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गाँधी के पहले राजनीतिक शिकार-स्वामी श्रद्धानन्द

जिन्होंने इतिहास के उन पन्नो को पलटा है, जब गांधी जी दक्षिण अफ्रीका में रंगभेद के विरुद्ध लड़ाई लड़ रहे थे, तब उन्होंने आर्थिक सहायता के लिये अभ्यर्थना भारत से की | उन दिनों गुरुकुल कांगड़ी में २-३ अंग्रेजी अख़बार आते थे | स्वामी श्रद्धानंद ने उन अखबारों के आधार पर गांधीजी की सहायता करने की सोची | गुरुकुल के छात्रों ने दिसम्बर की ठण्ड में गंगा किनारे कुछ श्रम कर कुछ रुपये इकठ्ठे करके ‘गुरुकुल सहायता’ के नाम से उनको भेजे |
स्वामी श्रद्धानंद आयु, ज्ञान, अनुभव तथा सेवा में गांधी से श्रेष्ठ और ज्येष्ठ तो थे ही | इस कारण गांधी उन्हें बड़े आदर से ‘बड़े भाई जी’ शब्द से सम्बोधित किया करते थे | स्वामी श्रद्धानंद कांग्रेस में देश सेवा हेतु शामिल हुए थे, परन्तु हिन्दू-मुस्लिम एकता के नाम पर मुसलमानों की चापलूसी, हिन्दू हितो की अपेक्षा, खिलाफत आन्दोलन को समर्थन, दंगो की निन्दा तक न करना, अछूतों
(दलित) कहे जाने वाले ८ करोड़ हिन्दुओ के हित में कोई कदम न उठाना जैसे अनेक विषय थे जिनके कारण स्वामीजी को कांग्रेस से अलग होना पड़ा | भारतीय आश्रम-व्यवस्था में वानप्रस्थी को ‘महात्मा’ शब्द से ही सम्बोधित किया जाता है | उन दिनों जब गुरुकुल का वार्षिकोत्सव था, गांधी स्वामीजी से मिलने पहुंचे थे |
स्वामीजी उनको कोई उपहार या भेंट देना चाहते थे | ऋषि-मुनियों की परम्परा को मानते हुए स्वामीजी ने वार्षिकोत्सव के अंतिम दिन लाखों दर्शकों की उपस्थिथि में गांधी से कहा “आप मुझे अपना बड़ा भाई मानते हैं, इस बड़े भाई के पास तुम्हे देने के लिये के लिये एक ही वस्तु है | मैं अपना महात्मा (तब स्वामीजी महात्मा मुंशीराम के नाम से जाने जाते थे) उपाख्य इस अवसर पर
आपको सादर भेंट करता हूँ | इसे अभी स्वीकार करलो | फिर क्या था, लाखों लोगों ने करतल ध्वनि की | कुछ लोग जानबूझकर इस घटना छिपाते हैं और मिथ्या घटना तक बुनते हैं की ये उपाधि गांधी को रविन्द्रनाथ टैगोर ने दी थी | यह प्रयास गुरुकुल और स्वामी श्रद्धानंद, आर्य समाज और ऋषि दयानन्द के ओर से ध्यान हटाने के लिये किया जाता है जो की एक अक्षम्य अपराध है |
१९१९ में हुए जलियांवाला कांड के कारण भयभीत जनता ने एक जुलूस निकला जिसका नेतृत्व स्वामी श्रद्धानंद कर रहे थे | जब जुलूस चांदनी चौक पहुंचा तो वहां मौजूद सेना की टुकड़ी में एक सिपाही ने बन्दूक स्वामीजी के सीने पर तान दी | स्वामीजी ने सिंहगर्जना करते हुए अपने छाती पर पड़ी चादर हटा दी और कहा “साहस है तो चलाओ गोली” लाखों की भीड़ का नेतृत्व करने वाले संन्यासी दुनिया को गरजते देख रही थी | कहते हैं इस घटना के पश्चात ३ दिनों तक पूरे दिल्ली प्रदेश में स्वामीजी का अघोषित राज कायम रहा | हिन्दू ही नही सैकड़ो मुस्लिम इस वीतराग संन्यासी के पास आते और अपनी समस्यायों का समाधान पाकर संतुष्ट होकर जाते | स्वामी श्रद्धानंद की अद्वितीय प्रभाव की खबर गांधी के कान तक पहुंचायी गयी| गांधी अपने प्रभाव की बागडोर फिसलते देखने लगे | उनमें ईर्ष्या की आग भड़क उठी | जिन्होंने गांधी के राजनीतिक क्रियाकलापों को नजदीक से देखा है, उनका स्पष्ट कथन है कि गांधी अपने बराबर किसी अन्य नेता को उठते नहीं देख सकते थे | उन्होंने अपने मार्ग में आने वाले हर नेता को चाहे वो नरम दल का रहा हो या गरम दल का, उसे किसी भी प्रकार हटाकर अपना मार्ग प्रशस्त किया | और ये एक कटु सत्य है कि उनकी इस राजनीति का पहला शिकार स्वामी श्रद्धानंद ही बने थे |
दिल्ली की जामा मस्जिद के गुम्बद से स्वामीजी ने यह वेदमंत्र पढ़ा था-
“त्वं हि पिता वसो त्वं माता सखा त्वमेव । शतक्रतो बभूविथ । अधा ते सुम्नमी महे ।।”
संसार के इतिहास की ये इकलौती घटना है जब ‘एक काफ़िर’ मस्जिद के मिम्बर से वेद मंत्र का उच्चारण कर रहा था | इसके बाद मुसलमानों ने अन्य मस्जिदों में भी उनके व्याख्यान करवाये | मुसलमानों पर स्वामीजी के अमिट प्रभाव की खबर गांधी को लगी | अपनी लोकप्रियता के आड़े आते श्रद्धानंद उनको अपनी व्यक्तिगत पूजा में बाधा लगे | टर्की के बादशाह और अंग्रेजों का संघर्ष को लेकर ‘खिलाफत आन्दोलन’ जो की भारत के लिये निरर्थक था, गांधी ने मुस्लिम तुष्टिकरण के लिये अकारण ही ये आन्दोलन छेड़ जन शक्ति को भ्रमित किया| इससे कई नेता गांधी से असंतुष्ट होकर संगठन से अलग होने लगे | इनमें स्वामीजी भी थे | काकीनाडा   कांग्रेस सम्मेलन में देश के ८ करोड़ अछूतों के  उद्धार की जो घृणित योजना बनी, उसके कारण भी काफी असंतोष फैला | योजना के मुताबिक अछूतों को हिन्दू और मुसलमानों में बराबर बांटने की बात कही गयी | यानी हिन्दू समाज के अभिन्न अंग करीब ४ करोड़ लोगों को सीधे सीधे इस्लाम की गोदी में सौंपने का षड़यंत्र था |
ये बात स्वामीजी के लिये असहनीय थी क्योंकि उन्होंने तो अपना जीवन ही अछूतों के उद्धार को समर्पित कर दिया था | वे कांग्रेस से सदा के लिये अलग हो गये | उनके पीछे पीछे सेठ बिड़ला और मदन मोहन मालवीय जी ने भी कांग्रेस छोड़ दी | इस घटना ने गांधी की ईर्ष्या की आग को और भड़का दिया | उन्होंने अपने पत्रों में आर्यसमाज और स्वामीजी के विरुद्ध विष वमन किया और उनके फैलाये सांप्रदायिक जाल ने आखिर अपना रंग दिखाया और २३ दिसम्बर १९२६ को स्वामी श्रद्धानंद की हत्या एक मुस्लिम के हाथों करा दी गयी | स्वामीजी की शहादत पर गांधी ने भी ऐसी वीरोचित मृत्यु की कामना की थी | वैसी मृत्यु तो खैर उनको नहीं मिली पर भारत के बंटवारे के कारण लाखों-करोड़ों हिन्दुओं की आहों से भरी मृत्यु अवश्य मिली | भगवान सब की इच्छा पूर्ण नहीं करता | पर स्वामीजी का बलिदान व्यर्थ नहीं गया | लाखों आर्यसमाजी सदा के लिये कांग्रेस से अलग हो गये और कांग्रेस मात्र एक सांप्रदायिक पार्टी बनकर रह गयी |
महान संन्यासी को नमन |
(राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के मुख पत्र “राष्ट्र धर्म के जनवरी 2016 विशेषांक से साभार)
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‘ज्ञानपीठ’ का महाप्रयाण की गौरवमयी यात्रा का पथिक

आखिरकार ‘ज्ञानपीठ’ विनोद कुमार शुक्ल जीवन संघर्ष में पराजित होकर अलविदा कह दिया. उनका जाना नियति की स्वीकृति हो सकती है लेकिन समाज और साहित्य को यह बिलकुल भी गंवारा नहीं था. उनकी एक-एक धडक़न समाज के लिए धरोहर थी. कहते हैं सरल होना कठिन नहीं है लेकिन सरल बने रहना कठिन है. विनोदजी ने सरल बने रहना को सच कर दिखाया था. अविभाजित मध्यप्रदेश के एक कस्बानुमा शहर में पढ़ाते हुए वे रचना किया करते थे. उनके जानने वाले जानते थे कि विनोदजी किस मिट्टी के बने हुए हैं. बेहद सरल और सहज. अपनों से छोटे हों, हमउम्र हों या उम्रदराज, उनके पास जाकर किसी ने खुद को छोटा नहीं पाया. यह बहुत कम होता है कि किसी को श्रेष्ठ सम्मान से नवाजा जाए तो पूरा समाज स्वयं को सम्मानित महसूस करता है. विनोदजी को जब ‘ज्ञानपीठ’ मिलने का ऐलान हुआ तो यह भी उन अपवाद वाले पल-छीन में था. रायपुर से दिल्ली तक स्वागत और उत्साह का माहौल था.
 ‘वह आदमी नया गरम कोट पहनकर चला गया विचार की तरह’ अपनी इस पहली कविता संगह से वे चर्चा में आ गए. यह प्रयोगधर्मी शीर्षक को पढक़र सुनकर साहित्य प्रेमी चौंक गए थे. तब उस दौर में ऐसा प्रयोग ना के बराबर था. वे इस बात के कभी हामी नहीं रहे कि कविता को नारे की तरह गढ़ा जाए. उनकी रचनाओं में लोक की छाप दिखती है तो आधुनिक समाज में हो रहे परिवर्तन, आकांक्षाओं के साथ उनकी संवेदनशीलता झलकती है. सही मायने में देखा जाए तो उनका लेखन सुपतिेिष्ठत कवि भवानी प्रसाद मिश्र की बातों को आगे बढ़ाते हुआ दिखता है जिसमें भवानी भाई कहते हैं- जिस तरह हम बोलते हैं, उस तरह तू लिख, और इसके बाद भी हमसे बड़ा तू दिख.
विनोद कुमार शुक्ल छत्तीसगढ़ राज्य की राजधानी रायपुर के थे लेकिन उनकी कविताएं और कथा संसार सारी भौगोलिक सीमा को लांघ जाती है. ज्ञानपीठ सम्मान का ऐलान हो जाने के बाद अपनी पहली प्रतिक्रिया में कहा कि ‘मेरे पास में शब्द नहीं हैं कहने के लिए, क्योंकि बहुत मीठा लगा कहूंगा, तो मैं शुगर का पेशेंट हूं. मैं इसको कैसे कह दूं कि बहुत मीठा लगा. बस अच्छा लग रहा है.’. यह सादगी उन्हें और बड़ा बनाती है.
एक जनवरी, 1937 में विनोद कुमार शुक्ल का जन्म साहित्य से रचे-बसे शहर राजनांदगांव में हुआ. वे अध्यापक रहे और पूरा समय साहित्य को समर्पित कर दिया था.  उम्र के 88वें पड़ाव पर खड़े विनोद कुमार शुक्ल वैसे ही सहज और सरल रहे जैसा कि छत्तीसगढ़ का एक व्यक्ति होता है. वे ज्ञानपीठ सम्मान को केवल सम्मान नहीं मानते हैं बल्कि अपनी जवाबदारी के रूप में देखते थे. बकौल विनोद कुमार शुक्ल ‘मुझे लिखना बहुत था, बहुत कम लिख पाया. मैंने देखा बहुत, सुना भी मैंने बहुत, महसूस भी किया बहुत, लेकिन लिखने में थोड़ा ही लिखा. कितना कुछ लिखना बाकी है, जब सोचता हूं, तो लगता है बहुत बाकी है. इस बचे हुए को मैं लिख लेना चाहता हूं. अपने बचे होने तक मैं अपने बचे लेखक को शायद लिख नहीं पाऊंगा, तो मैं क्या करूं? मैं बड़ी दुविधा में रहता हूं. मैं अपनी जिंदगी का पीछा अपने लेखन से करना चाहता हूं. लेकिन मेरी जिंदगी कम होने के रास्ते पर तेजी से बढ़ती है और मैं लेखन को उतनी तेजी से बढ़ा नहीं पाता, तो कुछ अफसोस भी है’. ऐसे थे विनोद जी.
विनोद जी के उपन्यास ‘नौकर की कमीज’ पर सुपरिचित फिल्मकार मणि कौल फिल्म भी बना चुके हैं. उनकी कहानियाँ ‘आदमी की औरत’ एवं ‘पेड़ पर कमरा’ पर राष्ट़ीय फिल्म इंस्टीट्यूट, पूना द्वारा अमित दत्ता के निर्देशन में निर्मित फिल्म को वेनिस अंतरराष्टीय फिल्म समारोह 2009 में ‘स्पेशल मेनशन अवार्ड’ मिला. उनके उपन्यास ‘दीवार में एक खिडक़ी रहती थी’ पर प्रसिद्ध नाट्य निर्देशक मोहन महर्षि सहित अन्य रचनाओं पर निर्देशकों द्वारा नाट्य मंचन भी हो चुका है.
ज्ञानपीठ के पहले उन्हें मध्यपदेश शासन का गजानन माधव मुक्तिबोध फेलोशिप, मध्यप्रदेश कला परिषद  का रज़ा पुरस्कार, मध्यपदेश शासन का शिखर सम्मान, राष्ट्रीय मैथिलीशरण गुप्त सम्मान, मोदी फाउंडेशन का  दयावती मोदी कवि शेखर सम्मान, भारत सरकार का साहित्य अकादमी सम्मान, उत्तरपदेश हिन्दी संस्थान का हिन्दी गौरव सम्मान, अंग्रेजी कहानी संग्रह के लिए मातृभूमि सम्मान के साथ ही साहित्य अकादमी, नई दिल्ली के सर्वोच्च सम्मान ‘महत्तर सदस्य’ मनोनीत किया गया था.
विशिष्ट भाषिक बनावट, संवेदनात्मक गहराई, उत्कृष्ट सृजनशीलता से उन्होंने भारतीय भाषा साहित्य को समृद्ध किया है. इसलिए कहते हैं कि विनोद कुमार शुक्ल हो जाना आसां नहीं है. तभी तो 59वें ज्ञानपीठ सम्मान के लिए चयनित हो जाने की सूचना के बाद हिंदी के वरिष्ठ कवि-चिंतक अशोक वाजपेयी का कहते हंै कि ‘यह सम्मान एक ऐसे व्यक्ति को दिया गया है, जिसने अपनी रचनाधर्मिता को निपट साधारण और नायकत्व से निरपेक्ष व्यक्ति को समर्पित किया है’. वे समाज के नब्ज को जानते हैं और उन पर भी उनका दखल है.
विनोद कुमार शुक्ल की कविता संगह लगभग जयहिंद वर्ष, 1971, वह आदमी चला गया नया गरम कोट पहिनकर विचार की तरह, वर्ष 1981, सब कुछ होना बचा रहेगा, वर्ष, 1992, अतिरिक्त नहीं, वर्ष 2000, कविता से लंबी कविता, वर्ष 2001, आकाश धरती को खटखटाता है, वर्ष 2006, पचास कविताएँ, वर्ष 2011, कभी के बाद अभी, वर्ष 2012, कवि ने कहा -चुनी हुई कविताएँ, वर्ष 2012, प्रतिनिधि कविताएँ, वर्ष 2013 में पकाशित हुई. उपन्यास संग्रह नौकर की कमीज़, वर्ष 1979, खिलेगा तो देखेंगे, वर्ष 1996, दीवार में एक खिडक़ी रहती थी, वर्ष 1997, हरी घास की छप्पर वाली झोपड़ी और बौना पहाड़, वर्ष 2011, यासि रासा त, वर्ष 2017, एक चुप्पी जगह, वर्ष 2018 है. कहानी संग्रह मेें पेड़ पर कमरा, वर्ष 1988, महाविद्यालय, वर्ष 1996, एक कहानी, वर्ष 2021, घोड़ा और अन्य कहानियाँ, वर्ष 2021 के साथ कहानी/कविता पर पुस्तक ‘गोदाम’, वर्ष 2020, ‘गमले में जंगल’, वर्ष 2021 हैं. विनोद कुमार शुक्ल की अनेक कृतियों का विभिन्न भाषाओं में अनुवाद भी हुआ है. साहित्य, संस्कृति एवं मनुष्यत्व के ‘ज्ञानपीठ’ विनोद जी के चले जाने से उनके पीछे जो रिक्तता आयी है, उसे भरा पाना लगभग कठिन सा होगा.

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं शोध पत्रिका ‘समागम’ के संपादक हैं)

समरस संस्थान द्वारा लेखक डॉ. प्रभात सिंघल का सम्मान

कोटा / समरस संस्थान साहित्य सृजन भारत गांधीनगर, गुजरात के कोटा संभागीय अध्यक्ष महेश पंचोली की पहल पर पदाधिकारियों द्वारा संस्थान के मुख्य कार्यकारी अधिकारी एवं राष्ट्रीय मीडिया प्रभारी डॉ. प्रभात कुमार सिंघल का मंगलवार 23 दिसंबर को महावीर नगर में सम्मान किया गया। हाल ही में इन्हें इनकी साहित्य जगत की महत्वपूर्ण कृति राजस्थान के साहित्य साधक के लिए राजस्थान के राज्यपाल श्री हरिभाऊ किसनराव बागडे द्वारा लालसोट में अनुराग सेवा संस्थान द्वारा आयोजित अखिल भारतीय साहित्य सम्मान समारोह में सम्मानित किया गया था। इस उपलक्ष्य में यह कार्यक्रम रखा गया।
संस्थान के राष्ट्रीय अध्यक्ष डॉ. शशि जैन, राजस्थान प्रांत प्रभारी डॉ. वैदेही गौतम, संभागीय अध्यक्ष महेश पंचोली, कोटा जिला इकाई अध्यक्ष राजेंद्र कुमार जैन एवं संदीप द्विवेदी ने डॉ. सिंघल का शाल ओढ़ा कर और पुष्प हार पहना कर सम्मान किया गया।
राष्ट्रीय अध्यक्ष  डॉ. शशि जैन ने कहा इनके नेतृत्व में कोटा में किए जा रहे कार्यों से संस्थान गौरवान्वित है। संस्थान के संस्थापक संयोजक डॉ. मुकेश कुमार व्यास ने इनकी सक्रियता को देखते हुए इन्हें संस्थान का मुख्य कार्यकारी अधिकारी नियुक्त किया है।
राजस्थान प्रभारी डॉ. वैदेही गौतम ने कहा कि डॉ. सिंघल के विशेष प्रयासों से कोटा में बाल साहित्य के प्रति उल्लेखनीय कार्य हुआ है और महिला रचनाकारों को सम्मान मिला है तथा वे लेखन में पहले की अपेक्षा अधिक मुखर हो कर आगे आई हैं।
संभागीय अध्यक्ष महेश पंचोली ने कहा कि डॉ. सिंघल ने अथक परिश्रम कर विगत तीन वर्ष में हाड़ोती के साहित्य जगत में जिस प्रकार की चेतना साहित्यकारों में जागृत की और साहित्य के प्रति माहौल बनाया वह अद्वितीय है।
डॉ. सिंघल ने सभी का आभार व्यक्त कर कहा कि राजस्थान के साहित्य साधक कृति का सम्मान उन सभी साहित्य मनीषियों को समर्पित करता हूं जिनकी साहित्यिक सुगंध इस कृति में महक रही है, यह उन सभी का सम्मान है। मैं सौभाग्यशाली हूं कि मुझे राजस्थान के साहित्य साधकों की सेवा करने का मौका मिला है। अनुराग सेवा संस्थान लालसोट के प्रति अपनी कृतज्ञता ज्ञापित करता हूं जिन्होंने कृति का पुरस्कार के लिए चयन किया। प्रयास रहेगा कि संस्थान ने जो विश्वास और संबल दिया है भविष्य में उस पर खरा उतर कर साहित्य सेवा करता रहूं।
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महेश पंचोली
संभागीय अध्यक्ष
समरस संस्थान, कोटा

बांग्लादेश में हिंदू युवक की निर्मम हत्या और हिंदू समाज पर लक्षित हिंसा अस्वीकार्य: आलोक कुमार

मुंबई। आज आयोजित पत्रकार वार्ता में  विश्व हिंदू परिषद के अध्यक्ष एवं वरिष्ठ अधिवक्ता श्री आलोक कुमार ने बांग्लादेश के मैमनसिंह  में एक हिंदू युवक दीपु चंद्रदास की भीड़ द्वारा की गई निर्मम हत्या की कड़े शब्दों में निंदा की और गहरा दुःख व्यक्त किया। उन्होंने बताया कि गुरुवार रात कथित ईशनिंदा के आरोपों के बाद इस जघन्य घटना को अंजाम दिया गया।
श्री आलोक कुमार ने कहा कि रिपोर्टों के अनुसार दीपु चंद्र दास ने यह लिखा था कि “सभी भगवान अलग-अलग नामों से एक ही हैं।” इसे ईशनिंदा करार दिया गया और इसी कारण उसे जिंदा जला दिया गया। उन्होंने कहा कि ऐसी सोच अत्यंत खतरनाक है, क्योंकि यह भारत में धर्मनिरपेक्षता की बुनियाद को ही चुनौती देती है। उन्होंने सवाल उठाया कि स्वयं को धर्मनिरपेक्ष बताने वाली शक्तियाँ, अंतरराष्ट्रीय मीडिया के कुछ वर्ग और विश्वभर के मानवाधिकार मंच इस मुद्दे पर पूरी तरह मौन क्यों हैं। उन्होंने आगे कहा कि निर्वासित बांग्लादेशी लेखिका एवं मानवाधिकार कार्यकर्ता तस्लिमा नसरीन ने सार्वजनिक रूप से बताया है कि दीपु चंद्र दास पर झूठा ईशनिंदा का आरोप लगाया गया था और पुलिस संरक्षण में होने के बावजूद उसे छोड़ दिया गया। श्री आलोक कुमार ने कहा कि यह बांग्लादेश में कानून के शासन के पूर्ण और जानबूझकर हुए पतन तथा राज्य की गंभीर जिम्मेदारी से पलायन को दर्शाता है।
श्री आलोक कुमार ने कहा कि बांग्लादेश इस समय अनिश्चितता, अराजकता और कानूनविहीनता के गंभीर दौर से गुजर रहा है। इस भयावह वातावरण में कट्टरपंथी और उग्रवादी तत्वों ने हिंदुओं, सिखों और अन्य अल्पसंख्यक समुदायों के खिलाफ बेलगाम हिंसा शुरू कर दी है। एक हिंदू युवक की यह अमानवीय हत्या कोई अकेली घटना नहीं है, बल्कि पूरे बांग्लादेश में अल्पसंख्यकों के खिलाफ बढ़ती असुरक्षा, भय और व्यवस्थित उत्पीड़न का भयावह प्रतिबिंब है। उन्होंने जोर देकर कहा कि यह स्थिति पूरी दुनिया के लिए गंभीर चिंता का विषय है। अंतरराष्ट्रीय समुदाय का यह नैतिक और मानवीय दायित्व है कि वह बांग्लादेश में अल्पसंख्यकों की सुरक्षा और मानवाधिकारों की रक्षा के लिए तत्काल और प्रभावी कदम उठाए।
श्री आलोक कुमार ने आगे कहा कि ऐसे हालात में भारत मूक दर्शक बना नहीं रह सकता और न ही रहना चाहिए। भारत की परंपरा रही है कि वह दुनिया भर में उत्पीड़ित और पीड़ित समुदायों के साथ खड़ा रहा है। विश्व हिंदू परिषद भारत सरकार से आग्रह करती है कि वह बांग्लादेश में हिंदुओं और अन्य अल्पसंख्यकों की सुरक्षा, सम्मान और गरिमा सुनिश्चित करने के लिए सभी संभव कूटनीतिक, राजनीतिक और मानवीय उपाय करे।
उन्होंने स्पष्ट रूप से मुहम्मद यूनुस को प्रदान किए गए नोबेल शांति पुरस्कार को तत्काल वापस लेने की मांग की। उन्होंने कहा कि जो नेतृत्व अल्पसंख्यकों की रक्षा करने और कानून-व्यवस्था बनाए रखने में विफल रहता है, उसे अंतरराष्ट्रीय मान्यता या वैधता का कोई नैतिक अधिकार नहीं है। उन्होंने इस बात की भी कड़ी निंदा की कि मुहम्मद यूनुस ने शरीफ उस्मान हादी को राजकीय सम्मान के साथ अंतिम संस्कार दिया, जिसने पहले फेसबुक पर तथाकथित “ग्रेटर बांग्लादेश” का मानचित्र साझा कर भारत को खुली चुनौती दी थी—जिसमें भारत के सात पूर्वोत्तर राज्य, पश्चिम बंगाल और पूर्वी भारत के कुछ हिस्से शामिल दिखाए गए थे। विश्व हिंदू परिषद को ऐसे तत्वों के प्रति कोई सहानुभूति नहीं है।

श्री आलोक कुमार ने घोषणा की कि विश्व हिंदू परिषद बांग्लादेश में हिंदुओं के खिलाफ जारी हिंसा के विरोध में तथा न्याय, जवाबदेही और अंतरराष्ट्रीय हस्तक्षेप की मांग को लेकर भारत के प्रत्येक प्रांत और जिले में देशव्यापी आंदोलन करेगी।

अपने वक्तव्य के समापन पर श्री आलोक कुमार ने कहा कि विश्व हिंदू परिषद की आशा है कि बांग्लादेश में शीघ्र ही लोकतंत्र, धर्मनिरपेक्ष मूल्य और कानून का शासन बहाल होगा। बांग्लादेश की जनता शांति, मानवाधिकार और निर्बाध आर्थिक प्रगति की हकदार है। भारत का समाज और सरकार बांग्लादेश में सौहार्द, सुरक्षा और न्याय की बहाली के लिए सभी न्यायसंगत, वैधानिक और मानवीय प्रयासों का समर्थन करती रहेगी।

श्रीराज नायर                                                       नरेंद्र मुजुमदार
राष्ट्रीय प्रवक्ता                                                      प्रचार प्रसार प्रमुख

भारत की पारंपरिक चिकित्सा की रोशनी में विश्व-स्वास्थ्य

आज की दुनिया गहन और बहुआयामी स्वास्थ्य संकटों से गुजर रही है। एक ओर जीवनशैली से जुड़ी बीमारियाँ, मानसिक तनाव, अवसाद, चिंता और असंतुलन तेजी से बढ़ रहे हैं, तो दूसरी ओर संक्रामक रोग, महामारी और पर्यावरणीय विषमताएँ मानव जीवन को निरंतर चुनौती दे रही हैं। इन परिस्थितियों के बीच यह स्पष्ट होता जा रहा है कि केवल आधुनिक एलोपैथिक चिकित्सा के सहारे वैश्विक स्वास्थ्य समस्याओं का संपूर्ण समाधान संभव नहीं है। यही कारण है कि विश्व समुदाय का ध्यान पुनः भारत की पारंपरिक चिकित्सा प्रणालियों की ओर आकर्षित हो रहा है, जिनमें आयुर्वेद, योग, यूनानी, सिद्ध, होम्योपैथी और प्राकृतिक चिकित्सा जैसी पद्धतियाँ शामिल हैं। जिन्हें ‘आयुष’ के नाम से जाना जाता है; ये प्रणालियाँ समग्र स्वास्थ्य, प्राकृतिक उपचार और शरीर-मन संतुलन पर ध्यान केंद्रित करती हैं, जिनमें आयुर्वेद सबसे प्राचीन और सुव्यवस्थित प्रणालियों में से एक है, जो अपने दार्शनिक आधार और विविध उपचार विधियों के लिए प्रसिद्ध है।
 इन चिकित्सा प्रणालियों का आधार केवल रोग का उपचार नहीं, बल्कि शरीर, मन और आत्मा के समन्वय के माध्यम से संपूर्ण स्वास्थ्य की अवधारणा है।
आयुर्वेद शरीर के तीन दोषों (वात, पित्त, कफ) के संतुलन पर केंद्रित; आहार, जीवनशैली, जड़ी-बूटी और पंचकर्म (शुद्धिकरण) जैसी तकनीकों का उपयोग करती है। अष्टांग आयुर्वेद अर्थात कायचिकित्सा (आंतरिक चिकित्सा), शल्य (सर्जरी), कौमारभृत्य (बाल चिकित्सा), भूतविद्या (मनोविज्ञान), अगद तंत्र (विष विज्ञान), रसायन (जराचिकित्सा), वाजीकरण (प्रजनन) और शालक्य (नेत्र/कान/नाक) में विभाजित है। आयुर्वेद की ही भांति योग भी एक पारंपरिक चिकित्सा प्रणाली है जो शारीरिक आसन (आसन), प्राणायाम (सांस लेने के व्यायाम), ध्यान (मेडिटेशन) और नैतिक सिद्धांतों के माध्यम से मन-शरीर के समन्वय पर केंद्रित है। इसी तरह प्राकृतिक चिकित्सा में मिट्टी, पानी, धूप और आहार जैसी प्राकृतिक तरीकों से शरीर की स्व-उपचार क्षमता को बढ़ावा देती है।
यूनानी चिकित्सा प्रणाली भी भारत में प्रचलित है, यूनान से आई यह प्रणाली शरीर के चार हमर (रक्त, बलगम, पीला पित्त, काला पित्त) के संतुलन पर जोर देती है और पर्यावरण के प्रभाव को मानती है। सिद्ध चिकित्सा प्रणाली मुख्यतः दक्षिण भारत में प्रचलित है, जिसमें जड़ी-बूटियों और धातुओं से बनी दवाओं का उपयोग और योग व ध्यान पर जोर दिया जाता है। सोवा-रिग्पा पहाड़ों की चिकित्सा प्रणाली है, हिमालयी क्षेत्रों (जैसे लद्दाख, सिक्किम) में प्रचलित है, जिसे ‘तिब्बती चिकित्सा’ के रूप में भी जाना जाता है। भारत सरकार का आयुष मंत्रालय राष्ट्रीय आयुष मिशन के माध्यम से इन प्रणालियों के विकास, अनुसंधान और मुख्यधारा की स्वास्थ्य सेवा में एकीकरण को बढ़ावा देता है।
ये प्रणालियाँ प्राचीन भारतीय ज्ञान पर आधारित हैं और अब वैश्विक स्वास्थ्य मंच पर भी अपनी पहचान बना रही हैं।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भारत की इन पारंपरिक चिकित्सा को वैश्विक मंच पर प्रतिष्ठा दिलाने में निर्णायक भूमिका निभाई है। उन्होंने इसे केवल सांस्कृतिक धरोहर के रूप में नहीं, बल्कि भविष्य की एक प्रभावी, सुलभ और टिकाऊ स्वास्थ्य व्यवस्था के रूप में प्रस्तुत किया है। उनके नेतृत्व में आयुष मंत्रालय की स्थापना, अंतरराष्ट्रीय योग दिवस की शुरुआत, विश्व स्वास्थ्य संगठन के साथ पारंपरिक चिकित्सा को लेकर साझेदारी और वैश्विक सम्मेलनों का आयोजन इस दिशा में ठोस कदम हैं। हाल ही में नई दिल्ली में पारंपरिक चिकित्सा पर दूसरा वैश्विक शिखर सम्मेलन इस बात का प्रमाण है कि भारत अब इस क्षेत्र में केवल सहभागी नहीं, बल्कि मार्गदर्शक की भूमिका निभा रहा है। प्रधानमंत्री की ओमान यात्रा के दौरान आयुष और हर्बल उत्पादों के निर्यात में हुई वृद्धि इस परिवर्तनशील परिदृश्य को स्पष्ट रूप से दर्शाती है। 61.1 मिलियन डॉलर से बढ़कर 65.1 मिलियन डॉलर तक पहुँचना केवल आर्थिक आँकड़ा नहीं है, बल्कि यह वैश्विक विश्वास का संकेत है। दुनिया के अनेक देश यह समझने लगे हैं कि भारत की पारंपरिक चिकित्सा प्रणालियाँ न केवल सस्ती और सुलभ हैं, बल्कि दीर्घकालिक स्वास्थ्य लाभ भी प्रदान करती हैं।
 यह तथ्य और भी महत्वपूर्ण हो जाता है जब विश्व की लगभग एक चौथाई आबादी आर्थिक कारणों से बुनियादी स्वास्थ्य सुविधाओं से वंचित है। ऐसे में पारंपरिक चिकित्सा एक व्यवहारिक विकल्प के रूप में उभरती है।
विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार आज भी दुनिया के लगभग 170 देशों में 40 से 90 प्रतिशत आबादी किसी-न-किसी रूप में पारंपरिक चिकित्सा का उपयोग करती है। यह आँकड़ा इस धारणा को तोड़ता है कि पारंपरिक चिकित्सा केवल विकासशील देशों तक सीमित है। वास्तव में विकसित देशों में भी योग, आयुर्वेदिक उपचार, हर्बल औषधियाँ और प्राकृतिक चिकित्सा के प्रति रुचि लगातार बढ़ रही है। इसका एक बड़ा कारण आधुनिक चिकित्सा से जुड़े दुष्प्रभाव, अत्यधिक दवाओं पर निर्भरता और महँगी उपचार प्रक्रियाएँ हैं। एलोपैथिक चिकित्सा ने जहाँ त्वरित राहत और शल्य चिकित्सा में अद्भुत प्रगति की है, वहीं इसके साथ दवाओं के साइड इफेक्ट, एंटीबायोटिक प्रतिरोध और दीर्घकालिक जटिलताएँ भी जुड़ी हैं। इसके विपरीत भारतीय पारंपरिक चिकित्सा रोग की जड़ तक पहुँचने का प्रयास करती है। आयुर्वेद शरीर की प्रकृति, दोषों के संतुलन और जीवनशैली के सुधार पर बल देता है। योग केवल शारीरिक व्यायाम नहीं, बल्कि मानसिक शांति, एकाग्रता और आत्मिक संतुलन का मार्ग है।
इन पद्धतियों का उद्देश्य रोग को दबाना नहीं, बल्कि शरीर की स्वाभाविक उपचार क्षमता को जाग्रत करना है। यही कारण है कि इन्हें अपेक्षाकृत सुरक्षित, कम दुष्प्रभाव वाली और दीर्घकालिक स्वास्थ्य के लिए उपयोगी माना जाता है।
पारंपरिक चिकित्सा के दूसरे वैश्विक शिखर सम्मेलन में भारत ने इस दृष्टिकोण को प्रभावी ढंग से दुनिया के सामने रखा। ब्राज़ील, संयुक्त अरब अमीरात, मलेशिया, मेक्सिको, नेपाल, श्रीलंका सहित 16 देशों के साथ द्विपक्षीय बैठकों ने यह स्पष्ट कर दिया कि पारंपरिक चिकित्सा अब कूटनीति और वैश्विक सहयोग का भी एक सशक्त माध्यम बन चुकी है। इस अवसर पर प्रधानमंत्री मोदी द्वारा जारी किया गया ‘आयुष मार्क’ एक ऐतिहासिक पहल है, जो आयुष उत्पादों और सेवाओं के लिए गुणवत्ता का वैश्विक मानक स्थापित करेगा। इससे न केवल उपभोक्ताओं का विश्वास बढ़ेगा, बल्कि भारतीय उत्पादों की अंतरराष्ट्रीय स्वीकार्यता भी मजबूत होगी। हालाँकि यह भी सत्य है कि पारंपरिक चिकित्सा के क्षेत्र में कुछ चुनौतियाँ मौजूद हैं। गुणवत्ता नियंत्रण, मानकीकरण, वैज्ञानिक शोध और प्रमाणिकता के प्रश्न लंबे समय से उठते रहे हैं।
कई बार अप्रमाणित दावे और मिलावटी उत्पाद इस पूरी प्रणाली की विश्वसनीयता पर प्रश्नचिह्न लगा देते हैं। किंतु ‘आयुष मार्क’ जैसी पहलों और वैज्ञानिक अनुसंधान को बढ़ावा देकर इन चुनौतियों से निपटा जा सकता है। आवश्यकता इस बात की है कि पारंपरिक ज्ञान और आधुनिक विज्ञान के बीच सेतु बनाया जाए, ताकि दोनों की श्रेष्ठताओं का समन्वय हो सके।
आज जब वैश्विक आबादी का एक बड़ा हिस्सा, लगभग 4.6 अरब लोग, पर्याप्त स्वास्थ्य सेवाओं से वंचित हैं, तब भारत की पारंपरिक चिकित्सा प्रणालियाँ आशा की किरण बन सकती हैं। ये प्रणालियाँ न केवल रोगों के उपचार में सहायक हैं, बल्कि रोकथाम और स्वास्थ्य संवर्धन में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।
 संतुलित आहार, नियमित योगाभ्यास, प्राकृतिक औषधियों और मानसिक अनुशासन के माध्यम से अनेक बीमारियों को प्रारंभिक स्तर पर ही नियंत्रित किया जा सकता है। इस संदर्भ में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का दृष्टिकोण दूरदर्शी कहा जा सकता है। उन्होंने पारंपरिक चिकित्सा को अतीत की विरासत के रूप में नहीं, बल्कि भविष्य की आवश्यकता के रूप में देखा है। वैश्विक मंचों पर भारत की इस चिकित्सा परंपरा को स्थापित करने के उनके प्रयास यह संकेत देते हैं कि आने वाले वर्षों में विश्व स्वास्थ्य व्यवस्था में भारत की भूमिका और भी सशक्त होगी। जब आधुनिक चिकित्सा की सीमाएँ स्पष्ट हो रही हैं और विश्व एक समग्र, सुलभ और मानवीय स्वास्थ्य मॉडल की तलाश में है, तब भारतीय पारंपरिक चिकित्सा न केवल भारत के लिए, बल्कि पूरी मानवता के लिए एक प्रभावी विकल्प के रूप में उभर रही है। यही इसकी सबसे बड़ी उपलब्धि और भविष्य की सबसे बड़ी संभावना है।

(ललित गर्ग)
लेखक, पत्रकार, स्तंभकार
ई-253, सरस्वती कंुज अपार्टमेंट
25 आई. पी. एक्सटेंशन, पटपड़गंज, दिल्ली-92
फोनः 22727486, 9811051133

पत्थरों पर स्वर्णाक्षऱों से लिखा है हमारे अतीत का गौरव

जयपुर के प्राचीन गोविंददेवजी मन्दिर का यह शिलालेख बड़े काम की चीज है : वामपन्थी इतिहास के षड्यंत्र का भंडाफोड़ करता है ।
अर्थ
” 1577 ईस्वी का यह शिलालेख है, इसमें श्रीराम वंसज – कुर्मकुल -पृथ्वीनाथवंसज – ( श्रीविष्णु ) कुल में पैदा हुए भगवंतदास जी के प्रतापी पुत्र #महाराजधिराज_मानसिंह ने वृंदावन के इस गोविंददेवजी मंदिर का निर्माण करवाया । “
7 मंजिला यह मंदिर इतना भव्य था, की इसके यज्ञ की अग्नि आगरा के मुगलकिले तक दिखाई देती थी ।। यह मानसिंह का रुतबा था ।
इस शिलालेख से हमे इतिहास के एक महान घपले का पता चलता है । पहला तो यह, की अकबर के काल में अकबर भारत का राजा नही था, बल्कि मानसिंह भारत का राजा था । मानसिंह अगर भारत का राजा नही होते, आगरा से मात्र 70 किलोमीटर दूर ही शिलालेख गाड़कर खुद को ” महाराजधिराज ” नही कह पाते ।। आज इन उपाधियों का महत्व नही है, इनकी जगह प्रधामनंत्री, राष्ट्रपति आदि शब्द सम्मानित नामो की सूची में आ गए है, जिनका हम सार्वजनिक उपयोग या अपमान नही कर सकते । राज ओर शाही ( राजशाही ) काल मे #महाराजधिराज #राजा #रावल आदि शब्दो का महत्व काफी ज्यादा होता था ।। बिना भारत के राजा हुए अगर मानसिंह खुद को महाराजधिराज कह देते, तो खून की नदियां बह जाती ।। अतः अकबर ने भी यह स्वीकार कर लिया था, की मानसिंह ही भारत का राजा है ।।
अब हमारे इतिहास की विडम्बना यह है, की 18Th सदी के आसपास कोई इतिहासकार कर्नल टॉड जो न् अच्छे से भारत की भाषा समझता है, न् सांस्कृती, न् मजबूरियां, वह भारत का इतिहास लिखता है । उसमे वह मानसिंह की आलोचना करता है , अंग्रेजो का वही इतिहास फिर परम्परा ओर सत्य बन जाता है । कहावत है, झूठ को अगर बार बार – बार बार बोला जाए, तो वही सच लगने लगता है । यही हाल तो भारत के इतिहास का हुआ है । वरना क्या भारत मे एक हल्दीघाटी का युद्ध ही हुआ है ? इसके अलावा कोई युद्ध नही हुआ, जिसकी बातें भारत के इतिहास में होती ही नही है …. ओर हल्दीघाटी का युद्ध ही इसलिए बार बार आता है, क्यो की कर्नल टॉड उदयपुर के ही मेहमान थे, बाद के सारे इतिहासकार , जिनके दस्तावेज ही आज के इतिहास के प्रमाणिक दस्तावेज माने जाते है, चाहे श्यामलदास हो, या ओझा जी । यह सब कर्नल टॉड के शिष्य थे, ओर मेवाड़ की तनख्वाह लेने वाले इतिहासकार ।। इनका मेवाड़ के लिए सॉफ्ट कार्नर रहना स्वाभाविक है, लेकिन इसका यह अर्थ नही, की मेवाड़ के इतिहास के सम्मान में भारत के अन्य वीरो के इतिहास की तिलांजलि दे दी जाएं।
बात वहीं हल्दीघाटी पर आती है, क्या भारत मे एकमात्र महान युद्ध हल्दीघाटी ही है ?
क्यो जेता ओर कुम्पा के बलिदान ओर शौर्य की बात बार बार नही होती ? जिसके कारण विश्वशक्ति को कहना पड़ गया, इन दो शेरो के मुंह से बाजरा के दाना लेना भी मुश्किल है । ” एक मुट्ठी बाजरे के लिए में हिन्दुस्थान की सल्तनत खो बैठता । शेरशाह सूरी से अपने पराक्रम के बल पर यह कहलवाने जेता ओर कुम्पा के इतिहास की बात क्यो नही होती ?
क्यों नही बात होती आसाम के लासित वीरफोकन की, जिसने मुगलो को मारा था ?
क्यों नही बार बार बात होती मिहिरभोज, विग्रहराज चौहान , सूरजमल जाट, राजा सुहेलदेव के पराक्रम की ?
यह बात इसलिए नही हो सकती, क्यो की इन बातों से हिंदुओ का भला होता है । देश का बच्चा अगर अपना इतिहास ही जान लेगा, तो गुलामी की जंजीर नही तोड़ फेंकेंगा ? बाबासाहेब ने बिल्कुल सही कहा है, बाबासाहेब की बातें में आपसे कहना चाहता हूं –
” तोड़ दीजिये अपने सारे सभी पूर्वाग्रहों को की इतिहास ने किसको महान या ग़द्दार कहा है, अपने आप से तय करें, की इतिहास में महान या गद्दार कौन है ? क्यो की महान इतिहासकार P N ok ने कहा है, की ” भारत का इतिहास भारत के शत्रुओं द्वारा लिखा गया है ” ।अब शत्रु हमे भृमित नही करेंगे तो ओर क्या करेंगे ??
बार बार हल्दीघाटी की अगर बात से अगर मानसिंह का अपमान होता ही है, तो आज में आपको कहना चाहता हूं, की अगर मानसिंह हल्दीघाटी का युद्ध हार जाते, तो उस दिन हिन्दूधर्म ही हार जाता, अगर महाराणा प्रताप का वह भाला मानसिंह को लग जाता, तो फिर पूरी का जगन्नाथपुरी मंदिर नही बचता ।। अगर हल्दीघाटी के मैदान में मानसिंह हार जाता, तो गुजरात इस्लामिक सुल्तानों, जिसके कारण भद्रकाली अहमदाबाद बना पड़ा है, ओर चित्तौड़ माता कर्णावती के जोहर के साथ जला कुचला सा पड़ा है, उन गुजराती मुसलमान सुल्तानों से गुजरात को आजादी नही मिलती । द्वारिकाधीश मस्जिद से दुबारा मंदिर नही बनता ।।। क्यो की हल्दीघाटी के बाद मानसिंह ने भारत मे यही सब काम किये है । कोई हिंदुओ पर अत्याचार नही किये है, आप एक भी प्रमाण देवें, कहाँ मानसिंह के राज्य में किसी हिन्दू के साथ कोई अन्याय हुआ हो, या उसका किसी मुसलमान ने धर्म परिवर्तन करवाया हो ?
आज बिहार में मानसिंह के नाम पर गांव आजतक है, गयाजी के मस्जिद बने मंदिरो को दुबारा मानसिंह ने ही मंदिर बनवाया था । सूर्यमंदिर का पुनः उद्धार भी किया। यह सब कार्य मानसिंह ने हल्दीघाटी के बाद ही किए ।
जोधा को लेकर अपमानित करना भी गलत है, क्यो की जोधा का चर्चा जिसने छेड़ा , वह कर्नल टॉड स्वयं कन्फर्म नही, की जोधा जोधपुर की थी, या आमेर की ।। ऐसे इतिहास को हम प्रमाणिक क्यो मानें ?
ओर फिर भी अगर आप जोड़तोड़ करके साबित करते भी है, की आमेरवालो ने लड़कीं दी, भले ही पारसी हो, तब भी आमेर परिवार सम्मान के लायक है, न् की अपमान के लायक । क्यो की उनके इस निर्णय की वजह से हजारो लाखो लड़कियों की इज्जत आबरु बच गयी । एक राजा अगर अपना बलिदान देकर प्रजा की रक्षा कर ले, तो इससे बड़ी खुशी और आदर्श की बात ओर क्या हो सकती है ??
इस पोस्ट के अंत मे मैं यह कहना चाहता हूं, की मेरी पिछली पोस्ट में किसी ने कमेंट किया, मानसिंह कितने भी वीर हो, थे तो मुगलो के सेनापति ?
तो भैया सेनापति नही थे, सेनापति तो अकबर था, मानसिंहः तो राजा ही था, बस भारत के हिन्दू गद्दारों ने, आपने, हमने मिलकर मानसिंह को सेनापति ओर अकबर को राजा बना दिया ।। वरना 15-16th में तो मानसिंहः राजा ही हुआ करते थे ।
अब कर लेते हैं हल्दीघाटी की बात –
मेवाड़ की सेना ? 7000
गुजरात की पठान की सेना – 2 लाख
मालवा – लाखो पठान उपद्रवी
बंगाल की पठान षेण – 3 लाख, 200 एडवांस तोप, 40,000 घुड़सवार
अकबर – सैनिक लाख में , लेकिन हथियार बहुत एडवांस । अकबर का एक सैनिक आधुनिक हथियार लेकर 10 के बराबर ।
मानसिंह- 20000 सेनिक
ऐसी समीकरण भारत मे हो, तो आपका मित्र कौन होगा ? और हां इसमें आपके पास पठानो के पास जाने का ऑप्शन नही है, क्यो की पूरे भारत के पठान एक है और वह किसी कीमत पर मूर्तिपूजा नही होने देने की कसम खा चुके हैं …….

क्या है विकसित भारत-जी राम जी कानून 2025

ग्रामीण रोज़गार लगभग दो दशकों से भारत की सामाजिक सुरक्षा संरचना की आधारशिला रही है। 2005 में कार्यान्वित होने के बाद से, महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम (मनरेगा) ने मज़दूरी वाला रोजगार प्रदान करने, ग्रामीण आय को स्थिर करने और मूलभूत अवसंरचना निर्माण में अहम भूमिका निभाई है। हालांकि, समय के साथ, ग्रामीण भारत की संरचना और लक्ष्य अत्‍यधिक बदल गए हैं। बढ़ती आय, बढ़ी हुई कनेक्टिविटी, व्यापक स्तर पर डिजिटल पहुंच और अलग-अलग तरह की आजीविका ने ग्रामीण रोज़गार की आवश्यकताओं की प्रकृति बदल दी है।

इस पृष्ठभूमि में, भारत के राष्ट्रपति द्वारा विकसित भारत–गारंटी फॉर रोज़गार एंड आजीविका मिशन (ग्रामीण) विधेयक, 2025 को स्वीकृति प्रदान की गई है। यह कानून मनरेगा में व्यापक वैधानिक बदलाव का प्रतिनिधित्व करता है, जो ग्रामीण रोज़गार को विकसित भारत 2047 के दीर्घकालिक विजन के साथ संयोजित करता है तथा जवाबदेही, बुनियादी ढांचे के परिणामों और आय सुरक्षा को सुदृढ़ करता है।

भारत में ग्रामीण रोजगार और विकास नीति की पृष्ठभूमि
स्वतंत्रता के बाद से, भारत में ग्रामीण विकास की नीतियों का केंद्रबिन्दु निर्धनता कम करने, खेती की पैदावार को बेहतर बनाने और अधिशेष तथा कम काम वाले ग्रामीण मज़दूरों के लिए रोजगार सृजन रहा है। मजदूरी वाले रोजगार कार्यक्रम धीरे-धीरे ग्रामीण रोजगार की सहायता करने के मुख्य माध्यम बन गए हैं, साथ ही इसने मूलभूत अवसंरचना को भी सुदृढ़ किया है। समय के साथ बदलते सामाजिक-आर्थिक स्थितियों के अनुरूप दृष्टिकोणों में भी बदलाव आया है।

ग्रामीण श्रमबल कार्यक्रम (1960 का दशक) और ग्रामीण रोजगार के लिए क्रैश स्कीम (1971) जैसे आरम्भिक कार्यक्रमों के साथभारत के मजदूरी रोजगार पहलों की विविध चरणों के माध्यम से प्रगति हुई। इनके बाद 1980 और 1990 के दशक में अधिक संरचित प्रयास किए गए, जिसमें राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार कार्यक्रम, ग्रामीण भूमिहीन रोजगार गारंटी कार्यक्रम शामिल था, जिसे बाद में जवाहर रोजगार योजना (1993) में विलय कर दिया गया। 1999 में यह सम्पूर्ण ग्रामीण रोजगार योजना में संघटित हो गई, जिसका उद्देश्य कवरेज और समन्वय में सुधार करना था। रोजगार आश्वासन योजना और काम के बदले अनाज कार्यक्रम जैसी पूरक योजनाओं ने मौसमी बेरोजगारी और खाद्य सुरक्षा पर ध्यान दिया। 1977 के महाराष्ट्र रोजगार गारंटी अधिनियम के साथ एक बड़ा बदलाव आया, जिसने काम करने के वैधानिक अधिकार की अवधारणा प्रस्तुत की। इन अनुभवों की परिणति 2005 में महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम (एमजीएनआरईजीए) के अधिनियमन में हुई।


मनरेगा का विकास और वृद्धिशील सुधार की सीमाएं
महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम (मनरेगा) एक प्रमुख कार्यक्रम था जिसका लक्ष्य बिना कौशल वाले काम करने को तैयार गांव के परिवारों को प्रति वर्ष कम से कम 100 दिन की गारंटी वाला काम देकर रोजी-रोटी की सुरक्षा बढ़ाना था। पिछले कुछ वर्षों में, कई प्रशासनिक और प्राद्यौगिक सुधारों ने इसके कार्यान्वयन को सुदृढ़ किया, जिससे सहभागिता, पारदर्शिता और डिजिटल शासन में अत्‍यधिक सुधार हुआ। वित्‍त वर्ष 2013-14 और वित्‍त वर्ष 2025-26 के बीच महिलाओं की सहभागिता 48 प्रतिशत से धीरे-धीरे बढ़कर 58.15 प्रतिशत हो गई, आधार सीडिंग में तेज़ी से बढ़ोतरी हुई, आधार-बेस्ड पेमेंट सिस्टम को व्‍यापक स्‍तर पर अपनाया गया और इलेक्ट्रॉनिक वेतन पेमेंट लगभग हर जगह प्रचलित हो गया। कामों की निगरानी में भी सुधार हुआ, जियो-टैग्ड एसेट्स में व्‍यापक स्‍तर पर बढ़ोतरी हुई और घरेलू स्‍तर पर सृजित अलग-अलग परिसंपत्तियों का हिस्सा बढ़ा।

मनरेगा के तहत प्राप्‍त अनुभव ने प्रक्षेत्र-स्‍तरीय कर्मचारियों की अहम भूमिका को भी रेखांकित किया, जिन्होंने कम प्रशासनिक संसाधनों और कर्मचारियों के साथ काम करने के बावजूद निरंतरता और कर्यान्‍वयन का परिमाण सुनिश्चित किया। यद्पि, इन लाभों के साथ-साथ, गहरे संरचनागत मुद्दे भी बने ही रहे। कई राज्यों में निगरानी से पता चला कि जमीनी स्‍तर पर काम प्राप्‍त नहीं हो रहा था, व्‍यय वास्‍तविक प्रगति से मेल नहीं खा रहा था, श्रम केन्द्रित कार्यों में मशीनों का इस्तेमाल हो रहा था और डिजिटल उपस्थितिप्रणाली का बार-बार उल्‍लंघन किया जा रहा था। समय के साथ, गलत इस्तेमाल बढ़ता गया और महामारी के बाद के समय में केवल कुछ ही परिवार पूरे सौ दिन का काम पूरा कर पाए। इन रुझानों से पता चला कि डिलीवरी प्रणाली में तो सुधार हुआ, लेकिन मनरेगा का पूरा ढांचा लगभग चरमरा चुका था।

रोजगार के लिए विकसित भारत गारंटी और आजीविका मिशन ग्रामीण कानून ने एक व्‍यापक कानूनी बदलाव के जरिए इस अनुभव पर ध्‍यान दिया है। यह प्रशासनिक व्‍यय की सीमा को 6 प्रतिशत से बढ़ाकर 9 प्रतिशत करने के जरिए कार्यान्‍वयन संरचना को सुदृढ़ करता है, जिससे कर्मचारियों की भर्ती करने, पारिश्रमिक प्रदान करने, प्रशिक्षण और तकनीकी क्षमता के लिए पर्याप्‍त मदद मिलती है। यह बदलाव प्रोग्राम मैनेजमेंट के लिए एक व्‍यावहारिक और लोक-केंद्रित दृष्टिकोण प्रदर्शित करता है, जो अधिक पेशेवर और उपयुक्‍त सपोर्ट वाले सिस्टम की ओर बढ़ रहा है। मजबूत प्रशासनिक क्षमता से योजना निर्माण और काम करने में सुधार, सेवा वितरण में बढ़ोतरी और जवाबदेही में सुदृढ़ता आने की उम्‍मीद है, जिससे यह सुनिश्चित होगा कि नई संरचना के लक्ष्य ग्रामीण स्‍तर पर निरंतर पूरे होते रहें।

नए वैधानिक ढांचे का औचित्‍य
सुधार की आवश्‍यकता बड़े सामाजिक-आर्थिक बदलावों में भी निहित है। मनरेगा 2005 में कार्यान्वित किया गया था, लेकिन ग्रामीण भारत अब रूपांतरित हो रहा है। 2011-12 में निर्धनता का स्‍तर 27.1 प्रतिशत से घटकर 2022-23 में 5.3 प्रतिशत हो गया, जिसे बढ़ते उपभोग, बेहतर वित्‍तीय सुविधा और बढ़े हुए कल्‍याणकारी कवरेज से सहायता मिली। ग्रामीण आजीविका के अधिक विविधीकृत होने और डिजिटली तरीके से समेकित होने के साथ, मनरेगा की व्‍यापक और मांग आधारित संरचना अब आज के गांव की वास्‍तविकता से पूरी तरह मेल नहीं खाती।

विकसितभारत- जी राम जी कानून 2025, इस संदर्भ का प्रत्‍युत्‍तर ग्रामीण रोजगार गारंटी को आधुनिक बनाने, जवाबदेही को सुदृढ़ करने और रोजगार सृजन को दीर्घावधि अवसंरचना और जलवायु अनुकूलता लक्ष्यों के साथ जोड़कर देता है।

विकसित भारत-जी राम जी कानून, 2025 की मुख्य विशेषताएं

यह कानून प्रत्‍येक वित्‍तीय वर्ष में ऐसे ग्रामीण परिवारों को, जिनके वयस्‍क सदस्‍य स्‍वेच्‍छा से बिना कौशल वाले काम के लिए तैयार हैं, 125 दिन की मजदूरी वाले रोजगार की गारंटी देता है। इससे पहले के 100 दिन की पात्रता से अधिक दिनों की आय सुरक्षा में मदद मिलेगी। साथ ही, बुवाई और कटाई के व्‍यस्‍त सीज़न में खेती में काम करने वाले मजदूरों की उपस्थिति सुनिश्चित करने के लिए कुल 60 दिन का नो-वर्क पीरियड होगा। शेष 305 दिनों में भी मजदूरों को 125 दिन की गारंटी वाला रोजगार प्राप्‍त होता रहेगा, जिससे किसानों और मजदूरों दोनों लाभान्वित होंगे। दैनिक मज़दूरी हर सप्‍ताह या किसी भी स्थिति में, काम करने की तिथि के 15 दिन के भीतर ही वितरित कर दी जाएगी। रोजगार सृजन को चार प्राथमिकता वाले कार्य-क्षेत्रों के माध्‍यम से अवसंरचना विकास के साथ जोड़ा गया है:

जल-संबंधी कार्यों के माध्यम से जल सुरक्षा
मुख्य-ग्रामीण अवसंरचना
आजीविका से संबंधित बुनियादी ढांचा
मौसम में बदलाव के असर को कम करने के लिए विशेष कार्य

सृजित सभी परिसंपत्तियों को विकसित भारत राष्ट्रीय ग्रामीण अवसंरचना से जोड़ा गया है, जो एक एकीकृत और समन्वित राष्ट्रीय विकास रणनीति सुनिश्चित करता है। योजना को विकसित ग्राम पंचायत योजनाओं के जरिए विकेंद्रीकृत किया जाता है, जो स्थानीय रूप से तैयार की जाती हैं और स्थानीय रूप से पीएम गति शक्ति जैसी राष्ट्रीय प्रणालियों के साथ एकीकृत होती हैं।

मनरेगा बनाम विकसित भारत- जी राम जी कानून, 2025
नया कानून मनरेगा में एक बड़े सुधार का प्रतिनिधित्व करता है, जिसमें रोजगार, पारदर्शिता, योजना और जवाबदेही को बढ़ाते हुए संरचनात्मक कमियों को दुरूस्त किया गया है।
वित्तीय ढांचा
केंद्रीय क्षेत्र की योजना से केंद्र प्रायोजित ढांचे में बदलाव ग्रामीण रोजगार और परिसंपत्ति निर्माण की स्वाभाविक रूप से स्थानीय प्रकृति को दर्शाता है। नए बदलाव के तहत, राज्य एक मानक आवंटन ढांचे के माध्यम से लागत और जिम्मेदारी दोनों साझा करते हैं, प्रभावी कार्यान्वयन के लिए प्रोत्साहित करते हैं और दुरुपयोग को रोकते हैं। योजना को क्षेत्रीय जरूरतों के आधार पर तैयार किया जाता है जो ग्राम पंचायत योजनाओं के रूप में दिखता है। साथ ही, केंद्र मानक निर्धारित करता है, जबकि राज्य जवाबदेही के साथ कार्य निष्पादन करते हैं, जिसके परिणामस्वरूप एक सहकारी साझेदारी होती है जिससे दक्षता में सुधार होता है और ठोस परिणाम मिलते हैं।

मजदूरी, सामग्री और प्रशासनिक खर्चों पर निधियों की कुल अनुमानित वार्षिक आवश्यकता 1,51,282 करोड़ रुपये है, जिसमें राज्य का हिस्सा भी शामिल है। इसमें से केंद्र का अनुमानित हिस्सा 95,692.31 करोड़ रुपये है। इस बदलाव से राज्यों पर कोई अनुचित वित्तीय बोझ नहीं पड़ेगा। वित्त पोषण अवसंरचना को राज्य की क्षमता के अनुसार तैयार किया गया है। इसके तहत केंद्र और राज्यों के बीच 60:40 के मानक लागत-साझाकरण अनुपात, पूर्वोत्तर और हिमालयी राज्यों के लिए 90:10 की बढ़ी राशि और बिना विधायिका वाले केंद्र शासित प्रदेशों के लिए 100 प्रतिशत केंद्रीय वित्त पोषण का प्रावधान है। राज्य पहले के ढांचे के तहत, पहले से ही सामग्री और प्रशासनिक लागतों का एक हिस्सा वहन कर रहे थे और पूर्वानुमानित मानक आवंटन के लिए किए गए उपाय से बजट में मजबूती आई है। आपदाओं के दौरान राज्यों को अतिरिक्त सहायता के प्रावधान और मजबूत निगरानी तंत्र भी दुरुपयोग से उत्पन्न होने वाले दीर्घकालिक नुकसान को कम करने में मदद करते हैं और जवाबदेही के साथ-साथ राजकोषीय स्थिरता को मजबूत करते हैं।

विकसित भारत के लाभ- जी राम जी कानून

यह कानून रोजगार सृजन को उत्पादक परिसंपत्ति सृजन से जोड़कर ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत करता है, जिससे घरेलू आय में वृद्धि होती है और अनुकूलन क्षमता में सुधार होता है। पानी से जुड़े कामों, कृषि और भूजल स्तर में सुधार को प्राथमिकता दी जाती है। सड़क और कनेक्टिविटी जैसे मुख्य ग्रामीण बुनियादी ढांचे में निवेश से बाजार तक पहुंच में आसानी होती है, जबकि भंडारण, बाजार और उत्पादन परिसंपत्तियों सहित आजीविका बुनियादी ढांचा आय विविधीकरण को सक्षम बनाता है। जल संचयन, बाढ़ जल निकासी और मृदा संरक्षण पर केंद्रित कार्यों के माध्यम से जलवायु अनुकूलता मजबूत होती है। 125 दिनों के रोजगार की गारंटी घरेलू आय को बढ़ाती है, ग्राम-स्तर की खपत को प्रोत्साहित करती है, और डिजिटल उपस्थिति, मजदूरी भुगतान और डेटा-संचालित योजना के माध्यम से प्रवासन को कम करने में मदद करती है।

किसानों को बुवाई और कटाई के मौसम के दौरान सार्वजनिक कार्यों में राज्य-अधिसूचित ठहराव, मजदूरी मुद्रास्फीति की रोकथाम और बेहतर सिंचाई, भंडारण और कनेक्टिविटी की वजह से सुनिश्चित श्रम उपलब्धता से लाभ होता है। श्रमिकों को उच्च संभावित कमाई, विकसित ग्राम पंचायत योजनाओं के माध्यम से अनुमानित काम, सुरक्षित डिजिटल मजदूरी भुगतान और उन परिसंपत्तियों से प्रत्यक्ष लाभ होता है जिन्हें सृजित करने में वे मदद करते हैं। इसके साथ ही उन्हें एक अनिवार्य बेरोजगारी भत्ता भी मिलता है। जब श्रमिकों को काम प्रदान नहीं किया जाता है तो उन्हें दैनिक बेरोजगारी भत्ता 15 दिनों के बाद मिल जाता है। इसकी जिम्मेदारी राज्यों को दी गई है। मजदूरी की दरों और शर्तों को नियमों के माध्यम से निर्धारित किया जाना है, जो यह सुनिश्चित करे कि इसमें लचीलापन हो और साथ ही श्रमिकों के अधिकारों की रक्षा तथा रोजगार के समयबद्ध प्रावधान को बढ़ावा मिले।

कार्यान्वयन और निगरानी प्राधिकरण

यह कानून राष्ट्रीय, राज्य, जिला, ब्लॉक और गांव के स्तर पर मिशन को समन्वित, जवाबदेह और पारदर्शी तरीके से लागू करने के लिए एक स्पष्ट संस्थागत ढांचा बनाता है।

• केन्द्रीय और राज्य ग्रामीण रोजगार गारंटी परिषदें नीतिगत मार्गदर्शन देती हैं, कार्यान्वयन की समीक्षा करती हैं और जवाबदेही को मजबूत करती हैं।

• राष्ट्रीय और राज्य संचालन समितियां रणनीतिक दिशा, तालमेल और निष्पादन समीक्षा का संचालन करती हैं।

• पंचायती राज संस्थाएं योजना निर्माण और कार्यान्वयन का नेतृत्व करती हैं, जिसमें ग्राम पंचायतें लागत के हिसाब से कम से कम आधा कार्यान्वयन करती हैं।

• जिला कार्यक्रम समन्वयक और कार्यक्रम अधिकारी योजना निर्माण, अनुपालन, भुगतान और सामाजिक लेखा-परीक्षा का प्रबंधन करते हैं।

• ग्राम सभाएं सामाजिक लेखा-परीक्षा करने और सभी रिकॉर्ड तक पहुंच के जरिए पारदर्शिता सुनिश्चित करने में एक मजबूत भूमिका निभाती हैं।

पारदर्शिता, जवाबदेही और सामाजिक सुरक्षा

यह कानून अनुपालन सुनिश्चित करने और सार्वजनिक धन की सुरक्षा के लिए केंद्र सरकार को स्पष्ट प्रवर्तन शक्तियों से लैस करता है। यह केंद्र को कार्यान्वयन से संबंधित शिकायतों की जांच करने, गंभीर अनियमितताओं का पता चलने वाली निधि जारी करने को निलंबित करने और कमियों को दूर करने के लिए सुधारात्मक या उपचारात्मक उपायों को निर्देशित करने के लिए अधिकृत करता है। ये प्रावधान पूरे सिस्टम में जवाबदेही को मजबूत करते हैं, वित्तीय अनुशासन बनाए रखते हैं और दुरुपयोग को रोकने के लिए समय पर हस्तक्षेप करने में सक्षम बनाते हैं।

कानून कार्यान्वयन के हर चरण को कवर करते हुए एक व्यापक पारदर्शिता का ढांचा भी स्थापित करता है। यह अनियमितताओं की शीघ्र पहचान करने के लिए कृत्रिम बुद्धिमत्ता और बायोमेट्रिक प्रमाणीकरण के इस्तेमाल को सक्षम बनाता है, जो निरंतर मार्गदर्शन और समन्वय प्रदान करने वाली केंद्रीय और राज्य संचालन समितियों द्वारा समर्थित है। चार स्पष्ट रूप से परिभाषित ग्रामीण विकास कार्यक्षेत्रों के माध्यम से एक केंद्रित दृष्टिकोण इनके परिणामों की बारीकी से ट्रैकिंग की अनुमति देता है। पंचायतों को पर्यवेक्षण में एक बढ़ी हुई भूमिका सौंपी गई है, जिसमें तत्क्षण कार्यों की जीपीएस और मोबाइल-आधारित निगरानी शामिल है। तत्क्षण एमआईएस डैशबोर्ड और साप्ताहिक सार्वजनिक घोषणा सार्वजनिक दृश्यता सुनिश्चित करते हैं, जबकि हर छह महीने में कम से कम एक बार अनिवार्य सामाजिक लेखा-परीक्षा सामुदायिक भागीदारी और विश्वास को मजबूत करते हैं।

निष्कर्ष 
विकसित भारत- रोजगार गारंटी और आजीविका मिशन (ग्रामीण) कानून, 2025, भारत की ग्रामीण रोजगार नीति में एक निर्णायक बदलाव का प्रतिनिधित्व करता है। मनरेगा ने समय के साथ भागीदारी, डिजिटलीकरण और पारदर्शिता में महत्वपूर्ण लाभ हासिल किया, जबकि लगातार संरचनात्मक कमजोरियों ने इसकी प्रभावशीलता को सीमित कर दिया। नया कानून एक आधुनिक, जवाबदेह और अवसंरचना-केंद्रित ढांचे के माध्यम से उनकी कमियों को दूर करते हुए पिछले सुधारों पर आधारित है।

गारंटीकृत रोजगार का विस्तार करके, राष्ट्रीय विकास की प्राथमिकताओं और कार्यों के बीच ताल-मेल बिठाते हुए मजबूत डिजिटल शासन को शामिल करके, यह कानून ग्रामीण रोजगार को सतत विकास और यथोचित आजीविका के लिए एक कार्यनीतिक साधन के रूप में स्थापित करता है, जो पूरी तरह से विकसित भारत 2047 के विजन के साथ जुड़ा हुआ है।

भारतीय मानस को औपनिवेशिक गुलामी से मुक्त करने की आवश्यकता

समालखा ,पानीपत में आयोजित त्रयोदश राष्ट्रीय महाधिवेशन के समापन सत्र में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के अखिल भारतीय कार्यकारिणी सदस्य एवं अखिल भारतीय इतिहास संकलन योजना के पालक अधिकारी आदरणीय सुरेश सोनीजी ने कहा कि,” पश्चिम केंद्रित प्रत्यय हमारे जीवन प्रणाली, शिक्षा प्रणाली, सामाजिक संरचनात्मक परिदृश्य, कार्य व्यवहार एवं राजनीतिक संस्कृति में  अति व्याप्त हैं,जबतक  औपनिवेशिक मानसिकता को विनष्ट नहीं करेंगे, तबतक  हम ‘ विकसित भारत’ एवं ‘ अग्रणी भारत’ की संकल्पना को गति नहीं दे पाएंगे”।  भारत में औपनिवेशिक मानसिकता ने राष्ट्रीय एकता, अखंडता एवं केंद्रीकरण की अवधारणा को बोझिल किया है, बल्कि सांस्कृतिक स्वतंत्रता में मंदक की भूमिका निभाया है। 1947 के पश्चात भी शिक्षा व्यवस्था, शासकीय संरचना, सामाजिक संरचना, विज्ञान एवं नवोन्मेष में  यूरोपियन दृष्टिकोण व्याप्त है। हम सभी भारतीयों को सन् 2035 तक इस औपनिवेशिक मानसिकता को त्याग करके भारतीय मानस को वीं- औपनिवेशीकरण की अवधारणा को आत्मसात करना होगा।
विभाजनकारी शक्तियां एवं औपनिवेशिक मानसिकता ‘ अग्रणी भारत’ एवं’ परम वैभव भारत’ के निर्माण में बाधक रही है। यह मूर्त शक्तियां भारत की एकता व अक्षुण्णता के लिए निरंतर   चुनौती रहे हैं । विभाजनकारी शक्तियों ने राष्ट्रीय एकता व अखंडता पर निरंतर प्रहार किया है, वही औपनिवेशिक मानसिकता ने भारत को उसकी परंपरागत प्रत्यय, धर्म की व्यापक अवधारणा एवं सनातन संस्कृति से जुड़ने नहीं दिया। सन् 1947 में स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात सत्ता अभिकरण में ‘ पाश्चात्य केंद्रित मानसिकता ‘ के कारण भारत के संस्कृति, विरासत ,लोकतांत्रिक संस्कृति एवं आदर्श के अनुरूप शिक्षा का  उन्नयन नहीं हो सका, शासकीय संरचना, वैज्ञानिक विकासात्मक  कारकों, नवोन्मेष ,चिकित्सा एवं विकास के ‘ नूतन प्रतिमान’ नहीं विकसित कर सका था। भारतीय मानस के विवेकी पटल पर ‘ वीं- औपनिवेशीकरण ‘ की अवधारणा का उन्नयन कर  2035 तक सशक्त करना होगा। हम सभी को हीनभावना त्यागना होगा, हमें अपने सांस्कृतिक विरासत पर  गर्व करना होगा ,अपने जीवन दर्शन में ‘ स्वदेशी’ एवं ‘ भारतीयता’ की भावना को सशक्त करना होगा ।हमें अपने संविधान को भारतीयता की भावना से आत्मसात करना होगा। भारत वैश्विक स्तर पर ‘ लोकतंत्र की जननी’ है। लोकतंत्र भारतीयों के’ डीएनए’ में  हैं।
सवाल यह है कि हम ” वि – औपनिवेशीकरण ” को कैसे भारतीय मानस के ढांचे में रूपांतरित करें ?
 भारतीय शोधार्थी एवं बुद्धिजीवी वर्ग में थॉमस बेडिंगटन मैकाले द्वारा स्थापित शिक्षा  – प्रणाली एवं औपनिवेशिक मानसिकता भारतीय मानस में गहरी जड़े जमा चुकी हैं ,जो प्रत्येक    ‘ इच्छित बदलाव’ में बाधा बनती हैं । सन् 2014 के शासकीय बदलाव एवं मजबूत इच्छा शक्ति की सरकार ने भारतीय मानस के” वि- औपनिवेशीकरण” के दिशा में कई पहल  किया है। नवोदित मेधा के लिए भारत सरकार ने   ‘ नई शिक्षा नीति- 2020 ‘ के सफल क्रियान्वयन के लिए प्रशासकीय स्तर पर सकारात्मक पहल किया है। नागरिक समाज एवं नागरिक सरकार ने भी” वि- औपनिवेशीकरण” के लिए राष्ट्रीय संकल्प लिया है। मैकाले के सोच एवं चिंतन को भारत के काल, ज्ञान ,इतिहास एवं संस्कृति से पूरी तरह  अनाछादित करना नागरिक सरकार के दूरदर्शी सोच है। नागरिक सरकार एवं सांस्कृतिक संगठनों के सद्प्रयासों से भारतीय ज्ञान- प्रणाली को पुन: स्थापित करना एवं भारतीय ज्ञान- परंपरा पर गर्व करने की आवश्यकता पर जोर दिया है, और इनका कहना है कि,”  वि- औपनिवेशीकरण “की मानसिकता भारत के विकास, आत्मनिर्भर भारत एवं विकसित भारत @ 2047 का आधार   – स्तंभ है।
 स्वतंत्रता के  पश्चात् भी सामाजिक, शैक्षणिक ,आर्थिक, साहित्यिक एवं सांस्कृतिक संस्थानों पर  ‘ पश्चिमी कारकों’ का प्रभाव है, एवं भाषा, पोशाक, सांस्कृतिक पहचान एवं मूलभूत विज्ञान की अवधारणाओं की अनदेखी होती रही थीं। विश्वविद्यालयों महाविद्यालयों ,बौद्धिक संस्थाओं एवं वैश्विक स्तर की विचार – विमर्श की संस्थाओं में ज्ञान एवं मेघा , योग्यता एवं  कार्य कुशलता की बजाय ‘ आंग्ल भाषा’ की जानकारी माना जाने लगा ,जिससे भारतीय युवाओं में अपने भाषा, ज्ञान ,प्रतिभा ,इतिहास एवं संस्कृति के प्रति  हीनभावना आने लगी थी।” वि – औपनिवेशीकरण” की संकल्पना को भारत सरकार ‘ राष्ट्रीय शिक्षा नीति- 2020’ के द्वारा ‘ भाषाई समानता ‘ एवं ‘ मातृभाषा के महत्व ‘ के आधार पर उन्नयन  कर रहा है । भारतीय मानस में ” वि – औपनिवेशीकरण” के द्वारा सांस्कृतिक मूल्यों की महत्ता को बढ़ाकर भारतीय युवाओं में ‘ प्रोत्साहन’ ‘ पुरस्कार’ एवं    ‘ मनोबल ‘ के कारकों से उन्नयन करके भारत को  ‘ समग्र विकास’ एवं ‘ अग्रणी राष्ट्र ‘ के रूप में स्थापित करना होगा।
 वैश्विक स्तर पर विश्वविद्यालयों की संकल्पना भारतीय मनीषियों  एवं बौद्धिक  व्यक्तित्वों  का अनमोल देन है। योग की अवधारणा, आयुर्वेद की अवधारणा एवं वास्तु शास्त्र की अवधारणा भारतीय मेधा एवं चिंतन का देन है। वैश्विक स्तर पर काल   – गणना, ग्रह नक्षत्र पर पारंपरिक शोध एवं सांस्कृतिक विविधता में “तार्किकता” का प्रत्यय भारतीय मनीषियों  का देन है। समसामयिक स्तर पर इन अवधारणाओं का योगदान वैश्विक स्तर पर अधिक कलात्मक स्तर पर हो रहा है। यह भारत की ‘ समृद्ध गणना प्रणाली’ की  उपादेयता है। सिंधु घाटी की नगर  – नियोजन व्यवस्था ,सर्वोत्तम वस्तु कलाओं तथा मंदिरों की नक्काशी ,ऐतिहासिक विकासात्मक अवधारणा एवं सांस्कृतिक धरोहरों की समग्रता भारतीयों को वैश्विक राष्ट्र- राज्यों को  देन है।
हमारी विविधता पूर्ण सांस्कृतिक परंपरा में    ‘ सभी रंगों ‘ को सम्मान मिलता हैं।भारत के सांस्कृतिक प्रेरक व्यक्तित्व ,श्री राम जी एवं श्री कृष्ण जी श्याम वर्ण के थे, जो चारित्रिक सौंदर्य एवं  उदारता  के आदर्श थे। हमारे समाज का खान-पान, रहन-सहन, वेशभूषा एवं जीवन शैली प्रकृति के अनुकूल और पर्यावरण के प्रति   धारणीय है। इतिहास का काल विभाजन भी औपनिवेशिक मानसिकता का परिणाम है। हमें अपने परिवार, समाज एवं राष्ट्र को भी ” वि- औपनिवेशीकरण “की मानसिकता से देखना होगा। भारत ‘ सिरमौर राष्ट्र’ तभी होगा जब हम सभी अपनी संकल्पनाओं के प्रति पूरी तरह ‘ भारतीय दृष्टिकोण’ को आत्मसात करें।
भारत का विकास अंग्रेजों के आगमन से पहले हो चुका था। अंग्रेज अधिकारियों के संस्मरणों के अनुसार 18वीं एवं 19वीं शताब्दी में भारत में 10000 से अधिक लौह- भट्ठियां थी, जहां तत्कालीन संयुक्त राज्य( ग्रेट ब्रिटेन) से उन्नत इस्पात बनाया जाता था। तत्कालीन भारत की शिक्षा, सामाजिक व्यवस्था, कृषि, उद्योग एवं प्रौद्योगिकी विकसित थी। विद्वान इतिहासकार धर्मपाल जी ने अपने दो प्रसिद्ध पुस्तकों में  इन तथ्यों  को ऐतिहासिक एवं वैज्ञानिक आधार पर प्रस्तुत किया है। भारत की लोह – इस्पात तकनीकें अंग्रेजों से अधिक उन्नत थी। 18वीं एवं 10वीं सदी में  तत्कालीन समाज में  कृषि, उद्योग, सिंचाई, यातायात एवं सूती वस्त्रों के  उत्पादन के क्षेत्र में उन्नत एवं प्रगतिशील था। खाद्यान्न, दलहन, तिलहन ,फल, फूल, सब्जी, बागवानी एवं  दुग्ध उत्पादन में भारत की स्थिति तत्कालीन इंग्लैंड से बेहतर थीं। 18वीं शताब्दी के दौरान भारतीय खेती की उपज इंग्लैंड से लगभग” दोगुनी” थी। 18वीं सदी तक सूती वस्त्रो का निर्यात उच्चतर स्तर का था जिसके प्रतिक्रियास्वरूप  संयुक्त राज्य( ग्रेट ब्रिटेन) में भारतीय  वस्त्रों के निर्यात पर विरोध प्रारंभ हो गया था।18वीं सदी तक भारत में ‘ चेचक’ के टीके उपलब्ध थे।  शल्य चिकित्सा में भारत के वैद्य  यूरोपीय चिकित्सकों से बेहतर थे। इस तरह भारतीय मानस को गुलामी की मानसिकता से  मुक्ति की आवश्यकता है।
राष्ट्रपति भवन में “परमवीर दीर्घा” का निर्माण औपनिवेशिक मानसिकता के त्यागने एवं देश को मानवीय दृष्टिकोण से  जोड़ने का माध्यम है। राष्ट्रपति भवन की”  परमवीर गैलरी” में देश के नायकों  के चित्र हमारे राष्ट्र के रक्षकों  को हार्दिक श्रद्धांजलि है! वह नायक जिन्होंने अपने सर्वोच्च त्याग से  मातृ भूमि की रक्षा किए, जिन्होंने भारत की एकता व अखंडता के लिए अपने प्राण न्योछावर कर दिए। राष्ट्र ने उनके अदम्य साहस एवं बलिदान के लिए कृतज्ञता व्यक्त कर रहा है।”
     मेरा सुझाव है –
1. अंतःकरण से भारतीय शिक्षा पद्धति, भारतीय चिंतकों एवं मनीषियों  के    ‘ विचारों’ को आत्मसात करना होगा;
2. प्रत्येक स्तर पर ‘ स्वदेशी शिक्षा ‘ को प्रोत्साहित करना होगा;
3. सामयिक  स्तर पर सरकार ‘ प्रतीकों ‘ को हटाकर “वि – औपनिवेशीकरण” का उन्नयन करें;
4. महामहिम ,लॉर्ड्स एवं अन्य औपनिवेशिक शब्दों को व्यक्तिगत स्तर एवं सार्वजनिक स्तर पर त्यागने की आवश्यकता है।
5. ‘ हिस मजेस्टी’ एवं ‘ हर मैजेस्टी  ‘ जैसे शब्दों की जगह  ‘ महोदय’ एवं  ‘ महोदया  ‘ का प्रयोग अंतःकरण की आवश्यकता है।
(लेखक अखिल भारतीय इतिहास संकलन योजना झंडेवालान, नई दिल्ली के राष्ट्रीय सचिव हैं और भारतीय ज्ञान परंपरा, इतिहास एवं  सामयिक विषयों पर गंभीर चिंतन करते हैं )

एलोरा की गुफाओं के चित्रों में हजारों सालों से धड़क रही है भारतीय संस्कृति

एलोरा गुफाएँ भारत में यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल हैं , जिनमें हिंदू, बौद्ध और जैन धर्म की चट्टानों को काटकर बनाई गई गुफाओं का समूह है। महाराष्ट्र के औरंगाबाद जिले में स्थित एलोरा गुफाएं शहर से 29 किलोमीटर दूर हैं। यह दुनिया के सबसे बड़े चट्टानों को काटकर बनाए गए गुफा मंदिर परिसरों में से एक है। प्राचीन समय में कई गुफाएं मंदिरों के रूप में उपयोग की जाती थीं, जबकि अन्य मठ और विश्राम स्थल थे। यह लगभग 100 गुफाओं का एक परिसर है जिनमें जटिल नक्काशी और मूर्तियां हैं। गुफाएँ प्राचीन भारतीय शिला- कट वास्तुकला के सबसे प्रभावशाली उदाहरणों में से एक हैं।खोजी गई 100 गुफाओं में से 34 गुफाएँ जनता के लिए खुली हैं। इनमें 12 बौद्ध गुफाएँ (1-12), 17 हिंदू गुफाएँ (13-29) और 5 जैन गुफाएँ (30-34) शामिल हैं। भारत के इतिहास और संस्कृति में रुचि रखने वाले किसी भी व्यक्ति के लिए ये गुफाएँ अवश्य देखने योग्य हैं।इन गुफाओं में सबसे प्रसिद्ध कैलाश मंदिर नामक एक स्मारक है। यह एक विशाल अखंड संरचना है जिसे एक ही चट्टान से तराशा गया है।

हिंदू बौद्ध और जैन धर्म के पवित्र कलाएं

गुफाएं हमेशा से ही पवित्र स्थल रही हैं, जिन्हें आमतौर पर वेरुल के नाम से जाना जाता है। सदियों से ये गुफाएं तीर्थयात्रियों को आकर्षित करती रही हैं और आज भी करती हैं। एलोरा गुफाओं में मौजूद शिलालेख और नक्काशी बौद्ध धर्म, हिंदू धर्म और जैन धर्म के विभिन्न पहलुओं को दर्शाती हैं।माना जाता है कि इन गुफाओं का निर्माण बौद्ध धर्म के पतन के समय हुआ था। इनकी नक्काशी का काम लगभग उसी समय शुरू हुआ जब पास की अजंता गुफाओं को छोड़ दिया गया था। उस दौरान हिंदू धर्म का प्रभाव बढ़ने लगा था। पूरे क्षेत्र में धार्मिक सद्भाव कायम था। गुफाओं का निर्माण एक-दूसरे के करीब किया गया था, जो इसी सद्भाव को दर्शाता है।

एलोरा गुफा का समय

गुफा स्मारकों की यह निरंतर श्रृंखला छठी से दसवीं शताब्दी के बीच की सभ्यता को जीवंत कर देती है। कुछ ग्रंथों से यह भी पता चलता है कि इसके बाद भी लंबे समय तक इन गुफाओं में लोग रहते रहे।

एलोरा गुफाओं का निर्माण 600 ईस्वी से 1000 ईस्वी के बीच,400 वर्षों की अवधि में हुआ था। जिसमें मुख्य रूप से कलचुरी, चालुक्य और राष्ट्रकूट राजवंशों का योगदान था; इनमें बौद्ध (6वीं-8वीं सदी), हिंदू (6वीं-10वीं सदी) और जैन (9वीं- 12वीं सदी) धर्मों से संबंधित मंदिर और मठ शामिल हैं, जो प्राचीन भारत की धार्मिक सहिष्णुता को दर्शाते हैं।

एलोरा गुफाओं में सहिष्णुता की भावना दिखती है

एलोरा गुफाएं बौद्ध, हिंदू और जैन गुफा मंदिरों का एक प्रभावशाली संगम हैं। इन गुफाओं में बौद्ध चैत्य और विहार, हिंदू मंदिर और जैन तीर्थस्थल शामिल हैं। इस प्रकार,एलोरा गुफाएं उस काल की धार्मिक सद्भाव, सामंजस्य और समकालिकता का प्रतीक हैं। एलोरा गुफा परिसर अपनी अनूठी कलात्मक कृतियों और तकनीकी बुद्धिमत्ता के लिए भी प्रसिद्ध है। इसी कारण एलोरा को 1983 में यूनेस्को द्वारा विश्व धरोहर स्थल घोषित किया गया था।

कैलाश मंदिर सबसे ज्यादा आकर्षक

एलोरा गुफाओं में स्थित कैलाश मंदिर यहाँ का सबसे प्रसिद्ध आकर्षण है। कैलाश मंदिर (गुफा 16), जो एक ही चट्टान को तराशकर बनाया गया है, शिव के निवास स्थान कैलाश पर्वत के समान दिखता है। प्रारंभिक हिंदू गुफाओं में से अधिकांश भगवान शिव को समर्पित थीं।

एलोरा गुफाओं की वास्तुकला

एलोरा गुफाओं की वास्तुकला में विभिन्न प्रकार की शैलियाँ और तकनीकें देखने को मिलती हैं। पश्चिमी दक्कन के विभिन्न स्थानों पर चट्टानों को काटकर की जाने वाली कलाकृतियों पर इसका महत्वपूर्ण प्रभाव है, साथ ही दक्षिण भारत में संरचनात्मक गतिविधियों पर भी इसका प्रभाव है।

सामान्य तौर पर, एलोरा की गुफाएँ चट्टानों को काटकर बनाई गई वास्तुकला शैली के अंतिम चरण से उभरती हुई स्वतंत्र संरचना वास्तुकला की ओर संक्रमण का प्रतीक हैं। ये भारतीय मंदिर वास्तुकला के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। सबसे पुराने मंदिरों की संरचना सरल होती है। इनमें मंदिर के सामने स्तंभों के बिना छोटे-छोटे गलियारे होते हैं। और दरवाजों के फ्रेम और स्तंभ आमतौर पर सादे होते हैं। इसमें कैलाश मंदिर, छोटा कैलाश और इंद्र सभा जैसी अखंड संरचनाएं निर्मित इमारतों की नकल करती हुई प्रतीत होती हैं। ये स्वतंत्र रूप से खड़े मंदिर थे जिनमें खुले बरामदे और बंद मंडप थे, साथ ही गर्भगृह भी थे। यहां एक हिंदू मंदिर की विशिष्ट विशेषताएं दिखाई देंगी: गर्भगृह जिसमें लिंगम स्थापित है, परिक्रमा करने के लिए एक स्थान, एक सभा कक्ष और एक प्रवेश द्वार।

15 मीटर ऊंची प्रतिमा बुद्ध की प्रतिमा

एलोरा में स्थित जैन गुफाएं हिंदू और बौद्ध गुफाओं से छोटी हैं। इन गुफाओं में मंडप और स्तंभों वाला बरामदा जैसी स्थापत्य विशेषताएं मौजूद हैं।परिसर में स्थित बौद्ध गुफाओं में मठ और मंदिर हैं। विश्वकर्मा गुफा (गुफा 10) सबसे उल्लेखनीय है।इस स्थल पर और भी कई गुफाएँ और मूर्तियाँ हैं। भगवान बुद्ध की 15 मीटर ऊंची प्रतिमा भी यहाँ की एक और खास विशेषता है। यह एक समर्पित प्रार्थना स्थल है, और इसके अंदर आपको उपदेश देने की मुद्रा में विश्राम करते हुए बुद्ध की 15 फुट ऊंची प्रतिमा मिलेगी।

कैलाश मंदिर की शैली में निर्मित छोटा कैलाश (गुफा 30) एलोरा गुफाओं में सबसे अधिक दर्शनीय जैन मंदिर है। इंद्र सभा (गुफा 32) भी प्रसिद्ध है। यह सभी गुफाओं में सबसे बड़ी और सबसे उत्तम है।

एलोरा गुफाओं का इतिहास

एलोरा गुफाओं का इतिहास चार शताब्दियों पुराना है। हालांकि गुफाओं की खुदाई की समयरेखा स्पष्ट नहीं है, लेकिन माना जाता है कि हिंदू और बौद्ध गुफाओं का कुछ हिस्सा राष्ट्रकूट राजवंश के दौरान बनाया गया था। जैन गुफाओं का निर्माण यादव शासनकाल में हुआ माना जाता है।

बौद्ध गुफाओं (1 से 12) की खुदाई छठी और आठवीं शताब्दी के बीच हुई मानी जाती है। और जैन गुफाओं (30 से 34) की खुदाई नौवीं और बारहवीं शताब्दी के बीच हुई थी। हिंदू गुफाओं की खुदाई दो चरणों में की गई थी। इनमें से कुछ गुफाओं की खुदाई बौद्ध या जैन गुफाओं से भी पहले की गई थी। नौ गुफाओं (17 से 25) की खुदाई छठी शताब्दी के आरंभ में की गई थी, जिसके बाद चार और गुफाओं (26 से 29) की खुदाई की गई। अन्य हिंदू गुफाओं (13 से 16) का निर्माण सातवीं और दसवीं शताब्दी के बीच हुआ था।

एलोरा गुफाओं की महत्वपूर्ण बातें

भारत में एलोरा गुफाओं में 100 से अधिक चट्टानों को काटकर बनाई गई गुफाएं हैं। हालांकि, इनमें से केवल 34 गुफाएं ही जनता के लिए खुली है।

1. हिंदू मंदिरों का भ्रमण – एलोरा गुफाओं की सूची में, गुफा संख्या 13 से 29 तक हिंदू गुफाएं हैं। इनमें सबसे प्रमुख हैं गुफा संख्या 15 (दशावतार), गुफा संख्या 16 (कैलासा मंदिर) और गुफा संख्या 21 (रामेश्वर)। कैलाश मंदिर अपनी भव्य नक्काशी के लिए प्रसिद्ध है, दशावतार गुफा में मुख्य रूप से भगवान शिव और भगवान विष्णु के विभिन्न रूपों को दर्शाया गया है, और रामेश्वर गुफा अपनी मूर्तिकला के लिए प्रसिद्ध है। गुफा संख्या 29 (दुमर लेना) भी लोकप्रिय है। यह सीता-की-नहानी के किनारे स्थित है, जो एलागंगा नदी के झरने से बना एक छोटा सा तालाब है।

2. बौद्ध मठों का भ्रमण – एलोरा गुफाएँ: गुफा संख्या 1 से 12 तक बौद्ध मठ स्थित हैं। इनमें से गुफा संख्या 10 (विश्वकर्मा), गुफा संख्या 11 (दो ताल) और गुफा संख्या 12 (तीन ताल) विशेष रूप से प्रभावशाली हैं। विश्वकर्मा गुफा में बुद्ध का एक विशाल स्तूप है, दो ताल दो मंजिला मठ है और तीन ताल तीन मंजिला मठ है। सभी बौद्ध गुफाओं में बुद्ध के चित्र और मूर्तियां तथा बौद्ध पौराणिक कथाओं के प्रतीक उकेरे गए हैं।

3. जैन तीर्थ स्थलों का भ्रमण – एलोरा में जैन गुफाएँ गुफा संख्या 30 से 34 तक हैं। इनमें से सबसे उल्लेखनीय हैं गुफा संख्या 30 (छोटा कैलाश), गुफा संख्या 32 (इंद्र सभा) और गुफा संख्या 33 (जगन्नाथ सभा)। छोटा कैलाश हिंदू कैलाश मंदिर की एक अधूरी प्रतिकृति जैसा है, इंद्र सभा जैन तीर्थ स्थलों की एक श्रृंखला है, और जगन्नाथ सभा में कुछ अच्छी तरह से संरक्षित मूर्तियाँ हैं। सभी जैन गुफाओं में सूक्ष्म और नाजुक नक्काशी की गई है और इनमें दिगंबर संप्रदाय को समर्पित चित्र हैं।

 

4. कैलाश मंदिर का भ्रमण – कैलाश मंदिर एक प्राचीन शिलाखंड काटकर निर्मित मंदिर परिसर है जिसमें भगवान शिव को समर्पित एक गर्भगृह है। इसमें एक विशाल अखंड शिवलिंग है। मंदिर में हिंदू महाकाव्यों रामायण और महाभारत की घटनाओं को दर्शाने वाली मूर्तियां हैं। पूरे मंदिर का आधार, दीवारें और छत सूक्ष्म और विस्तृत नक्काशी से सुशोभित हैं। और सभी शिव मंदिरों की तरह, केंद्रीय गर्भगृह के सामने बरामदे में नंदी की प्रतिमा स्थापित है। यह सारा काम छेनी और हथौड़े जैसे साधारण औजारों से किया गया था।यह मंडप द्रविड़ शैली के शिखर और 16 स्तंभों पर टिका हुआ है। मंदिर के सामने नंदी की प्रतिमा स्थापित है। ऐसा प्रतीत होता है कि भारत के विभिन्न क्षेत्रों के कारीगरों ने यहाँ काम किया है। कैलाश मंदिर भारतीय गुफा वास्तुकला का एक ज्ञानकोश है।

एलोरा-अजंता गुफाएं एक जैसी नहीं

अजंता पूरी तरह से बौद्ध हैं और अपने अद्भुत चित्रों (भित्तिचित्रों) के लिए प्रसिद्ध हैं, जबकि एलोरा में बौद्ध, हिंदू और जैन धर्मों का मिश्रण है और यह कैलास मंदिर जैसे विशाल रॉक-कट मंदिरों के लिए जाना जाता है, जो एक ही चट्टान को काटकर बनाए गए हैं, और एलोरा की गुफाएँ पास-पास हैं, जबकि अजंता की गुफाएँ थोड़ी दूर हैं। संक्षेप में, अजंता कला और चित्रों के लिए है, जबकि एलोरा विभिन्न धर्मों के अद्भुत वास्तुकला और धार्मिक सहिष्णुता का संगम है।

क्षति के कारक

एलोरा गुफाएँ पूरी तरह नष्ट नहीं हुईं, बल्कि दिल्ली सल्तनत और मुगल काल (15वीं-17वीं सदी) के दौरान मुस्लिम शासकों द्वारा मूर्तियों और चित्रों को नुकसान पहुँचाया गया, खासकर औरंगज़ेब ने कैलाश मंदिर को तोड़ने की कोशिश की, लेकिन यह असफल रहा; आज भी प्राकृतिक कारणों : पानी का रिसाव और मानवीय उपेक्षा से इन्हें खतरा है, पर ये यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल के रूप में मौजूद हैं।

 

लेखक परिचय:-

(लेखक भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण, में सहायक पुस्तकालय एवं सूचनाधिकारी पद से सेवामुक्त हुए हैं। वर्तमान समय में उत्तर प्रदेश के बस्ती नगर में निवास करते हुए सम सामयिक विषयों,साहित्य, इतिहास, पुरातत्व, संस्कृति और अध्यात्म पर अपना विचार व्यक्त करते रहते हैं। वॉट्सप नं.+919412300183)

साहित्यिक प्रतियोगिताओं में विद्यार्थियों ने दिखाया बौद्धिक कौशल

कोटा।  बसंत विहार स्थित अकलंक कॉलेज ऑफ एजुकेशन में आयोजित मुक्ताकाश सत्र ‘उमंग 2025’  में कविता पाठ, आशु भाषण एवं वाद–विवाद प्रतियोगिताओं का आयोजन किया गया।  प्रतियोगिताओं में विद्यार्थियों ने उत्साहपूर्वक भाग लेकर अपनी साहित्यिक, वक्तृत्व एवं तार्किक प्रतिभा का  प्रदर्शन किया।
कार्यक्रम का शुभारंभ अकलंक विद्यालय एसोसिएशन के अध्यक्ष श्री पियूष जैन, प्राचार्या डॉ. पिंकी श्रीवास्तव, उप-प्राचार्या श्रीमती नम्रता जैन,  सांस्कृतिक कार्यक्रम समन्वयक डॉ. किरण गुप्ता एवं डॉ. मिशा शर्मा, कार्यक्रम प्रभारी डॉ इंदु बाला शर्मा,श्री के. के. गोस्वामी एवं श्री हर्ष जैन तथा अन्य वरिष्ठ संकाय सदस्यों द्वारा माँ शारदे के समक्ष दीप प्रज्वलन के साथ हुआ।
 देशभक्ति  पर आयोजित कविता प्रतियोगिता में विद्यार्थियों ने शहीदों के बलिदान, राष्ट्र की एकता एवं संविधानिक मूल्यों को काव्यात्मक अभिव्यक्ति दी। प्रतियोगिता में विशाल पॉटर ने प्रथम स्थान, अक्षिता गौतम ने द्वितीय स्थान एवं चिरायुशी सैनी ने तृतीय स्थान प्राप्त किया। कविता पाठ प्रतियोगिता का संयोजन श्री के. के. गोस्वामी एवं श्री हर्ष जैन द्वारा किया गया।
डॉ. इंदु बाला शर्मा के संयोजन में आयोजित वाद–विवाद प्रतियोगिता का विषय “ए.आई. (कृत्रिम बुद्धिमत्ता): वरदान या अभिशाप” में विद्यार्थियों ने तकनीकी विकास के सकारात्मक–नकारात्मक पहलुओं एवं नैतिक प्रश्नों पर अपने तर्क प्रस्तुत किए। प्रतियोगिता में विभूति सिंह हाड़ा (बी.एससी. बी.एड.) ने प्रथम स्थान, प्रिंस जैन (बी.ए. बी.एड. प्रथम वर्ष) ने द्वितीय स्थान तथा वैष्णवी सिंह (बी.एड. प्रथम वर्ष) ने तृतीय स्थान प्राप्त किया।
आशु भाषण प्रतियोगिता का संयोजन श्रीमती कुसुम शर्मा द्वारा किया गया, जिसमें विद्यार्थियों ने आत्मविश्वास, विषय-ज्ञान एवं प्रभावी अभिव्यक्ति का परिचय दिया। प्रतियोगिता में कांची (बी.एड. प्रथम सेमेस्टर) ने प्रथम स्थान, विभूति सिंह हाड़ा (बी.एससी. बी.एड. तृतीय सेमेस्टर) ने द्वितीय स्थान तथा वैष्णवी सिंह (बी.एड. तृतीय सेमेस्टर) ने तृतीय स्थान प्राप्त किया।
प्रतियोगिताओं के निर्णायक मंडल के रूप में श्रीमती शुचि सेठी एवं श्रीमती लविशा सावलिया उपस्थित रहीं, जिन्होंने प्रस्तुतियों का निष्पक्ष मूल्यांकन किया। कार्यक्रम का सशक्त मंच संचालन अहिंसा गोस्वामी एवं रक्षित प्रजापति द्वारा किया गया।
 कार्यक्रम के अंत में प्राचार्या डॉ. पिंकी श्रीवास्तव एवं उप-प्राचार्या श्रीमती नम्रता जैन द्वारा निर्णायक मंडल को स्मृति चिह्न प्रदान कर सम्मानित किया गया तथा सभी प्रतिभागियों को उज्ज्वल भविष्य के लिए शुभकामनाएँ दी गईं। समापन अवसर पर संयोजक डॉ. इंदु बाला शर्मा ने सभी अतिथियों, निर्णायकों, आयोजकों एवं प्रतिभागियों का आभार व्यक्त किया।