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वर्ष 2025 में पश्चिम रेल्वे की उपलब्धियाँ

मुंबई।  कैलेंडर वर्ष 2025 पश्चिम रेलवे के लिए एक ऐतिहासिक एवं परिवर्तनकारी वर्ष के रूप में उभरकर सामने आया। यह वर्ष राष्ट्रीय महत्व की उपलब्धियोंरिकॉर्ड अवसंरचना विकासउत्कृष्ट परिचालन प्रदर्शन तथा यात्री सुरक्षासेवा गुणवत्ताडिजिटल शासनराजस्व वृद्धि और सतत विकास पर निरंतर केंद्रित प्रयासों से परिपूर्ण रहा। वर्ष भर पश्चिम रेलवे ने व्यापक पैमाने के संचालन को सटीकता के साथविरासत को आधुनिकता के साथ तथा विकास को अनुशासन के साथ संतुलित करने की अपनी क्षमता का सशक्त प्रदर्शन किया।

राष्ट्रीय उपलब्धियाँ एवं ऐतिहासिक प्रथम

वर्ष की सबसे महत्वपूर्ण उपलब्धियों में से एक यह रही कि पश्चिम रेलवे ने अपने संपूर्ण ब्रॉड गेज नेटवर्क का 100% विद्युतीकरण प्राप्त किया। इससे पश्चिम रेलवे भारतीय रेल के पूर्णतः विद्युतीकृत रेल नेटवर्क वाले क्षेत्रों में मजबूती से स्थापित हुआ है तथा सतत एवं ऊर्जा-कुशल परिचालन के प्रति उसकी प्रतिबद्धता और अधिक सुदृढ़ हुई है।

एक अन्य प्रमुख उपलब्धि के रूप में रोलिंग स्टॉक वर्कशॉपदाहोद में लोको मैन्युफैक्चरिंग शॉप का निर्माण एवं लोकार्पण किया गयाजिसे ₹21,405 करोड़ की परियोजना लागत से विकसित किया गया है। इस अत्याधुनिक इकाई की आधारशिला माननीय प्रधानमंत्री द्वारा रखी गई थी तथा परियोजना का कार्य वर्ष 2025 में पूर्ण किया गया। यह अत्याधुनिक संयंत्र 9000 हॉर्स पावर की विद्युत मालगाड़ी इंजनों के निर्माण हेतु डिज़ाइन किया गया हैजिससे भारतीय रेल की माल वहन क्षमता में वृद्धि होगी और लॉजिस्टिक लागत में कमी आएगी। यह संयंत्र मेक इन इंडिया” और मेक फॉर द वर्ल्ड” पहल को सशक्त समर्थन प्रदान करता हैजिसके अंतर्गत भारतीय रेल के लिए ब्रॉड गेज विद्युत लोकोमोटिव तथा निर्यात हेतु स्टैंडर्ड गेज विद्युत लोकोमोटिव का निर्माण किया जाएगा। हरित विनिर्माण सिद्धांतों पर आधारित एवं हरित ऊर्जा से संचालित इस परियोजना ने प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष रूप से बड़े पैमाने पर रोजगार सृजित किया है तथा दाहोद क्षेत्र के आर्थिक विकास को भी मजबूत प्रोत्साहन प्रदान किया है।

वर्ष के दौरानपश्चिम रेलवे ने 234 किलोमीटर नई लाइनेंदोहरीकरण तथा गेज परिवर्तन कार्य पूर्ण किएजिससे नेटवर्क क्षमतापरिचालन लचीलापन और मजबूती में उल्लेखनीय वृद्धि हुई। एक प्रमुख तकनीकी उपलब्धि के रूप मेंमिशन रफ्तार के अंतर्गत रतलाम मंडल के खाचरौदनागदा दोहरी लाइन खंड पर भारत की पहली 2×25 केवी ट्रैक्शन प्रणाली का सफलतापूर्वक कमीशनिंग किया गयाजिससे उच्च गति संचालनबेहतर ऊर्जा दक्षता तथा भविष्य के लिए तैयार ट्रैक्शन अवसंरचना सुनिश्चित हुई।

अवसंरचना विस्तार एवं संरक्षा कार्य – संपर्कलॉजिस्टिक्स और क्षेत्रीय विकास में परिवर्तनकारी भूमिका

वर्ष 2025 के दौरानपश्चिम रेलवे ने बड़े पैमाने पर अवसंरचना सुदृढ़ीकरण कार्य जारी रखते हुए संरक्षा और क्षमता वृद्धि की दिशा में महत्वपूर्ण उपलब्धियाँ हासिल कीं। इस अवधि में कुल 138 रोड ओवर ब्रिज एवं अंडर ब्रिज का निर्माण किया गया, 114 मानवयुक्त समपार फाटकों का उन्मूलन किया गया तथा 660 किलोमीटर डब्ल्यू-बीम फेंसिंग स्थापित की गईजिससे यात्रियों की सुरक्षा और परिचालन दक्षता में उल्लेखनीय सुधार हुआ।

वर्ष 2025 के दौरानपश्चिम रेलवे ने डबलिंगगेज परिवर्तन एवं विद्युतीकरण से जुड़े अनेक उच्च प्रभाव वाले परियोजनाओं का सफलतापूर्वक क्रियान्वयन कियाजिससे गुजरात में यात्री आवागमनमाल ढुलाई क्षमता तथा क्षेत्रीय आर्थिक विकास को उल्लेखनीय मजबूती मिली। प्रमुख परियोजनाओं में आनंदगोधरा रेल खंड का दोहरीकरण (79 किमी, ₹693 करोड़) शामिल हैजो आनंदखेड़ा एवं पंचमहल जिलों को कवर करता है। इसी प्रकारमहेसाणापालनपुर रेल खंड का दोहरीकरण (65.10 किमी, ₹537 करोड़)जो बनासकांठापाटन एवं महेसाणा जिलों को कवर करता हैदिल्लीअहमदाबाद राजधानी मार्ग पर शेष अंतिम सिंगल लाइन अंतर को समाप्त करने वाला एक महत्वपूर्ण प्रोजेक्ट रहा। राजकोटहदमटिया खंड का दोहरीकरण (39 किमी, ₹377 करोड़)जो राजकोटकानालूस दोहरीकरण परियोजना (111 किमी) का हिस्सा हैने राजकोट जिले में रेल अवसंरचना को सुदृढ़ किया। इसके अतिरिक्तकालोलकड़ीकतोसन रोड रेल खंड का गेज परिवर्तन सहित विद्युतीकरण (37 किमी, ₹347 करोड़)जो गांधीनगर एवं महेसाणा जिलों को कवर करता हैएक महत्वपूर्ण उपलब्धि रहा। 

बेचराजीरणुज रेल खंड का गेज परिवर्तन (40 किमी, ₹520 करोड़)जो महेसाणापाटन एवं अहमदाबाद के आकांक्षी जिलों को कवर करता हैराष्ट्रीय लॉजिस्टिक्स नीति तथा पीएम गति शक्ति राष्ट्रीय मास्टर प्लान के अनुरूप किया गया। साथ हीसाबरमतीबोटाद रेल खंड का विद्युतीकरण (106 किमी, ₹333 करोड़) पूरा होने के साथ ही गुजरात में रेल नेटवर्क का 100% विद्युतीकरण सुनिश्चित हुआ।

समग्र रूप सेइन परियोजनाओं ने रेल नेटवर्क में मौजूद बाधाओं को दूर किया हैभीड़भाड़ तथा ट्रेनों की अनावश्यक रोक को कम किया है और प्रमुख रेल गलियारों पर यात्रा समय में उल्लेखनीय कमी लाई है। इससे परिचालन में अधिक लचीलापन आया है तथा अतिरिक्त यात्री एवं मालगाड़ियों के संचालन का मार्ग प्रशस्त हुआ है। इस अवसंरचना सुदृढ़ीकरण से मल्टीमॉडल लॉजिस्टिक्स को मजबूती मिली हैपरिवहन लागत में कमी आई हैआपूर्ति श्रृंखला की दक्षता में सुधार हुआ है और ऑटोमोबाइलऔद्योगिककृषि एवं विनिर्माण क्षेत्रों को महत्वपूर्ण समर्थन प्राप्त हुआ है। साथ हीपर्यावरण-अनुकूल रेल परिचालन को बढ़ावा मिला है तथा क्षेत्रीय विकासरोजगार सृजन और अहमदाबादराजकोटजामनगरद्वारका एवं भावनगर जैसे प्रमुख शहरी केंद्रों तक बेहतर संपर्क सुनिश्चित हुआ है।

परिचालन उत्कृष्टता एवं समयपालन में नेतृत्व

वर्ष 2025 के दौरान पश्चिम रेलवे ने समयपालन के क्षेत्र में असाधारण प्रदर्शन दर्ज किया और भारतीय रेल की सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन करने वाली ज़ोनल रेलों में अपना स्थान बनाए रखा। मेल/एक्सप्रेस ट्रेनों की समयपालनता पूरे सिस्टम में उच्चतम स्तर पर रहीजिसमें नवंबर 2025 में लगभग 97% समयपालनता तथा नवंबर तक की संचयी अवधि में लगभग 96% समयपालनता दर्ज की गईजो सभी ज़ोनल रेलों में सर्वश्रेष्ठ रही।

यह उल्लेखनीय उपलब्धि भारी मानसूनी परिस्थितियोंअत्यंत सघन उपनगरीय रेल परिचालनबड़े पैमाने पर त्योहार विशेष ट्रेनों के संचालन तथा निरंतर चल रहे अवसंरचना कार्यों के बावजूद हासिल की गई। यह प्रदर्शन पश्चिम रेलवे की सुदृढ़ परिचालन योजनावास्तविक समय में प्रभावी निगरानी तथा अनुशासित नियंत्रण तंत्र की सशक्तता को दर्शाता है।

मुंबई उपनगरीय रेल नेटवर्क – भारत की जीवनरेखा

पश्चिम रेलवे का मुंबई उपनगरीय रेल नेटवर्क एक बार फिर अपनी सुदृढ़ता एवं विश्वसनीयता का प्रमाण देता हुआ मुंबई की जीवनरेखा के रूप में सेवा करता रहाजो प्रतिदिन 30 लाख से अधिक यात्रियों की आवश्यकताओं को पूरा करता है। मानसून के दौरान तीव्र वर्षा की घटनाओं के बावजूदसघन पूर्व-मानसूनी योजनापरिसंपत्तियों की बेहतर तैयारी तथा त्वरित प्रतिक्रिया प्रणाली के चलते उपनगरीय सेवाएं अधिकांशतः निर्बाध रूप से संचालित होती रहीं।

प्रमुख यात्री सेवा विस्तार एवं बढ़ती मांग का प्रभावी प्रबंधन

वर्ष 2025 के दौरान नई नियमित रेल सेवाओं की शुरुआत तथा बढ़ती और मौसमी यात्रा मांग को पूरा करने के लिए बड़े पैमाने पर स्‍पेशल ट्रेनों के परिचालन के माध्यम से यात्री संपर्क में उल्लेखनीय वृद्धि की गई। इससे यात्रियों को बेहतर सुविधाअधिक विकल्प और सुगम आवागमन सुनिश्चित हो सका।

एक प्रमुख उपलब्धि के रूप में उधना जंक्शन (गुजरात) और ब्रह्मपुर (ओडिशा) के बीच अमृत भारत एक्सप्रेस का उद्घाटन किया गया। यह पश्चिम रेलवे एवं गुजरात की पहली अमृत भारत एक्सप्रेस हैजिसने पश्चिमी भारत और पूर्वी तट के बीच किफायती लंबी दूरी की रेल संपर्क व्यवस्था को और अधिक सुदृढ़ किया है।

इसके अतिरिक्तक्षेत्रीय आवागमन को सुदृढ़ करने के लिए नई मेमू (MEMU) सेवाओं की शुरुआत की गई। वहीं भावनगरअयोध्या के बीच नई रेल सेवा को माननीय रेल मंत्रीइलेक्ट्रॉनिक्स एवं सूचना प्रौद्योगिकी तथा सूचना एवं प्रसारण मंत्री श्री अश्विनी वैष्णव द्वारा हरी झंडी दिखाकर रवाना किया गयाजिससे तीर्थयात्रियों एवं यात्रियों के लिए लंबी दूरी की रेल संपर्क सुविधा का और विस्तार हुआ।

यात्रा की बढ़ती मांग का प्रभावी प्रबंधन करने तथा नियमित सेवाओं को पूरक सहयोग देने के लिए पश्चिम रेलवे ने वर्ष 2025 के दौरान लगभग 7000 फेरे हॉलिडे स्पेशल ट्रेनों के रूप में परिचालित किए। ये ट्रेनें ग्रीष्मकालीन अवकाशगणपतिदीवालीछठ तथा क्रिसमस/नववर्ष आदि के दौरान विभिन्न चरणों में चलाई गईं। इसके साथ हीअस्थायी एवं स्थायी आधार पर ट्रेनों में अतिरिक्त कोच भी जोड़े गए। इन विशेष ट्रेन सेवाओं ने पूरे रेल नेटवर्क में यात्रियों की सुगमसुरक्षित एवं सुविधाजनक आवाजाही सुनिश्चित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

पश्चिम रेलवे ने उपनगरीय और लंबी दूरी की सेवाओं में असाधारण रूप से अधिक यात्री आवागमन के दौरान गहन और सुविचारित भीड़ प्रबंधन उपाय किए। उत्सवोंविशेष ट्रैफिक अवधि और पीक आवर्स के दौरान अभूतपूर्व यात्री संख्या के बावजूदयात्री आवागमन सुचारूव्यवस्थित और सुरक्षित रहा। यह संभव हुआ सक्रिय योजनाअतिरिक्त कर्मियों की तैनातीवास्तविक समय निगरानीयात्री प्रवाह का नियमनबेहतर घोषणाओं की व्यवस्था और विभिन्न रेलवे विभागों के बीच घनिष्ठ समन्वय के माध्यम से। इन व्यापक व्यवस्थाओं ने भीड़ के सुरक्षित विघटनजाम की रोकथाम और ट्रेन परिचालन में अविरलता सुनिश्चित कीजिससे पश्चिम रेलवे की उच्च घनत्व वाले यात्री ट्रैफिक को कुशलता और सटीकता के साथ संभालने की क्षमता और मजबूत हुई।

डिजिटल परिवर्तन और स्मार्ट गवर्नेंस

वर्ष 2025 ने पश्चिम रेलवे के लिए डिजिटल शासन में निर्णायक छलांग का प्रतीक बनाया। इस वर्षजोन ने SUGAMRAIL लॉन्च कियाजो वास्तविक समय में लिफ्टएस्केलेटर और अर्थिंग पिट की निगरानी के लिए पहला सॉफ्टवेयर-आधारित प्लेटफ़ॉर्म है। लिफ्ट और एस्केलेटर के प्रदर्शन का डिजिटल ट्रैकिंग होने से टूट-फूट की स्थिति में तेजी से कार्रवाई संभव हुई।

यात्री अनुभव को डिजिटल नवाचार के माध्यम से और बेहतर बनाने के लिएपश्चिम रेलवे ने मुंबई सेंट्रल पर डिजिटल लाउंज और को-वर्किंग स्पेस स्थापित कियाजिससे यात्रियों को आधुनिकआरामदायक और उत्पादक यात्रा वातावरण उपलब्ध हो सकेजो बदलती यात्रियों की अपेक्षाओं के अनुरूप है।

इसके अलावापश्चिम रेलवे ने 2,270 हैंड-हेल्ड टर्मिनल (HHTs) की तैनाती के साथ 100% डिजिटल टिकट जांच हासिल की। पश्चिम रेलवे ने रेल मदद शिकायत निवारण में लगातार पांचवें वर्ष के लिए अपनी स्थिति नंबर वन बनाए रखी।

फ्रेट सेक्टर

पश्चिम रेलवे ने फ्रेट सेक्टर में कई प्रमुख उपलब्धियाँ हासिल कींजिनमें पहला समर्पित रेफ्रिजरेटेड (रीफर) कंटेनर रेक MHPL–साणंद से पीपावाव पोर्ट तक और पहली बार दो डिम्ड VP रेक का लिंक  से सांकरेल गुड्स टर्मिनल तक लोडिंग शामिल हैजो लॉजिस्टिक सेवाओं में विविधीकरण को दर्शाता है।

हमारी सुरक्षा उपायों को मजबूत करना

पश्चिम रेलवे आरपीएफ कर्मियों की सतर्कतात्वरित प्रतिक्रिया और साहसिक प्रयासों के चलते ऑपरेशन जीवन रक्षा के तहत 37 बहुमूल्य जीवन बचाए गए।

बाल सुरक्षा के प्रति सहानुभूति और प्रतिबद्धता दिखाते हुएऑपरेशन नन्हे फरिश्ते के अंतर्गत 769 भगोड़े/लापता बच्चों को बचाकर उनके परिवारों के साथ सुरक्षित रूप से मिलवाया गया।

ऑपरेशन अमानत के तहतपश्चिम रेलवे आरपीएफ ने यात्रियों की छोड़ी हुई संपत्तियों को उचित सत्यापन के बाद 5000 से अधिक यात्रियों को लौटायाजिनकी कुल कीमत ₹11.66 करोड़ से अधिक थी।

स्वास्थ्य सेवा में उत्कृष्टता और कर्मचारी कल्याण

पश्चिम रेलवे ने वर्ष के दौरान स्वास्थ्य सेवा में कई महत्वपूर्ण उपलब्धियाँ हासिल कीं। डिवीज़नल रेलवे अस्पतालराजकोट भारतीय रेल का पहला अस्पताल बन गयाजिसे मेडिकल एंट्री-लेवल टेस्टिंग (MELT) के लिए NABL मान्यता प्राप्त हुईइसके बाद राजकोटबादश्वर पार्कसाबरमती और वलसाड के पैथोलॉजी प्रयोगशालाओं को भी NABL मान्यता दी गई।

एक ऐतिहासिक चिकित्सा उपलब्धि के रूप मेंभारतीय रेलवे का पहला अवे क्रैनियोटोमी (Awake Craniotomy) सफलतापूर्वक जगजीवन राम अस्पतालमुंबई सेंट्रल में किया गया। साथ हीएक अत्याधुनिक CT और MRI स्कैन सेंटर 3-टेस्ला MRI के साथ स्थापित किया गयाजिससे चिकित्सा सेवाओं में महत्वपूर्ण सुधार हुआ।

सततता और हरित पहल

पर्यावरणीय सततता पश्चिम रेलवे की प्रमुख प्राथमिकताओं में से एक बनी हुई है। 100% विद्युतीकरणओपन-एक्सेस ग्रीन पावर का अपनानासौर ऊर्जा पहल और वॉटर रीसाइक्लिंग प्‍लांट के माध्यम से पश्चिम रेलवे ने अपने कार्बन फूटप्रिंट को महत्वपूर्ण रूप से कम किया। राजकोट स्टेशन को अपने पर्यावरण प्रबंधन प्रणाली के लिए ISO 14001:2015 प्रमाणन से सम्मानित किया गयाजो सतत स्टेशन प्रबंधन के प्रति पश्चिम रेलवे की प्रतिबद्धता को दर्शाता है।

पश्चिम रेलवे ने 98 “ईट राइट” प्रमाणन हासिल किएजो भारतीय रेल में सबसे अधिक हैंऔर यह स्टेशनोंअस्पतालोंस्टाफ कैंटीन और रनिंग रूम को कवर करते हैं।

विरासतसमावेशिता और जनसंपर्क

वर्ष 2025 मेंपश्चिम रेलवे ने विरासत संरक्षणसमावेशिता और जनसंपर्क पर अपने फोकस को मजबूत किया और कई महत्वपूर्ण पहलों के माध्यम से इसे प्रदर्शित किया। बांद्रा स्टेशन महोत्सव बड़े उत्साह के साथ मनाया गयाजिसमें प्रतिष्ठित बांद्रा उपनगरीय रेलवे स्टेशन की समृद्ध विरासतस्थापत्य धरोहर और जनसंपर्क को उजागर किया गया। यह स्टेशन एक ग्रेड-विरासत संरचना है और मुंबई के प्रमुख रेलवे स्थलों में से एक है।

1888 में बने इस विरासत स्टेशन को सांस्कृतिक कार्यक्रमोंविरासत प्रदर्शनीरचनात्मक प्रतियोगिताओं और समुदाय-केंद्रित गतिविधियों के माध्यम से प्रस्तुत किया गयाजिससे पश्चिम रेलवे की रेलवे विरासत को संरक्षित करने और यात्रियों व समुदाय की भागीदारी को बढ़ावा देने की प्रतिबद्धता को बल मिला।

वर्ष के दौरानरतलाम स्टेशन भवन ने अपना शताब्दी वर्ष मनाया, 100 वर्षों की सेवा पूरी कीजिसे विरासत-केंद्रित और जनसंपर्क पहलों के माध्यम से मनाया गयाजिसमें भारतीय रेलवे के विकास में इसकी महत्वपूर्ण भूमिका को सम्मानित किया गया।

पश्चिम रेलवे ने महिलाओं के सशक्तिकरण और समावेशिता को भी बढ़ावा दियाजिसमें पहली संपूर्ण महिला TRD मेंटेनेंस टीम की तैनाती और आरपीएफ पहलों जैसे मेरी सहेली शामिल हैं। रेल की धड़कन” जैसे जनसंपर्क कार्यक्रम और पश्चिम रेलवे द्वारा भारतीय रेल का पहला पॉडकास्ट चैनल लॉन्च करना यात्रियों के साथ जुड़ाव और सार्वजनिक सहभागिता को मजबूत करने में सहायक रहे।

पश्चिम रेलवे ने विभिन्न क्षेत्रों में उत्कृष्ट प्रदर्शन के लिए अति विशिष्ट रेल सेवा पुरस्कार’ के तहत कुल सात शील्ड जीतकर एक महत्वपूर्ण उपलब्धि हासिल की।

खेलों को बढ़ावा

पश्चिम रेलवे के एथलीटों ने वर्ष 2025 में अपनी उत्कृष्ट अंतरराष्ट्रीय उपलब्धियों के माध्यम से देश और संगठन का गौरव बढ़ाया। सुश्री अंतिम पंघल ने मंगोलिया में आयोजित अंतरराष्ट्रीय महिला कुश्ती टूर्नामेंट 2025 और बुडापेस्ट टूर्नामेंट में स्वर्ण पदक जीते। इसके अतिरिक्तभारत ने ढाकाबांग्लादेश में आयोजित द्वितीय महिला कबड्डी विश्व कप का खिताब अपने नाम कियाजिसमें पश्चिम रेलवे की सुश्री सोनाली शिंगटे ने टीम की राइट रेडर के रूप में प्रभावशाली प्रदर्शन करते हुए भारत की जीत में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

100% विद्युतीकरणसमयपालनता में नेतृत्वरिकॉर्ड इंफ्रास्ट्रक्चर निर्माणमजबूत वित्तीय प्रदर्शनडिजिटल परिवर्तन और लोगों को प्राथमिकता देने वाले दृष्टिकोण के साथ, 2025 पश्चिम रेलवे की यात्रा में एक मील का पत्थर साबित हुआ। इस वर्ष की उपलब्धियाँ पश्चिम रेलवे की रेलवे संचालन में राष्ट्रीय मानक के रूप में स्थिति को पुनः पुष्टि करती हैं और भविष्य में विकास और नवाचार के लिए एक मजबूतलचीला आधार तैयार करती हैं।

वीर बाल दिवस पर हिन्दू कालेज में श्रद्धांजलि सभा

दिल्ली।  देश से बढ़कर और कुछ नहीं होता। देश के लिए मनुष्य अपना सर्वोच्च बलिदान कर सकता है जिसकी अद्भुत उदाहरण साहिबजादों जोरावर सिंह और बाबा फतेह सिंह ने अपने प्राणो का उत्सर्ग कर दर्शाया था। यह बलिदान आने वाली पीढ़ियां भी कभी भुला नहीं सकतीं। हिन्दू कालेज में वीर बाल दिवस पर आयोजित श्रद्धा सुमन कार्यक्रम में कार्यवाहक प्राचार्या प्रो रीना जैन ने कहा कि युवा पीढ़ी को इन वीर बलिदानियों को अपना आदर्श बनाना चाहिए जिन्होंने आयु और अनुभव के सारे पुराने उदाहरण पीछे छोड़ दिए।

आयोजन में हिन्दू विभाग के प्रभारी प्रो बिमलेन्दु तीर्थंकर ने कहा कि वीर बाल दिवसबार बार याद दिलाता है कि साहस आयु का मोहताज नहीं होता, छोटी उम्र भी बड़े और असम्भव कार्य किये जा सकते हैं। महाविद्यालय के कोषाधिकारी डॉ वरुणेन्द्र सिंह रावत ने कहा कि गुरु गोबिंद सिंह जी के साहिबजादों ने यह दिखा दिया कि सच्चाई और आत्मसम्मान के लिए खड़े होना सबसे बड़ा धर्म है।

राष्ट्रीय सेवा योजना के कार्यक्रम अधिकारी डॉ पल्लव ने कहा कि यह दिन पूरे देश के लिए प्रेरणा का प्रतीक है जब हम इस बलिदान से ईमानदारी, निडरता और बलिदान का महत्व समझते हैं। उन्होंने कहा कि राष्ट्रीय सेवा योजना के स्वयं सेवक ऐसे वीरों से प्रेरणा लेते हैं।

इससे पहले राष्ट्रीय सेवा योजना के विद्यार्थी अध्यक्ष निशांत सिंह ने सभी का स्वागत किया और आयोजन की रूपरेखा प्रस्तुत की। आयोजन में महाविद्यालय के शिक्षकों, सह शैक्षणिक कर्मचारियों और विद्यार्थियों ने साहिबजादों को पुष्पांजलि अर्पित कर सम्मान प्रदर्शित किया।

अंत में राष्ट्रीय सेवा योजना की विद्यार्थी उपाध्यक्ष नेहा यादव ने सभी का आभार व्यक्त किया।

अर्चिता द्विवेदी
जन संपर्क प्रमुख
राष्ट्रीय सेवा योजना
हिन्दू महाविद्यालय, दिल्ली
मो -9452536877

देववाणी संस्कृत उच्चारण से रोगनाशक सिद्धान्तों की वैज्ञानिकता

संस्कृत भाषा संसार की समस्त भाषाओं में अपना विशेष एवं गौरवपूर्ण स्थान रखती है। स्वरों की रचना हमारे ऋषियों ने ऐसी दूरदर्शिता के साथ की है कि इस भाषा को बोलने से एक प्रकार का सूक्ष्म यौगिक व्यायाम होता है जिसके कारण बोलने वाले के शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य पर बड़ा उत्तम प्रभाव पड़ता है। इन्हीं विशेषताओं के कारण संस्कृत को देववाणी कहा जाता है।
‘स्वर’ – ‘अ’ का उच्चारण कंठ द्वारा होने से हृदय पर प्रभाव पड़ता है अतएव जितनी बार ‘अ’ का उच्चरण किया जायेगा, उतनी ही बार हृदय का संचालन शीघ्रता के साथ होगा। इससे शरीर में रुधिर प्रवाहित होने की क्रिया हृदय से ही होती है और किसी विकृत अंग के लिये जो रुधिर जाता है उसको भेजने वाला हृदय ही है। यदि यह रुधिर इस विकृत अंग में कम मात्रा में पहुँचाता है तो उसका प्रभाव यह होगा कि रोग दूर हो जायेगा इसके विपरीत यदि रुधिर कम मात्रा में जाता है तो अंग अच्छा होने के बजाय और अधिक रोगी हो जायेगा।
 “अ” स्वर प्रत्येक अंग में शुद्ध रक्त का संचार करता है। मंत्र शास्त्र में (अ) स्वर रचनात्मक शक्ति माना गया है।
‘‘आ’’ स्वर के उच्चारण से फेफड़े के ऊपरी भाग तथा सीने पर प्रभाव पड़ता है। यह उपरी तीन पसलियों को बलवान बनाता है, भोजन ले जाने वाली नली को शुद्ध तथा फेफड़ों को उत्तेजित करके उनके ऊपरी भाग को शुद्ध करता है इसके अभ्यास से दमा और खाँसी के रोग अच्छे होते हैं। इस स्वर का अभ्यास उन लोगों को तो अवश्य करना चाहिये जिन्हें क्षय रोग होने की संभावना हो और जो झुककर अँधेरे में काम करते हैं। गायक लोग जो प्राचीन भजनों में ‘‘आ’’ का उच्चारण अनेक बार करते हुए लय मिलाते हैं। इसीलिए, देखा गया है कि संगीताचार्य कम बीमार पड़ते हैं तथा शीघ्र ही स्वस्थ हो जाते हैं। (‘‘इ ई’’) के लम्बे उच्चारण का प्रभाव गले तथा मस्तिष्क पर पड़ता है। इसके उच्चारण से गले, नाक, तालु, दिल के ऊपरी भाग की क्रिया विशेष रूप से उत्तेजित होती है। कफ, बलगम एवं आंतों में जमा हुआ मल निकल जाता है जिससे श्वासेन्द्रिय की भी सफाई होती है। इसका प्रभाव शरीर पर भी पड़ता है। इसका उच्चारण सिर दर्द तथा दिल के रोगों में भी लाभदायक है। जो व्यक्ति क्रोधी तथा उदासवृत्ति के होते हैं, उन पर इसका अच्छा प्रभाव पड़ता है।
(उ-ऊ) का प्रभाव जिगर पेट और अंतड़ियों पर पड़ता है और जो स्त्रियाँ पेडू के भार के रोग से पीड़ित रहती हैं उन्हें (उ-ऊ) के उच्चारण से बड़ा लाभ होता है कितने ही दिनों का कठिन कब्ज क्यों न हो इसके द्वारा दूर किया जा सकता है। यह स्त्रियों के गर्भ के लिये भी लाभदायक होता है।
‘‘ए-ऐ’’ के उच्चारण का प्रभाव गले और श्वांस नलिका के उद्गम स्थान पर पड़ता है और गुर्दे को उत्तेजित करता है। इसका बार-बार उच्चारण मूत्र संबंधी रोगों को दूर करता तथा पेशाब उतारने में औषधि का काम करता है। इस स्वर के प्रयोग का लाभ अध्यापकों तथा देर तक बोलने वालों को होता है तथा नलियों के अंदर की लुआवदार झिल्ली को स्वस्थ  बनाता है।
(‘‘ओ-औ’’) का प्रभाव उपस्थेन्द्रिय और जननेन्द्रिय पर होता है और वह उसको स्वभाविक रूप से काम करने में सहायता देता है। जब इसके उच्चारण का अच्छा अभ्यास हो जायेगा तब यह अनुभव होगा कि जो आंतें तथा नसें सुस्त थी वह खुलकर स्वाभाविक कार्य करने लगी हैं। यह सीने के मध्य भाग को उत्तेजित करता है और निमोनियाँ तथा प्लुरेसी के लिये बहुत लाभदायक है।
(अं) के उच्चारण से नासिका द्वारा ली गयी सांस के साथ जो ऑक्सीजन या प्राणवायु शरीर के भीतर जाती है वह दूषित, रुधिर को शुद्ध तथा लाल बनाती है। नासिका द्वारा सांस लेने में नासिका तथा श्वास नलिका प्रयुक्त होती है, इसलिये इन अंगों का विकार रहित एवं निरोग होना अत्यावश्यक है और इसी अभिप्राय से हमारे महर्षियों ने प्रत्येक बीज मंत्र के अंत में ‘‘म्’’ अथवा अनुस्वार को रखा है तथा उसका देर तक लम्बा उच्चारण करने का संदेश दिया है। स्वरों के उच्चारण करने में मुख खुलता है और अनुस्वार या ‘‘म’’ के उच्चारण से ओष्ठ बंद हो जाते हैं। ऐसा प्रतीत होता है कि मानो प्रथम स्वरों के उच्चारण द्वारा शरीर के समस्त विकारों को दूर कर ‘‘म्’’ द्वारा ओष्ट रूपी किवाड़ बंद कर लिये जाते हैं जिससे यह विकार पुन: प्रविष्ट न हो सकें।
‘‘शंख’’ – हिन्दुओं के मंदिरों में दोनों समय शंख बजाया जाता है किन्तु बजाने और सुनने वाले दोनों ही यह नहीं जानते कि इसके बजाने से ध्वनि के अलावा और भी कोई फायदा है या नहीं, फिर भी धर्म समझकर बजाते हैं।
प्रोफेसर जगदीश चन्द्र जी बोस जो एक प्रसिद्ध विज्ञानाचार्यों में से एक थे, अपने प्रयोगों द्वारा वह सिद्ध कर दिखाया कि जहाँ तक शंख ध्वनि पहुँचती है वहाँ तक रोगों के अनेक कीटाणु स्वयं नष्ट हो जाते हैं और वायु शुद्ध हो जाती है। शंख बजाना आरोग्य के लिए बहुत ही अच्छा है, छुआछूत की बीमारी के समय इसे विशेष रूप से काम में लाना चाहिए। अर्थात् संक्रामक रोगों में शंख बजाना लाभदायक है। मालवा प्रान्त के ग्रामीण अंचल में एक प्रसिद्ध कहावत प्रचलित है कि-
 ‘‘शंख बाजे और सरला उड़े’’ अर्थात् शंख की ध्वनि से कीटाणु नष्ट हो जाते हैं। भारतीय संस्कृति में यह निर्विवाद रूप से कहा गया है कि सुबह और शाम को संधियों में शंख बजाने से राक्षसगण दूर होते हैं। राक्षस शब्द का अर्थ यह है कि जिससे रक्षा की जानी चाहिये वह राक्षस है। इस अर्थ के अनुसार रोगों के कीटाणु भी राक्षस हो सकते हैं। संध्या के समय रोगों के कीटाणु पैदा होते हैं और बढ़कर पैâलते हैं। अत: उस समय शंख बजाना आरोग्य के लिये बहुत अच्छा है। अब तो पाश्चात्य वैज्ञानिकों ने भी शोधों के द्वारा ‘शंख ध्वनि’ की महत्ता सिद्ध कर दी है।
वेदों में कहा गया है कि ‘‘अन्ताय मूक शब्दाय’’ इसलिए, यदि किसी गूँगे व्यक्ति को ३-४ घण्टे श्ांख बजवाया जाये, शंख में २४ घण्टे तक रखा रहने वाला पानी पिलाया जाये और शंख भस्म भी खिलाया जाये, साथ-साथ छोटे शंखों की माला बनाकर गले में पहना दी जाये। तो कुछ वर्षों में ईश्वर कृपा से गूँगा मनुष्य अवश्य बोलने लगेगा। ऐसा कई प्रयोगों में प्रमाणित भी हो चुका है।
हमारे देश में बच्चों के गले में छोटे-छोटे शंख छेदकर पहनाने की परम्परा रही है। इससे बच्चे शीघ्र बोलने लग जाते थे और उन्हें नजर भी नहीं लगती थी किन्तु आजकल आधुनिकता की आँधी में यह प्रथा समाप्त होती जा रही है।
हिन्दू शास्त्रों में शंख की महिमा अपार है, समुद्र मंथन के समय  १४ रत्न उत्पन्न हुए थे उसमें एक शंख भी था जो ‘ॐ’ आकार का था जिससे ‘‘ॐ’’ की ध्वनि प्रगट हुयी देव मंदिरों में मठों में भजन मंडलियों में संतों की कुटीर में सभी आनन्द मंगलों के उत्सव में शंख का पवित्र नाद आर्यावर्त के घर-घर में होता रहा है। कुरुक्षेत्र के युद्ध में भगवान् श्रीकृष्ण ने पांचजन्य नामक शंख को बजाकर युद्ध का उद्घोष किया था।
यूरोपीय विज्ञान वेत्ताओं ने भी अनेक शोधों द्वारा शंख की ध्वनि में मनुष्य के लिए हितकर विद्युत ऊर्जा उत्पादन करने की क्षमता को प्रमाणित किया है।
आयुर्वेद के ग्रंथों में भी शंख की शक्ति का अपूर्व वर्णन है। शंखद्राव के सेवन से गुल्म, ताप, तिल्ली मूत्रकृच्छ्र आदि रोग दूर होते हैं। शंख में पानी या गंगाजल शोधित करके पिलाया  जाय तो कीटाणु जनित सब रोग दूर हो जाते हैं।
(साभार – चिकित्सा पल्लव : मई 2020)  https://www.facebook.com/share/p/1JyS5dP3ET/

कुशल भारतीय युवाओं को देशों में भी उपलब्ध हो रहे हैं रोजगार के अवसर

हाल ही के समय में भारतीय युवाओं ने भारतीय संस्कृति के नियमों का अनुपालन करने की ओर अपने पग बढ़ा दिए हैं। “वसुधैव कुटुम्बकम” के भाव को आत्मसात करते हुए अन्य कई देशों में उच्च शिक्षा ग्रहण करने के उद्देश्य से एवं अपनी उच्च शिक्षा समाप्त करने के पश्चात आज भारतीय युवा रोजगार प्राप्त करते हुए इन देशों में आसानी से रच बस रहे हैं। आज कई विकसित देशों में तकनीकी, स्वास्थ्य एवं रीसर्च जैसे क्षेत्रों में भारतीय मूल के नागरिकों का दबदबा बन गया है। इन देशों की अर्थव्यवस्था को गति देने में भारतीय मूल के नागरिकों के योगदान को भुलाया नहीं जा सकता है। कई अन्य देशों में रचे बसे भारतीयों ने अपनी हिंदू सनातन संस्कृति का पालन करते हुए अपनी छाप छोड़ी है। इसके चलते ही आज कई देश – रूस, जापान, इजराईल, वियतनाम, जर्मनी, यूनाइटेड किंगडम, कनाडा, फ्रान्स एवं अन्य कई देश – भारतीय युवाओं की खुले रूप से मांग करने लगे हैं। विशेष रूप से विकसित देशों में आज श्रमबल की भारी कमी महसूस की जा रही है क्योंकि इन देशों में बुजुर्गों की संख्या बहुत तेज गति से बढ़ रही है और इन देशों में युवाओं द्वारा बच्चे पैदा नहीं करने अथवा कम बच्चे पैदा करने के चलते युवाओं की बहुत कमी हो गई है। इसीलिए भी विश्व के कई देश आज भारत के साथ द्विपक्षीय व्यापार समझौते को शीघ्रता के साथ अंतिम रूप देना चाहते हैं ताकि वे भारत से श्रमबल को अपने देशों में विशेष सुविधाएं देकर आकर्षित कर सकें।

इस समय रूस लगभग 20 लाख कामगारों की कमी से जूझ रहा है। 4 एवं 5 दिसम्बर 2025 को रूस के राष्ट्रपति श्री व्लादिमीर पुतिन, 23वें भारत रूस वार्षिक शिखर सम्मेलन में भाग लेने हेतु, भारत में आए थे। रूस के राष्ट्रपति की भारत के प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी से द्विपक्षीय चर्चा में अन्य मुद्दों के साथ साथ भारतीय युवाओं के लिए रूस द्वारा अपने दरवाजे खोलने पर भी गम्भीर चर्चा हुई थी। इसके अतिरिक्त, वर्ष 2017 में प्रारम्भ हुए यूरेशियाई आर्थिक संघ के साथ मुक्त व्यापार समझौते को आगे बढ़ाते हुए उक्त 23वें भारत रूस वार्षिक शिखर सम्मेलन में भारत एवं रूस के बीच द्विपक्षीय व्यापार को बढ़ावा देने के उद्देश्य से रूस में भारत द्वारा निर्यात की जाने वाली 90 प्रतिशत वस्तुओं पर वर्ष 2028 तक शून्य टैरिफ सम्बंधी शर्तों को अंतिम रूप दिया गया। इससे भारतीय फार्मा और वस्त्र उद्योग के लिए तीन करोड़ उपभोक्ताओं का बाजार खुल जाएगा, जिससे प्रति वर्ष लगभग 1500 से 2000 करोड़ अमेरिकी डॉलर के निर्यात को बढ़ावा मिलेगा। यूरेशियाई आर्थिक संघ में रूस, बेलारूस, कजाकिस्तान, आर्मेनिया और किर्गिस्तान शामिल हैं। इस महत्वपूर्ण समझौते के अंतर्गत भारत वर्ष 2030 तक सूचना प्रौद्योगिकी, निर्माण और नर्सिंग के क्षेत्रों में रूस को लगभग 5 लाख भारतीय श्रमबल उपलब्ध कराएगा। इससे भारत को अपने रोजगार सृजन के लक्ष्य को पूरा करने और अपनी जनसांख्यिकी बढ़त का लाभ उठाने का अवसर मिलेगा। रूस के उद्योगपतियों एवं उद्यमियों के संघ के उपाध्यक्ष ने तो बताया है कि रूस को 50 लाख कुशल श्रमिकों की आवश्यकता है और भारत रूस की इस कमी को पूरा करने में अपनी अहम भूमिका निभा सकता है।

आज इजराईल भी, विशेष रूप से हम्मास के साथ हुए संघर्ष के बाद से, निर्माण के क्षेत्र में कुशल श्रमिकों की कमी से जूझ रहा है और भारत की ओर बहुत आशाभारी नजरों से देख रहा है। इजराईल ने भारत से एक लाख श्रमिकों को उपलब्ध कराने हेतु आग्रह किया है। इजराईल ने भारत के साथ इस सम्बंध में एक द्विपक्षीय रूपरेखा करार भी किया है। भारतीय संसद में उपलब्ध कराई गई जानकारी के अनुसार, इस करार के अंतर्गत, 1 जुलाई 2025 तक 6,774 भारतीय कामगारों को इजराईल भेजा जा चुका है। उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा इजराईल भेजे जाने वाले श्रमिकों को प्रशिक्षण प्रदान किया जा रहा है ताकि उत्तर प्रदेश से अधिकतम युवाओं को इजराईल भेजकर उन्हें वहां पर आसानी से रोजगार उपलब्ध कराया जा सके।

भारत के प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी एवं जापान के प्रधानमंत्री श्री शिगेरू इशिबा के बीच 29-30 अगस्त, 2025 को जापान में हुई बैठक में भारत और जापान के बीच रणनीतिक सहयोग की दिशा में एक दूरदर्शी मार्ग प्रशस्त किया है और दोनों देशों के बीच अगले दशक के लिए एक व्यापक संयुक्त विजन की नींव रखी गई है। जापान ने आगामी दस वर्षों में भारत में अपने निवेश को 2024 के स्तर, लगभग 4,300 करोड़ अमेरिकी डॉलर, से बढ़ाकर, 6,800 करोड़ अमेरिकी डॉलर (10 लाख करोड़ जापानी येन) करने की प्रतिबद्धत्ता दिखाई है। पूंजी के प्रवाह के साथ ही, जापान एवं भारत ने एक “पीपल टू पीपल” आदान प्रदान कार्यक्रम को भी आगे बढ़ाने की बात कही है। इस कार्यक्रम का लक्ष्य है कि जापान की प्रौढ़ हो रही आबादी के चलते वहां के संरचनात्मक श्रमबल के क्षेत्र में कमी को कम करने और भारत के डेमोग्राफिक डिवीडेंड का लाभ उठाने के लिए आने वाले 5 वर्षों में जापान में 5 लाख भारतीय छात्रों और श्रमिकों को भेजने के लक्ष्य को लेकर दोनों देश काम करेंगे। जापान, भारतीय नर्सों के लिए भी अवसर गढ़ने का प्रयास कर रहा है क्योंकि वहां चिकित्सा के क्षेत्र में चिकित्सकों एवं नर्सों की भारी कमी है, जबकि जापान में बुजुर्गों की संख्या बहुत तेजी से बढ़ रही है।

इन्वेस्टमेंट बैंकर श्री सार्थक आहूजा की एक रिपोर्ट के अनुसार, जर्मनी, जापान, फिनलैंड एवं ताईवान भारतीय श्रमिकों की सक्रिय रूप से तलाश कर रहे हैं। जर्मनी में स्वास्थ्य सेवा, आईटी, इंजीनीयरिंग और निर्माण जैसे  क्षेत्रों में पेशेवर श्रमिकों की भारी कमी है। जर्मनी प्रतिवर्ष लगभग 90,000 भारतीय कुशल श्रमिकों को वीजा जारी करने की योजना बना रहा है। जर्मनी में महत्वपूर्ण क्षेत्रों में 7 लाख से अधिक नौकरियां उपलब्ध हैं। फिनलैंड भारतीयों को आकर्षित करने के उद्देश्य से उन्हें स्थायी निवास प्रदान करने की पेशकश कर रहा है। ताईवान विनिर्माण के क्षेत्र में भारतीय श्रमिकों की तलाश में है।

भारतीय संसद में उपलब्ध कराई गई एक जानकारी के अनुसार पिछले 5 वर्षों के दौरान (जनवरी 2020 से 30 जून 2025 तक) कुल 16,06,964 भारतीय श्रमिकों को विभिन्न देशों में रोजगार के लिए मंजूरी प्रदान की गई है। भारत सरकार ने भारतीय श्रमिकों के हितों की रक्षा के लिए विभिन्न देशों से इस संबंध में विभिन्न प्रकार के समझौते भी सम्पन्न किये हैं। आस्ट्रिया, औस्ट्रेलिया, फ्रान्स, जर्मनी, इटली, डेनमार्क और यूनाइटेड किंगडम के साथ प्रवासन और आवाजाही भागीदारी समझौता सम्पन्न किया गया है। जापान, पुर्तगाल, ताईवान, मारीशस, मलेशिया और इजराईल के साथ श्रम आवाजाही समझौता सम्पन्न किया गया है। बहरीन, कुवैत, ओमान, कतर, साऊदी अरब, यूनाइटेड अरब अमीरात और जॉर्डन जैसे खाड़ी सहयोग देशों (जी सी सी) के साथ श्रम और जन शक्ति सहयोग समझौता सम्पन्न किया गया है जो श्रम और जनशक्ति मुद्दों पर सहयोग के लिए व्यापक रूपरेखा प्रदान करते हैं। साऊदी अरब, यूनाइटेड अरब अमीरात और कुवैत के साथ अलग अलग समझौता ज्ञापन (एम ओ यू) और समझौता घरेलू श्रमिकों के लिए सुरक्षा उपायों की रूपरेखा तैयार करता हैं। इन समझौता ज्ञापनों और करारों में एक संयुक्त कार्य समूह के माध्यम से कार्यान्वयन का प्रावधान है, जहां सम्बंधित देशों के साथ संयुक्त कार्य समूहों की नियमित बैठकों के दौरान श्रमिकों के कल्याण और सुरक्षा से सम्बंधित मामलों पर विचार किया जाता है।

विकसित देशों यथा यूरोपीय महाद्वीप के कई देश – यूनान, इटली, ब्रिटेन, फ्रांन्स आदि एवं इजराईल में भारतीय श्रमिकों की मांग बढ़ रही है। भारत ने श्रमिक उपलब्ध कराने के लिए वर्ष 2023 तक 17 देशों के साथ समझौते सम्पन्न किए हैं। विदेशों में काम करने वाले भारतीयों की संख्या वर्ष 1990 में 66 लाख से बढ़कर वर्ष 2024 में 185 लाख हो गई है, जो तीन गुना वृद्धि है। इसी अवधि में वैश्विक प्रवासियों में भारतीयों की हिस्सेदारी 4.3 प्रतिशत से बढ़कर 6 प्रतिशत से अधिक हो गई है। खाड़ी देशों में रहने वाले प्रवासी भारतीय विश्व के कुल प्रवासी भारतीयों का लगभग आधा हिस्सा है। यूरोप, जापान, रोमानिया, फिनलैंड, रूस, जर्मनी, साऊदी अरब और पश्चिम एशिया में भारतीय श्रमिकों की मांग को पूरा करने के लिए नेशनल स्किल डेवलपमेंट कारपोरेशन (NSDC) भारतीय युवाओं को प्रशिक्षण भी प्रदान कर रहा है।

 NSDC अभी तक लगभग 60,000 भारतीय युवाओं को जापान, जर्मनी, इजराईल, ब्रिटेन, बहरीन एवं साऊदी अरब जैसे देशों में रोजगार दिला चुका है। विश्व के कई देशों में कुशल श्रमिकों के रूप में भारतीय युवाओं की मांग तेजी से बढ़ रही है। इसीलिए केंद्र सरकार द्वारा कौशल विकास योजना चलाई जा रही है जिसका उद्देश्य देश में कुशल श्रमिकों की मांग को पूरा करना है तथा भारत को ग्लोबल मैनपावर सप्लायर के रूप में स्थापित करना भी लक्ष्य है। यह रणनीति भारत के युवा आबादी को देखते हुए विशेष तौर पर बहुत महत्वपूर्ण है। यूरोप, जापान और अन्य देशों में आबादी बूढ़ी हो रही है, ऐसे समय में यह भारत के पास एक बड़ा अवसर है। केंद्र सरकार की यह कोशिश है कि अधिक से अधिक युवाओं को रोजगार मिल सके। इसके लिए कौशल विकास पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है एवं अन्य देशों में भी भारतीय युवाओं के लिए रोजगार के अवसर तलाशे जा रहे हैं।

प्रहलाद सबनानी
सेवानिवृत्त उपमहाप्रबंधक,
भारतीय स्टेट बैंक
के-8, चेतकपुरी कालोनी,
झांसी रोड, लश्कर,
ग्वालियर – 474 009
मोबाइल क्रमांक – 9987949940
ई-मेल – prahlad.sabnani@gmail.com

भोजपुरी के महान कवि पं.चन्द्रशेखर मिश्र

भारत भाषाई विविधताओं का देश है जहां सैकड़ों भाषाएं तथा उनके अन्तर्गत हजारों बोलियां व उपबोलियां प्रचलित हैं। हिन्दी की ऐसी ही एक बोली भोजपुरी है, जो पूर्वी उत्तर प्रदेश,बिहार तथा फिजी सूरीनाम मॉरीशस आदि देश के बड़े भाग में बोली जाती है। अपने व्यापक प्रभाव के कारण अनेक साहित्यकार तथा राजनेता इसे अलग भाषा मानने का आग्रह भी करते हैं। सरकार इसके विकास के लिए पर्याप्त ध्यान नहीं दे पा रही है।

भोजपुरी के श्रेष्ठ साहित्यकार श्री चंद्रशेखर मिश्र का जन्म 30 जुलाई, 1930 को ग्राम मिश्रधाम (जिला मिर्जापुर, उ.प्र.) में हुआ था। उनका पालन-पोषण उनके ननिहाल बनारस के जरी परसीपुर गांव में हुआ था। उन्होंने उस युग में पढ़ाई लिखाई के लिए क्रांतिकारी सन्यासी बाबा गोविन्ददास के द्वारा स्थापित विद्यालय में कक्षा 5 तक की शिक्षा ग्रहण की थी। इस विद्यालय का प्रभाव मिश्र जी पर खूब पड़ा। वन्दे मातरम का पाठ और मामा सत्य नारायण दुबे के क्रांतिकारी स्वभाव मिश्र जी पर खूब पड़ा। गांव में अपने माता-पिता तथा अन्य लोगों से भोजपुरी लोकगीत व लोककथाएं सुनकर उनके मन में भी साहित्य के बीज अंकुरित हो गये थे । कुछ समय बाद उन्होंने कविता लेखन को अपनी अभिव्यक्ति का माध्यम बना लिया ।

भोजपुरी काव्य मुख्यतः श्रृंगार प्रधान होते है। इस चक्कर में कभी-कभी तो यह अश्लीलता की सीमाओं को भी पार कर जाता है। होली के अवसर पर बजने वाले गीत इसके प्रत्यक्ष प्रमाण हैं। इसके कारण भोजपुरी लोककाव्य को कई बार हीन दृष्टि से भी देखा जाता है। चंद्रशेखर मिश्र इससे व्यथित हुए थे। उन्होंने दूसरों से कहने की बजाय स्वयं ही इस धारा को बदलने का निश्चय किया।

1942 के आंदोलन में गोविंद प्रसाद जी और मामा सत्य नरायण दुबे जी के गिरफ्तारी के बाद मिश्र जी अपने  साथियों के संग परसीपुर स्टेशन को आग लगा दिया था। उस जगह से वे इलाहाबाद फरार हो गए थे, जहाँ उनकी गिरफ्तारी हुई और उन्हें जेल जाना पड़ा था।

आजादी के लड़ाई में शामिल होने और जेल भी जाने के कारण उनकी लेखनी पर भी इसका प्रभाव पड़ा। इस कारण शुरुवाती दिनों में वीर रस के रचना को उन्होंने अपनाया। धीरे धीरे वहां से वह वाराणसी आए फिर राष्ट्रीय स्तर पर वे सक्रिय हो गए। मिश्र जी ने स्वाधीनता के समर में भाग लेकर कारावास का गौरव बढ़ाया था। अतः सर्वप्रथम उन्होंने वीर रस की कविताएं लिखीं। गांव की चौपाल से आगे बढ़ते हुए जब ये वाराणसी और फिर राष्ट्रीय कवि सम्मेलनों में पहुंचीं, तो इनका व्यापक स्वागत हुआ। राष्ट्रीयता के उभार के साथ ही भाई और बहिन के प्रेम को भी उन्होंने अपने काव्य में प्रमुखता से स्थान दिया।

17 अप्रैल, 2008 को 78 वर्ष की आयु में भोजपुरी साहित्याकाश के इस तेजस्वी नक्षत्र का अवसान हो गया। उनकी इच्छा थी कि उनके दाहसंस्कार के समय भी लोग भोजपुरी कविताएं बोलें। लोगों ने इसका सम्मान करते हुए वाराणसी के शमशान घाट पर उन्हें सदा के लिए विदा किया।

साहित्यिक कृतियां :-

‘दउरी हंकवा’

आजाद भारत में मिश्र जी के लेखनी से वीररस को नई ऊंचाई दी। पं. चंद्रशेखर मिसीर जी की पहिला रचना ‘दउरी हंकवा’ थी। इसमें गांव के दलित समाज पर सामंती वर्ग की ओर से होने वाला अत्याचार को दर्शाया गया है ।  समाचार ‘आज’ में यह रचना विशेष नोट के साथ प्रकाशित हुआ था।बाद में आज, उत्तरप्रदेश, सन्मार्ग में इनकी  रचनायें प्रकाशित होने लगी।

नागरी प्रचारिणी सभा’ में संपादक

कुछ समय के बाद बनारस के ‘ नागरी प्रचारिणी सभा’ में इन्हें ‘संपादक के रूप में नियुक्त हो गए थे। जहां वे लंबे समय तक जुड़े रहे। वे आकाशवाणी से भी बहुत लम्बे समय तक जुड़े रहे।

अन्य रचनाएं

इसके बाद अनेक ग्रंथों की रचना मिश्र जी ने की है – लोरिकचंद्र,गाते रूपक, देश के सच्चे सपूत, पहला सिपाही, आल्हा ऊदल, जाग्रत भारत,धीर, पुंडरीक, रोशनआरा आदि। साहित्य की इस सेवा के लिए उन्हें राज्य सरकार तथा साहित्यिक संस्थाओं ने अनेक सम्मान एवं पुरस्कार दिये। उनके काव्य की विशेषता यह थी कि उसे आम लोगों के साथ ही प्रबुद्ध लोगों से भी भरपूर प्रशंसा मिली। इस कारण उनकी अनेक रचनाएं विश्व विद्यालय स्तर पर पढ़ाई जाती हैं। कवि सम्मेलन के मंचों से एक समय भोजपुरी लगभग समाप्त हो चली थी। ऐसे में चंद्रशेखर मिश्र ने उसकी रचनात्मक शक्ति को जीवित कर उसे फिर से जनमानस तक पहुंचाया।

पृष्ठभूमि सहित प्रमुख रचनाएं

राष्ट्र जागरण के लिए “कुंवर सिंह” उनके लेखन का उद्देश्य था कि हर व्यक्ति अपनी तथा अपने राष्ट्र की शक्ति को पहचाकर उसे जगाने के लिए परिश्रम करे। राष्ट्र और व्यक्ति का उत्थान एक-दूसरे पर आश्रित है। उन्होंने 1857 के प्रसिद्ध क्रांतिवीर कुंवर सिंह पर एक खंड काव्य लिखा। यह चंद्रशेखर मिश्र जी के प्रसिद्ध दिलाने वाला महाकाव्य बना। ‘कुँअर सिंह’ की भूमिका सम्पूर्णानंद जी लिखी इस प्रकार लिखी है –

झूमत बा इतिहास जहां

तहँ कईसे भूगोल रही ख़तरे में।

छुरी कटारी बिकय सगरों,

चूड़हारिन गांव में आवत नाहीं।

  यह महाकव्य 1966 में प्रकाशित हुआ है ।1958 में भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के शताब्दी वर्ष मनाया जा रहा था। उस समय बाबू रघुबंश नारायण सिंह जी के सम्पादन में प्रकाशित होने वाली भोजपुरी मासिक पत्रिका में बाबू कुंअर सिंह पर एक बड़ा लेख ‘बिहार केशरी बाबू कुंअर सिंह’ पर आया । इस लेख का असर पं चंद्रशेखर मिश्र जी पर इतना पड़ा कि इस महाकाव्य का  सृजन हुआ। इससे उनकी लोक प्रियता में चार चांद लग गये। कवि सम्मेलनों में लोग आग्रह पूर्वक इसके अंश सुनते थे। इसे सुनकर लोगों का देश प्रेम हिलोरें लेने लगता था। युवक तो इसके दीवाने ही हो गये। इस ग्रन्थ के कुछ पंक्तियां इस प्रकार है –

नेवता बलि बेदी क छोड़िके,

औरन कs कबहूँ यह आवत नाहीं ।

मारू, जुझारू बजई बजना,

केहु दोसर राग बजावत नाहीं ॥

छोड़ि के बीर भरी कविता,

रस दूसर में केहू गावत नाहीं ।

छूरी-कटारी बिकइ सगरउँ ,

चुरिहारिन गाउँ में आवत नाहीं ॥

पूतन से बुढवा कहले,

रन कइसे चली रहली न जवानी ।

पेड़ किनारे क जानs हमईँ,

बस चार दिना क बची जिनगानी ॥

वेद के मंत्र से पिंड ना लेबइ,

बोलs तबउ जय देस क बानी ।

पानी बचाई के ना रखबs ,

तब ना हम लेबइ सराध में पानी ॥

छाँटली बाँह गिरि छप से,

किछु दूरी बनी तब लाल निसानी ।

भोजपुरी भुइयाँ हुलसी,

कोखिया जनमा बेटवा बलिदानी ॥

भागीरथी से कहै धरती ,

जब लेइ लहरा नदिया इतरानी ।

बोलs ई नीर तोहार हु या,

हमरे बेटवा के कटार के पानी ॥

‘द्रौपदी’ खण्डकाव्य भोजपुरी में

कुंवर सिंह की सफलता के बाद उन्होंने अनेक भोजपुरी और हिन्दी पुस्तकों की रचना की। जहाँ ‘कुँअर सिंह’ महाकाव्य वीर रस प्रधान महाकाव्य रहा उसी युग में ‘द्रौपदी’ खण्डकाव्य भोजपुरी में करुण रस के अप्रतीम उदाहरण है। द्रौपदी काव्य की कुछ पंक्तियां इसप्रकार है –

मोछि मुरेरत आंखि घुरेरत

पापी के केहू निरेखत नाहीं ।

ताकत बा हमही के सबै,

ओकरे ओरिया केहू ताकत नाहीं ।

सासु जेठानी खड़ी देवरानी,

दुसासन के केहू छेकत नाहीं ।

हे बिरना हमरे उपरा फटहिउ

धोतिया केहू फेकत नाहीं ।।

जीयत बा जबले भयवा,

एहसान ना आन के माथे चढइबै।

गाढे में भारी भरोस हमार

ओन्है  तजि के के भला गोहरइबै।

पांच पति पर ऐसी गती

एहि देस में साझहिं आग लगइबै ।

सासुर में सब कायर बा

अब नइहर से बिरना बोलवइबै  ।।

टारत भीड़ बढी द्रौपदी

जस हंसिनि पौरंत फाटत काई ।

ठाढि छछात लगै दुरगा,

केसिया कन्हिया रहलें छितराई ।

बोललिं धाइ धधाइ के बोललिं

एड़ी ऊँचाई के हाथ उठाईं ।

बाटै खड़ा बिरना अब देखब

बाघ बियानी बा केकरि माई ॥

तू दुर्गा बनके अइलू

तोहरे बल वीर चलावत भाला ।

माई सरस्वती तू बनलु

तोहरी किरिपा कविता बनी जाला ।

आठ भुजा नभचुंबी धुजा

नहीं मैहर में सीढ़िया चढी जाला

राउर उंचि अदालत बा,

बदरा जहां से रचिकै रहि जाला।।

नाहीं ढोवात अन्हार क भार

बा ताकत बाटे ढोवाइ न देते।

झंखत बानी अँजोर बदे

दियरी, दियरी से छुवाई न देते।

भोर समय पछितैबे अकेलइ

राह अन्हारे देखाइ न देते

बाती अकेलि कहाँ ले जरइ?

तनिका भरि नेह चुवाई न देते।।

देखले कबउँ ना बाटी

पढ़ले जरूर बाटीं

सुनी ले कि रिखि मुनि

झूठ नाहीं बोललें

बरम्हा, बिसुन औ महेस

तीनिउँ मोहि गइले,

माई तोर बीन कौन-

कौन सुर खोललें?

द्रौपदी बेचारी बाटे

खाली एक सारी बाटै,

उहो ना बचत बाटै

बैरि मिलि छोरले,

अस गाढ़ी समय में

देखब तोहार हंस

हाली हाली उड़ेलें

कि धीरे धीरे डोलेले।।

ना लूटिहई द्रौपदी कतहू

मतवा भेजबू जौउ धोती एहां से।

रोज तू सुरुज बोवलू खेत मे

रोजई भेजलू जोती एहीं से।

माई रे तोरे असिसन के बल

पाउब छंद के मोती एहीं से।

बाटई हमे बिस्वास बड़ा निह्चाई

निकले रस सोती एहीं से ॥

ढोग कविताई क रचाई गैल बाटै तब छोड़ी के दूआरी तोर बोल कहाँ जाईरे।

भाव नाही भाषा नाही छंद रस बोध नाही ।

कलम न बाटै नाही बाटै रोसनाई रे।

कौरव सभा मे आज द्रौपदी क लाज बाटै गाढे में परली बाटै मोर कविताई रे।

हियरा लगाई तनी अचंरा ओढाई लेते लडिका रोवत बा उठाई लेते माई रे ॥

ओहि दिन पुरहर राष्ट्र धृतराष्ट भैल भागि मे बिधाता जाने काउ रचि गईलें।

नाऊ त धरमराज नाहि बा सरम लाज हाइ राम लाज क जहाज पचि गईलें।

ठाट बाट हारि गईलें राजपाट हारि गईलें

आगे अब काउ हारे काउ बची गईलें।

अंत जब द्रौपदी के दाँउ पर धई देले

अनरथ देखि हहकार मची गईलें॥

नाहि ढेर बड़ि बाटै नही ढेर छोटी बाटै नाहि ढेर मोटि बाटै नाहि ढेर पतरी।

छोट छोट दांत बाटै मोती जोति माथ बाटै तनी मनि गोरी बाटै ढेर ढेर सवंरी।

बड़ बड़ बाल बाटै गोल गोल गाल बाटै गोड लाल लाल बाटै लाल लालअगुँरी।

बड़े बड़े नैन वाली मीठे मीठे बैन वाली द्रौपदी जुआरिन के दाँउ पर बा धरी॥

द्रौपदी की करुण पुकार-

गाढ़े (बिपत्ति) में जो बिसरईबs

हरी,त जा तोहसे हम बोलब नाहीं।

तू बहिना बहिना कहबs,

पर नाता कब्बो हम जोड़ब नाहीं।

सावन में तोहें बांधे बदे,

जरई कब्बो ताल में बोरब नाहीं।

आ पूष में जो खिचड़ी लेके अईबs,

भले सड़ी जाई, मो खोलब नाही।।

दौड़े चले हैं मोहन पुकार पर-

आगे से चीर बढ़े नभ में,

ओकरे पीछवाँ, दउरेले मुरारी।

आज कन्हैया भगें एतना,

उनका के ना छू पऊंले ऊरगारी ।

तीन विमान उड़े नभ में,

अगवां के बढ़े, ईहे होड़ लगा री।

आई सभा में, आकाश से कान्हा,

बढ़ावन लागे हैं, छोर से सारी।।

सारी सभा और कौरव अचंभित हैं-

साड़ी घटे ना त, बोला दुर्योधन,

‘खींच दु:शासन, जोर लगा दे।’

ई सुन, द्रौपदी हंस बोली,

‘तुहूँ अब जोर लगा शहजादे।

बाती दयादी के आई गई बा त,

बाती पे बाती, हमें भी कहे दे।

‘चीर घटी न दु:शासन से,

अपने अन्हरा बपवा के पठा दे।।’

कृष्ण द्रौपदी से कहते हैं-

आ के कन्हैया कहें बहिना,

‘काहें बोलत नईखे, कोहांईल बाड़ी।

‘राही में ना पनियो पियनी,

तनी देख हमें, कि घमाईल बाड़ीं।

‘वाहन बा अबहीं मोर पाछे,

मो पैदल धावल, आवत बानी।

‘अद्वारिकाधीश के तें बहिना,

लुगरी बदे काहें कोहांईल बाड़ी।।

कृष्ण का बहन को आश्वासन..

‘खींचे दे साड़ी, मो देखत बानी,

ईहां पर के बलवान बड़ा बा।

कि बहिना के गोहार पे भाई भी,

आ के सभा बीचवा में खड़ा बा।

फारी के तें बन्हली सड़िया,

अबहीं अंगुरी में निशान पड़ा बा।

आ सूद में ढांकब लाज तोहार,

मूल तोहार, पड़ा के पड़ा बा।।

द्रौपदी की चेतावनी

खींच दु:शासन, जोर लगाई के

टेर हमार जो ऊ सुनी पईहें।

बा विश्वास, बिपत्ती पड़े पर,

मोहन ना हमके बिसरईहें।

देर लगी, ना अबेर लगी,

बिरना, हिरना अस धावल अईहैं।

भउजी के गोदी में होइहें तबो,

मोर टेर सुनी, थीर ना रह पईहें।।

खड़ी बोली में “सीता” खण्ड काव्य

इनकी खड़ी बोली में सीता बेहतरीन खण्डकाव्य है जो देवी सीता के जीवन पर आधारित है। यथा –

ऐसा ना दण्ड विधान बना

निर्दोष रहे, नृप तो भी सजा दे ।

देवो को सारवी बनायेगा कौन

सुरेश से जाके कोई समझा दे ।

शोभा न देता है राम के राज्य में

सत्य को आ के असत्य दबा दे ।

अग्नि में भी नही साहस था ,

जो सिया तन में एक दाग लगा दे ।।

सूरज के नाम पर वंश के गुमान वाले

समय कहेगा कौन खोटा,कौन है खरा।

सारी राजनीति एक दासी थी पलट गयी

खानदान खूब पहचानती थी मंथरा ।

बाप ने तो पूत को दिया था बनवास पर,

पूत ने तो एक पग और आगे है धरा ।

राम ने कलंक हीन नारी को निकालने की,

रवि-वंश में चलायी है नई परम्परा ।।

राम हो कि रावन हो, बलि चाहे बावन हो

यश-अपयश शेष दुनिया में रहेंगे ।

जब-जब चर्चा चलेगी रघुनाथ जी की,

सीय तेरी ! महिमा में तृण सम बहेंगे ।

आगे आगे राम सदा, पीछे पीछे सीय चली

किन्तु अब सीय आगे, राम पीछे रहेंगे ।

राम-सीता, राम-सीता , कोइ न कहेगा,

लोग सीताराम ! सीताराम ! सीताराम ! कहेंगे ।।

भीष्म खण्ड काव्य

कुँअर सिंह, द्रौपदी, सीता जैसे महान काव्यों की रचना के बाद भोजपुरी में तीसरा और हिन्दी भोजपुरी के चौथा  बेहतरीन खण्डकाव्य इन्होंने ‘भीषम’ खण्डकाव्य लिखा है। जो महाभारत के भीष्म के जीवन पर आधारित खण्ड काव्य  है । इसमें वीर रस और करुण रस का अदभुत समन्वय है। यथा –

छतिया उतान कइले भीषम तड़पि बोले,

रण बीच फैसला हमार बा तोहार बा ।

भाग्यमान जसुदा के कौन बा अभाव नाथ,

घीउ-दुध माखन कs लागल पहाड़बा ।

मोरे गंगा माई के त पास खाली पानी बाटै,

पनिया में का बा इहै मछरी सेवार बा ।

तबौ कुरुखेत बीच फैसला ई होइ जाई

दूध धार-दार बा कि पानी पानीदारबा ।

के रण जीतल हारल के,

कहइँ भीषम, केसव तू ही बतावs ।

जौन करइ के ना उ कइलs अब,

मारै बदै मति कष्ट उठावs ।

चूवत लोहू तरातर बा थकि-

जइबs न भूमि कठोर पै धावs ।

मैं रखि देब गला खुद चक्र पै,

मोहन माधव केसव आवs ।।

हिंदूस्तान, किसान और देस के लिए-

आओ लगाव की बात करें ,

इस देस को तो अलगाव ने मारा ।

नीचे को जाता कभी न कोइ,

इनका उनका सबका चढा पारा ।

एक मंदिर दूजे को मस्जिद,

चहिये तीसरे को गुरुद्वारा ।

जो कुछ चाहिए दे दो उन्हे ,

हमे चाहिए हिंदुस्तान प्यारा ।।

फूल लिखो कहीं पान लिखे,

कहीं गेहूँ कहीं धान लिखो रे ।

खेत लिखो खलिहान लिखो , खलिहान के पास किसान लिखो रे ।

एक निवेदन है तुमसे,

तुम ओ मेरे बेटे जवान लिखो रे ।

देश के देखें जहाँ टुकड़े ,

उन्हे जोड़ के हिन्दूस्तान लिखो रे।।

“गांव का बरखा” की कुछ पंक्तियां-

 

हमरे गाँव क बरखा लागै बड़ी सुहावन रे।

 

सावन-भादौ दूनौ भैया राम-लखन की नाईं।

पतवन पर जेठरु फुलवन पर लहुरु कै परछाईं।

बनै बयार कदाँर कान्ह पर बाहर के खड़खड़िया।

बिजुरी सीता दुलही, बदरी गावै गावन रे। हमर।।

 

बड़ी लजाधुर बिरई अंगुरी छुवले सकुचि उठेली,

ओहू लकोअॅरी कोहड़ा क बतिया, देखतै मुरझेली।

बहल बयरिया उड़ै चुनरिया फलकै लागै गगरिया,

नियरे रहै पनिघरा, लगै रोज नहावन रे। हमर ।।

 

मकई जब रेसमी केस में मोती लर लटकावै,

तब सुगना रसिया धीर से घुँघट आय हटावै।

फूट जरतुहा बड़ा तिरेसिहा लखैत बिहरै छतिया,

प्रेमी बड़ी मोरिनियाँ लागै मोर नचावन रे। हमर.।।

 

“देखऽ अब का होला” की पंक्तियां

 

जवन कब्‍बो ना करे के

तवनो कइलीं

जहँवा गइले पाप परेला

तहँवो गइलीं

जनलस अरोस-परोस

जानि गयल टोला

देखऽ अब का होला !

 

कहलीं, त कहलन –

ई का कइलऽ?

गंगा के घरे जनमलऽ

गड़ही में नहइलऽ? !

का ऊ ना जनतन जे कमल –

गड़हिए में होला ?

देखऽ अब का होला !

 

सरग हमैं ना चाहीं

हम त पा गइलीं

केहू जरो

हम त जुड़ा गइलीं

तोहार नाँव लेके

पी गइलीं जहर

रच्‍छा करिहऽ भोला

देखऽ अब का होला !

 

उँह…!

जवन होए के होई

तवन होई

एह डरन मनई

कब ले रोई।

हमके ?

‘हरि प्रेरित लछिमन मन डोला’

देखऽ अब का होला !।।

 

” झुलनी का रंग सांचा हमार पिया”

अवधी के  निर्गुण लोकगीत भौतिक अवलंबों पर आधारित आध्यात्मिक रचनाएँ है। एसा ही एक मनोहारी युगल  गीत पंडित चन्द्र शेखर मिश्र जी ने इस प्रकार व्यक्त किया है –

 

झुलनी में गोरी लागा हमार जिया ,  झुलनी का रंग साँचा हमार पिया

कवन सोनरवा बनायो रे झुलनिया ,

रंग पड़े नहीं कांचा हमार जिया

सुघड़ सोनरवा रचि रचि के बनवै ,

दै अगनी  का  आँचा हमार पिया।

छिति जल पावक गगन समीरा ,

तत्व मिलाइ दियो पाँचा हमार पिया।

रतन से बनी रे झुलनिया ,

जोइ पहिरा सोइ नाचा हमार पिया।

जतन से रखियो गोरी झुलनिया ,

गूँजे चहूँ दिसि साँचा हमार पिया।

टूटी  झुलनिया बहुरि नहिं बनिहैं ,

फिर न मिलै अइसा साँचा हमार पिया।

सुर मुनि रिसी देखि रीझैं झुलनिया ,

केहु न जग में रे बाँचा हमार जिया।

एहि झुलनी का सकल जग मोहे ,

इतना सांई मोहे राचा हमार पिया।

 

(स्पष्टीकरण : सोनार ईश्वर, झुलनी मानव शरीर तथा रतन इंद्रियों के रूपक के तौर पर प्रयुक्त किया गया है।)

 

पुरस्कार एवं सम्मान –

उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान लखनऊ के ओर से इनको  2002 में ‘अवन्तिबाई सम्मान’ से सम्मानित किया गया। मारीशस में भोजपुरी बोलने वालों की संख्या बहुत है।वहां के साहित्यकारों ने भी उन्हें ‘विश्व सेतु सम्मान’ से अलंकृत किया है। श्री चंद्रशेखर मिश्र जी के द्वारा लिखी कुछ किताब  भोजपुरी साहित्यांगन पर पढ़ी जा सकती है।

 

लेखक परिचय:-

(लेखक भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण, में सहायक पुस्तकालय एवं सूचनाधिकारी पद से सेवामुक्त हुए हैं। वर्तमान समय में उत्तर प्रदेश के बस्ती नगर में निवास करते हुए सम सामयिक विषयों,साहित्य, इतिहास, पुरातत्व, संस्कृति और अध्यात्म पर अपना विचार व्यक्त करते रहते हैं। वॉट्सप नं.+919412300183)

बाल साहित्यकारों का त्रिदिवसीय महाकुंभ 5 जनवरी 2026 से नाथद्वारा में

11 राज्यों के 107 बाल साहित्यकार  सम्मानित होंगे
नाथद्वारा / साहित्य मंडल श्रीनाथद्वारा द्वारा आगामी 5 से 7 जनवरी 26 को नाथद्वारा में  ” श्री भगवती प्रसाद देवपुरा स्मृति एवं राष्ट्रीय बाल साहित्य – सांस्कृतिक कार्यक्रम” का आयोजन भगवती प्रसाद देवपुरा प्रेक्षागृह में किया जाएगा। कार्यक्रम में स्व. भगवती प्रसाद देवपुरा के व्यक्तित्व, कृतित्व और साहित्यिक योगदान पर संगोष्ठी, बाल साहित्य  विषयों पर आलेख वाचन, पुस्तकों का विमोचन, कवि सम्मेलन, पुस्तक प्रदर्शनी, बाल साहित्यकारों के सम्मान के साथ -साथ बृज रत्न वंदनाश्री द्वारा नानी बाई का मायरा की संगीतमय दृश्यात्मक प्रस्तुति  मुख्य आकर्षण होगा।
साहित्य मंडल श्रीनाथद्वारा के प्रधानमंत्री श्याम प्रकाश देवपुरा ने उक्त जानकारी देते हुए बताया कि  स्व.भगवती प्रसाद देवपुरा की बारहवीं पुण्यतिथि के अवसर पर तीन दिवसीय कार्यक्रम में देश के 11 राज्यों बिहार, राजस्थान, उत्तरप्रदेश, मध्यप्रदेश, हरियाणा, गुजरात, महाराष्ट्र, दिल्ली, पंजाब, कर्नाटक एवं छत्तीसगढ़ से 107 बाल साहित्यकारों को सम्मानित किया जाएगा। इनमें से 58 बाल साहित्यकारों को उनकी साहित्यिक उपलब्धियों के लिए नकद पुरस्कार और मानद अलंकरण से सम्मानित किया जाएगा। साथ ही 49 बाल साहित्यकार ऐसे हैं जिन्होंने भारतीय त्यौहार विषय पर साहित्य मंडल द्वारा आयोजित राष्ट्रीय बाल कहानी , कविता प्रतियोगिता में प्रथम, द्वितीय, तृतीय एवं प्रोत्साहन पुरस्कार प्राप्त किया है। राष्ट्रीय प्रतियोगिता में 22 बच्चों ने भी सफलता प्राप्त की है।
बाल साहित्य आलेख वाचन:
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डा. पशुपतिनाथ उपाध्याय, अलीगढ़ द्वारा बाल साहित्य का समसामायिक परिप्रेक्ष्य,
डॉ. रामेश्वरप्रसाद सारस्वत, सहारनपुर द्वारा बाल कहानियों के मूल में आत्म विश्वास और आत्म विकास, डॉ.सत्यनारायण ‘सत्य’, रायपुर-द्वारा बाल कहानियों में आधुनिक युग की चुनौतियाँ और संभावनाएँ, नरेन्द्र ‘निर्मल’, भरतपुर द्वारा बाल कहानियाँः संस्कृति के संदर्भ में, श्रीमती विमला नागला, केकड़ी द्वारा वर्तमान काल में बाल कहानियाँ और जीवन मूल्य तथा  श्रीमती संतोष ‘ ऋचा’, राया द्वारा बाल कहानियों में नैतिक मूल्य विषय पर बाल साहित्य आलेख प्रस्तुत किए जाएंगे। कार्यक्रम में 18 लेखकों की कृतियों का विमोचन भी किया जाएगा।
समारोह में 3100 रुपये की राशि एवं साहित्य मर्मज्ञ मानद उपाधि के अलंकरण से डॉ. अशोक कुमार मंगलेश, चरखीवावरी,  डॉ.अजय शर्मा, जलन्धर, शंकर सिंह मुरादाबाद, पवन तिवारी, मुम्बई को सम्मानित किया जाएगा।
समारोह में 2100 रुपए स्मृति सम्मान से सम्मानित होने वालों में  डॉ.अतुल भाई पी. सी. पाढक, सूरत,  शरद अरविन्द जोशी, अहमदाबाद,श्रीमती रत्ना ओझा ‘रत्न’, जबलपुर , डॉ.अशोक व्यास, भोपाल एवं श्री रंजन पाण्डेय, प्रयागराज को साहित्य सुधाकर मानद उपाधि से अलंकृत कर सम्मानित किया जाएगा। डॉ. ऋषिपाल धीमान ‘ऋषि’, अहमदाबाद, रवीन्द्र कुमार पाण्डेय, मिर्जापुर एवं  डॉ.वर्षा सिंह, ठाणे-मुम्बई को काव्य कलाधर मानद उपाधि से अलंकृत कर सम्मानित किया जाएगा।
समारोह में 2100 रुपए राशि एवं बाल साहित्य विभूषण अलंकरण से डॉ.भैरूलाल गर्ग, भीलवाड़ा, डॉ.पशुपतिनाथ उपाध्याय, अलीगढ़,श्रीमती वंदना यादव, दिल्ली, अजय कुमार अनुरागी, जयपुर, डॉ. दिनेश प्रसाद साह, दरभंगा, डॉ. गीता गीत, जबलपुर, डॉ. विमला भण्डारी, सलूम्बर, डॉ. अलका पाण्डेय,मुंबई, पवन कुमार पहाड़िया, डेह, नागौर, प्रकाश तातेड़, उदयपुर,  घनश्याम मैथिल ‘अमृत’, भोपाल, डॉ. रामेश्वर प्रसाद सारस्वत, सहारनपुर, डॉ. सत्यनारायण ‘सत्य’, रायपुर, डॉ. मंजु गुप्ता, नवी मुम्बई, राजेन्द्र मोहन शर्मा,जयपुर को सम्मानित किया जाएगा।
समारोह में 1100 रुपए स्मृति सम्मान से पुरस्कृत होने वालों में नरेन्द्र कुमार शर्मा, जयपुर, अशोक आनन, शाजापुर, श्रीमती आरती वर्मा, कानपुर एवं श्रीमती सरोज शर्मा, जयपुर को साहित्य कुसुमाकर मानद उपाधि से अलंकृत कर  सम्मानित किया जाएगा। नरेन्द्र कुमार लाटा, जयपुर ,डॉ.नंदकिशोर महावर, कोटा एवं गोपालप्रसाद पाठक ‘राज’, बलदेव -उत्तरप्रदेश को साहित्य सौरभ मानद उपाधि से अलंकृत कर सम्मानित किया जाएगा। डॉ.फारुक आफरीदी, जयपुर, राजेश भारती, कैथल-हरियाणा और श्रीमती ममता महक, कोटा को काव्य कौस्तुभ मानद उपाधि से अलंकृत कर सम्मानित किया जाएगा। डॉ.सुमन कादयान, हिसार, डॉ.उमा विश्वकर्मा, कानपुर एवं  हेमराज सिंह ‘हेम’, कोटा को काव्य कुसुम मानद उपाधि से अलंकृत कर सम्मानित किया जाएगा। संदीप कुमार पुरोहित, जोधपुर एवं भगवत दयाल सिंह, ब्यावर को पत्रकार श्री मानद उपाधि से अलंकृत कर सम्मानित किया जाएगा।
समारोह में 1100 रूपये  एवं बाल साहित्य भूषण मानद उपाधि अलंकरण से डॉ.बंदना पांचाल, अहमदाबाद श्रीमती उषा शर्मा ‘प्रिया’, मयुरा, श्रीमती सुमन पाठक, मथुरा डॉ.ओम प्रकाश कादयान, हिसार, डॉ. नीरु मित्तल नीर, पंचकूला, जय भगवान सैनी, हिसार, श्रीमती इन्दिरा त्रिवेदी, भोपाल,श्रीमती नीता सोलंकी, भोपाल,डॉ. मनीषा गिरी, ग्वालियर, देवकी दर्पण, कोटा सत्येन्द्र छिब्बर, जोधपुर, डॉ. सुशीला जोशी, कोटा, श्रीमती योगिता जोशी,जयपुर  ,श्रीमतीसंतोषचौधरी,जोधपुर,श्रीमती शकुंतला पालीवाल, उदयपुर को सम्मानित किया जाएगा।
 साहित्य मंडल की ओर से नाथद्वारा में साहित्यकारों के आवास और भोजन आदि की व्यवस्थाएं सुनिश्चित की गई है।

एजेंडाधारी हिंदू विरोधी फिल्मों का कच्चा चिठ्ठा

अभी एक फ़िल्म आई है धुरंधर। इसमें पाकिस्तान के अपराध के संगठित प्रयास को दिखाया है। स्वयं को सेक्युलर कहने वाले बहुत अधिक परेशान हो रहें है।
इससे पहले क्या दिखाया जाता था –
टुकड़े टुकड़े का समर्थन करने वाली दीपिका पादुकोण हो या पीके का आमिर खान। शोले के सलीम जावेद हों आज के नेटफ्लिक्स के सीरियल निर्माता। सभी का एक ही एजेंडा है। फिल्म गोल्ड हाकी ओलम्पिक की भारतीय टीम के इतिहास पर आधारित थी। इसमे कोच आदि सब को सच विपरीत दिखाया गया।
फिल्म जोधा अकबर मे ऋतिक रोशन ने अकबर को महान बताया। वही अकबर जिसके कारण चीतौड़ के किले मे हजारों महिलाएं जीवित आग मे कूद गई। शोले का रहीम चाचा ( ए के हंगल) हो या जंजीर का पठान ( प्राण) सभी के सभी अल्लाह के नेक बंदे परन्तु शोले का हीरो (धर्मेन्द्र ) मन्दिर मे शिवजी की मूर्ति के पीछे खड़ा होकर  हीरोइन को उल्लू बनाता है।
कुछ उदाहरण देखिए –
1
लक्ष्मी फ़िल्म का संदेश
भूत सच में होते हैं। भूत भगाने वाले हिंदू ओझा-तांत्रिक ठग होते हैं। कुछ पंडित भूत को पहचान तो पाते हैं, लेकिन भगाने की ताकत नहीं रखते। भूत को केवल पीर बाबा ही वश में कर सकते हैं। जमजम के पानी से बड़े से बड़ा भूत भी डरता है।
और भी-
अब्दुल नाम वाले चाचा बहुत अच्छे इंसान होते हैं। कोई माँ-बाप अपनी बेटी के लिए आसिफ से अच्छा लड़का नहीं खोज सकते। (इसलिए उन्हें अब लड़का खोजने की चिंता छोड़ देनी चाहिए, क्योंकि अब गली-गली में आसिफ उनकी बेटियों को खोज रहे हैं।
2
चक दे इंडिया फ़िल्म का संदेश
एक मुस्लिम कोच “तीजा तेरा रंग था मैं तो” करकर वर्ल्ड कप ले आता है। फ़िल्म में गंगा जमुनी भाईचारे को बताया गया था।
3
रंग दे बसंती फ़िल्म का संदेश
एक हिन्दू वादी कार्यकर्ता की पार्टी विमान घोटाला करती है जिससे पायलट मर जाता है। यह भी एक दृष्टिकोण बनाने का तरीका है। जिससे लगे कि केवल हिन्दू की बात करने वाला नेता ही घोटाले करता है।
4
राजी फ़िल्म का संदेश
एक मासूम लड़की को रॉ (भारतीय गुप्तचर एजेंसी) पाकिस्तान भेज देती है जहां निर्दोष ISI और आर्मी वाले अपने पति को वो मार देती है। असल मे वही पाकिस्तान की सेना उस समय 30 लाख बंगाली मार रही थी और 20 लाख महिलाओं का बलात्कारी थी।
नेटफ्लिक्स की निर्भया देखी?
पांच में से 1 आरोपी मुस्लिम अफरोज नाबालिग जिसे केजरीवाल सिलाई मशीन और 10000 दे रहा था उसे भी हिन्दू दिखा दिया गया।
नेटफ्लिक्स की ही लीला देखी?
जिसको एक काल्पनिक नगर “आर्यवर्त”(भारत का एक समय का नाम) दिखाया गया जहां एक ऐसी संस्था है जो गैर आर्य की नस्ल को मार डालती है। वही आर्य-द्रविड़ वाली थ्योरी स्थापित करने की कोशिश।
क्वांटिको
जहां प्रियंका चोपड़ा “रुद्राक्ष” देखकर आतंकी पहचानती है।
सेक्रेड गेम्स
जहां एक हिन्दू सन्त आतंकी होता है।

बांग्लादेश में जान बचाने को हिंदू ने रखा मुस्लिम नाम, भारतीय पहचान छिपाकर पहुँचे एयरपोर्ट

बांग्लादेश में हिंदुओं के खिलाफ अत्याचार अब चरम पर है। हाल ही में हिंदू युवक दीपू दास की बेरहमी से पीट-पीटकर हत्या कर दी गई। अब चटगांव जिले में दो हिंदू परिवारों के घरों को आग के हवाले कर दिया गया। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, देश में उग्रवादी आंतकियों की तरह धर्म पूछ-पूछ हिंदुओं को निशाना बना रहे हैं।

वहीं कई हिंदू परिवार बांग्लादेश में माहौल के डर से जान बचाकर किसी तरह भारत पहुँचे हैं। उन्होंने आपबीती सुनाते हुए बांग्लादेश में हिंसा के बीच अपने डर को जाहिर किया है। वह कहते हैं कि देश में जगह-जगह घूम रही इस्लामी भीड़ के चंगुल से निकलना काफी मुश्किल था।

तबला वादक मैनाक विश्वास 48 घंटे में पहुँचे भारत
मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, भारत पहुँचने वालों में एक नाम तबला वादक मैनाक विश्वास ढाका का है। वो बांग्लादेश में एक कार्यक्रम में शामिल होने अपने साथियों के साथ गए थे।लेकिन बिगड़ते हालात के बीच वो किसी तरह जान बचाकर निकले। उन्होंने बताया कि वे 48 घंटे की मशक्कत के बाद बांग्लादेश से भारत वापस लौटे हैं। उन्होंने बताया कि बांग्लादेश में हिंसक भीड़ के निशाने से बचने के लिए उन्हें हिंदू पहचान छिपानी पड़ी।

विश्वास ने एक इंटरव्यू में कहा, “मैं पहले भी कई बार बांग्लादेश जा चुका हूँ, लेकिन मैंने कभी ऐसी स्थिति का सामना नहीं किया। जहाँ स्थानीय लोगों के एक वर्ग के बीच तनाव और शत्रुता की भावना इतनी स्पष्ट रूप से महसूस की जा सके।” न्यूज 18 की रिपोर्ट के अनुसार, विश्वास बताते हैं कि उन्हें हिंदू नाम बदलकर मुस्लिम नाम रखना पढ़ा।

सरोद वादक ने भारतीय पहचान छिपाकर बचाई जान
बांग्लादेश में हिंसा के बीच फँसे लोकप्रिय सरोद वादक शिराज अली खान भी भारत लौट आए। ढाका में उनकी संगीत कार्यक्रम में तोड़फोड़ हुई थी, जिसके बाद उनका कार्यक्रम रद्द हो गया था। वे शनिवार (20 दिसंबर 2025) को ही भारत लौटे हैं, जबकि उनका परिवार बांग्लादेश में फँसा रहा। परिवार सोमवार (22 दिसंबर 2025) को वापस लौटा है।

शिराज अली खान कहते हैं कि भारत लौटने के बाद भी बांग्लादेश में देखा भयावह मंजर का खौफ अब तक है। वह बताते हैं कि वे दो दिन तक होटल के कमरे में ही बंद रहे। अगर किसी वजह से बाहर निकलना भी पड़ता था तो वह यह सुनिश्चित करते कि उनकी भारतीय पहचान छिपी रहे। होटल से ढाका एयरपोर्ट आते हुए भी उन्होंने पासपोर्ट छिपा दिया और अपनी अम्मी से सीखी ‘ब्राह्णबाणिया’ की स्थानीय भाषा में बात की, जिससे किसी को शक न हो।

बांग्लादेश में हिंसा पर चिंता जताते हुए वह कहते हैं, “मैंने कभी नहीं सोचा था कि मुझे अपनी पहचान छिपाकर भागना पड़ेगा। ढाका में कोई भी भारतीय सुरक्षित नहीं है।”

साभार- https://hindi.opindia.com/ से

भारत में सुशासन :उपलब्धियां एवं चुनौतियां

सुशासन निर्णय लेने की प्रक्रिया है एवं वह प्रक्रिया है जिसके द्वारा विकासात्मक लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए आवश्यक  निर्णयों को क्रियान्वित किया जाता है। विश्व बैंक की प्रतिवेदन  ‘ शासन एवं विकास 1992 ‘ के अनुसार, सुशासन वह तरीका है जिसमें सर्वांगीण विकास के लिए देश के आर्थिक एवं सामाजिक संसाधनों का अनुप्रयोग किया जाता है।
भारत में सुशासन का उपयोगिता है कि सार्वजनिक सेवा वितरण प्रणाली (पीडीएस ) उत्कृष्टता के शिखर पर पहुंची है, इसके साथ ही सरकारी योजनाओं एवं आधारभूत परियोजनाओं के क्रियान्वयन में ‘ आदर्श’ बदलाव आया है । सुशासन के द्वारा सरकार ने विभिन्न  उपेक्षित समूहों(वंचित वर्गों ) के लिए अपरिवर्तनीय सशक्तिकरण सुनिश्चित किया हैं, जिससे उन्हें सामाजिक सुरक्षा कवच  प्रदान करके ‘ आत्मनिर्भर’ बनने में मदद मिला है। लोक कल्याणकारी योजनाओं के बड़े पैमानों पर सविस्तार ने शत – प्रतिशत परिपूर्णता( सैचुरेशन) की ओर अग्रसर है। सुशासन में सभी वर्गों के लिए परिपूर्णता आच्छादन  (शत- प्रतिशत सैचुरेशन) के भेदभाव एवं भ्रष्टाचार को समाप्त करने में सहयोग किया है।
सुशासन की समावेशी राजनीति से भारत वृहद लोकतंत्र के साथ-साथ वैश्विक स्तर का ‘ सबसे बड़ा लोकतंत्र’ बन सका है। सुशासन ने भारतीय संस्कृति, संवैधानिक मूल्यों एवं आदर्शों को उचित आयाम दिया है,एवं वैश्विक स्तर पर भारत की समृद्ध  सांस्कृतिक  विरासत का उन्नयन किया है। भारत अपने  कार्यदायी व शासकीय क्षमता से वैश्विक स्तर का “नेता “हो चुका है। वर्तमान में वैश्विक स्तर के ‘ विकासशील राष्ट्र राज्य ‘ (3A , एशिया ,अफ्रीका, अमेरिका (लातिनी),जो  पूंजी,अर्थव्यवस्था, भूमंडलीय तापन के प्रबंधन में एवं प्रौद्योगिकी में विकसित नहीं है। वो  समस्याओं के समाधान के लिए भारत की तरफ देख रहे हैं।” हम कहीं पर भी  हों ,किसी भी छाते के नीचे काम करते हों, लेकिन अंतत: हम सब देश के लिए काम करते हैं! देश के उज्जवल भविष्य के लिए काम करते हैं!, और इसलिए हम जो मेहनत करते हैं। क्या वह सुशासन के लिए काम आ सकती है ? कार्य क्षमता के लिए काम आ सकता है क्या?”
सुशासन की  उपादेयता  है कि जन धन योजना, आधार एवं प्रत्यक्ष लाभ हस्तांतरण ने करोड़ों लोगों को वित्तीय प्रणाली से जोड़ा  एवं भ्रष्टाचार रूपी बीमारी पर अंकुश लगाया। 28 अगस्त, 2025 तक वित्तीय समावेशन योजना प्रधानमंत्री जनधन योजना (PMJDY )  के तहत 56 करोड़ से अधिक बैंक खातें खोले गए हैं, जिनमें कुल जमा राशि 2.68 लाख करोड रुपए  हैं।उज्ज्वला योजना के अंतर्गत 11 करोड़ से अधिक मुफ्त  कनेक्शन दिए गए हैं। आयुष्मान योजना के अंतर्गत लगभग 56 करोड़ से अधिक लोगों को  ‘ स्वास्थ्य बीमा ‘ की सुरक्षा मिली  हैं । इन तथ्यों से स्पष्ट हो रहा है कि सुशासन से भारत “विकसित भारत @ 20047” की प्राप्ति के लिए अग्रसर है।
भारत का दुनिया की चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने के करीब पहुंचना आर्थिक उपलब्धि के साथ उज्जवल भविष्य की दिशा में मजबूत कदम है। यह  भविष्य की शक्ति का उद्घोष है। वर्तमान में दुनिया भारत को राजनीतिक स्थिरता, सुअवसर  एवं नवाचार के केंद्र के रूप में देख रही हैं ,जिससे निवेशकों की संख्या बढ़ रही हैं। वैश्विक  विश्लेषकों का मानना है कि भारत 2027 तक जर्मनी को पीछे छोड़ते हुए  ‘ तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था’ बन सकता है। यह  महान  यात्रा 140 करोड़ों लोगों की लोकाकांक्षा है।
सुशासन  जवाबदेही,पारदर्शिता, सामान वितरण एवं सहभागिता के अव्यय पर आधारित हैं ।बैंक सुविधा, शौचालय, एलपीजी सिलेंडर, नल से जल, बिजली कनेक्शन एवं बुनियादी स्वास्थ्य सुविधाओं को सभी लोगों को मिलें। सुशासन के उपादेयता  के द्वारा यह सभी बुनियादी सुविधाएं सभी भारतीयों तक पहुंच रहे हैं। योजनाओं का लाभ हर हकदार को मिलें  न कि जाति, धर्म ,लिंग, क्षेत्र ,राजनीतिक जुड़ाव के आधार पर सुशासन के द्वारा योजनाओं की परिपूर्णता शत  – प्रतिशत लोगों को मिल रही है। मूलभूत सुविधाओं का परिपूर्णता ( सैचुरेशन) सभी को शत – प्रतिशत प्राप्त होना सामान वितरण के सिद्धांत का आदर्श है। सार्वजनिक सेवाओं का लाभ लोगों तक पहुंचने में होने वाले लीकेज ( रिसाव) को रोकने में सफलता सुशासन का देन है। कल्याणकारी योजनाओं के द्वारा एवं गरीबी उन्मूलन के प्रयासों पर दुनिया भर के संस्थानों ने भी स्वीकारोक्ति की है। आईएमएफ के शोध पत्र में देश से अत्यधिक गरीबी को समाप्त करने का श्रेय सरकार के पारदर्शी नीतियों के कारण ही हो सका है।
भारत में सुशासन की मजबूती में भ्रष्टाचार ,सरकारी योजनाओं में लीकेज ( रिसाव), नौकरशाही का  लालफीताशाही , जवाबदेही की कमी, पारदर्शिता का अभाव, विधियों  का सही क्रियान्वयन ना होना,  निर्णयों  में राजनीतिक हस्तक्षेप, राष्ट्रीय विषयों पर राजनीतिक दलों में मतभेद एवं मनभेद, नागरिक समाज का सशक्त ना होना, न्यायपालिका पर मुकदमों का अत्यधिक बोझ एवं नौकरशाही का जनता से  ‘ मित्रवत व्यवहार ‘ की कमी होना है।
भारत में सुशासन के मजबूती के लिए सुझाव –
1. सरकारी योजनाओं के वितरण में पारदर्शिता का उन्नयन हों;
2. अस्थाई कार्यपालिका (मंत्री परिषद) एवं स्थायी कार्यपालिका ( नौकरशाही) में बेहतर समन्वय हों,जिससे जनता के प्रति जिम्मेदारी एवं जवाबदेही बढ़ सकें;
3. शत – प्रतिशत   डिजिटलीकरण हों, जिससे  योजनाओं में  होने वाले रिसाव ( लीकेज) को समाप्त किया जा सकें;
4. मजबूत नागरिक समाज को बढ़ाने के लिए “वर्कशॉप” एवं “प्रशिक्षण कार्यक्रम” को किया जाएं;एवं
5. लोगों की सक्रिय सहभागिता का  उन्नयन किया जा सकें, जिससे वह अपने’ हक’ के लिए  सजग रहे।
(सामयिक विषयों, इतिहास एवं राष्ट्रीय घटनाओं के विश्लेषण व सामाजिक विचारक हैं) 

अरावली की चिन्ताः नारे से आगे, अस्तित्व की लड़ाई

अरावली पर्वत शृंखला की नई परिभाषा को लेकर उठा विवाद अब जन-आन्दोलन का रूप ले रहा है। इसी के अन्तर्गत अरावली बचाओ की चिन्ता-यह केवल भावनात्मक आह्वान नहीं, बल्कि भारत के पर्यावरणीय भविष्य की जीवनरेखा है। गुजरात से लेकर दिल्ली तक फैली अरावली पर्वतमाला पृथ्वी की प्राचीनतम पर्वत श्रृंखलाओं में से एक है। यह पर्वत केवल पत्थरों का ढेर नहीं, बल्कि जल, जंगल, जैव-विविधता, जलवायु संतुलन और मानव जीवन के लिए एक प्राकृतिक कवच है। आज जब खनन, शहरीकरण और विकास की आड़ में इस पर्वतमाला को टुकड़ों में बांटने की कोशिशें हो रही हैं, तब यह प्रश्न केवल पर्यावरण का नहीं, बल्कि मनुष्य जाति के अस्तित्व का बन गया है। हमें उम्मीद करनी चाहिए कि अरावली को लेकर सरकारों की चिन्ता व्यर्थ न जाये, कोई सकारात्मक रंग लाए। पहाड़ी इलाकों के खनन, उपेक्षा एवं लोभवृत्ति पर विचार करना होगा। इसमें कोई संदेह नहीं है कि सरकारों की उपेक्षा की वजह से अरावली के बड़े हिस्से का खनन ही नहीं हुआ, आमजन एवं प्रकृति-पर्यावरण रक्षा का यह कवच ध्वस्त भी हुआ है।
अरावली की आयु भूगर्भीय दृष्टि से करोड़ों वर्षों में आंकी जाती है। यह हिमालय से भी पुरानी है। यही कारण है कि अरावली का स्वरूप अपेक्षाकृत निचला और क्षरित दिखाई देता है, किंतु इसका महत्व कहीं अधिक गहरा है। राजस्थान, हरियाणा, गुजरात और दिल्ली के बड़े हिस्सों में वर्षा जल का संचयन, भूजल रिचार्ज और मरुस्थलीकरण पर नियंत्रण अरावली के कारण ही संभव है। थार मरुस्थल को पूर्व की ओर बढ़ने से रोकने में अरावली की भूमिका किसी अदृश्य दीवार की तरह है। आज के समय में पर्यावरणीय संकट बहुआयामी हो चुका है-जल संकट, वायु प्रदूषण, जैव-विविधता का क्षय, जलवायु परिवर्तन और अनियंत्रित शहरी विस्तार। इन सभी चुनौतियों का एक साझा समाधान अरावली जैसी प्राकृतिक संरचनाओं का संरक्षण है। दुर्भाग्यवश, खनन और निर्माण गतिविधियों ने इस पर्वतमाला को गहरे घाव दिए हैं। पत्थर, संगमरमर और अन्य खनिजों के लिए की जा रही अंधाधुंध खुदाई ने न केवल पहाड़ों को खोखला किया है, बल्कि आसपास के गांवों, नदियों और जंगलों को भी संकट में डाल दिया है। लगातार संकट से घिर रही अरावली को बचाने के लिये एक याचिका 1985 से न्यायालय में विचाराधीन है। हालांकि इस याचिका का ही नतीजा है कि अरावली का लगभग 90 प्रतिशत हिस्सा संरक्षित श्रेणी में आता है। वैसे अब समय आ गया है कि अरावली को पूरी तरह से खनन-मुक्त रखने का फैसला किया जाये। अब भी खनन जारी रहा तो उससे होने वाले लाभ से कई गुणा ज्यादा कीमत हमें पर्यावरण के मोर्चे पर चुकानी पडे़गी।
सुप्रीम कोर्ट ने समय-समय पर अरावली के संरक्षण को लेकर गंभीर टिप्पणियां की हैं। न्यायालय का दृष्टिकोण स्पष्ट रहा है कि पर्यावरणीय संतुलन को नुकसान पहुंचाने वाली गतिविधियों पर रोक लगनी चाहिए और विकास के नाम पर प्रकृति के विनाश को वैधता नहीं दी जा सकती। इसके बावजूद, विभिन्न स्तरों पर नियमों की व्याख्या और पुनर्व्याख्या के जरिए खनन को अनुमति देने के प्रयास होते रहे हैं। विशेष रूप से “100 मीटर ऊंचाई” जैसे मानदंडों के आधार पर पर्वतों को परिभाषित करना और उससे नीचे की संरचनाओं को खनन योग्य मानना एक खतरनाक प्रवृत्ति है। यह तर्क न केवल वैज्ञानिक दृष्टि से कमजोर है, बल्कि पर्यावरणीय समझ के भी विपरीत है। खनन की वजह से अरावली की छलनी हो चुकी है।
पर्वत केवल ऊंचाई से नहीं पहचाने जाते, बल्कि उनके भूगर्भीय ढांचे, जलधारण क्षमता और पारिस्थितिकी तंत्र से उनकी पहचान होती है। 100 मीटर से कम ऊंचाई वाले पहाड़ भी उतने ही महत्वपूर्ण हैं, जितने ऊंचे पर्वत। यदि इस तर्क को स्वीकार कर लिया जाए, तो धीरे-धीरे पूरी अरावली को छोटे-छोटे हिस्सों में बांटकर समाप्त किया जा सकता है। यह दृष्टिकोण अल्पकालिक आर्थिक लाभ को दीर्घकालिक पर्यावरणीय सुरक्षा से ऊपर रखता है। राजस्थान सरकार की कुछ पहलें संरक्षण की दिशा में सराहनीय कही जा सकती हैं, जैसे वन क्षेत्रों की अधिसूचना, अवैध खनन पर कार्रवाई और पर्यावरणीय स्वीकृतियों की सख्ती। किंतु इन प्रयासों के समानांतर ऐसी नीतिगत ढील भी दिखाई देती है, जो खनन और रियल एस्टेट गतिविधियों को बढ़ावा देती हैं। केंद्र सरकार द्वारा प्रस्तुत तथ्यों और आंकड़ों के आधार पर यह तर्क दिया जाता है कि नियंत्रित खनन से विकास संभव है। परंतु अनुभव बताता है कि “नियंत्रित” शब्द व्यवहार में अक्सर अर्थहीन हो जाता है। भले ही वन एवं पर्यावरण मंत्री भूपेन्द्र यादव स्पष्टीकरण दे रहे हैं कि सिर्फ 277 वर्ग किमी में ही खनन की अनुमति है। उन्होंने आश्वस्त किया है कि नई परिभाषा से खनन बढ़ेगा नहीं, बल्कि अवैध खनन रूकेगा।
विकास और पर्यावरण को आमने-सामने खड़ा करना एक पुरानी भूल है। सच्चा विकास वही है जो प्रकृति के साथ सामंजस्य बैठाकर हो। अरावली का संरक्षण विकास विरोधी कदम नहीं, बल्कि दीर्घकालिक विकास की शर्त है। जिन क्षेत्रों में अरावली को नुकसान पहुंचा है, वहां जल स्तर गिरा है, तापमान बढ़ा है और जैव-विविधता घट गई है। दिल्ली-एनसीआर की जहरीली हवा और जल संकट में अरावली के क्षरण की भूमिका को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। अरावली में वन्यजीव लगभग खत्म होने को है।  खनन के विकल्प पर विचार करना होगा। खनन मुख्यत पत्थर के लिये होता है और पत्थरों से सुन्दर घर बनाने की परम्परा सदियों से चली आ रही है, इस परम्परा पर नये सिरे से चिन्तन करने की अपेक्षा है। घर या इमारत बनाने के दूसरे संसाधन पर सोचना होगा। जिनसे मकान तो बहुत बन जायेंगे, पर कटने वाले पहाड़ फिर कभी खड़े नहीं होंगे। पर्यावरण एवं प्रकृति रक्षक ये पहाड़ कहां से लायेंगे? सर्वोच्च न्यायालय ने अरावली के साथ-ही-साथ उत्तराखण्ड में भी जंगलों में हो रहे अतिक्रमण के खिलाफ चिन्ता का इजहार किया है। लेकिन अदालतों के साथ सरकारों को भी पर्यावरण, प्रकृति, पहाड़, पहाड़ी जंगलों एवं वन्यजीवों पर कड़ा रुख अपनाना होगा और इन्हें सर्वोच्च प्राथमिकता में रखना होगा।
तुलनात्मक दृष्टि से देखें तो विश्व के अनेक देशों ने अपनी प्राचीन पर्वतमालाओं और प्राकृतिक संरचनाओं को राष्ट्रीय धरोहर के रूप में संरक्षित किया है। यूरोप में आल्प्स, अमेरिका में रॉकी पर्वत और चीन में पीली नदी के बेसिन क्षेत्र इसके उदाहरण हैं। इन क्षेत्रों में खनन और निर्माण पर कठोर नियंत्रण है, क्योंकि वहां यह समझ विकसित हो चुकी है कि प्रकृति की कीमत पर आर्थिक समृद्धि टिकाऊ नहीं होती। भारत में भी इस सोच को अपनाने की आवश्यकता है। अरावली केवल जल का स्रोत नहीं है; यह जैव-विविधता का आश्रय है। यहां पाए जाने वाले वनस्पति और जीव-जंतु पारिस्थितिकी संतुलन बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। जंगलों की कटाई और पहाड़ों की खुदाई से वन्यजीवों का आवास नष्ट होता है, जिससे मानव-वन्यजीव संघर्ष बढ़ता है। यह समस्या केवल पर्यावरणीय नहीं, सामाजिक भी है।
आज देशभर में अरावली के संरक्षण को लेकर आंदोलन हो रहे हैं। ये आंदोलन इस बात का संकेत हैं कि समाज अब खामोश नहीं रहना चाहता। नागरिकों, पर्यावरणविदों, न्यायपालिका और नीति-निर्माताओं के बीच संवाद आवश्यक है। यह समय भावनात्मक नारों से आगे बढ़कर ठोस नीतिगत निर्णय लेने का है-खनन पर पूर्ण प्रतिबंध, पुनर्वनीकरण, जल संरक्षण परियोजनाएं और स्थानीय समुदायों की भागीदारी। बीज अगर आज प्रकृति एवं पर्यावरण संरक्षण के प्यार का बोए जाएंगे, तो कल स्वच्छ हवा, पर्याप्त जल और सुरक्षित भविष्य का फल मिलेगा। अरावली बचेगी तो भारत खुशहाल रहेगा, यह केवल कविता की पंक्ति नहीं, बल्कि एक वैज्ञानिक सत्य है। धरती मां की रक्षा करना हमारा अधिकार ही नहीं, कर्तव्य भी है। यदि आज हमने लालच को प्राथमिकता दी, तो आने वाली पीढ़ियां हमें माफ नहीं करेंगी। अंततः, अरावली का सवाल केवल एक पर्वतमाला का नहीं, बल्कि उस सोच का है जो विकास को विनाश से अलग देखती है। इतिहास उन्हीं समाजों को याद रखता है, जिन्होंने प्रकृति के साथ संतुलन बनाकर प्रगति की। आइए, हम भी वही इतिहास लिखें, जहां हर आवाज़ शोर बने और अरावली के साथ जीवन भी भरपूर सुनिश्चित हो।
प्रेषकः

(ललित गर्ग)
लेखक, पत्रकार, स्तंभकार
ई-253, सरस्वती कंुज अपार्टमेंट
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