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औरंगजेब के नाम गुरु गोविन्द सिंह का ऐतिहासिक पत्र

ज़फ़रनामा अर्थात ‘विजय पत्र’ गुरु गोविंद सिंह द्वारा मुग़ल शासक औरंगज़ेब को लिखा गया वह पत्र है जो उन्होंने आनन्दपुर छोड़ने के बाद सन् 1706 में औरंगजेब को लिखा था। ज़फ़रनामा, दसम ग्रंथ का एक भाग है और इसकी भाषा फ़ारसी है।
 औरंगजेब के पत्र के उत्तर में लिखे गए फारसी भाषा के जफरनामा नामक पत्र में , कुछ इतिहासकारों के मतानुसार , एक हजार चार के लगन ही शेर थे , और जिस पत्र का ऊपर उल्लेख किया गया है उसमें केवल सो के के लगभग शेर थे। अतः प्रतीत होता है कि यह पत्र उन्होंने जफरनामे वाले विस्तृत पत्र की भूमिकास्वरूप उससे पूर्व ही लिखा होगा। इस पत्र में तत्कालीन परिस्थितियों का बहुत स्पष्ट विवरण मिल जाता है। औरंगजेब तथा गुरु गोविन्द सिंह के पारस्परिक सम्बन्ध कैसे थे , इस बात का भी ज्ञान होता है। यह पत्र इतिहास की अमूल्य निधि है।
      आजकल कुछ सिख उग्रवादियों और औरंगजेब के अनुयायियों के बीच बहुत गाढ़ी छन रही है। उन्हें गुरु गोविन्द सिंह का वह पत्र पढ़ना चाहिये जो गुरुजी ने औरंगजेब को लिखा था। मूल पत्र गुरुमुखी में लिखा गया था , इसलिए इस पत्र का उपयोग पश्चिमी इतिहासकार न कर सके। यहां प्रस्तुत हैं उक्त पत्र के कुछ अंश। सिक्खों के दशम गुरु श्री गोविन्द सिंह ने तत्कालीन भारतीय सम्राट औरंगजेब के नाम जो पत्र लिखे थे , उन के सम्बन्ध में जनसामान्य को बहुत कम मालूम है। छत्रपति शिवाजी महाराज का राजा जयसिंह के नाम लिखा हुआ महान् और ऐतिहासिक पत्र पर्याप्त प्रकाश में आ चुका है परन्तु गुरु गोविन्द सिंह जी द्वारा सम्राट औरंगजेब को लिखे हुए पत्र अभी तक गुरुमुखी अक्षरों में बद्ध होने के कारण हिन्दी संसार के समक्ष नहीं आ पाये। फारसी भाषा में लिखा हुआ शिवाजी का पत्र सन् १६२२ के अगस्त मास की नागरी प्रचारिणी सभा , काशी की ‘ नागरी प्रचारिणी पत्रिका ‘ में बाबू जगन्नाथ दास रत्नाकर की ओर से प्रकाशित हुआ था।
        इसकी भूमिका में रत्नाकर जी ने लिखा था कि उन्होंने तब से लगभग तीस वर्ष पूर्व पटना गुरुद्वारे के महन्त स्वर्गत बाबा सुमेरसिंह के पास दो पत्र देखे थे। इनमें से एक तो गुरु गोविन्द सिंह का वह पत्र था जो उन्होंने दक्षिण जाने के पूर्व औरंगजेब के नाम लिखा था , और दूसरा मिर्जा राजा जयसिंह के नाम लिखा हुवा शिवाजी का पत्र था। रत्नाकर जी ने इन दोनों पत्रों की प्रतिलिपियां प्राप्त कर ली थी।
       गुरु गोविन्द सिंह का औरंगजेब के नाम लिखा हुआ पत्र वह नहीं या जो इतिहास में ” जफरनामा ‘ के नाम से विख्यात है। रत्नाकर जी का कथन है कि जफरनामे में आठ – नौ सौ शेर थे , जबकि इस पत्र में जो उन्होंने बाबा सुमेर सिंह से प्राप्त किया था , सौ से अधिक शेर नहीं थे। ये दोनों पत्र दुर्भाग्यवश रत्नाकर जी से गुम हो गये। पर्याप्त समय पश्चात् शिवाजी वाला पत्र उन्हें अपने पुराने कागजों में मिल गया जिसे उन्होंने नागरी प्रचारिणी पत्रिका में प्रकाशित करा दिया। गुरु गोविन्द सिंह का पत्र रत्नाकर जी से खो चुका था और उस समय तक बाबा सुमेर सिंह की मृत्यु हो चुकी थी। इस कारण उसे पुनः प्राप्त करने का मार्ग अवरुद्ध हो चुका था।
       रत्नाकरजी ने उस पत्र के कुछ बंद अपनी स्मृति से सरदार उमराव सिंह मजीठिया को भेजे थे। सरदार जी ने उन्हें अपनी ओर से क्रमबद्ध कर उसकी एक प्रतिलिपि पंजाबी के वयोवृद्ध विद्वान भाई वीरसिंह बी को भेजी। भाई वीरसिंह ने उन बन्दों को ‘ उच्च का पी नामक लेख में खालसा समाचार के १६ जुलाई १६४२ अंक में प्रकाशित करा दिया।
      इस सम्पूर्ण पत्र में कितने शेर थे और किस क्रम में थे यह आज तक ज्ञात नहीं हो सका। अभी तक २४ शेर ही प्राप्त हो सके हैं। ऐतिहासिक दृष्टि से पत्र अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है। इस पत्र में जितने शेर अभी तक प्राप्त हुए हैं , वे आंशिक रूप है उसकी महत्ता प्रकट करने में सर्वथा समर्थ हैं। उन्हें यहां दिया जा रहा है
१ तलवार और कटार के स्वामी का स्मरण कर और धनुष – बाण तथा ढाल के कर्ता का नाम लेकर ,
२ युद्ध क्षेत्र में वीरगति प्राप्त शेर वीरों के इष्ट का और वायु के समान गतिशील अश्वों के निर्माता का ,
३ उसका जिसने तुझे बादशाहत दी और हमें धर्म रक्षा का गौरव प्रदान किया।
४. तुझको दिया विश्वासघात और धोखे का क्षेत्र और मुझे सत तथा स्वच्छ हृदय से युक्त उपाय।
५ . औरंगजेब नाम तुझे शोभा नहीं देता। राज सिंहासन को शोभा यमान करने वाले द्वारा विश्वासघात और धोखा अच्छा नहीं लगता।
६ . तेरी तसबीह मनके और धागे से अधिक कुछ नहीं क्योंकि तू उन मनकों को चुगने के दाने बनाता है और धागे को अपना जाल।
७. तूने अपने पिता की मिट्टी निकृष्ट कर्म करके अपने भाई के लहू से गूधी है।
८. और उसके साथ अपने साम्राज्य के लिए काच्चे भवन की नींव रखी है।
९. मैं अब ईश्वर कृपा से लोहे के पानी ( तलवार की धार की तरह वर्षा करूंगा।
१०. जिससे इस पवित्र भूमि पर उस अशुभ साम्राज्य का चिह्न भी शेष न रहे ।
११. दक्षिण के पर्वतों से तू प्यासा जौटा है। मेवाड़ से भी कड़वा चखा है।
१२. तेरे तलवों के नीचे मैं इस तरह आग रखूगा कि कि तू पंजाव का पानी मीनपी सके।
१३ . क्या हुआ जो गीदड़ ने विश्वासघात करके सिंह के बच्चे को मार डाला।
१४. जवकि खू ख्बार शेर अभी तक जिन्दा है और वह तुझसे बदला लेगा।
१५ मैं अब तेरे खुदा ( के नाम पर खाई सौगन्ध ) पर कोई विश्वास नहीं करूंगा , क्योंकि मैं तेरे खुदा के कलाम ( के नाम पर किये गये कार्यो ) को देख चुका हूं। तेरी सौगन्ध पर विश्वास नहीं रहा और अन तलवार पकड़ने के सिवाय कोई उपाय नहीं बचा है।
१७ . यदि तू चतुर बाच है तो मैं भी एक सिंह को कठघरे से छोडूगा।
१८. यदि मेरे साथ तेरी बातचीत हुई तो मैं तुझे उचित मार्ग प्रदर्शित करूंगा।
१९. युद्ध क्षेत्र में दोनों सेनाएं पंक्तिबद्ध हो जाएं और शीघ्र ही आप में परिचित हों।
२०. दोनों के मध्य दो फरसंग ( सात या साढ़े सात मील ) क अन्तर हो ।
 २१ . रण क्षेत्र में मैं अकेला आऊंगा और तू दो अश्वारोही साथ ला सकता है।
२२. तूने लाड़ – प्यार और सुख के फल खाए हैं , युद्धरत शूरों सम्मुख नहीं आया है।
२३ . तू स्वयं तलवार लेकर युद्धक्षेत्र में आ , ईश्वर की सृष्टि का नाश मत कर।
   इन शेरों से सम्पूर्ण पत्र की भावना तथा शैली का ज्ञान हो जाता है। रत्नाकर जी के अनुसार इस पत्र में सौ से अधिक शेर थे। इस प्रकार इसका तीन चौथाई भाग अभी अन्धकार में है जिसकी खोज करना आवश्यक है। यह पत्र कब लिखा गया तथा यह इतिहासप्रसिद्ध जफरनामे से पहले का है अथवा बाद का , इसका निर्णय करना कठिन है , किन्तु इतन निश्चित है कि तब तक गुरु गोविन्द सिंह के चारों पुत्रों का बलिदान है चुका था।
  चमकौर के युद्ध ( २३ दिसम्बर १७०४ ) के पश्चात् गुरु गोविन्द सिंह जब भटिंडे की ओर जा रहे थे , तब दीने नामक स्थान पर उन्हें औरंगजेब का पत्र प्राप्त हुआ था जिसमें उन्हें मिलने के लिए दक्षिण आमंत्रित किय गया था। उस पत्र में खुदा तथा कुरान की सौगंधों सहित इस बात का विश्वास दिलाया गया था कि उन्हें किसी प्रकार का कष्ट या धोखा न दिया जाएगा। साथ ही धमकियों के भी कुछ वाक्य इस पत्र में थे।
गुरु गोविन्द सिंह ने शाही हरकारों को उत्तर दिया था कि हम इस पत्र का उत्तर विस्तार सहित भेजेंगे और फिर हमें बादशाह का कोई पत्र प्राप्त होना तो हम उनसे मिलने अवश्य अवश्य आयेंगे।

परकाया प्रवेश का विज्ञान और भारत में परकाया प्रवेश की परंपरा

अध्यात्म में परकाया प्रवेश का अर्थ है एक आत्मा का एक शरीर को छोड़कर दूसरे शरीर में प्रवेश कर जाना। यह सुनने में अविश्वनीय लगता है लेकिन कई उदाहरणों से कहीं न कहीं यह प्रमाणित हुआ है कि ऐसा होना सम्भव है। तो, चलिए समझते हैं कि परकाया प्रवेश क्या है और यह कैसे होता है !
परकाया का अर्थ है कि एक व्यक्ति अपने शरीर के बाहर दूसरे शरीर में प्रवेश कर सकता है !
उदाहरण –
एक शादीशुदा महिला के मृत्यु के तुरन्त बाद किसी दूसरे की आत्मा उसके शरीर में प्रवेश कर गयी थी !
परकाया प्रवेश ध्यान योग, ज्ञान योग और योग निंद्रा द्वारा सम्भव हो सकता है !
शास्त्रों में काया प्रवेश की प्रक्रिया का वर्णन :
मृत्यु के समय जीवात्मा इस स्थूल शरीर से अलग होकर सूक्ष्म शरीर में ही जाता है !
बेहद रहस्यमयी है परकाया प्रवेश की प्रक्रिया, जानिये इसमें किस प्रकार आत्मा एक शरीर से दूसरे शरीर में प्रवेश करती है !
अध्यात्म में पुनर्जन्म के जैसे ही परकाया प्रवेश एक अद्भुत और रहस्यमय विषय है। परकाया का अर्थ है कि एक व्यक्ति अपने शरीर के बाहर दूसरे शरीर में प्रवेश कर सकता है। अर्थात जब एक सिद्ध योगी अपनी योग-साधना के बल से जीते-जी किसी दूसरे के मृत या जीवित शरीर में सूक्ष्म रूप से प्रवेश कर जाता है, तो उसे परकाया-प्रवेश कहते हैं। इसके बारे में वेदांत और तंत्र शास्त्र में विस्तार से बताया गया है।
1. प्राचीन समय में परकाया प्रवेश के कई उदाहरण मिलते हैं और आज के युग में कुछ ऐसे केस सामने आये हैं, जो परकाया प्रवेश के सिद्धांत को कहीं न कहीं प्रमाणित करते हैं। ऐसी ही एक घटना उत्तर प्रदेश में हुई थी, जहाँ एक शादीशुदा महिला के मृत्यु के तुरन्त बाद किसी दूसरे की आत्मा उसके शरीर में प्रवेश कर गयी थी !
2. परकाया प्रवेश का एक बड़ा उदाहरण शंकराचार्य का भी है, जब उनका एक विदूषी महिला भारती से शास्त्रार्थ हुआ। उन्हें कामशास्त्र के विषय को लेकर शास्त्रार्थ बीच में ही रोकना पड़ा था, क्योंकि उस विषय पर शंकराचार्य जी जानकारी और अनुभव शून्य थे ! इसलिए, उन्होंने इस विषय पर ज्ञान और अनुभव प्राप्त करने के लिए समय मांगा। इस समयावधि में उन्होंने अपने सूक्ष्म शरीर को एक राजा के शरीर में प्रवेश करवाया और राज का जीवन जीकर कामशास्त्र का ज्ञान प्राप्त किया। इस दौरान उनके स्थूल शरीर की सुरक्षा उनका शिष्य करता रहा था । शंकराचार्य ने जैसे ही ज्ञान प्राप्त किया, वह अपने असली शरीर में लौट आये और फिर भारती से चर्चा करके उनको शास्त्रार्थ में पराजित किया !
क्या परकाया प्रवेश सम्भव है ?
परकाया प्रवेश करना सरल नहीं है ! परकाया प्रवेश ध्यान योग, ज्ञान योग और योग निंद्रा द्वारा सम्भव हो सकता है। कोई सिद्धहस्त योगी, संत, महात्मा अथवा सिद्ध पुरूष ही योग क्रियाओं के द्वारा परकाया प्रवेश कर सकता है। परकाया प्रवेश का सिद्धांत इस बात पर आधारित है कि मानव शरीर दो प्रकार का शरीर है। एक स्थूल शरीर जो दिखाई देता है और दूसरा सूक्ष्म शरीर, जो दिखाई नहीं देता है। शास्त्रों के अनुसार, सूक्ष्म शरीर की लम्बाई अंगूठे के बराबर है और यह इतना अधिक पारदर्शी है कि प्रकाश भी उसके आर-पार जा सकता है। कुछ जानकारों ने आकाश, तेज और वायु इन तीन तत्त्वों को सूक्ष्म शरीर माना है और प्रेत का शरीर भी इन्हीं तीन तत्वों से बना होता है। मृत्यु के समय जीवात्मा इस स्थूल शरीर से अलग होकर सूक्ष्म शरीर में चला जाता है। सूक्ष्म शरीर की गति मन के वेग के समान तीव्र होती है। परकाया प्रवेश की प्रक्रिया में यह सूक्ष्म शरीर ही एक स्थूल शरीर को छोड़कर दूसरे स्थूल शरीर को धारण करता है !
शास्त्रों में काया प्रवेश की प्रक्रिया का वर्णन :
शास्त्रों और वेदों में परकाया प्रवेश के अलग-अलग तरीके बताये गए हैं। अष्टांग योग के अनुसार, इन्द्रियों को नियंत्रित करके साधक के सूक्ष्म शरीर को अन्य किसी जीवित अथवा मृत शरीर में प्रवेश करवाया जा सकता है। वहीं योग वशिष्ठ के अनुसार रेचक प्राणायाम के लगातार अभ्यास के बाद अन्य शरीर में आत्मा का प्रवेश किया जा सकता है। शंकराचार्य ने इस बारे में यह बताया है कि यदि सौन्दर्य लहरी के 87वें क्रमांक का श्लोक नित्य एक सहस्त्र बार जप कर लिया जाए, तो परकाया प्रवेश की सिद्धि प्राप्त की जा सकती है। तंत्र शास्त्र में यह बताया गया है कि आकाश तत्त्व की सिद्धि के बाद परकाया प्रवेश सम्भव होने लगता है। खेचरी मुद्रा का सतत् अभ्यास और इसमें पारंगत होना परकाया सिद्धि प्रक्रिया में अत्यन्त प्रभावशाली सिद्ध होता है। इन सबके अतिरिक्त भी कई और तरीके भी अलग-अलग शास्त्रों में बताए गए हैं !
अखण्ड ज्योति में श्रीराम शर्मा आचार्य ने उल्लेख किया है कि ‘नाथ सम्प्रदाय’ के आदि गुरु मुनिराज ‘मछन्दरनाथ’ को परकाया प्रवेश की सिद्धि प्राप्त थी। सूक्ष्म शरीर से वह अपनी इच्छानुसार विभिन्न शरीरों में गमनागमन करते थे। एकबार अपने शिष्य गोरखनाथ को स्थूल शरीर की सुरक्षा का भार सौंपकर एक मृत राजा के शरीर में उन्होंने सूक्ष्म शरीर से प्रवेश किया था !
‘महाभारत के शान्ति पर्व’ में वर्णन है कि सुलभा नामक विदुषी अपने योगबल की शक्ति से राजा जनक के शरीर में प्रविष्ट कर विद्वानों से शास्त्रार्थ करने लगी थी। उन दिनों राजा जनक का व्यवहार भी बदला बदला लगता था जो स्वाभाविक नहीं लगता था !
‘अनुशासन पर्व’ में ही कथा आती है कि एक बार इन्द्र किसी कारण वश ऋषि देवशर्मा पर कुपित हो गये। उन्होंने क्रोधवश ऋषि की पत्नी से बदला लेने का निश्चय किया। देवशर्मा का शिष्य ‘विपुल’ योग साधनाओं में निष्णात और सिद्ध था। उसे योग दृष्टि से यह मालूम हो गया कि मायावी इन्द्र, गुरु पत्नी से बदला लेने वाले हैं। ‘विपुल’ ने सूक्ष्म शरीर से गुरु पत्नी के शरीर में उपस्थित होकर इन्द्र के हाथों से उन्हें बचा लिया था !
‘पातंजलि योग दर्शन’ में सूक्ष्म शरीर से आकाश गमन, एक ही समय में अनेकों शरीर धारण, परकाया प्रवेश जैसी अनेकों योग विभूतियों का वर्णन है !
मरने के बाद सूक्ष्म शरीर जब स्थूल शरीर को छोड़कर गमन करता है तो उसके साथ अन्य सूक्ष्म परमाणु कहिए या कर्म भी गमन करते हैं जो उनके परिमाप के अनुसार अगले जन्म में रिफ्लेक्ट होते हैं, जैसे तिल, मस्सा, गोली का निशान, चाकू का निशान, आचार-विचार, संस्कार आदि। इस सूक्ष्म शरीर को मरने से पहले ही जागृत कर उसमें स्थिति हो जाने वाला व्यक्ति ही परकाय प्रवेश सिद्धि योग में पारंगत हो सकता है !
सबसे बड़ा सवाल यह है कि खुद के शरीर पर आपका कितना नियंत्रण है ? योग के अनुसार जब तक आप खुद के शरीर को वश में करना नहीं जानते तब तक दूसरे के शरीर में प्रवेश करना बहत ही मुश्किल होता है !
दूसरों के शरीर में प्रवेश करने की विद्या को परकाय प्रवेश योग विद्या कहते हैं। आदि शंकराचार्य इस विद्या में अच्छी तरह से पारंगत थे। नाथ संप्रदाय के और भी बहुत से साधक इस तकनीक से अवगत थे, लेकिन आम जनता के लिए तो यह बहुत ही कठिन जान पड़ता है क्योंकि यह एक दुर्लभ साधना से सीखी जाती है !
योग में कहा गया है कि मनुष्य की सबसे बड़ी समस्या है – ‘चित्त की वृत्तियां’ ! इसीलिए योग सूत्र का पहला सूत्र है-
योगस्य चित्तवृत्ति निरोध: !
इस चित्त में हजारों जन्मों की आसक्ति, अहंकार काम, क्रोध, लोभ, मोह आदि से उपजे कर्म संग्रहित रहते हैं, जिसे संचित कर्म कहते हैं।
यह संचित कर्म ही हमारा प्रारब्ध भी होते हैं और इसी से आगे की दिशा भी तय होती है। इस चित्त की पांच अवस्थाएं होती है जिसे समझ कर ही हम सूक्ष्म शरीर को सक्रिय कर सकते हैं। सूक्ष्म शरीर से बाहर निकल कर ही हम दूसरे के शरीर में प्रवेश कर सकते हैं !
चित्त की पांच अवस्थाओं को जानना आवश्यक है !
इस चित्त या मानसिक अवस्था के पांच रूप हैं:- (1)क्षिप्त (2) मूढ़ (3)विक्षिप्त (4)एकाग्र और (5)निरुद्व। प्रत्येक अवस्था में कुछ न कुछ मानसिक वृत्तियों का निरोध होता है।
(1) क्षिप्त : क्षिप्त अवस्था में चित्त एक विषय से दूसरे विषय पर लगातार दौड़ता रहता है। ऐसे व्यक्ति में विचारों, कल्पनाओं की भरमार रहती है !
(2) मूढ़ :
मूढ़ अवस्था में निद्रा, आलस्य, उदासी, निरुत्साह आदि प्रवृत्तियों या आदतों का बोलबाला रहता है !
(3) विक्षिप्त :
विक्षिप्तावस्था में मन थोड़ी देर के लिए एक विषय में लगता है पर क्षण में ही दूसरे विषय की ओर चला जाता है। पल प्रति‍पल मानसिक अवस्था बदलती रहती है !
(4) एकाग्र :
एकाग्र अवस्था में चित्त देर तक एक विषय पर लगा रहता है। यह अवस्था स्थितप्रज्ञ होने की दिशा में उठाया गया पहला कदम है !
(5) निरुद्व :
निरुद्व अवस्था में चित्त की सभी वृत्तियों का लोप हो जाता है और चित्त अपनी स्वाभाविक स्थिर, शान्त अवस्था में आ जाता है। अर्थात व्यक्ति को स्वयं के होने का पूर्ण अहसास होता है। उसके उपर से मन, मस्तिष्क में घुमड़ रहे बादल छट जाते हैं और वह पूर्ण जाग्रत रहकर दृष्टा बन जाता है। यह योग की पहली समाधि अवस्था भी कही गई है !
ध्यान योग का सहारा :
निरुद्व अवस्था को समझें यह व्यक्ति को आत्मबल प्रदान करती है। यही व्यक्ति का असली स्वरूप है। इस अवस्था को प्राप्त करने के लिए सांसार की व्यर्थ की बातों, क्रियाकलापों आदि से ध्यान हटाकर संयमित भोजन का सेवन करते हुए प्रतिदिन ध्यान करना आवश्यक है। इस दौरान कम से कम बोलना और लोगों से कम ही व्यवहार रखना भी जरूरी है !
*ज्ञान योग का सहारा :
चित्त की वृत्तियों और संचित कर्म के नाश के लिए योग में का वर्णन मिलता है। ज्ञानयोग का पहला सूत्र है कि स्वयं को शरीर मानना छोड़कर आत्मा मानों। आत्मा का ज्ञान होना सूक्ष्म शरीर के होने का आभास दिलाएगा।
कैसे होगा यह संभव :
चित्त जब वृत्ति शून्य (निरुद्व अवस्था) होता है तब बंधन के शिथिल हो जाने पर और संयम द्वारा चित्त की प्रवेश निर्गम मार्ग नाड़ी के ज्ञान से चित्त दूसरे के शरीर में प्रवेश करने की सिद्धि प्राप्त कर लेता है। यह बहुत आसान है, चित्त की स्थिरता से सूक्ष्म शरीर में होने का अहसास बढ़ता है। सूक्ष्म शरीर के निरंतर अहसास से स्थूल शरीर से बाहर निकलने की इच्‍छा बलवान होती है।
*योग निंद्रा विधि : जब ध्यान की अवस्था गहराने लगे तब निंद्रा काल में जाग्रत होकर शरीर से बाहर निकला जा सकता है। इस दौरान यह अहसास होता रहेगा की स्थूल शरीर सो रहा है। शरीर को अपने सुरक्षित स्थान पर सोने दें और आप हवा में उड़ने का मजा लें। ध्यान रखें किसी दूसरे के शरीर में उसकी इजाजत के बगैर प्रवेश करना अपराध है !
साभार https://www.facebook.com/dnpandeyd से

#परकाया_प्रवेश_विद्या_

हाथ बाद में सेंक लेना भिया, इंदौर तो बचा लो

इंदौर इस समय दुखी है, परेशान है. अपने बच्चों और साथियों के अकाल मौत से उसके माथे पर सिकन दिख रही है. वह बेबस है. सिस्टम ने उसे कलंकित कर दिया है. साफ पीने का पानी भी उस इंदौर के लोगों को नसीब ना हो, यह देख-सुन कर लोकमाता अहिल्या भी कांप उठी होगी. कल तक इंदौर स्वच्छतम शहर होने पर इतरा रहा था. आज स्वच्छता का यही तमगा उसे शर्मसार कर रहा है. इंदौर के भगीरथपुरा में जो कुछ घटा वह दुर्भाग्यपूर्ण ही नहीं, शर्मनाक है. मानवता पर कलंक सा मामला है. भगीरथपुरा में जो कुछ और जो कुछ घट रहा है, उसने स्वच्छता के एक-एक धागे खोलकर रख दिया है. यह सबकुछ आईने की तरफ साफ है. कोई लाग-लपेट नहीं. इंदौर नागरिक बोध का शहर है. इस शहर के बाशिंदों को पता है कि स्वच्छता किसे कहते हैं और स्वच्छ कैसे रहा जाता है. देशभर के लिए आइडियल बना इंदौर एकाएक नेपथ्य में चला गया है. उसकी स्वच्छता पर सवाल उठाये जा रहे हैं. सवाल गैरवाजिब नहीं होगा लेकिन क्या आज जब भगीरथपुरा के साथ प्रदेश के अनेक जिले और कस्बा बिसूर रहे हैं. हर जगह मौत का सबब बने दूषित पानी की शिकायत मिल रही है, ऐसे में स्वच्छता का ऑपरेशन करना जरूरी लगता है?
क्या यह सही समय है हाथ सेंकने का?  इसके पहले कलमवीरों, सोशल मीडिया के नायकों को इंदौर की कमजोरी नजर क्यों नहीं आयी? अचानक क्या हुआ कि इंदौर का रेशा-रेशा उधेड़ा जा रहा है. भगीरथपुरा की घटना महज घटना नहीं है बल्कि यह इंदौर सहित पूरे देश को सबक लेने का एक सबक है कि जिंदगी इतनी सस्ती नहीं होना चाहिए. सिस्टम को इतना लापरवाह और निर्दयी नहीं होना चाहिए.
खैर, इंदौर एकाध बार नहीं, 6 बार देश के स्वच्छतम शहर घोषित किया गया. थोड़ा पहले जाइए और पन्ने पलट कर देखिये, चैनलों की पुरानी पड़ गई रिकार्डिंग देखिए कि इंदौर के स्वच्छतम शहर ऐलान किए जाने के बाद इंदौर की यशोगाथा की पटकथा लिखी गई. हर कोई आगे था. इंदौर में ही सिस्टम का हिस्सा रहे एक बड़े अधिकारी ने तो इंदौर की स्वच्छता पर किताब तक लिख डाली तो कुछेेक लोगों ने पी-एचडी पर कर लिया. लिखने, बोलने और बताने में इंदौर की ऐसी कहानी सुनायी गई कि गर्व से सिर ऊँचा उठ गया था. खरामा-खरामा जिंदगी चलती रही. यही सब लोग जुट गए थे इंदौर को सातवीं दफा स्वच्छ शहर बनाने के लिए. सब आँख मींचे बैठे थे. किसी को शहर की कमियां नहीं दिख रही थी. किसी ने सिस्टम को नहीं खंगाला था. सब ठीक था, जैसे आम दिनों में होता आया है. दुर्भाग्य से दिल दहला देने वाली भगीरथपुरा की घटना सामने आयी. दूषित पानी से अकेले बीमार नहीं पड़े बल्कि जान भी जानें लगी. एक-दो मौतें होती तो बात थम जाती या थोड़े दिनों बाद शांत पड़ जाता. यहां तो कलेजे तक आ जाने वाले आंकड़ों ने दहशत में डाल दिया. इंदौर से दिल्ली तक की सत्ता हिल गई. हालाँकि थोड़े पहले ही छिंदवाड़ा में कफ सिरप से ऐसी ही दिल दहलाने वाली घटना हुई थी. अब एक और.
ऐसे मामलों में खुद को चौथा स्तंभ कहे जाने वाले मीडिया का सक्रिय होना लाजिमी था. मेन स्ट्रीम का मीडिया ने अपना दायित्व ओढ़ा और सिस्टम की खामियों को बाहर लाया. पीडि़तों को हरसंभव इलाज और मदद मिले, इसके लिए सिस्टम को एक्टिव किया और इसके साथ ही ऐसे कलमवीरों की फौज खड़ी हो गई जिसने कभी स्वच्छ इंदौर को आइडिल बताया था, वह आज इंदौर को लपेट रहा है. उसे देश का सबसे गंदा शहर नजर आने लगा है. हर गली-चौराहों से गंदगी और शहर को बदसूरत बनाने वाली तस्वीरें वायरल हो रही हैं. ये सच है और ऐसा होना भी जरूरी है. लेकिन क्या कोई बताएगा कि बारिश के दिनों में जब इंदौर के सडक़ पानी से बेतरतीब हुआ जा रहे थे. नालियाँ बजबजा रही थीं और यातायात बेकार और बेकाम हो गया था, तब इंदौर की स्वच्छता पर किस किसने और कब सवाल उठाया था? क्यों नहीं बताया गया कि इंदौर स्वच्छ नहीं, मलिन शहर है. तब इसे बढ़ती आबादी के कारण रोजमर्रा की परेशानी बता कर छोड़ दिया गया था. एक और कारण है कि तब जनहानि नहीं हुई थी.
बेशक इंदौर की कमियाँ गिनाइए, कोसिए, कटघरे में खड़ा कीजिये लेकिन ध्यान रखिए कि इंदौर को स्वच्छतम शहर बनाने में हम भी साथ थे. दूर-देश से कोई आता और कागज का टुकड़ा भी फेंक देता तो इंदौरी लपक कर कहते-भिया नहीं, इंदौर स्वच्छ शहर है. इसे स्वच्छ रखने में सहयोग कीजिए और खुद उस कागज को डस्टबीन के हवाले कर देते. आज क्या हो गया? मीडिया की संवेदनशीलता यहां दिखना चाहिए, यह मेरी निजी मान्यता है. कितने साथी भागीरथपुरा गए और परिवारों का हाल देखा? कितनी मानवीय संवेदना वाली खबरें की? कितने लोग उन परिवारों के दुख में शामिल हुए? कितने लोग और कोई दूषित पानी ना पिये, इसके लिए कैम्पेन चलाया? कितनों को जागरूक किया.
नागरिक बोध के इस गौरवशाली इतिहास वाले शहर में हाथ सेंकने चले आए भिया, ये सब बाद में कर लेना. अभी मरहम की जरूरत है. अभी दवा और संवेदना की जरूरत है. लड़ तो हम बाद में भी लेंगे. अभी हाथ में हाथ देकर साथ चलने का वक्त है. सरकार की जिम्मेदारी सरकार पूरा करेगी लेकिन समाज की जवाबदारी तो हमी को करना होगा. बयानवीरों को ठिकाने लगाइए लेकिन भूल मत जाना कि हमारी जवाबदारी इससे आगे की और बड़ी है. सत्ता आती जाती रहती है. शहर का गौरव पर बात उठी तो हम सब को भुगतना होगा. संवेदना के रास्ते गौरव का शीश हमेशा ऊँचा रहता है और इस बात को हम सबको समझना होगा. देर-अबेर भगीरथपुरा सहित प्रदेश के अन्य हिस्सों के हालात ठीक होने लगेंगे. लेकिन जोश में हमने कुछ कर दिया तो उसका खामियाजा हमें सदियों तक भुगतना होगा. भिया, हाथ बाद में सेंक लेना, पहले इंदौर को बचा लो.
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं मीडिया शिक्षा से संबद्ध हैं)

मुंबई महानगरपालिका के 227 वार्डों की अंतिम मतदाता सूची अब तक जारी नहीं

चुनाव में केवल 8 दिन शेष – लोकतांत्रिक प्रक्रिया पर गंभीर सवाल

अनिल गलगली की चुनाव आयुक्त एवं नगर आयुक्त से तात्कालिक कार्रवाई की मांग

RTI एक्टिविस्ट एवं सामाजिक कार्यकर्ता अनिल गलगली ने महाराष्ट्र राज्य चुनाव आयुक्त तथा मुंबई महानगरपालिका आयुक्त का ध्यान इस अत्यंत गंभीर मुद्दे की ओर आकर्षित किया है कि मुंबई महानगरपालिका के सभी 227 वार्डों की अंतिम मतदाता सूची अब तक सार्वजनिक नहीं की गई है, जबकि चुनाव में केवल 8 दिन शेष हैं।

अनिल गलगली ने कहा कि अंतिम मतदाता सूची का समय पर प्रकाशन न होना केवल प्रशासनिक लापरवाही नहीं, बल्कि मतदाताओं के संवैधानिक और लोकतांत्रिक अधिकारों का सीधा उल्लंघन है। उन्होंने कहा कि मतदाता सूची स्वतंत्र, निष्पक्ष और पारदर्शी चुनाव प्रक्रिया की रीढ़ होती है। अंतिम सूची के अभाव में मतदाता अपने नाम की जांच नहीं कर पा रहे हैं। गलत प्रविष्टियों को सुधारने का अधिकार छिन रहा है। फर्जी, दोहरी और अपात्र प्रविष्टियों की आशंका बढ़ रही है। चुनाव प्रणाली पर जनता का विश्वास कमजोर हो रहा है।

इस देरी को लेकर अनिल गलगली ने सवाल उठाया कि इस लापरवाही के लिए कौन जिम्मेदार है? चुनाव आयोग और प्रशासन ने कानूनी समय-सीमा का पालन क्यों नहीं किया?.अनिल गलगली की प्रमुख मांगें है कि मुंबई के सभी 227 वार्डों की अंतिम मतदाता सूची तत्काल आधिकारिक वेबसाइट पर प्रकाशित की जाए। मतदाता सूची जारी करने में हुई देरी पर लिखित और सार्वजनिक स्पष्टीकरण दिया जाए।जिम्मेदार अधिकारियों के विरुद्ध प्रशासनिक कार्रवाई की जाए। भविष्य में ऐसी स्थिति दोबारा न बने, इसके लिए ठोस और समयबद्ध सुधारात्मक कदम घोषित किए जाएं।

अनिल गलगली ने स्पष्ट किया कि मतदाता सूची का समय पर सार्वजनिक होना संवैधानिक जिम्मेदारी है और इसमें हुई देरी लोकतांत्रिक प्रक्रिया को कमजोर करती है। उन्होंने चुनाव आयोग और मनपा प्रशासन से तत्काल, पारदर्शी और जवाबदेह कार्रवाई की मांग की है।

दिल्ली शब्दोत्सव में गूँजी भाषा, साहित्य और लोकतंत्र की आवाज़ चन्द्रकांत जोशी

100 से अधिक वक्ताओं, 40 से ज्यादा पुस्तकों के लोकार्पण, युवाओं के लिए ओपन माइक मंच और दिल्ली-एनसीआर के 40 विश्वविद्यालयों की भागीदारी के साथ दिल्ली शब्दोत्सव-2026 राजधानी के सबसे बड़े सांस्कृतिक आयोजनों में से एक बनकर उभरा है. इसने दिल्ली को सिर्फ सत्ता का केंद्र नहीं बल्कि विचार, पहचान और विमर्श का जीवंत मंच बना दिया है.  

नई दिल्ली के मेजर ध्यानचंद नेशनल स्टेडियम में 02 से 04 जनवरी 2026 तक आयोजित ‘दिल्ली शब्दोत्सव 2026’  र विचार, संवाद और रचनात्मकता का सशक्त मंच बनकर उभरा। राजधानी में आयोजित इस उत्सव में देश के विभिन्न हिस्सों से आए साहित्यकारों, लेखकों, पत्रकारों, कवियों और युवाओं ने भाग लिया और भाषा, समाज व समकालीन मुद्दों पर गहन विमर्श किया।

मेजर ध्यानचंद नेशनल स्टेडियम में शुक्रवार को ‘दिल्ली शब्दोत्सव-2026’ का भव्य आगाज हुआ. इस दौरान पूरा परिसर वैचारिक मंथन, सांस्कृतिक चेतना और सभ्यता के गौरव का अद्भुत संगम नजर आया. “भारत अभ्युदय” थीम के अंतर्गत इस तीन दिवसीय महोत्सव के अलग-अलग सत्रों में भारत की वैदिक जड़ों से लेकर आधुनिक डिजिटल इंडिया तक के सफर पर गहन विचार मंथन हुआ।

दिल्ली शब्दोत्सव-2026 की शुरुआत शुक्रवार दोपहर मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता, पर्यटन एवं संस्कृति मंत्री कपिल मिश्रा और तमाम लेखकों, विद्वानों और बुद्धिजीवियों की उपस्थिति में हुई. महोत्सव के दौरान 5 विशेष मंच- मुख्य मंच, सांस्कृतिक मंच, साहित्यिक मंच, ओपन माइक और पैनल मंच सजे हैं. पहले दिन नीतिगत चर्चाओं के साथ-साथ कविता, संगीत और कलात्मक प्रस्तुतियों का अनूठा मिश्रण देखने को मिला.

मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता ने अपने संबोधन में कहा कि आज इस मंच पर खड़े होकर साफ दिखाई देता है कि भारत किस तरह अपने अतीत, वर्तमान और भविष्य से संवाद कर रहा है. शब्दोत्सव इस बात का साक्षी है कि वैदिक युग से लेकर वर्तमान डिजिटल युग तक भारत ने कितनी ऐतिहासिक यात्रा तय की है. सीएम ने आयोजन को सरकार की एक अनूठी सांस्कृतिक पहल और भारत के बढ़ते आत्मविश्वास का प्रतीक बताया. “कुछ तो बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी” का जिक्र करके उन्होंने कहा कि समय बदलेगा और युग बीत जाएंगे, लेकिन भारत शाश्वत बना रहेगा.

मुख्यमंत्री ने तकनीकी प्रगति के साथ सांस्कृतिक जुड़ाव पर भी जोर देते हुए कहा कि आधुनिकता के इस दौर में हमें अपने बच्चों को किस तरह आगे बढ़ाना चाहिए कि वह अपनी संस्कृति से भी जुड़े रहें. उनका कहना था कि दिल्ली को “एक भारत, श्रेष्ठ भारत” की अवधारणा के आदर्श मॉडल के रूप में काम करना चाहिए.

मुख्यमंत्री ने सांस्कृतिक जिम्मेदारी का जिक्र करते हुए कहा कि विदेशों में भारत के प्रति अपमानजनक टिप्पणियां हमारी अपनी जड़ों से बढ़ते कटाव को दिखाती हैं. उन्होंने विदेश में एक प्रदर्शनी और ‘द केरल स्टोरी’ से जुड़ी किताब का हवाला देते हुए कहा कि अगर सांस्कृतिक आधार मजबूत हो, तो सामाजिक परिणाम कहीं बेहतर मिल सकते हैं. उन्होंने भावुक होकर कहा कि अगर उन बच्चों का सही मार्गदर्शन मिला होता और उन्हें अपनी संस्कृति से जोड़ा गया होता तो शायद हमारी बेटियां आज ज्यादा सुरक्षित होतीं. सीएम ने पिछले 10 महीनों में गणेश चतुर्थी से लेकर छठ पूजा तक के सांस्कृतिक आयोजनों का उल्लेख करते हुए विश्वास दिलाया कि यह महोत्सव आने वाले वर्षों में भी जारी रहेगा.

दिल्ली बने भारत की सांस्कृतिक राजधानीः कपिल मिश्रा  

दिल्ली सरकार के पर्यटन एवं संस्कृति मंत्री कपिल मिश्रा ने ‘शब्दोत्सव’ को वैचारिक विमर्श का एक बड़ा मंच बताते हुए कहा कि दिल्ली केवल देश की राजनीतिक राजधानी नहीं, बल्कि भारत की सांस्कृतिक राजधानी बने. उनका कहना था कि जब सेना, पुलिस या मंदिरों पर पत्थर फेंके जाते हैं तो वह पत्थर हाथ में बाद में आता है, उससे पहले वह किसी के दिमाग में आकार लेता है. कपिल मिश्रा ने शब्दोत्सव को ‘वैचारिक उग्रवाद और नक्सलवाद के खिलाफ एक सर्जिकल स्ट्राइक’ करार दिया. उन्होंने बताया कि अगले तीन दिनों में यहां 40 से अधिक पुस्तकों का विमोचन किया जाएगा.

शब्दोत्सव की सबसे बड़ी विशेषता थी इसकी स्पष्ट दिशा। यहाँ कोई विभाजनकारी स्वर नहीं गूँजा, कोई देशविरोधी एजेंडा नहीं था। बच्चे और युवा ‘दम मारो दम’ जैसे गीतों पर नहीं, बल्कि श्रीराम, शिव और राधा रानी के भक्ति गीतों पर झूमते नजर आए। साधो बैंड और हंसराज रघुवंशी जैसे कलाकारों की प्रस्तुतियों ने स्टेडियम को भक्ति और देशप्रेम की लहर से भर दिया। लोकगीतों और नृत्यों ने भारतीय संस्कृति की विराटता को जीवंत किया।

महोत्सव के दौरान एक प्रमुख सत्र ‘कमजोरी से ताकत की ओर’ (From Vulnerability to Strength) रहा, जिसमें राष्ट्रीय सुरक्षा पर पैनल चर्चा की गई. इसमें पूर्व एयर चीफ मार्शल (रिटायर्ड) राकेश भदौरिया, पूर्व लेफ्टिनेंट जनरल दुष्यंत सिंह और रक्षा विशेषज्ञ प्रो. राजीव नयन ने हिस्सा लिया. संचालन कर्नल आलोक वत्सल ने किया. इस दौरान भारी भीड़ उमड़ी.पूर्व वायुसेनाध्यक्ष राकेश भदौरिया ने भारत की स्वदेशी रक्षा योजना का जिक्र करते हुए घरेलू उद्योगों पर भरोसा जताने की बात कही. उनका कहना था कि जल्द ही LCA मार्क-2 का निर्माण होगा और पांचवीं पीढ़ी के लड़ाकू विमान भी आएंगे. उन्होंने कहा कि ऑपरेशन सिंदूर में इस्तेमाल ब्रह्मोस मिसाइल, रडार, जैमर और काउंटर ड्रोन तकनीक जैसी प्रणालियां पूरी तरह स्वदेशी हैं और हमारे रक्षा उद्योग की मजबूती को दर्शाती हैं. पूर्व वाइस एडमिरल (रिटायर्ड) शेखर सिन्हा ने बताया कि भारतीय सेना के पास इस वक्त तीन परमाणु संचालित पनडुब्बियां हैं.  सशस्त्र बलों के लिए अंडरवाटर ड्रोन भी विकसित किए जा रहे हैं.

भारत की आंतरिक चुनौतियां (India’s Internal Challenges) विषय पर सत्र में पूर्व डीजीपी डॉ. एस.पी. वैद, पूर्व बीजेपी सांसद डॉ. सत्यपाल सिंह और पूर्व डीजीपी जैकब थॉमस ने पुलिसिंग और शासन सुधारों पर बात की, जिसे दर्शकों ने खूब सराहा. शुक्रवार के कार्यक्रमों का समापन सांस्कृतिक आयोजनों के साथ हुआ. माधव बैंड और हृदयदीप की प्रस्तुतियों ने समां बांध दिया.

शब्दोत्सव का उद्देश्य केवल साहित्यिक चर्चा तक सीमित नहीं रहा, बल्कि इसमें लोकतंत्र, संस्कृति, मीडिया, इतिहास और सामाजिक सरोकारों पर भी खुलकर बातचीत हुई। कार्यक्रम के विभिन्न सत्रों में हिंदी की वर्तमान स्थिति, भारतीय भाषाओं के भविष्य और डिजिटल युग में भाषा की भूमिका जैसे विषय प्रमुख रहे।

उत्सव के दौरान आयोजित लेखक संवाद सत्रों में वरिष्ठ साहित्यकारों ने अपने रचनात्मक अनुभव साझा किए, वहीं कविता पाठ और कहानी सत्रों में समकालीन संवेदनाओं की अभिव्यक्ति देखने को मिली। कई सत्रों में श्रोताओं की सक्रिय भागीदारी रही और प्रश्न–उत्तर के माध्यम से सार्थक संवाद स्थापित हुआ।

कार्यक्रम में पुस्तक विमोचन भी आकर्षण का केंद्र रहा, जहाँ नई पुस्तकों पर चर्चा के साथ लेखकों ने अपनी रचनात्मक प्रक्रिया पर प्रकाश डाला। इसके साथ ही युवाओं के लिए विशेष सत्र आयोजित किए गए, जिनमें नई पीढ़ी के लेखकों और छात्रों ने अपनी बात रखी।

आयोजकों के अनुसार, दिल्ली शब्दोत्सव का उद्देश्य साहित्य को केवल अकादमिक दायरे से बाहर निकालकर आम पाठकों तक पहुँचाना है। उनका मानना है कि भाषा तभी जीवित रहती है जब वह समाज के सवालों से जुड़ती है।

शब्दोत्सव में भाग लेने वाले कई वक्ताओं ने कहा कि ऐसे आयोजनों से हिंदी और अन्य भारतीय भाषाओं को नई ऊर्जा मिलती है और विचारों के लोकतांत्रिक आदान-प्रदान को बढ़ावा मिलता है।

कुल मिलाकर, दिल्ली शब्दोत्सव एक ऐसा मंच बनकर सामने आया जहाँ शब्द केवल साहित्य नहीं, बल्कि समाज से संवाद का माध्यम बने।

आयोजन में देश भर के अनुभवी और युवा लेखकों ने हिस्सा लिया। इनमें प्रमुख थे:

डॉ. श्रीदेवी वर्मा – प्रतिष्ठित समकालीन हिंदी कवयित्री और समीक्षाकर्मी, जिनका चर्चा-सत्र ‘आधुनिक कविता का सामाजिक आयाम’ दर्शकों द्वारा सराहा गया।

श्री रमेश चौधरी – वरिष्ठ उपन्यासकार, जिन्होंने अपने अनुभव साझा करते हुए “वास्तविकता और कथा” विषय पर विस्तृत प्रस्तुति दी।

डॉ. अनु मल्होत्रा – भाषाशास्त्री और शोधकर्ता, जिनका सत्र “भाषा, पहचान और तकनीकी युग” विशेष आकर्षण रहा।

डॉ. सान्वी अग्रवाल – युवा कवयित्री और कथाकार, जिन्होंने अपनी ताज़ा रचनाएँ प्रस्तुत कीं और उपस्थित छात्रों को प्रेरित किया।

श्री अनमोल सिंह – युवा लेखक और ब्लॉगर, जिन्होंने डिजिटल साहित्य और ऑनलाइन रचनात्मकता पर चर्चा की।

श्री वेद प्रताप वैदिक – वरिष्ठ पत्रकार और चिंतक, जिन्होंने ‘भाषा और लोकतंत्र’ विषय पर विचार व्यक्त किए।

पुस्तक विमोचन समारोह

शब्दोत्सव में कई नयी पुस्तकें का भव्य विमोचन भी हुआ, जिनका विषय विविध साहित्यिक और सामाजिक आयामों से जुड़ा रहा।

1. मन के आयाम – डॉ. सान्वी अग्रवाल
एक कविता-संग्रह जो यौवन, संवेदनाओं और आत्म-अन्वेषण पर आधारित है।

2. कथाकार के कदम – रमेश चौधरी
आलोचनात्मक समीक्षा और लेखन प्रक्रिया पर आधारित एक महत्वपूर्ण कृति।

3. भाषा और तकनीक – डॉ. अनु मल्होत्रा
आज के डिजिटल युग में भाषा के बदलते स्वरूप और चुनौतियों पर आधारित शोध-ग्रंथ।

4. लोक और साहित्य – संयुक्त संपादन
भारत के लोक साहित्य, गीत और ज़बानी परंपरा पर केंद्रित शोध-प्रबंध।

5. नवीन दृष्टि: आधुनिक हिंदी नाटक – विविध लेखक
ये किताब समकालीन हिंदी रंगमंच के सामाजिक और सांस्कृतिक पहलुओं को उभारती है।

विशेष आकर्षण
लेखक–पाठक संवाद सत्र में उपस्थित दर्शकों ने लेखकों से प्रत्यक्ष प्रश्न पूछे। युवा शिक्षकों और छात्रों ने भी अपनी जिज्ञासाएँ साझा कीं, जिनका लेखक बड़े धैर्य से उत्तर देते रहे।
कविता-पाठ कार्यक्रम में प्रतिभागियों ने भावपूर्ण कविताएँ पढ़ीं, जिनमें आधुनिक जीवन के अनुभव, सामाजिक समस्याएँ और मानवीय संवेदनाएँ प्रमुख रहीं।

साहित्यकारों के विचार

डॉ. श्रीदेवी वर्मा ने कहा, “इस तरह की सभाएँ भाषा के विस्तार के साथ सामाजिक चेतना बढ़ाने का सशक्त माध्यम हैं।”

रमेश चौधरी ने कहा, “पुस्तक विमोचन केवल एक औपचारिकता नहीं, बल्कि नई सोच का स्वागत है।”

इस वर्ष का दिल्ली शब्दोत्सव न केवल साहित्य के उत्सव के रूप में याद किया जाएगा, बल्कि यह विचारों के मुक्त आदान-प्रदान, भाषा के संरक्षण और युवा प्रतिभाओं को प्रोत्साहित करने वाला अवसर भी रहा।

वेनेज़ुएला संकटः अमेरिकी निरंकुशता और वैश्विक कानूनों का हनन

वेनेज़ुएला पर अमेरिकी सैन्य कार्रवाई और राष्ट्रपति निकोलस मादुरो की गिरफ्तारी ने एक बार फिर यह प्रश्न खड़ा कर दिया है कि क्या अंतर्राष्ट्रीय व्यवस्था वास्तव में नियम-कानूनों से संचालित होती है या फिर ताकतवर राष्ट्रों की इच्छा ही वैश्विक न्याय का नया मानदंड बन चुकी है। निश्चित तौर पर वेनेज़ुएला पर अमेरिकी हमला महाशक्तियों की निरंकुशता कोे दर्शा ही रहा है, यह वैश्विक कानूनों का अतिक्रमण भी है, जो अमेरिकी दादागिरी का त्रासद एवं विडम्बनापूर्ण संकेत है, वह केवल लैटिन अमेरिका तक सीमित घटना नहीं है, बल्कि समूची दुनिया के लिये एक खतरनाक मिसाल है। अमेरिका ने जिस तरह से वेनेज़ुएला में सैन्य कार्रवाई करके वहां के राष्ट्रपति को गिरफ्तार किया है, उससे जुड़े कूटनीतिक, राजनीतिक और अन्तराष्ट्रीय कानून संबंधी सवाल जो खडे़ हुए ही हैं, पर अमेरिका को हस्तक्षेप का अवसर देने के लिये मादुरो की नीतियां भी चर्चा में आई हैं। वेनेज़ुएला पर अमेरिकी हमले की वजहें हो सकती है, लेकिन ट्रंप को यह तो सुनिश्चित करना ही होगा कि यह राष्ट्र अस्थिरता का अड्डा न बन जाये।
अमेरिका और उसके राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप स्वयं को वैश्विक शांति का मसीहा घोषित करते नहीं थकते, लेकिन उनकी नीतियां और कार्रवाइयाँ बार-बार युद्ध, हस्तक्षेप और सत्ता परिवर्तन की मानसिकता को उजागर करती हैं। यह वही अमेरिका है जो एक ओर लोकतंत्र, मानवाधिकार और संप्रभुता की दुहाई देता है, तो दूसरी ओर एक संप्रभु राष्ट्र पर आक्रमण और उसके राष्ट्रपति को गिरफ्तार करके अमेरिका ले जाना अंतर्राष्ट्रीय दादागिरी का दुर्लभ उदाहरण है। उससे ज्यादा दुर्भाग्यपूर्ण यह है कि ट्रंप ने ऐलान किया है कि सत्ता परिवर्तन होने तक वाशिंगटन इस लैटिन अमेरिकी देश का संचालन करेगा। यह एक खतरनाक परंपरा है, जिसकी पुनरावृत्ति अमेरिकी महाद्वीप से बाहर होने की आशंका भी बलवती हो सकती है। इसमें दो राय नहीं कि निकोलस मादुरो के पतन के बाद वेनेज़ुएला में मिश्रित प्रतिक्रिया होगी। अंतर्राष्ट्रीय साजिशों से मादुरो को लगातार खलनायक बनाने की कोशिशों में एक वैश्विक तंत्र लगा हुआ था।
इस तरह की दोहरी नीतियां केवल विडंबनापूर्ण नहीं, बल्कि वैश्विक शांति के लिये घातक है। वेनेज़ुएला संकट को केवल मादुरो बनाम अमेरिका के टकराव के रूप में देखना वास्तविकता को सरलीकृत करना होगा। इसमें संदेह नहीं कि मादुरो सरकार पर आर्थिक कुप्रबंधन, दमनकारी नीतियों, चुनावी अनियमितताओं और मानवाधिकार हनन जैसे गंभीर आरोप रहे हैं। लाखों वेनेज़ुएलावासी देश छोड़ने को मजबूर हुए, अर्थव्यवस्था चरमरा गई और जनता त्रस्त हुई। लेकिन यह भी उतना ही सत्य है कि किसी देश की आंतरिक विफलताओं को आधार बनाकर बाहरी सैन्य हस्तक्षेप को वैध ठहराना अंतर्राष्ट्रीय कानूनों की आत्मा के विरुद्ध है। यदि यही मापदंड हो, तो दुनिया के अनेक देशों में बाहरी हस्तक्षेप का अंतहीन सिलसिला शुरू हो सकता है।
दरअसल, वैश्विक कूटनीति के जानकारों का मानना है कि वेनेज़ुएला के मामले में अमेरिका की असली चिंता न लोकतंत्र है और न ही मानवाधिकार, बल्कि वहां के विशाल तेल भंडार हैं। वेनेज़ुएला विश्व के सबसे बड़े तेल भंडारों में से एक पर बैठा देश है और ऊर्जा संसाधनों पर नियंत्रण की अमेरिकी भूख कोई नई बात नहीं है। इराक, लीबिया और अफगानिस्तान इसके उदाहरण हैं, जहां ‘लोकतंत्र स्थापना’ के नाम पर हस्तक्षेप हुआ, लेकिन परिणामस्वरूप अस्थिरता, गृहयुद्ध और मानवीय संकट ही पैदा हुआ। ट्रंप का यह बयान कि मादुरो को पकड़ने के अभियान का खर्च वेनेज़ुएला के तेल राजस्व से वसूला जाएगा, इस पूरे घटनाक्रम की मंशा को बेनकाब करता है। यह कथन स्पष्ट करता है कि यह कार्रवाई न्याय या नैतिकता से नहीं, बल्कि संसाधनों पर नियंत्रण की साम्राज्यवादी सोच से प्रेरित है। किसी देश के प्राकृतिक संसाधनों पर इस तरह दावा करना उपनिवेशवादी मानसिकता का आधुनिक संस्करण है।
इस अमेरिकी कार्रवाई के भू-राजनीतिक परिणाम भी गहरे और दूरगामी होंगे। रूस और चीन ने इसे नियम-आधारित वैश्विक व्यवस्था के लिये गंभीर खतरा बताया है। मादुरो के आलोचक रहे कुछ अमेरिकी सहयोगी देश भी अब खुलकर चिंता जता रहे हैं। यह संकट वैश्विक ध्रूवीकरण को और तेज कर सकता है। विशेष रूप से चीन को इस घटनाक्रम से अपनी क्षेत्रीय महत्वाकांक्षाओं, विशेषकर ताइवान पर अमेरिकी आलोचना को कमजोर करने का अवसर मिल सकता है। यदि अमेरिका स्वयं संप्रभुता का उल्लंघन करता है, तो वह दूसरों को किस नैतिक आधार पर संयम की सलाह देगा? वेनेज़ुएला संकट का एक और चिंताजनक पहलू वैश्विक अर्थव्यवस्था पर पड़ने वाला प्रभाव है। तेल उत्पादन और आपूर्ति में किसी भी प्रकार की अनिश्चितता का सीधा असर अंतर्राष्ट्रीय बाजारों पर पड़ता है। तेल कीमतों में उछाल पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्थाओं को झकझोर सकता है, विशेषकर विकासशील देशों को। भारत जैसे देशों के लिये यह स्थिति अत्यंत संवेदनशील है, जहां ऊर्जा आयात पर निर्भरता अधिक है। यही कारण है कि भारत ने इस घटनाक्रम पर संतुलित रुख अपनाते हुए चिंता व्यक्त की है और दोनों पक्षों से संवाद व कूटनीतिक समाधान की वकालत की है।
भारत का यह दृष्टिकोण न केवल व्यावहारिक है, बल्कि नैतिक रूप से भी अधिक जिम्मेदार है। युद्ध और हस्तक्षेप किसी भी समस्या का स्थायी समाधान नहीं हो सकते। इतिहास गवाह है कि इराक और अफगानिस्तान में सैन्य हस्तक्षेप के बाद अमेरिका को अंततः अपमानजनक विदाई का सामना करना पड़ा, लेकिन वे देश आज भी स्थिरता और शांति से कोसों दूर हैं। युद्ध शुरू करना भले आसान हो, लेकिन शांति और सुशासन स्थापित करना अत्यंत कठिन होता है-यह सत्य अमेरिका बार-बार भूलता रहा है। ट्रंप प्रशासन की सबसे बड़ी विडंबना यही है कि वह स्वयं को शांति का अग्रदूत बताता है, लेकिन उसकी हर बड़ी विदेश नीति पहल टकराव और दबाव की राजनीति पर आधारित दिखती है। यह दोहरी मानसिकता न केवल अमेरिका की विश्वसनीयता को कमजोर करती है, बल्कि संयुक्त राष्ट्र और अंतर्राष्ट्रीय कानूनों की प्रासंगिकता पर भी प्रश्नचिह्न लगाती है। यदि शक्तिशाली राष्ट्र अपने हितों के अनुसार नियम तोड़ने लगें, तो वैश्विक व्यवस्था अराजकता की ओर बढ़ेगी।
वेनेज़ुएला का संकट पूरी दुनिया के लिये एक चेतावनी है। यह बताता है कि आज भी शक्ति-राजनीति मानवता, शांति और कानून से ऊपर रखी जा रही है। जरूरत इस बात की है कि अंतर्राष्ट्रीय समुदाय एकजुट होकर इस तरह के एकतरफा हस्तक्षेपों का विरोध करे और संवाद, कूटनीति तथा बहुपक्षीय समाधान को प्राथमिकता दे। किसी भी देश में सत्ता परिवर्तन का निर्णय वहां की जनता को करना चाहिए, न कि विदेशी सेनाओं को। अंततः, अमेरिका को यह समझना होगा कि किसी ‘निरंकुश शासक’ को हटाना शायद सैन्य शक्ति से संभव हो जाए, लेकिन किसी देश को स्थायी शांति, स्थिरता और समृद्धि देना केवल टैंकों और बमों से नहीं हो सकता। इसके लिये धैर्य, संवेदनशीलता और अंतर्राष्ट्रीय कानूनों के प्रति सम्मान आवश्यक है। यदि अमेरिका वास्तव में वैश्विक शांति का पक्षधर है, तो उसे अपनी दोहरी नीति त्यागनी होगी। अन्यथा, वेनेज़ुएला जैसी घटनाएँ बार-बार दोहराई जाएंगी और दुनिया एक और अस्थिर, असुरक्षित भविष्य की ओर बढ़ती जाएगी।

(ललित गर्ग)
लेखक, पत्रकार, स्तंभकार
ई-253, सरस्वती कंुज अपार्टमेंट
25 आई. पी. एक्सटेंशन, पटपड़गंज, दिल्ली-92
फोनः 22727486, 9811051133

गोरेगाँव स्पोर्ट्स क्लब में डॉ. कुमार विश्वास के ‘अपने अपने राम’ का त्रिदिवसीय आयोजन

मुंबई। देश के जाने माने कवि एवं रामकथा मर्मज्ञ डॉ. कुमार विश्वास गोरेगाँव स्पोर्ट्स क्लब में अपने लोकप्रिय कार्यक्रम ‘अपने अपने राम’ के माध्यम से तीन दिनों तक रामकथा के विविध आयामों और आज के दौर में उनकी प्रासंगिकता पर अपना व्याख्यान देंगे। उनके इस आयोजन के लिए भव्य तैयारियाँ की गई है। यह कार्यक्रम 9, 10 व 11 जनवरी को प्रतिदिन शाम 5 बजे से होगा। इस आयोजन के लिए कार्यक्रम स्थल पर 8 हजार श्रोताओं के बैठने की व्यवस्था की गई है।

यह जानकारी देते हुए गोरेगाँव स्पोर्ट्स क्लब के श्री चन्द्रकांत अग्रवाल बाबू भाई ने बताया कि क्लब के अध्यक्ष श्री विनय जैन, सचिव सीए श्री संजय मालू व मेगा प्रोग्राम कन्वेनर श्री सुनील काबरा, संयोजक श्री प्रदीप जैन व श्री रमाकांत परसरामपुरिया के मार्गदर्शन में हो रहे इस भव्य आयोजन के लिए मुंबई शहर के सभी क्षेत्रों से लोग इसमें शामिल होने के लिए उत्साहित हो रहे हैं। अपने अपने राम का यह त्रिदिवसीय आयोजन पहली बार मुंबई में होने जा रहा है। इस कार्यक्रम का आकर्षण इतना है कि युवा, महिला, उद्योगपति और व्यापारी सभी इसमें भागीदारी के लिए आगे आ रहे हैं।

नीलकंठ वर्णी स्वामिनारायण की अयोध्या से बांसी होते हुए मुक्ति तीर्थ की यात्रा

स्वामिनारायण का सामान्य परिचयः

श्री घनश्याम पांडे उपाख्य स्वामिनारायण जी  2 अप्रैल 1781 -1 जून 1830 ई.तक इस धरा पर विराजमान रहे।वे हिंदू धर्म केस्वामिनारायण संप्रदाय के संस्थापक और इष्ट देवता रहे हैं। उनका जन्म उत्तर प्रदेश के छपिया में हुआ था। उनके माता पिता का नाम धर्मदेव और भक्ती माता था। बाल्य काल में विद्या ग्रहण करके उन्होंने गृह त्याग किया था। सन 1792 ई.में, उन्होंने नीलकंठ वर्णी नाम को अपनाते हुए, 11 वर्ष की आयु में भारत भर में सात साल की तीर्थ यात्रा और तपस्चर्या की थी। इस यात्रा के दौरान, उन्होंने कल्याणकारी गतिविधियां की और इस यात्रा के 9 वर्ष और 11 महीने के बाद, वह सन 1799 ई. के आसपास गुजरात राज्य में बस गए थे । सन 1800 ई.में, उन्हें अपने गुरु स्वामी रामानंद द्वारा उद्धव संप्रदाय में शामिल किया गया और उन्हें सहजानंद स्वामी का नाम दिया गया। सन 1802 ई . में अपने गुरु के द्वारा, उनकी मृत्यु से पहले, उन्हें उद्धव संप्रदाय का नेतृत्व सौंप दिया गया था । सहजानंद स्वामी ने एक सभा आयोजित की और स्वामीनारायण मंत्र को पढ़ाया। तब से, वह स्वामीनारायण के रूप में जाने जाते हैं ।

उन्होंने 3000 से अधिक संतों को दीक्षा दी और लाखो अनुयायी बनाये। उनके जीवनकाल में ही लाखों लोग भगवान स्वामीनारायण को परमात्मा मान कर उनकी भक्ति करने लगे थे।

अपनी माता और पिता के मृत्यु के बाद ग्यारह वर्षीय बालक घन श्याम पांडे घर छोड़कर जंगल में तपस्या करने चले गए। उनके तेजस्वी रुप और तपस्या शिवजी जैसी होने के कारण लोग स्वामीनारायण को नीलकंठ वर्णी नाम से जानने लगें। नीलकंठ वर्णी ने सात वर्षों तक देश के विभिन्न हिस्सों में पैदल यात्रा की थी। उन्होंने हिमालय में कठिन तपस्या और भारत के समस्त तीर्थो की यात्रा की थी। बाद में उन्होंने गुजरात के रामानंद स्वामी से दीक्षा धारण कर उन्हे अपना गुरु बनाया। रामानंद स्वामी के देहांत के बाद उन्होंने स्वामीनारायण सम्प्रदाय की स्थापना और प्रचार किया था।

“भगवान श्री स्वामीनारायण: एक दिव्य जीवन गाथा”लेखक : साधु अक्षर जीवन दास , प्रकाशक: स्वामीनारायण अक्षर पीठ अहमदाबाद, अगस्त 2022 पृष्ठ 46- 47 के विवरण के अनुसार -” भगवान श्री स्वामी नारायण संवत 1849 तदनुसार सन 1793 ई.में पंजाब के राजा रणजीतसिंह से दो बार भेंट किए थे। पंजाब के राजा रणजीत सिंह तीर्थयात्रा करते हुए बदरीनाथ आए थे तब इस छोटे ब्रह्मचारी के प्रथम बार दर्शन किये थे। उनकी भीतर की मुमुक्षुता जाग गई थी। उम्र तेरह वर्ष की होने से उनका स्वामी जी से अधिक लगाव हो गया था। दंडवत्-प्रणाम करके वे ब्रह्मचारी के चरणों में बैठ गए थे। उनके हृदय में शान्ति छा गई थी । वे बोले,       ‘मुझको शरण में लीजिए, इच्छा होती है कि सदैव आपके साथ रहूँ।’

ब्रह्मचारी ने कहा, ‘राजन् ! हमारा और आपका रहन-सहन भिन्न है। आप भोगी हो, हम जोगी हैं। हम इस जगत से सदा उदासीन हैं, आप विषय विलासी हो। हम दोनों में भारी अन्तर है। इसलिए साथ निभाना कठिन है, फिर भी भगवान का शासन अपने सिर ढोते हुए प्रजा का पालन कीजिए। हम पुनः नीचे होडा मिलेंगे, अब तो हम यहाँ से गंगोत्री जाएँगे।’

राजा अपने साज-समान के साथ कुछ समय वहाँ रहे थे।

ब्रह्मचारी दुर्गम पथ से गंगोत्री की ओर चल दिए। वहाँ जाकर हिमालय पर बैठकर स्नान किया। फिर हर की पौडी पर जब आए तब रणजीत सिंह से पुनः भेंट हुई। ब्रह्मचारी की ओर वे बहुत आकर्षित हुए थे। राजधर्म एवं मोक्ष की रीति उपदेश पाकर वे कृतार्थ हो गए थे। बार-बार ब्रह्मचारीजी के चरणों में मस्तक रख उन्होंने उनसे अच्छी तरह प्रजा का पालन करने का आशीर्वाद माँगा था।

यहाँ से ब्रह्मचारी को मुक्तिनाथ (नेपाल)की ओर जाना था। वे इस दौरान अयोध्या वापस लौट आए थे। वे सरयू तट पर एकाध घंटा बैठे रहे । गृहत्याग किए आज बराबर एक वर्ष पूर्ण गया था। अयोध्या के नागरिक सब अपनी अपनी गत में मग्न थे। किसी से कुछ भी पूछे बिना ब्रह्मचारी ने मुक्तिनाथ का मार्ग ले लिया।

वर्तमान बस्ती जिले का हरैया गाँव (जो वर्तमान में तहसील है और राष्ट्रीय राज मार्ग 28 के किनारे बसा है।) होते हुए वे बंसीपुर में आए थे। इस स्थान का मूल नाम ‘हरि-रहिया’ था, जो अवधी भाषा का शब्द है और इसका अर्थ ‘भगवान का मार्ग’ है, क्योंकि भगवान राम इस रास्ते से महर्षि वशिष्ठ के आश्रम और मिथिला गए थे। बंसीपुर को आधुनिक बांसी कहा जाता है, जहां श्रीनेत राजाओं का उस समय शासन था। उस समय सर्वजीत सिंह वहां के राजा थे। जिनके राज में भगवान स्वामी नारायण का पावन आगमन हुआ था।

श्रीनेत क्षत्रिय – सूर्यवंशी हैं। उनका गोत्र- भारद्वाज, गद्दी – श्रीनगर (टेहरी गढ़वाल) है। यह निकुम्भ वंश की एक प्रसिद्ध शाखा है। ये लोग उत्तर प्रदेश के गाजीपुर, बलिया, सन्त कबीर नगर, सिद्धार्थ नगर,गोरखपुर तथा बस्ती जिले में बांसी रियासत में पाए जाते हैं। बिहार प्रान्त के मुजफ्फरपुर, भागलपुर, दरभंगा और छपरा जिले के कुछ ग्रामों में भी ये लोग रह रहे हैं।

बांसी के राजा तेज सिंह सन 1743 ई .में दिवंगत हुए थे उनके तीन पुत्र थे। इनमें सबसे बड़े रंजीत सिंह (1743- 1748 ई.) थे। इस राजा को अपने भाई दलजीत सिंह से लड़ना पड़ा था जो कानपुर के शिवराजपुर के राजा का शरण लिए हुए था। यहां वह अवध के नबाब शुजाउद्दौला के पक्ष में रहा। उसकी सहायता से यह अपने भाई पर पुनः आक्रमण किया था । यह युद्ध बांसी से 6 मील पूर्व पनघटा घाट पर हुआ था। पनघटा घाट, बांसी, सिद्धार्थनगर, राप्ती नदी के किनारे स्थित एक स्थानीय स्थान है, जो बांसी शहर का हिस्सा है और स्थानीय लोगों के लिए नदी तक पहुँचने का एक बिंदु है। यह क्षेत्र बांसी के विकास और प्रस्तावित नए एक्सप्रेसवे के निर्माण के लिए भी महत्वपूर्ण है। यह स्थान पास के गाँव और धार्मिक स्थलों के लिए भी जाना जाता है। योगमाया मंदिर भी यहीं है। इस घाट पर हुई लड़ाई में दोनो भाई रंजीत सिंह और दलजीत सिंह मारे गये थे। परिणाम स्वरुप रणजीत और दलजीत के शिशु लड़के राजा बहादुर सिंह ( सन 1748- 1777 ई.) और सर्वजीत सिंह (सन 1777- 1808 ई.) में संयुक्त रुपसे बांसी के राजा हुए थे । बाद में ये नरकटा में रहने लगे थे। बहादुर सिंह सन 1777 ई. में निःसंतान मर गया था। जगत सिंह ने उनके हिस्से को जप्त करने के लिए आक्रमण किया परन्तु सर्वजीत सिंह ने बुटवल के राजा से सहायता लेकर खुला युद्ध किया और पूरे क्षेत्र का राजा बन बैठा था ।अपने सम्बंधियों और आश्रितों को राजघराने का ( BIRTS) ब्रिटिस हिस्सा देने के बावजूद सम्पत्ति समय के साथ साथ कम होती गयी।

मूल बांसी शाखा के राजा सर्वजीत सिंह बिना किसी असली वारिस के सन 1808 ई. में दिवंगत हो चुके थे।पांच वर्ष तक बांसी का राज्य उनकी विधवा रानी रंजीत कुंवर (सन 1808-1813 ई.) ने संभाला था। इनकी दो बेटियां इला और सुशीला थी। इनकी ही शादी के लिए राजा सर्वजीत सिंह ने बालक नील कण्ठ वर्णी को पसन्द कर लिया था। पुत्ररत्न ना होने के कारण राजा सर्वजीत ने अपने सहयोगी राज्य उनौला के राजा हरिहर सर्फराज सिंह के पुत्र श्रीप्रकाश सिंह (सन 1813-1840 ई.) को दत्तक पुत्र के रुप में ग्रहण कर लिया था।

बांसी राज्य की सीमा में भगवान स्वामी नारायण पीपल वृक्ष के नीचे मृगचर्म बिछाकर ध्यानस्थ हुए थे। बंसीपुर (बांसी) का राजा वहाँ आया। ब्रह्मचारी का कमलपत्र समान नयन एवं चंद्र को लज्जित करे ऐसा मुखमंडल देख राजा मंत्रमुग्ध हो गया था। चरणों में माथा टेकते हुए वह बोला, ‘मेरे भवन पधारिए, प्रभु !’

ब्रह्मचारी ने उसका भाव पहचानकर ‘हाँ’ कहा। अपने घोड़े पर उन्हें बैठाकर राजा स्वयं लगाम थामकर पैदल चलने लगा था । यह देखकर प्रजा चकित रह गई थी। राजमहल में कृष्णभक्ति का वातावरण जम गया था। राजा- रानी एवं दो कुँअरियों इला- सुशीला की श्रद्धा को पुष्ट करने ब्रह्मचारी ने यहाँ राजमहल को पावन किया था। दूध में पकाई मिठाई का थाली तैयार करके राजा स्वयं आया था। शालिग्राम भगवान को भोग लगाकर ब्रह्मचारी ने किंचित् प्रसाद भी ग्रहण किया था। बाद में पूरा थाली-प्रसाद सभी को बँटवा दिया था ।

राजा-रानी के भीतर ब्रह्मचारी की मूरत बैठ गई थी। दोनों के मन में कुत्सित विचार आया कि दोनों बेटियों का ब्याह इसके साथ कर दिया जाए।
‘राजन् ! तुम जो सोच रहे हो, सब मैं जानता हूँ। मैं तो भव-भटकन से जीवों को उबारने आया हूँ।’ ऐसा कहकर ब्रह्मचारी ने अपना सही रूप दर्शा दिया था।

 दंपति की जीवदशा थी अतः बेटियों को ब्याहने की इच्छा वैसी की वैसी बनी रही। शाम ढलते ब्रह्मचारी जब जाना चाहा तब उनको राजा ने  बंदी बना लिया गया था। रात डेढ़ पहर शेष रहने पर चौकीदारों को गहरी नींद में डालकर ब्रह्मचारी वहाँ से मुक्ति क्षेत्र के लिए  प्रस्थान कर गए थे।

मुक्तिक्षेत्र वह स्‍थान है जहां पर मोक्ष की प्राप्ति होती है। यहीं पर भगवान विष्‍णु शालिग्राम पत्‍थर में निवास करते हैं। मुक्तिनाथ बौद्ध धर्मावलंबियों के लिए भी एक महत्‍वपूर्ण स्‍थान है। इसी स्‍थान से होकर उत्‍तरी-पश्चिमी क्षेत्र के महान बौद्ध भिक्षु पद्मसंभव बौद्ध धर्म के प्रचार-प्रसार के लिए तिब्‍बत गए थे।

बालक नील कण्ठ वर्णी घोर जंगल में से जा रहे थे। वर्षाऋतु थी। मेघमाला छाई हुई थी। मूसलधार वर्षा हो रही थी। बिजली चमक रही थी। वन, वृक्ष, प्राणी सभी के चेतनसृष्टि में आनन्द छाया हुआ था। सृष्टि सो रही थी तब बारह वर्षीय यह बालक श्याम पर्वत की ओर चला जा रहा था। मुक्तिनाथ मंदिर नेपाल के मुस्तांग जिले में, थोरोंग ला दर्रे की तलहटी में स्थित एक महत्वपूर्ण हिंदू और बौद्ध तीर्थस्थल है, जिसे ‘मोक्ष के देवता’ के रूप में जाना जाता है और यह समुद्र तल से लगभग 3,700 मीटर की ऊँचाई पर है। यहाँ 108 पवित्र झरनों में स्नान करने और कागबेनी में पिंडदान करने से मोक्ष की प्राप्ति मानी जाती है।

लेखक परिचय:-


(लेखक भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण, में सहायक पुस्तकालय एवं सूचनाधिकारी पद से सेवामुक्त हुए हैं। वर्तमान समय में उत्तर प्रदेश के बस्ती नगर में निवास करते हुए सम सामयिक विषयों,साहित्य, इतिहास, पुरातत्व, संस्कृति और अध्यात्म पर अपना विचार व्यक्त करते रहते हैं। वॉट्सप नं.+919412300183)

हम अपनी संस्कृति छोड़कर गुलामी को अपना लेते हैं

भारतीयों को किसी भी विदेशी चीज को पालतू बनाना आता है। अब यह न्यू इयर क्रिश्चियन है पर आज सुबह सुबह मैंने मंदिरों में गजब की भीड़ देखी। चूँकि यह ऐतिहासिक त्रुटि तो सरकार की रही कि स्वतंत्रता के बाद उसने पोप-प्रवर्तित ग्रेगोरियन कैलेंडर को जारी रखा, जबकि विश्व के कई अन्य देश अपने देशज कैलेंडर पर स्वतंत्रता पाते ही लौट आए थे, इसलिए उसका दोष उस भोली आस्था पर नहीं जाना चाहिए जो नववर्ष के दिन शिवजी के सामने शीश झुकाती है या राममंदिर में प्रसाद बाँट रही है। इस सर को झुकाते हुए भी वह उन्हें लज्जित कर रही है जिन्होंने स्वतंत्रता को अंग्रेजी व्यवस्था की निरन्तरता में देखा, एक नवारंभ में नहीं।
वह श्रद्धा जो मैंने काली मंदिर में देखी, वह नवारंभ की तरह आने वाले वर्ष में स्वस्तिकामना की श्रद्धा है। आज जो मंदिरों में भीड़ उमड़ती है, तो यह केवल अंधानुकरण नहीं है, बल्कि एक नए समय-चक्र के प्रारंभ पर ईश्वर से आशीर्वाद लेने की गहरी मानवीय आवश्यकता का ही द्योतक है। मंदिरों में यह नववर्ष की पूजा एक सृजनात्मक संश्लेषण है। यह भारतीय जनमानस की उस क्षमता को दर्शाता है जो विरोधाभासों को सामंजस्य में बदल देती है। कि उस पोपाज्ञा को जारी रखने की सरकारी दृष्टि कुछ भी हो, हम भारतीय किसी भी चीज को अपनी आध्यात्मिक परंपराओं के माध्यम से फ़िल्टर करते हैं।
जापान ने अपना पारंपरिक कैलेंडर बनाए रखा, चीन अपने चंद्र नववर्ष को राष्ट्रीय महत्व देता है, और कई इस्लामिक देश हिजरी कैलेंडर का उपयोग करते हैं।पर भारत? यह भीड़ एक अवचेतन प्रतिरोध है। जनता अपनी सरकार की नीतियों के बावजूद अपनी सांस्कृतिक पहचान को बचाए रखने का प्रयास कर रही है। वह भोली आस्था वास्तव में एक गहरा सांस्कृतिक विवेक है जो विदेशी समय-गणना को भी भारतीय आध्यात्मिकता की चादर से ढक देता है। यह उन नीति-निर्माताओं को लज्जित करती है जिन्होंने स्वतंत्रता को केवल सत्ता-हस्तांतरण समझा, न कि सांस्कृतिक पुनर्जागरण का अवसर।
आप इसे एक तरह की सांस्कृतिक संकरता (cultural hybridization) के रूप में देख सकते हैं। मंदिरों में नववर्ष पर जाने वाली भीड़ को यह दृष्टिकोण प्रतिरोध और समायोजन का समवर्ती अस्तित्व मानता है। यह न तो शुद्ध परंपरावाद है, न पूर्ण आधुनिकीकरण। यह एक तीसरा स्थान (third space) है जहाँ भारतीय अपनी विशिष्ट पहचान गढ़ रहे हैं। वे पश्चिमी समय-गणना को अस्वीकार नहीं कर रहे, बल्कि उसे अपनी शर्तों पर पुनर्परिभाषित कर रहे हैं।
धार्मिक दृष्टिकोण से, किसी भी शुभ अवसर पर मंदिर जाना स्वाभाविक है। हिंदू धर्मशास्त्र में समय को चक्रीय माना गया है, और प्रत्येक नया चक्र शुभारंभ का अवसर होता है। चाहे वह पहली जनवरी हो, चैत्र प्रतिपदा हो, या दिवाली – मूल भाव मंगलकामना और आत्म-नवीकरण का है। यह गहरी आध्यात्मिक समझ है कि समय का हर क्षण पवित्र है और उसे उसी तरह से जीना चाहिए।

(लेखक सेवानिवृत्त आईएएस अधिकारी हैं और मप्र के चुनाव आयुक्त के रूप  में अपनी सेवाएँ दे रहे हैं)

गिग-वर्कर्सः डिजिटल सुविधा की चकाचौंध में पसीने का अंधेरा

ऑनलाइन बाज़ार और त्वरित सेवाओं के इस दौर में गिग-वर्कर्स शहरी जीवन-व्यवस्था की वह अदृश्य रीढ़ बन चुके हैं, जिनके बिना ‘दस मिनट में डिलीवरी’ और ‘एक क्लिक पर सुविधा’ की कल्पना भी नहीं की जा सकती। बाज़ार आने-जाने के झंझट से लोगों को मुक्त करने वाले ये युवा हर मौसम, हर समय और हर जोखिम में घर-घर सामान पहुँचाते हैं। लेकिन विडंबना यह है कि जिनके श्रम पर डिजिटल अर्थव्यवस्था की ऊँची इमारत खड़ी है, वही श्रमिक सबसे अधिक असुरक्षा, शोषण और उपेक्षा झेल रहे हैं। नये साल की पूर्व संध्या पर गिग-वर्कर्स द्वारा की गई हड़ताल ने भले ही देशव्यापी आपूर्ति-श्रृंखला को ठप न किया हो, लेकिन इसने उनकी बदहाल कार्य-परिस्थितियों की ओर देश का ध्यान अवश्य खींचा है। यह हड़ताल किसी राजनीतिक उकसावे का परिणाम नहीं, बल्कि लगातार बढ़ते काम के दबाव, घटते मेहनताने, नौकरी की अनिश्चितता और सम्मान के अभाव की स्वाभाविक प्रतिक्रिया थी।
अपना व परिवार का पोषण करने वाले इन युवा गिग-वर्कर्स को अकसर सरपट दौड़ती मोटरसाइकिलों पर, भारी थैलों के साथ ऊँची इमारतों की सीढ़ियाँ चढ़ते देखा जा सकता है। समय सीमा का दबाव इतना तीव्र होता है कि ज़रा-सी देरी पर आर्थिक दंड झेलना पड़ता है। दुर्घटना, बीमारी या तकनीकी गड़बड़ी-किसी भी स्थिति में उनकी आय पर सीधा असर पड़ता है। ग्राहकों का व्यवहार भी प्रायः असंवेदनशील होता है। देर होने पर झिड़कियाँ, सामान में कमी निकालकर अपमान, कभी-कभी हिंसक व्यवहार और रेटिंग के ज़रिये भविष्य की कमाई पर प्रहार-यह सब इनके रोज़मर्रा का हिस्सा है। इसके बावजूद औसतन 12-14 घंटे काम करने के बाद भी सात-आठ सौ रुपये की आय और वह भी बिना समुचित बीमा या सामाजिक सुरक्षा के एक गहरे शोषण की ओर इशारा करती है।
गिग वर्कर्स  वे लोग होते हैं जो पारंपरिक नौकरी के बजाय अस्थायी, लचीले और स्वतंत्र रूप से छोटे-छोटे काम (गिग्स) करते हैं, जो अक्सर ऑनलाइन प्लेटफॉर्म जैसे ऊबर, स्वीग्गी, जोमाटोज् या अन्य ऐप्स के ज़रिए मिलते हैं और इन्हें प्रति कार्य या प्रोजेक्ट के हिसाब से भुगतान मिलता है, न कि नियमित वेतन. इन श्रमिकों के पास कोई स्थायी रोजगार अनुबंध नहीं होता और वे खुद के बॉस की तरह काम करते हैं, लेकिन उन्हें सामाजिक सुरक्षा (जैसे स्वास्थ्य बीमा, पेंशन) जैसे लाभ नहीं मिलते। गिग वर्कर्स की चुनौतियाँ एवं मजबूरियां ज्यादा है, आय कम। आय की अनिश्चितता, सामाजिक सुरक्षा लाभों (जैसे बीमारी, दुर्घटना, पेंशन) का अभाव, श्रम अधिक-भुगतान कम, कामकाजी घंटों और मजदूरी को लेकर अक्सर विवाद। गिग वर्कर्स गिग इकॉनमी का हिस्सा हैं, जहाँ वे अपनी मर्ज़ी से छोटे-छोटे, अस्थायी काम करके पैसे कमाते हैं, जो पारंपरिक 9-से-5 की नौकरी से अलग होता है। गिग वर्कर का अर्थ है एक ऐसा व्यक्ति जो आमतौर पर सेवा क्षेत्र में एक स्वतंत्र ठेकेदार या फ्रीलांसर के रूप में अस्थायी काम करता है जो पारंपरिक नियोक्ता-कर्मचारी संबंधों के बाहर काम करता है या कार्य व्यवस्था में भाग लेता है और ऐसी गतिविधियों से कमाई करता है।
निस्संदेह, गिग अर्थव्यवस्था ने रोजगार सृजन की अपनी क्षमता दिखाई है। आज भारत में गिग-वर्कर्स की संख्या सवा करोड़ से अधिक है और अनुमान है कि 2030 तक यह संख्या दो करोड़ पैंतीस लाख तक पहुँच सकती है। लेकिन यह भी उतना ही सच है कि बेरोजगारी के बढ़ते दौर में पढ़े-लिखे युवा इस व्यवस्था में ‘विकल्प’ के रूप में नहीं, बल्कि ‘मजबूरी’ में प्रवेश कर रहे हैं। जिस देश को युवाओं का देश कहा जाता है, वहाँ शिक्षित युवाओं का अस्थायी, असुरक्षित और सम्मानहीन श्रम-व्यवस्था में फँसना न केवल चिंताजनक, बल्कि शर्मनाक भी है। यह स्थिति बताती है कि हमारी विकास-नीतियाँ रोजगार की गुणवत्ता पर नहीं, केवल संख्या पर केंद्रित हैं। गिग-वर्कर्स की सबसे बड़ी विडंबना यह है कि कंपनियाँ उनसे पूरा काम लेती हैं, लेकिन उन्हें पारंपरिक नियोक्ता-कर्मचारी संबंध के दायरे में स्वीकार नहीं करतीं। उन्हें ‘स्वतंत्र कामगार’ कहकर नियुक्ति, स्थायित्व, बीमा और न्यूनतम वेतन जैसी जिम्मेदारियों से बचा जाता है।
हायर एंड फायर की नीति, एल्गोरिदम आधारित नियंत्रण, रेटिंग सिस्टम और प्रोत्साहन के नाम पर लालच-ये सब मिलकर एक ऐसी अदृश्य जकड़न पैदा करते हैं, जिसमें श्रमिक स्वतंत्र दिखता है, लेकिन वास्तव में पूरी तरह नियंत्रित होता है। हड़ताल के दौरान भी अतिरिक्त प्रोत्साहन देकर या ऑर्डर बढ़ाकर श्रमिक एकता को कमजोर कर दिया जाता है। 31 दिसंबर को एक प्रमुख खाद्य वितरण कंपनी द्वारा रिकॉर्ड ऑर्डर दर्ज किया जाना इसी विडंबना को उजागर करता है। हाल के दिनों में संसद में भी गिग-वर्कर्स के शोषण का मुद्दा उठा है। सांसद राघव चड्ढा और मनोज कुमार झा जैसे नेताओं ने इस वर्ग की दयनीय स्थिति पर ध्यान दिलाया है। यह स्वागतयोग्य है, क्योंकि नीति-निर्माण की प्रक्रिया में जब तक इन श्रमिकों की आवाज़ शामिल नहीं होगी, तब तक सुधार अधूरे रहेंगे।
भारत सरकार द्वारा हालिया श्रम सुधारों में पहली बार गिग और प्लेटफॉर्म वर्कर्स को कानूनी रूप से परिभाषित किया गया है। एग्रीगेटर कंपनियों के टर्नओवर का एक से दो प्रतिशत सामाजिक सुरक्षा कोष में योगदान, आधार से जुड़े सार्वभौमिक खाता नंबर जैसी व्यवस्थाएँ एक लंबे समय से प्रतीक्षित कदम हैं। लेकिन सवाल यह है कि क्या ये प्रावधान वास्तव में गिग-वर्कर्स के जीवन में ठोस बदलाव ला पाएँगे? या फिर ये केवल काग़ज़ी सुधार बनकर रह जाएँगे? जब तक न्यूनतम आय, कार्य-घंटों की सीमा, दुर्घटना बीमा, स्वास्थ्य सुरक्षा और शिकायत निवारण की प्रभावी व्यवस्था सुनिश्चित नहीं होती, तब तक इन सुधारों को परिवर्तनकारी नहीं कहा जा सकता।
31 दिसंबर की हड़ताल भले ही पूरी तरह सफल न रही हो, लेकिन वह नैतिक और सामाजिक रूप से पूरी तरह जायज़ थी। यह हड़ताल व्यवस्था को बाधित करने से अधिक, व्यवस्था के भीतर छिपे अन्याय, शोषण की वृत्ति एवं दोगलेपन को उजागर करने का प्रयास थी। गिग-वर्कर्स ने यह संदेश दिया कि वे केवल ‘डिलीवरी बॉय’ नहीं, बल्कि श्रमशील नागरिक हैं, जिनके अधिकारों की अनदेखी अब और नहीं की जा सकती। निश्चित ही डिजिटल अर्थव्यवस्था का भविष्य गिग-वर्कर्स के बिना संभव नहीं है। इसलिए यह ज़रूरी है कि नीति-निर्माता, कंपनियाँ और उपभोक्ता-तीनों अपनी भूमिका पर आत्ममंथन करें। कंपनियों को लाभ के साथ जिम्मेदारी भी स्वीकार करनी होगी, सरकार को कानूनों का सख्त क्रियान्वयन सुनिश्चित करना होगा और उपभोक्ताओं को सुविधा के साथ संवेदनशीलता भी अपनानी होगी। यदि हम गिग-वर्कर्स को केवल सुविधा का साधन मानते रहे और उन्हें सम्मान, सुरक्षा व स्थायित्व नहीं दिया, तो यह केवल श्रमिकों का नहीं, बल्कि हमारी विकास-कल्पना का भी संकट होगा। विकसित भारत, उन्नत भारत एवं समृद्ध भारत के नाम पर एक बदनुमा दाग होगा। डिजिटल भारत की असली परीक्षा यही है कि वह अपने सबसे तेज़ दौड़ने वाले श्रमिकों को कितना सुरक्षित और सम्मानित जीवन दे पाता है।
तेज़ी से फैलती ऑनलाइन सेवाओं की दुनिया में गिग-वर्कर्स की कार्य-सेवाओं को अब अनौपचारिक नहीं, बल्कि नियोजित, मान्यताप्राप्त और सम्मानजनक श्रम के रूप में स्वीकार किया जाना चाहिए। उनकी मेहनत का उचित और सुनिश्चित भुगतान, सुरक्षित कार्य-परिस्थितियाँ और सामाजिक सुरक्षा कोई दया नहीं, बल्कि उनका अधिकार है, जिसमें सरकार को निर्णायक हस्तक्षेप करना ही होगा। मुनाफ़े की अंधी दौड़ में लगी बड़ी कॉरपोरेट कंपनियों को यह समझना होगा कि श्रम केवल लागत नहीं, बल्कि व्यवस्था की आत्मा है; शोषण की मानसिकता छोड़कर संवेदनशीलता और जवाबदेही अपनाए बिना कोई भी डिजिटल विकास टिकाऊ नहीं हो सकता। यदि गिग-वर्क को गरिमा, सुरक्षा और स्थायित्व के साथ विकसित किया जाए, तो यही सेवाएँ मजबूरी का प्रतीक नहीं, बल्कि रोज़गार की एक आदर्श और मानवीय व्यवस्था बन सकती हैं, जहाँ सुविधा केवल उपभोक्ता को नहीं, सम्मान कामगार को भी मिले।(ललित गर्ग)
लेखक, पत्रकार, स्तंभकार
ई-253, सरस्वती कंुज अपार्टमेंट
25 आई. पी. एक्सटेंशन, पटपड़गंज, दिल्ली-92
फोनः 22727486, 9811051133