Home Blog Page 32

कोटा में दुनिया का खूबसूरत चंबल रिवर फ्रंट

हाड़ोती में पर्यटन विकास के लिए लोकसभा अध्यक्ष ओम बिड़ला की पहल और प्रयास से 2 जनवरी 26 से आयोजित तीन दिवसीय हाड़ोती ट्रैवल मार्ट के आयोजन पर विशेष

चंबल रिवर फ्रंट के साथ ऑक्सीजोन पार्क , गराडिया महादेव, गेपरनाथ, कोटा गढ़ – माधोसिंह म्यूजियम, सेवन वंडर पार्क, जग मंदिर किशोर सागर , छत्र विलास उद्यान, चंबल उद्यान, हाड़ोती यातायात पार्क, गणेश उद्यान, मथुराधीश मंदिर , शिवपुरी धाम  सहित कई दर्शनीय स्थल हैं।

कोटा के चंबल रिवर फ्रंट पर मस्ती के कई आकर्षण हैं। चंबल नदी में बोट की सवारी का पानी की लहरों पर आनंद लेते हुए रात्रि में घूमना लगता है जैसे किसी स्वप्नलोक की सैर कर रहे हो। दिन में गोल्फ कार में  घूमते हुए मनभावन कलाकृतियों से सजे रिवर फ्रंट को  देखने का अपना ही मजा है। रात्रि में अजब-अनूठा एल.ई.डी. लाइट गार्डन अपनी विचित्र और खूबसूरत लाइटों की रंगबिरंगी रोशनी से  खूब लुभाता है। वाटर पार्क में विभिन्न अनूठी राइडों से फिसलते हुए नहाने का अपना मजा है । कई प्रकार के संगीतमय फाउंटेन जब बार-बार अपना रंग और रूप बदलते हैं तो मन को खूब आनंदित करते हैं।
मगरमच्छ की आकृति पर बनाया शुभंकर, खूबसूरत शेर, ऊंट, घोड़े  देख कर सैलानी आनंदित होते हैं। एक ऐसा साधु जो योग मुद्रा में बैठा है, एक विशेष कोण से देखने पर गायब हो जाता है तो आश्चर्य की सीमा नहीं रहती और  उत्सुकता बढ़ जाती है। जवाहर लाल नेहरू जी का विशाल चेहरा ,आकाश छूती चंबल माता की मूर्ति और विशाल शिव का वाहन नंदी की मूर्ति देख कर आश्चर्य होता है।  रंगमंच घाट पर लोक कलाकारों के नृत्य – संगीत भी इतना आनंदित करते हैं कि देखने वाले उनके साथ नाचने लगते हैं। रात्रि में रंगबिरंगी रोशनी से जगमग और नदी में हजारों प्रतिबिंबों से मनोहारी दृश्य  दिल और दिमाग पर यादगार जादू बिखेरते हैं । इतना मनोरंजन एक साथ हो तो  मन यहां आने के लिए ललचाएगा ही ।  देश – विदेश की प्रसिद्ध इमारतों की परिकल्पनाओं से ज्ञानवर्धन होने के साथ-साथ स्वास्थ्य मनोरंजन भी होता है।
चंबल रिवर फ्रंट चंबल नदी के पूर्व और पश्चिम दिशा में तीन-तीन कुल छः किलोमीटर में बना है। इसमें 26 आकर्षक घाट हैं, हर एक की अपनी विशेषता है। पूर्वी घाट की ओर जापान,चीन, थाईलैंड ,दक्षिणी भारत  के कारीगरी पूर्ण भवनों का रूप लुभावना है। इसी  घाट पर बना पृथ्वी की गोल संरचना ग्लोबल रचना देखते ही बनती है।
एक छोर पर विश्व की सबसे ऊंची 40 मीटर ऊंची चंबल माता की श्वेत प्रतिमा विशेष आकर्षण का केंद्र है जो अपने हाथों  में  कलश थामे है जिस से जलधारा बहती रहती है। हर शाम चंबल माता जी आरती की जाती है। रात्रि में यहां का दृश्य अपने रंगबिरंगे संगीतमय फाउंटेन्स से बेहद सुंदर हो जाता है। प्रतिदिन यहां आयोजित लाइट एंड साउंड कार्यक्रम और रात्रि में  रंगबिरंगे नजारों के बीच नौकायन तो अविस्मरणीय होता ही है।
चंबल माता की मूर्ति के पीछे की रचना  मुकुट महल कारीगरी पूर्ण राजपूत भवनों का समूह सुंदर नमूना है। हाड़ोती घाट पर हाड़ोती के खूबसूरत वास्तुकला के नमूने गढ़ महल का प्रवेश द्वार गणेश पोल, बूंदी की चौरासी खंभों की छतरी,  पन्ना धाय एवं हाड़ी रानी की गनमेटल मूर्तियां तथा राजस्थान के इतिहास में महत्वपूर्ण भूमिका वाली  महिलाओं की मूर्तियां हाड़ोती घाट की शोभा हैं।
 इसी घाट के दूसरे छोर पर कलात्मक छतरियां, जल की बावड़ियां, और उद्यानों के लैंडस्केप खूबसूरत हैं। छोटी – बड़ी समाद को भी इसी घाट से लिंक कर जोड़ दिया गया है। इनमें कई  कारीगरीपूर्ण हिंदू धार्मिक मंदिर और छतरियां दर्शनीय हैं।  साहित्य घाट पर पर एक खुली किताब है जो महान साहित्यकारों तुलसीदास, सूरदास, कबीर, महादेवी वर्मा,मुंशी प्रेम चंद और अन्य के बारे में परिचय कराती है। नौकायन द्वारा पूर्वी घाट से पश्चिमी घाट पर पहुंचा जा सकता है।
रिवर फ्रंट के पश्चिमी की ओर घाट पर जवाहर घाट पर पंडित जवाहर लाल नेहरू का गनमेटल का 10 मीटर ऊंचा चेहरा बनाया गया है। बच्चें इनकी आंखों से रिवर फ्रंट के नजारे देख सकते हैं। गीता घाट पर गीता के 700 श्लोक मार्बल शिला में  संस्कृत, हिंदी एवं अंग्रेजी तीन भाषाओं में उकेरें गए हैं। रोशन घाट पर  मुस्लिम स्थापत्य में नीले रंग के जन्नती दरवाजे पर तुर्किश कला के नमूने बनाए गए हैं।  यहां के घाटों पर राजस्थान के मारवाड़, मेवाड़, ढूंढाड़, बांगड़, शेखावाटी एवं हाड़ोती का प्रतिनिधित्व करने वाले स्मारक पोदार हवेली, गणगौर घाट, हवामहल, विजय स्तंभ, ब्रह्मा मंदिर, रणकपुर, पटवो की हवेली, गणेश पोल, हवामहल आदि खूबसूरत संरचनाएं देखते ही बनती हैं। पश्चिम की ओर आखरी किनारे पर रंगबिरंगी लाइटों का अद्भुत एल ई डी गार्डन की रंगत देखते ही बनती है।
पर्यटकों के लिए आकर्षक चंबल रिवर फ्रंट भारत के अन्य रिवर फ्रंट में सब से अधिक सुंदर हैं। कोटा शहर में चंबल नदी के किनारे कोटा बैराज के डाउन स्ट्रीम पर स्थित है।

डॉ.प्रभात कुमार सिंघल
लेखक एवं पत्रकार, कोटा

साहित्यिक जगत में शिवना सम्मानों की गूँज: लीलाधर मंडलोई को ‘अंतर्राष्ट्रीय शिवना सम्मान’

– मुकेश नेमा और स्मृति आदित्य को कृति सम्मान
सीहोर। नए वर्ष की ऊर्जा और साहित्यिक उल्लास के बीच ‘शिवना प्रकाशन’ द्वारा वर्ष 2025 के प्रतिष्ठित सम्मानों की घोषणा कर दी गई है। शुक्रवार, 2 जनवरी की सुबह देश के जाने-माने साहित्यकारों की उपस्थिति में इन पुरस्कारों का आधिकारिक ऐलान किया गया।
इस वर्ष का प्रतिष्ठित ‘अंतर्राष्ट्रीय शिवना सम्मान’ वरिष्ठ कवि और लेखक लीलाधर मंडलोई को राजकमल प्रकाशन से प्रकाशित उनकी चर्चित आत्मकथा ‘जब से आँख खुली है’ के लिए दिया जाएगा। अपनी विशिष्ट शैली और गहरे अनुभवों के लिए जानी जाने वाली यह कृति साहित्य जगत में विशेष स्थान रखती है।

शिवना कृति सम्मान 2025 के लिए इस बार दो लेखकों का चयन किया गया है। यह सम्मान साझा रूप से प्रदान किया जाएगा:
मुकेश नेमा: उनकी कृति ‘इत्तू सी इरा’ के लिए।
स्मृति आदित्य: उनकी कृति ‘अब मैं बोलूँगी’ के लिए।
ख्यात साहित्यकारों की उपस्थिति में हुई घोषणा

पुरस्कारों की घोषणा के दौरान साहित्य जगत की प्रमुख हस्तियाँ मौजूद रहीं। जिनमें सुधा ओम ढींगरा, मनीषा कुलश्रेष्ठ, यतीन्द्र मिश्र, पंकज सुबीर  और आकाश माथुर शामिल थे। सभी उपस्थित लेखकों ने चयनित लेखकों को बधाई दी।

शिवना प्रकाशन के प्रबंधक शहरयार खान और पंखुरी पुरोहित ने बताया कि इन सभी सम्मानित लेखकों को आगामी 28 फरवरी और 1 मार्च को आयोजित होने वाले ‘शिवना साहित्य समागम’ में सम्मानित किया जाएगा। इस भव्य समारोह में वर्ष 2025 के विजेताओं के साथ-साथ वर्ष 2024 के सम्मानित लेखकों और नव-लेखन के उभरते रचनाकारों का भी सम्मानित किया जाएगा।

समन्वयक
आकाश माथुर
7000373096

भारत का युवा जाग गया है, वह अपने देश को समर्थ बनाना चाहता है – सरसंघचालक जी

भोपाल। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के शताब्दी वर्ष के प्रसंग पर सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत जी का देशभर में प्रवास हो रहा है। इसी श्रृंखला में उनका दो दिवसीय प्रवास भोपाल में हुआ। प्रवास के पहले दिन कुशाभाऊ ठाकरे सभागार में उन्होंने युवाओं से संवाद किया। उन्होंने कहा कि संघ अपने जन्म से ही लक्ष्य लेकर चल रहा है कि अपने धर्म-संस्कृति का संरक्षण कर, अपने भारत को परम वैभव पर लेकर जाना है। संघ का प्रत्येक स्वयंसेवक यह प्रतिज्ञा करता है। उन्होंने कहा कि कोई भी देश सम्पूर्ण समाज के योगदान से ही बड़ा होता है। नेता, नीति और व्यवस्था, ये सब तब सहायक होते हैं जब समाज गुणसम्पन्न होता है। भारत का युवा जाग गया है, वह अपने देश को समर्थ बनाना चाहता है। संघ युवाओं से आह्वान करता है कि वे संघ की शाखा में आएं या फिर संघ की योजना से चल रहे अपने रुचि के कार्य में जुड़कर राष्ट्र निर्माण में अपना योगदान दें।

उन्होंने कहा कि यदि हमें देश के लिए कुछ करना है तो इस मार्ग में हमें गुणों को धारण करना होगा और अहंकार एवं स्वार्थ छोड़ने होंगे। दुनिया में संघ ने ही एकमात्र ऐसी पद्धति दी है, जो अच्छी आदतें विकसित करती है। उन्होंने कहा कि संघ के संस्थापक डॉ. हेडगेवार हर क्षेत्र में कार्य करते थे। लेकिन उन्हें चिंता यह थी कि देश में एकता कैसे स्थापित होगी। इस भाव को उत्पन्न करने वाले संगठन का नाम राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ है। दुनिया में कहीं दूसरी पद्धति नहीं है व्यक्ति निर्माण की। उन्होंने कहा कि संघ की शाखा देशभक्ति सिखाती है। यदि इसका अनुभव लेना है और उद्देश्य को जीना है तो शाखा एकमात्र जगह है। यहां कोई बंधन नहीं है।

सरसंघचालक डॉ. भागवत जी ने कहा कि हम कई बार असुरक्षा और चिंता के साथ जीते है। लेकिन इसकी बजाय हमें भयमुक्त होकर जीना चाहिए। स्वयं से पहले देश को रखना चाहिए। अपने विकास से देश और परिवार प्रगति कर रहा है कि नहीं यह सोचना चाहिए। युवाओं को ही देश बनाना है और वे हर बात में आगे भी आते हैं। उन्होंने कहा कि जब आप देश की बात करते हैं तो प्रश्नों के जवाब देने होंगे और उसके लिए योग्यता लाना पड़ेगी। संघ में आकर तैयार होना पड़ेगा। मैं युवाओं से आहवान करता हूं कि वे आए और संघ का अनुभव लें।

कार्यक्रम के प्रथम सत्र में अखिल भारतीय सह बौद्धिक प्रमुख श्री दीपक विस्पुते और भोपाल करुणा धाम के प्रमुख श्री सुदेश शांडिल्य जी महाराज ने युवाओं को संबाेधित किया। इस अवसर पर मंच पर मध्यभारत प्रांत के सह संघचालक डॉ. राजेश सेठी उपस्थित रहे।

युवाओं के प्रश्नों के उत्तर विस्तार से दिया :

युवा संवाद में सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत जी ने युवाओं द्वारा पूछे गए प्रश्नों के उत्तर दिए। 100 वर्ष पूर्ण होने पर संघ की भूमिका पर उन्होंने कहा कि विश्व शक्ति की सुनता है और संघ संपूर्ण समाज को साथ लेकर धर्म की रक्षा करते हुए देश को नया रास्ता दिखाता है। महाशक्ति एकत्रित कर रहा है। उन्होंने कुली फिल्म का उदाहरण देते हुए कहा कि उस समय युवा लाल कुर्ता या शर्ट पहनते थे। यानी फैशन फॉलो करते हैं। उन्होंने कहा कि हम ऐसे युवाओं का निर्माण कर रहे हैं, जो समाज में सार्थक फैशन को बढ़ाएं।सुरक्षा और करियर को लेकर पूछे गए प्रश्न के उत्तर में कहा कि सुरक्षा की गारंटी कोई नहीं दे सकता। बिना चिंता जीवन जिए। मनुष्य अलग है, क्योंकि वह रिस्क लेता है। दुनिया सक्सेस को देखती है, लेकिन जैसे ही उस पथ पर चलने की कोशिश करते हैं तो संघर्ष देखकर डर जाते हैं। इसलिए बेहतर करियर वह है जिसमें आप उत्कृष्ट प्रदर्शन कर पाएं और डर भी न लगे। सुविधा से सुख नहीं मिलता। एआई के सवाल पर बोले कि हमें एआई को कंट्रोल करना है, न कि कंट्रोल होना है। उसका उपयोग विकास में करना है। हमें ऐसे युवाओं का निर्माण करना है जो एआई या अन्य तकनीक का उपयोग देश हित में करें।संघ उत्सव नहीं मना रहा, लोगों के दिलों तक पहुंचने पर काम कर रहा है – श्री दीपक विस्पुते जी

कार्यक्रम के प्रथम सत्र में अखिल भारतीय सह बौद्धिक प्रमुख श्री दीपक विस्पुते जी ने संघ की 100 साल की यात्रा पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि संघ को 100 वर्ष में खूब प्रसिद्ध मिली। लेकिन संघ का प्रचार किया विरोधियों ने और नकारात्मक भाव में किया। इन्होंने कभी संघ को समझने का प्रयास नहीं किया। उन्होंने बताया कि संघ वर्ष 1925 में नागपुर से प्रारंभ हुआ और जिस तरह भागीरथ ने गंगा पृथ्वी पर लेकर आए ठीक वैसे डा. केशव बलिराम हेडगेवार जी ने संघ कार्य को समाज के बीच लेकर गए। इसके पहले भारत में कभी इस तरह का प्रयास नहीं हुआ। डॉक्टर साहब ने नागपुर की बजाय कोलकता को पढ़ाई के लिए चुना और स्वतंत्रता की लड़ाई में भाग लिया। लेकिन उन्हें महसूस हुआ कि देश के हिन्दू समाज को मानसिक गुलामी से मुक्त कराना होगा। श्री विस्पुते ने बताया कि संघ स्वामी विवेकानंद की तीन बातों का अनुशरण करते हुए काम करता है। पहली बात भारत के समाज को आर्गनाइजेशन सीखना पड़ेगा। दूसरा भारत में मेन मेकिंग यानी व्यक्ति के निर्माण की प्रक्रिया जरूरी है और तीसरी बात कि आने वाले 50 साल के लिए देश को प्राथमिकता पर रखकर भारत माता की आराधना करना चाहिए। संघ इसी विचार पर काम कर रहा है। उन्होंने बताया कि संघ ने समय–समय पर जरूरत को देखकर अन्य संगठन खड़े किए। इसमें युवाओं के लिए अभाविप, मजदूरों के लिए मजदूर संघ, किसानों के लिए, सेवा कार्यों के लिए सेवा भारती संगठन खड़े किए। उन्होंने कहा कि लोगों को भरोसा नहीं था, लेकिन डॉक्टर साहब ने और श्रीगुरूजी ने वह करके दिखाया। उन्होंने कहा कि संघ 100 वर्ष पूरे होेने पर उत्सव नहीं मना रहा है, बल्कि डोर टू डोर मेन टू मेन और हार्ट टू हार्ट पहुंचने की कोशिश कर रहा है। मेरा भी क्या योगदान देश और संघ के लिए हो सकता है, इसके लिए प्रयास करें।

संघ युवाओं को सामर्थ्यवान बना रहा है:

भोपाल करुणा धाम के प्रमुख श्री सुदेश शांडिल्य जी महाराज ने युवाओं से कहा कि अक्सर हम सुनते हैं “समरथ को नहीं दोष गुसाई”। इसका यह मतलब नहीं है कि कोई बलवान है, उसको दोष नहीं दिया जाता। वास्तव समर्थ वह है जिसकी नीयत में दोष नहीं हो। उन्होंने कहा कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ समर्थ बनेगा तभी भारत विश्वगुरु बनेगा। इसलिए संघ का समर्थ होना जरूरी है। परोपकार, सद्चरित्र, जनकल्याण की भावना और यश के पीछे नहीं भागने की भावना कहीं दिखाई दे रही है, तो वह केवल संघ है। उन्होंने सूर्य, गंगा का उदाहरण देते हुए कहा कि सूर्य सबको बराबर रोशनी देता है। गंगा के जल में लोग स्नान भी करते हैं और गंदे नाले भी मिलते हैं। लेकिन वह अविरल बह रही है, क्योंकि उसमें सामर्थ्य है सभी को समाहित करने का। ऐसे ही युवाओं को सामर्थ्यवान बनना है। आगे बढ़ने के लिए पीछे का छोड़ना पड़ेगा। उन्होंने कहा कि कि भारत में युवाओं को सामर्थ्यवान बनाने का काम केवल संघ कर रहा है। उसकी शाखाओं में 100 साल से व्यक्ति का निर्माण हो रहा है। साथ ही ईश्वर की आराधना करें, वह आपको सामर्थ्य देता है।

फ़ोटो-वीडियो यहां से डाउनलोड करें
https://drive.google.com/drive/folders/1xZkkZdjuAJTQslH1iBlJAxYKU_oGzNj8?usp=sharing

अहमदाबाद के पहले नवीनीकृत एन-जेन (नेक्स्ट जेन) थीम आधारित डाकघर का उद्घाटन

डाक सेवाओं के साथ-साथ वाई-फाईकैफेटेरियामिनी लाइब्रेरीयुथ-केंद्रित कम्फर्ट सीटिंग स्पेस जैसी सुविधाएं प्रदान करेगा आई.आई.एम अहमदाबाद डाकघर

अहमदाबाद। भारतीय डाक डिजिटल सोच, आधुनिक सुविधाएँ और युवा ऊर्जा के साथ नए भारत की रफ्तार में कदम से कदम मिलाकर आगे बढ़ रहा है। पारंपरिक डाक सेवाओं से आगे बढ़ते हुए अब डाकघर एन-जेन (नेक्स्ट जेन) के लिए स्मार्ट और आधुनिक सेवा केंद्र के रूप में विकसित हो रहे हैं। केंद्रीय संचार मंत्री श्री ज्योतिरादित्य एम. सिंधिया के दृष्टिकोण से निर्देशित इस पहल के तहत  डाकघरों को जीवंत, विद्यार्थी-केंद्रित, प्रौद्योगिकी-सक्षम स्थानों के रूप में पुनःपरिकल्पित किया जा रहा है। इसी कड़ी में गुजरात के द्वितीय एवं अहमदाबाद के प्रथम एन-जेन (नेक्स्ट जेन) थीम आधारित नवीनीकृत आई.आई.एम डाकघर का उद्घाटन 2 जनवरी, 2026 को गुजरात परिमंडल के मुख्य पोस्टमास्टर जनरल श्री गणेश वी. सावळेश्वरकर, आई.आई.एम अहमदाबाद निदेशक प्रो. भारत भास्कर तथा उत्तर गुजरात परिक्षेत्र के पोस्टमास्टर जनरल श्री कृष्ण कुमार यादव द्वारा किया गया।

इस अवसर पर मुख्य पोस्टमास्टर जनरल श्री गणेश वी. सावळेश्वरकर ने कहा कि आई.आई.एम अहमदाबाद डाकघर को नई पीढ़ी (एन-जेन) की जीवनशैली, रुचियों और अपेक्षाओं के अनुरूप पुनःडिज़ाइन किया गया है, जिसके परिणामस्वरूप यह एक जीवंत हैंगआउट-कम-सेवा केंद्र के रूप में विकसित हुआ है। कूल, आकर्षक और युवा-केंद्रित लुक-एंड-फील के साथ तैयार किया गया यह एन-जेन पोस्ट ऑफिस सार्वजनिक सेवा वितरण प्रणाली में एक परिवर्तनकारी छलांग को दर्शाता है, जिसे विशेष रूप से विद्यार्थियों, युवाओं और डिजिटल नेटिव्स को ध्यान में रखकर विकसित किया गया है।

आई.आई.एम अहमदाबाद के निदेशक प्रो. भारत भास्कर ने डाक विभाग की एन-जेन पोस्ट ऑफिस पहल को एक दूरदर्शी और समयोचित कदम बताते हुए इसकी सराहना की। उन्होंने आशा व्यक्त की कि इस आधुनिक और तकनीक-सक्षम डाकघर से अधिकाधिक छात्र लाभान्वित होंगे तथा डाक विभाग की सेवाओं का सक्रिय रूप से उपयोग करेंगे। साथ ही, आई.आई.एम अहमदाबाद के छात्रों द्वारा एन-जेन पोस्ट ऑफिस में सक्रिय सहभागिता की भी सराहना की।

पोस्टमास्टर जनरल श्री कृष्ण कुमार यादव ने बताया कि युवा केंद्रित यह एन-जेन पोस्ट ऑफिस युवाओं को आधुनिक सुविधाएँ प्रदान करेगा, जिसमें वाई-फाई, कैफेटेरिया, मिनी लाइब्रेरी, पीओएस/ क्यूआर कोड स्कैन करके यूपीआई-आधारित डिजिटल भुगतान, युथ-केंद्रित कम्फर्ट सीटिंग स्पेस, छात्रों के लिए स्पीड पोस्ट व पार्सल सेवाओं पर 10% की विशेष छूट, ज्ञान पोस्ट, पार्सल पैकेजिंग सर्विस, आधार सेवा, फिलेटली, डाकघर बचत सेवाएँ, डाक जीवन बीमा, आईपीपीबी जैसी वित्तीय सेवाएं शामिल हैं। इसके अतिरिक्त, छात्रों के बीच आपसी संवाद और मनोरंजन को बढ़ावा देने के लिए इंडोर गेम्स की सुविधाएँ भी प्रदान की गई हैं।

आई.आई.एम छात्रों को अहमदाबाद के पहले एन-जेन थीम आधारित नवीनीकृत आई.आई.एम डाकघर को डिज़ाइन करने में उनके योगदान के लिए सम्मानित भी किया गया। यह अनोखा पोस्ट ऑफिस आई.आई.एम अहमदाबाद के छात्रों ने इंडिया पोस्ट के साथ मिलकर ” छात्रों का, छात्रों द्वारा, छात्रों के लिए” की फिलॉसफी पर बनाया है। इसमें स्थानीय संस्कृति, युवा रचनात्मकता और आधुनिक डिजिटल सेवाओं का सुंदर मिश्रण देखने को मिलता है।

गौरतलब है कि गुजरात के पहले एन-जेन थीम आधारित नवीनीकृत भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी) गांधीनगर डाकघर का शुभारम्भ 5 दिसंबर, 2025 को किया गया था। यह परिवर्तन एक राष्ट्रीय पहल का हिस्सा है, जिसमें शैक्षणिक परिसरों में स्थित 46 मौजूदा डाकघरों का नवीनीकरण किया जा रहा है। इसके अतिरिक्त, इस नए साल में 54 अतिरिक्त डाकघरों को भी इस महत्वाकांक्षी नवीनीकरण कार्यक्रम के अंतर्गत शामिल किया जायेगा। इन डाकघरों में डिजिटल सुविधाओं, नवाचार और आकर्षक वातावरण के माध्यम से युवाओं को डाक सेवाओं से जोड़ने तथा उन्हें अधिक सुलभ, सहज और प्रासंगिक बनाने की परिकल्पना को साकार किया जा रहा है। इस पहल का उद्देश्य नई पीढ़ी के साथ अधिक प्रत्यक्ष, सार्थक और सतत जुड़ाव स्थापित करना है।

इस अवसर पर डाक प्रशिक्षण केंद्र के निदेशक डॉ. एस. शिवराम,  निदेशक डाक सेवाएं श्री सुरेख रेघुनाथेन, प्रवर डाक अधीक्षक, अहमदाबाद श्री चिराग मेहता, आई.आई.एम डीन प्रो. सतीश देवधर, मुख्य प्रशासनिक अधिकारी कर्नल (डॉ.) जगदीश सी. जोशी, प्रवर अधीक्षक श्री पियूष रजक, श्री शिशिर कुमार, आइपीपीबी चीफ मैनेजर श्री अभिजीत जिभकाटे, डिप्टी अधीक्षक श्री एस. के. वर्मा, श्री दीपक वाढेर, सीनियर पोस्टमास्टर श्री पी जे सोलंकी, सहायक निदेशक श्री वी एम वहोरा, श्री अल्पेश शाह, श्री रितुल गाँधी, सहायक डाक अधीक्षक श्री विशाल चौहान, श्री अलकेश परमार, श्री आर टी परमार, श्री हार्दिक राठोड, श्री एच जे परिख, श्री भाविन प्रजापति, पोस्टमास्टर सुश्री कृतिबेन मेहता सहित तमाम अधिकारी-छात्र उपस्थित रहे।

“शिवसंकल्पसूक्त” में छुपे रहस्य और इसका महत्त्व

शिवसंकल्पसूक्त शुक्ल यजुर्वेद का अंश (अध्याय ३४, मन्त्र १-६) है । इसे शिवसंकल्पोपनिषद् के नाम से भी जाना जाता है । सूक्त में छः ऋचा हैं, जिनमें मन को अपूर्व सामर्थ्यों से युक्त बता कर उसे श्रेष्ठ व कल्याणकारी संकल्पों से युक्त करने की प्रार्थना की गई है । अन्वय के साथ इन मन्त्रों का सरल भावार्थ देते हुए इनकी व्याख्या की गई है ।

संक्षिप्त परिचय: छह ऋचाओं वाला शिवसंकल्पसूक्त शुक्ल यजुर्वेद का अंश (अध्याय ३४, मन्त्र १-६) है । यह छह ऋचा अपनी संरचना और संदेश में इतने सारगर्भित व भावपूरित है कि इन्हें स्वतंत्र रूप से एक उपनिषद् की मान्यता भी दी गई है । इस प्रकार शिवसंकल्पसूक्त को शिवसंकल्पोपनिषद् के नाम से भी जाना जाता है । यहाँ शिव संकल्प से तात्पर्य शुभ संकल्प, श्रेष्ठ एवं कल्याणकारी संकल्प से है। इन मन्त्रों में मनुष्य को ईश्वर से प्राप्त `मन` नामक दिव्य ऊर्जा के अद्भुत सामर्थ्यों का वर्णन है ।

मन के संबंध में पातंजलि योगसूत्र में लिखा गया है कि प्रत्येक मनुष्य को जिस प्रकार स्थूल अस्तित्व के रूप में देह मिली है, उसी प्रकार सूक्ष्म अस्तित्व के रूप में उसे मन मिला है तथा कारण अस्तित्व के रूप में आत्मा प्राप्त हुई है । दार्शनिकों ने मन को छठी इन्द्रिय कहा है और यह छठी इन्द्रिय अन्य इन्द्रियों से कहीं अधिक प्रचण्ड है । मन इन्द्रियों का प्रकाशक है, ज्योतिस्वरूप है । वैदिक ऋषियों ने मनुष्य के ह्रदय-गुहा में स्थित इस ज्योति को देखा व पहचाना है । श्रद्धेय विनोबा भावे ने अपनी पुस्तक महागुहा में प्रवेश में कहा है:

“मनुष्य के द्वारा जो कुछ होता है, वह मन के द्वारा ही होता है । तो जिसके द्वारा काम होता है, वह एजेंसी अगर बिगड़ी हुई हो, तो सारा काम बिगड़ जायेगा । आंख अच्छी है, लेकिन मन ख़राब है, तो देखने का काम अच्छा नहीं होगा । इस प्रकार यद्यपि कर्म इन्द्रियों द्वारा होता है, तो भी कर्म का अच्छा या बुरा होना मन पर निर्भर करता है । इसलिये अपना मन क्या है, यह देखना, उसका परीक्षण करना बहुत जरुरी है ।”

स्वामी करपात्रीजी महाराज का कथन है:

“स यत्कृतर्भवति तत्कर्म कुरुते, यत्कर्म कुरुते तदभिसम्पद्यते”

अर्थात् पुरुष जैसा संकल्प करने लगता है, वैसा ही आचरण करता है और जैसा आचरण करता है, फिर वैसा ही बन जाता है । उनके अनुसार कर्म का आधार मन में उठने वाले विचार है । भारतीय वाङ्गमय में मन एवं उसके निग्रह पर मनीषियों ने बहुत कुछ कहा है ।

शिवसंकल्पसूक्त का संबंध भी मन से है । ईश्वर से की गई अपनी प्रार्थनाओं में वैदिक ऋषि कहते हैं कि वह उन्हें शारीरिक तथा वाचिक ही नहीं अपितु मानसिक पापों से भी दूर रखें । उनके मन में उठने वाले संकल्प सदैव शुभ व श्रेयस्कर हों । मनुष्य का मन अपूर्व क्षमतावान् है, उसमें जो संकल्प जाग जाएं, उनसे उसे विमुख करना बहुत कठिन कार्य है । इसीलिए ऋषि मन को शुभ व श्रेष्ठ संकल्पों से युक्त रखने की प्रार्थना करत्ते हैं ।

शिवसंकल्पसूक्त

ऋचा १:

यज्जाग्रतो दूरमुदैति दैवं तदु सुप्तस्य तथैवैति ।

दूरंगं ज्योतिषां ज्योतिरेकं तन्मे मनः शिवसंकल्पमस्तु ।।

अन्वय

यत् जाग्रतः दूरं उदैति सुप्तस्य तथा एव एति तत् दूरं गमं ज्योतिषां ज्योतिः एकं दैवं तत् में मनः शिवसंकल्पं अस्तु ।

सरल भावार्थ

हे परमात्मा ! जागृत अवस्था में जो मन दूर दूर तक चला जाता है और सुप्तावस्था में भी यह मन कहीं और ही दूर दूर चला जाता है, वही मन इन्द्रियों रुपी ज्योतियों की एक मात्र ज्योति है अर्थात् इन्द्रियों को प्रकाशित करने वाली एक ज्योति है अथवा जो मन इन्द्रियों का प्रकाशक है, ऐसा हमारा मन शुभ-कल्याणकारी संकल्पों से युक्त हो !

व्याख्या:

शिवसंकल्पसूक्त के प्रथम ऋचा में ऋषि कहते हैं कि जागृत अवस्था में मन दूर दूर तक गमन करता है । सदैव गतिशील रहना उसका स्वभाव है और उसकी गति की कोई सीमा भी नहीं है । मन इतनी प्रबल क्षमताओं से युक्त है कि एक स्थान पर स्थित हो कर भी सुदूर क्षितिज के परले पार पहुँच जाता है । वेगवान पदार्थों में वह सबसे अधिक वेगवान है ।

“चन्द्रमाँ मनसो जातः”

यह श्रुतिवाक्य है । उपनिषदों में कहा गया है कि मन ही चन्द्रमा है। मन ही यज्ञ का ब्रह्मा है। मुक्ति भी वही है । यहाँ मन और मन मन में उठे विचारों की अत्यन्त तीव्र और अनन्त गति की ओर संकेत है । मन और मन के विचारों को घनीभूत करके कुछ भी प्राप्त किया जा सकता है। उसे किसी आधार की आवश्यकता नहीं होती। वस्तुतः मन स्थिर होता है जब उसमें विघटन न हो और वह विक्षेप से रहित हो । विषयों से विभ्रांत मन विघटन की स्थिति को प्राप्त होता है । अस्थिर व चंचल मन मनुष्य को मुक्त नहीं होने देता तथा नए नए बंधनों में बांधता चला जाता है । जागृत अवस्था में जीवन-यापन करने के लिए लोक-व्यवहार एवं सांसारिक प्रपंचों में उलझा रहता है, अतः दूर दूर तक निकल जाता है, क्योंकि यही मन तो व्यक्ति को कर्म करने की प्रेरणा देता है ।

गायत्र्युपनिषद् की तृतीय कण्डिका के प्रथम श्लोक में कहा गया है ‘मन एव सविता’ अर्थात् मन ही सविता या प्रेरक तत्व है । मन की ये गतिशीलता सुप्तावस्था में भी दिखाई देती है । सुप्तावस्था में मन के शांत होने के कारण मन को अद्भुत बल मिलता है । कहते हैं कि सोते समय वह अपने सृजनहार से संयुक्त होता है, जो वास्तव में शांति का स्रोत है । श्रद्धेय विनोबा भावे अपनी पुस्तक महागुहा में प्रवेश में कहते हैं कि “… नींद में अनंत के साथ समरसता होती है ।” यहाँ से प्राप्त शांति मनुष्य के आने वाले दिन की यात्रा का पाथेय बनती है ।यही कारण है कि रात्रि में अनिद्रा की स्थिति में रहने वाला व्यक्ति अगले दिन सवेरे उठ कर क्लांत-श्रांत व उद्विग्न-सा अनुभव करता है । परमात्मा से प्राप्त सद्य शांति के अभाव को कोई भी भौतिक साधन पूरा नहीं कर सकता है । यह बात और है कि जाग जाने पर सुप्तावस्था की बातें याद नहीं रहतीं, अनुभूत होती है शांति केवल, क्योंकि वह आध्यात्मिक क्षेत्र से आती है ।

ऋषियों ने परमात्मा से प्रार्थना करते हुए मन को इन्द्रियों का प्रकाशक कहा है

“ज्योतिषां ज्योतिरेकम्”

मन के द्वारा सभी इन्द्रियां अपने अपने विषय का ज्ञान ग्रहण करती है । स्वाद रसना नहीं लेती अपितु मन लेता है, नयनाभिराम दृश्य मन को मनोहर लगते हैं । मन यदि अवसाद से भरा हो तो अमृतवर्षा करती चंद्रकिरणें अग्निवर्षा करती हुईं प्रतीत होती हैं । वाक् इन्द्रिय वही बोलती है व श्रवणेंद्रिय वही सुनती हैं जो मन अभिप्रेरित करता है । यही मन स्पर्शेन्द्रिय से प्राप्त संवेदनों को सुखदुःखात्मक, मृदु-कठोर मनवाता है। सब इन्द्रियां निज निज कार्य करती हैं, किन्तु उनकी अनुभूतियों के ग्रहण में मन की महत्वपूर्ण भूमिका रहती है, जिसे नकारा नहीं जा सकता । हिंदी साहित्यकार श्री बालकृष्ण भट्ट अपने निबंध मन और नेत्र में मन को सभी इन्द्रियों का प्रभु बताते हैं तथा शास्त्रों से उदाहरण देते हैं:

“मनः कृतं कृतं लोके न शरीरं कृतं कृतं ।”

इसका अर्थ लेखक के अनुसार यह है कि जग में मन द्वारा किया हुआ कृत ही वास्तव में कृत अर्थात् कर्म है, न कि शरीर द्वारा किया हुआ । यह मन जीव का दिव्य माध्यम है, इन्द्रियों का प्रवर्तक है मन को दार्शनिक छठी इन्द्रिय बताते हैं और यह छठी इन्द्रिय अन्य सभी इन्द्रयों से कहीं अधिक प्रचंड है । तात्पर्य यह कि इन्द्रियां, जिन्हें ज्योतियां कह कर पुकारा गया है, उनका प्रकाशक मन ही है । यजुर्वेद के ऋषियों ने मानवमन के भीतर स्थित इस दिव्य-ज्योति को देखा और पहचाना है, अतः उसे ज्योतिषां ज्योतिरेकम् कहते हुए ऋषि प्रार्थना करते हैं कि हे परमात्मा ! ऐसा हमारा मन श्रेष्ठ और कल्याणकारी संकल्पों से युक्त हो !

ऋचा २:

येन कर्मण्यपसो मनीषिणो यज्ञे कृण्वन्ति विदथेषु धीराः ।

यदपूर्वं यक्षमन्तः प्रजानां तन्मे मनः शिवसंकल्पमस्तु ।।

अन्वय

येन अपसः मनीषिणः यज्ञे धीराः विदथेषु कर्माणि कृण्वन्ति यत् अपूर्वं प्रजानां अंतः यक्षं तत् मे मनः शिवसंकल्पं अस्तु ।

सरल भावार्थ:

जिस मन से कर्मनिष्ठ एवं स्थिरमना प्रज्ञावान जन यज्ञ आदि कर्म और गंभीर व साहसी लोग विज्ञान आदि से संबद्ध कर्म सम्पादित करते हैं, जो अपूर्व है व सब के अंतःकरण में मिश्रित है अर्थात् मिला हुआ है, विद्यमान है, ऐसा हमारा मन शुभ-कल्याणकारी संकल्पों से युक्त हो !

व्याख्या:

शिवसंकल्पसूक्त के दूसरे ऋचा में ऋषिगण सबसे पहले यह बात कहते हैं कि मन से ही यज्ञ आदि कर्मों का सम्पादन होता है । शुद्ध मन ही यज्ञ आदि सत्कार्यों का करने वाला है । यही कारण है कि वैदिक ऋषि ईश्वर का आवाह्न करके उन्हें अपने ह्रदय में प्रविष्ट होने की प्रार्थना करते हैं, जिससे उन्हें दिव्य ऊर्जा प्राप्त हो और वे निष्पाप, निष्कलुष रहें । तैत्तिरीयोपनिषद् के दशम अनुवाक् में कहा गया है कि त्रिशंकु नामक ऋषि ने परमात्मा को प्राप्त होकर अपना अनुभव व्यक्त किया था । त्रिशंकु के वचनानुसार अपने अंतःकरण में परमात्मा की भावना करना भी उसकी प्राप्ति का साधन है । दसवें अनुवाक् में यही बात बताई गई है ।

“अहं वृक्षस्य रेरिवा । कीर्तिः पृष्ठं गिरेरिव । उर्ध्वपवित्रो वाजिनीव स्वमृतमस्मि । द्रविणं सवर्चसम् । सुमेधा अमृतोक्षितः। इति त्रिशङ्कोर्वेदनुवचनम् ।”

इसका भावार्थ यह है कि मैं ही प्रवाहरूप से अनादिकाल से चलते हुए इस जन्म-मृत्यु रूप संसारवृक्ष का उच्छेद करने वाला हूँ । यह मेरा अंतिम जन्म है और इसके बाद मेरा पुनः जन्म नहीं होने वाला है । मेरी कीर्ति पर्वत-शिखर की भांति उन्नत और विशाल है । अन्नोत्पादक शक्ति से युक्त सूर्य में जैसे उत्तम अमृत का निवास है, उसी प्रकार मैं भी रोग-दोष आदि से पूर्णतया मुक्त हूं, अमृत-स्वरूप हूँ । मैं सुप्रकाशित धन का भंडार हूँ, परमानंद रूप अमृत में निमग्न एवं श्रेष्ठ धारणा युक्त बुद्धि से सम्पन्न हूं । इस प्रकार त्रिशंकु मुनि के यह वचन हैं । तात्पर्य यह कि मनुष्य के संकल्प में यह अपूर्व और अद्भुत शक्ति है कि वह जिस प्रकार की भावना करता है, वैसा ही बन जाता है ।

तैत्तिरीयोपनिषद् के चतुर्थ अनुवाक् में उन मन्त्रों का वर्णन किया गया है, जिनमें कहा गया है कि किस प्रकार अपने मन को अधिकाधिक शुद्ध बनाने के लिए आचार्य को हवन करना चाहिए । एक छोटा-सा उदाहरण प्रस्तुत है ।

“स मा भग प्रविश स्वाहा ।

तस्मिन् सहस्रशाखे निभगाहं त्वयि मृजे स्वाहा।”

अर्थात् इस उद्देश्य से मंत्रोच्चारण कर के स्वाहा शब्द के साथ अग्नि में आहुति डालनी चाहिए कि हे भगवन् ! आपके उस दिव्य रूप में मैं प्रविष्ट हो जाऊं। इसके बाद मंत्रोच्चार कर के स्वाहा शब्द के साथ अग्नि में अगली आहुति डालनी चाहिए इस उद्देश्य के साथ कि आप का दिव्य स्वरूप मुझ में प्रविष्ट हो जाये, मेरे मन में आ जाये। हजार शाखाओं वाले आपके दिव्य रूप में ध्यान-मग्न हो कर मैं स्वयं को परिशुद्ध बना लूं । इस अनुवाक् के अनुसार आचार्य को अपना मन अधिक से अधिक शुद्ध बनाने के हेतु इस प्रकार अग्नि में आहुतियां देते हुए स्वाहा शब्द के उच्चारण के साथ याग-कर्म करना चाहिए । वस्तुतः धीर-गंभीर प्रतिभाशाली लोग विज्ञान आदि के कर्म, नवीन खोजें आदि स्वस्थ और सधे हुए मन से करते हैं । वैदिक विज्ञान एवं वैदिक गणित का ज्ञान आज के युग में भी प्रासंगिक है तथा प्रत्येक युग की चुनौती व कसौटी पर खरा उतरा है । हमारे तत्कालीन ऋषि-मुनियों की खोजों को ही आज नए नाम दे कर, अपने आविष्कार बता कर पुनः संसार के सामने लाया जा रहा है । वे खोजें चाहे चिकित्सा के क्षेत्र की हों या मनोविज्ञान के क्षेत्र की, यान बनाने की कला हो या वास्तु-कला हो, साहित्य, कला, दर्शन, ज्योतिष, गणित आदि सभी क्षेत्रों को हमारे मनीषियों ने समृद्ध किया है । इस मन्त्र के अनुसार ज्ञान-विज्ञानं के ऐसे सभी कर्मों के पीछे मन की दृढ संकल्प-शक्ति वर्तमान होती है, तब ही यह सब संभव होता है ।

शिवसंकल्पसूक्त के दूसरे ऋचा में कहा है कि मन सब के शरीर में विद्यमान है । पातंजलि योगसूत्र के अनुसार सभी को भौतिक अस्तित्व के रूप में शरीर तथा मानसिक अस्तित्व के रूप में मन मिला हुआ है । मन शरीर से सूक्ष्म है । कठोपनिषद् के अनुसार मन इन्द्रियों से परे है, उनसे उत्कृष्ट है:

“इन्द्रियेभ्यः परं मनः ।”

इस मन्त्र में यह बात कही गई है कि सभी श्रेष्ठ कर्मों को इसी मन की स्वस्थ व शुद्ध अवस्था में किया जा सकता है । यही मन गृहस्थ को कर्मठ बनाता है एवं उसे नीति से जीविकोपार्जन की बुद्धि देता है । सन्यासी को भी यही मन विषयों से विमुख रखता है, जिससे वह सद्चिन्तन में रत रहे, विकारों की उत्पत्ति एवं उपद्रव से वह बचा रहे । तब ही सन्यासी तपस्या, संध्या, पूजा आदि सत्कर्मों का करने वाला बन सकता है । यजुर्वेद में मन के नियंत्रक देवता को मनस्पत: कहा गया है । मन की शुद्ध व शांत स्थिति ही स्वस्थ चिंतन एवं नवोन्मेष के हेतु नवीन क्षितिजों का उद्घाटन करती है । समस्त समाज के लिए सबसे पहले मन का निर्विकार होना आवश्यक है । अतः ऋषि परमात्मा से प्रार्थना करते हुए कहते हैं कि हमारा मन शुभ-कल्याणकारी संकल्पों से युक्त हो !

ऋचा ३:

यत्प्रज्ञानमुत चेतो धृतिश्च यज्ज्योतिरन्तरमृतं प्रजासु ।

यस्मान्न ऋते किंचन कर्म क्रियते तन्मे मनः शिवसंकल्पमस्तु ।।

अन्वय

यत् प्रज्ञानं चेतः उत धृति च यत् प्रजासु अन्तः अमृतं ज्योतिः यस्मात् ऋते किंचन कर्म न क्रियते तत् में मनः शिवसंकल्पं अस्तु ।

सरल भावार्थ:

जो मन प्रखर ज्ञान से संपन्न, चेतना से युक्त्त एवं धैर्यशील है, जो सभी प्राणियों के अंतःकरण में अमर प्रकाश-ज्योति के रूप में स्थित है, जिसके बिना किसी भी कर्म को करना संभव नहीं, ऐसा हमारा मन शुभ संकल्पों से युक्त हो !

व्याख्या:

शिवसंकल्पसूक्त के तृतीय ऋचा में ऋषियों का कथन है कि मन प्रखर ज्ञान से संपन्न है । वस्तुतः वह मन ही है जो लौकिक व अलौकिक बातों का ज्ञान रखता है, ग्राह्य व त्याज्य का निर्णय लेता है । स्वस्थ मन ही ईश्वर से असदो मा सद्गमय मृत्योर्मा अमृतगमय की प्रार्थना करता है । वैदिक ऋषि मन्त्रों के द्रष्टा होते थे । प. श्रीराम शर्मा आचार्य का कथन है कि “प्रत्येक पदार्थ और विधान के जड़ तथा चेतन दो विभाग होते हैं । आत्मज्ञानी पुरुष मुख्यतः प्रत्येक पदार्थ में चेतन शक्ति को ही देखता है, क्योंकि वास्तविक कार्य और प्रभाव उसीका होता है।” उनके अनुसार फलतः वैदिक ऋषि वेद के मन्त्रों एवं उनकी शक्ति को चेतना से अनुप्राणित मानते थे तथा प्रकृति की संचालक शक्तियों को देवता मान कर उनसे प्रार्थना करते थे, उनकी स्तुति करते थे । यह उनका अंधविश्वास नहीं उनका उत्कृष्ट कोटि का ज्ञान था, जो जड़ में अवस्थित चेतन के दर्शन कर लेता था । सूक्ष्म से सूक्ष्म पदार्थ की मूलभूत शक्ति व उनके कार्योंके वैज्ञानिक रहस्य इन ऋषियों के ज्ञानचक्षुओं के आगे प्रकट होते थे । उन्होंने स्तुति प्राकृत शक्तियों के स्थूल रूप की नहीं अपितु उनकी शासक अथवा अहिष्ठात्री चेतन शक्ति की है । वेदों में आध्यात्मिक विषयों का और अथर्ववेद में विविध प्रकार की व्याधियों के निवारण के उपाय, औषधियों और मन्त्र-तंत्र का विधान है और इन सबको इसमें देवता माना गया है । इनके मन्त्र गूढ़ार्थ लिए हुए होते हैं । बिना आत्मज्ञान के इन्हें हृदयंगम नहीं किया जा सकता ।

वस्तुतः पदार्थ में निहित चेतन शक्ति उन्हीं के सम्मुख सक्रिय होती है जो निर्मल मन से पूरी तरह निजी स्वार्थ से या अन्य मनोविकार से अलिप्त रहते हैं तथा जो आत्मवत् सर्वभूतेषु के भाव से सब में एक ही चैतन्य शक्ति के दर्शन करते हैं । ऐसे महान ऋषियों के आश्रम के निकट रहने-बसने वाले, वहां घूमने वाले हिंस्र पशु भी अहिंसक हो जाते थे । वैदिक ऋषि जानते थे कि शरीर की शक्ति से मन की शक्ति अनेक गुनी अधिक है । यही कारण है कि इस मन्त्र में मन को प्रखर ज्ञान, चेतना व धृति से युक्त कहा गया है । धृति का अर्थ केवल धैर्य ही नहीं अपितु स्थैर्य भी है । इस शब्द में स्फूर्ति, दृढ संकल्प, साहस तथा सहारा देने के भाव भी समाहित हैं । अतएव इसका संकुंचित अर्थ न लेकर इसे विस्तृत परिप्रेक्ष्य में देखना अपेक्षणीय है । आगे इस मंत्र में कहा गया है कि यह मन सब में अमर-ज्योति के रूप में स्थित है । यह चेतना ऋषियों ने सभी में पायी है। यही कारण है कि जगत के सर्वप्रथम आदि कवि वाल्मीकि एक दुर्दांत डाकू से मुनि बन गए, महामूर्ख कालिदास महाकवि के रूप में उभर कर आये । यह चेतना मनुष्य के भीतर निहित वह अमर ज्योति है जिसके बिना कुछ भी कर पाना सम्भव नहीं है । ज्ञान जो सब के भीतर ढंका हुआ है, वह मन के द्वारा प्रकशित किये जाने के कारण मन को अमर-ज्योति कहा है । सब के अंतःकरण में जलती हुई भी यह ज्योति केवल वहीँ अपना आलोक बिखेर सकती है, जहाँ मन मल से रहित हो, अमल हो, निर्मल हो । रामचरितमानस में श्रीराम विभीषण से ये कहते हैं कि

“निर्मल मन जान सो मोहि पावा ।

मोहि कपट छल छिद्र न भावा ।।”

गोस्वामीजी मानस में जानकीजी से निर्मल मति प्रदान करने की प्रार्थना करते हैं ।

“जनकसुता जगजननी जानकी ।

अतिसय प्रिय करुणानिधान की ।।

ताके जुग पदकमल मनावउं ।

जासु कृपा निर्मल मति पावउँ ।।”

इस प्रकार मन की पावनता और निर्मलता पर बल दिया गया है भारतीय संस्कृति में सर्वत्र । क्योंकि यह प्रकृष्ट ज्ञान का साधन है । ऋषि कहते हैं की ऐसा हमारा मन श्रेष्ठ और कल्याणकारी संकल्पों से युक्त हो !

ऋचा ४:

येनेदं भूतं भुवनं भविष्यत् परिगृहीतममृतेन सर्वम् ।

येन यज्ञस्तायते सप्तहोता तन्मे मनः शिवसंकल्पमस्तु ।।

अन्वय

येन अमृतेन इदं भूतं भुवनं भविष्यत् सर्वं परिगृहीतं येन सप्तहोता यज्ञः तायते तत् मे मनः शिवसंकल्पं अस्तु ।

सरल भावार्थ:

जिस सनातन मन से भूत, भविष्य व वर्त्तमान- तीनों कालों का प्रत्यक्षीकरण होता है, जिसके द्वारा सप्त होतागण यज्ञ का विस्तार करते हैं, ऐसा हमारा मन शुभ संकल्पों से युक्त हो !

व्याख्या:

शिवसंकल्पसूक्त के चतुर्थ ऋचा के अनुसार मन में सभी कालों का ज्ञान निहित है । मन को वश में किये हुए मनस्वी, योगी जब अहम् भाव से मुक्त हो जाते हैं तो ज्ञान की समस्त थाती को निज अंतःकरण में पा लेते हैं । मन वस्तुतः अंतःकरण की ही एक वृत्ति है । अपनी वृत्तियों के कारण अंतःकरण मन, बुद्धि, चित्त और अहंकार- इन चार नामों से कहा जाता है । अंतःकरण अपनी वृत्तियों के आधार पर चार तरह का हो जाता है । इन्हें अन्त:करण चतुष्टय कहते हैं । संकल्प-विकल्प मन में उठते हैं । “मनस्यति अनेन इति मनः” अर्थात् साधक मन और इन्द्रियों को वश में करके आतंरिक उत्थान में उन्हें लगा कर आध्यात्मिक उन्नति करता है, एवं विराट चेतना अर्थात् परमात्मा से सम्बन्ध जोड़ता है । किन्तु यह सब मन की विशुद्ध अवस्था पर निर्भर करता है । मन के द्वारा ही समय को, तीनों कालों को जाना जाता है । इस मन के भीतर ही मनुष्य के जन्मजन्मांतर का ज्ञान निहित है । साधक अपनी साधना की उन्नत अवस्था में अपने अतीत एव भावी को जानने में समर्थ होता है । मन को वशवर्त्ती करने वाला योगी तीनों कालों में होने वाली घटनाओं को अनुभूत करने में सक्षम होता है । किन्तु इस ज्ञान से वे आसक्त न होकर इसके प्रति उदासीन रहते हैं । अपने मन में स्थित विश्व-कल्याण की भावना व चिंतन के कारण वे निरुद्देश्य और निरर्थक अपने ज्ञान का, अपनी ऊर्जा, अपने समय का अपव्यय नहीं करते है । अपितु विश्व-कल्याण के कार्यों को सम्पादित करते हुए उनका विस्तार करते हैं ।

प्रस्तुत ऋचा में आगे कहा है कि इस मन से ही सप्तहोता यज्ञ का विस्तार करते हैं । यज्ञों का विस्तार, शुभ कर्मों का प्रसार, शुद्ध तथा पापरहित मन वाले व्यक्तियों द्वारा ही किया जाता है । ऐसे सत्पुरुष न केवल शुभ संकल्प ही करते हैं, अपितु शीघ्रातिशीघ्र उन्हें पूर्ण करने के साधन भी करते हैं, जैसे शास्त्रों में वर्णित एक कथानुसार राजा निमि के मन में यज्ञ करवाने के संकल्प के उठने पर उनका ऋषि वशिष्ठ से ऋत्विज बनने का निवेदन करना । ऋषि वशिष्ठ उस समय देवराज इंद्र का यज्ञ करावा रहे थे, जिससे उन्होंने कहा कि वे उस यज्ञ के पूर्ण होने के पश्चात् ही आ सकते हैं, जिसमें वर्ष से अधिक समय लग सकता है । महाराज निमि उत्कंठित हो गए और जीवन की क्षणभंगुरता ने प्रश्न उठा दिया कि क्या पता, जब तक इंद्र का यज्ञ पूर्ण हो, हमारे प्रयाण का समय आ जाये । शुभस्यशीघ्रम् सोचते हुए महाराज निमि ने तब गौतम ऋषि से सब वृतांत निवेदन किया, जिसे ऋषि ने मान लिया । यज्ञ का शुभारम्भ किया गया तथा सप्त ज्वालाओं से यज्ञ की अग्नि प्रज्वलित हो उठी । अग्निपुराण के अनुसार अग्निदेव सात जिह्वाओं से युक्त हैं – कराली, धूमिनि, श्वेता, लोहिता, नीललोहिता, सुवर्ण तथा पद्मरागा । यह सातों अग्नि की सात ज्वालाएँ हैं ।

श्रीविष्णुपुराण के तृतीय अंश व दूसरे अध्याय में लिखा है कि प्रत्येक चतुर्युग के अंत में वेदों का लोप होता है, तथा उस समय सप्तर्षिगण स्वर्गलोक से पृथ्वी पर अवतीर्ण होकर उनका प्रचार करते हैं । वेदों का ज्ञान यज्ञ-संस्कृति का पोषक है । इस प्रकार वे सप्तऋषि यज्ञकर्मों का विस्तार करते हैं । ज्ञान अथवा ईश्वर का प्रवेश होता ही शुद्ध अंतःकरण में है । गोस्वामी तुलसीदास कृत रामचरितमानस में राम यही बात कहते हैं:

“निर्मल मन जन सो मोहि पावा ।

मोहि कपट छल छिद्र न भावा ।।”

यही कारण है कि वे जनकसुता जगजननी जानकी से निर्मल मति पावउं की विनती करते हैं । यज्ञ करने वाले होता या ऋत्विज वही होते हैं, जो पाप से रहित हों, विशुद्ध चित्तवाले हों । इस मन्त्र में कहा गया है कि जिस मन से सप्तहोता यज्ञों का विस्तार करते हैं, हमारे ऐसे उस मन में सदा कल्याणकारी संकल्पों का उदय हो । होता अर्थात् यज्ञ का पुरोहित । भारतीय संस्कृति में सभी संस्कारों के साथ हवन, होम, अग्निहोत्र अथवा यज्ञ की परम्परा जुडी हुई है । यह वैदिक कृत्य है, जिसमें यज्ञ की व्यवस्था करने वाला, व्ययभार उठाने वाला यजमान कहलाता है तथा यज्ञ कराने वाला पुरोहित या ऋत्विज् कहलाता है । शतपथ ब्राह्मण में यज्ञ को देवों की आत्मा कहा गया है:

“यज्ञो वै देवानामात्मा”

और साथ ही श्रेष्ठतम कर्म को भी यज्ञ की संज्ञा दी है:

“यज्ञो वै श्रेष्ठतमं कर्म”

यज्ञ के मुख्य चार ऋत्विज होते हैं — ब्रह्मा, अध्वर्यु, होता और उद्गाता । प्रचलित अर्थ में यज्ञ कराने वाले पुरोहित को भी होता कहा जाता है । इस मन्त्र के अनुसार होतागण यज्ञ का विस्तार करते हैं । विस्तार से तात्पर्य कार्य आगे बढ़ाने से है, प्रचार-प्रसार करने से है । होतागण यज्ञ का विस्तार करके, यज्ञ-संस्कृति को समृद्ध करते हैं समृद्धि आतंरिक और बाह्य दोनों प्रकार की होती है । दोनों प्रकार से समृद्ध होकर ही व्यक्ति समृद्धिवान बनता है । इसी को धन की देवी लक्ष्मी का श्री रूप में आना कहते हैं । लक्ष्मी यदि केवल संपत्ति रूप में आये, तो वह केवल क्षणिक सुखों की अतिशयता की देने वाली होती है, वही जब श्री रूप में आती है तो परमपद -प्राप्ति के द्वार भी खुलते हैं, व्यक्ति सद्गुणों से संवलित होकर सत्कर्म, यज्ञकर्म आदि में स्वयं को नियोजित करता है । परिवार से लेकर विश्व-परिवार तक सभी संघटन यज्ञ हैं । केवल अगिहोत्र करना ही यज्ञ नहीं है । परम चैतन्य व उसके अंश रूप मनुष्य की सेवा करना यज्ञ है, धर्म व समाज का उत्थान करना, मानवीय मूल्यों की रक्षा करना यज्ञ है । वेद ने इस सृष्टि को यज्ञमय कहा है ।

“सर्वेषां संकल्पानां मन एकायनम्”

अर्थात् हमारा मन सभी संकल्पों का अयन (आश्रय) है । अतः ऋषि परमात्मा से प्रार्थना करते हुए कहते हैं कि हमारा मन श्रेष्ठ और कल्याणकारी संकल्पों से युक्त हो ।

ऋचा ५:

यस्मिन्नृचः साम यजूंषि यस्मिन् प्रतिष्ठिता रथनाभाविवाराः ।

यस्मिंश्चित्तं सर्वमोतं प्रजानां तन्मे मनः शिवसंकल्पमस्तु ।।

अन्वय

यस्मिन् ऋचः यस्मिन् सामः यजूंषि रथानाभौ अराः इव प्रतिष्ठिता यस्मिन् प्रजानां सर्वं चित्तं ओतं तत् में मनः शिवसंकल्पं अस्तु ।

सरल भावार्थ:

हे परमात्मा ! जिस मन में वैदिक ऋचाएं समाई हुई हैं, जिसमें साम और यजुर्वेद के मन्त्र ऐसे प्रतिष्ठित हैं, जैसे रथ के पहिये में `अरे` स्थित होते हैं (लगे होते हैं) तथा जिस मन में प्रजाजनों का सकल ज्ञान समाहित है, ऐसा हमारा मन शुभ संकल्पों से युक्त हो ।

व्याख्या:

शिवसंकल्पसूक्त के पंचम ऋचा में वैदिक ऋषि परमात्मा के सम्मुख मन की शुद्धि की व मन को प्रबलता प्रदान करने की प्रार्थना करते हैं । मन को श्रेष्ठ संकल्पों से युक्त करने की विनय करते हुए ऋषि यह कहते हैं कि संपूर्ण वेदराशि मन में ही छिपी हुई है । इस मन में तीनों वेदों का अपार-अमाप ज्ञान निहित है । लेकिन भय इस बात का है कि अशुभ विचार भी जाने-अनजाने इस मन में आ जाते हैं । ऋषि मन को दृढ़ व साहसपूर्ण बनाना चाहते हैं ताकि वे अपने परम कर्त्तव्य को कर सके, कठिन तप और साधना में तत्पर रह सकें । उनके द्वारा मनुष्य का हित संपादित हो । मन में उठने वाले अच्छे-बुरे संकल्प कर्मों को प्रभावित करते हैं । ऋषियों के अनुसार मन में ऋग्वेद की ऋचाएं निहित हैं अर्थात् समाई हुई हैं, इसी में सामवेद तथा यजुर्वेद के मन्त्र प्रतिष्ठित हैं । वेदों का समस्त ज्ञान मन के भीतर ही समाविष्ट है और वह भी कुछ इस तरह जैसे रथ के पहिये में अरे लगे होते हैं ।

उपर्युक्त ऋचा में ऋषिगण पहली बात यह कहते हैं कि मन ही में वेदों की ऋचाएं एवं मंत्र समाहित है । तात्पर्य यह कि मनुष्य को शुद्ध मन परमात्मा से प्राप्त हुआ है, क्योंकि विशुद्ध ज्ञान केवल विशुद्ध मन ही में स्थित हो सकता है, विकारयुक्त मन में नहीं । मन में विकारों के आ जाने पर तमस का आवरण उसे आच्छादित कर देता है, फलतः अज्ञान से ज्ञान व उसका आलोक ढँक जाता है । मन में विकार का कारण है मलिन विचार, क्योंकि व्यक्ति जैसा चिंतन करता है, वह वैसा ही आचरण भी करने लगता है । गीता में श्रीकृष्ण का कहना है कि विषयभोगों का रागपूर्वक चिंतन करने से इन विषयों में आसक्ति उत्पन्न हो जाती है:

“ध्यायतो विषयान्पुंसः संगस्तेषूपजायते”

–गीता २/५९

इसलिए आध्यात्मिक जीवन में विचार और चिन्तन की शुचिता पर विशेष बल दिया जाता है । निर्मल-निर्विकार मन में ईश्वर प्रदत्त प्रेरणा अविलम्ब स्फुरित होती हैं, व्यक्ति को प्रश्नों के उत्तर, समस्याओं के समाधान, निराकरण स्वयमेव आश्चर्यजनक रूप से लब्ध होते हैं । वस्तुतः ज्ञान हमारे भीतर ही निहित है और यह ज्ञान सार्वकालिक, सार्वभौमिक है, इसीलिए मन्त्र में कहा है कि मन में वैदिक ऋचाएं प्रतिष्ठित हैं, सामवेद व यजुर्वेद के मन्त्र समाहित हैं । वेदों में प्रदत्त ज्ञान कालजयी है । वह किसी देश-काल की सीमा में बंधा हुआ नहीं है, प्रत्युत् कालातीत और सीमातीत है जो प्रत्येक युग की कसौटी पर खरा उतरता है, प्रासंगिक है, मानव-सभ्यता की आधारशिला है । व्यक्ति विश्व के किसी भी भाग में हो, युग चाहे कोई भी, लेकिन वेद मन्त्रों के भीतर उसके प्रश्नों के निराकरण मिलते हैं । फिर प्रश्न या समस्याएं वैयक्तिक (व्यक्तिगत) हों, पारिवारिक हों या सामाजिक या चाहे वैश्विक स्तर की हों, भौतिक हों या आध्यात्मिक इन सभी के समाधान और उसके लिए उपयोगी साधन इन वेद-मन्त्रों में मिलते हैं । वेद ब्रह्मवाणी हैं । वेदों में वैदिक ऋषियों का अनुभूतिजन्य तत्व-दर्शन सन्निहित है । छल-कपट रहित, निष्पाप, संयत आत्मा वाले ऋषिगण दिव्य-दृष्टि रखते थे, जो उन्होंने दुःसह, कठोर तपश्चर्या के फलस्वरूप पाई थी । इस प्रकार शुद्ध मन वाले वे प्राणियों के हित-सम्पादन में रत रहते थे तथा स्वयं भी मुक्ति के अधिकारी बने । गीता (अध्याय ५) में भी लिखा है –

“लभन्ते ब्रह्मनिर्वाणमृषयः क्षीणकल्मषाः ।

छिन्नद्वैधा यतात्मनः सर्वभूतहिते रताः ।। २५ ।।”

अर्थात् नष्टपाप, छिन्नसंशय, सम्पूर्ण प्राणियों के हित में रत तथा जीते हुए मन-इन्द्रियों वाले विवेकी साधक ब्रह्मनिर्वाण को प्राप्त होते हैं ।

पांचवें मन्त्र में यह भी कहा गया है कि जिस प्रकार रथ के चक्र की नाभि में `अरे` लगे होते हैं, उसी प्रकार वेदों का ज्ञान मन में इस प्रकार प्रतिष्ठित है । रथ के चक में नाभि होती है, उसमें अरे लगे होते हैं । वैदिक ऋषियों को रथ-चक्र की नाभि में स्थित अरों का उपमान बहुत प्रिय था और अनेक स्थलों पर उनके द्वारा इसका प्रयोग देखने को मिलता है । प्रश्नोपनिषद से एक उदाहरण द्रष्टव्य है-

” अरा इव रथानाभौ प्राणी सर्वं प्रतिष्ठितम् । ऋचोयंजूषि सामानि यज्ञः क्षत्रं ब्रह्म च ।”

अर्थात् जैसे रथ की नाभि में अरे लगे होते हैं, वैसे ही प्राण में ऋचाएं, यजु, सामगीत, यज्ञ, शक्ति और ज्ञान सभी निहित है । इस मन्त्र में मन के सामर्थ्य को दर्शाने हेतु इस उपमान को दिया गया है, जिससे अभिप्राय यह है कि रथ के पहिये में लगे रहने वाले अरे जैसे पहिये के मध्यस्थ नाभि में प्रविष्ट रहते हैं, वैसे ही ऋचाएं, यजुर्वेद के मन्त्र व सामगीत सब मन में प्रविष्ट रहते हैं । आगे कहा है कि प्रजाजनों का समस्त ज्ञान भी इस मन में प्रतिष्ठित रहता है । प्रकारांतर से मन सम्पूर्ण ज्ञान अपने भीतर समाहित किये हुए है । किन्तु उस ज्ञान के सकारात्मक उपयोग से ही विश्व-कल्याण संभव हो सकता है । संहारक शस्त्रों की खोज करने वाले, बमों और मानव बमों द्वारा विनाश की विभीषिका से विश्व को दहला देने वाले लोगों के पास भी जानकारियों की कमी नहीं है, कमी है तो शुभ भावों व कल्याण-कामना की ।ऐसे लोग अपने विनाशक संकल्पों से मानवता को केवल हानि ही पहुंचाते रहे हैं। अतः ऋषि प्रार्थना करते हुए कहते हैं कि हे परमात्मा ! हमारा मन श्रेष्ठ और कल्याणकारी संकल्पों से युक्त हो ।

साभार- https://www.facebook.com/share/14Soj9K6Dtp/ से

हिंदुओं के नरसंहार की भूमि बनता बांग्लादेश_ सेक्युलर दलों के मुंह पर लगा ताला

अगस्त 2024 में बांग्लादेश की पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना को हिंसक प्रदर्शनों के चलते अपना देश छोड़ना पड़ा जिसके बाद बांग्लादेश में हिन्दुओं पर आक्रमण, हत्या और आगजनी की भीषण घटनाएं हुईं क्योंकि हिन्दुओं को उनकी पार्टी का समर्थक माना जाता है। शेख हसीना के देश छोड़ने के बाद मोहम्मद यूनुस के नेतृत्व में अंतरिम सरकार बनी। यूनुस के आते ही  पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी आईएसआई  बांग्लादेश में सक्रिय हो गई और भारत तथा हिन्दू विरोधी आग भड़काने में जुट गई। दिसंबर 2025 में भारत विरोधी नेता उस्मान हादी की हत्या के बाद यह आग और भड़क गई। अब ईशनिंदा के झूठे आरोप लगाकर हिन्दुओं की हत्याएं की जा रही हैं। हिन्दू घरों में बाहर से ताला लगाकर आग लगाई जा रही है। इन सभी क्रूर आपराधिक घटनाओं को यूनुस सरकार का मौन समर्थन है जिससे हिन्दू जान बचाकर भाग तक नहीं पा रहा है। बांग्लादेश हिंदू समाज के नरसंहार की भूमि बन चुका है।

विभाजन के समय  बांग्लादेश में  हिन्दू जनसँख्या 23 प्रतिशत थी। 1974 की जनगणना में यह घटकर   मात्र 13.5 प्रतिशत रह गई थी और अब मात्र 7.96 प्रतिशत है। हिन्दुओं पर हो रहे धार्मिक अत्याचारों का यही  हाल  रहा तो बांग्लादेश में  हिन्दू  पूरी तरह से लुप्तप्राय हो जाएंगे।विदेश मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार 2022 में अल्पसंख्यकों पर 47 हमले दर्ज किए गए जो 2023 में बढ़कर 302 हो गए और  फिर 2024 में तेजी से बढ़कर 3200 हो गए।दिसंबर माह में ही पहले दीपू चन्द्र दस और फिर अमृत मंडल को भीड़ ने ईशनिंदा के नाम पर बर्बरता से मार डाला। चटगांव मे हिंदू परिवार के घर में आग लगा दी गई।घटनास्थल से एक धमकी भरा नोट मिला जिसमें हिन्दुओं पर इस्लाम विरोधी गतिविधियों का अरोप लगाया गया था और गंभीर परिणाम की चेतावनी दी गई।हादी की मौत का बदला लेने के लिए भीड़ हिन्दुओं  के  खून की प्यासी होकर अनेकानेक हथियारों के साथ  सड़कों पर घूम रही है। बांग्लादेश में प्रतिवर्ष किस न किसी बहाने हिंदू मंदिरों पर हमले हो रहे हैं और अब तक 850 से अधिक हिंदू मंदिरों को ध्वस्त किया जा चुका है। केवल तजा हिंसा में ही अभी तक 200 से अधिक हिन्दुओं की हत्याएं और 170 से अधिक हिंदू महिलाओं  के साथ बलात्कार जैसे जघन्य अपराध हो चुके हैं।

प्राप्त आंकड़ों  के अनुसार  बांग्लादेश में 2022 से 2024 के बीच हिन्दू अल्पसख्यकों पर हमलों के मामले आठ गुना बढ़ गए हैं। बांग्लादेश में हिन्दुओं पर हिसा के मामलों में जिस प्रकार से वृद्धि देखी जा रही है वह केवल तात्कालिक कानून व्यवस्था की समस्या नहीं है अपितु देश की सामाजिक तथा जनसांख्यिकीय संरचना को बदलने के लिए दशकों से किए जा रहे कट्टर इस्लामी राजनीतिक प्रयासों का परिणाम भी है।

बांग्लादेश मे हिंदुओं के साथ हो रही हिंसा की पृष्ठभूमि  बहुत पुरानी है। शेख हसीना की सरकार के समय भी  हमले होते थे, विशेषकर जब हिन्दुओं के पवित्र नवरात्र प्रारंभ होते थे तब ईशनिंदा की झूठी अफवाहें फैलाकर दुर्गा पंडालो पर हमले किए जाते थे और उनमें तोड़ फोड़ की जाती थी। अब अंतर यह आ गया है कि इन घटनाओं  का नियंत्रण  पाक खुफिया एजेंसी आईएसआई व कट्टरपंथी अराजक तत्वों के हाथ में  आ गया है।

बांग्लादेश मे ईशनिंदा कट्टरपंथियों का सबसे बड़ा हथियार बन गया है।आठ ऐसे अवसर रहे हैं जब हिंदुओं पर ईशनिंदा के नाम पर भयानक हमले किए गए।  सुनामगंज में एक फेसबुक पोस्ट के बाद परा हिंदू गांव तबाह कर दिया गया। रंगपुर के गंगा चरा में एक हिंदू युवक पर आरोप लगाने के बाद दंगाइयों ने 22 हिंदू घरों  को ध्वस्त कर दिया। खुलना, बारिशाल, मौलवी बाजार, फरीदपुर, चांदपुर और कुमिल्ला जैसे जिलों मे भी हिंदुओं के साथ भयानक घटनाएं घटी हैं ।

मोहम्मद यूनुस की अंतरिम सरकार बनने  के बाद से हिन्दुओं की स्थिति दिन प्रतिदिन बदतर होती जा रही है । नोबेल शांति पुरस्कार पाने वाला वास्तव में हिन्दुओं रक्त  का प्यासा हो गया है जो उस्मान हादी के अंतिम संस्कार  की जनसभा में कहता है कि “हादी तुम जहां कहीं भी हो हम तुम्हारे हर सपने को अवश्य पूरा करेंगे।“ यह भाषण यूनुस की खतरनाक मंशा का संकेत कर रहा है। बांग्लादेश इस बात का प्रमाण है कि जहां मुस्लिम आबादी बढ़ जाती है वहां पर अन्य अल्पसंख्यक समाज का रहना दूभर हो जाता है।आज बांग्लादेश में मुस्लिम जनसंख्या 91.08 प्रतिशत हो चुकी है और अल्पसंख्यक हिंदू समाज पूरी तरह से असुरक्षित हो गया है।

बांग्लादेश के कट्टरपंथी देश में शरीयत का कानून लागू करना चाहते हैं। वे हिंदू महिलाओं को माथे पर बिंदी न लगाने, साड़ी न पहनने और  बुर्का पहनने को कह रहे हैं  ओैर ऐसा न करने पर बलात्कार तथा परिवार को मारने की घमकियां दे रहें हैं। बांग्लादेश में भारत- बांग्लादेश के मध्य मैत्री को मजबूती प्रदान करने के लिए जिन सांस्कृतिक केन्द्रों की स्थापना की गई थी उन्हें  निशाना बनाया जा रहा है।सांस्कृतिक कार्यक्रम की प्रस्तुति दे रहे कलाकारों पर हमला किया जा रहा है। जगह -जगह हिन्दुओं  का नरसंहार कर अस्तित्व समाप्त करने के पोस्टर लगाए जा रहे हैं।

दुर्भाग्यपूर्ण है कि संयुक्तराष्ट्र महासभा में  उस्मान हादी की मौत पर गहरी चिंता व्यक्त की जाती है किंतु हिन्दू नरसंहार पर चुप्पी साध ली जाती है। अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने राष्ट्रपति चुनाव के दौरान, बांग्लादेशी हिन्दुओं  के लिए कहा था कि अगर बाइडेन की जगह उन्हें  चुना गया होता तो आज वहां के हालात ऐसे न होते किंतु ट्रंप अब शांत हैं और अमेरिका से हिंदुओं की हत्याओ की निंदा करने का  कोई बयान अभी तक नहीं आया है। कनाडा की संसद में एक महिला सांसद ने हिंदुओं के पक्ष में आवाज उठाई है, कुछ और देशों  से भी आवाज उठ रही है किंतु वह नाकाफी है। बांग्लादेश में हिन्दुओं के नरसंहार पर दुनिया भर में मानवाधिकार का हल्ला मचाने वालों  ने चुप्पी  साध ली है।

(लेखक समसामयिक व राजनीतिक  विषयों पर नियमित लेखन करते हैं )

हॉलीवुड के प्रसिद्ध अभिनेता और ‘द बोल्ड एंड द ब्यूटीफुल’ के स्टार क्लेटन नॉरक्रॉस के लिए काम करेगा एप्रोच एंटरटेनमेंट

मुंबई – भारत और भारतीय अध्यात्म के प्रति गहरी रुचि रखने वाले हॉलीवुड के मशहूर अभिनेता क्लेटन नॉरक्रॉस को भारत में प्रतिनिधित्व के लिए भारत की अग्रणी और पुरस्कार-विजेता सेलिब्रिटी मैनेजमेंट, फिल्म प्रोडक्शन और एंटरटेनमेंट मार्केटिंग कंपनी एप्रोच एंटरटेनमेंट ने एक्सक्लूसिव रूप से साइन करने की घोषणा की है। क्लेटन नॉरक्रॉस को दुनियाभर में लोकप्रिय टीवी सीरीज़  बोल्ड एंड  ब्यूटीफुल में थॉर्न फॉरेस्टर के मूल किरदार के लिए विशेष रूप से जाना जाता है।

क्लेटन नॉरक्रॉस ने अपने करिश्माई और प्रभावशाली अभिनय से वैश्विक दर्शकों को मंत्रमुग्ध किया है। ‘द बोल्ड एंड द ब्यूटीफुल’ टीवी इतिहास के सबसे लंबे समय तक चलने वाले और सफल ड्रामा शोज़ में से एक है, जो वर्तमान में अपने 38वें सीज़न में है और 100 से अधिक देशों में प्रसारित होता है। रोमांटिक हीरो की उनकी छवि, आत्मविश्वास से भरी स्क्रीन प्रेज़ेंस और सुरुचिपूर्ण अभिनय शैली ने उन्हें दुनिया भर में एक विशाल फैन फॉलोइंग दिलाई है।

‘द बोल्ड एंड द ब्यूटीफुल’ के बाद क्लेटन नॉरक्रॉस ने अपने करियर को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर और विस्तार दिया। उन्होंने यूरोप, अफ्रीका, साउथ अमेरिका और अमेरिका में कई फिल्मों और टीवी/वेब प्रोजेक्ट्स में मुख्य भूमिकाएं निभाईं। उनके हालिया प्रमुख प्रोजेक्ट्स में एक्शन थ्रिलर फिल्म लास्ट रिज़ॉर्ट (जो वर्तमान में प्राइम वीडियो पर स्ट्रीम हो रही है), इटालियन कॉमेडी फिल्म चाओ ब्रदर, और फ्रेंच-इटालियन को-प्रोडक्शन  किडनैप शामिल हैं, जिसकी शूटिंग थाईलैंड में की गई है।

इसके अलावा क्लेटन नॉरक्रॉस लोकप्रिय अमेरिकी शोज़ बेवॉचजेएजीहवाई फाइव और अंतरराष्ट्रीय फिल्म एयर फ़ोर्स वन इज़ डाउन में भी अहम भूमिकाओं में नज़र आ चुके हैं, जिसमें उन्होंने लिंडा हैमिल्टन और जेरेमी सिस्टो जैसे कलाकारों के साथ काम किया।

अभिनय के साथ-साथ क्लेटन नॉरक्रॉस एक कुशल लेखक और निर्माता भी हैं। उन्होंने पुलिस एक्शन सीरीज़ ब्रूटल एंजेल्स का सह-लेखन किया है, जिसमें रोमांस और पैरानॉर्मल एलिमेंट्स भी शामिल हैं। यह सीरीज़ फिलहाल प्रमुख अंतरराष्ट्रीय नेटवर्क्स और प्लेटफॉर्म्स के साथ बातचीत के दौर में है।

क्लेटन नॉरक्रॉस का भारत और भारतीय अध्यात्म से विशेष जुड़ाव है। अपनी हालिया भारत यात्रा के दौरान उन्होंने ऋषिकेश के योग आश्रमों में समय बिताया, मुंबई से लेकर हिमालय तक कई आध्यात्मिक स्थलों का भ्रमण किया और योग, ध्यान एवं माइंडफुलनेस का गहराई से अनुभव किया। उन्होंने आध्यात्मिक वेब सीरीज़ टू ग्रेट मास्टर्स की भी खुलकर सराहना की, जिसमें स्वामी विवेकानंद और परमहंस योगानंद की शिक्षाओं को प्रामाणिक और प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत किया गया है। अध्यात्म, ध्यान और मानसिक शांति में उनकी रुचि एप्रोच एंटरटेनमेंट ग्रुप की आध्यात्मिक पहल गो स्पिरिचुअल के मूल विचारों से पूरी तरह मेल खाती है।

इस सहयोग के तहत एप्रोच एंटरटेनमेंट भारत में क्लेटन नॉरक्रॉस के मैनेजमेंटप्रतिनिधित्वपीआरडिजिटल पहलब्रांड पार्टनरशिपइवेंट्सएंडोर्समेंट्स और विभिन्न सहयोगों को एक्सक्लूसिव रूप से संभालेगी। इस साझेदारी से भारतीय फिल्म प्रोजेक्ट्स, अंतरराष्ट्रीय सहयोग, ब्रांड एंडोर्समेंट्स और क्रॉस-कल्चरल इनिशिएटिव्स के नए रास्ते खुलेंगे, जो हॉलीवुड और भारतीय मनोरंजन उद्योग के बीच एक मजबूत सेतु का काम करेंगे।

इस अवसर पर क्लेटन नॉरक्रॉस ने कहा,
“भारत की मेरी यात्रा और ऋषिकेश जैसे स्थानों में मिले अनुभव मेरे लिए बेहद परिवर्तनकारी रहे हैं। भारतीय अध्यात्म और संस्कृति से मेरा जुड़ाव और भी गहरा हुआ है। एप्रोच एंटरटेनमेंट और सोनू त्यागी के साथ साझेदारी कर भारत में सार्थक और रचनात्मक अवसरों को तलाशने को लेकर मैं बहुत उत्साहित हूं। भारत मेरे दिल के बहुत करीब है।”

एप्रोच एंटरटेनमेंट ग्रुप के फाउंडर और डायरेक्टर सोनू त्यागी ने कहा,
“क्लेटन नॉरक्रॉस एक सच्चे अंतरराष्ट्रीय आइकन हैं। उनकी प्रतिभा, करिश्मा और आध्यात्मिक सोच उन्हें विशिष्ट बनाती है। भारत और इसकी आध्यात्मिक विरासत के प्रति उनका प्रेम इस साझेदारी को और भी खास बनाता है। हमें गर्व है कि हम भारत में उनका प्रतिनिधित्व कर रहे हैं और आने वाले समय में कई प्रभावशाली सहयोग देखने को मिलेंगे।”

सोनू त्यागी एक पुरस्कार-विजेता लेखक, निर्देशक और निर्माता हैं। उन्होंने मनोविज्ञान, विज्ञापन प्रबंधन, पत्रकारिता और फिल्ममेकिंग में पेशेवर शिक्षा प्राप्त की है। एप्रोच एंटरटेनमेंट ग्रुप की स्थापना से पहले उन्होंने भारत की प्रमुख विज्ञापन एजेंसियों और मीडिया हाउसेज़ के साथ कार्य किया। वे चर्चित आध्यात्मिक वेब सीरीज़ टू ग्रेट मास्टर्स के सह-निर्माता हैं और आगामी अंतरराष्ट्रीय फिल्म लिबरेशन के भी सह-निर्माता हैं। इसके अलावा वे हिंदी सैटायर कॉमेडी फिल्म कैंप डीसेंट के क्रिएटिव प्रोड्यूसर हैं, जिसमें ब्रिजेंद्र काला, राजपाल यादव, सारा खान और हेमंत पांडे जैसे कलाकार शामिल हैं। उनके कार्यों में सिनेमा, अध्यात्म और सामाजिक सरोकारों का अनूठा संगम देखने को मिलता है।

एप्रोच एंटरटेनमेंट एक पूर्ण-सेवा एंटरटेनमेंट मार्केटिंग कंपनी है, जो सेलिब्रिटी मैनेजमेंट, फिल्म प्रोडक्शन, विज्ञापन एवं कॉरपोरेट फिल्म्स, फिल्म मार्केटिंग, इवेंट्स और एंटरटेनमेंट मार्केटिंग में विशेषज्ञता रखती है। कंपनी की मौजूदगी मुंबई, नई दिल्ली, गुरुग्राम, गोवा, देहरादून, चंडीगढ़, कोलकाता, हैदराबाद और जालंधर में है।

एप्रोच एंटरटेनमेंट ग्रुप में एप्रोच कम्युनिकेशंस (एक प्रमुख पीआर और इंटीग्रेटेड कम्युनिकेशंस एजेंसी), एप्रोच बॉलीवुड (एक विशेष बॉलीवुड न्यूज़वायर) और गो स्पिरिचुअल भी शामिल हैं। गो स्पिरिचुअल ने हाल ही में गो स्पिरिचुअल न्यूज़ मैगज़ीन ऐप लॉन्च किया है और जल्द ही गो स्पिरिचुअल ओटीटी प्लेटफॉर्म लॉन्च करने की योजना है।

अधिक जानकारी के लिए:
एप्रोच एंटरटेनमेंट एवं एप्रोच कम्युनिकेशंस

संपर्क: 9820965004 / 9716962242
ईमेल: info@approachentertainment.com
वेबसाइट: www.approachentertainment.com | www.approachcommunications.in

सनातन संस्कृति, भारत एवं संघ के विरुद्ध गढ़े जा रहे हैं झूठे विमर्श

भारत आज विश्व के आर्थिक, सामाजिक एवं राजनैतिक परिदृश्य को बदलने में अपनी प्रभावी भूमिका निभा रहा है। पश्चिमी देशों के वर्चस्व को पूर्वी देशों से चुनौती मिल रही है, जिसका नेतृत्व भारत करता हुआ दिखाई दे रहा है। इसलिए, अमेरिका के कुछ विघ्नसंतोषी संस्थानों सहित कुछ विकसित देश सनातन हिन्दू संस्कृति, भारत एवं राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पर निराधार आरोप लगाकर झूठे विमर्श गढ़ने का लगातार प्रयास कर रहे हैं। दरअसल, पश्चिमी देशों की समस्या यह है कि वे केवल अपनी आधी अधूरी जानकारी को ही पूर्ण जानकारी मानते हुए अपने विचार तय करते हैं। जबकि, उनके विचार स्पष्टत: सत्यता की कसौटी पर खरे नहीं उतरते हैं। भारत पर आक्रांताओं एवं अंग्रेजो के शासनकाल में भी सनातन हिंदू संस्कृति एवं भारतीय संस्कारों पर जो विचार गढ़े गए थे, वे पूर्णत: गलत पाए गए थे। जैसे, सनातन संस्कृति के संस्कार रूढ़िवादी हैं एवं यह विज्ञान के धरातल पर खरे नहीं उतरते हैं, आदि, आदि।

उनके द्वारा सनातन संस्कृति के बारे में गढ़े गए विचार पूर्णत: उनके आधे अधूरे ज्ञान पर ही आधारित थे। परंतु, आज सनातन हिंदू संस्कृति के संस्कार विज्ञान के धरातल पर खरे पाए जा रहे हैं। पश्चिमी देशों के तथाकथित विद्वानों में सनातन हिंदू संस्कृति, भारत एवं राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के बारे में जानकारी का पूर्णत: अभाव है। अमेरिका से प्रकाशित न्यूयॉर्क टाइम्स नामक एक समाचार पत्र में हाल ही में प्रकाशित एक लेख में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के बारे में असत्य विचार प्रकट किए गए हैं। न्यूयॉर्क टाइम्स में प्रकाशित यह आलेख न तो भारत के सामाजिक यथार्थ का परिपूर्ण चित्र प्रस्तुत करता है, न ही संघ की वैचारिक और संगठनात्मक वास्तविकता को। इस लेख में तथ्यों, आंकड़ों और स्वतंत्र स्रोतों का संतुलित उपयोग नहीं किया गया है और यह लेख पूर्णत: पूर्वाग्रहों पर आधारित दिखाई देता है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के इतिहास एवं संघ के स्वयंसेवकों द्वारा सम्पन्न किए गए अतुलनीय कार्यों के बारे में इन महानुभावों को कोई जानकारी ही नहीं है।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना वर्ष 1925 में हुई थी और इसके साथ ही संघ ने देश के विभिन्न नगरों एवं ग्रामों में शाखाओं की स्थापना करते हुए भारत के युवाओं में राष्ट्रीयता के भाव को जागृत करना प्रारम्भ कर दिया था। वर्ष 1947 आते आते तो भारत में संघ के स्वयसेवकों की एक बड़ी फौज खड़ी हो चुकी थी। वर्ष 1947 में जब पाकिस्तानी सेना की टुकड़ियों ने कश्मीर की सीमा को पार करने की कोशिश की थी तब संघ के स्वयसेवकों ने कश्मीर की सीमा पर पाकिस्तानी सेना की गतिविधियों पर बिना किसी प्रशिक्षण के लगातार नजर बनाए रखी थी और तब पाकिस्तानी सेना को रोकने हेतु भारतीय सेना के जवानों के साथ संघ के कई स्वयसेवकों ने भी अपनी मातृभूमि की रक्षा में अपने प्राणों की आहुति दी थी। साथ ही, भारत में विभाजन के समय दंगे भड़कने के दौरान पाकिस्तान से जान बचाकर आए हिंदू शरणार्थियों की सहायता के लिए संघ के स्वयसेवकों ने 3,000 से अधिक राहत शिविर भारत में लगाए थे।

कश्मीर के भारत में विलय के समय पाकिस्तान की सेना कबाईलियों के भेष में भारत की सीमा में घुस रही थी, ऐसे में तात्कालीन केंद्र सरकार यह फैसला नहीं ले पा रही थी कि इन परिस्थितियों के बीच क्या किया जाय क्योंकि उस समय कश्मीर के महाराजा श्री हरी सिंह जी भारत में कश्मीर के विलय सम्बंधी प्रस्ताव पर अपने हस्ताक्षर नहीं कर पाए थे। इन विकट परिस्थितियों के बीच सरदार पटेल ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक श्री गुरु गोलवलकर जी से मदद मांगी और उन्हें कश्मीर में महाराजा श्री हरी सिंह जी से मिलने भेजा। श्री गुरु जी तुरंत कश्मीर गए एवं महाराजा श्री हरी सिंह जी को समझाया और कश्मीर के भारत में विलय सम्बंधी प्रस्ताव पर हस्ताक्षर करा लिए और उसे दिल्ली भेज दिया। इस प्रकार उन्होंने पाकिस्तानी सेना के पूरे कश्मीर पर कब्जे को विफल करने में अपना महत्वपूर्ण योगदान किया।

दादरा, नगर हवेली और गोवा को मुक्त कराते हुए भारत में विलय में भी संघ के स्वयसेवकों की प्रमुख भूमिका रही थी। 21 जुलाई 1954 को दादरा को पुर्तगालियों से मुक्त कराया गया था, 28 जुलाई 1954 को नरोली और फिपारिया को मुक्त कराया गया और फिर राजधानी सिलवासा को मुक्त कराया गया था। संघ के स्वयसेवकों ने 2 अगस्त 1954 की सुबह पुर्तगाल का झंडा उतारकर भारत का तिरंगा फहराया था एवं दादरा नगर हवेली को पुर्तगालियों के कब्जे से मुक्त कराकर भारत सरकार को सौंप दिया था।

भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री श्री जवाहरलाल नेहरु ने गोवा में सशस्त्र हस्तक्षेप करने से साफ इंकार कर दिया था अतः वर्ष 1955 में संघ के स्वयंसेवकों ने श्री जगन्नाथ राव जोशी जी के नेतृत्व में गोवा पहुंच कर गोवा मुक्ति आंदोलन प्रारम्भ किया, जिसके परिणामस्वरूप जगन्नाथ राव जोशी सहित संघ के कई कार्यकर्ताओं को दस वर्ष की सजा सुनाई गई। हालत बिगड़ते देख अंततः भारतीय सैनिकों ने हस्तक्षेप किया और वर्ष 1961 में गोवा को आजादी प्राप्त हुई।

इसी प्रकार वर्ष 1962 में भी चीन के साथ भारत के युद्ध के समय संघ के स्वयसेवकों ने भारतीय सेना की भरपूर मदद की थी। संघ के स्वयंसेवक पूरे उत्साह के साथ सेना की मदद के लिए सीमा पर पहुंचे थे। स्वयंसेवकों ने सरकारी कार्यों में और विशेष रूप से जवानों की मदद में पूरी ताकत लगा दी थी। सैनिक आवाजाही मार्गों की चौकसी, प्रशासन की मदद, रसद और आपूर्ति में मदद और ययां तक कि शहीदों के परिवारों की चिंता भी संघ के स्वयसेवकों ने की थी। संघ के इस महान योगदान को तत्कालीन प्रधानमंत्री श्री जवाहरलाल नेहरु ने भी पहचाना था और 26 जनवरी 1963 की गणतंत्र दिवस की परेड में संघ के स्वयंसेवकों को शामिल होने का निमंत्रण दिया था। गणतंत्र दिवस की परेड में शामिल होने के लिए महीनों की तैयारी की जाती है परंतु केवल 2 दिन पहिले मिले निमंत्रण पर संघ के 3,500 स्वयंसेवक गणवेश में गणतंत्र दिवस की परेड में शामिल हुए थे।

वर्ष 1965 में भारत पाकिस्तान युद्ध के समय तत्कालीन प्रधानमंत्री श्री लाल बहादुर शास्त्री को भी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की सहायता की आवश्यकता पड़ी थी। आपने देश में कानून व्यवस्था की स्थिति को सम्भालने और विशेष रूप से दिल्ली की यातायात व्यवस्था पर नियंत्रण स्थापित करने हेतु राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को अनुरोध किया था ताकि इन कार्यों में व्यस्त पुलिसकर्मियों का भारतीय सेना की मदद में उपयोग किया जा सके। युद्ध के इस कठिन समय में घायल जवानों को सबसे पहिले रक्तदान देने में भी संघ के स्वयंसेवक ही सबसे आगे रहे थे। युद्ध के दौरान कश्मीर की हवाईपट्टियों से बर्फ हटाने का कार्य भी संघ के स्वयसेवकों द्वारा ही सम्पन्न किया गया था।

भारत में शिक्षा के क्षेत्र में कार्य करने हेतु विद्या भारती, शिक्षा भारती, एकल विद्यालय, वनवासी कल्याण आश्रम, स्वदेशी जागरण मंच, अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद जैसे संगठनों की स्थापना राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने की। यह समस्त संगठन आज शिक्षा के क्षेत्र में अतुलनीय कार्य करते हुए भारतीय संस्कृति के संस्कारों को भारतीय युवाओं के बीच ले जाने का कार्य सफलतापूर्वक कर रहे हैं। 1952 में गोरखपुर में प्रारंभ हुए प्रथम विद्यालय के साथ विद्या भारती वर्तमान में 12,830 औपचारिक विद्यालय तथा 11,350 अनौपचारिक केंद्र के साथ कुल 24,180 प्राथमिक, माध्यमिक, वरिष्ठ माध्यमिक तथा उच्च शिक्षा स्तर पर संचालित करती है जिनमें अध्ययनरत छात्रों की संख्या लगभग 34,48,000 तथा शिक्षकों की संख्या 150,000 है।

वर्ष 1955 में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ द्वारा भारतीय मजदूर संघ की स्थापना की गई थी। भारतीय मज़दूर संघ विश्व का पहिला ऐसा मजदूर आंदोलन था, जिसने विध्वंस के स्थान पर निर्माण की धारणा की नीति अपनाई थी। विनिर्माण इकाईयों में विश्वकर्मा जयंती का चलन भारतीय मजदूर संघ ने ही प्रारम्भ किया था। आज भारतीय मजदूर संघ विश्व का सबसे बड़ा, शांतिपूर्ण और रचनात्मक मजदूर संगठन बन गया है।

सेवा भारती, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ द्वारा चालित एक प्रकल्प है। यह मुख्यत: वनवासी क्षेत्रों में कार्य करता है। इसके मुख्य कार्य हैं – शिक्षा, संस्कार, सामाजिक जागरूकता, स्वरोजगार, धर्म-परिवर्तन से वनवासियों की रक्षा, आदि। सेवा भारती, भारत के दूरदराज और दुर्गम क्षेत्रों में 2 लाख से अधिक सेवा कार्य कर रहा है। लगभग 35,000 एकल विद्यालयों में 10 लाख से अधिक छात्र अपना जीवन संवार रहे हैं। सेवा भारती ने जम्मू कश्मीर से आतंकवाद में अनाथ हुए 57 बच्चों के गोद लिया है जिनमें 38 मुस्लिम एवं 19 हिंदू बच्चे शामिल हैं।

वर्ष 1971 में ओड़िसा में आए भयंकर चक्रवात, वर्ष 1977 में आंध्रप्रदेश में आए चक्रवात, भोपाल गैस त्रासदी के दौरान, वर्ष 1984 में हुए सिख विरोधी दंगों, वर्ष 2001 में गुजरात में आए भूकम्प, उत्तराखंड में आई भयंकर बाढ़ और कारगिल युद्ध के घायलों की सेवा में संघ के स्वयसेवकों ने राहत और बचाव कार्यों में हमेशा आगे रहकर भागीदारी की है।

महात्मा गांधी ने वर्ष 1934 में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के एक शिविर की यात्रा के दौरान वहां पूर्ण अनुशासन देखा और छुआछूत की अनुपस्थिति पायी। उन्होंने व्यक्तिगत रूप से पूछताछ की और जाना कि वहां लोग एक साथ रह रहे हैं तथा एक साथ भोजन कर रहे हैं। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के बारे में इसी प्रकार के विचार बाबा साहेब अम्बेडकर के भी थे।

भारतीय सनातन हिन्दू संस्कृति, भारत एवं राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के बारे में हमें अपनी जानकारी को सुदृद्ध करना चाहिए, इसके बाद ही हम उक्त के बारे में गढ़े जा रहे झूठे विमर्श को ध्वस्त करने में सफल हो सकेंगे।

प्रहलाद सबनानी
सेवानिवृत्त उपमहाप्रबंधक,
भारतीय स्टेट बैंक
के-8, चेतकपुरी कालोनी,
झांसी रोड, लश्कर,
ग्वालियर – 474 009
मोबाइल क्रमांक – 9987949940

ई-मेल – prahlad.sabnani@gmail.com

बढ़ते कामकाजी जीवन के दबाव में बिखरते परिवार

भाग-दौड़, प्रतिस्पर्धा और आकांक्षाओं से भरे आधुनिक जीवन में परिवार के लिए समय निकालना आज केवल एक भावनात्मक आवश्यकता नहीं, बल्कि सामाजिक अस्तित्व का प्रश्न बनता जा रहा है। वर्ष 2025 की विदाई और 2026 की अगवानी की इस संधि बेला में खड़े होकर जब हम पीछे मुड़कर देखते हैं तो साफ दिखाई देता है कि विकास, तकनीक और कैरियर की दौड़ ने हमें सुविधा तो दी, लेकिन संबंधों की ऊष्मा धीरे-धीरे छीन ली। परिवार, जो सदियों से मनुष्य का सबसे सुरक्षित आश्रय रहा है, आज स्वयं असुरक्षा के दौर से गुजर रहा है। प्रश्न यह नहीं है कि आधुनिकता गलत है, प्रश्न यह है कि क्या आधुनिक जीवन शैली में परिवार व्यवस्था को बचाने की हमारी इच्छाशक्ति और समझ उतनी ही मजबूत है या नहीं?
व्यस्ततम, घटनाबहुल एवं कामकाजी जिंदगी जीने के साथ परिवार के लिए वक्त निकालना आज के इंसान के लिए ज्यादा जरूरी हो गया है। परिवार से यह जुुड़ाव व्यक्ति को न केवल भावनात्मक रूप से, बल्कि शारीरिक व मानसिक स्वास्थ्य के लिहाज से भी खुशनुमा रहने की ताकत देता है। इस सोच के बीच ताजा अध्ययन में आया यह तथ्य सचमुच चौंकाने वाला और चिंताजनक है कि काम के बोझ व परिवार को समय नहीं दे पाने से उपजी परिस्थितियों से निजात पाने के लिए साठ फीसदी से ज्यादा लोग अपनी मौजूदा नौकरी को बदलना चाहते हैं। ग्रेट प्लेस टू वर्क का यह अध्ययन भारत के कामकाजी लोगों के लिए और भी गंभीर है क्योंकि वर्क-लाइफ बैलेंस की ग्लोबल रैंकिंग में हम 42 वें स्थान पर हैं।
आज कामकाजी जीवन का दबाव इतना बढ़ चुका है कि व्यक्ति शारीरिक रूप से घर में मौजूद होते हुए भी मानसिक रूप से दफ्तर में ही रहता है। डिजिटल कनेक्टिविटी ने समय और स्थान की सीमाएं मिटा दी हैं, लेकिन इसी के साथ उसने घर और कार्यस्थल के बीच की स्वाभाविक दीवार भी तोड़ दी है। मोबाइल फोन, लैपटॉप और ऑनलाइन मीटिंग्स ने परिवार के साथ बैठकर बातचीत करने, एक-दूसरे की बात सुनने और महसूस करने के अवसरों को सीमित कर दिया है। विडंबना यह है कि हम परिवार के लिए मेहनत कर रहे हैं, लेकिन उसी मेहनत की कीमत परिवार से दूरी बनाकर चुका रहे हैं।
वर्क फ्रॉम होम की संस्कृति को शुरू में वरदान माना गया था, लेकिन धीरे-धीरे यह भी परिवारिक जीवन के लिए एक नई चुनौती बन गई। घर अब विश्राम और संवाद का स्थान न रहकर कार्यालय का विस्तार बन गया है। बच्चों के सामने माता-पिता लगातार स्क्रीन में उलझे रहते हैं, पति-पत्नी के बीच संवाद की जगह नोटिफिकेशन ले लेते हैं और बुजुर्गों की बातें अक्सर ‘बाद में’ की श्रेणी में डाल दी जाती हैं। ऐसे में परिवार एक साथ रहते हुए भी भीतर से बिखरता चला जाता है। यह बिखराव केवल भावनात्मक नहीं, बल्कि संस्कारों, परंपराओं और आपसी जिम्मेदारियों का भी है।
कॉर्पाेरेट कार्यशैली में बढ़ते लक्ष्य, बढ़ता प्रतिस्पर्धात्मक दबाव और बॉस संस्कृति ने व्यक्ति को लगातार यह एहसास कराया है कि यदि वह रुका तो पीछे रह जाएगा। इस डर ने जीवन की गति को इतना तेज कर दिया है कि ठहराव, आत्मचिंतन और संबंधों के लिए समय निकालना कमजोरी समझा जाने लगा है। जबकि सच यह है कि मजबूत परिवार ही व्यक्ति को मानसिक स्थिरता, आत्मविश्वास और जीवन की कठिनाइयों से जूझने की ताकत देता है। जब यह आधार कमजोर होता है, तो व्यक्ति बाहर से सफल दिखते हुए भी भीतर से टूटने लगता है।
सोशल मीडिया ने इस संकट को और गहरा किया है। एक ही छत के नीचे रहते हुए भी परिवार के सदस्य अलग-अलग आभासी दुनिया में जी रहे हैं। दिखावे की खुशी, तुलना की प्रवृत्ति और निरंतर उपलब्ध रहने का दबाव रिश्तों में असंतोष और तनाव पैदा कर रहा है। हम दूसरों की जिंदगी पर नजर रखने में इतने व्यस्त हो गए हैं कि अपने घर के भीतर चल रही भावनाओं को समझने का समय ही नहीं बचा। यह स्थिति यदि यूं ही चलती रही तो परिवार केवल एक संरचना बनकर रह जाएगा, जिसमें आत्मा का अभाव होगा। ऐसे समय में आदर्श और अनुकरणीय परिवार व्यवस्था की पुनर्स्थापना कोई आसान काम नहीं है, लेकिन असंभव भी नहीं। इसके लिए सबसे पहले हमें यह स्वीकार करना होगा कि करियर और परिवार एक-दूसरे के विरोधी नहीं, बल्कि पूरक हैं। यह सोच बदलनी होगी कि सफलता का पैमाना केवल पद, पैसा और प्रतिष्ठा है। यदि इन सबके बीच परिवार में संवाद, स्नेह और अपनापन नहीं है, तो ऐसी सफलता अधूरी ही नहीं, खोखली भी है। नए वर्ष में हमें यह संकल्प लेना होगा कि हम अपने समय, ऊर्जा और प्राथमिकताओं का पुनर्मूल्यांकन करेंगे।
परिवार को बचाने के लिए किसी बड़े सिद्धांत की नहीं, बल्कि छोटे-छोटे व्यवहारिक बदलावों की जरूरत है। घर में रहते हुए कुछ समय तकनीक से दूरी बनाना, साथ बैठकर भोजन करना, बच्चों और बुजुर्गों की बातों को ध्यान से सुनना और एक-दूसरे की भावनाओं को महत्व देना, ये सब साधारण लगने वाले कदम ही परिवार को फिर से जोड़ सकते हैं। यह समझना जरूरी है कि गुणवत्ता पूर्ण समय केवल घंटों की संख्या से नहीं, बल्कि उस समय में मौजूद संवेदनशीलता और सहभागिता से तय होता है। नई परिवार व्यवस्था का अर्थ यह नहीं कि हम पुरानी परंपराओं को ज्यों का त्यों लौटा लें, बल्कि यह है कि हम आधुनिक जीवन की वास्तविकताओं के बीच संबंधों के मूल्यों को सुरक्षित रखें। जहां दोनों पति-पत्नी कामकाजी हैं, वहां जिम्मेदारियों का संतुलित बंटवारा, आपसी सहयोग और सम्मान परिवार को मजबूत बना सकता है। बच्चों को केवल प्रतिस्पर्धा की दौड़ के लिए तैयार करने के बजाय उन्हें भावनात्मक बुद्धिमत्ता, संवेदनशीलता और रिश्तों की अहमियत सिखाना भी उतना ही जरूरी है। बुजुर्गों को बोझ नहीं, बल्कि अनुभव और संस्कार की धरोहर मानकर सम्मान देना परिवार की आत्मा को जीवित रखता है।
घर पर रहते हुए भी कार्यस्थल से डिजिटल कनेेक्टिविटी ने अलग तरह के तनाव को जन्म दिया है। रही-सही कसर घर से कार्यस्थल की लंबी दूरी पूरी कर देती है जहां व्यक्ति को दिनभर का बड़ा हिस्सा सफर में बिताने की मजबूरी का सामना भी करना पड़ता है। खतरे की बात यह भी है कि दफ्तर में काम का दबाव कई बार व्यक्ति का आत्मविश्वास भी कमजोर कर देता है। यह बात और है कि संस्थानों में काम के घंटे बढ़़ाने का मुद्दा भी हमारे यहां बहस का विषय बनता रहा है। तर्क यह भी दिया जा रहा है कि वैश्विक स्तर पर उत्पादकता बढ़ाने का विकल्प कार्य के घंटे बढ़ाना ही हो सकता है। इसीलिए श्रम कानून में भी काम के घंटे बढ़ाने की छूट दी जा रही है। इसमें दो राय नहीं कि अधिक से अधिक कमाने की चाहत के साथ-साथ कार्यस्थल पर काम का बोझ भी बढ़ा है।यह भी जरूरी है कि संस्थान और समाज दोनों स्तरों पर वर्क-लाइफ बैलेंस को गंभीरता से लिया जाए। केवल कानून बनाना पर्याप्त नहीं, बल्कि कार्यसंस्कृति में मानवीय दृष्टिकोण को शामिल करना होगा। उत्पादकता का अर्थ केवल लंबे काम के घंटे नहीं, बल्कि संतुलित और संतुष्ट कर्मचारी भी है। जब व्यक्ति का पारिवारिक जीवन स्थिर होता है, तभी वह कार्यस्थल पर रचनात्मक और प्रभावी योगदान दे पाता है।
नए वर्ष की दहलीज पर खड़े होकर यह आत्ममंथन जरूरी है कि यदि हमने आज परिवार को प्राथमिकता नहीं दी, तो आने वाली पीढ़ियों को केवल सुविधाएं तो मिलेंगी, लेकिन संबंधों की गर्मी नहीं। परिवार केवल साथ रहने का नाम नहीं, बल्कि साथ महसूस करने की प्रक्रिया है। यदि यह प्रक्रिया टूट गई तो समाज की नींव कमजोर हो जाएगी। इसलिए 2026 की ओर कदम बढ़ाते हुए हमें यह संकल्प लेना होगा कि हम तकनीक का उपयोग जीवन को सरल बनाने के लिए करेंगे, संबंधों को प्रतिस्थापित करने के लिए नहीं। करियर की ऊंचाइयों के साथ-साथ परिवार की जड़ों को भी सींचेंगे, ताकि आधुनिकता और मानवीयता के बीच संतुलन बना रहे। यही संतुलन एक नई, सशक्त और अनुकरणीय परिवार व्यवस्था की नींव रख सकता है, जो बदलते समय में भी रिश्तों की रोशनी को बुझने नहीं देगा।
प्रेषकः
(ललित गर्ग)
लेखक, पत्रकार, स्तंभकार
ई-253, सरस्वती कंुज अपार्टमेंट
25 आई. पी. एक्सटेंशन, पटपड़गंज, दिल्ली-92
फोनः 22727486, 9811051133

उमंग-2025 समारोह में अरावली बचाओ का संदेश दिया

कोटा ।   अकलंक कॉलेज ऑफ एजुकेशन में हाल ही में ‘उमंग-2025’ समारोह हर्षोल्लास  के साथ सम्पन्न हुआ। कार्यक्रम में प्रशिक्षणार्थी विद्यार्थियों ने आत्मविश्वास के साथ अपनी सृजनात्मकता का प्रदर्शन करते हुए अरावली बचाओ का संदेश दिया। कार्यक्रम प्रभारी डॉ. इंदु बाला शर्मा ने बताया कि डॉ. रंजना गुप्ता द्वारा धूम्रपान छोड़ो, सपनों को साकार करो थीम पर रंगोली प्रतियोगित एवं रंगारंग सांस्कृतिक प्रस्तुतियों के साथ प्रकृति थीम पर आधारित रैंप वॉक का आयोजन भी किया गया।  समापन कार्यक्रम का शुभारंभ विद्यालय एसोसिएशन के अध्यक्ष  पीयूष बज, उपाध्यक्ष  ऐश्वर्य जैन,  प्राचार्या डॉ. पिंकी श्रीवास्तव, उप-प्राचार्या श्रीमती नम्रता जैन, निदेशिका डॉ.संस्कृति जैन, संयोजक डॉ. किरण गुप्ता एवं डॉ. मिशा शर्मा द्वारा माँ वागेश्वरी के समक्ष दीप प्रज्वलित कर किया गया।
प्राचार्या ने अतिथियों का स्वागत करते हुए कार्यक्रम के उद्देश्य बताए।  अध्यक्ष  पीयूष बज एवं उपाध्यक्ष श्री ऐश्वर्य जैन ने अपने-अपने उद्बोधन में विद्यार्थियों के उत्कृष्ट प्रदर्शन की सराहना करते हुए समस्त स्टाफ सदस्यों के प्रयासों की प्रशंसा की तथा विद्यार्थियों के सर्वांगीण विकास एवं प्रतिभा निखार हेतु भविष्य में भी इस प्रकार के कार्यक्रमों के आयोजन के लिए प्रोत्साहित किया।
सचिव  अनिमेष जैन एवं कोषाध्यक्ष कपिल जैन ने कहा स्टूडेंट इस जोश एवं उत्साह को निजी जीवन में भी बनाए रखें तथा विपरीत परिस्थितियों में भी अपनी उमंग और सकारात्मकता को कम न होने दें।
रैंप वॉक में  पारोमिता मंडल ने ‘मिस अकलंक’ एवं रघुनंदन मीणा ने ‘मिस्टर अकलंक’ का खिताब प्राप्त किया। साथ ही ‘बेस्ट थीम ऑफ द डे (गर्ल)’ का खिताब अदिति गौतम, ‘बेस्ट थीम ऑफ द डे (बॉय)’ प्रियांशु, ‘मिस कॉन्फिडेंस’ कृति, ‘मिस्टर कॉन्फिडेंस’ विशाल, ‘मिस क्रिएटिव’ लक्षिता चतुर्वेदी, ‘मिस्टर क्रिएटिव’ अतुल वर्मा, ‘मिस स्माइल’ आलिया फातिमा तथा ‘मिस्टर स्माइल’ का खिताब प्रिन्स ने अपने नाम किया। सरकारी सेवाओं में चयनित महाविद्यालय के पूर्व प्रशिक्षणार्थियों को ‘स्टार अचीवर सम्मान’ से सम्मानित किया गया।
उप-प्राचार्या ने धन्यवाद दिया। मंच संचालन  खुशबू जोशी, कांची पाटनी, महक पचेरिया, खुशी जायसवाल, आलिया फातिमा एवं निहारिका शर्मा ने संयुक्त रूप से किया।
 उमंग-2025 में एकल एवं सामूहिक नृत्य तथा गायन, मेहंदी एवं आशु भाषण, कविता एवं वाद-विवाद प्रतियोगिता का आयोजन हुआ।  डॉ. सुनयना गंगेले द्वारा फाइल फोल्डर मेकिंग प्रतियोगिता का आयोजन किया गया।
रंगोली प्रतियोगिता में प्रथम स्थान खुशी जायसवाल एवं सीमा रावत तथा द्वितीय स्थान सोनम नागर एवं वर्षा कंवर ने प्राप्त किया। फाइल फोल्डर मेकिंग प्रतियोगिता में प्रथम स्थान मेघा वर्मा , द्वितीय स्थान अश्विनी कुमार  एवं तृतीय स्थान लक्ष्मी मीणा  ने प्राप्त किया।
 कार्ड मेकिंग प्रतियोगिता में हिमांशी आर्य ने प्रथम स्थान, लक्षिता चतुर्वेदी ने द्वितीय तथा पायल पंवार एवं अदिति गौतम ने तृतीय स्थान प्राप्त किया। बेस्ट आउट ऑफ वेस्ट प्रतियोगिता में प्रथम रक्षित प्रजापति, द्वितीय  भावना शर्मा एवं प्रिया मीणा  तथा तृतीय स्थान पायल पंवार रही। प्रभारी ने बताया कि साहित्यिक प्रतियोगिताएं मिशन बाल मन से प्रेरित हो कर आयोजित की गई हैं।