट्रिक विवरण को अनिवार्य रूप से अपडेट कराने के लिए तथा तीसरी बार 15 वर्ष की आयु पूर्ण होने के बाद व्यक्ति के अपने पुनः बायोमेट्रिक अपडेट के हेतु केंद्र पर उपस्थित होना आवश्यक होता है। बच्चों के लिए अनिवार्य बायोमेट्रिक अपडेट (5–7 वर्ष एवं 15–17 वर्ष की आयु वर्ग में) पूर्णतः निःशुल्क है।

इस अवसर पर प्रवर अधीक्षकगांधीनगर श्री शिशिर कुमारसहायक निदेशक श्री वी एम वहोरा, डिप्टी अधीक्षक श्री दीपक वाढेरसहायक डाक अधीक्षक श्री हेमंत कंतारश्री दक्षेश चौहानश्री भाविन प्रजापतिडाक निरीक्षक श्री चिराग सुथार, पोस्टमास्टर श्री खेमचंदभाई वाघेला, सुश्री रइसा मन्सुरी, श्री संजय पटेल सहित तमाम अधिकारी-कर्मचारी उपस्थित रहे।

संघ शताब्दी वर्ष विशेष – बैतूल की जेल में लिखा गया था आरएसएस का संविधान

बैतूल जेल से संचालित सत्याग्रह से डरकर ही नेहरूजी ने संघ से हटाया था प्रतिबंध

सर्वविदित है कि परमपूजनीय श्रीगुरुजी माधव सदाशिवराव गोलवलकर बैतूल के कारागार के बैरक क्र. 1 में रह चुके हैं। वे यहाँ 1 जनवरी 1949 से 6 जून 1949 तक बंदी रहे थे। बैतूल कारागार के जिस बैरक में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के द्वितीय परमपूजनीय सरसंघचालक श्रीगुरुजी को बंदी बनाकर रखा गया था वह कक्ष आज भी एक लघु स्मारक के रूप में रिक्त रहता है। इस कक्ष में श्री गुरुजी का एक चित्र लगा हुआ है व उनके कारागार प्रवास के संदर्भ में कक्ष की दीवार पर संक्षिप्त लेखन भी है। बैतूल जेल के इस लघु स्मारक को अब एक भव्य, दिव्य स्मारक में परिवर्तित करने की चाह देश भर के स्वयंसेवकों में है।

वर्ष 2017 में परमपूजनीय सरसंघचालक डॉ. मोहनराव जी भागवत ने भी जेल के इस कक्ष में जाकर श्रीगुरुजी को श्रद्धासुमन अर्पित किए थे।

गांधी जी की दुखद हत्या के पश्चात् नेहरू सरकार ने आरएसएस पर प्रतिबंध लगा दिया था। श्री गुरुजी सहित बीस हजार अग्रणी स्वयंसेवक गिरफ्तार कर लिए गए थे। उस समय के प्रसिद्ध मराठी समाचार पत्र ‘केसरी’ के संपादक केतकर जी सरकार व संघ के मध्य संवाद करा रहे थे। केतकर जी 12 व 16 जनवरी 1649 को श्री गुरुजी से सिवनी कारागार में मिले थे। उन्होंने श्री गुरुजी से संघ के सत्याग्रह को समाप्त करने का आग्रह किया। श्रीगुरुजी ने परिस्थितियों का आकलन किया व आंदोलन स्थगित कर दिया। 22 जनवरी को संघ के सत्याग्रह प्रभारी महावीर जी ने आंदोलन स्थगित करने की घोषणा कर दी। तब जाकर कहीं सरकार ने राहत की साँस ली थी।

यह भी एक स्मरणीय तथ्य है कि नेहरू जी की हठधर्मिता से संघ पर 1948 में लगे प्रतिबंध हटाने की भूमिका भी बैतूल जेल के बैरक क्र. 1 में ही लिखी गई थी।
देश के प्रमुख समाचार पत्र ‘द ट्रिब्यून’ ने 22 जन. 1949 को संघ प्रतिबंध को अनैतिक बताते हुए लिखा – “अब नेहरू सरकार को संघ से प्रतिबंध हटा लेना चाहिए”।

संघ के इस आंदोलन के प्रति देश की जनता में बढ़ती लोकप्रियता को देखते हुए नेहरू सरकार घबरा गई थी। सरकार ने तत्काल ही पाँसा फेंका और प. मौलिचन्द्र शर्मा को संघ से चर्चा करने हेतु आगे बढ़ाया।

इस समय तक श्री गुरुजी को सिवनी कारागार से बैतूल कारागार में स्थानांतरित किया जा चुका था। 10 जुलाई को मौलिचन्द्र शर्मा श्री गुरुजी से भेंट करने बैतूल जेल आए थे। बैतूल जेल से ही श्री गुरुजी एवं  मौलिचन्द्र शर्मा की चर्चा के आधार पर नेहरू जी ने 12 जुलाई को संघ से प्रतिबंध हटाया था व 13 जुलाई को प्रातः समय में श्री गुरुजी को बैतूल जेल से मुक्त कर दिया गया था। (संदर्भ – श्री गुरुजी समग्र, खंड 2, पृष्ठ 45)

बैतूल जेल से निकलने के तत्काल बाद ही श्री गुरुजी जीटी एक्सप्रेस से नागपुर चले गए थे। श्री गुरुजी के बैतूल से प्रस्थान के समय का एक किस्सा संघ क्षेत्रों में बहुधा ही कहा सुना जाता है। कहा जाता है कि, श्री गुरुजी ने बैतूल स्टेशन पर छोड़ने आए स्वयंसेवकों से कहा था – “जिस दिन बैतूल में संघ का कार्य सुदृढ़ और संपुष्ट हो जाएगा उस दिन समूचे देश में संघ विचार सुदृढ़ हो जाएगा”।

बैतूल जेल में श्रीगुरुजी के बंदी रहने के समय को दुखद किंतु ऐतिहासिक काल कहा जाता है। श्री गुरुजी ने इस विकट, दुधूर्ष अग्निपरीक्षा के समय में अद्भुत धेर्य का परिचय देते हुए बैतूल जेल से अनेकों पत्रों व संवादों के माध्यम से देश भर के स्वयंसेवकों के मनोबल को बनाए रखा था तथा देश के वातावरण में राष्ट्रीयता का प्रवाह भी बनाए रखा था। समूचे देश के लाखों स्वयंसेवकों व सामान्य जनता श्रीगुरुजी के संदेशों हेतु बैतूल जेल की ओर टकटकी लगाए देखते रहती थी। बैतूल देश की धड़कनों के केंद्र में आ गया था। बैतूल जेल में रहते हुए ही श्री गुरुजी ने नेहरू सरकार पर इतना दबाव बना लिया था कि नेहरू सरकार को न चाहते हुए भी श्री गुरुजी को जेल से मुक्त करना पड़ा था।

श्री गुरुजी के बैतूल जेल में बंदी रहने के मध्य उन्होंने देश भर में ऐसा वातावरण निर्मित कर दिया था कि गृह मंत्री वल्लभभाई पटेल ने भी नेहरू जी पर अंगुली उठाते हुए 27 फरवरी 1948 को एक पत्र लिखा था – “बापू की हत्या की जाँच में हो रही प्रगति पर मैने प्रायः प्रतिदिन ध्यान दिया है। सभी प्रमुख अपराधियों ने अपनी गतिविधियों के लम्बे और विस्तृत वक्तव्य दिए हैं। उन वक्तव्यों से यह बात भी स्पष्ट रूप से उभर कर आती है कि इस सारे मामले में संघ कहीं भी संलिप्त नहीं है।” (संदर्भ – 1.श्रीगुरुजी समग्र दर्शन-2, पृष्ठ 2-10, संदर्भ 2. पहली अग्नि परीक्षा, मामा माणिकचंद्र वाजपेयी, पृष्ठ 23-24, संदर्भ 3. Sardar Patel’s Correspondence, Vol. VI PAGE 56)

श्री गुरुजी को बैतूल कारागार में नाना प्रकार से प्रताड़ित किया गया था। उन्हें भोजन, पहनने को कपड़े व कंबल आदि अत्यंत निम्नस्तरीय प्रकार के दिए जाते थे। कष्ट, प्रताड़ना, व निम्न स्तरीय भोजन, वस्त्र से उत्पन्न कष्ट से श्रीगुरुजी को कोई अन्तर नहीं पड़ता था। वे तो निस्पृह योगी थे। बिना भगवा पहने ही एक महान सन्यासी थे। उन्होंने बैतूल जेल में मिले उस सम्पूर्ण गरल को नीलकंठ बन अपने कंठ में स्थिर कर दिया था। बैतूल जेल उनके लिए एक साधना केंद्र हो गई थी।

बैतूल कारागार में श्रीगुरूजी ने संघ का संविधान तैयार करने के कार्य को प्रारंभ व पूर्ण किया था व अपने हस्ताक्षर के साथ इसे जारी किया था।

श्रीगुरुजी गोलवलकर का बैतूल जेल प्रवास संघ के इतिहास का एक निर्णायक मोड़ था, और, बैतूल की यह जेल संघ के संविधान की जन्मस्थली।

बैतूल कारागार में रहते हुए श्रीगुरुजी ने संघ की राजनाति में शुचिता, पवित्रता व समाज योगदान के संदर्भ में तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू और गृह मंत्री सरदार वल्लभभाई पटेल के साथ बहुत व्यापक पत्राचार किया। इन पत्रों को बाद में “Justice on Trial” नामक पुस्तक में प्रकाशित भी किया गया था।

श्री गुरुजी ने तत्कालीन नेहरूवियन सरकार से आग्रह किया था कि यदि संघ के विरुद्ध कोई साक्ष्य है तो उसे सार्वजनिक किया जाए, अन्यथा प्रतिबंध हटाकर स्वयंसेवकों को राष्ट्र निर्माण में योगदान देने दिया जाए।

बैतूल कारागार में रहने के मध्य श्री गुरुजी उस समय के उदारवादी नेता टी.आर.वी. शास्त्री से सतत् संपर्क में थे। शास्त्री जी ने भी नेहरू-गांधी की सरकार और गुरुजी के बीच मध्यस्थता की थी।

उस समय की जवाहर लाल नेहरू की आत्ममुग्ध, अंग्रेजीदां शैली से चलने वाली सरकार ने संघ पर नाना प्रकार के आरोप लगाए थे। श्रीगुरुजी ने जेल में रहते हुए ही समूचे राष्ट्र को स्पष्ट कर दिया था कि संघ एक घोर राष्ट्रवादी, संस्कृति केंद्रित व समाज आधारित संगठन मात्र है।

तत्कालीन गृह सचिव आर.एन. बनर्जी ने, गांधी हत्या में संघ की संलिप्तता के मिथ के संदर्भ में सार्वजनिक तौर पर कहा था कि सम्पूर्ण, गहन व सघन जांच की गई है जिसमें संघ का गांधी जी की हत्या में रज मात्र भी भूमिका नहीं दिखती है।

आज बैतूल जिले की यह ऐतिहासिक जेल निजी क्षेत्र को विक्रित की जाकर तोड़े जाने के कगार पर है। आवश्यकता इस बात की है कि जेल परिसर में निर्मित इस ‘गुरुजी कक्ष’ को या ‘संघ संविधान जन्म कक्ष’ को सुरक्षित रखकर एक स्मारक के रूप में सुरक्षित रखा जाए। समूचा देश बैतूल जेल के इस कक्ष को एक विशाल, भव्य स्मारक के रूप में देखना चाहता है।

(लेखक समसामयिक विषयों पर शोधपूर्ण लेखन करते हैं)

औरंगजेब के नाम गुरु गोविन्द सिंह का ऐतिहासिक पत्र

ज़फ़रनामा अर्थात ‘विजय पत्र’ गुरु गोविंद सिंह द्वारा मुग़ल शासक औरंगज़ेब को लिखा गया वह पत्र है जो उन्होंने आनन्दपुर छोड़ने के बाद सन् 1706 में औरंगजेब को लिखा था। ज़फ़रनामा, दसम ग्रंथ का एक भाग है और इसकी भाषा फ़ारसी है।
 औरंगजेब के पत्र के उत्तर में लिखे गए फारसी भाषा के जफरनामा नामक पत्र में , कुछ इतिहासकारों के मतानुसार , एक हजार चार के लगन ही शेर थे , और जिस पत्र का ऊपर उल्लेख किया गया है उसमें केवल सो के के लगभग शेर थे। अतः प्रतीत होता है कि यह पत्र उन्होंने जफरनामे वाले विस्तृत पत्र की भूमिकास्वरूप उससे पूर्व ही लिखा होगा। इस पत्र में तत्कालीन परिस्थितियों का बहुत स्पष्ट विवरण मिल जाता है। औरंगजेब तथा गुरु गोविन्द सिंह के पारस्परिक सम्बन्ध कैसे थे , इस बात का भी ज्ञान होता है। यह पत्र इतिहास की अमूल्य निधि है।
      आजकल कुछ सिख उग्रवादियों और औरंगजेब के अनुयायियों के बीच बहुत गाढ़ी छन रही है। उन्हें गुरु गोविन्द सिंह का वह पत्र पढ़ना चाहिये जो गुरुजी ने औरंगजेब को लिखा था। मूल पत्र गुरुमुखी में लिखा गया था , इसलिए इस पत्र का उपयोग पश्चिमी इतिहासकार न कर सके। यहां प्रस्तुत हैं उक्त पत्र के कुछ अंश। सिक्खों के दशम गुरु श्री गोविन्द सिंह ने तत्कालीन भारतीय सम्राट औरंगजेब के नाम जो पत्र लिखे थे , उन के सम्बन्ध में जनसामान्य को बहुत कम मालूम है। छत्रपति शिवाजी महाराज का राजा जयसिंह के नाम लिखा हुआ महान् और ऐतिहासिक पत्र पर्याप्त प्रकाश में आ चुका है परन्तु गुरु गोविन्द सिंह जी द्वारा सम्राट औरंगजेब को लिखे हुए पत्र अभी तक गुरुमुखी अक्षरों में बद्ध होने के कारण हिन्दी संसार के समक्ष नहीं आ पाये। फारसी भाषा में लिखा हुआ शिवाजी का पत्र सन् १६२२ के अगस्त मास की नागरी प्रचारिणी सभा , काशी की ‘ नागरी प्रचारिणी पत्रिका ‘ में बाबू जगन्नाथ दास रत्नाकर की ओर से प्रकाशित हुआ था।
        इसकी भूमिका में रत्नाकर जी ने लिखा था कि उन्होंने तब से लगभग तीस वर्ष पूर्व पटना गुरुद्वारे के महन्त स्वर्गत बाबा सुमेरसिंह के पास दो पत्र देखे थे। इनमें से एक तो गुरु गोविन्द सिंह का वह पत्र था जो उन्होंने दक्षिण जाने के पूर्व औरंगजेब के नाम लिखा था , और दूसरा मिर्जा राजा जयसिंह के नाम लिखा हुवा शिवाजी का पत्र था। रत्नाकर जी ने इन दोनों पत्रों की प्रतिलिपियां प्राप्त कर ली थी।
       गुरु गोविन्द सिंह का औरंगजेब के नाम लिखा हुआ पत्र वह नहीं या जो इतिहास में ” जफरनामा ‘ के नाम से विख्यात है। रत्नाकर जी का कथन है कि जफरनामे में आठ – नौ सौ शेर थे , जबकि इस पत्र में जो उन्होंने बाबा सुमेर सिंह से प्राप्त किया था , सौ से अधिक शेर नहीं थे। ये दोनों पत्र दुर्भाग्यवश रत्नाकर जी से गुम हो गये। पर्याप्त समय पश्चात् शिवाजी वाला पत्र उन्हें अपने पुराने कागजों में मिल गया जिसे उन्होंने नागरी प्रचारिणी पत्रिका में प्रकाशित करा दिया। गुरु गोविन्द सिंह का पत्र रत्नाकर जी से खो चुका था और उस समय तक बाबा सुमेर सिंह की मृत्यु हो चुकी थी। इस कारण उसे पुनः प्राप्त करने का मार्ग अवरुद्ध हो चुका था।
       रत्नाकरजी ने उस पत्र के कुछ बंद अपनी स्मृति से सरदार उमराव सिंह मजीठिया को भेजे थे। सरदार जी ने उन्हें अपनी ओर से क्रमबद्ध कर उसकी एक प्रतिलिपि पंजाबी के वयोवृद्ध विद्वान भाई वीरसिंह बी को भेजी। भाई वीरसिंह ने उन बन्दों को ‘ उच्च का पी नामक लेख में खालसा समाचार के १६ जुलाई १६४२ अंक में प्रकाशित करा दिया।
      इस सम्पूर्ण पत्र में कितने शेर थे और किस क्रम में थे यह आज तक ज्ञात नहीं हो सका। अभी तक २४ शेर ही प्राप्त हो सके हैं। ऐतिहासिक दृष्टि से पत्र अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है। इस पत्र में जितने शेर अभी तक प्राप्त हुए हैं , वे आंशिक रूप है उसकी महत्ता प्रकट करने में सर्वथा समर्थ हैं। उन्हें यहां दिया जा रहा है
१ तलवार और कटार के स्वामी का स्मरण कर और धनुष – बाण तथा ढाल के कर्ता का नाम लेकर ,
२ युद्ध क्षेत्र में वीरगति प्राप्त शेर वीरों के इष्ट का और वायु के समान गतिशील अश्वों के निर्माता का ,
३ उसका जिसने तुझे बादशाहत दी और हमें धर्म रक्षा का गौरव प्रदान किया।
४. तुझको दिया विश्वासघात और धोखे का क्षेत्र और मुझे सत तथा स्वच्छ हृदय से युक्त उपाय।
५ . औरंगजेब नाम तुझे शोभा नहीं देता। राज सिंहासन को शोभा यमान करने वाले द्वारा विश्वासघात और धोखा अच्छा नहीं लगता।
६ . तेरी तसबीह मनके और धागे से अधिक कुछ नहीं क्योंकि तू उन मनकों को चुगने के दाने बनाता है और धागे को अपना जाल।
७. तूने अपने पिता की मिट्टी निकृष्ट कर्म करके अपने भाई के लहू से गूधी है।
८. और उसके साथ अपने साम्राज्य के लिए काच्चे भवन की नींव रखी है।
९. मैं अब ईश्वर कृपा से लोहे के पानी ( तलवार की धार की तरह वर्षा करूंगा।
१०. जिससे इस पवित्र भूमि पर उस अशुभ साम्राज्य का चिह्न भी शेष न रहे ।
११. दक्षिण के पर्वतों से तू प्यासा जौटा है। मेवाड़ से भी कड़वा चखा है।
१२. तेरे तलवों के नीचे मैं इस तरह आग रखूगा कि कि तू पंजाव का पानी मीनपी सके।
१३ . क्या हुआ जो गीदड़ ने विश्वासघात करके सिंह के बच्चे को मार डाला।
१४. जवकि खू ख्बार शेर अभी तक जिन्दा है और वह तुझसे बदला लेगा।
१५ मैं अब तेरे खुदा ( के नाम पर खाई सौगन्ध ) पर कोई विश्वास नहीं करूंगा , क्योंकि मैं तेरे खुदा के कलाम ( के नाम पर किये गये कार्यो ) को देख चुका हूं। तेरी सौगन्ध पर विश्वास नहीं रहा और अन तलवार पकड़ने के सिवाय कोई उपाय नहीं बचा है।
१७ . यदि तू चतुर बाच है तो मैं भी एक सिंह को कठघरे से छोडूगा।
१८. यदि मेरे साथ तेरी बातचीत हुई तो मैं तुझे उचित मार्ग प्रदर्शित करूंगा।
१९. युद्ध क्षेत्र में दोनों सेनाएं पंक्तिबद्ध हो जाएं और शीघ्र ही आप में परिचित हों।
२०. दोनों के मध्य दो फरसंग ( सात या साढ़े सात मील ) क अन्तर हो ।
 २१ . रण क्षेत्र में मैं अकेला आऊंगा और तू दो अश्वारोही साथ ला सकता है।
२२. तूने लाड़ – प्यार और सुख के फल खाए हैं , युद्धरत शूरों सम्मुख नहीं आया है।
२३ . तू स्वयं तलवार लेकर युद्धक्षेत्र में आ , ईश्वर की सृष्टि का नाश मत कर।
   इन शेरों से सम्पूर्ण पत्र की भावना तथा शैली का ज्ञान हो जाता है। रत्नाकर जी के अनुसार इस पत्र में सौ से अधिक शेर थे। इस प्रकार इसका तीन चौथाई भाग अभी अन्धकार में है जिसकी खोज करना आवश्यक है। यह पत्र कब लिखा गया तथा यह इतिहासप्रसिद्ध जफरनामे से पहले का है अथवा बाद का , इसका निर्णय करना कठिन है , किन्तु इतन निश्चित है कि तब तक गुरु गोविन्द सिंह के चारों पुत्रों का बलिदान है चुका था।
  चमकौर के युद्ध ( २३ दिसम्बर १७०४ ) के पश्चात् गुरु गोविन्द सिंह जब भटिंडे की ओर जा रहे थे , तब दीने नामक स्थान पर उन्हें औरंगजेब का पत्र प्राप्त हुआ था जिसमें उन्हें मिलने के लिए दक्षिण आमंत्रित किय गया था। उस पत्र में खुदा तथा कुरान की सौगंधों सहित इस बात का विश्वास दिलाया गया था कि उन्हें किसी प्रकार का कष्ट या धोखा न दिया जाएगा। साथ ही धमकियों के भी कुछ वाक्य इस पत्र में थे।
गुरु गोविन्द सिंह ने शाही हरकारों को उत्तर दिया था कि हम इस पत्र का उत्तर विस्तार सहित भेजेंगे और फिर हमें बादशाह का कोई पत्र प्राप्त होना तो हम उनसे मिलने अवश्य अवश्य आयेंगे।

परकाया प्रवेश का विज्ञान और भारत में परकाया प्रवेश की परंपरा

अध्यात्म में परकाया प्रवेश का अर्थ है एक आत्मा का एक शरीर को छोड़कर दूसरे शरीर में प्रवेश कर जाना। यह सुनने में अविश्वनीय लगता है लेकिन कई उदाहरणों से कहीं न कहीं यह प्रमाणित हुआ है कि ऐसा होना सम्भव है। तो, चलिए समझते हैं कि परकाया प्रवेश क्या है और यह कैसे होता है !
परकाया का अर्थ है कि एक व्यक्ति अपने शरीर के बाहर दूसरे शरीर में प्रवेश कर सकता है !
उदाहरण –
एक शादीशुदा महिला के मृत्यु के तुरन्त बाद किसी दूसरे की आत्मा उसके शरीर में प्रवेश कर गयी थी !
परकाया प्रवेश ध्यान योग, ज्ञान योग और योग निंद्रा द्वारा सम्भव हो सकता है !
शास्त्रों में काया प्रवेश की प्रक्रिया का वर्णन :
मृत्यु के समय जीवात्मा इस स्थूल शरीर से अलग होकर सूक्ष्म शरीर में ही जाता है !
बेहद रहस्यमयी है परकाया प्रवेश की प्रक्रिया, जानिये इसमें किस प्रकार आत्मा एक शरीर से दूसरे शरीर में प्रवेश करती है !
अध्यात्म में पुनर्जन्म के जैसे ही परकाया प्रवेश एक अद्भुत और रहस्यमय विषय है। परकाया का अर्थ है कि एक व्यक्ति अपने शरीर के बाहर दूसरे शरीर में प्रवेश कर सकता है। अर्थात जब एक सिद्ध योगी अपनी योग-साधना के बल से जीते-जी किसी दूसरे के मृत या जीवित शरीर में सूक्ष्म रूप से प्रवेश कर जाता है, तो उसे परकाया-प्रवेश कहते हैं। इसके बारे में वेदांत और तंत्र शास्त्र में विस्तार से बताया गया है।
1. प्राचीन समय में परकाया प्रवेश के कई उदाहरण मिलते हैं और आज के युग में कुछ ऐसे केस सामने आये हैं, जो परकाया प्रवेश के सिद्धांत को कहीं न कहीं प्रमाणित करते हैं। ऐसी ही एक घटना उत्तर प्रदेश में हुई थी, जहाँ एक शादीशुदा महिला के मृत्यु के तुरन्त बाद किसी दूसरे की आत्मा उसके शरीर में प्रवेश कर गयी थी !
2. परकाया प्रवेश का एक बड़ा उदाहरण शंकराचार्य का भी है, जब उनका एक विदूषी महिला भारती से शास्त्रार्थ हुआ। उन्हें कामशास्त्र के विषय को लेकर शास्त्रार्थ बीच में ही रोकना पड़ा था, क्योंकि उस विषय पर शंकराचार्य जी जानकारी और अनुभव शून्य थे ! इसलिए, उन्होंने इस विषय पर ज्ञान और अनुभव प्राप्त करने के लिए समय मांगा। इस समयावधि में उन्होंने अपने सूक्ष्म शरीर को एक राजा के शरीर में प्रवेश करवाया और राज का जीवन जीकर कामशास्त्र का ज्ञान प्राप्त किया। इस दौरान उनके स्थूल शरीर की सुरक्षा उनका शिष्य करता रहा था । शंकराचार्य ने जैसे ही ज्ञान प्राप्त किया, वह अपने असली शरीर में लौट आये और फिर भारती से चर्चा करके उनको शास्त्रार्थ में पराजित किया !
क्या परकाया प्रवेश सम्भव है ?
परकाया प्रवेश करना सरल नहीं है ! परकाया प्रवेश ध्यान योग, ज्ञान योग और योग निंद्रा द्वारा सम्भव हो सकता है। कोई सिद्धहस्त योगी, संत, महात्मा अथवा सिद्ध पुरूष ही योग क्रियाओं के द्वारा परकाया प्रवेश कर सकता है। परकाया प्रवेश का सिद्धांत इस बात पर आधारित है कि मानव शरीर दो प्रकार का शरीर है। एक स्थूल शरीर जो दिखाई देता है और दूसरा सूक्ष्म शरीर, जो दिखाई नहीं देता है। शास्त्रों के अनुसार, सूक्ष्म शरीर की लम्बाई अंगूठे के बराबर है और यह इतना अधिक पारदर्शी है कि प्रकाश भी उसके आर-पार जा सकता है। कुछ जानकारों ने आकाश, तेज और वायु इन तीन तत्त्वों को सूक्ष्म शरीर माना है और प्रेत का शरीर भी इन्हीं तीन तत्वों से बना होता है। मृत्यु के समय जीवात्मा इस स्थूल शरीर से अलग होकर सूक्ष्म शरीर में चला जाता है। सूक्ष्म शरीर की गति मन के वेग के समान तीव्र होती है। परकाया प्रवेश की प्रक्रिया में यह सूक्ष्म शरीर ही एक स्थूल शरीर को छोड़कर दूसरे स्थूल शरीर को धारण करता है !
शास्त्रों में काया प्रवेश की प्रक्रिया का वर्णन :
शास्त्रों और वेदों में परकाया प्रवेश के अलग-अलग तरीके बताये गए हैं। अष्टांग योग के अनुसार, इन्द्रियों को नियंत्रित करके साधक के सूक्ष्म शरीर को अन्य किसी जीवित अथवा मृत शरीर में प्रवेश करवाया जा सकता है। वहीं योग वशिष्ठ के अनुसार रेचक प्राणायाम के लगातार अभ्यास के बाद अन्य शरीर में आत्मा का प्रवेश किया जा सकता है। शंकराचार्य ने इस बारे में यह बताया है कि यदि सौन्दर्य लहरी के 87वें क्रमांक का श्लोक नित्य एक सहस्त्र बार जप कर लिया जाए, तो परकाया प्रवेश की सिद्धि प्राप्त की जा सकती है। तंत्र शास्त्र में यह बताया गया है कि आकाश तत्त्व की सिद्धि के बाद परकाया प्रवेश सम्भव होने लगता है। खेचरी मुद्रा का सतत् अभ्यास और इसमें पारंगत होना परकाया सिद्धि प्रक्रिया में अत्यन्त प्रभावशाली सिद्ध होता है। इन सबके अतिरिक्त भी कई और तरीके भी अलग-अलग शास्त्रों में बताए गए हैं !
अखण्ड ज्योति में श्रीराम शर्मा आचार्य ने उल्लेख किया है कि ‘नाथ सम्प्रदाय’ के आदि गुरु मुनिराज ‘मछन्दरनाथ’ को परकाया प्रवेश की सिद्धि प्राप्त थी। सूक्ष्म शरीर से वह अपनी इच्छानुसार विभिन्न शरीरों में गमनागमन करते थे। एकबार अपने शिष्य गोरखनाथ को स्थूल शरीर की सुरक्षा का भार सौंपकर एक मृत राजा के शरीर में उन्होंने सूक्ष्म शरीर से प्रवेश किया था !
‘महाभारत के शान्ति पर्व’ में वर्णन है कि सुलभा नामक विदुषी अपने योगबल की शक्ति से राजा जनक के शरीर में प्रविष्ट कर विद्वानों से शास्त्रार्थ करने लगी थी। उन दिनों राजा जनक का व्यवहार भी बदला बदला लगता था जो स्वाभाविक नहीं लगता था !
‘अनुशासन पर्व’ में ही कथा आती है कि एक बार इन्द्र किसी कारण वश ऋषि देवशर्मा पर कुपित हो गये। उन्होंने क्रोधवश ऋषि की पत्नी से बदला लेने का निश्चय किया। देवशर्मा का शिष्य ‘विपुल’ योग साधनाओं में निष्णात और सिद्ध था। उसे योग दृष्टि से यह मालूम हो गया कि मायावी इन्द्र, गुरु पत्नी से बदला लेने वाले हैं। ‘विपुल’ ने सूक्ष्म शरीर से गुरु पत्नी के शरीर में उपस्थित होकर इन्द्र के हाथों से उन्हें बचा लिया था !
‘पातंजलि योग दर्शन’ में सूक्ष्म शरीर से आकाश गमन, एक ही समय में अनेकों शरीर धारण, परकाया प्रवेश जैसी अनेकों योग विभूतियों का वर्णन है !
मरने के बाद सूक्ष्म शरीर जब स्थूल शरीर को छोड़कर गमन करता है तो उसके साथ अन्य सूक्ष्म परमाणु कहिए या कर्म भी गमन करते हैं जो उनके परिमाप के अनुसार अगले जन्म में रिफ्लेक्ट होते हैं, जैसे तिल, मस्सा, गोली का निशान, चाकू का निशान, आचार-विचार, संस्कार आदि। इस सूक्ष्म शरीर को मरने से पहले ही जागृत कर उसमें स्थिति हो जाने वाला व्यक्ति ही परकाय प्रवेश सिद्धि योग में पारंगत हो सकता है !
सबसे बड़ा सवाल यह है कि खुद के शरीर पर आपका कितना नियंत्रण है ? योग के अनुसार जब तक आप खुद के शरीर को वश में करना नहीं जानते तब तक दूसरे के शरीर में प्रवेश करना बहत ही मुश्किल होता है !
दूसरों के शरीर में प्रवेश करने की विद्या को परकाय प्रवेश योग विद्या कहते हैं। आदि शंकराचार्य इस विद्या में अच्छी तरह से पारंगत थे। नाथ संप्रदाय के और भी बहुत से साधक इस तकनीक से अवगत थे, लेकिन आम जनता के लिए तो यह बहुत ही कठिन जान पड़ता है क्योंकि यह एक दुर्लभ साधना से सीखी जाती है !
योग में कहा गया है कि मनुष्य की सबसे बड़ी समस्या है – ‘चित्त की वृत्तियां’ ! इसीलिए योग सूत्र का पहला सूत्र है-
योगस्य चित्तवृत्ति निरोध: !
इस चित्त में हजारों जन्मों की आसक्ति, अहंकार काम, क्रोध, लोभ, मोह आदि से उपजे कर्म संग्रहित रहते हैं, जिसे संचित कर्म कहते हैं।
यह संचित कर्म ही हमारा प्रारब्ध भी होते हैं और इसी से आगे की दिशा भी तय होती है। इस चित्त की पांच अवस्थाएं होती है जिसे समझ कर ही हम सूक्ष्म शरीर को सक्रिय कर सकते हैं। सूक्ष्म शरीर से बाहर निकल कर ही हम दूसरे के शरीर में प्रवेश कर सकते हैं !
चित्त की पांच अवस्थाओं को जानना आवश्यक है !
इस चित्त या मानसिक अवस्था के पांच रूप हैं:- (1)क्षिप्त (2) मूढ़ (3)विक्षिप्त (4)एकाग्र और (5)निरुद्व। प्रत्येक अवस्था में कुछ न कुछ मानसिक वृत्तियों का निरोध होता है।
(1) क्षिप्त : क्षिप्त अवस्था में चित्त एक विषय से दूसरे विषय पर लगातार दौड़ता रहता है। ऐसे व्यक्ति में विचारों, कल्पनाओं की भरमार रहती है !
(2) मूढ़ :
मूढ़ अवस्था में निद्रा, आलस्य, उदासी, निरुत्साह आदि प्रवृत्तियों या आदतों का बोलबाला रहता है !
(3) विक्षिप्त :
विक्षिप्तावस्था में मन थोड़ी देर के लिए एक विषय में लगता है पर क्षण में ही दूसरे विषय की ओर चला जाता है। पल प्रति‍पल मानसिक अवस्था बदलती रहती है !
(4) एकाग्र :
एकाग्र अवस्था में चित्त देर तक एक विषय पर लगा रहता है। यह अवस्था स्थितप्रज्ञ होने की दिशा में उठाया गया पहला कदम है !
(5) निरुद्व :
निरुद्व अवस्था में चित्त की सभी वृत्तियों का लोप हो जाता है और चित्त अपनी स्वाभाविक स्थिर, शान्त अवस्था में आ जाता है। अर्थात व्यक्ति को स्वयं के होने का पूर्ण अहसास होता है। उसके उपर से मन, मस्तिष्क में घुमड़ रहे बादल छट जाते हैं और वह पूर्ण जाग्रत रहकर दृष्टा बन जाता है। यह योग की पहली समाधि अवस्था भी कही गई है !
ध्यान योग का सहारा :
निरुद्व अवस्था को समझें यह व्यक्ति को आत्मबल प्रदान करती है। यही व्यक्ति का असली स्वरूप है। इस अवस्था को प्राप्त करने के लिए सांसार की व्यर्थ की बातों, क्रियाकलापों आदि से ध्यान हटाकर संयमित भोजन का सेवन करते हुए प्रतिदिन ध्यान करना आवश्यक है। इस दौरान कम से कम बोलना और लोगों से कम ही व्यवहार रखना भी जरूरी है !
*ज्ञान योग का सहारा :
चित्त की वृत्तियों और संचित कर्म के नाश के लिए योग में का वर्णन मिलता है। ज्ञानयोग का पहला सूत्र है कि स्वयं को शरीर मानना छोड़कर आत्मा मानों। आत्मा का ज्ञान होना सूक्ष्म शरीर के होने का आभास दिलाएगा।
कैसे होगा यह संभव :
चित्त जब वृत्ति शून्य (निरुद्व अवस्था) होता है तब बंधन के शिथिल हो जाने पर और संयम द्वारा चित्त की प्रवेश निर्गम मार्ग नाड़ी के ज्ञान से चित्त दूसरे के शरीर में प्रवेश करने की सिद्धि प्राप्त कर लेता है। यह बहुत आसान है, चित्त की स्थिरता से सूक्ष्म शरीर में होने का अहसास बढ़ता है। सूक्ष्म शरीर के निरंतर अहसास से स्थूल शरीर से बाहर निकलने की इच्‍छा बलवान होती है।
*योग निंद्रा विधि : जब ध्यान की अवस्था गहराने लगे तब निंद्रा काल में जाग्रत होकर शरीर से बाहर निकला जा सकता है। इस दौरान यह अहसास होता रहेगा की स्थूल शरीर सो रहा है। शरीर को अपने सुरक्षित स्थान पर सोने दें और आप हवा में उड़ने का मजा लें। ध्यान रखें किसी दूसरे के शरीर में उसकी इजाजत के बगैर प्रवेश करना अपराध है !
साभार https://www.facebook.com/dnpandeyd से

#परकाया_प्रवेश_विद्या_

हाथ बाद में सेंक लेना भिया, इंदौर तो बचा लो

इंदौर इस समय दुखी है, परेशान है. अपने बच्चों और साथियों के अकाल मौत से उसके माथे पर सिकन दिख रही है. वह बेबस है. सिस्टम ने उसे कलंकित कर दिया है. साफ पीने का पानी भी उस इंदौर के लोगों को नसीब ना हो, यह देख-सुन कर लोकमाता अहिल्या भी कांप उठी होगी. कल तक इंदौर स्वच्छतम शहर होने पर इतरा रहा था. आज स्वच्छता का यही तमगा उसे शर्मसार कर रहा है. इंदौर के भगीरथपुरा में जो कुछ घटा वह दुर्भाग्यपूर्ण ही नहीं, शर्मनाक है. मानवता पर कलंक सा मामला है. भगीरथपुरा में जो कुछ और जो कुछ घट रहा है, उसने स्वच्छता के एक-एक धागे खोलकर रख दिया है. यह सबकुछ आईने की तरफ साफ है. कोई लाग-लपेट नहीं. इंदौर नागरिक बोध का शहर है. इस शहर के बाशिंदों को पता है कि स्वच्छता किसे कहते हैं और स्वच्छ कैसे रहा जाता है. देशभर के लिए आइडियल बना इंदौर एकाएक नेपथ्य में चला गया है. उसकी स्वच्छता पर सवाल उठाये जा रहे हैं. सवाल गैरवाजिब नहीं होगा लेकिन क्या आज जब भगीरथपुरा के साथ प्रदेश के अनेक जिले और कस्बा बिसूर रहे हैं. हर जगह मौत का सबब बने दूषित पानी की शिकायत मिल रही है, ऐसे में स्वच्छता का ऑपरेशन करना जरूरी लगता है?
क्या यह सही समय है हाथ सेंकने का?  इसके पहले कलमवीरों, सोशल मीडिया के नायकों को इंदौर की कमजोरी नजर क्यों नहीं आयी? अचानक क्या हुआ कि इंदौर का रेशा-रेशा उधेड़ा जा रहा है. भगीरथपुरा की घटना महज घटना नहीं है बल्कि यह इंदौर सहित पूरे देश को सबक लेने का एक सबक है कि जिंदगी इतनी सस्ती नहीं होना चाहिए. सिस्टम को इतना लापरवाह और निर्दयी नहीं होना चाहिए.
खैर, इंदौर एकाध बार नहीं, 6 बार देश के स्वच्छतम शहर घोषित किया गया. थोड़ा पहले जाइए और पन्ने पलट कर देखिये, चैनलों की पुरानी पड़ गई रिकार्डिंग देखिए कि इंदौर के स्वच्छतम शहर ऐलान किए जाने के बाद इंदौर की यशोगाथा की पटकथा लिखी गई. हर कोई आगे था. इंदौर में ही सिस्टम का हिस्सा रहे एक बड़े अधिकारी ने तो इंदौर की स्वच्छता पर किताब तक लिख डाली तो कुछेेक लोगों ने पी-एचडी पर कर लिया. लिखने, बोलने और बताने में इंदौर की ऐसी कहानी सुनायी गई कि गर्व से सिर ऊँचा उठ गया था. खरामा-खरामा जिंदगी चलती रही. यही सब लोग जुट गए थे इंदौर को सातवीं दफा स्वच्छ शहर बनाने के लिए. सब आँख मींचे बैठे थे. किसी को शहर की कमियां नहीं दिख रही थी. किसी ने सिस्टम को नहीं खंगाला था. सब ठीक था, जैसे आम दिनों में होता आया है. दुर्भाग्य से दिल दहला देने वाली भगीरथपुरा की घटना सामने आयी. दूषित पानी से अकेले बीमार नहीं पड़े बल्कि जान भी जानें लगी. एक-दो मौतें होती तो बात थम जाती या थोड़े दिनों बाद शांत पड़ जाता. यहां तो कलेजे तक आ जाने वाले आंकड़ों ने दहशत में डाल दिया. इंदौर से दिल्ली तक की सत्ता हिल गई. हालाँकि थोड़े पहले ही छिंदवाड़ा में कफ सिरप से ऐसी ही दिल दहलाने वाली घटना हुई थी. अब एक और.
ऐसे मामलों में खुद को चौथा स्तंभ कहे जाने वाले मीडिया का सक्रिय होना लाजिमी था. मेन स्ट्रीम का मीडिया ने अपना दायित्व ओढ़ा और सिस्टम की खामियों को बाहर लाया. पीडि़तों को हरसंभव इलाज और मदद मिले, इसके लिए सिस्टम को एक्टिव किया और इसके साथ ही ऐसे कलमवीरों की फौज खड़ी हो गई जिसने कभी स्वच्छ इंदौर को आइडिल बताया था, वह आज इंदौर को लपेट रहा है. उसे देश का सबसे गंदा शहर नजर आने लगा है. हर गली-चौराहों से गंदगी और शहर को बदसूरत बनाने वाली तस्वीरें वायरल हो रही हैं. ये सच है और ऐसा होना भी जरूरी है. लेकिन क्या कोई बताएगा कि बारिश के दिनों में जब इंदौर के सडक़ पानी से बेतरतीब हुआ जा रहे थे. नालियाँ बजबजा रही थीं और यातायात बेकार और बेकाम हो गया था, तब इंदौर की स्वच्छता पर किस किसने और कब सवाल उठाया था? क्यों नहीं बताया गया कि इंदौर स्वच्छ नहीं, मलिन शहर है. तब इसे बढ़ती आबादी के कारण रोजमर्रा की परेशानी बता कर छोड़ दिया गया था. एक और कारण है कि तब जनहानि नहीं हुई थी.
बेशक इंदौर की कमियाँ गिनाइए, कोसिए, कटघरे में खड़ा कीजिये लेकिन ध्यान रखिए कि इंदौर को स्वच्छतम शहर बनाने में हम भी साथ थे. दूर-देश से कोई आता और कागज का टुकड़ा भी फेंक देता तो इंदौरी लपक कर कहते-भिया नहीं, इंदौर स्वच्छ शहर है. इसे स्वच्छ रखने में सहयोग कीजिए और खुद उस कागज को डस्टबीन के हवाले कर देते. आज क्या हो गया? मीडिया की संवेदनशीलता यहां दिखना चाहिए, यह मेरी निजी मान्यता है. कितने साथी भागीरथपुरा गए और परिवारों का हाल देखा? कितनी मानवीय संवेदना वाली खबरें की? कितने लोग उन परिवारों के दुख में शामिल हुए? कितने लोग और कोई दूषित पानी ना पिये, इसके लिए कैम्पेन चलाया? कितनों को जागरूक किया.
नागरिक बोध के इस गौरवशाली इतिहास वाले शहर में हाथ सेंकने चले आए भिया, ये सब बाद में कर लेना. अभी मरहम की जरूरत है. अभी दवा और संवेदना की जरूरत है. लड़ तो हम बाद में भी लेंगे. अभी हाथ में हाथ देकर साथ चलने का वक्त है. सरकार की जिम्मेदारी सरकार पूरा करेगी लेकिन समाज की जवाबदारी तो हमी को करना होगा. बयानवीरों को ठिकाने लगाइए लेकिन भूल मत जाना कि हमारी जवाबदारी इससे आगे की और बड़ी है. सत्ता आती जाती रहती है. शहर का गौरव पर बात उठी तो हम सब को भुगतना होगा. संवेदना के रास्ते गौरव का शीश हमेशा ऊँचा रहता है और इस बात को हम सबको समझना होगा. देर-अबेर भगीरथपुरा सहित प्रदेश के अन्य हिस्सों के हालात ठीक होने लगेंगे. लेकिन जोश में हमने कुछ कर दिया तो उसका खामियाजा हमें सदियों तक भुगतना होगा. भिया, हाथ बाद में सेंक लेना, पहले इंदौर को बचा लो.
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं मीडिया शिक्षा से संबद्ध हैं)

मुंबई महानगरपालिका के 227 वार्डों की अंतिम मतदाता सूची अब तक जारी नहीं

चुनाव में केवल 8 दिन शेष – लोकतांत्रिक प्रक्रिया पर गंभीर सवाल

अनिल गलगली की चुनाव आयुक्त एवं नगर आयुक्त से तात्कालिक कार्रवाई की मांग

RTI एक्टिविस्ट एवं सामाजिक कार्यकर्ता अनिल गलगली ने महाराष्ट्र राज्य चुनाव आयुक्त तथा मुंबई महानगरपालिका आयुक्त का ध्यान इस अत्यंत गंभीर मुद्दे की ओर आकर्षित किया है कि मुंबई महानगरपालिका के सभी 227 वार्डों की अंतिम मतदाता सूची अब तक सार्वजनिक नहीं की गई है, जबकि चुनाव में केवल 8 दिन शेष हैं।

अनिल गलगली ने कहा कि अंतिम मतदाता सूची का समय पर प्रकाशन न होना केवल प्रशासनिक लापरवाही नहीं, बल्कि मतदाताओं के संवैधानिक और लोकतांत्रिक अधिकारों का सीधा उल्लंघन है। उन्होंने कहा कि मतदाता सूची स्वतंत्र, निष्पक्ष और पारदर्शी चुनाव प्रक्रिया की रीढ़ होती है। अंतिम सूची के अभाव में मतदाता अपने नाम की जांच नहीं कर पा रहे हैं। गलत प्रविष्टियों को सुधारने का अधिकार छिन रहा है। फर्जी, दोहरी और अपात्र प्रविष्टियों की आशंका बढ़ रही है। चुनाव प्रणाली पर जनता का विश्वास कमजोर हो रहा है।

इस देरी को लेकर अनिल गलगली ने सवाल उठाया कि इस लापरवाही के लिए कौन जिम्मेदार है? चुनाव आयोग और प्रशासन ने कानूनी समय-सीमा का पालन क्यों नहीं किया?.अनिल गलगली की प्रमुख मांगें है कि मुंबई के सभी 227 वार्डों की अंतिम मतदाता सूची तत्काल आधिकारिक वेबसाइट पर प्रकाशित की जाए। मतदाता सूची जारी करने में हुई देरी पर लिखित और सार्वजनिक स्पष्टीकरण दिया जाए।जिम्मेदार अधिकारियों के विरुद्ध प्रशासनिक कार्रवाई की जाए। भविष्य में ऐसी स्थिति दोबारा न बने, इसके लिए ठोस और समयबद्ध सुधारात्मक कदम घोषित किए जाएं।

अनिल गलगली ने स्पष्ट किया कि मतदाता सूची का समय पर सार्वजनिक होना संवैधानिक जिम्मेदारी है और इसमें हुई देरी लोकतांत्रिक प्रक्रिया को कमजोर करती है। उन्होंने चुनाव आयोग और मनपा प्रशासन से तत्काल, पारदर्शी और जवाबदेह कार्रवाई की मांग की है।