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गुजरात में 150 से ज्यादा एसटी परिवारों ने ईसाइयत को त्यागा, हिंदू धर्म में की घर वापसी की

गुजरात के नर्मदा जिले के देदियापाड़ा क्षेत्र में हिंदू संगठनों और संतों द्वारा आयोजित एक विशेष ‘घर वापसी’ कार्यक्रम में 150 से अधिक जनजातीय लोग ईसाई मजहब छोड़कर सनातन हिंदू धर्म में लौट आए। ये सभी जनजातीय लोग पहले ईसाई मजहब अपना चुके थे, लेकिन अब स्वेच्छा से हिंदू धर्म की औपचारिक विधियों के साथ वापसी कर ली है।

इस कार्यक्रम का आयोजन राष्ट्रीय आदिवासी जागरण मंच और अन्य हिंदू संगठनों ने मिलकर किया। संगठनों का कहना है कि जनजातीय समुदाय की मूल संस्कृति और पहचान को बचाने के लिए ऐसे आयोजन जरूरी हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि गरीब जनजातीय परिवारों को विभिन्न प्रलोभनों जैसे पैसा, नौकरी या इलाज का लालच देकर ईसाई मजहब में परिवर्तित किया जा रहा है।

राष्ट्रीय धर्म जागरण मंच के मंत्री सोनजीभाई वासावा ने कहा कि क्रिश्चियन मिशनरी जनजातीय लोगों का धर्मांतरण कर रहे हैं। कई जनजातीय लोगों ने भी ठगे जाने की भावना व्यक्त की।

घर वापसी करने वाले जनजातीय लोगों ने बताया कि वे अपनी जड़ों की ओर लौटकर खुश हैं और अब हिंदू रीति-रिवाजों का पालन करेंगे। संतों और संगठनों ने फैसला लिया है कि भविष्य में भी ऐसे ‘घर वापसी’ कार्यक्रम जारी रहेंगे ताकि जनजातीय और सनातन संस्कृति संरक्षित रहे।

इसी बीच, भाजपा नेता मनसुख वसावा ने भी कहा कि वे जमीनी स्तर पर रहकर हिंदुत्व के लिए काम कर रहे हैं। यह आयोजन जनजातीय बहुल क्षेत्र में धर्मांतरण के मुद्दे को फिर से उजागर करता है, जहाँ हिंदू संगठन सक्रिय रूप से जागरूकता अभियान चला रहे हैं।

अवीवा बेग बनेगी प्रियंका गाँधी की बहू

कॉन्ग्रेस सांसद प्रियंका गाँधी वाड्रा और बिजनेसमैन रॉबर्ट वाड्रा के बेटे रेहान वाड्रा ने अपनी गर्लफ्रेंड अवीवा बेग के साथ सगाई कर ली है। अवीवा बेग व्यवसायी इमरान बेग और इंटीरियर डिजाइनर नंदिता बेग की बेटी हैं। रेहान और अवीवा की स्कूलिंग साथ हुई है और दोनों कई वर्षों से एक-दूसरे को जानते हैं।

परिवार के सदस्यों ने रेहान और अवीवा की सगाई की पुष्टि की है। अवीवा बेग और उनका परिवार दिल्ली का रहने वाला है और दोनों परिवार भी एक दूसरे के करीब हैं। रिपोर्ट्स के मुताबिक, नंदिता बेग ने कॉन्ग्रेस मुख्यालय ‘इंदिरा भवन’ की इंटीरियर डिजाइनिंग में प्रियंका गाँधी की मदद की थी। जल्द ही दोनों परिवार मिलकर शादी की तारीख तय करेंगे।

अवीवा एक फोटोग्राफर हैं और ‘एटेलियर 11’ की को-फाउंडर हैं। यह फोटोग्राफी स्टूडियो और प्रोडक्शन हाउस है जिसके कई ऐड और शॉर्ट फिल्में बनाई हैं। कभी राष्ट्रीय स्तर की फुटबॉल खिलाड़ी रहीं अवीवा की शुरुआती पढ़ाई दिल्ली के मॉडर्न स्कूल से की और फिर ओपी जिंदल ग्लोबल यूनिवर्सिटी से मीडिया कम्युनिकेशन ऐंड जर्नलिज्म में डिग्री हासिल की है।

नये वर्ष में अनुत्तरित सवालों के जबावों की तलाश

एक और वर्ष इतिहास के पन्नों में दर्ज हो चुका है। वर्ष 2025 केवल कैलेंडर का एक अंक नहीं था, बल्कि वह घटनाओं, चेतावनियों, उपलब्धियों और विडंबनाओं का ऐसा संगम रहा, जिसने समाज, राजनीति और विकास की हमारी समूची अवधारणाओं को कठघरे में खड़ा किया। नये वर्ष में प्रवेश करते समय यह केवल उल्लास, संकल्प और शुभकामनाओं का क्षण नहीं है, बल्कि गहरे आत्ममंथन का अवसर भी है। सवाल यह नहीं कि नया साल हमें क्या देगा, सवाल यह है कि बीते वर्ष ने हमें क्या सिखाया और हम उन सीखों को अपने जीवन, नीतियों और प्राथमिकताओं में कितना उतार पाए। हर नया वर्ष अपने साथ उम्मीदों की नई रोशनी लेकर आता है, लेकिन वह बीते वर्ष की छायाओं से मुक्त नहीं होता। उन छायाओं को समझना और उनसे सबक लेना ही नये वर्ष की सच्ची शुरुआत है।
वर्ष 2025 की ओर दृष्टि डालें तो यह स्पष्ट होता है कि भारत और विश्व दोनों स्तरों पर विकास और संकट साथ-साथ चले। एक ओर भारत ने डिजिटल अर्थव्यवस्था, अंतरिक्ष विज्ञान, बुनियादी ढांचे और वैश्विक मंच पर अपनी उपस्थिति को मजबूत किया, वहीं दूसरी ओर पहलगाम की आतंकी घटना, पर्यावरणीय आपदाएं, महंगाई, बेरोज़गारी, शिक्षा और चिकित्सा की बढ़ती लागत, सामाजिक विषमता और राजनीतिक अविश्वास जैसे प्रश्न और भी गहरे होते चले गए। ये वे अनुत्तरित सवाल हैं, जिनके समाधान के बिना नये भारत और सशक्त भारत की संकल्पना अधूरी ही रहेगी। जाते हुए वर्ष के आंकडों एवं घटनाओं ने यह स्पष्ट कर दिया कि केवल आर्थिक आंकड़ों की चमक से किसी राष्ट्र की वास्तविक स्थिति नहीं आंकी जा सकती, उसके लिए आम जनजीवन की सच्चाइयों को समझना जरूरी है।
पहलगाम की आतंकी घटना ने एक बार फिर आतंकवाद के भयावह चेहरे को उजागर किया, लेकिन उसके बाद ऑपरेशन सिंदूर की सफलता ने यह स्पष्ट कर दिया कि भारत अब केवल पीड़ित नहीं, बल्कि निर्णायक और साहसी प्रतिकार करने वाला राष्ट्र है। इस सटीक कार्रवाई ने पाकिस्तान-प्रायोजित आतंकवाद की पोल खोलते हुए दुनिया को यह संदेश दिया कि भारत अपनी सुरक्षा, संप्रभुता और नागरिकों के जीवन के साथ कोई समझौता नहीं करेगा। आतंक के विरुद्ध भारत की यह नीति-न तो उकसावे में आना, न ही चुप रहना, एक परिपक्व, सक्षम और आत्मविश्वासी राष्ट्र की पहचान बन चुकी है, जिसने सीमा पार बैठे आतंकी संरक्षकों को गहरा और ठोस जवाब दिया है।
इसी परिप्रेक्ष्य में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की विदेश यात्राएं और उनकी वैश्विक नेतृत्व-छवि भारत के उभार को नई ऊंचाइयों तक ले जाती दिखती हैं। कूटनीति, निवेश, तकनीक और आपूर्ति-श्रृंखलाओं में भारत की भूमिका सुदृढ़ हुई है, जिससे देश के भीतर विश्वास और आशाओं का संचार हुआ है। स्थिर शासन, सुधारों की निरंतरता और वैश्विक साझेदारियों के बल पर भारत का तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था की ओर बढ़ना अब एक दूर का स्वप्न नहीं, बल्कि साकार होता परिदृश्य प्रतीत होता है। आतंकवाद के विरुद्ध कठोर रुख, नक्सलवादमुक्त भारत और अर्थव्यवस्था में आत्मनिर्भर, नवोन्मेषी गति-इन तीनों ने मिलकर भारत को विश्व मंच पर निर्णायक शक्ति के रूप में स्थापित किया है।
पर्यावरण वर्ष 2025 की सबसे बड़ी चेतावनी बनकर सामने आया। जलवायु परिवर्तन अब केवल वैज्ञानिक रिपोर्टों या अंतरराष्ट्रीय सम्मेलनों का विषय नहीं रहा, बल्कि वह आम आदमी के जीवन का कठोर यथार्थ बन चुका है। हिमालयी क्षेत्रों में भूस्खलन, उत्तर भारत में रिकॉर्ड तोड़ गर्मी, महानगरों में दमघोंटू प्रदूषण और तटीय इलाकों में चक्रवातों की बढ़ती तीव्रता-ये सभी घटनाएं एक ही संकट की अलग-अलग अभिव्यक्तियां हैं। हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, केरल, पूर्वाेत्तर और अन्य राज्यों में आई प्राकृतिक आपदाओं ने यह दिखा दिया कि प्रकृति से खिलवाड़ का मूल्य सबसे पहले गरीब और वंचित चुकाते हैं। विकास की अंधी दौड़ में जब पहाड़ों को काटा जाता है, नदियों को बांधा जाता है और जंगलों को उजाड़ा जाता है, तो उसका परिणाम विनाश के रूप में सामने आता है। नये वर्ष में यह सवाल हमारे सामने खड़ा है कि क्या विकास का अर्थ केवल सड़कें, पुल, सुरंगें और ऊंची इमारतें है, या वह जीवन, प्रकृति और भविष्य की सुरक्षा से भी जुड़ा हुआ है। जब तक पर्यावरणीय संतुलन को विकास नीति के केंद्र में नहीं रखा जाएगा, तब तक हर नया साल नई आपदाओं की आहट लेकर आता रहेगा। वर्ष 2025 ने हमें यह सोचने को विवश किया है कि प्रकृति के साथ सामंजस्य ही स्थायी विकास का एकमात्र रास्ता है।
प्रदूषण और स्वास्थ्य का संकट भी 2025 में और अधिक गहराया। दिल्ली-एनसीआर सहित अनेक शहरों की हवा लंबे समय तक ‘गंभीर’ श्रेणी में बनी रही। यह केवल प्रदूषण के आंकड़े नहीं थे, बल्कि करोड़ों लोगों के स्वास्थ्य पर मंडराता खतरा था। जल प्रदूषण, प्लास्टिक कचरे और रासायनिक अपशिष्ट ने गांवों और कस्बों को भी अपनी चपेट में ले लिया। सवाल यह है कि क्या आर्थिक विकास के नाम पर हम अपने ही जीवन स्रोतों को नष्ट करने के लिए तैयार हैं। नया वर्ष यह सोचने की प्रेरणा देता है कि स्वास्थ्य केवल अस्पतालों और दवाओं तक सीमित विषय नहीं है, बल्कि स्वच्छ हवा, शुद्ध जल और सुरक्षित पर्यावरण उसका मूल आधार हैं।
शिक्षा के क्षेत्र में 2025 ने कई कड़वी सच्चाइयों को उजागर किया। विदेशों में पढ़ाई लगातार महंगी होती गई और देश के भीतर निजी शिक्षा संस्थानों की फीस मध्यम वर्ग की पहुंच से भी बाहर होती चली गई। शिक्षा का बढ़ता बाज़ारीकरण गरीबी के दुष्चक्र को और मजबूत कर रहा है। गरीब का बच्चा शिक्षा से वंचित रहता है और अशिक्षा उसे फिर उसी गरीबी में धकेल देती है। बस अड्डों, रेलवे स्टेशनों, चौराहों और कारखानों में काम करते बच्चों की तस्वीरें विकास के दावों पर प्रश्नचिह्न लगाती हैं। नया वर्ष यह गंभीर सवाल सामने रखता है कि क्या शिक्षा अधिकार है या विशेषाधिकार। यदि शिक्षा वास्तव में राष्ट्र-निर्माण की आधारशिला है, तो उसे बाजार की वस्तु क्यों बना दिया गया है। चिकित्सा व्यवस्था भी 2025 में आम आदमी की सबसे बड़ी चिंता बनी रही। सरकारी योजनाओं और दावों के बावजूद गंभीर बीमारी आज भी आर्थिक तबाही का कारण बन जाती है। निजी अस्पतालों की मनमानी, महंगी जांचें और दवाइयों की बढ़ती कीमतें यह प्रश्न खड़ा करती हैं कि क्या जीवन भी अब खरीदने-बेचने की वस्तु बन गया है। नया साल यह मांग करता है कि स्वास्थ्य को सेवा के रूप में पुनर्परिभाषित किया जाए, न कि मुनाफे के साधन के रूप में। महामारी और आपदाओं के अनुभव यह सिखाते हैं कि मजबूत सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणाली ही किसी भी राष्ट्र की वास्तविक शक्ति होती है।
भ्रष्टाचार और राजनीति का संकट भी 2025 में लगातार चर्चा का विषय बना रहा। आरोप-प्रत्यारोप, घोटालों की खबरें और राजनीतिक कटुता ने लोकतंत्र के प्रति आमजन के विश्वास को कमजोर किया। लोकतंत्र केवल चुनाव जीतने का नाम नहीं है, बल्कि वह जनविश्वास, पारदर्शिता और जवाबदेही की निरंतर परीक्षा भी है। जब जनता को यह महसूस होता है कि नीतियां उसके हितों के बजाय कुछ चुनिंदा वर्गों के लिए बन रही हैं, तो असंतोष और निराशा जन्म लेती है। नया वर्ष यह सवाल उठाता है कि क्या राजनीति सेवा का माध्यम बनेगी या केवल सत्ता का साधन बनी रहेगी। वर्ष 2025 ने हमें यह सिखाया कि चुनौतियां केवल समस्याएं नहीं होतीं, वे भविष्य की दिशा भी तय करती हैं। पर्यावरण संकट हमें टिकाऊ विकास की ओर बुलाता है, शिक्षा और स्वास्थ्य की चुनौतियां हमें मानवीय मूल्यों की याद दिलाती हैं और गरीबी व भ्रष्टाचार हमें सामाजिक न्याय की अनिवार्यता समझाते हैं। नये वर्ष की नाव इन्हीं अनुभवों और सबकों के सहारे आगे बढ़ सकती है। यदि हम विकास को प्रकृति-संवेदनशील बनाएं, शिक्षा और चिकित्सा को लोककल्याण का आधार मानें, राजनीति में नैतिकता और प्रशासन में पारदर्शिता स्थापित करें और गरीबी उन्मूलन को केवल आंकड़ों में नहीं, बल्कि जीवन की वास्तविकता में उतारें, तो नये वर्ष का स्वागत सार्थक होगा।
नया साल कोई जादुई समाधान नहीं लाता, वह केवल एक अवसर देता है-अपने अनुत्तरित सवालों से ईमानदारी से जूझने का। यदि हम 2025 की घटनाओं से प्रेरणा लेकर 2026 में सही प्रश्न पूछने का साहस कर पाएं, तो उनके उत्तर स्वतः रास्ता बना लेंगे। यही नये वर्ष की सच्ची कामना, संकल्प और सबसे बड़ी उपलब्धि हो सकती >
प्रेषकः
(ललित गर्ग)
लेखक, पत्रकार, स्तंभकार
ई-253, सरस्वती कंुज अपार्टमेंट
25 आई. पी. एक्सटेंशन, पटपड़गंज, दिल्ली-92
फोनः 22727486, 9811051133

हिन्दू सम्मेलन भारतीय समाज में दे रहे हैं समरसता के भाव को मजबूती

27 सितम्बर 1925 को विजयादशमी के पावन दिवस पर, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना जिन मुख्य उद्देश्यों को लेकर हुई थी, उनमें भारतीय समाज में एकता, सद्भावना एवं समरसता का भाव मजबूत करना एवं भारतीय नागरिकों के बीच सनातन संस्कृति के संस्कारों के अनुपालन को बढ़ावा देना भी शामिल हैं। भारतवर्ष में धर्म का अनुसरण करते हुए, अपने जीवन में प्रत्यक्ष रूप से धार्मिक संस्कारों का आचरण करने वाली तपस्वी, त्यागी एवं ज्ञानी विभूतियां एक अखंड परम्परा के रूप में अवतरित होती आई हैं। इन्हीं महान विभूतियों के चलते ही भारत की एक राष्ट्र के रूप में वास्तविक रक्षा हुई है। अतः हम भारतीय नागरिकों को यह भली भांति समझना होगा कि भारतीय समाज को समर्थ, धर्मनिष्ठ, प्रतिष्ठित बनाने में हम तभी सफल हो सकेंगे जब हम भारत की प्राचीन परम्परा को युगानुकूल बनाकर एक बार पुनः इसे पुनर्जीवित करेंगे।

आज राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने अपनी स्थापना के 100 वर्ष पूर्ण कर लिए हैं और यदि हम संघ की 100 वर्षों की यात्रा पर दृष्टि डालें, तो ध्यान में आता है कि संघ के स्वयसेवकों ने जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में विचार और क्रियाशीलता के स्तर पर सक्रिय योगदान दिया है। वे अनेक क्षेत्रों में परिवर्तन के वाहक भी बने हैं। प्रारम्भ का सीमित संघ कार्य, समय के साथ व्यापक होता गया है। समाज की विभिन्न आवश्यकताओं को समझते हुए स्वयंसेवक विविध आयामों में अपने सहयोगियों के साथ क्रियाशील बने हैं।

परिणामतः संघ के उद्देश्य के अनुरूप, देश में हिंदुत्व का जागरण करने की दिशा में विशेष प्रगति हुई है। हिंदुत्व के जागरण से, समाज में जाति, वर्ग, भाषा इत्यादि के आधार पर होने वाले अनेक प्रकार के भेदभाव, धीरे धीरे कम होने लगे हैं। श्रीराम जन्मभूमि मुक्ति आंदोलन, अयोध्या मंदिर में श्रीरामलला की प्राण प्रतिष्ठा, कुम्भ जैसे विराट आयोजन इत्यादि अनेक ऐसे अवसर आए हैं – जहां हिंदू समाज का एक संगठित, भव्य और उच्च आदर्शों से युक्त स्वरूप सामने आया है। यह दृश्य समाज में आत्मविश्वास जगाने वाला बन रहा है। हम सब मिलकर देश के भविष्य को उज्जवल एवं सुदृढ़ बना सकते हैं और आने वाली पीढ़ियों के लिए एक सकारात्मक वातावरण निर्मित कर सकते हैं। इसलिए ये हमारी राष्ट्रीय एकात्मता को सुदृढ़ करने वाले आयोजन सिद्ध हुए हैं। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के 100 वर्ष केवल इतिहास की उपलब्धियां नहीं है, बल्कि भविष्य की दिशा का संकल्प हैं।

आज, जब हम राष्ट्रीयस्वयं संघ की 100 वर्षों की इस यात्रा को देखते हैं, तो यह भी स्पष्ट होता है कि हिंदुत्व और इसकी परम्पराओं पर लोगों का विश्वास बढ़ा है। समाज के अनेक लोग इस तथ्य को स्वीकार कर रहे हैं और इसका अनुभव भी कर रहे हैं। हिंदुत्व की इस जागृति के कारण लोग अब हिंदू होने में गर्व का अनुभव कर रहे हैं। एक समय था जब सार्वजनिक जीवन में हिंदू समाज की कमियों को ही उजागर किया जाता था, जिससे अनेक लोग हिंदुत्व की अच्छाईयों को पहचान नहीं पाए, किंतु अब स्थिति बदल रही है। लोग अपने पूर्वजों के धर्म और परम्पराओं को महत्व देने लगे हैं। वे अपने बच्चों के नामकरण से लेकर विवाह पद्धति तक में हिंदू संस्कारों का समावेश कर रहे हैं। घर की परम्पराओं को आदरपूर्वक अपनाया जा रहा है।

इस सम्पूर्ण प्रक्रिया का उद्देश्य है – एक सच्चरित्र, प्रामाणिक और संस्कारवान पीढ़ी का निर्माण करना। ऐसी पीढ़ी समाज का वातावरण सुधार कर घर और समाज में सुख शांति स्थापित कर सकती है। इसलिए, इन मूल्यों और संस्कारों को महत्व देने और उन्हें अपने जीवन में उतारने के प्रयास आज घर घर में होने लगा हैं। लोग अब ऐसे सभी मंचों और माध्यमों से जुड़ने के लिए प्रयत्नशील हैं जो इस दिशा में मार्गदर्शन प्रदान करते हैं। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को भी लोग इस दृष्टि से एक महत्वपूर्ण माध्यम मानते हैं और विश्वासपूर्वक राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़ने का उत्साह दिखा रहे हैं। जैसे जैसे हिंदुत्व पर विश्वास बढ़ रहा है, वैसे वैसे भारत के प्रति श्रद्धा और विश्वास, व्यापक और गहरा हो रहा है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का मानना है कि “वसुधैव कुटुंबकम्” के आदर्श पर चलकर भारत न केवल अपने समाज को सशक्त करेगा, बल्कि पूरी दुनिया को शांति, सद्भाव और सहयोग का संदेश देकर विश्वगुरु की भूमिका निभाएगा।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ द्वारा अपनी स्थापना के समय लिए गए संकल्पों को शीघ्र ही पूर्ण करने के उद्देश्य से अपने इस शताब्दी वर्ष में कुछ विशेष कार्यक्रमों के माध्यम से भारतीय समाज को अपने नागरिक कर्तव्यों के प्रति सजग करने, पर्यावरण के प्रति सचेत करने, नागरिकों में स्व के भाव को जगाने एवं स्वदेशी उत्पादों के उपयोग को बढ़ावा देने, कुटुम्ब प्रबोधन के माध्यम से पारिवारिक भावना जागृत करने एवं समाज में समरसता के भाव को सुदृद्ध करने के लिए गम्भीर प्रयास किए जा रहे हैं। वर्ष 2025 में विजयादशमी के पावन दिवस पर पूरे देश में संघ की समस्त शाखाओं (देश भर में संघ की 83,000 से अधिक शाखाएं चल रही हैं) के स्वयसेवकों द्वारा गणवेश में बस्ती स्तर पर, 2 अक्टोबर से 12 अक्टोबर 2025 की बीच, विशाल पथ संचालनों का आयोजन कर शताब्दी वर्ष के कार्यक्रमों का शुभारम्भ किया गया था।

देश भर में आयोजित किए गए इन पथ संचलनों को समाज का भरपूर स्नेह प्राप्त हुआ था। दूसरे कार्यक्रम के रूप में संघ के स्वयसेवकों द्वारा अपनी बस्ती एवं मौहल्लों में हिंदू समाज के परिवारों के बीच, 15 नवम्बर से 30 नवम्बर 2025 की बीच, व्यापक गृह सम्पर्क अभियान को सफलता पूर्वक सम्पन्न किया गया है। अब तीसरे कार्यक्रम के रूप में पूरे देश में एक लाख से अधिक हिंदू सम्मेलनों का आयोजन, 20 दिसम्बर 2025 से 20 जनवरी 2026 के बीच, किया जा रहा है। हिंदू सम्मेलनों का आयोजन संघ द्वारा नहीं बल्कि सकल हिंदू समाज द्वारा बस्ती स्तर पर हो रहा है। अभी तक देश भर में सकल हिन्दू समाज द्वारा आयोजित किए गए हिंदू सम्मेलनों में भारतीय नागरिकों द्वारा भारी संख्या में भागीदारी देखने में आई हैं। विशेष रूप से ग्रामीण इलाकों में मंडल स्तर पर आयोजित किए जा रहे इन विराट हिंदू सम्मेलनों में ग्रामीण नागरिकों की भारी मात्रा में उत्साहपूर्वक भागीदारी दिखाई दी है।

उक्त हिन्दू सम्मेलनों में न केवल मातृशक्ति सहित सकल हिन्दू समाज की उत्साहपूर्वक भागीदारी हो रही है बल्कि साधु एवं सन्त महात्माओं द्वारा भी खुले हृदय से आशीर्वचन प्रदान किए जा रहे हैं। कुल मिलाकर इन हिन्दू सम्मेलनों की सकल हिन्दू समाज द्वारा भूरि भूरि प्रशंसा की जा रही है। इन सम्मेलनों का आयोजन दरअसल सकल हिन्दू समाज के विभिन्न वर्गों द्वारा मिलकर किया जा रहा है जिससे समाज के समस्त अंगों में आपस में भाईचारा पुष्ट हो रहा है। छोटे छोटे आपसी मतभेद समाप्त हो रहे हैं एवं विशेष रूप से युवा नागरिकों को हिंदू सनातन संस्कृति के संस्कारों से अवगत होने का सौभाग्य प्राप्त हो रहा है। इन हिन्दू सम्मेलनों के आयोजन का उद्देश्य भी सनातन संस्कृति, सनातन धर्म और सामाजिक एकता को सुदृढ़ करना है, जिसकी प्राप्ति होती हुई दिख रही है।

आज हिंदुत्व यदि सशक्त होता है तो यह न केवल भारत के लिए बल्कि पूरे विश्व के हित में होगा क्योंकि आज विश्व के विभिन्न देशों में फैली अशांति को दूर करने में केवल सनातन हिंदू संस्कृति ही सक्षम दिखाई दे रही है और इस विषय को विभिन्न देशों में फैले भारतीय मूल के नागरिकों के माध्यम से विकसित एवं अन्य देशों के नागरिक भलीभांति समझने लगे हैं क्योंकि इन देशों में निवासरत भारतीय मूल के नागरिक सनातन हिंदू संस्कृति के संस्कारों का अनुपालन करते हुए दिखाई देते हैं जिनमें “वसुधैव कुटुम्बकम” का भाव दिखाई देता है। इन देशों में समस्त भारतीय मूल के नागरिक शांतिपूर्वक अपना जीवन यापन करते हैं एवं वहां की स्थानीय अर्थव्यवस्था में अपना सशक्त योगदान देते हुए दिखाई देते हैं। और फिर, भारत के भी आज विश्व के लगभग समस्त देशों के साथ दोस्ताना सम्बंध हैं, भारत ने कभी भी किसी देश की जमीन पर कब्जा करने के उद्देश्य से किसी देश के साथ युद्ध नहीं किया है। भारत सदैव से ही “जियो और जीने दो” के सिद्धांत का अनुपालन करता आया है। बल्कि, विश्व के अन्य देशों के नागरिक, जैसे, शक, हूण, कुषाण, पारसी, यहूदी, ईसाई एवं मुस्लिम भी भारत आकर आसानी से यहां रच बस गए हैं। आज पूरे विश्व में भारत ही एक ऐसा देश है जिसमें मुस्लिम समाज के समस्त फिर्के पाए जाते हैं।

संघ की दृष्टि बहुत स्पष्ट है कि सम्पूर्ण भारत की पहचान जिससे है, उस आध्यात्म आधारित एकात्म और सर्वांगीण जीवन दृष्टि को दुनिया हिंदुत्व अथवा हिंदू जीवन दृष्टि के नाते जानती है, उस हिंदुत्व को जगाकर सम्पूर्ण समाज को एक सूत्र में जोड़कर निर्दोष और गुणवान हिंदू समाज के संगठन का यह कार्य जो वर्ष 1925 में प्रारम्भ हुआ वह आज भी निरन्तर जारी है और आगे भी जारी रहे। सकल हिंदू समाज द्वारा आयोजित किए जा रहे हिन्दू सम्मेलन भी उक्त दृष्टि को ही साकार करते हुए दिखाई दे रहे हैं।

प्रहलाद सबनानी
सेवानिवृत्त उपमहाप्रबंधक,
भारतीय स्टेट बैंक
के-8, चेतकपुरी कालोनी,
झांसी रोड, लश्कर,
ग्वालियर – 474 009
मोबाइल क्रमांक – 9987949940
ई-मेल – prahlad.sabnani@gmail.com

चंबल की गोद में बसा आस्था और प्रकृति का अद्भुत संगम स्थल : मेंढ़कीपाल महादेव गुफा

चित्तौड़गढ  के पास चंबल नदी की सुरम्य घाटी का प्रायः हर दृश्य मन को मोह लेने वाला है, किंतु कुछ स्थान ऐसे होते हैं जो अपनी अनूठी भौगोलिक बनावट, आध्यात्मिक ऊर्जा और प्राकृतिक रमणीयता के कारण रोमांच और आत्मिक शांति—दोनों का अनुभव कराते हैं। ऐसा ही एक विलक्षण और मनोहारी स्थल है रावतभाटा के निकट स्थित मेंढ़कीपाल महादेव गुफा।
प्रकृति की गोद में बसा अलौकिक परिसर चंबल की गोद में स्थित यह स्थान चारों ओर से घने जंगलों, ऊँचे पहाड़ों, नदियों, खाड़ियों, जलधाराओं और हरियाली से घिरा हुआ है। कहीं पानी के धौरे बहते हैं तो कहीं खेत-खलिहान और बाग-बगीचे ग्रामीण जीवन की सादगी को दर्शाते हैं। दूर-दूर तक फैली भैंसरोड़गढ़ की रियासतकालीन विरासत और शांत, सरल ग्रामीण जनजीवन इस क्षेत्र को एक विशेष पहचान प्रदान करता है।
राजस्थान के चित्तौड़गढ़ जिले की रावतभाटा तहसील में स्थित यह गुफा मंदिर रावतभाटा शहर से लगभग 15 किलोमीटर दूर, बालापुरा गाँव के समीप एक विशाल पहाड़ी के मध्य अवस्थित है। गुफा तक पहुँचने के लिए पहाड़ी क्षेत्र में लगभग 500 मीटर का दुर्गम और रोमांचकारी पैदल मार्ग तय करना पड़ता है, जो श्रद्धालुओं और प्रकृति-प्रेमियों के लिए एक अलग ही अनुभव प्रदान करता है।
मानसून के दौरान यह क्षेत्र अपने सबसे मनोहारी रूप में दिखाई देता है। जगह-जगह बहते नाले, जलधाराएँ, पहाड़ी झरने और हरियाली से आच्छादित ढलानें इस स्थल को स्वर्गीय आभा प्रदान करती हैं। हालांकि वर्षा ऋतु में पहाड़ी रास्ता चुनौतीपूर्ण हो जाता है, परंतु वही चुनौती इस यात्रा को रोमांच से भर देती है।
इस गुफा में भगवान शिव का प्राकृतिक रूप से स्थापित अथवा खोजा गया शिवलिंग विराजमान है, जिसे स्थानीय श्रद्धालु मेंढ़की महादेव या मेंढ़कीपाल महादेव के नाम से पूजते हैं। विशेष रूप से सोमवार को यहाँ भक्तों की संख्या बढ़ जाती है।
सावन मास में यहाँ विशेष पूजा-अर्चना होती है तथा लड्डू, बाटी-चूरमा जैसी पारंपरिक गोठ (भोग) का आयोजन किया जाता है।
गुफा पहाड़ी के मध्य स्थित है, जहाँ से नीचे दृष्टि डालने पर चट्टानों, हरियाली और घाटियों का विहंगम दृश्य दिखाई देता है। यहाँ से चंबल नदी भैंसरोड़गढ़ पुलिया तक स्पष्ट दिखाई देती है। यह दृश्य ऐसा है जिसे शब्दों में बाँध पाना कठिन है—इसे केवल महसूस किया जा सकता है।
मानसून में गुफा के नीचे बहती जलधाराएँ, झरने और चारों ओर फैली हरियाली एक आलौकिक वातावरण रच देती हैं। भंवरों की गूंज, रंग-बिरंगी तितलियों की उड़ान, कीट-पतंगों की हलचल, झींगुरों की स्वर-लहरी और दादुरों का सामूहिक गान—ऐसा प्रतीत होता है मानो प्रकृति स्वयं उत्सव मना रही हो।
सड़क और कच्चे रास्तों के अतिरिक्त, आसपास के ग्रामीण श्रद्धालुओं को नाव द्वारा गुफा के नीचे तक भी लाते हैं, विशेषकर बरसात के मौसम में। यह यात्रा इस स्थल को और भी यादगार बना देती है।
स्थानीय मान्यताओं के अनुसार यह स्थल अत्यंत प्राचीन और पौराणिक आस्था से जुड़ा हुआ है। रियासतकाल में भी यहाँ राजपरिवारों द्वारा पूजा-अर्चना की परंपरा रही है, जो इस स्थान के ऐतिहासिक महत्व को दर्शाती है। अछूती प्रकृति का संरक्षण यद्यपि मेंढ़कीपाल महादेव गुफा स्थानीय स्तर पर भक्ति-पर्यटन का महत्वपूर्ण केंद्र है, किंतु इसे अब तक बड़े पर्यटन मानचित्र पर शामिल नहीं किया गया है। शायद यही इसकी सबसे बड़ी विशेषता है।
पर्यटन का अति-विकास कई बार विनाश भी लाता है, जबकि यहाँ विकास का अभाव इस स्थान को प्रकृति की दृष्टि से निर्मल, शांत और अछूता बनाए हुए है। इसी कारण यहाँ वही लोग पहुँच पाते हैं जिनमें दुर्गम मार्ग तय करने का साहस और प्रकृति से साक्षात्कार की तीव्र इच्छा होती है।
सैलानियों को अपने वाहन बालापुरा गाँव या आसपास ही पार्क करने होते हैं। इसके बाद पहाड़ी मार्ग से पैदल चढ़ाई कर गुफा तक पहुँचा जाता है।
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लेखक कोटा ( राजस्थान ) में चित्रकार,शिल्पकार, पर्यटन प्रेमी और सोशल एक्टिविस्ट हैं।

अरावली पर सरकार की मंशा आखिर क्या थी?

अरावली बचाओ अभियान की जीत हुई। सरकार की सलाह पर पहले सुप्रीम कोर्ट ने अरावली की 100 मीटर तक ऊंचाई की पहाड़ियों को अरावली पर्वत श्रृंखला का हिस्सा न मानने का फैसला दिया था। इस मामले पर सरकार के विरोध में शुरू हुए तेज आंदोलन के बाद सुप्रीम कोर्ट द्वारा अपने ही आदेश पर रोक लगा दी गई है। इस निर्णय को अरावली बचाओ आंदोलन की एक बड़ी जीत के रूप में देखा जा रहा है, क्योंकि इससे अरावली के संरक्षण के लिए और समय मिल गया है। माना कि अरावली पर सुप्रीम कोर्ट ने स्टे देकर जनता की चिंताओं को गंभीरता से लिया है। लेकिन संघर्ष अभी समाप्त नहीं हुआ है, क्योंकि यह सत्य अभी सार्वजनिक होना बाकी है कि सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में, अरावली की 100 मीटर की पहाड़ियों को अरावली का हिस्सा ही न मानने की सिफारिश किस मंशा से की थी?

सुप्रीम कोर्ट ने 29 दिसंबर 2025 को अरावली पहाड़ियों से जुड़े एक अहम फैसले में 20 नवंबर के अपने पिछले आदेश पर रोक लगा दी। इस पिछले आदेश में कोर्ट ने केंद्र सरकार द्वारा पेश की गई 100 मीटर ऊंचाई के आधार पर अरावली पर्वतमाला की नई परिभाषा को स्वीकार किया था। लेकिन 29 दिसंबर को तीन जजों की बेंच ने इस नई परिभाषा पर सीधे कार्रवाई करने से पहले गहन समीक्षा की जरूरत बताई। कोर्ट ने यह भी कहा कि 100 मीटर नियम का व्यापक प्रभाव समझे बिना उसे लागू नहीं किया जा सकता है। इसके साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र और राज्य सरकारों को कहा कि एक उच्चस्तरीय विशेषज्ञ समिति का गठन किया जाए, जो परिभाषा, ऊंचाई के मानदंड और खनन की संभावित अनुकूलता पर अध्ययन करे।

राजस्थान के पूर्व मुख्यमंत्री और वरिष्ठ कांग्रेस नेता अशोक गहलोत सहित पार्टी नेताओं ने इस फैसले को जनता की आवाज़ की जीत और पर्यावरण संरक्षण की दिशा में सही कदम के रूप में देखा। गहलोत ने आम तौर पर इस मुद्दे पर कहा कि अरावली रेंज को कमजोर करने वाली परिभाषा पर्यावरण और स्थानीय जीवन के लिए जोखिम भरी थी। उन्होंने अदालत द्वारा अपने ही फैसले को रोकने को लोगों की संवेदनशीलता को सम्मान देने वाला फैसला बताते हुए कहा कि वर्तमान पर्यावरणीय परिस्थितियों को देखते हुए यह बेहद आवश्यक है कि अरावली को लेकर अगली शताब्दी तक की स्थिति को सोचकर काम किया जाए। गहलोत ने इस मुहिम में जुड़े सभी लोगों के प्रति आभार व्यक्त किया है। उन्होंने कहा कि भारत सरकार के पर्यावरण मंत्री को भी अब पर्यावरण के हित में काम करने की सोच रखनी चाहिए। सरिस्का सहित पूरे अरावली में खनन बढ़ाने की सोच भविष्य के लिए खतरनाक है। गहलोत मानते हैं कि पर्यावरण संरक्षण पर जनता की चिंताओं को गंभीरता से लेना चाहिए।

विशेषज्ञों का कहना था कि सरकार और सुप्रीम कोर्ट के इस कदम से 100 मीटर से कम ऊंचाई वाली महत्वपूर्ण पहाड़ियां संरक्षण से बाहर हो सकती थीं, जिससे खनन और पर्यावरणीय क्षरण बढ़ सकता था। पर्यावरण प्रेमियों और आन्दोलनकारियों ने इसे आरंभ से ही अरावली के अस्तित्व के लिए खतरा बताया। कई विशेषज्ञों ने कहा कि अगर 100 मीटर मानदंड लागू होता तो पारिस्थितिक रूप से संवेदनशील ज़मीनें अलग हो जाएंगी और उन्हें खनन और अवैध गतिविधियों के लिए खोल दिया जाएगा। 29 दिसंबर के फैसले पर प्रमुख पर्यावरणवादी और आंदोलन से जुड़े लोग इसे एक बड़ी जीत और न्याय का प्रतीक मानते हैं। उनका मानना है कि इस फैसले से यह संदेश गया है कि संरक्षण को केवल तकनीकी परिभाषा के आधार पर कमजोर नहीं किया जा सकता। कई ने कहा कि अदालत ने जनता की आवाज़ और वैज्ञानिक चिंताओं को सही ढंग से समझा है।

अरावली पर्वतमाला भारत की सबसे प्राचीन पर्वतमालाओं में से एक है जो गुजरात से दिल्ली तक लगभग 690 किमी में फैली हुई है और यह उत्तर-पश्चिम भारत के पारिस्थितिक संतुलन के लिए महत्त्वपूर्ण है। यह भूजल रिचार्ज, धूल के तूफानों को रोकने, जैव विविधता और स्थानीय जलवायु को संतुलित रखने में अहम भूमिका निभाती है। केंद्र सरकार के पर्यावरण मंत्रालय द्वारा सुप्रीम कोर्ट में पेश की गई 100 मीटर की नई परिभाषा ने पूरी अरावली को ही खतरे में डाल दिया, क्योंकि इसके तहत कम ऊंचाई वाली लगभग 90% पहाड़ियों को अरावली के दायरे से बाहर किया जा सकता था। जिससे वे इलाके खनन और निर्माण के लिए खोले जा सकते थे। इस फैसले के विरोध में राजस्थान, हरियाणा, गुजरात और दिल्ली में अरावली बचाओ अभियान शुरू हुआ। राजस्थान में स्तर पर, इस मुद्दे को उठाया गया, इस व्यापक समर्थन ने जन आंदोलन का रूप धर लिया और आखिरकार सुप्रीम कोर्ट को अपने ही फैसले को रोकना पड़ा।

सुप्रीम कोर्ट के 29 दिसंबर के फैसले के बाद केंद्र सरकार और संबंधित राज्यों को लंबे समय से उठ रहे विवाद का समाधान ढूंढना होगा। सुप्रीम कोर्ट ने विशेषज्ञ समिति गठित करने की बात कही है, जिसका मुख्य काम होगा कि अरावली की वास्तविक परिभाषा, ऊंचाई मानदंड और संरक्षण खतरे पर वैज्ञानिक मूल्यांकन किया जाए। सरकार अब अदालत के निर्देश के अनुसार नए नियमों को लागू करने से पहले वैज्ञानिक जांच और विशेषज्ञ रिपोर्ट तैयार करने पर ध्यान केंद्रित करेगी। पर्यावरण मंत्री ने संकेत दिए हैं कि कोई भी नया खनन पट्टा तब तक नहीं दिया जाएगा जब तक एक व्यापक और स्थायी प्रबंधन योजना तैयार नहीं हो जाती। अवैध खनन पर सरकार की रुख भी और अधिक कड़ी होने की उम्मीद है। हाल के समय में जैसे कुछ सरकारी निर्देशों में पूरे अरावली क्षेत्र में नई खनन लीज नहीं दी जाएगी जैसी बातें सामने आई हैं, यह संकेत है कि खनन पर नियंत्रण और पर्यावरण संरक्षण प्राथमिकता बनेगा।

अरावली बचाओ अभियान की सफलता लोकतंत्र, पर्यावरण चेतना और जनसहभागिता की प्रभावी मिसाल बन गई है। अदालत का फैसला यह भरोसा देता है कि कानून व्यवस्था पर्यावरणीय संवेदनशीलता को समझती है। लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि संघर्ष समाप्त हो गया, बल्कि इसका मतलब है कि अब संघर्ष ठोस नीति, वैज्ञानिकता और पारदर्शिता की मांग करेगा। अरावली सिर्फ राजस्थान की नहीं, यह उत्तर भारत की प्रकृति की रीढ़ है। जनता की एकजुटता से सुप्रीम कोर्ट ने समझा कि अगर अरावली बची रहेगी, तो ही रेगिस्तान की रेत शहरों तक नहीं पसरेगी, उत्तर भारत की हवाओं सहित जल का भविष्य सुरक्षित रहेगा और जनजीवन निखरेगा। इसी वजह से, अरावली पर यह फैसला आने वाले समय में देश की अन्य पर्यावरणीय लड़ाइयों के लिए भी दिशा तय कर सकता है।

(लेखक राजनीतिक विश्लेषक हैं)

कच्छ के जल क्रांतिकारी ‘दामजीभाई एन्करवाला’ पर डाक टिकट

अहमदाबाद।भारतीय डाक विभाग द्वारा कच्छ के जल क्रन्तिकारी के रूप में प्रसिद्ध ‘दामजीभाई एन्करवाला’ पर एक कस्टमाइज़्ड डाक टिकट जारी किया गया। सर्किल कार्यालय, अहमदाबाद में आयोजित एक समारोह में  गुजरात परिमंडल के मुख्य पोस्टमास्टर जनरल श्री गणेश वी. सावळेश्वरकर और उत्तर गुजरात परिक्षेत्र के पोस्टमास्टर जनरल श्री कृष्ण कुमार यादव ने 29 दिसंबर, 2025 को उक्त  डाक टिकट (माई स्टैम्प) जारी किया। इस अवसर पर निदेशक डाक सेवाएं श्री सुरेख रेघुनाथेन, सौराष्ट्र ट्रस्ट के मैनेजिंग ट्रस्टी श्री हार्दिक मामानिया, ट्रस्टी श्री संजयभाई डी शाह, श्री अतुल डी शाह, कच्छमित्र के संपादक श्री दीपक मांकड़, कच्छमित्र के महाप्रबंधक श्री मुकेश ढोलकिया की गरिमामयी उपस्थिति रही।

इस अवसर पर मुख्य पोस्टमास्टर जनरल श्री गणेश वी. सावळेश्वरकर ने कहा कि डाक टिकटों के माध्यम से देश की संस्कृति, इतिहास, विज्ञान और उपलब्धियों को दर्शाया जाता है, जो संचार के साथ-साथ राष्ट्रीय गौरव और विरासत को बढ़ावा देते हैं। दामजीभाई एन्करवाला का जीवन कच्छ और सामाजिक उत्थान के लिए समर्पित था और उनकी तरह ही युवाओं को मातृभूमि के प्रति अपनी निष्ठा और जिम्मेदारी सदैव स्मरण रखनी चाहिए।

पोस्टमास्टर जनरल श्री कृष्ण कुमार यादव ने कहा कि दामजीभाई एन्करवाला ने कच्छ के जल प्रबंधन में बहुमूल्य योगदान दिया। एक उद्योगपति के साथ-साथ वे प्रसिद्ध समाज सेवी भी रहे। कच्छ के जल योद्धा के रूप में जारी यह डाक टिकट दामजीभाई के व्यक्तित्व, संघर्ष और समाज के प्रति उनके योगदान को देश-विदेश में आने वाली पीढ़ियों तक पहुँचाने का माध्यम बनेगा। श्री यादव ने कहा कि डाक टिकट वास्तव में एक नन्हा राजदूत है, जो विभिन्न देशों का भ्रमण करता है एवम् उन्हें अपनी सभ्यता, संस्कृति और विरासत से अवगत कराता है। हर डाक टिकट के पीछे एक कहानी छुपी हुई है और इस कहानी से आज की युवा पीढ़ी को जोड़ने की जरूरत है।

सौराष्ट्र ट्रस्ट के ट्रस्टी श्री अतुल डी शाह ने इस डाक टिकट हेतु भारतीय डाक का आभार जताते हुए अपने पिता दामजीभाई लालजीभाई शाह – एन्करवाला (1937-2023) के जीवन पर विस्तार से प्रकाश डाला। उन्होंने बताया कि, कच्छ में जन्मे श्री दामजीभाई का सपना डॉक्टर बनने का था, लेकिन सौराष्ट्र और कच्छ में चल रही पानी की समस्या ने उन्हें समाजसेवा और राष्ट्रनिर्माण की दिशा में अग्रसर किया। कच्छ में व्याप्त जल संकट को उन्होंने अपनी व्यक्तिगत जिम्मेदारी माना और इसके समाधान के लिए सतत प्रयास किए। उनके अथक प्रयासों और दूरदर्शिता के कारण सूखा-ग्रस्त कच्छ जिले तक नर्मदा का पानी पहुँच सका। इस ऐतिहासिक पहल से कच्छ के लाखों लोगों के जीवन में स्थायी परिवर्तन आया और क्षेत्र के विकास को नई दिशा मिली।

सौराष्ट्र ट्रस्ट के मैनेजिंग ट्रस्टी श्री हार्दिक मामानिया ने कहा कि दामजीभाई एन्करवाला का जीवन युवाओं के लिए प्रेरणास्रोत है। ट्रस्टी श्री संजयभाई डी शाह, कच्छमित्र के संपादक श्री दीपक मांकड़, कच्छमित्र के महाप्रबंधक श्री मुकेश ढोलकिया ने भी दामजीभाई एन्करवाला के व्यक्तित्व और कृतित्व के विभिन्न पहलुओं से परिचित कराया।

इस अवसर पर सीनियर पोस्टमास्टर अहमदाबाद जीपीओ श्री अल्पेश आर. शाह, सहायक निदेशक श्री एन एन रावल, सुश्री किंजल शाह, श्री मिरल खमार, सहायक अधीक्षक सुश्री विजयालक्ष्मी, श्री जलदीप गोहेल, श्री धवल बाविसी, श्री बिरंग शाह, भाविन प्रजापति, श्री रमेश जी पटेल, श्री दीक्षित रामी, सुश्री धारा कापड़िया सहित तमाम लोग उपस्थित रहे। कार्यक्रम का संचालन सहायक अधीक्षक श्री हार्दिक गढ़वी ने किया।

कंटेट क्रिएटर नहीं, कंटेट रिफार्मर बनें- प्रो.संजय द्विवेदी

कंटेट वायरल ही नहीं मूल्यवान भी हो
‘वेब मीडिया समागम-2025’ में देश भर से जुटे डिजिटल दिग्गज

भागलपुर (बिहार)। भारतीय जनसंचार संस्थान (आईआईएमसी) के पूर्व महानिदेशक प्रो.संजय द्विवेदी का कहना है डिजिटल मीडिया के व्यापक प्रभाव के कारण बड़ी जिम्मेदारी भी जुड़ जाती है। इसलिए जरुरी है कि हम सिर्फ कंटेंट क्रिएटर नहीं, उससे आगे कंटेंट लीडर और कंटेंट रिर्फामर बनें। करोड़ों लोगों तक पहुँचने वाला प्रत्येक शब्द, प्रत्येक विचार और प्रत्येक दृश्य अपने आप में एक संदेश है। इसलिए यह सिर्फ वायरल नहीं बल्कि मूल्यवान भी होना चाहिए।

वे वेब जर्नलिस्ट एसोसिएशन ऑफ इंडिया द्वारा भागलपुर में आयोजित ‘वेब मीडिया समागम-2025’ को संबोधित कर रहे थे। कार्यक्रम में पूर्व केंद्रीय मंत्री श्री अश्विनी कुमार चौबे, वरिष्ठ पत्रकार डॉ.बृजेश कुमार सिंह,संगठन के राष्ट्रीय अध्यक्ष श्री आनंद कौशल, राष्ट्रीय महासचिव डा. अमित रंजन विशेष रूप से सहभागी रहे। समागम में देश भर के डिजिटल मीडिया दिग्गजों ने कई सत्रों में विमर्श किया और संगठन विस्तार पर भी चर्चा की।

प्रो. द्विवेदी ने कहा कि लोकप्रियता से अधिक जरूरी यह है कि सामग्री समाज को बेहतर बनाए, नागरिक विवेक को विकसित करे और संवाद की संस्कृति को मजबूत करे। फेक न्यूज़, तथ्यहीन दावे और सनसनीखेज प्रस्तुति विश्वसनीयता के संकट को जन्म दे रहे हैं। एल्गोरिद्म की मजबूरी क्रिएटर्स को रचनात्मकता से दूर ले जाकर केवल ट्रेंड के पीछे भागने के लिए विवश कर रही है। उन्होंने कहा कि लाइक्स, फॉलोअर्स और व्यूज़ की अनवरत दौड़ मानसिक तनाव और आत्मसम्मान के संकट को बढ़ा रही है। ध्रुवीकरण और ट्रोल संस्कृति समाज के ताने-बाने को कमजोर कर रही है। प्रोफेसर द्विवेदी ने कहा कि जिम्मेदार क्रिएटर की पहचान सत्य, संवेदना और सामाजिक हित से होती है। विश्वसनीय जानकारी देना, सकारात्मक संवाद स्थापित करना, आंचलिक भाषाओं और स्थानीय मुद्दों को महत्व देना, जनता की समस्याओं को स्वर देना और स्वस्थ हास्य तथा मानवीय संवेदनाओं को बनाए रखना आज की डिजिटल नैतिकता के प्रमुख तत्व हैं।

उन्होंने वेब पत्रकारों का आह्वान करते हुए कहा कि आपके पास केवल कैमरा या रिंग लाइट नहीं है; आपके पास समाज को रोशन करने की रोशनी है। आप वह पीढ़ी हैं जो बिना न्यूज़रूम के पत्रकार, बिना स्टूडियो के कलाकार और बिना मंच के विचारक हैं। जाहिर है तोड़ने वाले बहुत हैं अब कुछ ऐसे लोग चाहिए जो देश और दिलों को जोड़ने का काम करें।

जड़ों से जुड़ी रहे पत्रकारिता : अश्विनी चौबे
पूर्व केंद्रीय मंत्री अश्विनी कुमार चौबे ने अपने संबोधन में कहा कि हर युग में पत्रकारों ने अपनी लेखनी से क्रांति लाई है। अब तकनीक से चलने वाली मीडिया का समय है। बावजूद इसके अपनी जड़ों से जुड़े रहकर हम बेहतर पत्रकारिता कर सकते हैं। भाजपा नेता प्रीति शेखर ने कहा कि जिस तरह से संचार क्रांति आई है उससे युवाओं के बेहतर अवसर मिले हैं। स्थानीय भाषाओं में सामग्री पहुंचाने के द्वार खुले हैं।

सूचनाओं को दबाना असंभव:डा.बृजेश कुमार सिंह
वरिष्ठ पत्रकार डा. बृजेश कुमार सिंह ने कहा कि पिछले 15 वर्षों के अंदर बहुत बड़ा बदलाव आया है। इसकी वजह इंटरनेट का डाटा सस्ता होना और हर व्यक्ति तक पहुंच बढ़ना है। अब सूचना को दबाए रखने की व्यवस्था खत्म हो चुकी है और इसका लोकतंत्रीकरण हुआ है। उन्होंने कहा कि समाज का भरोसा अर्जित करें क्योंकि प्रायः वेब पत्रकारों के पास बड़ी टीम नहीं होती किंतु सूचना का सत्यापन जरूरी है। इसलिए बड़े मीडिया हाउस की तुलना में वेब पत्रकारों की चुनौतियां ज्यादा हैं।

ग्रामीण पुस्तकालय स्थापना दिवस पर सम्मान समारोह और कविता पाठ का आयोजन

जनपक्षधर लेखन के उत्तरदायित्व का बोध कराता रहेगा रामदेव सिंह ‘कलाधर’ सम्मान : डॉ. रमाशंकर सिंह
उक्त विचार चर्चित लेखक डॉ. रामशंकर सिंह ने दिनांक 28 दिसंबर 2025 को ग्राम भलुआ, जनपद देवरिया, उत्तर प्रदेश में स्व. विंध्याचल स्मारक न्यास द्वारा संचालित ग्रामीण पुस्तकालय के स्थापना दिवस पर सम्मान समारोह, परिचर्चा और कविता पाठ के आयोजन के अवसर पर व्यक्त किया।
इस कार्यक्रम का शुभारंभ अतिथियों को असमिया अंगवस्त्रम  और भारतीय संविधान की प्रस्तावना भेंट कर किया। ग्रामीण पुस्तकालय के उदेश्य, इसकी संकल्पना को साकार करने की यात्रा पर प्रकाश डालते हुए न्यास के अध्यक्ष, परिवर्तन पत्रिका के सम्पादक एवं शिक्षक डॉ. महेश सिंह बताया कि मेरे जीवन में पुस्तकालयों ने क्रन्तिकारी भूमिका निभाई है। मैं एसी कारीगर बनने गोवा गया और वहाँ विश्वविद्यालय पुस्तकालय में एसी का काम करने के दौरान पढ़ने के प्रति मेरी जिज्ञासा बढ़ी फलस्वरुप मैंने परास्नातक और पीएचडी की उपाधि हासिल की और आज शिक्षक के रूप में अपनी सेवाएं दे रहा हूँ। इसी सोच के साथ कि पुस्तक और प्रेरणा के अभाव में कोई पढ़ाई से वंचित न होने पाए हमने गाँव, क्षेत्रवासियों और मित्रों के सहयोग से यह पुस्तकालय मूर्त रूप में आपकी समक्ष है। इसका उद्देश्य मात्र पुस्तकें उपलब्ध करवाना नहीं वरन एक ऐसा मंच प्रदान करना है जो हमारी तार्किक और वैज्ञानिक सोच का विस्तार करे और हमारी वैचारिकी को एक आकर दे सके। इसी क्रम में हम समय-समय पर विभिन्न वैचारिक कार्यक्रम आयोजित करते रहते हैं और शिक्षा के क्षेत्र में विशिष्ट उपलब्धि हासिल करने वाले युवाओं एवं जन पक्षधर वैचारिकी के संवाहक रचनाकारों को सम्मानित भी करते रहते हैं।
अतिथि परिचय और उनके योगदानों पर प्रकाश कार्यक्रम के संचालक डॉ. रवीन्द्र पीएस ने डाला।
डॉ. महेश सिंह ने न्यास द्वारा प्रति वर्ष दिए जाने वाले तीनों सम्मान रामदेव सिंह ‘कलाधर’ साहित्य सम्मान, बोधिसत्व लोक-कला एवं संस्कृति सम्मान तथा प्रेमचंद श्रीवास्तव स्मृति सम्मान के बारें में बताया। उन्होंने कहा कि रामदेव सिंह ‘कलाधर’ राष्ट्रीय चेतना, लोक संस्कृति एवं बाल साहित्य के स्थापित रचनाकार रहे हैं। इसका प्रमाण न केवल उनके प्रकाशित, अप्रकाशित पाण्डुलिपियों से मिलता है बल्कि उनके समकालीन राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त आदि से हुए पत्रों से भी मिलता है। यह भूमि तथागत बुद्ध के कार्यस्थल का केंद्रीय क्षेत्र रही है और इसी रूप में इसकी वैश्विक पहचान है इसलिए हम गोरखपुर मंडल स्तर का ‘बोधिसत्व लोक-कला एवं संस्कृति सम्मान’ उनकी स्मृति में देते हैं। भलुआ गाँव के ही गाँव-गवईं, सामाजिक रूढ़ि और किसान के प्रति अत्यधिक संवेदनशील कवि रहे प्रेमचंद श्रीवास्तव की स्मृति में जनपद देवरिया के उदीयमान कवि को ‘प्रेमचंद श्रीवास्तव स्मृति सम्मान’ प्रदान करते हैं।
डॉ. महेश सिंह ने न्यास की ओर से वर्ष 2025 के रामदेव सिंह ‘कलाधर’ साहित्य सम्मान के लिये शोधार्थी एवं लेखक चर्च क्राइस्ट महाविद्यालय कानपुर के सहायक प्रोफेसर डॉ. रमाशंकर सिंह, बोधिसत्व लोक-कला एवं संस्कृति सम्मान के लिये प्रसिद्ध लेखक और पुरातत्त्वविद डॉ. रमाकांत कुशवाहा ‘कुशाग्र’ तथा प्रेमचंद श्रीवास्तव स्मृति सम्मान के लिये देवरिया जनपद के उदीयमान कवि सच्चिदानंद पाण्डेय के नामों की घोषणा की।
कार्यक्रम संचालक डॉ. रवीन्द्र पीएस ने इन तीनों रचनाकारों के योगदान पर विस्तार से प्रकाश डाला। बांस पर आश्रित जातियों, घुमन्तु एवं विमुक्त समुदायों के इतिहास, संस्कृति, राजनीति और जीवन बोध तथा इनके चर्चित शोध ग्रन्थ ‘नदी पुत्र’ की चर्चा किया। डॉ. रामाकांत कुशवाहा की बुद्ध सम्बंधी पुस्तकों बुद्ध के वंशज, बुद्ध और सम्राट अशोक, खत्तिय जातियाँ एवं बौद्ध स्थलों की पुरातत्व विभाग की सहायता से पहचान और संरक्षण के विशेष प्रयास पर चर्चा किया गया।
सम्मान समारोह के उपरांत आयोजित वैचारिक सत्र में सम्मानित विभूतियों डॉ. रमाशंकर सिंह, डॉ. रमाकान्त कुशवाहा और श्री सच्चिदानन्द पांडेय के वक्तव्यों से परिचर्चा का मार्ग प्रशस्त हुआ। प्रो. असीम सत्यदेव की अध्यक्षता में आयोजित इस सत्र में प्रो. अनिल राय, शिवाजी राय, मनोज कुमार सिंह, डॉ. राम नरेश राम, डॉ. चतुरानन ओझा, जय प्रकाश मल्ल, अशोक चौधरी, डॉ. हितेश सिंह और अरविंद सिंह जैसे प्रबुद्ध विचारकों ने ग्रामीण पुस्तकालयों की प्रासंगिकता पर गंभीर विमर्श किया। विद्वानों ने एकमत से स्वीकार किया कि ग्रामीण पुस्तकालय किसी भी समाज के बौद्धिक और नैतिक स्वास्थ्य के वास्तविक सूचक हैं; ये वे कारखाने हैं जहाँ जागरूक, तर्कशील और लोकतांत्रिक नागरिकों का निर्माण होता है।
चर्चा का मुख्य केंद्र पुस्तकालयों की वह भूमिका रही, जिसके माध्यम से गाँव केवल साक्षरता तक सीमित न रहकर एक न्यायपूर्ण समाज में रूपांतरित होते हैं। वक्ताओं ने जोर दिया कि अफवाहों और अंधविश्वास के इस दौर में पुस्तकालय ही वह सुरक्षा कवच हैं, जहाँ वैज्ञानिक दृष्टिकोण और सत्य को परखने की शक्ति विकसित होती है। यह आयोजन एक समानांतर वैचारिक आंदोलन के रूप में देखा गया, जो रूढ़िवादिता की जंजीरों को तोड़ने और सामाजिक समरसता को सुदृढ़ करने का कार्य कर रहा है। यहाँ जाति, वर्ग और लिंग के भेद मिट जाते हैं और साझा ज्ञानार्जन से लोकतांत्रिक मूल्यों को बल मिलता है। युवाओं के लिए ये संस्थान सीमित संसाधनों के बीच प्रतियोगिता परीक्षाओं के द्वार खोलने वाले वरदान सिद्ध हो रहे हैं।
साहित्यिक ऊर्जा को विस्तार देते हुए कार्यक्रम के द्वितीय चरण में काव्य पाठ का भव्य आयोजन हुआ, जिसका कुशल संचालन डॉ. रवींद्र पीएस ने किया। वरिष्ठ कवि एवं जलेस गोरखपुर के अध्यक्ष जय प्रकाश मल्ल, पिछले वर्ष ‘रामदेव सिंह ‘कलाधर’ साहित्य सम्मान से सम्मानित ‘बदल की अलगनी पर’ के रचयिता अभिषेक कुमार सिंह, प्रेमचंद श्रीवास्तव स्मृति सम्मान से सम्मानित कवि योगेंद्र पाण्डेय, डॉ. अचल पुलस्तेय, प्रवीण त्रिपाठी, कौशलेंद्र मिश्र, डॉ. रवींद्र सिंह और स्वयं डॉ. महेश सिंह जैसे रचनाकारों ने अपनी कविताओं के माध्यम से सामाजिक विसंगतियों पर प्रहार किया और मानवीय संवेदनाओं को स्वर दिया। इन रचनाओं में जहाँ गाँव की सोंधी मिट्टी की महक थी, वहीं व्यवस्था के प्रति तीखे प्रश्न भी थे, जिन्होंने श्रोताओं को वैचारिक ऊर्जा से सराबोर कर दिया। अंततः, डॉ. महेश सिंह के उस भागीरथ प्रयास की मुक्तकंठ से सराहना की गई, जिसके माध्यम से उन्होंने अज्ञानता की धुंध को चीरते हुए ज्ञान की दीपशिखा प्रज्वलित की है।

बनास जन के पंकज मित्र विशेषांक का लोकार्पण

नई दिल्ली। तकनीकी विकास और बाज़ार की व्यवस्था ने कुछ हद तक मुक्ति भी दी है और एक अलग तरीके से अन्यायपूर्ण व्यवस्था भी बनाई है। मनुष्य की गरिमा, नया अभी भी कोसों दूर है और लेखक का स्वप्न है कि ऐसा समाज बन सके जो न्याय आधारित हो। मेरा कहानी लेखन इसी दिशा में एक विनम्र प्रयास है कि हमारा समाज अधिक मानवीय बन सके।

सुप्रसिद्ध कथाकार पंकज मित्र ने अपने पर केंद्रित विख्यात लघु पत्रिका बनास जन के लोकार्पण के अवसर पर अपने पाठकों का सबसे अधिक ऋण स्वीकार किया जिनके कारण वे लगातार सक्रिय रह सके। हरकिशन सिंह सुरजीत भवन में एक सादे समारोह में वरिष्ठ उपन्यासकार रणेन्द्र, लेखक-अनुवादक दिगम्बर, चर्चित कथाकार कविता और अरुण कुमार असफल ने बनास जन के उक्त विशेषांक का लोकार्पण किया। आलोचक-कथाकार राजीव कुमार के सम्पादन में आए इस विशेषांक में लगभग एक दर्जन आलोचकों ने विस्तार से पंकज मित्र की कहानियों का विश्लेषण-मूल्यांकन किया है। मित्र के संगी- साथियों संजय कुमार कुंदन और राजेश करमहे के संस्मरणों के साथ उनका लम्बा साक्षात्कार भी अंक में है। मूलत: झारखंड निवासी पंकज मित्र 1996 से कहानियाँ लिख रहे हैं और पेशे से भारतीय प्रसारण सेवा में अधिकारी रहे हैं।

आयोजन में साहित्यकार रणेन्द्र ने कहा कि हिंदी के लघु पत्रिका आंदोलन का विशिष्ट स्वर बन चुकी बनास जन का पंकज मित्र पर विशेषांक का प्रकाशन इस बात का प्रमाण है कि हिंदी साहित्य समाज ने गंभीर और जनपक्षधर लेखकों का महत्व स्वीकार किया है। कथाकार कविता ने पंकज मित्र को बधाई दी और कहा कि अपनी पीढ़ी के श्रेष्ठ कहानी सर्जक के रूप में वे जाने जाते रहेंगे। बनास जन के सम्पादक पल्लव ने बनास जन की सत्रह वर्षीय यात्रा का उल्लेख करते हुए बताया कि पंकज मित्र पर आया अंक तरासीवाँ अंक है। चित्तौड़गढ़ से प्रारम्भ हुई इस पत्रिका ने अब तक हिंदी के अनेक रचनाकारों पर अपने अंकों का प्रकाशन किया है जिनमें मीराँ, नज़ीर अकबराबादी, भीष्म साहनी, नामवर सिंह, फणीश्वरनाथ रेणु,अमरकान्त, मृणाल पांडे, स्वयं प्रकाश, असग़र वजाहत, ओमप्रकाश वाल्मीकि,अखिलेश पर अंक सम्मिलित हैं। पल्लव ने लघु पत्रिकाओं की प्रकाशन यात्रा को भूमंडलीकरण के प्रतिपक्ष में भारतीय संस्कृति और साहित्य का संघर्ष बताया।

Banaas Jan